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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

अष्टादशपुराणानां श्रवणे यत्फलं लभेत्।

चतुरशीतितमोऽध्यायः ४०५

भुक्त्वा तु सकलान् भोगान् सूर्यलोके महीयते।
अष्टादशपुराणानां श्रवणे यत्फलं लभेत्।
तत्फलं समवाप्नोति सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥१५॥

इति श्रीसाम्बपुराणे वशिष्ठबृहद्बलसंवादे
फलश्रुतिर्नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः

इस संसार में समस्त भोगों का उपभोग करके वे सूर्यलोक में पूजित होते हैं। १८ पुराणों के सुनने से जो फल मिलता है, वह सब इसके पाठ से मिलता है; तुमसे यह सत्य-सत्य कहता हूँ॥१५॥

श्री साम्ब पुराणोक्त वशिष्ठ-बृहद्दल संवाद में फलश्रुति
नामक चौरासीवाँ अध्याय समाप्त

शुभं भवतु
॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥

योगवासिष्ठः

(महारामायणम्)

भाषानुवादकारःसम्पादकौ
स्व. पण्डित श्री कृष्ण पन्त शास्त्री<br>अध्यक्ष, अच्युतग्रन्थमाला-काशीस्व. पण्डित श्री कृष्ण पन्त शास्त्री<br>स्व. पण्डित श्री मूलशङ्कर शास्त्री

भूमिकालेखकः संशोधकश्च
प्रोफेसर मदनमोहन अग्रवाल

योगवासिष्ठ, वेदान्तशास्त्र के मुख्य प्रमाणित ग्रन्थ प्रस्थानत्रयी = उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीतादि में एक संस्कृत भाषा का बृहत् ग्रन्थ है । बृहद् योगवासिष्ठ में लगभग बत्तीस हजार (32000) या तैंतीस हजार (33000) श्लोक है । यह ग्रन्थ योगवासिष्ठमहारामायण, महारामायण, आर्षरामायण, वासिष्ठ रामायण, ज्ञानवासिष्ठ और वासिष्ठ आदि नामों से भी ज्ञात है । यह ग्रन्थ अत्यन्त आदरणीय है, क्योंकि इसमें किसी सम्प्रदायविशेष का उल्लेख नहीं है । भारत के एक कोने से दूसरे काने तक इसका पाठ, मूल तथा भाषानुवाद में, चिरकाल से होता चला आ रहा है । जो महत्त्व भगवद् भक्तों के लिए भागवतपुराण और रामचरितमानस का है, तथा कर्मयोगियों के लिए भगवद्गीता का है, वही महत्त्व ज्ञानियों के लिए योगवासिष्ठ का है । सहस्रों स्त्री-पुरुष-राजा से रङ्क तक-इस अद्भुत ग्रन्थ के अध्ययन से प्रतिदिन के जीवन में आनन्द और शान्ति प्राप्त करते रहे हैं । इस ग्रन्थ में प्रायः सभी प्रकार के पाठकों के अनुयोग के लिए सामग्री प्रस्तुत हैं । जहाँ अबोध बालक भी इसकी कहानियाँ सुनकर प्रसन्न होते हैं, वहां बड़े-बड़े विद्वानों के लिए गहनतम दार्शनिक सिद्धान्तों का इसमें प्रतिपादन है । ऐसा कोई भी प्रश्न नहीं है, जिसका समाधान इसमें प्राप्त न हो । यह ऐसा अद्भुत ग्रन्थ है कि इसमें काव्य, उपाख्यान तथा दर्शन—सभी का आनन्द वर्तमान है यह सब श्रुतियों का सार एवं माण्डूकारिका का वार्तिक = व्याख्यान ग्रन्थ है । महर्षि वसिष्ठ ने स्वयं कहा है—
'यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित् । इमं समस्तविज्ञानशास्त्रकोशं विदुर्बुधाः ॥'
योगवासिष्ठ के प्रस्तुत संस्करण में संस्कृत के प्रत्येक श्लोकों की अत्यन्त सरल हिन्दी भाषा में सुन्दर विवेचना की गई है, जो इसकी प्रमुख विशेषता है । कोई भी व्यक्ति, जो संस्कृत से सर्वथा अपरिचित है, इसका सरलतापूर्वक अध्ययन कर योगवासिष्ठ के गूढ़दार्शनिक स्थलों को हृदयंगम कर सकेगा और उसको मुक्तिलाभ के लिए अन्य साधनों की अपेक्षा नहीं रह जाती है । मोक्षप्राप्ति के उपाय ढूँढने की चेष्टा में व्यक्ति को आत्मानुभव होता है । इस ग्रन्थ के अध्ययन से व्यक्ति के सम्पूर्ण क्लेशों - दुःखों का अन्त होकर उसके हृदय में अपूर्व शान्ति प्राप्त होगी । अध्ययनार्थी सांसारिक सुख-दुःख की परिधि से बाहर निकलकर परम आनन्द का अनुभव करेगा । मनोयोगपूर्वक अध्ययन करनेवाले निश्चय ही इस जीवन में ब्रह्मज्ञान कर मुक्ति को प्राप्त करेंगे । यह ग्रन्थ ज्ञान का भण्डार है । वेदान्त के ग्रन्थों में यह चमकता हुआ रत्न है । मुमुक्षु, के लिए यह ग्रन्थ नित्य स्वाध्याय-योग्य है । ग्रन्थ की मौलिक उपादेयता की दृष्टि से आशा की जा सकती है कि वेदान्त के सच्चे जिज्ञासुओं में इसका विशेष प्रचार होगा ।


