साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
| १२४ | श्रीसाम्बपुराणम् |
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ये स्वधारूप अमृत से सभी प्राणियों का पोषण करते हैं। ये सबके अन्तः में, यहाँ तक कि म्लेच्छ जाति तथा तिर्यक् योनिगत प्राणियों के अन्तः में भी स्थित रहते हैं॥१६॥
कारुण्यात् सर्वभूतानि पासि देव विभावसो।
आपत्सु च विमोक्षार्थं त्वं भक्तानभिरक्षसि॥१७॥
चित्रकुष्ठान्धबधिरान् खञ्जान्पङ्गूञ्जडांस्तथा।
प्रपन्नवत्सलो देव नीरुजः कुरुषे नरान्॥१८॥
हे देव विभावसु! आप कल्पनावशात् सभी प्राणियों का पालन करते हैं। विपत्-समूह में उनके मोचनार्थ आप भक्तों की रक्षा करते हैं। हे प्रपन्नवत्सल देव! चित्रकुष्ठ, अन्ध, वधिर, खञ्ज, पङ्गु तथा जड लोगों को आप ही रोगमुक्त करते हैं॥१७-१८॥
दद्रुगण्डनिमग्नांश्च निर्ब्रणान्यूरुषांस्तथा।
प्रत्यक्षदर्शी त्वं देव समुद्धरसि लीलया॥१९॥
दद्रु, गण्ड (विस्फोटकादि) प्रभृति रोग में निमग्न पुरुषों को आप नीरोग कर देते हैं। हे देव! आप प्रत्यक्षदर्शी देवता हैं और अपनी लीला से (अनायास ही) सबका उद्धार कर देते हैं॥१९॥
का मे शक्तिस्तव स्तोतुमार्त्तोऽहं रोगपीड़ितः।
स्तूयसे त्वं सदा देव ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः॥२०॥
मैं आर्त्त तथा रोगपीड़ित हूँ। आपकी स्तुति करने की शक्ति मुझमें कहाँ है? हे देव! आप सर्वदा ब्रह्मा-विष्णु-शिवादि से स्तुत होते हैं॥२०॥
महेन्द्रसिद्धगन्धर्वैरप्सरोभिः सगुह्यकैः।
स्तुतिभिः किं पवित्रैर्वा तव देव समीरिताः॥२१॥
हे देव! इन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व, गुह्यगण के साथ अप्सरागण पवित्र स्तुति द्वारा आपका स्तवन करते हैं॥२१॥
यस्य ते ऋग्यजुःसाम्नां त्रितयं मण्डले स्थितम्।
ध्यायिनां तु परं धाम मोक्षद्वारं च मोक्षिणाम्॥२२॥
आपके मण्डल में ऋक्-यजुः तथा साम (यह त्रयी) मूर्त्तिमान होकर अवस्थान करते हैं। आप योगीगण के परम धाम तथा मोक्षाभिलाषियों के लिये मोक्षद्वार हैं॥२२॥
अनन्तं तेजसां तेजो ह्यचिन्त्याव्यक्तनिर्मलम्।
यदप्यपाहतं किञ्चिद् स्तोत्रेऽस्मिन् जगतःपते।
आर्त्तभक्तिं च विज्ञाय तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि॥२३॥
चतुर्विंशोऽध्यायः १२५
तेजों में आपका तेज अनन्त, अचिन्त्य, अव्यक्त तथा निर्मल है। हे जगत्पति! यदि मेरे इस स्तव में कुछ वैगुण्य हुआ है, तो उसे आप आर्त्तजनों की भक्ति समझकर क्षमा करने में समर्थ हैं॥२३॥
तमुवाच नरः प्रीतः सूर्यो जाम्बवतीसुतम्।
प्रीतोऽस्मि तपसा वत्स वरं ब्रूहि यमिच्छसि॥२४॥
परमात्मस्वरूप सूर्य प्रसन्न होकर जाम्बवती-नन्दन साम्ब से बोले—हे साम्ब! वत्स! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हो गया। जो इच्छा हो, उस वर की प्रार्थना करो॥२४॥
साम्ब उवाच
यदि प्रसन्नो भगवानेष एव वरो मम।
भक्तिर्भवतु मे नित्यं त्वयि देवे सनातने॥२५॥
साम्ब कहते हैं—हे भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तब हमें यही वर दीजिये कि आप सनातन देव के प्रति मेरी नित्य भक्ति बनी रहे॥२५॥
सूर्य उवाच
भूयस्तुष्टोऽस्मि भद्रं ते वरं वरय सुव्रत।
स द्वितीयं वरं वव्रे तं देवं वरदं शुभम्॥२६॥
मलं शरीरस्थमिदं त्वत्प्रसादात् प्रणश्यतु।
तथास्त्वित्युक्तमात्रोऽसौ भास्करेण महात्मना॥२७॥
तन्मुमोच मलं साम्बो देहात्त्वचमिवोरगः।
ततो लब्धवरः साम्बो रूपवांश्चाभवत् पुनः॥२८॥
सूर्यदेव कहते हैं—इससे मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ हूँ। तुम्हारा मंगल हो। हे सुव्रत! वर माँगो। साम्ब ने कल्याणप्रद वरद सूर्यदेव से द्वितीय वर इस प्रकार माँगा—मेरे शरीर का यह मल (कुष्ठरोग) आपकी कृपा से नष्ट हो जाय। महात्मा भास्कर के 'तथास्तु' कहते ही साम्ब के देह से वह कुष्ठरोग उसी प्रकार समाप्त हो गया, जैसे कि सर्प अपनी केंचुल त्याग देता है। यह वर पा जाने से साम्ब पुनः रूपवान हो गये॥२६-२८॥
सूर्य उवाच
भूयश्च शृणु मे साम्ब तुष्टोऽहं यद् ब्रवीमि ते।
अद्य प्रभृति त्वन्नाम्ना मम स्थानानि सुव्रत!॥२९॥
क्षितौ ये स्थापयिष्यन्ति तेषां लोकः सनातनः॥३०॥
स्थापयस्व च मामस्मिंश्चन्द्रभागातटे शुभे।
त्वत्समानमिदं चापि पुरं साम्ब भविष्यति॥३१॥
१२६ श्रीसाम्बपुराणम्
सूर्यदेव कहते हैं—हे साम्ब! तुमसे सन्तुष्ट होकर जो कहता हूँ, उसे सुनो! हे सुव्रत! आज से तुम्हारे नाम से पृथ्वी पर जो मेरा स्थान स्थापित करेगा, उसे सनातन लोक की प्राप्ति होगी। हे साम्ब! शुभ चन्द्रभागा के तट पर मुझे स्थापित करो। तुम्हारे नाम से ही यह नगर प्रसिद्ध होगा।।२९-३१।।
कीर्त्तिस्तवाक्षया लोके यावद् भूमिर्भविष्यति।
भूयश्च ते प्रदास्यामि प्रत्यहं स्वप्नदर्शनम्॥३२॥
