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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages
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७२० रसतरङ्गिणी भङ्गायाः प्रथमः शोधनप्रकारः मातुलानीं शुष्कपत्रां सलिले तु निमज्जयेत् । निष्पीड्य शुष्कां गव्याज्ये भर्जयेन्मन्दवह्निना ॥३६४॥ सुभृष्टामथ विज्ञाय सत्वरं तु समाहरेत् । इत्थं विशोधितां भङ्गां सर्वत्र विनियोजयेत् ॥३६५॥ भा.टी.—सूखी हुई भांग के पत्रों को जल में भिगोकर निचोड़ लें । अब इन पत्तों को धूप में सुखाकर गोघृत में मन्द-मन्द अग्नि से भून लें । जब अच्छी तरह भुन जायँ तो इन्हें नीचे उतार रख लें । इस तरह भांग के पत्ते शुद्ध हो जाते हैं । इन्हें सर्वत्र भांग के प्रयोगों में काम लायें ॥३६५॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः भङ्गां विशुष्ककामादाय बब्बूलत्वक्कषायतः । स्वेदयेद् घटिकार्द्धं तु मध्यमप्रानलयोगतः ॥३६६॥ विज्ञाय विजयां स्विन्नां घर्मे खलु विशाषयेत् । एवं संस्वेदिता भङ्गां शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥३६७॥ एवं विशोधितां भङ्गां पिष्ट्वा गोदुग्धयोगतः । कामोद्दीपनयोगेषु विशेषेण नियोजयेत् ॥३६८॥ भङ्गा तिक्ता लघुस्तीक्ष्णा ग्राहिणी कफहारिणी । दीपना पाचनी चैव पित्तला मदकारिणी ॥३६९॥ भा.टी.—सूखे हुए भांग के पत्तों को लेकर उन्हें बबूर की छाल के क्वाथ में २५ या तीस मिनट तक मध्यम अग्नि में स्वेदन करें । जब अच्छी तरह से उबल जायँ तो क्वाथ से निकालकर धूप में सुखा लें । इस प्रकार बबूर के क्वाथ में उबाली हुई भांग उत्तम रूप से शुद्ध हो जाती है । उक्त विधि से शुद्ध की हुई भांग को गोदुग्ध के साथ पीसकर कामोद्दीपक योगों में विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है । भांग के पत्ते रस में कड़वे, लघुगुण और तीव्र प्रभावक होते हैं । इसका शरीर में, विशेषतः महास्रोतों में ग्राही प्रभाव होता है । इसके सेवन से कफप्रकोप शान्त हो जाता है, अग्नि दीप्त होती तथा आमरस का परिपाक होता है । इसके सेवन से शरीर में पित्त की वृद्धि होती है और नशा आता है ॥३६६–३६६॥ भङ्गाया विशिष्टगुणाः भङ्गा ह्युद्दीपनी चैव ध्वजभङ्गहरा परम् ।

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स्वप्नमेहहरा चैव शुक्रस्तम्भनकारिणी ॥४००॥ निद्राप्रदायिनी कामं कामोद्दीपनकारिणी । प्रलापनाशिका चैव धनुःस्तम्भहरा तथा ॥४०१॥ आन्त्रशूलहरा चैव वृक्कशूलप्रणाशिनी । पित्तशोषजशूलघ्नी त्वामाशयबलप्रदा ॥४०२॥ अजीर्णजातिसारघ्नी तथाजीर्णनिवारिणी । उन्मादनाशिनी चैव वृक्कशोथंव्यथाहरा ॥४०३॥ मूत्रला रक्तसंयुक्तमूत्रस्रावनिवारिका । विचित्रानन्दजननस्वप्नसन्तानकारिका ॥४०४॥ अर्शोव्यथाहरा चैव किञ्चिज्ज्वरनिवारिका । व्रणमेहसमुद्भूतशिश्नोत्थानव्यथाहरा ॥४०५॥ नाडीदौर्बल्यसम्भूतं तथाक्षेपसमुत्थितम् । रजःशूलं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥४०६॥ आमाशयोत्थशूलघ्नी यक्ष्मकासहरा परम् । बस्त्याक्षेपहरा चैव साक्षेपतमकापहा ॥४०७॥ दारुणाक्षेपसंयुक्तमतिकष्टप्रदायिनम् । परं सङ्क्रामकं कासं विनिहन्ति विशेषतः ॥४०८॥ रजोनिवृत्तिकाconsumerलोत्थां प्रौढावस्थाक्षये तथा । शीर्षव्यथां तु नारीणां विनिहन्ति सुदारुणाम् ॥४०६॥ गर्भस्रावसमुद्भूतां मासिकस्रावकालजाम् । रक्तप्रदरजां वापि वृद्धां रक्तस्रुतिं जयेत् ॥४१०॥ आलपन् विस्मरेद् यन्त्रं स्वकीयं पूर्वभाषितम् । दौर्बल्यं मानसोद्भूतं विनाशयति सत्वरम् ॥४११॥ अन्नजातं तु निखिलं भुक्तं यत्र न जीर्यति । अजीर्णं नाशयत्याशु सारुचिं क्षुद्विवर्जितम् ॥४१२॥ अर्द्धावभेदकोपेताकाचरोगनिवारिका । सङ्कोचनी तथा श्रोत्रदृष्टिशक्तिविवर्द्धिनी ॥४१३॥ भङ्गायाः गुणाः—क्षुद्दीपनो क्षुधावृद्धिकरी, पित्तशोषजशूललक्षणं नारि- केललवणस्य गुणव्याख्याने द्रष्टव्यम् । अजीर्णजातिसारघ्नीति अजीर्णजातमती- सारं हन्ति । विचित्रानन्दजननेत्यादि—अस्याः प्रयोगात् निद्राविष्टः पुरुषः

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७९२ रसतरङ्गिणी स्वप्ने विचित्राण्यानन्दजननानि रूपाणि पश्यति । शिश्नोत्थानं ध्वजहर्षः । वस्त्याक्षेपः मूत्राशये जायमानः आक्षेपः ॥३६६-४१३॥ आ.टी.—भांग क्षुधा बढ़ानेवाली और उत्तम ध्वजभंगरोगहर है । इसके सेवन से स्वप्नप्रमेह (Night-discharge) में आराम आता है और वीर्य की स्तम्भनशक्ति बढ़ जाती है। इसके सेवन से अच्छी नींद आती है और कामोद्दीपन होता है। यदि रोगी अधिक प्रलाप आदि करता हो तो इसके योग देने से वह निद्रा में बदल जाते हैं। धनुःस्तम्भ रोग में इसके सेवन से लाभ होता है। आन्त्रशूल तथा वृक्कों में शूल होने पर इसके योग को दिया जाता है। पित्तशोष के कारण होनेवाले शूल को यह नष्ट करती है और आमाशय के बल को बढ़ाती है। अजीर्ण के कारण होनेवाले अतीसार तथा अजीर्ण रोग को नष्ट करती है। इसके योगों को उन्माद रोग में दिया जाता है और इससे वृक्कशोथजन्य पीड़ा भी शान्त हो जाती है। यह मूत्र को अधिक मात्रा में लाती है और रक्तमिश्रित मूत्रस्राव को रोकती है। स्वस्थावस्था में इसके सेवन से विचित्र आनन्ददायक निद्रा की वृद्धि होती है। बाह्यप्रयोग में बवासीर के मस्सों का कष्ट दूर होता है। साधारण रूप से ज्वर को भी मिटाती है। सुजाक में होनेवाली मेढ़ेन्द्रिय-स्तब्धता की पीड़ा को इसके लेप आदि से शान्ति मिलती है। इसके सेवन से नाड़ियों की दुर्बलता के कारण आक्षेपयुक्त माहवारी की पीड़ा अति शीघ्र दूर हो जाती है। आमाशय में शोथ के कारण होनेवाले शूल तथा राजयक्ष्मा के कास में इसके सेवन से शीघ्र आराम आता है। यदि किसी कारण वस्ति में आक्षेप हो अथवा शरीर में आक्षेपयुक्त तमक श्वास हो तो इसके योगों से लाभ होता है। अत्यन्त कष्टदायक तथा तीव्र आक्षेपयुक्त संक्रामक कास (हूपिंग कफ) में इससे विशेष लाभ देखा जाता है। स्त्री की प्रौढावस्था के अन्त में जब उसकी माहवारी बन्द हो जाती है तो इसके कारण शिर में कभी-कभी या हर समय तीव्र वेदना होती है। इस वेदना के लिए भांग के योग लाभकारी होते हैं। गर्भस्राव या गर्भपात के कारण होनेवाली अधिक रक्तप्रवृत्ति अथवा मासिक स्राव के समय, या रक्त- प्रदरजन्य अधिक रक्तप्रवृत्ति में भी इसके योगों के सेवन से आराम आता है। इस प्रकार की मानसिक दुर्बलता में जब मनुष्य बात करते हुए अपनी पहलो बात को भूल जाय तो इसके कुछ काल तक बहुत अल्प मात्रा में सेवन करने से यह मानसिक दुर्बलता मिट जाती है। ऐसे अजीर्ण में जहाँ किसी प्रकार का खाना-पीना हजम न होता हो और भोजन में अरुचि के साथ भूख भी नहीं

