संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
स्तनोंके रोग ।
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३. किसी प्रकारका दवाव पहुँचनेसे जब कि नसें और गिलटियाँ दब जावें या पेंट जावें ।
ऐसे दर्दमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. सूजनका न होना ।
२. नसोंमें गाँठ पड़ जाना या मोटी हो जाना ।
ऐसे दर्दमें मवाद नहीं पड़ती है और न रगत बदलती है ।
३ स्तनोका सूख जाना । इसके कई कारण हैं ।
१. निर्बलता, दमा और कफके प्रकोपसे ।
२. तपेदिक, शरीरमें रक्तके न बनने और विषम ज्वरसे ।
३. रजस्वला होनेके पहले या होनेपर जब कि शरीर अत्यन्त निर्बल हो, पुरुषका संसर्ग होनेसे ।
ऐसे रोगमें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. स्तनमें गिलटियोंका सूखना ।
२. भिटनीका सुरक्षा जाना ।
ऐसी दशामें दूध नहीं निकलता, स्तन सूखते चले आते हैं ।
स्तानोंकी खजली । इसके कई कारण हैं ।
१. रक्त-विकार और छूतदार रोगोंसे ।
२. दाढ़का पानी या प्रसव समयमें बहते हुए खून या पानीके लग जानेसे ।
३. रजके लगने या खुजलाते समय नाखूनके विकारोंसे ।
एसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. छोटे छोटे दाने पोस्त सरीखे पड़ जाते हैं ।
२. स्तनका रंग लाल हो जाता है ।
जब ऐसा होता है । तो दाने फूट जाते हैं और जहाँ वह पनी लगता है वहाँ दूसरे दाने पड़ते जाते हैं । इसमें सफाईकी बड़ी जरूरत है ।
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सन्तति-शास्त्र ।
५. स्तनोंका फावा । यह तीन तरहका होता है । (१) वह कि जो स्तनोंकी गिलटियाँमें हो । इसे स्तनका गहरा फोड़ा कहते हैं । (२) वह कि जो खालकी तहमें पीप पड़नेसे हो, इसको उथला फोड़ा कहते हैं । (३) वह कि जब स्तनके पड़ोके मध्यमें पीप पड़ जाय । इसको पटुका गहरा फोड़ा कहते हैं । इनके कई कारण हैं ।
१. वात-पित्त और कफके अलग अलग या सन्मिलित विगाडसे ।
२. दवाय, चोट और रगडसे ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. स्तनोंका लाल पड़ जाना और कठिन धर ।
२. ज्वरका बराबर रहना और जलन ।
३. छुनेसे गरम प्रतीत होना ।
प्रायःलोग इसको धर्नेली कहते हैं । यह जिस स्तनमें होती है उसको दूध नहीं रहता या कम पड़ जाता है । नासुर होनेका भी भय रहता है जब कि फोड़ा अपने आप फूटे ।
६ स्तनोंका लाल पड़ जाना । इसके अनेक कारण हैं ।
१. वात-पित्त और कफकी अलग अलग या तीनोंकी मिली हुई खराबीसे ।
२. आमशय, जिंगर, अण्डे, गुरदे और गर्भाशयके विकारसे ।
३. गरमी, सूजाक और आतशकके प्रकोपसे ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. भिटनीके चारों ओर स्याहीमें छोटे छोटे दाने पड़ जाते हैं ।
२. खाजका आना और चकत्ते से पड़ जाना ।
स्तनोंके रोग ।
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जब ऐसे दाने पड़कर फूटते हैं तो जहाँ वह पानी लगता है वहाँ वैसे ही दाने पड़ जाते हैं ।
७ स्तनोंका वदना । इसके कई कारण हैं ।
१. गर्भाशयके विकारसे ।
२. ऐसे भोजनसे कि जिससे चरबी अधिक बनती है ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१ स्तनोंमें दूधका अधिक आना ।
२. थोड़ी थड़ीसी सरसराहट मालूम होती है ।
३. स्तनों का मोटा हो जाना ।
जब ऐसा होता है तो स्तन बढ़ते चले जाते हैं, परन्तु यह रोग उसी समय होता है जब कि बच्चा पीता हो या गर्भ हो । ये इतने बढ़ जाते हैं कि स्वयं स्त्रिको दुःख होने लगता है । चलवान् स्त्रियोंमें अधिक पाया जाता है । प्रायः देखा गया है कि स्तन इतने बढ़ जाते हैं कि पीठके पीछे बैठकर बगलसे लेजाकर बच्चे पीते है यह रोग रडियोंमें प्रायः होता है ।
