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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

दूसरा सर्ग

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दूसरा सर्ग

वनके भीतर श्रीराम, लक्ष्मण और सीतापर विराधका आक्रमण

रात्रिमें उन महर्षियोंका आतिथ्य ग्रहण करके सबेरे सूर्योदय होनेपर समस्त मुनियोंसे विदा ले श्रीरामचन्द्रजी पुनः वनमें ही आगे बढ़ने लगे॥ १ ॥

जाते-जाते लक्ष्मणसहित श्रीरामने वनके मध्यभागमें एक ऐसे स्थानको देखा, जो नाना प्रकारके मृगोंसे व्याप्त था। वहाँ बहुत-से रीछ और बाघ रहा करते थे। वहाँके वृक्ष, लता और झाड़ियाँ नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थीं। उस वनप्रान्तमें किसी जलाशयका दर्शन होना कठिन था। वहाँके पक्षी वहीं चहक रहे थे। झींगुरोंकी झंकार गूँज रही थी॥ २-३ ॥

भयंकर जंगली पशुओंसे भरे हुए उस दुर्गम वनमें सीताके साथ श्रीरामचन्द्रजीने एक नरभक्षी राक्षस देखा, जो पर्वतशिखरके समान ऊँचा था और उच्चस्वरसे गर्जना कर रहा था॥ ४ ॥

उसकी आँखें गहरी, मुँह बहुत बड़ा, आकार विकट और पेट विकराल था। वह देखनेमें बड़ा भयंकर, घृणित, बेडौल, बहुत बड़ा और विकृत वेशसे युक्त था॥ ५ ॥

उसने खूनसे भीगा और चरबीसे गीला व्याघ्रचर्म पहन रखा था। समस्त प्राणियोंको त्रास पहुँचानेवाला वह राक्षस यमराजके समान मुँह बाये खड़ा था॥ ६ ॥

वह एक लोहेके शूलमें तीन सिंह, चार बाघ, दो भेड़िये, दस चितकबरे हरिण और दाँतोंसहित एक बहुत बड़ा हाथीका मस्तक, जिसमें चर्बी लिपटी हुई थी, गाँथकर जोर-जोरसे दहाड़ रहा था॥ ७ १/२ ॥

श्रीराम, लक्ष्मण और मिथिलेशकुमारी सीताको देखते ही वह क्रोधमें भरकर भैरवनाद करके पृथ्वीको कम्पित करता हुआ उन सबकी ओर उसी प्रकार दौड़ा, जैसे प्राणान्तकारी काल प्रजाकी ओर अग्रसर होता है॥

वह विदेहनन्दिनी सीताको गोदमें ले कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया। फिर उन दोनों भाइयोंसे बोला— 'तुम दोनों जटा और चीर धारण करके भी स्त्रीके साथ रहते हो और हाथमें धनुष-बाण और तलवार लिये दण्डकवनमें घुस आये हो; अतः जान पड़ता है, तुम्हारा जीवन क्षीण हो चला है॥ १० १/२ ॥

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‘तुम दोनों तो तपस्वी जान पड़ते हो, फिर तुम्हारा युवती स्त्रीके साथ रहना कैसे सम्भव हुआ? अधर्मपरायण, पापी तथा मुनिसमुदायको कलङ्कित करनेवाले तुम दोनों कौन हो?॥ ११ १/२ ॥

‘मैं विराध नामक राक्षस हूँ और प्रतिदिन ऋषियोंके मांसका भक्षण करता हुआ हाथमें अस्त्र-शस्त्र लिये इस दुर्गम वनमें विचरता रहता हूँ॥ १२ १/२ ॥

‘यह स्त्री बड़ी सुन्दरी है, अतः मेरी भार्या बनेगी और तुम दोनों पापियोंका मैं युद्धस्थलमें रक्त पान करूँगा’॥

दुरात्मा विराधकी ये दुष्टता और घमंडसे भरी बातें सुनकर जनकनन्दिनी सीता घबरा गयीं और जैसे तेज हवा चलनेपर केलेका वृक्ष जोर-जोरसे हिलने लगता है, उसी प्रकार वे उद्वेगके कारण थरथर काँपने लगीं॥ १४-१५ ॥

शुभलक्षणा सीताको सहसा विराधके चंगुलमें फँसी देख श्रीरामचन्द्रजी सूखते हुए मुँहसे लक्ष्मणको सम्बोधित करके बोले—॥ १६ ॥

‘सौम्य! देखो तो सही, महाराज जनककी पुत्री और मेरी सती-साध्वी पत्नी सीता विराधके अङ्कमें विवशतापूर्वक जा पहुँची हैं॥ १७ ॥

‘अत्यन्त सुखमें पली हुई यशस्विनी राजकुमारी सीताकी यह अवस्था! (हाय! कितने कष्टकी बात है!) लक्ष्मण! वनमें हमारे लिये जिस दुःखकी प्राप्ति कैकेयीको अभीष्ट थी और जो कुछ उसे प्रिय था, जिसके लिये उसने वर माँगे थे, वह सब आज ही शीघ्रतापूर्वक सिद्ध हो गया। तभी तो वह दूरदर्शिनी कैकेयी अपने पुत्रके लिये केवल राज्य लेकर नहीं संतुष्ट हुई थी॥ १८-१९ ॥

‘जिसने समस्त प्राणियोंके लिये प्रिय होनेपर भी मुझे वनमें भेज दिया, वह मेरी मझली माता कैकेयी आज इस समय सफलमनोरथ हुई है॥ २० ॥