प्रथम संस्करण : 2011मूल्य : 10000/- ( 1-6 भाग सम्पूर्ण )

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन-वाराणसी

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श्रीविद्यार्णवतन्त्रम्

हिन्दीभाष्यकारः श्रीकपिलदेवनारायण

‘श्रीविद्या’ शब्द श्रीत्रिपुरसुन्दरी के मन्त्र एवं उसके अधिष्ठात्री देवता–इन दोनों का बोधक है। सामान्यतः ‘श्री’ शब्द ‘लक्ष्मी’ अर्थ में प्रसिद्ध है, परन्तु हारितायन संहिता, ब्रह्माण्डपुराण-उत्तरखण्ड आदि पुराणेतिहासों में वर्णित आख्यायिकाओं के अनुसार ‘श्री’ शब्द का मुख्य अर्थ ‘महात्रिपुरसुन्दरी’ ही है। श्री महालक्ष्मी ने महात्रिपुरसुन्दरी की चिरकाल-पर्यन्त आराधना कर जो अनेक वरदान प्राप्त किये हैं, उनमें एक वरदान ‘श्री’ की आख्या से लोक में ख्याति प्राप्त करने का भी है। अस्तु; ‘श्री’ शब्द का ‘महालक्ष्मी’ अर्थ तो गौण ही है, मुख्य अर्थ है–‘श्री’ अर्थात् महात्रिपुरसुन्दरी की प्रतिपादिका विद्या-मन्त्र = ‘श्रीविद्या’। वाच्य एवं वाचक का भेद मानकर इस मन्त्र की अधिष्ठात्री देवता भी ‘श्रीविद्या’ ही सिद्ध होती हैं। इस श्रीविद्या के उपासकों को लौकिक फल तो प्राप्त होते ही हैं, आत्मज्ञानी को प्राप्त होने वाला शोकोत्तीर्णतारूप फल भी श्रीविद्यापासकों को निश्चित रूप से प्राप्त होता है; साथ ही यही फल ब्रह्मविद्या से भी प्राप्त होता है; अतः फलैक्य होने के कारण श्रीविद्या ही ब्रह्मविद्या है–यह निर्विवाद सत्य प्रतिष्ठापित होता है। ‘श्रीविद्या’ का साङ्गोपाङ्ग विवेचन करने वाला सर्वप्रामाणिक महनीय ग्रन्थ ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्रम्’ न केवल श्री विद्या; अपितु दश महाविद्याओं के विशद् विवेचन के साथ-साथ शैव, शाक्त, गाणपत्य, वैष्णव, सौर आदि सभी मन्त्रों एवं उनके तत्तद् यन्त्रों से पाठक को साक्षात्कार कराने वाला एक बृहत्काय ग्रन्थ है। स्वामी विद्यारण्य यति द्वारा छत्तीस श्वासों में गुम्फित यह ग्रन्थरत्न पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्ध रूप दो खण्डों में समुपलब्ध है। श्रीविद्या के सविधि विवेचन के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं के भी मन्त्र-यन्त्रों का समग्र रूप में विवेचन, उनके उपासना की विधि