८. स्तनकी कठोरता—इसके कई कारण हैं ।
१ जो माताएँ अपने वदन और स्तनोंको सुन्दर सुडौल बनाये रहनेके कारण दूध रहते हुए बच्चोंको नहीं पिलातीं उनकी छातियोंमें दूध सूखकर स्तन कठोर हो जाते हैं ।
२. दूध न होता और स्तनका छोटा होना ।
ऐसी दशामें कई लक्षण होने हैं ।
१. स्तन कड़ा पड़ जाता है और दूध नहीं आता ।
२. टटोलनेसे स्तनमें गिलदियाँ आपसमें जकड़ी सी मालूम होती हैं और भिटनी छोटी पड़ जाती है ।
जब ऐसी दशा होती है तब दूध नहीं आता । स्तन कड़े बने रहते हैं और कुछ छोटे हो जाते हैं ।
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१. भिट्ठीका फोड़ा—इसके कई कारण हैं ।
१. चोद, रगड़ और दवाव पड़नेसे ।
२. वात-वित्त और कफके अलग अलग या सम्मिलित प्रकोपसे ।
३. रक्तविकार और गरमी सृजाक ऐसे छूतदार रोंगों के होने से ।
पेसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. भिट्ठीके नीचेकी काली जगह लाल पड़ जाती है ।
२. खाज और दर्दका होना ।
ऐसे फोड़को आपसे न फूटने देना चाहिये । चीर कर मवाद निकाल देना उत्तम है । आपसे फूटनेमें नासुर होनेका भय रहता है । पेसी दशामें या तो दूध कम हो जाता है या वृद्ध हो जाता है ।
१० भिट्ठीका धाव । इसके कई कारण हैं ।
१. उन वच्चोंके दाँत लगनेसे कि जिनको दाँतोंका रोंग है ।
२. गरमी सृजाक ऐसे छूतदार रोंगों के होने या छूतसे ।
पेसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१. दूध पिलाने और छूनेमें कष्ट ।
२. स्तनोंपर कुछ लाली आ जाती है ।
इसमें बहुत बड़ी सर्फाईकी जरूरत है । दूध पिलाना हानि पहुँचाता है ।
११ स्तनोंके झाले । इसके कई कारण हैं ।
१. जब कि स्त्रीको गरमी सृजाक इत्यादि छूतदार रोगहो ।
२. ऐसे बालकके दाँत लगनेसे कि जिसके पिता को गरमी सृजाक और आतिशक हुआ हो ।
३. रक्तविकार से ।
बच्चोंको कैसे सुलाना चाहिये ?
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ऐसी दशामें अनेक लक्षण होने हैं।
१. स्तनोंमें गरमी रोगकेसे चकत्ते पड़ जाते हैं।
२. दाढ़की तरह खाज आने लगती है।
३. छातीसे पानी बराबर निकलता रहता है।
जब ऐसा होता है तो छोले बराबर फैलते चले जाते हैं। इसमें सफाईकी बड़ी जरूरत है।
इसी प्रकारके अनेक रोगोंमें आजकल स्त्रियाँ फँसकर अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं। स्त्रियोंको असावधानताकी ओर विशेष ध्यान देना चाहिये। ( भाग क० )
(७०) बच्चोंको कैसे सुलाना चाहिये ?
हमारे देशमें यह बात सब जगह पाई जाती है कि माताएँ बच्चोंको अपने साथ सुलाती हैं; परन्तु प्रकृतिके नियमानुसार जरूरत मालूम होती है कि बच्चा अलग सुलाया जाय। एक साथ सोनेमें माताएँ बड़ी असावधानी करती हैं। स्त्रियाँ नीदमें ग्रसित होकर बेहोश सोती हैं। कई जगह ऐसा हुआ है कि जवान और मोटी माताओंका हाथ बच्चेके मुँह और नाकपर पड़ा रहा, श्वास बन्द हो गया। बच्चा चल बसा। बच्चेके हाथ पाँवका दब जाना, पलंगसे नीचे गिर पड़ना, यह तो रोज का काम है। इसलिये माताके पलंगके पास बच्चेके लिये एक घेरेदार पलंग होना चाहिये कि जिससे वह अकेले सोनेमें नीचे न गिरे। माताके पास सोनेसे बच्चेको अनेक रोग हो जाते हैं।
१. कुपच।
१. पास सोनेसे बच्चा बार बार दूध पीता है और अधिक पी जानेसे नहीं पच्चा सकता, अतएव कुपच हो जाती है।
70. वच्चोंको कैसे छुलाना चाहिये ?