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लगती हो तो इसके योगों के सेवन से आराम आता है। आधे शिर में पीड़ा के साथ होनेवाला काच रोग (मोतिया बिन्द) अर्थात् नीला मोतिया में इसके सेवन से आराम आता है। इसके सेवन से अथवा बाह्यप्रयोग से स्था- निक रक्तवाहिनी में संकोच हो जाता है और कर्ण एवं नेत्रों को श्रवण एवं दर्शन शक्ति बढ़ती है ॥३६६-४१३॥ वक्तव्य—विजया थोड़ी मात्रा में अग्निदीपक एवं क्षुधावर्धक है। अहिफेन के समान अतीसार प्रवाहिकाहर है, किन्तु मलबन्धक नहीं है। इसका विशेष प्रभाव मस्तिष्क पर होता है। थोड़ी मात्रा में यह हर्षजनक, मध्यम मात्रा में प्रलापक और अति मात्रा में निद्राजनक है। प्रथमावस्था में खानेवाले को शारीरिक और मानसिक परिश्रम का स्मरण नहीं रहता है और वह बहुत प्रसन्नचित्त प्रतीत होता है। उसे समय और व्यक्ति का ठीक ठीक ज्ञान नहीं रहता है। दूसरी अवस्था में अर्थात् जब विजया की मात्रा कुछ अधिक हो तो मादक (नशा) प्रभाव होता है। मनुष्य प्रत्येक बात पर खूब हँसता और उच्छृङ्खल होकर बोलता है। यदि अधिक मात्रा दी जाय तो मनुष्य निद्रित और शिथिल हो जाता है। मस्तिष्क के अतिरिक्त वातनाड़ियों पर भी इसका प्रभाव होता है। संज्ञावाहिनियों के निःसंज्ञ हो जाने से संज्ञानाशक प्रभाव त्वचा पर होता है। शरीर की शूल न्यून हो जाती या लुप्त हो जाती है। अतः विजया शूलहर है। यद्यपि विजया का शूलहर प्रभाव अहिफेन और धतूर की अपेक्षा कुछ निर्बल है। यदि मांसपेशियों में तीव्र उद्धर्त आक्षेप हो तो वे भी विजया के द्वारा शान्त हो जाते हैं, जिससे आक्षेप रोग, हनुस्तम्भ- रोग तथा अन्य वातरोग में आराम आता है। थोड़ी मात्रा में देने से यह उत्पादक अंगों का बल बढ़ाने के कारण बाजीकरण भी है। भंगाया मात्रा द्विगुञ्जातः समारभ्य चतुर्गुञ्जमितां परम्। भङ्गां खलु प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥४१४॥ भा.टी.—रोग तथा रोगी का बलाबल देखकर, देश, काल आदि का निश्चय करके विजया को दो रत्ती से लेकर चार रत्ती की मात्रा तक प्रयोग करना चाहिये। ४१४॥ भंगाया आग्रिमकः प्रयोगः आर्द्रा विशुष्का वा भङ्गा त्वजादुग्धेन पेषिता। प्रलिप्ता पादतलयोः निद्रां जनयति द्रुतम् ॥४१५॥

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७२४ रसतरङ्गिणी भङ्गा सुश्लक्ष्णसंपिष्टा शिलायां विमलाम्भसा । कोष्णोपनाहयोगेन कथिताशोर्व्यथाहरा ॥४१६॥ धूम्रपानविधानेन भङ्गा युक्त्याथवाशिता ॥ साक्षेपं तमकश्वासं कासं संक्रामकं हरेत् ॥४१७॥ आमयिकप्रयोगे—धूम्रपानविधानेन प्रयुक्ता अथवा अशिता भङ्गिता साक्षेपं तमकश्वासं तथा सङ्क्रामकं कासं “Whooping Cough” इति ख्यातं हरति ॥ भा.टी.—गीली या सूखी भांग की पत्तियों को खरल में बकरी के दूध के साथ पीस कर पैरों के तलवों पर लेप करने से शीघ्र ही नींद आने लगती है। बवासीर के मस्सों में अधिक पीड़ा होने पर भांग की पत्तियों को सिल पर जल के साथ पीसकर इसकी गुनगुनी पुलटिस गुदा पर बाँधने से पीड़ा शान्त हो जाती है। आक्षेप युक्त तमकश्वास ( दमा ) में भांग का धूम्रपान करने से दमा का दौरा कम हो जाता है। संक्रामक कास ( Whooping Cough ) में थोड़ी सी भांग खिलाने अथवा भांग के योग देने से कास का आक्षेपयुक्त कष्ट कम हो जाता है ॥४१५-४१७॥ मदनोदयमोदकः जातीपत्रीफले मांसी लवङ्गं चन्द्रकुङ्कुमम् । एला दारुसिता व्योषं वङ्गं जीरकमभ्रकम् ॥४१८॥ लोहं च रससिन्दूरं पृथक् तोलकसंमितम् । शतावरी गोक्षुरको द्राक्षा कर्कटशृङ्गिका ॥४१९॥ बलात्मगुप्ता कुष्ठं च वृद्धदारकबीजकम् । चूर्णीकृतं सर्वमेतत् पृथक कर्षद्वयोन्मितम् ॥४२०॥ भङ्गा विशोधिता चैव पूर्वचूर्णांर्द्धसंमिता । सितां सर्वद्विगुणितां दत्त्वा रसविशारदः ॥४२१॥ आरभ्य माषत्रितयाद्रसमाषकसंमितान् । निर्मापयेन्मोदकांस्तु खलु मोदकपाकवित् ॥४२२॥ नामतोऽयं समाख्यातो मदनोदयमोदकः । मदनोद्दीपनकरो विशेषात्परिकीर्तितः ॥४२३॥ शृतं परं घनीभूतं सितैलासंयुतं पयः । अनुपाने प्रयोक्तव्यं तदतीव हि बृंहणम् ॥४२४॥

