रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरोगों के मुख्य कारण
शरीर में दूषित पदार्थ का जमाव ही रोगों का मुख्य कारण है। रोग यानी शरीर में कोई दोष आ गया। यह दोष सर्वप्रथम पेड़ स्थान में पहुँचता है, फिर वहीं से शरीर के बाकी हिस्सों में चल पड़ता है। यानी रोग सबसे पहले पेड़ स्थान में ही पनपता है। फिर वहीं से अन्य जगहों की ओर चल पड़ता है और धीरे-धीरे इकट्ठा होकर रोग का रूप धारण कर लेता है।
मल-मूत्र के द्वारों के पास जमा यह दोष पहले-पहल तो पेशाब, मल आदि के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है, पर जब लगातार मनुष्य का खान-पान और रहने का वातावरण ठीक न होगा, तो कुछ-न-कुछ दोष बचा रह जाता है, जो धीरे-धीरे जमा होता जाता है।
जब भी मनुष्य के शरीर में दोष उत्पन्न हो जाते हैं तो उसकी शक्ल-सूरत में बदलाव आ जाता है, उसके शरीर का रंग, मुख की आकृति बदल जाती है। इस बदलाव को देखकर हम जान सकते हैं कि उसमें कुछ दोष है और वो रोगों की तरफ बढ़ रहा है। नज़रिया वैद्य इन्हीं बदलाव को देखकर जान जाते हैं कि रोगी को भविष्य में कौन से रोग हो सकते हैं।
इसे मुखाकृति विज्ञान भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें खासतौर पर मुख की आकृति को देखकर आने वाले रोगों को समझा जा सकता है।
इस परख का बहुत बड़ा लाभ यह है कि आम इंसान भी दोषयुक्त पदार्थ के जमाव को देखकर जान सकता है कि आगे रोग होने वाला है और समय रहते ही उससे बच सकता है।
इसमें रोगों के डाक्टरों नामों का कोई संबंध नहीं है। इसमें दूषित पदार्थ का जमाव ही मुख्य बात है। शरीर के एक हिस्से में दूषित पदार्थ का जमाव कई तरह के रोग उत्पन्न करता है।
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