जब तक पृथ्वी रहेगी, जगत् में तुम्हारी अक्षय कीर्ति बनी रहेगी और प्रतिदिन तुम्हें स्वप्न में मेरा दर्शन प्राप्त होगा।।३२।।
एवं दत्त्वा वरं तस्मै वृष्णिसिंहाय भास्करः।
प्रत्यक्षदर्शनं दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत॥३३॥
सूर्यदेव वृष्णिसिंह साम्ब को इस प्रकार का वर तथा प्रत्यक्ष दर्शन देकर वहाँ से अन्तर्हित हो गये।।३३।।
पठेद् द्विज इदं स्तोत्रं त्रिकालं भक्तिमान्नरः।
नारी वा दुःखशोकार्त्ता मुच्यते शोकसागरात्॥३४॥
हे ब्राह्मण! जो भक्तिमान व्यक्ति अथवा दुःख-शोक से कातर नारी त्रिकाल में इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे शोकसागर से मुक्त हो जायेंगे।।३४।।
चक्षुःपीडा मनःपीडा ग्रहपीडाभ्य एव च।
बन्धने निगडे घोरे काष्ठागारगृहेषु या॥३५॥
नेत्र की पीड़ा, मन की पीड़ा, ग्रहपीड़ा, घोर शृङ्खला-बन्धन तथा काष्ठागार गृह के बन्धन से वे मुक्त हो जायेंगे।।३५।।
अधस्तादन्तरिक्षे वा क्षमते भक्तिवत्सलः।
त्रिसप्तशतमावर्त्तैर्होमैस्त्वां सप्तरात्रिकम्॥३६॥
राज्यकामो लभेद्राज्यं धनकामो लभेद्धनम्।
रोगार्त्तो मुच्यते रोगाद् यथा साम्बस्तथैव सः॥३७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे रोगोपनयनो नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः
अधोलोक में अथवा अन्तरिक्ष में भक्तवत्सल सूर्यदेव सभी को क्षमा करते हैं। सात रात्रि २१०० आवर्त्त होम करने से राज्याभिलाषी राज्य प्राप्त करते हैं, धनकामी धनलाभ करते हैं एवं जैसे साम्ब रोग से मुक्त हो गये थे, वैसे ही रोगार्त्त व्यक्ति रोगमुक्त हो जाते हैं।।३६-३७।।
श्रीसाम्ब पुराण का रोगोपनयन नामक चतुर्विंश अध्याय समाप्त
पञ्चविंशोऽध्यायः
(श्रीसूर्यस्तवराजवर्णनम्)
वशिष्ठ उवाच
स्तुवंस्तत्र ततः साम्बः कृशो धमनिसन्ततः।
राजन्नामसहस्रेण सहस्रांशुं दिवाकरम् ॥१॥
खिद्यमानं तु तं दृष्ट्वा सूर्यः कृष्णात्मजं तदा।
स्वप्ने तु दर्शनं दत्त्वा पुनर्वचनमब्रवीत् ॥२॥
वशिष्ठ कहते हैं—महाराज साम्ब सहस्रांशु दिवाकर के सहस्र नाम के द्वारा स्तव करते-करते जब कृश एवं धमनीशिरा-मात्र हो गये तब खिद्यमान कृष्णपुत्र साम्ब को देखकर सूर्य ने उनको स्वप्न में दर्शन देकर इस प्रकार कहा।।१-२।।
सूर्य उवाच
साम्ब साम्ब महाबाहो शृणु जाम्बवतीसुत।
अलं नामसहस्रेण पठस्वेमं स्तवं शुभम् ॥३॥
यानि नामानि गुह्यानि पवित्राणि शुभानि च।
तानि ते कीर्त्तयिष्यामि श्रुत्वा त्वमवधारय ॥४॥
सूर्य कहते हैं—साम्ब-साम्ब! महाबाहो! जाम्बवतीनन्दन! सहस्र नामों का प्रयोजन नहीं है। तुम इस शुभ स्तव का पाठ करो। ये नाम अत्यन्त गुप्त हैं, पवित्र तथा शुभप्रद हैं। उन्हें मैं कहता हूँ। तुम स्थिर होकर धारण करो।।३-४।।
ॐ विकर्त्तनो विवस्वांश्च मार्त्तण्डो भास्करो रविः।
लोकप्रकाशकः श्रीमाँल्लोकचक्षुर्गृहेश्वरः ॥५॥
लोकसाक्षी त्रिलोकेशः कर्त्ता हर्त्ता तमिस्रहा।
तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः ॥६॥
गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।
एकविंशतिरित्थेष स्तव इष्टः सदा मम ॥७॥
ॐ, विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, कर्त्ता, हर्त्ता, तमिस्रहा, तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त, ब्रह्मा एवं सर्वदेवनमस्कृत—इन इक्कीस नामों से स्तुति मुझे सदा प्रिय है।।५-७।।
१२८ श्रीसाम्बपुराणम्
शरीरारोग्यदश्चैव धनवृद्धियशस्करः।
स्तवराज इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः॥ १८॥
यह शरीर के लिये आरोग्यप्रद, धनवर्धक तथा यशप्रद स्तवराज तीनों लोकों में प्रसिद्ध है॥१८॥
य एतेन महाबाहो द्वे सन्ध्येऽस्तमनोदये।
स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१९॥
कायिकं वाचिकं चापि मानसं यच्च दुष्कृतम्।
तत् सर्वमेकजाप्येन प्रणश्यति ममाग्रतः ॥२०॥
एष जाप्यश्च होमश्च सन्ध्योपासनमेव च।
बलिमन्त्रोऽर्घ्यमन्त्रश्च धूपमन्त्रस्तथैव च॥२१॥
हे महाबाहो! जो व्यक्ति दोनों सन्ध्या के समय (सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय) इस स्तव के द्वारा प्रणत होकर मेरी स्तुति करेगा, वह समस्त पापों से मुक्त हो जायेगा। समस्त कायिक, वाचिक तथा मानसिक दुष्कृत मेरे समक्ष इस स्तुति के मात्र एक जप से ही समाप्त हो जाते हैं। यह मन्त्र जाप्य (जपयोग्य) है। इससे होम, सन्ध्या, उपासना, बलि (उपहार प्रदान) किया जा सकता है। यही अर्घ्य का तथा धूप-प्रदान का भी मन्त्र है॥१९-२१॥
अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाते प्रदक्षिणे।
पूजितोऽयं महामन्त्रः सर्वव्याधिहरः शुभः॥२२॥
इस मन्त्र से अन्नदान, स्नान, प्रणाम तथा प्रदक्षिणा भी की जा सकती है। यह महामन्त्र पूजित होने पर व्याधिविनाशक तथा शुभप्रद होता है॥२२॥
एवमुक्त्वा तु भगवान् भास्करो जगदीश्वरः।