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ७२५ मोदकस्यास्य सततं मासत्रयनिषेवणात् । कामरूपो भवेन्मर्त्यस्तथा भीमपराक्रमः ॥४२५॥ स्मरस्मयस्मेरदृशो नवयौवनघूर्णिताः । प्रमदास्तोषयत्यस्य सेवकोऽपतितध्वजः ॥४२६॥ मदनोदयमोदकः-जातिपत्रीफले इति जातिपत्री जातिफलञ्चेति । मांसी जटा- मांसी, चन्द्रः कर्पूरम्, दारुसिता गुडत्वक् । विशोधिता भंगा जातिपत्यादीनां चूर्णादर्द्धपरिमाणा ग्राह्या । रसमाषकसंमितानीति षएमाषकप्रमितान्॥४१८-४२६॥ भा.टी. - जावित्री, जायफल, जटामांसी, लौंग, कपूर, काश्मीरी केसर, छोटी इलायची बीज, दालचीनी, सोंठ, मिर्च, पीपल, बंगभस्म, अभ्रक (कृष्ण) भस्म, लोहभस्म, रससिन्दूर, प्रत्येक एक-एक तोला, शतावर चूर्ण, गोखरूचूर्ण, मुनक्का या किसमिस, काकड़ासिंगीचूर्ण, खरेटीमुलचूर्ण, कौंचबीजचूर्ण, बीज- बन्द, कूट, विधाराबीजचूर्ण, प्रत्येक दो-दो तोला लें । भांग का चूर्ण इन सब से आधा भाग, खांड़ भांगसहित सब औषधियों से दुगुनी लें । अब सबको एकत्र अच्छी तरह पीसकर (खांड को छोड़कर) रख लें । खांड की चाशनी बना उसमें जावित्री आदि अन्य सब औषधियों को मिलाकर ३ मासे से लेकर छः मासे तक के मोदक (लड्डू) बना लें । इन मोदकों को 'मदनोदय मोदक' कहा जाता है । यह मोदक सेवन करने पर विशेष रूप से कामशक्ति को बढ़ाते हैं । इन मोदकों को उचित मात्रा में खाकर अनुपान में खूब औटाये हुए गाढ़े दूध में खांड और इलायची चूर्ण मिला पीना चाहिए । इस दूध के अनुपान से ये मोदक शरीर को बृंहण (मोटा) करते हैं । इन मोदकों को विधिपूर्वक उक्त दूध के साथ निरन्तर तीन मास तक सेवन करने से मनुष्य का शरीर कामदेव के सदृश हो जाता है और उसमें भीम के समान बल आ जाता है ॥४१८-४२६॥ त्रैलोक्यविजया वटी भङ्गासत्त्वं भागिकं तु पूर्वोक्तविधिसोधितम् । तुगाक्षीरीरजश्चैव भागत्रितयसम्मितम् ॥४२७॥ संमर्द्य वारिणा खल्वे वाटिका रक्तिकोन्मिताः । निर्मापयेत्प्रयत्नेन रसतन्त्रविचक्षणः ॥४२८॥ वटिकैयं समाख्याता त्रैलोक्यविजयाभिधा । प्रलापोन्मादशमनी वृक्कशूलप्रणाशिनी ॥४२६॥ रजःशूलहरा चैव यक्ष्मकासनिवारिका !

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७२६ रसतरङ्गिणी अतीसारप्रशमनी स्वप्नमेहनिषूदनी ॥४३०॥ त्रैलोक्यविजया वटी-भङ्गासत्त्वं पूर्वोक्तेन विधिनेति वन्यौषधिसत्त्वनिर्माणसाध- नेन यन्त्रविज्ञानीयोक्तेन बाष्पस्वेदनयन्त्रेण साधनीयम्। स्पष्टमन्यत्॥४२७-४३०॥ भा.टी.—वन्य-औषधि-सत्व-साधन-विधि से बनाया हुआ भांग का सत्व तीन भाग, वंशलोचनचूर्ण तीन भाग लेकर दोनों एकत्र खरल में जल के साथ मर्दन करके अच्छी तरह सावधानी से एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इन गोलियों को त्रैलोक्यविजया वटी कहा जाता है। यह वटी सेवन करने पर प्रलाप, उन्माद को शान्त करती और वृक्क शूल को नष्ट करती है। माहवारी के समय होनेवाले रजःकष्टजन्य शूल को दूर करती और राजयक्ष्मा के कास को मिटाती है। इसके सेवन से पुरातन अतीसार नष्ट हो जाता है और स्वप्नदोष होना बन्द हो जाता है ॥४२७-४३०॥ त्रैलोक्यसंमोहनरसः त्रैलोक्यविजयां शुद्धां भानुतोलकसंमिताम् । हिंगुलं रससिन्दूरं घनसारं लवंगकम् ॥४३१॥ अभ्रकं शङ्खभसितं पृथक् तोलकसंमितम् । गोक्षुरो वानरीबीजं तथा कर्कटशृङ्गिका ॥४३२॥ चूर्णीकृतं पृथक् चैतत्तोलकद्वयसंमितम् । समादाय भिषग्वर्यः सप्तधा सुविधानतः ॥४३३॥ भङ्गायाः शतपुत्र्याश्च स्वरसेन विभावयेत् । निर्मापयेत्तु वटिका रक्तित्रितयसंमिताः ॥४३४॥ यतः स्मरस्यापि कटाक्षपातैः स्त्रीणां तु संमोहनकारिणीनाम् । संमोहनं वै विदधाति तस्मात् त्रैलोक्यसंमोहनसंज्ञकोऽयम् ॥४३५॥ वामावश्यकरः परं रुचिकरः क्लैब्यापहारी पर हर्षोत्साहकरो धृतिस्मृतिकरः शुक्रातिसंस्तम्भनः । पुत्रोत्पत्तिकरो रतिप्रियकरः सर्वत्र सौख्याकरः सेव्योऽयं खलु कामिभी रसवरस्त्रैलोक्यसंमोहनः ॥४३६॥ त्रैलोक्यसंमोहनः—भङ्गा शुद्धा १२ तोलकप्रमिता। वानरीबीजं आत्मगुं- प्ताबीजम्। शतपुत्री शतावरी ॥४३२-४३६॥ भा.टी.—शुद्ध भांग की पत्ती बारह तोला, शुद्ध हिंगुल, रससिन्दूर, कपूर तथा लौंग का चूर्ण, कृष्णाभ्रकभस्म, प्रत्येक एक-एक तोला। गोखरूबीजचूर्ण,

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ७२७ कौंचबीजचूर्ण, काकड़ासिंगीचूर्ण, प्रत्येक दो-दो तोला लेकर सब को एकत्र खरल में डालकर इसको भांग के स्वरस की सात भावना तथा गुलाब के पुष्प- स्वरस की सात भावना देकर तीन-तीन रत्ती की गोलियाँ बना लें । इस रस को “त्रैलोक्यसम्मोहनरस” कहते हैं । इसके सेवन से यौवनोन्मत्त स्त्री वश में हो जाती और भोजन में पूर्णरुचि होती है । यह रस नपुंसकता को नष्ट करने में सर्वोत्तम माना जाता है । इसके सेवन से मनुष्य के शरीर में प्रेम और उत्साह पैदा होता है । धारणा और स्मरण शक्ति तथा शुक्रस्तम्भन शक्ति (Retention power) बढ़ जाती है ॥४३१-४३६॥ अथ गुञ्जाया नामानि गुञ्जा रक्ता रक्तिका च ताम्रिका कृष्णचूडिका । उच्चटा शीतपाकी च भिल्लभूषणिकारुणा ॥४३७॥ चूडामणिस्ताम्रिका च शिखण्डी कृष्णला तथा । काकणन्ती च काम्भोजो सैवेह परिकीर्तिता ॥४३८॥ अथ गुञ्जानामानि तन्त्रव्यवहृतानि । भिल्लभूषणिका अरुणा इति च्छेदः ॥ भा.टी.—गुञ्जा, रक्ता, रक्तिका, ताम्रिका, कृष्णचूडिका, उच्चटा, शीतपाकी, • भिल्लभूषणिका (भीलों का आभूषण), अरुणा, चूडामणि, शिखण्डी, कृष्णला, काकणन्ती, काम्भोजी—ये सब नाम रत्ती के कहे जाते हैं ॥४३७, ४३८॥ वक्तव्य—सफेद और लाल भेद से रत्ती दो प्रकार की पायी जाती है । परन्तु दोनों की बेल एक सी होती है, केवल बीजों में अन्तर होता है । चिकित्सा में लाल गुञ्जा की अपेक्षा श्वेत को अधिक विषैला माना जाता है । अतः बाह्य प्रयोग में ही अधिक रूप से श्वेत तथा रक्त गुञ्जा का वर्णन पाया जाता है । शोधन करके अन्तःप्रयोग करने में कोई हानि नहीं होती है, किन्तु अशुद्धा- वस्था में सेवन करने से शरीर में विषैले लक्षण उदय हो जाते हैं । गुञ्जा की लता भारत में सर्वत्र प्रायः पर्वतों पर अधिक पायी जाती है । इसकी लता वृक्ष और दीवारों तथा अन्य आश्रयों पर चढ़ी रहती है । इसका काण्ड पतला, मृदुत्वङ्मय, पत्रसंयुक्त (Compound), पक्षाकार (Pinnate) पत्तियाँ, इमली या आमलकी के तुल्य क्षुद्र, लम्बी, रस में मधुर, पुष्प क्षुद्र पीताभ, शिम्बी तुल्य, फल शिम्बी रूप (Pod or Lagumlike) इसके अन्दर बीज होते हैं । इसमें पुष्प शरत्काल में आता है । फल पकने पर लता शुष्क हो

