साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १२४ | श्रीसाम्बपुराणम् |
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ये स्वधारूप अमृत से सभी प्राणियों का पोषण करते हैं। ये सबके अन्तः में, यहाँ तक कि म्लेच्छ जाति तथा तिर्यक् योनिगत प्राणियों के अन्तः में भी स्थित रहते हैं॥१६॥
कारुण्यात् सर्वभूतानि पासि देव विभावसो।
आपत्सु च विमोक्षार्थं त्वं भक्तानभिरक्षसि॥१७॥
चित्रकुष्ठान्धबधिरान् खञ्जान्पङ्गूञ्जडांस्तथा।
प्रपन्नवत्सलो देव नीरुजः कुरुषे नरान्॥१८॥
हे देव विभावसु! आप कल्पनावशात् सभी प्राणियों का पालन करते हैं। विपत्-समूह में उनके मोचनार्थ आप भक्तों की रक्षा करते हैं। हे प्रपन्नवत्सल देव! चित्रकुष्ठ, अन्ध, वधिर, खञ्ज, पङ्गु तथा जड लोगों को आप ही रोगमुक्त करते हैं॥१७-१८॥
दद्रुगण्डनिमग्नांश्च निर्ब्रणान्यूरुषांस्तथा।
प्रत्यक्षदर्शी त्वं देव समुद्धरसि लीलया॥१९॥
दद्रु, गण्ड (विस्फोटकादि) प्रभृति रोग में निमग्न पुरुषों को आप नीरोग कर देते हैं। हे देव! आप प्रत्यक्षदर्शी देवता हैं और अपनी लीला से (अनायास ही) सबका उद्धार कर देते हैं॥१९॥
का मे शक्तिस्तव स्तोतुमार्त्तोऽहं रोगपीड़ितः।
स्तूयसे त्वं सदा देव ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः॥२०॥
मैं आर्त्त तथा रोगपीड़ित हूँ। आपकी स्तुति करने की शक्ति मुझमें कहाँ है? हे देव! आप सर्वदा ब्रह्मा-विष्णु-शिवादि से स्तुत होते हैं॥२०॥
महेन्द्रसिद्धगन्धर्वैरप्सरोभिः सगुह्यकैः।
स्तुतिभिः किं पवित्रैर्वा तव देव समीरिताः॥२१॥
हे देव! इन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व, गुह्यगण के साथ अप्सरागण पवित्र स्तुति द्वारा आपका स्तवन करते हैं॥२१॥
यस्य ते ऋग्यजुःसाम्नां त्रितयं मण्डले स्थितम्।
ध्यायिनां तु परं धाम मोक्षद्वारं च मोक्षिणाम्॥२२॥
आपके मण्डल में ऋक्-यजुः तथा साम (यह त्रयी) मूर्त्तिमान होकर अवस्थान करते हैं। आप योगीगण के परम धाम तथा मोक्षाभिलाषियों के लिये मोक्षद्वार हैं॥२२॥
अनन्तं तेजसां तेजो ह्यचिन्त्याव्यक्तनिर्मलम्।
यदप्यपाहतं किञ्चिद् स्तोत्रेऽस्मिन् जगतःपते।
आर्त्तभक्तिं च विज्ञाय तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि॥२३॥