आमन्त्र्य कृष्णतनयं तत्रैवान्तरधीयत ॥२३॥
साम्बोऽपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनम्।
पूतात्मा नीरुजः श्रीमाँस्तस्माद्रोगाद्विमुक्तवान्॥२४॥
इति श्रीसाम्बपुराणे रोगापनयने श्रीसूर्यवक्त्रविनिःसृतस्तवराजवर्णनं नाम पञ्चविंशतितमोऽध्यायः
यह कहकर जगत् के नियामक भगवान् भास्कर कृष्णपुत्र साम्ब से विदा लेकर वहाँ से अन्तर्हित हो गये। साम्ब भी इस स्तवराज से सप्त अश्ववाहन सूर्य की स्तुति करके पवित्रात्मा होकर, नीरोग, शोभायुक्त (श्रीमान्) हो कुष्ठ रोग से मुक्त हो गये॥२३-२४॥
श्री साम्बपुराण में सूर्यकृत स्तवराजवर्णन नामक पञ्चविंश अध्याय समाप्त
षड्विंशोऽध्यायः
(मगानयनम्)
अथ लब्ध्वरः साम्बः प्राप्तं रूपं पुरातनम्।
मन्यमानस्तदाश्चर्यं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥१॥
पूर्वाभ्यासेन तेनैव सार्धमन्यैस्तपस्विभिः।
स्नानार्थं नातिदूरस्थां चन्द्रभागां नदीं ययौ ॥२॥
तदनन्तर वर-लाभ करके साम्ब ने पुरातन रूप प्राप्त किया। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे मन ही मन आनन्दित हो गये। पुरानी आदत के कारण वे अन्य तपस्वीगण के साथ स्नान के लिये पास की चन्द्रभागा नदी में गये।।१-२।।
स स्नात्वा सहसैवाथ पश्यतिस्म प्रभावतीम्।
ऊह्यमानां जलौघेन प्रतिमामुन्मुखीं रवेः ॥३॥
उन्होंने स्नान करके हठात् देखा कि जल के स्रोत में सूर्य की प्रभा से युक्त एक उज्ज्वल प्रतिमा प्रतिच्छवित हो रही है।।३।।
स तामुत्तीर्य सलिलादानयित्वा स्वमाश्रमम्।
तस्मिन्मित्रवनोद्देशे स्थापयित्वा विधानतः ॥४॥
वे उस प्रतिमा को जल से निकाल कर अपने आश्रम में लाये और मित्रवन के एक स्थान पर उसे विधानपूर्वक स्थापित किया।।४।।
ततस्तामेव पप्रच्छ प्रणम्य प्रतिमां रवेः।
केनेयं निर्मिता नाथ भवतो ह्याकृतिः शुभा ॥५॥
तदनन्तर उस सूर्यप्रतिमा को प्रणाम करके साम्ब ने पूछा—हे नाथ! आपकी इस शुभ आकृति का निर्माण किसने किया है?।।५।।
प्रतिमा तमुवाचाथ शृणु साम्ब यतस्त्वियम्।
निर्मिता येन चाप्येषा पुरुषेण ममाकृतिः ॥६॥
प्रतिमा ने उत्तर किया—साम्ब! सुनो, जैसे उस प्रतिमा का निर्माण हुआ है और जिस पुरुष ने उसका निर्माण किया है।।६।।
ममातितेजसाविष्टं रूपमासीत् पुरातनम्।
असह्यं सर्वभूतानां ततोऽहं प्रार्थितः सुरैः ॥७॥
१३० | श्रीसाम्बपुराणम्
सह्यं भवतु ते रूपं सर्वप्राणभृतामिह।
ततो मया समादिष्टो विश्वकर्मा महातपाः ॥८॥
पहले मेरा रूप अत्यन्त तेजयुक्त था, जो समस्त प्राणिगण के लिये असह्य था। इसलिये देवताओं ने मुझसे प्रार्थना किया कि सभी प्राणियों के लिये आपका रूप सह्य हो जाय। इसलिये मैंने महातेजस्वी देवशिल्पी विश्वकर्मा को आदेश दिया॥७-८॥
तेजसः शातनं कुर्वन् रूपं निर्वर्त्तयस्व मे।
ततस्तु मत्समादेशात्तेनैव निपुणं तदा ॥९॥
शाकद्वीपे भ्रमिं कृत्वा रूपं निर्वर्त्तितं मम।
प्रीत्या ते साम्प्रतं चैव समयाकारितं पुनः ॥१०॥
(मैंने आदेश दिया कि) ‘मेरे तेज का खण्डन करके मेरा रूप तैयार करो’। तदनन्तर मेरे आदेश के अनुसार उन्होंने शाकद्वीप में भ्रमि (घूर्णिचक्र यन्त्र) पर (काट-छाँट कर) मेरे रूप का निर्माण किया। यहाँ मैंने तुम्हारी प्रसन्नता के लिये उनको बुलाया है॥९-१०॥
तेनेयं कल्पवृक्षात्तु निर्मिता प्रतिमा मम।
कृत्वा हिमवतः पृष्ठे पुण्यसिद्धनिषेविते ॥११॥
त्वदर्थं चन्द्रभागायां ततस्तेनावतारिता।
भवतस्तारणार्थं हि जातं स्थानमिदं मम ॥१२॥
विश्वकर्मा ने पुण्यशाली सिद्धों की आवासभूमि हिमालय के पृष्ठ पर कल्पवृक्ष से मेरी प्रतिमा का निर्माण किया था और तुम्हारे लिये उसे इस चन्द्रभागा नदी पर रख दिया था। तुम्हारी मुक्ति के लिये ही मेरा यह स्थान प्रकट हुआ है॥११-१२॥
रुचिरं सर्वदा चात्र सान्निध्यं मे भविष्यति ॥१३॥
सान्निध्यं मम पूर्वाह्ने उदिते रञ्जयते जनः।
कालात्यये च मध्याह्ने सायाह्ने चात्र नित्यशः ॥१४॥
इस स्थान पर सर्वदा मेरा मनोहर सान्निध्य रहेगा। पूर्वाह्न में उदित होने पर लोग मेरा सान्निध्य पाकर आनन्दित होंगे। तदनन्तर मध्याह्न तथा सायाह्न में भी नित्य मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे॥१३-१४॥
वशिष्ठ उवाच
श्रुत्वा देवस्य तद्वाक्यं दृष्ट्वा प्रत्यक्षदर्शिनम्।
कृत्वा देवगृहं साम्बस्ततः प्रोवाच नारदम् ॥१५॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—सूर्यदेव की बात सुनकर और प्रत्यक्ष उनका दर्शन पाकर साम्ब ने देवगृह का निर्माण करके नारद से इस प्रकार कहा॥१५॥
षड्विंशोऽध्यायः १३१
साम्ब उवाच त्वत्प्रसादान्मया प्राप्तं रूपमेतत् सनातनम्। प्रत्यक्षदर्शनं चापि भास्करस्य महात्मनः ॥१६॥ सर्वमेतच्च सम्प्राप्य पुनश्चिन्ताकुलं मनः। देवस्य परिचर्यायाः पालनं कः करिष्यति ॥१७॥ गुणयुक्तो द्विजो यो हि समर्थः परिपालने। ममैवानुग्रहाद् ब्रह्मन् विचिन्त्याख्यातुमर्हसि ॥१८॥ एवमुक्तस्तु साम्बेन नारदः प्रत्युवाच तम् ॥१९॥