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७५८ रसतरङ्गिणी जाती है। पुनः वर्षा पड़ने पर मूल फूट पड़ती है और गुञ्जा का वितान बन जाता है। सफेद गुञ्जाबीज में भी एक काला चिह्न होता है। कहीं-कहीं दक्षिण की ओर कृष्ण गुञ्जा भी पायी जाती है। विश्लेषण—इसके बीजों में Abric acid (एक तैल), तथा सर्पविष के तुल्य एक भयानक Abine नामक विष भी होता है। गुञ्जायाः परिचयः मिष्टमूलदला रम्या लता तु शीतपाकिनी। कृष्णचूडफला गुञ्जा सर्वेषां विदिता मता ॥४३६॥ पत्रं पत्ररसो मूलं बीजं चास्याः प्रयुज्यते। बीजमेव भिषग्वर्यैर्मतं तूपविषाह्वयम् ॥४४०॥ गुञ्जापरिचयः—मिष्टमूलदलेति। मिष्टं मूलं दलञ्च यस्याः सा तथा, रम्या सुन्दरदर्शना मनोहरेति यावत्। कृष्णवर्णा चूडा येषां तथाभूतानि फलानि यस्याः सा कृष्णचूडफला। स्पष्टमन्यत् ॥४३६, ४४०॥ भा.टी.—गुञ्जा का मूल मीठा होता है, सुन्दर होता है, सुन्दर लताएँ होती हैं। फल के ऊपर काला-काला दाग होता है। इसके फल, स्वरस, मूल तथा बीज का व्यवहार वैद्यवर्ग करते हैं। इसका केवल फल उपविष को दूर करता है ॥४३६, ४४०॥ गुञ्जाबीजानां शोधनप्रयोजनम् गुञ्जाबीजं वान्तिकरं तीव्ररेचनकृत्तथा। शीलितं त्वतिमात्रं तु गुञ्जाबीजमशोधितम् ॥४४१॥ विषूचीलक्षणकारां करोति हि विषक्रियाम्। अतो दोषनिवृत्त्यर्थं गुञ्जाबीजानि शोधयेत् ॥४४२॥ गुञ्जाबीजानां शोधनप्रयोजनम्—वान्तिकरत्वात् तीव्ररेचकत्वात् विषूचीसदृश- विषक्रियाहेतुत्वाच्च ॥४४१, ४४२॥ भा.टी.—यदि अशुद्ध गुञ्जाबीजों को अधिक मात्रा में खाया जाय तो इससे वमन तथा तीव्र रेचन होने लगते हैं। अर्थात् इसके अधिक मात्रा में खाने पर हैजे जैसे विषैले लक्षण उदय होते हैं, अतः इस दोष को दूर करने के लिए गुञ्जाबीजों को शुद्ध करके प्रयोग करना चाहिए ॥४४१, ४४२॥ गुञ्जाबीजानां प्रथमः शोधनप्रकारः जग्धानि गुञ्जाबीजानि चूर्णीकृत्य प्रयत्नतः। द्विगुणीकृतवस्त्रान्तः पोट्टल्यां रोधयेत्ततः ॥४४३॥

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ७२६ स्वेदयेद्दोलिकायन्त्रे द्वियामं गव्यदुग्धतः । इत्थं तु गुञ्जाबीजानि शुद्धिमायान्त्यनुत्तमाम् ॥४४४॥ गुञ्जाबीजशोधनप्रकारः— द्विगुणीकृतवस्त्रान्तः प्रक्षिप्य शोभनं गुञ्जाबीज- चूर्णान्निष्क्रमणरक्षार्थम् काञ्जिके स्वेदनादपि शुद्धिर्गुञ्जाबीजानाम्॥४४३,४४४॥ भा.टी.—नूतन गुञ्जाबीजों का मोटा-मोटा चूर्ण करके एक साफ दोहरे कपड़े में बाँध कर पोटली बना ले, अब इस पोटली को दोलायन्त्र में गोदुग्ध डालकर उसमें ६ घण्टे स्वेदन करें। इस विधि से शुद्ध किये गुञ्जाबीज उत्तम रूप से शुद्ध हो जाते हैं ॥४४३-४४४॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः गुञ्जाबीजं पोट्टलीस्थं दोलायन्त्रे सकाञ्जिकम् । यामैकं स्वेदनादेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥४४५॥ अ.टी.—नूतन गुञ्जाबीजों को एक कपड़े में बाँधकर पोटली बना लें । अब इस पोटली को काञ्जी से भरे, दोलायन्त्र में तीन घण्टे तक स्वेदन करके निकालकर सुखा लें । इस विधि से गुञ्जाबीज शुद्ध हो जाते हैं ॥४४५॥ गुञ्जाया गुणाः गुञ्जाबीजं सुविमलं कामोद्दोपनमुत्तमम् । ऊरुस्तम्भहरं चैव बलसंवर्द्धनं परम् ॥४४६॥ गुञ्जापत्रं शोथहरं त्वामवातप्रणाशनम् । तथैव च समाख्यातं वेदनाहरमुत्तमम् ॥४४७॥ गुञ्जापलाशनिर्यासो मधुरः कटुकस्तथा । स्वरभेदप्रशमनः शोथघ्नो वेदनाहरः ॥४४८॥ गुञ्जामूलं सुमधुरं कफनिःसारकं परम् । वातपित्तहरं चैव तृष्णाशाथनिवारणम् ॥४४९॥ स्वरभेदप्रशमनं तथा वान्तिविनाशनम् । मूत्रकृच्छ्रप्रशमनं बलवर्णकरं परम् ॥४५०॥ कासघ्नं शुक्रजननं रुच्यं विषविनाशनम् । वृष्यं व्रणापहं चैव विशेषात्परिकीर्तितम् ॥४५१॥ गुञ्जामूलं विशेषेण मधुयष्टिगुणोपमम् । अत एवाधुना तन्तु तदभावे प्रयुज्यते ॥४५२॥ भा.टी.—शुद्ध गुञ्जाबीज उत्तम कामोद्दीपक होते हैं । ऊरुस्तम्भ रोग में