एवं उपासना के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले फलों को स्पष्टतया अभिव्यक्त करना इस ग्रन्थ की सर्वातिशायी विशेषता है। अन्य ग्रन्थों में जहाँ किसी भी उपास्य देवता के एक, दो, चार अथवा कतिपय प्रमुख मन्त्र-यन्त्रों का ही विवेचन उपलब्ध होता है, वहीं इस ग्रन्थ में विवेच्य समस्त देवी-देवताओं के प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध सभी मन्त्र-यन्त्रों को उनकी विधियों सहित स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है; फलस्वरूप सम्बद्ध देवता के किसी भी मन्त्र-यन्त्र अथवा उसकी विधि को जानने के लिये साधक को किसी अन्य ग्रन्थ का अवलम्ब ग्रहण करने की लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं रह जाती। संक्षेप में कहा जा सकता है कि श्रीविद्यारण्य यति-प्रणीत ‘श्रीविद्यार्णवतन्त्रम्’ एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है, जो साधक के समस्त कामनाओं की पूर्ति करने में सर्वतोभावेन समर्थ है। अस्तु; यह ग्रन्थ अद्यावधि अपने मूल स्वरूप में ही, बिना किसी भाषा-टीका के उपलब्ध था, जिससे जिज्ञासु साधकों को आराधना में पग-पग पर दुरूह कठिनाइयों का अनुभव होता था एवं ग्रन्थ के तात्पर्य से अवगत न हो पाने के कारण वे बार-बार संशयग्रस्त हो जाते थे। इसी को हृदयङ्गम कर तन्त्रग्रन्थों के ख्यातिनाम भाषा-भाष्यकार श्री कपिलदेव नारायण ने इस विशालकाय ग्रन्थ को भाषा टीका से अलंकृत कर सर्वसुलभ बनाने का साहसिक प्रयास किया है। पूर्वार्द्ध-उत्तरार्द्ध के विभाजन से दो भागों में विभक्त यह विशालकाय ग्रन्थ भाषा-भाष्य से अलंकृत होने के फलस्वरूप और भी बृहद् कलेवर को प्राप्त हो गया, फलस्वरूप जिज्ञासुओं के सौकर्य को दृष्टिगत कर इसे पाँच भागों (पूर्वार्द्ध–दो भाग एवं उत्तरार्द्ध–तीन भाग) में प्रकाशित किया जा रहा है। विद्वान भाष्यकार श्री कपिलदेवनारायण द्वारा प्रयोगपरक भाषा भाष्य से अलंकृत यह ग्रन्थ जिज्ञासुओं की समस्त जिज्ञासाओं का शमन करने में सर्वविध समर्थ होगा–इसमें विचिकित्सा के लिये लेशमात्र भी स्थान नहीं है।

(सम्पूर्ण पाँच भागों में)

❧ तन्त्रशास्त्र के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ-मूल संस्कृत एवं हिन्दी टीका सहित ❧