साम्ब कहते हैं—आपकी कृपा से मैंने यह सनातन दिव्य रूप प्राप्त कर लिया एवं महात्मा भास्कर का प्रत्यक्ष दर्शन भी प्राप्त किया। यह सब पाकर भी मेरा मन चिन्तायुक्त ही है कि सूर्यदेव की (प्रतिमा की) पूजा—परिचर्या कौन करेगा? हे ब्रह्मन्! गुणयुक्त कौन ब्राह्मण है, जो इस कार्य में समर्थ है? मुझ पर अनुग्रह करके यह बतायें। साम्ब से यह सुनकर नारद उनसे कहने लगे॥१६-१९॥
नारद उवाच न द्विजः परिगृह्णन्ति देवस्यात्मीकृतं धनम्। विद्यते च धनं ह्यत्र गुरुश्चायं प्रतिग्रहः ॥२०॥ देवचर्यागतैर्द्रव्यैः क्रिया ब्राह्मी न विद्यते। अविज्ञाय च कुर्वन्ति ये क्रिया लोभमोहिताः ॥२१॥ अपांक्तेया भवन्तीह ते वै देवलका द्विजाः। अविज्ञाय विधानं ये ब्राह्मणा लोभमोहिताः ॥२२॥ देवस्वमुपभोक्ष्यन्ति पतितास्ते भवन्ति हि। गर्हितं मानवं शास्त्रं न प्रशंसन्ति ते द्विजाः ॥२३॥
नारद कहते हैं कि देवता का धन ब्राह्मण नहीं लेते। यह धन तो है; लेकिन उसका प्रतिग्रह अत्यन्त कठिन है। देवता की परिचर्या में प्राप्त द्रव्य द्वारा ब्राह्मण का कोई काम नहीं होता। यह तत्त्व जाने बिना जो लोभ से मुग्ध होकर इसे प्रतिगृहीत करते हैं, ऐसे पुरोहित गण सद् ब्राह्मणों के साथ एक पंक्ति में भोजन ग्रहण करने योग्य नहीं होते। अज्ञानवशात् लोभ से विमुग्ध जो ब्राह्मण देवस्व (देवमूर्त्ति-पूजन से प्राप्त धन) का भोग करते हैं, वे पतित हो जाते हैं। ऐसे निन्दित ब्राह्मणगण की मानवशास्त्र में प्रशंसा नहीं की गई है॥२०-२३॥
देवस्वं ब्राह्मणस्वं च यो लोभादुपजीवति। स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिष्टेन जीवति ॥२४॥
१३२ | श्रीसाम्बपुराणम्
देवता तथा ब्राह्मण के उद्देश्य से उत्सर्गीकृत वस्तु तथा द्रव्य से जो व्यक्ति लोभवशात् जीविका का निर्वाह करता है, वह पापात्मा परलोक में गृद्धों द्वारा छोड़ी गई जूठन से जीवन धारण करता है॥२४॥
विधिज्ञो ज्ञानवन्तश्च परिचर्याक्षमं तथा।
समाख्यास्यति ते देवस्तस्मात्तं शरणं व्रज॥२५॥
अतएव अन्य कोई ब्राह्मण परिचर्या करे, जो अधिक ज्ञानी तथा सेवा के उपयुक्त हों। इसे देव (सूर्य) तुमसे बतलायेंगे; अतः उनकी शरण में जाओ॥२५॥
नारदेनैवमुक्तस्तु प्रणम्य शिरसा रविम्।
संशयं परिपप्रच्छ कस्ते पूजां करिष्यति॥२६॥
नारद से यह जानकर साम्ब ने रविदेव को मस्तक से प्रणाम करके अपने संशय को व्यक्त किया कि आपकी पूजा कौन करेगा?॥२६॥
विज्ञप्ते त्वथ साम्बेन प्रतिमा तमुवाच ह।
न योग्यः परिचर्यायां जम्बूद्वीपे ममानघ॥२७॥
मम पूजापरा कृत्वा शाकद्वीपादिहानय।
लवणोदात् परे पारे क्षीरोदेन समावृतम्॥२८॥
जम्बूद्वीपात् परं तस्माच्छाकद्वीप इति श्रुतः।
तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमाश्रिताः॥२९॥
साम्ब के ऐसा पूछने पर प्रतिमा (सूर्यप्रतिमा) ने कहा—हे निःष्पाप! जम्बू द्वीप में मेरी परिचर्या करने वाला कोई नहीं है। शाकद्वीप से मेरी पूजा में परायण ब्राह्मण को ले आओ। वह शाकद्वीप लवण समुद्र के पार क्षीरोदक से घिरा है। जम्बूद्वीप के पार शाकद्वीप है, यह सर्वविदित है। वह पवित्र जनपद चातुर्वण्य मनुष्यों द्वारा समावृत है॥२७-२९॥
मगाश्च मामगाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा।
मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा मामगाः क्षत्रियास्तथा॥३०॥
वैश्यास्तु मानसा ज्ञेयाः शूद्रास्तेषां तु मन्दगाः।
न तेषां संकरः कश्चित् वर्णाश्रमकृतः क्वचित्॥३१॥
वहाँ चार प्रकार के लोग हैं—मग, मामग, मानस तथा मन्दग। मगगण प्रायः ब्राह्मण हैं। मानग क्षत्रिय होते हैं। मानस वैश्य हैं तथा शूद्रगण मन्दग हैं। उनमें वर्णाश्रम-कृत कोई साङ्कर्य नहीं है॥३०-३१॥
धर्मस्याव्यभिचारित्वादेकान्ते सुखिताः प्रजाः।
तेजसश्चास्मदीयस्य निर्मिता वै पुरा मया॥३२॥
षड्विंशोऽध्यायः १३३
धर्म से अविचलित होने के कारण वहाँ समस्त प्रजाजन सुखी रहते हैं। अपने तेज से मैंने वहाँ पुरी का निर्माण किया है।।३२।।
तेभ्यां वेदाश्च चत्वारः सरहस्या मयेरिताः।
वेदोक्तैर्विविधैः स्तोत्रैः परैर्गुह्यैर्मया कृतैः ।।३३।।
मामेव ते च ध्यायन्ति मां जपन्ते च नित्यशः ।
मद्भावना मम परा मद्भक्ता मत्परायणाः ।।३४।।
उनको मैंने सरहस्य चारो वेदों को बतलाया है। मेरे द्वारा कथित वेदोक्त परम गुह्य विविध स्तोत्रों द्वारा वे मेरा ही ध्यान करते हैं और नित्य मेरा ही जप करते हैं। वे मेरी भावना करते हैं, मेरा पूजन करते हैं। वे सभी मेरे भक्त तथा मुझमें परायण (आश्रित) हैं।।३३-३४।।
मम शुश्रूषकाश्चैव ममैव व्रतचारिणः ।
अव्यङ्गधारिणः सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा ।।३५।।