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७३० रसतरङ्गिणी

इनको बाह्य और आभ्यन्तर रूप में प्रयोग करने से आराम आता है । इनको उचित मात्रा में शुद्ध करके सेवन करने से शारीरिक बलवृद्धि होती है । गुञ्जा के पत्र शोथनाशक होते हैं । आमवात की शोथ में इनका लेप करने से शीघ्र ही शोथ और शूल में आराम आता है । आमवात के अतिरिक्त वातिक शूलों में इनका लेप करने से शूल शान्त हो जाता है । गुञ्जापत्र-स्वरस में मीठा तथा कुछ चरपरा होता है इसको थोड़ा-थोड़ा मुख में रखने से स्वरभेद, गलशोथ तथा कण्ठ ( गले ) की वेदना दूर होती है । गुञ्जा की जड़ स्वाद में अत्यन्त मीठी होती है । इसको मुख में रखकर चूसने से कफ पतला होकर निकलने लगता है और स्वरभेद शान्त होता है । तृष्णा तथा गलशोथ मिट जाता है । यदि मूत्र करने में कठिनाई हो तो इसके सेवन से आराम आ जाता है, साथ ही शरीर में बल तथा वर्ण की वृद्धि होती है । गुञ्जामूल, कासनाशक, शुक्रोत्पादक, रुचिकारक और विषनाशक है । इसके प्रयोग में उत्पादक अंगों को बल मिलता है, विशेषतः व्रणविकार शान्त होते हैं । गुञ्जा- मूल में मुलेठी के गुण-धर्म विशेष रूप से पाये जाते हैं, अतः आजकल मुलेठी के अभाव में गुञ्जामूल का प्रयोग किया जाने लगा है ॥४४६-४५२॥ शुद्धगुञ्जाबीजस्य मात्रा गुञ्जार्द्धतः समारभ्य सार्द्धगुञ्जैकसंमितम् । गुञ्जाबीजं सुविमलं प्रयुञ्जीत विधानवित् ॥४५३॥ भा.टो.—गुञ्जाबीज चूर्ण की मात्रा आधी रत्ती से लेकर डेढ़ रत्ती तक शुद्धावस्था में प्रयोग करनी चाहिए ॥४५३॥ गुञ्जाया आमयिकः प्रयोगः गुञ्जाबीजं शिलापिष्टं वारिणा परिलेपितम् । निहन्त्युत्पिष्टसन्धिस्थां दारुणां शोथवेदनाम् ॥४५४॥ इन्द्रलुप्तं पक्षवधं तत्तदङ्गसमाश्रितम् । गृध्रसीं दारुणां चैव सुघोरमवबाहुकम् ॥४५५॥ गुञ्जाबीजं शिलापिष्टं वारिणा चित्रकान्वितम् । प्रलिप्तं शमयत्येव श्वित्रकुष्ठं विशेषतः ॥४५६॥ गुञ्जाया रोगयोग्यः प्रयोगः—प्रसारणाकुञ्चनविवर्तनाक्षेपणाशक्त्युग्ररुजत्व- स्पर्शासहत्वादिसन्धिमुक्तलक्षणैः सह समन्तात् श्वयथुगदान्, विशेषतो रात्रिरुजा- करश्चोत्पिष्टसन्धिर्भवति । इन्द्रलुप्तं केशभूमिजः क्षुद्ररोगविशेषः, “रोमकूपानुगं

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पित्तं वातेन सह मूर्च्छितम् । प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणितः। रुणद्धि रोमकूपांस्तु ततोऽन्येषामसम्भवः । तदिन्द्रलुप्तं खालित्यं रुह्येति च विभाव्यते॥” इत्यु- क्तलक्षणः । अवबाहुकः अंसदेशगतः सिराकुञ्चनजो वातव्याधिविशेषः॥४५४-४५६॥ भा.टी.—गुञ्जाबीजों को एक सिल या खरल में जल के साथ बारीक पीस लेप करने से सन्धिस्थान में दबाव पड़ने या रगड़ पड़नेके कारण होनेवाली भयं- कर शोथवेदना शान्त हो जाती है । इसी तरह इसको इन्द्रलुप्त (बालों का उड़ना) तत्तत् अङ्गों में होनेवाले पक्षाघात, भयंकर गृध्रसीपीड़ा तथा तीव्र प्रकार का अव- बाहुक वातव्याधि रोग में इसके प्रयोग से शीघ्र आराम आता है । यदि गुञ्जा- बीजों को समभाग चित्रकमूलत्वक् में मिलाकर जल से बारीक पीसकर श्वेत कुष्ठ के दानों पर लेप किया जाय तो वे कुछ दिनों में नष्ट हो जाते हैं ॥४५४-४५६॥ प्रथमं गुञ्जाद्यतैलम् गुञ्जाबीजं शिलापिष्टं कल्कीकृतमनुत्तमम् । तिलतैलं भृङ्गराजपत्रनिर्यासकं तथा ॥४५७॥ चतुर्गुणोत्तरं चैव मानमेषां प्रकल्पयेत् । तैलपाकविधानेन तैलमेभिस्तु साधितम् ॥४५८॥ निहन्त्यभ्यङ्गयोगेन कण्डूकुष्ठादिकामयान् । तथा दारुणकं हन्ति विविधां वातवेदनाम् ॥४५६॥ गुञ्जाद्यं तैलमाद्यम् । गुञ्जाबीजानि शिलापिष्टानि पलैकमितानि, तिलतैलस्य चत्वारि पलानि, भृङ्गपत्रस्य षोडशपलानि । यथाविधि पाचितं कण्डूकुष्ठादिहारि । दारुणकं केशभूमिरोगविशेषः “दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपाट्यते । कफमारुतकोपेन विद्याद्दारुणकं तु तम्” इत्युक्तलक्षणः ॥४५७-४५६॥ भा.टी.—एक भाग गुञ्जाबीज लेकर इनको सिल पर जल के साथ पीस कर कल्क (लुगदी-सी) बना लें । तिलतैल चार भाग लें, भांगरे के पत्तों का स्वरस सोलह भाग लें । अब इन तीनों को एक बड़े चौड़े मुख के पात्र में एकत्र मिला चूल्हे के ऊपर रखकर स्नेह-साधन-विधान के अनुसार पकाकर तैल सिद्ध कर लें । इसको गुञ्जादि तैल कहते हैं । यह तैल शरीर पर मलने से कण्डू कुष्ठ आदि त्वग्रोगों तथा शिर के दारुणक (गंज) रोग और विविध प्रकार की वातिक पीड़ाओं को शान्त करती है ॥४५७-४५६॥ द्वितीयं गुञ्जाद्यतैलम् गुञ्जाबीजशिफाभिस्तु तैलं द्विगुणवारिणा ।