‘विदेहनन्दिनीका दूसरा कोई स्पर्श कर ले, इससे बढ़कर दुःखकी बात मेरे लिये दूसरी कोई नहीं है। सुमित्रानन्दन! पिताजीकी मृत्यु तथा अपने राज्यके अपहरणसे भी उतना कष्ट मुझे नहीं हुआ था, जितना अब हुआ है’॥ २१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर शोकके आँसू बहाते हुए लक्ष्मण कुपित हो मन्त्रसे अवरुद्ध हुए सर्पकी भाँति फुफकारते हुए बोले—॥ २२ ॥

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‘ककुत्स्थकुलभूषण! आप इन्द्रके समान समस्त प्राणियोंके स्वामी एवं संरक्षक हैं। मुझ दासके रहते हुए आप किसलिये अनाथकी भाँति संतप्त हो रहे हैं?॥

‘मैं अभी कुपित होकर अपने बाणसे इस राक्षसका वध करता हूँ। आज यह पृथ्वी मेरे द्वारा मारे गये प्राणशून्य विराधका रक्त पीयेगी॥ २४ ॥

‘राज्यकी इच्छा रखनेवाले भरतपर मेरा जो क्रोध प्रकट हुआ था, उसे आज मैं विराधपर छोड़ूँगा। जैसे वज्रधारी इन्द्र पर्वतपर अपना वज्र छोड़ते हैं॥ २५ ॥

‘मेरी भुजाओंके बलके वेगसे वेगवान् होकर छूटा हुआ मेरा महान् बाण आज विराधके विशाल वक्षःस्थलपर गिरे। इसके शरीरसे प्राणोंको अलग करे। तत्पश्चात् यह विराध चक्कर खाता हुआ पृथ्वीपर पड़ जाय’ ॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥

२॥

तीसरा सर्ग

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तीसरा सर्ग

विराध और श्रीरामकी बातचीत, श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा विराधपर प्रहार तथा विराधका इन दोनों भाइयोंको साथ लेकर दूसरे वनमें जाना

तदनन्तर विराधने उस वनको गुँजाते हुए कहा—'अरे! मैं पूछता हूँ, मुझे बताओ। तुम दोनों कौन हो और कहाँ जाओगे?'॥ १ ॥

तब महातेजस्वी श्रीरामने अपना परिचय पूछते हुए प्रज्वलित मुखवाले उस राक्षससे इस प्रकार कहा—'तुझे मालूम होना चाहिये कि महाराज इक्ष्वाकुका कुल ही मेरा कुल है। हम दोनों भाई सदाचारका पालन करनेवाले क्षत्रिय हैं और कारणवश इस समय वनमें निवास करते हैं। अब हम तेरा परिचय जानना चाहते हैं। तू कौन है, जो दण्डकवनमें स्वेच्छासे विचर रहा है?'॥ २-३ ॥

यह सुनकर विराधने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा— 'रघुवंशी नरेश! मैं प्रसन्नतापूर्वक अपना परिचय देता हूँ। तुम मेरे विषयमें सुनो॥ ४ ॥

'मैं ‘जव’ नामक राक्षसका पुत्र हूँ, मेरी माताका नाम ‘शतह्रदा’ है। भूमण्डलके समस्त राक्षस मुझे विराधके नामसे पुकारते हैं॥ ५ ॥

'मैंने तपस्याके द्वारा ब्रह्माजीको प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त किया है कि किसी भी शस्त्रसे मेरा वध न हो। मैं संसारमें अच्छेद्य और अभेद्य होकर रहूँ—कोई भी मेरे शरीरको छिन्न-भिन्न नहीं कर सके॥ ६ ॥

'अब तुम दोनों इस युवती स्त्रीको यहीं छोड़कर इसे पानेकी इच्छा न रखते हुए जैसे आये हो उसी प्रकार तुरंत यहाँसे भाग जाओ। मैं तुम दोनोंके प्राण नहीं लूँगा'॥ ७ ॥

यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वे पापपूर्ण विचार और विकट आकारवाले उस पापी राक्षस विराधसे इस प्रकार बोले—॥ ८ ॥

'नीच! तुझे धिक्कार है। तेरा अभिप्राय बड़ा ही खोटा है। निश्चय ही तू अपनी मौत ढूँढ़ रहा है और वह तुझे युद्धमें मिलेगी। ठहर, अब तू मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा'॥ ९ ॥

यह कहकर भगवान् श्रीरामने अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और तुरंत ही तीखे बाणोंका अनुसंधान करके उस राक्षसको बींधना आरम्भ किया॥ १० ॥

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उन्होंने प्रत्यञ्चायुक्त धनुषके द्वारा विराधके ऊपर लगातार सात बाण छोड़े, जो गरुड़ और वायुके समान महान् वेगशाली थे और सोनेके पंखोंसे सुशोभित हो रहे थे॥ ११ ॥

प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी और मोरपंख लगे हुए वे बाण विराधके शरीरको छेदकर रक्तरञ्जित हो पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १२ ॥

घायल हो जानेपर उस राक्षसने विदेहकुमारी सीताको अलग रख दिया और स्वयं हाथमें शूल लिये अत्यन्त कुपित होकर श्रीराम तथा लक्ष्मणपर तत्काल टूट पड़ा॥