कुर्वन्ति ते सदा तत्र मम पूजां मनोऽनुगाम्।
तत्र देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह चारणैः ।।३६।।
वे वहाँ मन की अभिलाषा के अनुसार मेरा पूजन करते हैं। वहाँ गन्धर्वों के साथ देवता एवं चारणों के साथ सिद्धगण विहार करते हैं, रमण करते हैं।।३५-३६।।
विहरन्ते रमन्ते च दृश्यमानाश्च तैः सह।
श्वेतद्वीपे त्वहं विष्णुः कुशद्वीपे महेश्वरः ।।३७।।
वहाँ विहार करते तथा रमण करते उनके साथ मैं दृश्यमान होता हूँ। मैं श्वेत द्वीप में विष्णुरूपेण तथा कुशद्वीप में महेश्वररूपेण रहता हूँ।।३७।।
पुष्करे च स्मृतो ब्रह्मा शाकद्वीपे च भास्करः ।
तन्मगान मम पूजार्थं शाकद्वीपादिहानय ।।३८।।
आरूढ़ो गरुड़ं साम्ब शीघ्रं गच्छ विचारय ।।३९।।
पुष्कर में मैं ब्रह्मारूप से तथा शाकद्वीप में भास्कररूप से ख्यात हूँ। अतएव मेरी पूजा-हेतु शाकद्वीप से मग ब्राह्मण को यहाँ लाओ। हे साम्ब! विचार करके गरुड़ पर आरूढ़ होकर शीघ्र वहाँ जाओ।।३८-३९।।
वशिष्ठ उवाच
तथेति प्रतिगृह्णाज्ञां रवेर्जाम्बवतीसुतः ।
पुनर्द्वारवतीं गत्वा कान्त्यातीव समावृतः ।।४०।।
आख्यातवान् पितुः सर्वं स्वकीयं देवदर्शनम् ।
तस्माच्च गरुड़ं लब्ध्वा ययौ साम्बोऽधिरुह्य तम् ।।४१।।
१३४ श्रीसाम्बपुराणम्
'ऐसा ही हो' कहकर सूर्य का आदेश ग्रहण करके साम्ब रमणीय कान्तियुक्त होकर द्वारका जाकर कृष्ण से अपनी सूर्यदर्शन की बातें बताई और उनसे गरुड़ को प्राप्त करके उसपर आरोहण कर साम्ब चल दिये॥४०-४१॥
शाकद्वीपमनुप्राप्य सम्प्रहृष्टतनूरुहः ।
तत्रापश्यद् यथोद्दिष्टान् साम्बस्तेजस्विनो मगान् ॥४२॥
शाकद्वीप में पहुँचकर प्रहृष्ट एवं रोमाञ्चित कलेवर वाले साम्ब ने यथाकथित मग (ब्राह्मणों) को देखा॥४२॥
विवस्वन्तं पूजयतो धूपगन्धादिभिः शुभैः ।
अभिवाद्य तु तान् सर्वान् कृत्वा चैव प्रदक्षिणाम् ॥४३॥
पृष्ट्वा ह्यनामयं तेषां श्लाघयामास तांस्ततः ।
यूयं हि पुण्यकर्माणो द्रष्टव्याश्च शुभार्थिभिः ॥४४॥
वे मंगलमय धूप तथा गन्धादि से सूर्य का पूजन कर रहे थे। उन सबका अभिवादन तथा प्रदक्षिणा करके साम्ब ने उनकी कुशलता पूछकर उनकी प्रशंसा करते हुये कहा कि आप पुण्यकर्मा एवं शुभाकांक्षी प्रतीत हो रहे हैं॥४३-४४॥
यो रतोऽर्कस्य पूजायां तस्य चैव वरप्रदः ।
तनयं विद्धि मां विष्णोर्नाम्ना साम्ब इति श्रुतः ॥४५॥
जो सूर्य को पूजा करते हैं, उनके लिये आप वर देने वाले हैं। आप लोग मुझे विष्णु (कृष्ण)-पुत्र साम्ब जानें॥४५॥
चन्द्रभागातटे चापि मया सूर्यो निवेशितः ।
तेनाहं प्रेषितश्चात्र उत्तिष्ठध्वं व्रजामहे ॥४६॥
मैंने चन्द्रभागा के तट पर सूर्य की प्रतिमा स्थापित की है। उन्होंने ही मुझे यहाँ भेजा है। आप उठिये, हम वहाँ जायँ॥४६॥
ते तमूचुस्ततः साम्बमेवमेतन्न संशयः ।
अस्माकमपि देवेन व्याख्यातं पूर्वमेव हि ॥४७॥
तब उन्होंने साम्ब से कहा कि ऐसा ही सूर्यदेव ने हमसे भी पहले कहा था, इसमें कोई संशय नहीं है॥४७॥
अष्टादशकुलानीह मगानां वेदवादिनाम् ।
यास्यन्ति च त्वया सार्धं यत्र सन्निहितो रविः ॥४८॥
यहाँ से वेदज्ञ मग ब्राह्मणों के अट्ठारह परिवार आपके साथ वहाँ जायेंगे, जहाँ सूर्यदेव की प्रतिमा सन्निहित है॥४८॥
षड्विंशोऽध्यायः १३५
स तु गृह्य ततस्तानि दश चाष्टौ कुलानि च।
आरोप्य गरुड़े साम्बस्त्वरितं पुनरभ्यगात् ॥४९॥
तदनन्तर साम्ब ने उनके अट्ठारह वंश ब्राह्मणाकुल को गरुड़ पर बैठाया और शीघ्र लौट आये।।४९।।
सपुत्रदारसंयुक्तो पूजा यज्ञाय चागतः ।
सोल्पेऽनैव तु कालेन प्राप्तो मित्रवनं पुनः ॥५०॥
वे स्त्री-पुत्रादि के साथ पूजा तथा यज्ञार्थ आये। उनके साथ साम्ब अत्यल्प काल में ही मित्रवन लौट आये।।५०।।
कृत्वाज्ञां तां रवेः साम्बो यत्कृतं तन्न्यवेदयत् ।
रविः शोभनमित्युक्त्वा प्रसन्नः साम्बमब्रवीत् ॥५१॥
मम पूजाकरा ह्येते प्रजानां शान्तिकारकाः ।
मम पूजां विधानोक्तां करिष्यन्ति मनोऽनुगाम् ।
मत्कृते च पुनश्चिन्ता न ते काचिद्भविष्यति ॥५२॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मगानयनं नाम षड्विंशोध्यायः
साम्ब ने सूर्य की आज्ञा का पालन कर लिया—यह उन्होंने सूर्य को बताया। सूर्यदेव ने कहा—‘ठीक है’ और प्रसन्नता-पूर्वक साम्ब से कहा—ये मेरे पूजक हैं। प्रजा के लिये शान्तिकारक हैं। ये यथाविधान साभिलाष होकर मेरा पूजन करेंगे। मेरे पूजनार्थ तुमको कोई चिन्तन नहीं करना होगा।।५१-५२।।
श्री साम्बपुराण में मगानयन नामक षड्विंश अध्याय समाप्त
सप्तविंशोऽध्यायः
(मगानां सूर्यपूजा)
बृहद्वल उवाच
अहो सभाग्याः श्लाघ्याश्च कृतपुण्याश्च ते सदा।
पूजायां ये रताः सूर्यो येषां चैव वरप्रदः ॥१॥
बृहद्वल कहते हैं—अहो! जो सूर्यपूजा में रत हैं, वे भाग्यवान हैं, प्रशंसनीय हैं तथा सर्वदा कृतपुण्य हैं। सूर्यदेव उनके लिये वरप्रद हैं॥१॥