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७३२ रसतरङ्गिणी विपाचितं गण्डमालां निहन्त्यभ्यङ्गतोगतः ॥४६०॥ एरण्डतैलसंयुक्तं गुञ्जापत्रं सुपेषितम् । कोष्णोपनाहयोगेन वेदनाहरमुत्तमम् ॥४६१॥ गुञ्जापत्ररसे पक्वं तैलमभ्यञ्जयोजितम् । शोथप्रशमनं चैव वेदनाहरमीरितम् ॥४६२॥ गुञ्जापत्रं नवं वापि विशुष्कं चूर्णितं भृशम् । नाशयत्यचिरादेव स्वरभेदमसंशयम् ॥४६३॥ द्वितीयं तैलम्—गुञ्जाबीजं गुञ्जाशिफा च कल्कः पलद्वयमितः तैलस्याष्टौ पलानि, जलस्य षोडश पलानि, पक्वं गण्डमालाहरम् ॥४६०-४६३! भा.टी.—गुञ्जाबीज आधा भाग, गुञ्जामूल आधा भाग, तिल तैल चार भाग, जल आठ भाग लेकर, पहिले गुञ्जाबीज और मूल को जल के साथ पीस कर कल्क बना लें । अब इन तीनों को एकत्र एक पात्र में डालकर स्नेहसाधन विधि से तैल सिद्ध कर लें । इस तैल को कुछ दिन निरन्तर कण्ठमाला की ग्रन्थियों पर मालिश करने से वे बैठ जाती हैं । गुञ्जापत्रों को कुछ एरण्ड तैल मिलाकर पीसकर गुन-गुनी पुलटिस बाँधने से उस स्थान की वेदना शान्त होती है । यदि केवल गुञ्जापत्रस्वरस में तिलतैल सिद्ध करके शरीर पर मालिश की जाय तो शरीर की शोथ की वेदना शान्त होती है । हरे गुञ्जापत्रों अथवा सूखे हुए पत्रचूर्ण को थोड़ा-थोड़ा करके मुख में चबाकर चूसने से स्वरभेद में अवश्य आराम आता है ॥४६०-४६३॥ गुञ्जाजीवनरसः गुञ्जाबीजं सुविमलं सार्द्धतोलकसंमितम् । तन्मितं रससिन्दूरं तयोश्च द्विगुणीकृताम् ॥४६४॥ विशोधितां तु विजयां समादाय भिषग्वरः । संपेष्य वटिकाः कार्या गुञ्जाद्वितयसंमिताः ॥४६५॥ रसोऽयं तु समाख्यातो गुञ्जाजीवनसंज्ञकः । बलसञ्जननश्चैव मदनोद्दीपनः परम् ॥४६६॥ गुञ्जाजीवनरसः—गुञ्जाबीजं १॥ तो०, रससिन्दूरं १॥ तो०, बब्बूलकषायेण शोधितायाः भङ्गायाः षट्टोलकानि । स्पष्टमन्यत् ॥४६५, ४६६॥ भा.टी.—शुद्ध गुञ्जाबीज डेढ़ तोला, रससिन्दूर डेढ़ तोला और शुद्ध भाँग की पत्ती तीन तोला लेकर तीनों को एकत्र जल के साथ पीसकर दो-दो रत्ती की

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गोलियां बना लें । इसको गुञ्जाजीवन रस कहते हैं । इस रस के प्रयोग से शरीर में बल की वृद्धि होती है और कामोत्तेजना बढ़ जाती है ॥४६४-४६६॥ गुञ्जाभद्ररसः गुञ्जाबीजं सुविमलं रसस्तोलकसंमितम् । जयन्ती निम्बबीजं च रसस्तोलकसंमितम् ॥ ४६७ ॥ तोलकत्रितयं सूतं गन्धं द्वादशतोलकम् । समादाय ततः खल्वे पेषयेदतियत्नतः ॥ ४६८ ॥ काकमाचीजयाधूर्तनिम्बूकद्रवयोगतः । वटिकाः कारयेद्यत्नाद् गुञ्जाद्वितयसंमिताः ॥ ४६९ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो गुञ्जाभद्रसमाह्वयः । ऊरुस्तम्भं महाघोरं विनिहन्ति विशेषतः ॥ ४७० ॥ गुञ्जाभद्ररसे-रसस्तोलकसमितमिति षट्तोलकप्रमितम् । धूर्तः धत्तूरः ॥४७०॥ भा.टी.-शुद्ध गुञ्जाबीजचूर्ण छः तोला, जयन्ती छः तोला, निम्बबीजमज्जा छः तोला, शुद्ध पारद तीन तोला, शुद्ध गन्धक बारह तोला लेवें । पहिले पारद और गन्धक की पृथक् कज्जली कर लें, फिर इसमें अन्य द्रव्यों का चूर्ण मिला- कर इसको एक खरल में मकोय स्वरस, जयास्वरस तथा धतूरस्वरस और नींबू- रस के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन करें । जब गोली बाँधने योग्य हो जाय तो इसकी दो-दो रत्ती की गोलियां बना लें । इसको गुञ्जाभद्र रस कहते हैं । यह रस महाभयंकर ऊरुस्तम्भ रोग में विशेष लाभ करता है ॥ ४६७-४७० ॥ अथ भल्लातकस्य नामानि भल्लातकस्तु भल्लातस्तपनोऽरुष्करोऽग्निकः । कृमिघ्नश्चैव वातारिः स एव परिकीर्तितः ॥४७१॥ भा.टी.—भल्लातक, भल्लात, तपन, अग्नि के नामवाला अर्थात् वह्नि, अग्नि, दहन, वायुसखा, आदि नाम युक्त, वातारि, व्रणकृत्, कृमिघ्न, अरु- ष्कर—ये सब नाम भिलावे के कहे जाते हैं ॥ ४७१ ॥ वक्तव्य—हिमालय के गरम प्रदेशों में भिलावे का एक सुन्दर १० से ४० फुट ऊँचा वृक्ष होता है । इसके पत्र बड़े ६ से ३७ इञ्च लम्बे, ५ से १२ इञ्च चौड़े समभाग में गोल होते हैं । इसके फूल हरे श्वेत अथवा हरे-पीले होते हैं । फल एक इञ्च लम्बा, पौन इञ्च चौड़ा, अण्डाकार, लाल, चिकना और इसके ऊपर की त्वचा मोटी होती है । इस फल के अन्दर एक दाहक रस होता है जो

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७३४ रसतरङ्गिणी हवा लगने पर या पकने पर काला हो जाता है। इसका बीज मीठा और एक प्रकार के तेल से युक्त होता है। विश्लेषण—फल की बाहरी त्वचा में एक छाला डालने वाला तैल ३२% होता है जो ईथर में घुल जाता है। भल्लातकस्य परिचयः भल्लातकः समाख्यातः शाखिजातीयकस्तरुः । जायतेऽद्रिषु बाहुल्याद् फलं तस्य प्रयुज्यते ॥ ४७२ ॥ भल्लातकपरिचयः—अद्रिष्विति पर्वतेषु । भल्लातकशोधनप्रयोजनं निगद- व्याख्यातम् ॥ ४७२ ॥ भा.टी—भिलावा, एक डाल पत्तीवाला वृक्ष है। प्रायः पर्वतों में पाया जाता है और इसका फल प्रयोग में आता है ॥ ४७२ ॥ ग्राह्यभल्लातकस्य स्वरूपम् भल्लातकानि पक्वानि नीरक्षिप्तानि यानि तु । निमज्जन्ति हि तान्येव ग्राह्याणीह विशुद्धये ॥ ४७३ ॥ भा.टी—औषधिकार्य में शोधन करने योग्य भिलावे के वे फल उत्तम सम- झने चाहिए जो पकने के बाद यदि उन्हें पानी में डाला जाय तो डूब जायें । न डूबनेवाले फलों को शोधन के अयोग्य समझना चाहिए ॥ ४७३ ॥ भल्लातकस्य शोधनप्रयोजनम् भल्लातस्य तु रसः स्वल्पोऽपि पतितस्त्वचि । करोति दारुणं दाहं व्रणं चैवातिदारुणम् ॥ ४७४ ॥ शोथं सञ्जनयत्याशु तीव्रदाहसमन्वितम् । मुखे निपतितो घोरं वीसर्पं प्रकरोति वै ॥ ४७५ ॥ उक्तोपद्रवशान्त्यर्थं फलं भल्लातकोद्भवम् । शोधयेद्भिषजां वर्यः सावधानतया सदा ॥ ४७६ ॥ भा.टी—यदि भिलावे का रस बहुत ही थोड़ी मात्रा में भी शरीर के किसी स्थान पर लग जाय तो वहाँ पर भयंकर दाह और व्रण हो जाता है। यदि वह . मुख में लग जाय तो तीव्र दाहयुक्त शोथ तथा वीसर्पशोथ को उत्पन्न कर देता है। अतः वैद्य को उक्त उपद्रवों से बचने-बचाने के लिए भिलावे के फलों को बड़ी सावधानी से शुद्ध करके काम लाना चाहिए ॥ ४७४-४७६ ॥