वह बड़े जोरसे गर्जना करके इन्द्रध्वजके समान शूल लेकर उस समय मुँह बाये हुए कालके समान शोभा पा रहा था॥ १४ ॥

तब काल, अन्तक और यमराजके समान उस भयंकर राक्षस विराधके ऊपर उन दोनों भाइयोंने प्रज्वलित बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ १५ ॥

‘यह देख वह महाभयंकर राक्षस अट्टहास करके खड़ा हो गया और जँभाईके साथ अँगड़ाई लेने लगा। उसके वैसा करते ही शीघ्रगामी बाण उसके शरीरसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १६ ॥

वरदानके सम्बन्धसे उस राक्षस विराधने प्राणोंको रोक लिया और शूल उठाकर उन दोनों रघुवंशी वीरोंपर आक्रमण किया॥ १७ ॥

उसका वह शूल आकाशमें वज्र और अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा; परंतु शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने दो बाण मारकर उसे काट डाला॥ १८ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंसे कटा हुआ विराधका वह शूल वज्रसे छिन्न-भिन्न हुए मेरुके शिलाखण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १९ ॥

फिर तो वे दोनों भाई शीघ्र ही काले सर्पोंके समान दो तलवारें लेकर तुरंत उसपर टूट पड़े और तत्काल बलपूर्वक प्रहार करने लगे॥ २० ॥

उनके आघातसे अत्यन्त घायल हुए उस भयंकर राक्षसने अपनी दोनों भुजाओंसे उन अकम्प्य पुरुषसिंह वीरोंको पकड़कर अन्यत्र जानेकी इच्छा की॥ २१ ॥

उसके अभिप्रायको जानकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—‘सुमित्रानन्दन! यह राक्षस अपनी इच्छाके अनुसार हम लोगोंको इस मार्गसे ढोकर ले चले। यह जैसा चाहता है, उसी तरह हमारा

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वाहन बनकर हमें ले चले (इसमें बाधा डालनेकी आवश्यकता नहीं है)। जिस मार्गसे यह निशाचर चल रहा है, यही हमलोगोंके लिये आगे जानेका मार्ग है'॥ २२-२३ ॥

अत्यन्त बलसे उद्दण्ड बने हुए निशाचर विराधने अपने बल-पराक्रमसे उन दोनों भाइयोंको बालकोंकी तरह उठाकर अपने दोनों कंधोंपर बिठा लिया॥ २४ ॥

उन दोनों रघुवंशी वीरोंको कंधेपर चढ़ा लेनेके बाद राक्षस विराध भयंकर गर्जना करता हुआ वनकी ओर चल दिया॥ २५ ॥

तदनन्तर उसने एक ऐसे वनमें प्रवेश किया, जो महान् मेघोंकी घटाके समान घना और नीला था। नाना प्रकारके बड़े-बड़े वृक्ष वहाँ भरे हुए थे। भाँति-भाँतिके पक्षियोंके समुदाय उसे विचित्र शोभासे सम्पन्न बना रहे थे तथा बहुत-से गीदड़ और हिंसक पशु उसमें सब ओर फैले हुए थे॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥ ३॥

चौथा सर्ग

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चौथा सर्ग

श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा विराधका वध

रघुकुलके श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मणको राक्षस लिये जा रहा है— यह देखकर सीता अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर जोर-जोरसे रोने-चिल्लाने लगीं— ॥ १ ॥

‘हाय! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचारविचार वाले दशरथनन्दन श्रीराम और लक्ष्मणको यह रौद्ररूपधारी राक्षस लिये जा रहा है॥ २ ॥

‘राक्षसशिरोमणे! तुम्हें नमस्कार है। इस वनमें रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो, किंतु इन दोनों ककुत्स्थवंशी वीरोंको छोड़ दो’॥ ३ ॥

विदेहनन्दिनी सीताकी यह बात सुनकर वे दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण उस दुरात्मा राक्षसका वध करनेमें शीघ्रता करने लगे॥ ४ ॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उस राक्षसकी बायीं और श्रीरामने उसकी दाहिनी बाँह बड़े वेगसे तोड़ डाली॥ ५ ॥

भुजाओंके टूट जानेपर वह मेघके समान काला राक्षस व्याकुल हो गया और शीघ्र ही मूर्च्छित होकर वज्रके द्वारा टूटे हुए पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ६ ॥

तब श्रीराम और लक्ष्मण विराधको भुजाओं, मुक्कों और लातोंसे मारने लगे तथा उसे उठा-उठाकर पटकने और पृथ्वीपर रगड़ने लगे॥ ७ ॥

बहुसंख्यक बाणोंसे घायल और तलवारोंसे क्षतवि क्षत होनेपर तथा पृथ्वीपर बार-बार रगड़ा जानेपर भी वह राक्षस मरा नहीं॥ ८ ॥

अवध्य तथा पर्वतके समान अचल विराधको बारंबार देखकर भयके अवसरोंपर अभय देनेवाले श्रीमान् रामने लक्ष्मणसे यह बात कही— ॥ ९ ॥

‘पुरुषसिंह! यह राक्षस तपस्यासे (वर पाकर) अवध्य हो गया है। इसे शस्त्रके द्वारा युद्धमें नहीं जीता जा सकता। इसलिये हमलोग निशाचर विराधको पराजित करनेके लिये अब गढ्ढा खोदकर गाड़ दें॥ १० ॥

‘लक्ष्मण! हाथीके समान भयंकर तथा रौद्र तेजवाले इस राक्षसके लिये इस वनमें बहुत बड़ा गढ्ढा खोदो’॥ ११ ॥