पर्याप्तं सर्वमेवैषामिह चामुत्र किं फलम्।
अनित्ये सति मानुष्ये देवपूजारता हि ये॥२॥
अनित्य मनुष्यदेह से जो देवपूजा में सदा रत हैं, उनको इहलोक तथा परलोक में क्या पर्याप्त फल मिलता है॥२॥
किन्तु चिन्तयतः सूर्यं चिन्तयित्वा सुभोजकान्।
ज्ञानं प्रति तथा चैषां हृदये मम संशयः ॥३॥
किन्तु सूर्य चिन्तनकारी को सुखभोग की इच्छा के कारण ज्ञान के प्रति कितनी रुचि (तथा यत्न) है, इस विषय में मुझे सन्देह है॥३॥
कथं पूजाकरा होते किं मगाः किञ्च याजकाः।
ज्ञानं च किं परं तेषां ज्ञेयस्तेषां क एव हि ॥४॥
एतत् सर्वं यथान्यायं तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥५॥
ये लोग किसलिये पूजापरायण होते हैं? मगगण किसके याजक हैं? क्या उनके लिये ज्ञान ही श्रेष्ठ है? उनके लिये ज्ञेय वस्तु क्या है? यह सब यथायथ रूप से मुझसे कहिये॥४-५॥
वशिष्ठ उवाच
मोक्षवादिन एवैते कर्मयोगे समाश्रिताः।
यष्टव्यो भगवान्सूर्यः फलपुष्पैर्मनोरमैः ॥६॥
तथैवान्नौषधीभिश्च ह्याज्यहोमैस्तथैव च।
होमं ये मन्त्रतः कृत्वा परं होमं पिबन्ति ते ॥७॥
परं होमस्य पानाच्च पूतात्मानो ह्यकल्मषाः।
विंशतिं परमां दिव्यां भास्करीं तेजसीं कलाम् ॥८॥
सप्तविंशोऽध्यायः १३७
वशिष्ठ देव कहते हैं—ये मोक्षवादी ही हैं और कर्मयोग का आश्रय ग्रहण किये हैं। मनोरम फल-पुष्प से भगवान् सूर्य का ये पूजन करते हैं। इसी प्रकार अन्न, औषधि द्वारा भी पूजन करते हैं और घृत से होम करते हैं। मन्त्रों द्वारा होम करते हैं तथा होमद्रव्य का पान करते हैं। होमपान के फल से ये निष्पाप हो गये हैं। सूर्य में दिव्य तेज की बीस कलायें हैं॥६-८॥
कर्मणः साधने चैका तनुरग्नौ स्थिता तु या।
वायुमार्गे स्थिता व्योम्नि द्वितीया च प्रकाशिका ॥९॥
ततः परं तृतीया तत् स्मृतं सूर्यस्य मण्डलम्।
ऋङ्मयं मण्डलं तच्च दिव्यं ह्याम॑रमव्ययम् ॥१०॥
जो अंश अग्नि में स्थित है, कर्म-साधन में वह एक तनु है। आकाश में वायुमार्गस्थ द्वितीय तनु प्रकाशिका है। तदनन्तर तृतीय तनु को सूर्य का मण्डल कहा गया है। वह ऋक्मय मण्डल अथवा दिव्य मण्डल है, जो अमर तथा अव्यय है॥९-१०॥
स तस्य पुरुषो मध्ये योऽसौ सदसदात्मकः।
क्षराक्षरञ्च विज्ञेयो महासूक्ष्मं तथैव च ॥११॥
निष्कलः सकलश्चैव द्वैविध्यं तस्य कल्पितम्।
द्रष्टव्यः सकलश्चैव सर्वभूतव्यवस्थितः ॥१२॥
उस मण्डल में जो पुरुष अवस्थित हैं, वे सत्-असत् स्वरूप हैं, वे क्षर-अक्षररूप से ज्ञेय हैं। उनको महासूक्ष्म स्वरूप भी कहा गया है। निष्कल (कलारहित) तथा सकल (कलायुक्त)—इन दो रूपों से उनकी कल्पना की जाती है। सकलरूप ही दृष्टिगोचर, द्रष्टव्य है। वह समस्त प्राणियों में स्थित है॥११-१२॥
तृण-गुल्म-लता-वृक्ष-मृग-सिंह-गज-द्विजान्।
सुर-द्विज-मनुष्यांश्च स्थलजाञ्जलजांस्तथा ॥१३॥
व्याप्य स्थितं स सर्वत्र सर्वेषामन्तरात्मनि।
यदा कालात्मनश्चैव द्वितीयां तनुमाश्रितः ॥१४॥
तृण-गुल्म-लता-वृक्ष-हिरण-सिंह-हाथी तथा पक्षीगण, देवता, ब्राह्मण तथा मनुष्यगण, स्थलज तथा जलज समस्त प्राणीगण में तथा सबकी अन्तरात्मा में वे ही सदा व्याप्त रहते हैं॥१३-१४॥
निष्कलस्तु तदा ज्ञेयः संस्थितस्तैजसीं कलाम्।
हिमं घर्मं च वर्षं च त्रैलोक्यं कुरुते सदा ॥१५॥
जब वे कलात्मक हैं, तब द्वितीय तनु का आश्रय ग्रहण करते हैं। जब निष्कल हैं, तब तैजसी कला का आश्रय ग्रहण करते हैं। इस प्रकार शीत-ग्रीष्म तथा वर्षारूप त्रिकाल की वे सृष्टि करते हैं॥१५॥
१३८ श्रीसाम्बपुराणम्
तृतीयायां तनौ तस्य संरक्षंस्तत्परं पदम्।
देवयानं च पन्थानं कर्मयोगेन संस्थितम्॥१६॥
आदित्यसिद्धान्तविदः सांख्ययोगविदश्च ये।
तेऽपि गच्छन्ति तत्स्थानं स मोक्षः प्रकीर्त्तितः॥१७॥
उनका तृतीय तनु परमपद में संरक्षित है। कर्मयोग में देवयान पथ संस्थित है। आदित्य सिद्धान्तविद लोग तथा सांख्ययोगज्ञ जिस स्थान में जाते हैं, वह मोक्ष के नाम से कहा गया है।।१६-१७।।
निर्द्वन्द्वो निर्मलश्चैव तत्र गत्वा न शोचति।
वेदेषु च वदन्तीमं त्रयीधर्मस्तु संस्थितः॥१८॥
निर्द्वन्द्व तथा निर्मल होकर वहाँ जाकर कोई शोक नहीं करता। वेद में भी यही कहा गया है। उसमें ऋक्-यजुः-साम वेदत्रयी में वर्णित कर्मकाण्ड संस्थित है।।१८।।
गायत्र्याश्च चतुर्विंशत्यक्षरं परिकीर्त्तितम्।
पञ्चविंशतितत्त्वस्थं ध्यायन्तस्तत्त्ववेदिभिः॥१९॥
ॐकारस्थं ततश्चापि ध्यायन्ति वेदवादिनः।
अक्षरं चैव ओङ्कारं सार्द्धमात्राद्वये स्थितम्॥२०॥
गायत्री २४ अक्षरों की कही गयी हैं। सूर्य का ध्यान तत्त्ववेत्ता २५ तत्त्वस्थ करते हैं। वेदवादीगण उनका ध्यान ओंकार रूप में करते हैं। ओंकार अ + उ + म तथा सार्द्धमात्राद्वय में स्थित है।।१९-२०।।
वदन्ति चार्द्धमात्रस्थमकारं व्यञ्जनात्मकम्।
ध्यायन्ति च मकारं ये ज्ञानं तेषां मदात्मकम्॥२१॥