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ७३५ भल्लातकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः इष्टकाचूर्णसंयुक्तं फलं भल्लातकोद्भवम् । पोट्टलीमध्यनिहितं घर्षयेन्नातिवेगतः ॥४७७॥ ततः प्रतप्ततोयेन क्षालयेदतियत्नतः । इत्थं तैलत्वचाहीनं भल्लातं शुद्धिमाप्नुयात् ॥४७८॥ भल्लातकशोधनप्रकार आद्यः—त्रिचतुर्गुणवस्त्रकृतपोट्टलिकायां इष्टिकाचूर्णं भल्लातकफलानि च निक्षिप्य औषधनिर्माणकुशलः घर्षयेत् । घर्षणेन तैला- धारत्वचापसारः । निर्यातं तैलं च विशुष्यतीष्टकाचूर्णेषु । तत उष्णैर्जलैः प्रक्षाल्य भेषजेषु योजयेत् । तैलमेवास्य दाहव्रणशोथादिकरम् । शोधनात्प्राक् नारिकेलतैलं हस्तयोर्म्रक्षणीयम् ॥४७७, ४७८॥ भा.टी.—एक कपड़े की दृढ़ पोटली अथवा थैली में भिलावे के फल और ईंट का बारीक चूर्ण भरकर उसको हाथों के सहारे मध्यम दबाव से रगड़ें। जब ईंट का चूर्ण तैल से तर हो जाय अर्थात् जब इसकी त्वचा निकल जाय तो इसको गरम पानी में डालकर अच्छी तरह धोकर साफ कर लें। इस विधि से भिलावे शुद्ध हो जाते हैं ॥४७७, ४७८॥ वक्तव्य—ईंट के चूर्ण में डालने से पूर्व भिलावाफलों की टोपी को चाकू से काट लेना चाहिए और रगड़ने के पूर्व हाथों में नारियल का तैल अच्छी तरह मल लेना चाहिए। द्वितीयः शोधनप्रकारः भल्लातकफलानीह नारिकेलाम्बुयोगतः । स्विन्नानि दोलिकायन्त्रे शुद्धिमायान्त्यनुत्तमाम् ॥४७९॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः—नारिकेलजलद्वारा स्वेदनात् साध्यः । स्वेदनञ्च खण्डशः कृतभल्लातकफलानां विधेयम् । तथा सति स्विन्नानि उपभोगयोग्यानि भवन्ति भल्लातकानि ॥४७६॥ भ.टी.—भिलावे के फलों को काटकर दो टुकड़े करलें, अब इनको दोलायन्त्र में डाल उसमें नारियल का जल भर दें और एक दो घण्टे तक उबालें। इस विधि से भी भिलावे शुद्ध हो जाते हैं ॥४७६॥ वक्तव्य — भल्लातकफलों को उक्त विधि से शोधन करने के बाद एक बार दोलायन्त्र द्वारा गोदुग्ध में अच्छी तरह स्वेदन कर लेने से अन्तःप्रयोग में इनके द्वारा कोई हानि होने की सम्भावना नहीं रहती है।

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७३६ रसतरङ्गिणी भल्लातकः कटुस्तिक्त अत्युष्णः कृमिनाशनः । रसायनो वलकरो गुल्मार्शोग्रहणीहरः ॥४८०॥ कुष्ठामयप्रशमनः कफवातोदरापहः । विवन्धाध्मानशूलघ्नः श्वासादिगदनाशनः ॥४८१॥ भा.टी.—भिलावे के फल रस में चरपरे (कटु) तथा कड़वे होते हैं । गुणों में यह अत्यन्त उष्ण तथा कृमिनाशक हैं। इनके विधिपूर्वक सेवन करने से शरीर में रसायनगुण उत्पन्न होते हैं और शरीर में वल की वृद्धि होती है । इनको गुल्मरोग तथा अर्शारोग में प्रयोग करने से शीघ्र लाभ होता है । इनके प्रयोग से कुष्ठरोग नष्ट होता है और कफवात-प्रकोपजन्य उदररोग शान्त होते हैं । आँतों की दुर्बलता से होनेवाले विबन्ध तथा आधमान और शूल में इनके प्रयोग से लाभ होता है और श्वास आदि रोगों में भी आराम आता है ॥४८०, ४८१॥ वक्तव्य—भिलावा आमाशय के लिए दीपक,वातनाड़ियों, श्वाससंस्थान, हृदय तथा त्वचा के लिए उत्तेजक और यकृत् के लिए पित्तनिस्सारक है । कहा जाता है कि जो मनुष्य शरद् ऋतु में इसके द्वारा बनाये हुए घृत का सेवन करता है वह रोगों से बचा रहता है। इसके सेवन से वृद्धावस्था देर से आती है । बाल देर तक काले रहते हैं और दाँत भी देर तक दृढ़ रहते हैं । तेल में दग्ध किये हुए भल्लातकचूर्ण में लवण मिलाकर बनाया हुआ मञ्जन दाँतों पर मलने से दाँत स्थिर होते हैं। श्वित्रकुष्ठ (सफेद कोढ़) के चिह्नों पर भल्लातकतैल का लेप लगाने से उनमें छोटे-छोटे छाले पड़ जाते हैं जो सूखकर काला चिह्न छोड़ जाते हैं, फिर ये कृष्णवर्णा चिह्न आपस में मिल कर त्वचा को सवर्ण कर देते हैं। सन्धिशोथों में गहरी शोथ को हटाने के लिए भल्लातक तेल के लेप लगाये जाते हैं। क्लीबरोग के लिए शिश्नेन्द्रिय पर भल्लातकादिलेप लगाने से हलके छाले पड़ जाते हैं और अन्दर का रक्तसञ्चय दूर हो जाता है। भारी चोट लगने से शरीर में तीव्र शोथ हो जाय तो एक शुद्ध भिलावे को तोड़कर घृत में तल करके उस घृत से बनाया हुआ हलवा (गुड़ का) खिलाया जाय तो शोथ को बहुत शीघ्र आराम आता है । चिरस्थायी त्वक्रोगों, फिरंगजन्य व्रणों और अर्बुदों में भिलावे के योग देने से आराम आता है । श्वासरोग, चिरस्थायी कास, प्रतिश्याय आदि में कुछ काल निरंतर भल्लातक घृत या इसके किसी अन्य योग का सेवन करना चाहिए । वात- कफजन्य अजीर्ण और मन्दाग्नि के उपद्रवों तथा अर्शारोग में इसके