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इस प्रकार लक्ष्मणको गढ्ढा खोदनेकी आज्ञा देकर पराक्रमी श्रीराम अपने एक पैरसे विराधका गला दबाकर खड़े हो गये॥ १२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी कही हुई यह बात सुनकर राक्षस विराधने पुरुषप्रवर श्रीरामसे यह विनययुक्त बात कही— ॥ १३ ॥

‘पुरुषसिंह! नरश्रेष्ठ! आपका बल देवराज इन्द्रके समान है। मैं आपके हाथसे मारा गया। मोहवश पहले मैं आपको पहचान न सका॥ १४ ॥

‘तात! आपके द्वारा माता कौसल्या उत्तम संतानवाली हुई हैं। मैं यह जान गया कि आप ही श्रीरामचन्द्रजी हैं। यह महाभागा विदेहनन्दिनी सीता हैं और ये आपके छोटे भाई महायशस्वी लक्ष्मण हैं॥ १५ ॥

‘मुझे शापके कारण इस भयंकर राक्षसशरीरमें आना पड़ा था। मैं तुम्बुरु नामक गन्धर्व हूँ। कुबेरने मुझे राक्षस होनेका शाप दिया था॥ १६ ॥

‘जब मैंने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की, तब वे महायशस्वी कुबेर मुझसे इस प्रकार बोले—‘गन्धर्व! जब दशरथनन्दन श्रीराम युद्धमें तुम्हारा वध करेंगे, तब तुम अपने पहले स्वरूपको प्राप्त होकर स्वर्गलोकको जाओगे॥ १७ १/२ ॥

‘मैं रम्भा नामक अप्सरामें आसक्त था, इसलिये एक दिन ठीक समयसे उनकी सेवामें उपस्थित न हो सका। इसीलिये कुपित हो राजा वैश्रवण (कुबेर) ने मुझे पूर्वोक्त शाप देकर उससे छूटनेकी अवधि बतायी थी॥ १८ १/२ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले रघुवीर! आज आपकी कृपासे मुझे उस भयंकर शापसे छुटकारा मिल गया। आपका कल्याण हो, अब मैं अपने लोकको जाऊँगा॥

‘तात! यहाँसे डेढ़ योजनकी दूरीपर सूर्यके समान तेजस्वी प्रतापी और धर्मात्मा महामुनि शरभङ्ग निवास करते हैं। उनके पास आप शीघ्र चले जाइये, वे आपके कल्याणकी बात बतायेंगे॥ २०-२१ ॥

‘श्रीराम! आप मेरे शरीरको गड्ढेमें गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइये। मरे हुए राक्षसोंके शरीरको गड्ढेमें गाड़ना (कब्र खोदकर उसमें दफना देना) यह उनके लिये सनातन (परम्पराप्राप्त) धर्म है॥ २२ ॥

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‘जो राक्षस गड्ढेमें गाड़ दिये जाते हैं, उन्हें सनातन लोकोंकी प्राप्ति होती है।’ श्रीरामसे ऐसा कहकर बाणोंसे पीड़ित हुआ महाबली विराध (जब उसका शरीर गड्ढेमें डाला गया, तब) उस शरीरको छोड़कर स्वर्गलोकको चला गया॥ २३ १/२ ॥

(वह किस तरह गड्ढेमें डाला गया?—यह बात अब बतायी जाती है—) उसकी बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणको आज्ञा दी—‘लक्ष्मण! भयंकर कर्म करनेवाले तथा हाथीके समान भयानक इस राक्षसके लिये इस वनमें बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’॥ २४-२५ ॥

इस प्रकार लक्ष्मणको गड्ढा खोदनेका आदेश दे पराक्रमी श्रीराम एक पैरसे विराधका गला दबाकर खड़े हो गये॥ २६ ॥

तब लक्ष्मणने फावड़ा लेकर उस विशालकाय विराधके पास ही एक बहुत बड़ा गड्ढा खोदकर तैयार किया॥ २७ ॥

तब श्रीरामने उसके गलेको छोड़ दिया और लक्ष्मणने खूँटे-जैसे कानवाले उस विराधको उठाकर उस गड्ढेमें डाल दिया, उस समय वह बड़ी भयानक आवाजमें जोर-जोरसे गर्जना कर रहा था॥ २८ ॥

युद्धमें स्थिर रहकर शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने रणभूमिमें क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले उस भयंकर राक्षस विराधको बलपूर्वक उठाकर गड्ढेमें फेंक दिया। उस समय वह जोर-जोरसे चिल्ला रहा था। उसे गड्ढेमें डालकर वे दोनों बन्धु बड़े प्रसन्न हुए॥ २९ ॥

महान् असुर विराधका तीखे शस्त्रसे वध होनेवाला नहीं है, यह देखकर अत्यन्त कुशल दोनों भाई नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मणने उस समय गड्ढा खोदकर उस गड्ढेमें उसे डाल दिया और उसे मिट्टीसे पाटकर उस राक्षसका वध कर डाला॥ ३० ॥

वास्तवमें श्रीरामके हाथसे ही हठपूर्वक मरना उसे अभीष्ट था। उस अपनी मनोवाञ्छित मृत्युकी प्राप्तिके उद्देश्यसे स्वयं वनचारी विराधने ही श्रीरामको यह बता दिया था कि शस्त्रद्वारा मेरा वध नहीं हो सकता॥ ३१ ॥