मकारध्यानयोगाच्च मया ह्येते प्रकीर्त्तिताः॥२२॥
अर्धमात्रस्थ मकार व्यञ्जनात्मक है। जो मकार का ध्यान करता है, उसे आत्मविषयक ज्ञान होता है। मकार ध्यानयोग में मैंने यह सब कहा है।।२१-२२।।
धूपमाल्यैर्जपैश्चापि ह्युपहारैस्तथैव च।
ये यजन्ति सहस्त्रांशुं तेन ते याजकाः स्मृताः॥२३॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मगानां सूर्यपूजानाम सप्तविंशोऽध्यायः
जो धूप, माला, जप तथा उपहार (पूजादि द्रव्य) द्वारा सहस्त्रांशु सूर्य का यजन करते हैं, उन्हें याजक कहा गया है।।२३।।
श्रीसाम्बपुराण में मग द्वारा सूर्यपूजा नामक सप्तविंश अध्याय समाप्त
अष्टाविंशोऽध्यायः
(मोक्षज्ञानम्)
वशिष्ठ उवाच
इमां ज्ञानोपलब्धिञ्च कथ्यमानां निबोध मे।
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांस-शोणितलेपनम् ॥१॥
चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्र-पुरीषयोः।
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् ॥२॥
रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत्।
वशिष्ठ देव कहते हैं—मैं तुमसे ज्ञानोपलब्धि की बातें कहता हूँ, सुनो। प्राणियों का निवास स्थल है—यह देह। इस देह की आसक्ति का त्याग करो। यह देह अस्थिस्थूण, स्नायुयुक्त है। मांस तथा रक्त से लिप्त है। चर्म द्वारा आवृत, मूत्र तथा पुरीषरूपी दुर्गन्ध-युक्त, जरा-शोक से युक्त, रोगगृह है। यह आतुर तथा रजयुक्त एवं अनित्य है॥१-२॥
कृपालुत्वं क्षमासत्यार्जवत्वमथ शौचता ॥३॥
क्षमता सर्वभूतेषु एतन्मुक्तस्य लक्षणम्।
तिले तैलं दधि क्षीरे काष्ठे पावकसंहतिः ॥४॥
कृपालुत्व, क्षमा, सत्य, आर्जव, शौच और क्षमता—ये हैं मुक्त के लक्षण। जैसे तिल में तेल है, जैसे दुग्ध में दधि है, जैसे काष्ठ में अग्नि है (वैसे ही समस्त प्राणियों में ये गुण रहते हैं)॥३-४॥
उपायं चिन्तयेदस्य धिया धीरः समाहितः।
प्रमाथिना चलेनापि मनसा संयतेन तु ॥५॥
धीर व्यक्ति समाहित चित्त से बुद्धि द्वारा प्रमाथी, चंचल मन को संयत करने के उपाय का चिन्तन करते हैं॥५॥
बुद्धीन्द्रियाणि संयम्य शकुन्तानिव पञ्जरे।
इन्द्रियैर्नियतैर्देही धारणाभिश्च तृप्यति ॥६॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषं धारणाभिश्च दुष्कृतम्।
प्रत्याहारेण विषयान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥७॥
१४० श्रीसाम्बपुराणम्
प्राणायाम (पूरक, कुम्भक, रेचक) द्वारा दोषों का धारण (यमादि गुणयुक्त आत्मा में मन-समर्पण, ब्रह्मवस्तु में अन्तःकरण का अभिनिवेश) द्वारा दुष्कृत का एवं प्रत्याहार (इन्द्रिय-निवर्तन) द्वारा विषयों का परित्याग करके, ध्यान द्वारा ईश्वरीय गुणों का लाभ प्राप्त करना चाहिये॥६-७॥
यथा पर्वतधातूनां दोषा दह्यन्ति धाम्यताम्।
तथेन्द्रियकृता दोषा दह्यन्ते चित्तनिग्रहात् ॥८॥
जैसे पर्वतस्थ धातुओं का समस्त दोष अग्नि में दग्ध हो जाता है, उसी प्रकार इन्द्रियकृत दोष चित्तनिग्रह से दग्ध होता है॥८॥
चित्तं चित्तेन संशोध्य मनस्तु मनसैव तु।
भावान् भावेन संशोध्य बुद्ध्या बुद्धिं विशोधयेत् ॥९॥
चित्त द्वारा चित्त का, मन द्वारा मन का, भाव के द्वारा भाव का एवं बुद्धि के द्वारा बुद्धि का शोधन करना चाहिये॥९॥
चित्तस्य हि प्रसादेन हन्ति कर्म शुभाशुभम्।
शुभाशुभविनिर्मुक्ता निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥१०॥
निर्ममो निरहङ्कारस्ततो याति परां गतिम्।
चित्त की प्रसन्नता से शुभ और अशुभ कर्म विनष्ट हो जाता है। शुभ तथा अशुभ से विनिर्मुक्त, निर्द्वन्द्व (शीत-ग्रीष्म, लाभ-अलाभ, मान-अपमान प्रभृति विरुद्ध धर्म से निष्कृत लाभ करता है), निष्परिग्रह (कहीं भी लिप्त न होना), निर्मम (ममताशून्य) तथा निरहंकार (मैं-मेरा इत्यादि अहंकार-शून्यता) के होने के उपरान्त परम गति का लाभ प्राप्त करता है॥१०॥
पूर्वाह्ने लोहितं रूपमृङ्मयं प्रथमं स्मृतम् ॥११॥
यजुर्मयं द्वितीयन्तु शुक्लं माध्यह्निकं स्मृतम् ॥१२॥
कृष्णं तृतीयं सायाह्ने साम्नो रूपं ततः स्मृतम्।
प्रथमं राजसं रूपं द्वितीयं सत्त्वसंज्ञितम् ॥१३॥
पूर्वाह्न में सूर्य के लोहितरूप को प्रथम ऋक् मय रूप कहा गया है। द्वितीय रूप मध्याह्नकालीन शुक्लरूप यजुर्मय रूप है। तृतीय सायाह्न कालीन साममय रूप कहा गया है। प्रथम रूप राजस एवं द्वितीय रूप सात्त्विक है॥११-१३॥
तृतीयं तामसं रूपं त्रैगुण्यं तच्च संज्ञितम्।
त्रयाणां व्यतिरेकेण चतुर्थं सूर्यमण्डलम् ॥१४॥
तृतीय रूप तामसिक है। इस प्रकार से यह त्रिगुण विशिष्ट कहा जाता है। इन तीनों के संस्पर्श से रहित चतुर्थ है—सूर्यमण्डल॥१४॥
अष्टाविंशोऽध्यायः १४१
ज्योतिःप्रकाशकं सूक्ष्मं प्रोक्तं तच्च निरञ्जनम्।
त्रैविद्यसिद्धान्तरताः सूर्यसिद्धान्तवेदिनः ॥१५॥
ॐकारप्रणवैर्युक्ता ध्याननिर्धूतकल्मषाः।
