रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७ चतुर्विंशस्तरङ्गः ७३७ योगों का सेवन शीघ्र लाभ करता है। भल्लातक का प्रयोग उष्णऋतु में नहीं करना चाहिए। इसके प्रयोगकाल में लवण, धूप में भ्रमण और मैथुन अपथ्य समझना चाहिए। पित्तप्रकृति रक्तपित्ती गर्भिणी और वृक्करोगी को इसका सेवन नहीं कराना चाहिए। इसके अधिक मात्रा में खाये जाने पर मूत्र लाल और मात्रा में थोड़ा हो जाता है। त्वचा पर कोठ और स्फोट आदि हो जाते हैं। इन विकारों की शान्ति के लिए नारियल का तैल, तिल तथा हरीतकी का सेवन करना चाहिए। भल्लातकस्य मात्रा गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जातितयसंमितम्। भल्लातकं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥४८२॥ भा.टी—रोगी तथा शरीर का बल और देश-काल, प्रकृति का पूर्ण विचार करके एक रत्ती से लेकर तीन रत्ती तक शुद्ध भिलावे की मात्रा समझनी चाहिए। भल्लातकस्य आमयिकः प्रयोगः हरीतकीतिलगुडयुतं भल्लातकं समम्। निषेवितं प्लीहपाण्डुज्वरघ्नं श्वासकासनुत् ॥४८३॥ भल्लातकस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—सममिति हरीतकीतिलगुडभल्लातकाः समाः परिग्राह्याः ॥४६३॥ भा.टी.—शुद्ध भल्लातकचूर्ण, हरीतकीचूर्ण, तिलचूर्ण और गुड़; प्रत्येक समभाग लेकर एकत्र पीसकर बनायी हुई गोलियों का सेवन करने में प्लीहा- वृद्धि, पाण्डुरोग, ज्वर, श्वास और कास में आराम आता है ॥४८३॥ भल्लातकरसायनम् शुण्ठीविडङ्गलौहाढ्यं भल्लातं विमलीकृतम्। मध्वाज्यसंयुक्तं युक्तं मासत्रितयसेवनात् ॥४८४॥ रक्तवृद्धिं करोत्येतद् बलं चैव विवर्द्धयेत्। नवयौवनलावण्यं जनयत्यविकल्पतः ॥४८५॥ समाख्यातमिदं नाम्ना भल्लातकरसायनम्। सेवितव्यं सदा यत्नाद्रक्ताल्पत्वनिवृत्तये ॥४८६॥ भल्लातकरसायनम्-व्याख्यासमपाठम्। यद्यपि तन्त्रान्तरेषु भल्लातकरसायन- प्रयोगो नैकविधः श्रूयते, तथापि स्वल्पव्ययं बहुफलं निरापदमावश्यकगुणयोगिप्रका- रममुमेव समामनन्त्याचार्या इत्यवधेयम्। यत्नात् पथ्यरन्नाद्धारेति भावः ॥४८६॥