उसकी कही हुई उसी बातको सुनकर श्रीरामने उसे गड्ढेमें गाड़ देनेका विचार किया था। जब वह गड्ढेमें डाला जाने लगा, उस समय उस अत्यन्त बलवान् राक्षसने अपनी चिल्लाहटसे सारे वनप्रान्तको गुँजा दिया॥

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राक्षस विराधको पृथ्वीके अंदर गड्ढेमें गिराकर श्रीराम और लक्ष्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे ऊपरसे बहुतेरे पत्थर डालकर पाट दिया। फिर वे निर्भय हो उस महान् वनमें सानन्द विचरने लगे॥ ३३ ॥

इस प्रकार उस राक्षसका वध करके मिथिलेश-कुमारी सीताको साथ ले सोनेके विचित्र धनुषोंसे सुशोभित हो वे दोनों भाई आकाशमें स्थित हुए चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति उस महान् वनमें आनन्दमग्न हो विचरण करने लगे॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ॥ ४॥

पाँचवाँ सर्ग

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पाँचवाँ सर्ग

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर जाना, देवताओंका दर्शन करना और मुनिसे सम्मानित होना तथा शरभङ्ग मुनिका ब्रह्मलोक-गमन

वनमें उस भयंकर बलशाली राक्षस विराधका वध करके पराक्रमी श्रीरामने सीताको हृदयसे लगाकर सान्त्वना दी और उद्दीप्त तेजवाले भाई लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा—'सुमित्रानन्दन! यह दुर्गम वन बड़ा कष्टप्रद है। हमलोग इसके पहले कभी ऐसे वनोंमें नहीं रहे हैं (अतः यहाँके कष्टोंका न तो अनुभव है और न अभ्यास ही है)। अच्छा! हमलोग अब शीघ्र ही तपोधन शरभङ्गजीके पास चलें'—ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर गये॥ १—३ ॥

देवताओंके तुल्य प्रभावशाली तथा तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरणवाले (अथवा तपके द्वारा परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार करनेवाले) शरभङ्ग मुनिके समीप जानेपर श्रीरामने एक बड़ा अद्भुत दृश्य देखा॥ ४ ॥

वहाँ उन्होंने आकाशमें एक श्रेष्ठ रथपर बैठे हुए देवताओंके स्वामी इन्द्रदेवका दर्शन किया, जो पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे थे। उनकी अङ्गकान्ति सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित होती थी। वे अपने तेजस्वी शरीरसे देदीप्यमान हो रहे थे। उनके पीछे और भी बहुत-से देवता थे। उनके दीप्तिमान् आभूषण चमक रहे थे तथा उन्होंने निर्मल वस्त्र धारण कर रखा था॥ ५-६ ॥

उन्हींके समान वेशभूषावाले दूसरे बहुत-से महात्मा इन्द्रदेवकी पूजा (स्तुति-प्रशंसा) कर रहे थे। उनका रथ आकाशमें खड़ा था और उसमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे। श्रीरामने निकटसे उस रथको देखा। वह नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होता था॥ ७ १/२ ॥

उन्होंने यह भी देखा कि इन्द्रके मस्तकके ऊपर श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल तथा चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् निर्मल छत्र तना हुआ है, जो विचित्र फूलोंकी मालाओंसे सुशोभित है॥ ८ १/२ ॥

श्रीरामने सुवर्णमय डंडेवाले दो श्रेष्ठ एवं बहुमूल्य चँवर और व्यजन भी देखे, जिन्हें दो सुन्दरियाँ लेकर देवराजके मस्तकपर हवा कर रही थीं॥ ९ १/२ ॥

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उस समय बहुत-से गन्धर्व, देवता, सिद्ध और महर्षिगण उत्तम वचनोंद्वारा अन्तरिक्षमें विराजमान देवेन्द्रकी स्तुति करते थे और देवराज इन्द्र शरभङ्ग मुनिके साथ वार्तालाप कर रहे थे। वहाँ इस प्रकार शतक्रतु इन्द्रका दर्शन करके श्रीरामने उनके अद्भुत रथकी ओर अँगुलीसे संकेत करते हुए उसे भाईको दिखाया और लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा— ॥ १०–१२ ॥

‘लक्ष्मण! आकाशमें वह अद्भुत रथ तो देखो, उससे तेजकी लपटें निकल रही हैं। वह सूर्यके समान तप रहा है। शोभा मानो मूर्तिमती होकर उसकी सेवा करती है॥ १३ ॥

‘हमलोगोंने पहले देवराज इन्द्रके जिन दिव्य घोड़ोंके विषयमें जैसा सुन रखा है, निश्चय ही आकाशमें ये वैसे ही दिव्य अश्व विराजमान हैं॥ १४ ॥

‘पुरुषसिंह! इस रथके दोनों ओर जो ये हाथोंमें खड्ग लिये कुण्डलधारी सौ-सौ युवक खड़े हैं, इनके वक्षःस्थल विशाल एवं विस्तृत हैं, भुजाएँ परिघोंके समान सुदृढ़ एवं बड़ी-बड़ी हैं। ये सब-के-सब लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं और व्याघ्रोंके समान दुर्जय प्रतीत होते हैं॥ १५-१६ ॥

‘सुमित्रानन्दन! इन सबके हृदयदेशोंमें अग्निके समान तेजसे जगमगाते हुए हार शोभा पाते हैं। ये नवयुवक पचीस वर्षोंकी अवस्थाका रूप धारण करते हैं॥ १७ ॥