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२. कानके रोग ।
१. जो माताएँ सोते हुए बच्चेको दूध पिलाती हैं उन बच्चों-में दूध कानमें आ जाता है इससे अनेक रोग हो जाते हैं। ( श० क० )
१ बहरापन २ कानका बहना ३ कानका नासूर ४ परदेका मोटा पड जाना ५ परदेकी सूजन इत्यादि ।
३. शरीरमें गरमीका परिवर्तन ।
१. माताके पास सोनेसे बच्चेमें माताके शरीरकी गरमी-का प्रवेश हो जाता है । जो गरमी बच्चोंमें होती है उससे अधिक पहुँचनेमें हानि है । जब कभी माताको ज्वर आता है तो वह बच्चेको अलग नहीं सुलाती । पास सोने और ज्वरका दूध पीनेसे बच्चेको भी ज्वर आ जाता है ।
४. श्वाँस-रोग ।
१. पास सोनेवाले बच्चोंमें माताके श्वाँस रोगका संचार हो जाता है । इस कारण कि माताके पेटसे निकली हुई श्वाँस बच्चेकी श्वाँसके साथ मिल कर अन्दर पहुँचती है और वहाँ फेफड़ोंको खराब कर देती है । यह दशा उस समय होती है जब कि माता और बच्चा दोनों मुँह बन्द करके जाड़ेमें एक लिहाफके अन्दर सोते हैं ।
अतएव बच्चोंको ऐसी थान डालनी चाहिये कि जिससे वे रातमें खूब सोवें । दिनमें इतना न सुलाना चाहिये कि रातमें खूब जागें । यदि इनको रातमें नींद न आवे तो वो वातें समझनी चाहिये—भूख और कुपच । इस प्रकार अलग न सोनेसे बच्चे
बच्चा होनेके कितने दिन बाद गर्भधारण होना चाहिये । २७९
माया रोगी रहते हैं । माताओंको इन बातोंपर ध्यान देना जरूरी है ।
(७१) बच्चा होनेके कितने दिन बाद गर्भधारण होना चाहिये ?
यह एक बड़ा प्रश्न है । लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं । लोगोमें इस बातकी विवेचना ही नहीं कि संयोग बच्चा होनेके कितने दिनों बाद होना चाहिये ? इससे तो यह बात कहीं दूर है । लोग यह विचार करते हैं कि जितने बच्चे हो उतना ही अच्छा; परन्तु जल्दी जल्दी सन्तान होना अच्छा नहीं । इस विषयमें अनेक मत हैं ।
१. वैद्यकका मत ।
१. जब बच्चोंको मातासे कुछ भी वास्ता न रहे, वह अच्छी तरह अन्न खाकर जी सके, इसके बाद दूसरी सन्तान होनी चाहिये । ( श० क० )
२. बच्चा होनेके पाँच वर्ष बाद दूसरी सन्तान होनी चाहिये । ( रतिशास्त्र )
२. धर्मशास्त्रका मत ।
१. बच्चा तीन वर्षोंका पूरा होनेके बाद दूसरा गर्भाधान होनी चाहिये । ( वा० य० )
लोग कामवश होकर जल्दी संयोग कर बैठते हैं और इसी कारण बच्चा पैदा होनेके कुछ ही दिनों बाद गर्भ रह जाता है । इसमें अनेक दोष हैं । स्त्रीके श्रवयवमें विगाड़ हो जाता है । गोदका बच्चा दूध उत्तम और ठीक तौरसे नहीं पीने पाता । बच्चा जिस समयतक दूध पीता है उस समयतक माताके
71. वच्चा होनेके कितने दिन बाद गर्भधारण होना चाहिये ?
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शरीरका पोषण कम होता है क्योंकि जो कुछ माता से उसके रससे बच्चेका भी पोषण होता है। यदि दो साल दूध पीवे तो इसके बाद माता जो कुछ भोजन करती है उससे पूरे रससे माताका पोषण होता है। एक विद्वानकी राय है कि जिस समयसे बच्चा दूध पीना छोड़ता है उससे एक साल तक यदि स्त्रीको गर्भ न रहे और उत्तम आहार मिला करे तो स्त्रीका शरीर गर्भ धारण होनेके पहलेका सा पुष्ट हो जावेगा और पेटके सारे अवयव, यदि उनमें कोई विकार उत्पन्न नहीं हुआ है तो, उत्तम हो जावेगा। इन बातोंपर विचार करते हुए यह बात निश्चय होती है कि दा वयतक दूध पिलाकर इसके एक साल बाद अर्थात् बच्चा पैदा होनेसे तीन वर्ष बाद गर्भाधान होना चाहिये।
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