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४७ चतुर्विंशस्तरङ्गः ७३७ योगों का सेवन शीघ्र लाभ करता है। भल्लातक का प्रयोग उष्णऋतु में नहीं करना चाहिए। इसके प्रयोगकाल में लवण, धूप में भ्रमण और मैथुन अपथ्य समझना चाहिए। पित्तप्रकृति रक्तपित्ती गर्भिणी और वृक्करोगी को इसका सेवन नहीं कराना चाहिए। इसके अधिक मात्रा में खाये जाने पर मूत्र लाल और मात्रा में थोड़ा हो जाता है। त्वचा पर कोठ और स्फोट आदि हो जाते हैं। इन विकारों की शान्ति के लिए नारियल का तैल, तिल तथा हरीतकी का सेवन करना चाहिए। भल्लातकस्य मात्रा गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जातितयसंमितम्। भल्लातकं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥४८२॥ भा.टी—रोगी तथा शरीर का बल और देश-काल, प्रकृति का पूर्ण विचार करके एक रत्ती से लेकर तीन रत्ती तक शुद्ध भिलावे की मात्रा समझनी चाहिए। भल्लातकस्य आमयिकः प्रयोगः हरीतकीतिलगुडयुतं भल्लातकं समम्। निषेवितं प्लीहपाण्डुज्वरघ्नं श्वासकासनुत् ॥४८३॥ भल्लातकस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—सममिति हरीतकीतिलगुडभल्लातकाः समाः परिग्राह्याः ॥४६३॥ भा.टी.—शुद्ध भल्लातकचूर्ण, हरीतकीचूर्ण, तिलचूर्ण और गुड़; प्रत्येक समभाग लेकर एकत्र पीसकर बनायी हुई गोलियों का सेवन करने में प्लीहा- वृद्धि, पाण्डुरोग, ज्वर, श्वास और कास में आराम आता है ॥४८३॥ भल्लातकरसायनम् शुण्ठीविडङ्गलौहाढ्यं भल्लातं विमलीकृतम्। मध्वाज्यसंयुक्तं युक्तं मासत्रितयसेवनात् ॥४८४॥ रक्तवृद्धिं करोत्येतद् बलं चैव विवर्द्धयेत्। नवयौवनलावण्यं जनयत्यविकल्पतः ॥४८५॥ समाख्यातमिदं नाम्ना भल्लातकरसायनम्। सेवितव्यं सदा यत्नाद्रक्ताल्पत्वनिवृत्तये ॥४८६॥ भल्लातकरसायनम्-व्याख्यासमपाठम्। यद्यपि तन्त्रान्तरेषु भल्लातकरसायन- प्रयोगो नैकविधः श्रूयते, तथापि स्वल्पव्ययं बहुफलं निरापदमावश्यकगुणयोगिप्रका- रममुमेव समामनन्त्याचार्या इत्यवधेयम्। यत्नात् पथ्यरन्नाद्धारेति भावः ॥४८६॥

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७३८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—शुण्ठीचूर्ण, विडंगचूर्ण और लोहभस्म तथा भिलावाचूर्ण प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र पीसकर रख लें । इनमें से उचित मात्रा में लेकर घी और शहद को मिलाकर निरन्तर तीन मास तक सेवन करने से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और बल बढ़ता है, जिससे शरीर में नवयौवन की सुन्दरता आ जाती है । इसको भल्लातक रसायन कहते हैं । इसको रक्ताल्पता (खून की कमी) रोग दूर करने के लिए सावधानी के साथ सेवन करना चाहिए ॥४८४-४८६॥ अथ करवीरस्य नामानि करवीरो हयारिश्च हयमारोऽश्वमारकः । अश्वान्तकोऽश्वहाश्वघ्नो मतश्चएडातकस्तथा ॥४८७॥ करवीरः श्वेतपीतरक्तपुष्पविभेदतः । त्रिविधस्तु समाख्यातो वैद्यविद्याविशारदैः ॥४८८॥ भा.टी.—करवीर, हयारि, हयमार, अश्वमार, अश्वान्तक, अश्वहा, अश्वघ्न, चएडातक, ये सब नाम करवीर (कनेर) के कहे जाते हैं । कनेर श्वेतपुष्प, रक्त- पुष्प और पीतपुष्प भेद से तीन प्रकार का माना जाता है ॥४८७, ४८८॥ करवीरस्य परिचयः करवीरः समाख्यातः सर्वत्र सुलभस्तरुः । भिषग्वरैरस्य मूलं मतं तूपविषाह्वयम् ॥४८६॥ करवीरस्य मूलत्वक् तद्रसो वा निषेवितः । करोति हि विशेषेण मोहदाहभ्रमादिकम् ॥४६०॥ करवीरकमूलन्तु बाह्ययोगे प्रयुज्यते । आभ्यन्तरः प्रयोगोऽस्य न कुत्रापि प्रकीर्तितः ॥४६१॥ करवीरपरिचयः—निगदव्याख्यातः । प्रायश्चौषधेषु श्वेतकरवीरस्यैव प्रयोग इति सम्प्रदायः ॥४८६-४६१॥ भा.टी.—कनेर सर्वत्र सुलभ रूप से पाये जानेवाला वृक्ष है । वैद्य लोग इसकी मूल को उपविष मानते हैं । कनेर मूल की छाल अथवा त्वक्रस को अधिक मात्रा में सेवन किये जाने पर विशेष रूप से मोह, दाह तथा भ्रम आदि विकार उत्पन्न होते हैं । कनेर की जड़ की छाल प्रायः बाह्य रोगों में ही काम आती है । आभ्यन्तर प्रयोग के लिए इसका उपयोग विरलावस्था में ही पाया जाता है॥४६१॥ करवीरस्य बाह्यप्रयोगः करवीरकमूलं तु वारिणा परिपेषितम् ।

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समाख्यातं प्रलेपेन ह्युपदंशव्रणापहम् ॥४६२॥ करवीरदलद्रावो नेत्रयोर्विनियोजितः । अभिष्यन्दं जलस्रावं व्यपोहति विशेषतः ॥४६३॥ करवीरस्य बाह्यप्रयोगः—उपदंशव्रणहरः नेत्राभिष्यन्दनाशनश्च । अपि च- करवीरमूलत्वक् १ तो०, करवीरपुष्पाणि १ तो०, आफूकम् ३ मा०, अश्वगन्धा १ तो०, धत्तूरबीजानि १ तो०, जले पिष्ट्वा वटिकाः कारयेत् । सेयं करवीरादि- वटी प्रलेपतो ध्वजभङ्गहरी ख्याता इति ॥४६२, ४६३॥ भा.टी.--कनेर की मूलछाल को जल के साथ पीसकर लेप तैयार कर लें । इस लेप को उपदंशव्रणों पर लगाने से उनमें आराम आता है । कनेर के पत्तों का स्वरस नेत्रों में डाला जाय तो नेत्राभिष्यन्द तथा नेत्रों से पानी निक- लना बन्द हो जाता है ॥४६२, ४६३॥ करवीराद्यं तैलम् करवीरशिफाक्वाथविपक्वं तिलतैलकम् । कल्कीकृतविडङ्गाग्नियोगतो गोजलान्वितम् ॥४६४॥ करवीराद्यतैलं तु समाख्यातं भिषग्वरैः । अभ्यङ्गाद्विनिहन्त्याशु त्वग्गतान् विविधान् गदान् ॥४६५॥ करवीराद्यं तैलम्—गोजलं गोमूत्रम् । तैलसाधनाय करवीरमूलक्वाथः ४ प्रस्थमितः, विडङ्गं चित्रकश्च उभयोर्मानं मिलित्वा १ कुडवम्, गोमूत्रं ४ प्रस्थ- मितम्, तिलतैलं १ प्रस्थमितम् ॥४६४, ४६५॥ भा.टी.—कनेर की छाल का क्वाथ चार सेर, वायविडंग तथा चित्रकमू- लत्वक् प्रत्येक दस-दस तोला और गोमूत्र चार सेर लें । पहले विडंग तथा चित्रकछाल को जल से पीसकर इसका कल्क बना लें । अब इस कल्क को एक बड़े पात्र में डालकर इसमें एक सेर तिलतैल और तिलतैल से चौगुना कनेर की छाल का क्वाथ तथा गोमूत्र मिलाकर अग्नि पर तैल सिद्ध कर लें । इसको करवीराद्य तैल कहते हैं । इस तैल को शरीर में मालिश करने से अनेक प्रकार के त्वक् रोग नष्ट हो जाते हैं ॥४६४,४६५ ॥ अथ लांगलिकाया नामानि लाङ्गली हलिनी सीरी विशल्या कलिहारिका । अग्निजिह्वा स्वर्णपुष्पा दीप्ता नक्तेन्दुपुष्पिका ॥४६६॥ विद्युज्ज्वाला वह्निशिखा लाङ्गली गर्भपातिनी । हली लांगलिनी चैव समाख्याता भिषग्वरैः ॥४६७॥