‘कहते हैं, देवताओंकी सदा ऐसी ही अवस्था रहती है, जैसे ये पुरुषप्रवर दिखायी देते हैं। इनका दर्शन कितना प्यारा लगता है॥ १८ ॥

‘लक्ष्मण! जबतक कि मैं स्पष्ट रूपसे यह पता न लगा लूँ कि रथपर बैठे हुए ये तेजस्वी पुरुष कौन हैं? तबतक तुम विदेहनन्दिनी सीताके साथ एक मुहूर्ततक यहीं ठहरो’॥ १९ ॥

इस प्रकार सुमित्राकुमारको वहीं ठहरनेका आदेश देकर श्रीरामचन्द्रजी टहलते हुए शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर गये॥ २० ॥

श्रीरामको आते देख शचीपति इन्द्रने शरभङ्ग मुनिसे विदा ले देवताओंसे इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी यहाँ आ रहे हैं। वे जबतक मुझसे कोई बात न करें, उसके पहले ही तुमलोग मुझे यहाँसे दूसरे स्थानमें ले चलो। इस समय श्रीरामसे मेरी मुलाकात नहीं होनी चाहिये॥ २२ ॥

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‘इन्हें वह महान् कर्म करना है, जिसका सम्पादन करना दूसरोंके लिये बहुत कठिन है। जब ये रावणपर विजय पाकर अपना कर्तव्य पूर्ण करके कृतार्थ हो जायँगे, तब मैं शीघ्र ही आकर इनका दर्शन करूँगा’ ॥ २३ ॥

यह कहकर वज्रधारी शत्रुदमन इन्द्रने तपस्वी शरभङ्गका सत्कार किया और उनसे पूछकर अनुमति ले वे घोड़े जुते हुए रथके द्वारा स्वर्गलोकको चल दिये॥

सहस्र नेत्रधारी इन्द्रके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजी अपनी पत्नी और भाईके साथ शरभङ्ग मुनिके पास गये। उस समय वे अग्निके समीप बैठकर अग्निहोत्र कर रहे थे॥ २५ ॥

श्रीराम, सीता और लक्ष्मणने मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे वहाँ बैठ गये। शरभङ्गजीने उन्हें आतिथ्यके लिये निमन्त्रण दे ठहरनेके लिये स्थान दिया॥ २६ ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे इन्द्रके आनेका कारण पूछा। तब शरभङ्ग मुनिने श्रीरघुनाथजीसे सब बातें निवेदन करते हुए कहा— ॥ २७ ॥

‘श्रीराम! ये वर देनेवाले इन्द्र मुझे ब्रह्मलोकमें ले जाना चाहते हैं। मैंने अपनी उग्र तपस्यासे उस लोकपर विजय पायी है। जिनकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, उन पुरुषोंके लिये वह अत्यन्त दुर्लभ है॥ २८ ॥

‘पुरुषसिंह! परंतु जब मुझे मालूम हो गया कि आप इस आश्रमके निकट आ गये हैं, तब मैंने निश्चय किया कि आप-जैसे प्रिय अतिथिका दर्शन किये बिना मैं ब्रह्मलोकको नहीं जाऊँगा॥ २९ ॥

‘नरश्रेष्ठ! आप धर्मपरायण महात्मा पुरुषसे मिलकर ही मैं स्वर्गलोक तथा उससे ऊपरके ब्रह्मलोकको जाऊँगा॥ ३० ॥

‘पुरुषशिरोमणे! मैंने ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक आदि जिन अक्षय शुभ लोकोंपर विजय पायी है, मेरे उन सभी लोकोंको आप ग्रहण करें’॥ ३१ ॥

शरभङ्ग मुनिके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता नरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीने यह बात कही — ॥ ३२ ॥

‘महामुने! मैं ही आपको उन सब लोकोंकी प्राप्ति कराऊँगा। इस समय तो मैं इस वनमें आपके बताये हुए स्थानपर निवासमात्र करना चाहता हूँ’॥ ३३ ॥

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इन्द्रके समान बलशाली श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर महाज्ञानी शरभङ्ग मुनि फिर बोले— ॥ ३४ ॥

‘श्रीराम! इस वनमें थोड़ी ही दूरपर महातेजस्वी धर्मात्मा सुतीक्ष्ण मुनि नियमपूर्वक निवास करते हैं। वे ही आपका कल्याण (आपके लिये स्थान आदिका प्रबन्ध) करेंगे॥ ३५ ॥

‘आप इस रमणीय वनप्रान्तके उस पवित्र स्थानमें तपस्वी सुतीक्ष्ण मुनिके पास चले जाइये। वे आपके निवासस्थानकी व्यवस्था करेंगे॥ ३६ ॥

‘श्रीराम! आप फूलके समान छोटी-छोटी डोंगियोंसे पार होने योग्य अथवा पुष्पमयी नौकाको बहानेवाली इस मन्दाकिनी नदीके स्रोतके विपरीत दिशामें इसीके किनारे-किनारे चले जाइये। इससे वहाँ पहुँच जाइयेगा॥ ३७ ॥

‘नरश्रेष्ठ! यही वह मार्ग है, परंतु तात! दो घड़ी यहीं ठहरिये और जबतक पुरानी केंचुलका त्याग करनेवाले सर्पकी भाँति मैं अपने इन जराजीर्ण अङ्गोंका त्याग न कर दूँ, तबतक मेरी ही ओर देखिये’॥ ३८ ॥