तन्त्रसार : परमहंस मिश्र (1-2 भाग)स्पन्दकारिका : श्यामाकान्त द्विवेदी
कुलार्णवतन्त्रम् : परमहंस मिश्रसर्वोल्लासतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
नित्योत्सव : (श्रीविद्याविमर्शकभद्रग्रन्थ)<br>परमहंस मिश्रनीलसरस्वतीतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
त्रिपुरारहस्यम् : (ज्ञान एवं महात्म्य खण्ड)<br>जगदीशचन्द्र मिश्र (1-2 भाग)भूतडामरतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
तन्त्रालोक : राधेश्याम चतुर्वेदी (1-5 भाग)सिद्धनागार्जुनतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
स्वच्छन्दतन्त्रं : राधेश्याम चतुर्वेदी (1-2 भाग)अन्नदाकल्पतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
नेत्रतन्त्रम् : राधेश्याम चतुर्वेदीत्रिपुरार्णवतन्त्रम् : एस. खण्डेलवाल
कामाख्यातन्त्रम् : राधेश्याम चतुर्वेदीविज्ञानभैरव : बापूलाल अंजना
महाकालसंहिता : (कामकला-कालीखण्ड)<br>राधेश्याम चतुर्वेदीश्रीविद्यार्णवतन्त्रम् : कपिलदेवनारायण (1-5 भाग सम्पूर्ण)
महाकालसंहिता : (गुह्यकाली-खण्ड)<br>राधेश्याम चतुर्वेदी (1-5 भाग)देवीरहस्यम् : (रुद्रयामलतन्त्रोक्तम्)<br>कपिलदेवनारायण (1-2 भाग)
रुद्रयामलम् : सुधाकर मालवीय (1-2 भाग)स्वर्णतन्त्र : भाषा टीका
शारदातिलकम्-सुधाकर मालवीय (1-2 भाग)महानिर्वाणतन्त्रम् : कपिलदेवनारायण
मन्त्रमहोदधि : सुधाकर मालवीयबृहत्तन्त्रसार : कपिलदेवनारायण (1-2 भाग)
लक्ष्मीतन्त्रम् : कपिलदेवनारायण (1-2 भाग)सौन्दर्यलहरी : लक्ष्मीधरी टीका सहित<br>सुधाकर मालवीय
तन्त्रराजतन्त्रम्-कपिलदेवनारायण (1-2 भाग)सिद्धसिद्धान्तपद्धति : द्वारकादास शास्त्री
महानिर्वाणतन्त्रम् : कपिलदेवनारायणआगमतत्त्वविलास : एस.एन. खण्डेलवाल (1-4 भाग सम्पूर्ण)
कामकलाविलास : श्यामाकान्त द्विवेदीराधातन्त्रम् : एस.एन. खण्डेलवाल
वरिवस्यारहस्यम् : श्यामाकान्त द्विवेदीसौभाग्यलक्ष्मीतन्त्रम् : एस.एन. खण्डेलवाल

❧ डॉ. श्यामाकान्त द्विवेदी द्वारा हिन्दी में लिखित तन्त्र विषयक महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय ग्रन्थ ❧

  • श्रीविद्या-साधना : (श्रीविद्या-उपासना का साङ्गोपाङ्ग शास्त्रीय विवेचन) (1-2 भाग सम्पूर्ण)
  • भारतीय शक्ति-साधना : (शक्ति-विज्ञान: स्वरूप एवं सिद्धान्त का शास्त्रीय विवेचन)
  • ब्रह्मास्त्रविद्या एवं बगलामुखी-साधना : (महाविद्याबगला-उपासना का शास्त्रीय विवेचन)
  • काश्मीर शैवदर्शन एवं स्पन्दशास्त्र : (शिवसूत्र, शक्तिसूत्र एवं स्पन्दसूत्र के सन्दर्भ में)
  • मुद्राविज्ञान एवं साधना : (नित्यकर्म्य एवं तान्त्रिक मुद्राओं का सचित्र एवं शास्त्रीय विवेचन)

श्रीविष्णुमहापुराणम्

(मूल संस्कृत-भावप्रकाशिका हिन्दीटीका श्लोकानुक्रमणिका सहित)

श्री शिवप्रसाद द्विवेदी


वितरकप्रकाशक
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