भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ७३५ भल्लातकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः इष्टकाचूर्णसंयुक्तं फलं भल्लातकोद्भवम् । पोट्टलीमध्यनिहितं घर्षयेन्नातिवेगतः ॥४७७॥ ततः प्रतप्ततोयेन क्षालयेदतियत्नतः । इत्थं तैलत्वचाहीनं भल्लातं शुद्धिमाप्नुयात् ॥४७८॥ भल्लातकशोधनप्रकार आद्यः—त्रिचतुर्गुणवस्त्रकृतपोट्टलिकायां इष्टिकाचूर्णं भल्लातकफलानि च निक्षिप्य औषधनिर्माणकुशलः घर्षयेत् । घर्षणेन तैला- धारत्वचापसारः । निर्यातं तैलं च विशुष्यतीष्टकाचूर्णेषु । तत उष्णैर्जलैः प्रक्षाल्य भेषजेषु योजयेत् । तैलमेवास्य दाहव्रणशोथादिकरम् । शोधनात्प्राक् नारिकेलतैलं हस्तयोर्म्रक्षणीयम् ॥४७७, ४७८॥ भा.टी.—एक कपड़े की दृढ़ पोटली अथवा थैली में भिलावे के फल और ईंट का बारीक चूर्ण भरकर उसको हाथों के सहारे मध्यम दबाव से रगड़ें। जब ईंट का चूर्ण तैल से तर हो जाय अर्थात् जब इसकी त्वचा निकल जाय तो इसको गरम पानी में डालकर अच्छी तरह धोकर साफ कर लें। इस विधि से भिलावे शुद्ध हो जाते हैं ॥४७७, ४७८॥ वक्तव्य—ईंट के चूर्ण में डालने से पूर्व भिलावाफलों की टोपी को चाकू से काट लेना चाहिए और रगड़ने के पूर्व हाथों में नारियल का तैल अच्छी तरह मल लेना चाहिए। द्वितीयः शोधनप्रकारः भल्लातकफलानीह नारिकेलाम्बुयोगतः । स्विन्नानि दोलिकायन्त्रे शुद्धिमायान्त्यनुत्तमाम् ॥४७९॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः—नारिकेलजलद्वारा स्वेदनात् साध्यः । स्वेदनञ्च खण्डशः कृतभल्लातकफलानां विधेयम् । तथा सति स्विन्नानि उपभोगयोग्यानि भवन्ति भल्लातकानि ॥४७६॥ भ.टी.—भिलावे के फलों को काटकर दो टुकड़े करलें, अब इनको दोलायन्त्र में डाल उसमें नारियल का जल भर दें और एक दो घण्टे तक उबालें। इस विधि से भी भिलावे शुद्ध हो जाते हैं ॥४७६॥ वक्तव्य — भल्लातकफलों को उक्त विधि से शोधन करने के बाद एक बार दोलायन्त्र द्वारा गोदुग्ध में अच्छी तरह स्वेदन कर लेने से अन्तःप्रयोग में इनके द्वारा कोई हानि होने की सम्भावना नहीं रहती है।