यों कहकर महातेजस्वी शरभङ्ग मुनिने विधिवत् अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और मन्त्रोच्चारणपूर्वक घीकी आहुति देकर वे स्वयं भी उस अग्निमें प्रविष्ट हो गये॥ ३९ ॥

उस समय अग्निने उन महात्माके रोम, केश, जीर्ण त्वचा, हड्डी, मांस और रक्त सबको जलाकर भस्म कर दिया॥ ४० ॥

वे शरभङ्ग मुनि अग्नितुल्य तेजस्वी कुमारके रूपमें प्रकट हो गये और उस अग्निराशिसे ऊपर उठकर बड़ी शोभा पाने लगे॥ ४१ ॥

वे अग्निहोत्री पुरुषों, महात्मा मुनियों और देवताओंके भी लोकोंको लाँघकर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे॥ ४२ ॥

पुण्यकर्म करनेवाले द्विजश्रेष्ठ शरभङ्गने ब्रह्मलोकमें पार्षदोंसहित पितामह ब्रह्माजीका दर्शन किया। ब्रह्माजी भी उन ब्रह्मर्षिको देखकर बड़े प्रसन्न हुए और बोले— ‘महामुने! तुम्हारा शुभ स्वागत है’॥ ४३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५॥

छठा सर्ग

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छठा सर्ग

वानप्रस्थ मुनियोंका राक्षसोंके अत्याचारसे अपनी रक्षाके लिये श्रीरामचन्द्रजीसे प्रार्थना करना और श्रीरामका उन्हें आश्वासन देना

शरभङ्ग मुनिके ब्रह्मलोक चले जानेपर प्रज्वलित तेजवाले ककुत्स्थवंशी श्रीरामचन्द्रजीके पास बहुत-से मुनियोंके समुदाय पधारे॥ १ ॥

उनमें वैखानस^१, वालखिल्य^२, सम्प्रक्षाल^३, मरीचिप^४, बहुसंख्यक अश्मकुट्ट^५, पत्राहार^६, दन्तोलूखली^७, उन्मज्जक^८, गात्रशय्य^९, अशय्य^{१०}, अनवकाशिक^{११}, सलिलाहार^{१२}, वायुभक्ष^{१३}, आकाशनिलय^{१४}, स्थण्डिलशायी^{१५}, ऊर्ध्ववासी^{१६}, दान्त^{१७}, आर्द्रपटवासा^{१८}, सजप^{१९}, तपोनिष्ठ^{२०} और पञ्चाग्निसेवी^{२१}—इन सभी श्रेणियोंके तपस्वी मुनि थे॥ २—५ ॥

वे सभी तपस्वी ब्रह्मतेजसे सम्पन्न थे और सुदृढ़ योगके अभ्याससे उन सबका चित्त एकाग्र हो गया था। वे सब-के-सब शरभङ्ग मुनिके आश्रमपर श्रीरामचन्द्रजीके समीप आये॥ ६ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ परम धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर वे धर्मके ज्ञाता समागत ऋषिसमुदाय उनसे बोले— ॥ ७ ॥

‘रघुनन्दन! आप इस इक्ष्वाकुवंशके साथ ही समस्त भूमण्डलके भी स्वामी, संरक्षक एवं प्रधान महारथी वीर हैं। जैसे इन्द्र देवताओंके रक्षक हैं, उसी प्रकार आप मनुष्यलोककी रक्षा करनेवाले हैं॥ ८ ॥

‘आप अपने यश और पराक्रमसे तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। आपमें पिताकी आज्ञाके पालनका व्रत, सत्य भाषण तथा सम्पूर्ण धर्म विद्यमान हैं॥ ९ ॥

‘नाथ! आप महात्मा, धर्मज्ञ और धर्मवत्सल हैं। हम आपके पास प्रार्थी होकर आये हैं; इसीलिये ये स्वार्थकी बात निवेदन करना चाहते हैं। आपको इसके लिये हमें क्षमा करना चाहिये॥ १० ॥

‘स्वामिन्! जो राजा प्रजासे उसकी आयका छठा भाग करके रूपमें ले ले और पुत्रकी भाँति प्रजाकी रक्षा न करे, उसे महान् अधर्मका भागी होना पड़ता है॥ ११ ॥

‘श्रीराम! जो भूपाल प्रजाकी रक्षाके कार्यमें संलग्न हो अपने राज्यमें निवास करनेवाले सब लोगोंको प्राणोंके समान अथवा प्राणोंसे भी अधिक प्रिय पुत्रोंके समान समझकर सदा

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सावधानीके साथ उनकी रक्षा करता है, वह बहुत वर्षोंतक स्थिर रहनेवाली अक्षय कीर्ति पाता है और अन्तमें ब्रह्मलोकमें जाकर वहाँ भी विशेष सम्मानका भागी होता है॥ १२-१३ ॥

‘राजाके राज्यमें मुनि फल-मूलका आहार करके जिस उत्तम धर्मका अनुष्ठान करता है, उसका चौथा भाग धर्मके अनुसार प्रजाकी रक्षा करनेवाले उस राजाको प्राप्त हो जाता है॥ १४ ॥