स्थिताः पद्मासने धीरा नाभिसंन्यस्तपाणयः ॥१६॥
उस सूर्यमण्डल को ज्योतिःप्रकाशक, सूक्ष्म एवं निरञ्जन कहते हैं। जो त्रैविद्य सिद्धान्त (वेदार्थज्ञ) में रत हैं, जो सूर्य-सिद्धान्त को जानने वाले हैं, निरन्तर प्रणव मन्त्र के ध्यान से जिनकी पापराशि धुल गई है, वे धीरगण नाभि पर हाथ रखकर पद्मासनस्थ होते हैं॥१५-१६॥
सुषुम्नानाभिमार्गं च कुम्भरेचकपूरकैः।
त्रिभिः संशोध्य तान् पञ्च मरुतो देहमध्यगान् ॥१७॥
पादाङ्गुष्ठेन सञ्चिन्त्यमूर्ध्वमुन्नमयक्रमात्।
नाभिप्रदेशे दृष्ट्वा च देवमग्निमनिन्धनम् ॥१८॥
जो सुषुम्ना पथ में कुम्भक, रेचक तथा पूरक द्वारा नाभिमार्ग एवं पादांगुष्ठद्वय द्वारा देहमध्यस्थ पञ्चवायु का संशोधन करके क्रमशः मस्तक में उसे उठाकर नाभिदेश में काष्ठरहित अग्निरूप देवता सूर्य को देखते हैं॥१७-१८॥
सोमं च हृदये दृष्ट्वा मूर्ध्नि चाग्निशिखां पुनः।
वातराशिमिवासह्यं तं भित्त्वादित्यमण्डलम् ॥१९॥
ततः परं तु गच्छेत योगस्थः सूर्यमण्डलम्।
तत्र गत्वा न शोचन्ति तत् सौरं परमं पदम् ॥२०॥
तदनन्तर हृदय में चन्द्र तथा मस्तक में पुनः अग्निशिखा का दर्शन करके वायु तथा रश्मि के समान असह्य आदित्यमण्डल का भेद करता है, तत्पश्चात् योगस्थ होकर परम सूर्यमण्डल में गमन करता है। वह वहाँ जाकर शोकरहित हो जाता है॥१९-२०॥
प्रथमं हृदयं स्थानं द्वितीयं चाग्निसंस्थितम्।
तृतीयं तापनं स्वस्थं चतुर्थं सूर्यमण्डलम् ॥२१॥
प्रथम स्थान हृदय, द्वितीय अग्नि, तृतीय सूर्य तथा चतुर्थ है—सूर्यमण्डल॥२१॥
स्थानं चतुर्थं परमात्मनस्तनोर्भानोः सुरेशस्य वदन्ति तज्ज्ञाः।
स्थानं द्वितीयं परमात्मनस्तनोर्भानोः सुरेशस्य वदन्ति तज्ज्ञाः ॥२२॥
ज्ञेयश्च मोक्षश्च नृणां स एव संसारविच्छिन्नकरं पदं तत्।
इदं तृषीणां चरितं मया ते प्रख्यापितं याजकशास्त्रसंगात् ॥२३॥
१४२ श्रीसाम्बपुराणम्
तत्त्वविद् इस चतुर्थ स्थान को परमात्मा देवदेव सूर्य का स्थान कहते हैं। तत्त्वज्ञ द्वितीय स्थान को भानु का द्वितीय स्थान कहते हैं। उसे मनुष्यों को मोक्ष देने वाला जानना चाहिये। वह स्थान संसार को विच्छिन्न करने वाला है। याजक शास्त्र का अवलम्बन लेकर इन ऋषियों (मग ब्राह्मणों) का चरित्र तुमसे कहा। इसे जान लेने पर मोक्षविद् होना सम्भव है और सिद्धि प्राप्त करके उस स्थान को प्राप्त करना सम्भव हो जाता है।।२२-२३।।
इदममृतसमं परस्य वेद्यं किरणसहस्रभृतो हितं जनानाम्।
ऋषिचरितं वीक्ष्य तत्त्वसारं व्यपगतमोहधियः प्रयान्ति मोक्षम् ॥२४॥
महत् प्रोक्तमिदं ज्ञानं देयं श्रद्धावतां नृणाम्।
नास्तिकानामबुद्धीनां न देयं भूतिमिच्छता ॥२५॥
इति साम्बपुराणे मोक्षज्ञानं नामाष्टाविंशोऽध्यायः
यह अमृततुल्य, सहस्र किरणधारी, परतत्त्व सूर्य का ज्ञापक, जनगण का हितकारक तत्त्वसार है। जिनकी मोह बुद्धि ऋषियों का चरित्र देखकर अपगत हो गयी है, वे इसके द्वारा मोक्ष-लाभ करते हैं। इस ज्ञान को जो महत् द्वारा उक्त है, श्रद्धालु जन को ही देना चाहिये। ऐश्वर्यकामी, नास्तिक बुद्धि तथा मूढ़ को यह ज्ञान कदापि नहीं देना चाहिये।।२४-२५।।
श्री साम्बपुराण का मोक्षज्ञान नामक अष्टाविंश अध्याय समाप्त
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
(प्रतिमालक्षणम्)
वशिष्ठ उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रतिमालक्षणं क्रमात्।
यथैवं नारदेनोक्तं साम्बानुग्रहकारिणा ॥१॥
वशिष्ठदेव कहते हैं—अब प्रतिमालक्षण कहूँगा, जिसे साम्ब के ऊपर अनुग्रह करके नारद ने जिस प्रकार कहा था॥१॥
न पुरा प्रतिमा ह्यासीः पूज्यते मण्डले रविः।
यथैतन्मण्डलं व्योम्नि स्थीयते सवितुस्तदा ॥२॥
एवमेव पुरा भक्तैः पूज्यते मण्डलाकृतिः।
यतः प्रभृति चाप्येषा निर्मिता विश्वकर्मणा ॥३॥
सर्वलोकहितार्थाय सूर्यस्य पुरुषाकृतिः।
प्रतिमास्थापनं चैव प्रमाणं च विधानतः ॥४॥
सर्वलोकहितं साम्ब कथ्यमानं निबोध मे।
गृहेषु प्रतिमायास्तु न तासां नियमः क्वचित् ॥५॥
पहले प्रतिमा नहीं थी; रवि की पूजा मण्डल में ही होती थी। जैसे आकाश में सूर्य का मण्डल है, वैसे ही सूर्य स्थापित होते थे। पूर्वकाल में भक्त मण्डलाकृति सूर्य का ही पूजन करते थे। जबसे विश्वकर्मा ने समस्त लोक के हितार्थ सूर्य की पुरुषाकृति प्रतिमा का निर्माण किया, तब से प्रतिमास्थापन तथा यथाविधान प्रमाण चलता है। हे साम्ब! समस्त संसार के हितार्थ मैंने तुमसे इसे कहता हूँ, सुनो। गृह में प्रतिमा-निर्माण का कोई नियम नहीं है॥२-५॥
मनसैवेप्सिताः कार्याः सर्वा एव शुभप्रदाः।
देवायतनविन्यासे कार्यं मूर्त्तिपरीक्षणम् ॥६॥
मन से ईप्सित कार्य सबके लिये शुभ देने वाला होता है। देवता के मन्दिर-निर्माण में मूर्ति की परीक्षा करना उचित है॥६॥
भूमेरश्च लक्षणं यत्नात् परीक्षां तत्त्वतो बुधैः।
आदौ भूमिं परीक्षेत कुर्याद्देवगृहं ततः ॥७॥