‘श्रीराम! इस वनमें रहनेवाला वानप्रस्थ महात्माओंका यह महान् समुदाय, जिसमें ब्राह्मणोंकी ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसोंके द्वारा अनाथकी तरह मारा जा रहा है—इस मुनि-समुदायका बहुत अधिक मात्रामें संहार हो रहा है॥ १५ ॥

‘आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसोंद्वारा बारम्बार अनेक प्रकारसे मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियोंके शरीर (शव या कंकाल) दिखायी देते हैं॥ १६ ॥

‘पम्पा सरोवर और उसके निकट बहनेवाली तुङ्गभद्रा नदीके तटपर जिनका निवास है, जो मन्दाकिनीके किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूटपर्वतके किनारे अपना निवासस्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियोंका राक्षसोंद्वारा महान् संहार किया जा रहा है॥ १७ ॥

‘इन भयानक कर्म करनेवाले राक्षसोंने इस वनमें तपस्वी मुनियोंका जो ऐसा भयंकर विनाशकाण्ड मचा रखा है, वह हमलोगोंसे सहा नहीं जाता है॥ १८ ॥

‘अतः इन राक्षसोंसे बचनेके लिये शरण लेनेके उद्देश्यसे हम आपके पास आये हैं। श्रीराम! आप शरणागतवत्सल हैं, अतः इन निशाचरोंसे मारे जाते हुए हम मुनियोंकी रक्षा कीजिये॥ १९ ॥

‘वीर राजकुमार! इस भूमण्डलमें हमें आपसे बढ़कर दूसरा कोई सहारा नहीं दिखायी देता। आप इन राक्षसोंसे हम सबको बचाइये’॥ २० ॥

तपस्यामें लगे रहनेवाले उन तपस्वी मुनियोंकी ये बातें सुनकर ककुत्स्थकुलभूषण धर्मात्मा श्रीरामने उन सबसे कहा—॥ २१ ॥

‘मुनिवरो! आपलोग मुझसे इस प्रकार प्रार्थना न करें। मैं तो तपस्वी महात्माओंका आज्ञापालक हूँ। मुझे केवल अपने ही कार्यसे वनमें तो प्रवेश करना ही है (इसके साथ ही आपलोगोंकी सेवाका सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हो जायगा)॥ २२ ॥

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‘राक्षसोंके द्वारा जो आपको यह कष्ट पहुँच रहा है, इसे दूर करनेके लिये ही मैं पिताके आदेशका पालन करता हुआ इस वनमें आया हूँ॥ २३ ॥

‘आपलोगोंके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये मैं दैवात् यहाँ आ पहुँचा हूँ। आपकी सेवाका अवसर मिलनेसे मेरे लिये यह वनवास महान् फलदायक होगा॥ २४ ॥

‘तपोधनो! मैं तपस्वी मुनियोंसे शत्रुता रखनेवाले उन राक्षसोंका युद्धमें संहार करना चाहता हूँ। आप सब महर्षि भाॅइसहित मेरा पराक्रम देखें’॥ २५ ॥

इस प्रकार उन तपोधनोंको वर देकर धर्ममें मन लगानेवाले तथा श्रेष्ठ दान देनेवाले वीर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण तथा तपस्वी महात्माओंके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके पास गये॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छठा सर्ग पूरा हुआ॥ ६॥


१. ऋषियोंका एक समुदाय जो ब्रह्माजीके नखसे उत्पन्न हुआ है।
२. ब्रह्माजीके बाल (रोम) से प्रकट हुए महर्षियोंका समूह।
३. जो भोजनके बाद अपने बर्तन धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे समयके लिये कुछ नहीं बचाते।
४. सूर्य अथवा चन्द्रमाकी किरणोंका पान करके रहनेवाले।
५. कच्चे अन्नको पत्थरसे कूटकर खानेवाले।
६. पत्तोंका आहार करनेवाले।
७. दाँतोंसे ही ऊखलका काम लेनेवाले।
८. कण्ठतक पानीमें डूबकर तपस्या करनेवाले।
९. शरीरसे ही शय्याका काम लेनेवाले अर्थात् बिना बिछौनेके ही भुजापर सिर रखकर सोनेवाले।
१०. शय्याके साधनोंसे रहित।
११. निरन्तर सत्कर्ममें लगे रहनेके कारण कभी अवकाश न पानेवाले।
१२. जल पीकर रहनेवाले।
१३. हवा पीकर जीवननिर्वाह करनेवाले।
१४. खुले मैदानमें रहनेवाले।
१५. वेदीपर सोनेवाले।
१६. पर्वतशिखर आदि ऊँचे स्थानोंमें निवास करनेवाले।
१७. मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले।
१८. सदा भीगे कपड़े पहननेवाले।
१९. निरन्तर जप करनेवाले।
२०. तपस्या अथवा परमात्मतत्त्वके विचारमें स्थित रहनेवाले।
२१. गर्मीके मौसममें ऊपरसे सूर्यका और चारों ओरसे अग्निका ताप सहन करनेवाले।

सातवाँ सर्ग

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सातवाँ सर्ग

सीता और भ्रातासहित श्रीरामका सुतीक्ष्णके आश्रमपर जाकर उनसे बातचीत करना तथा उनसे सत्कृत हो रातमें वहीं ठहरना

शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सीता तथा उन ब्राह्मणोंके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रमकी ओर चले॥ १ ॥

वे दूरतकका मार्ग तै करके अगाध जलसे भरी हुई बहुत-सी नदियोंको पार करते हुए जब आगे गये, तब उन्हें महान् मेरुगिरिके समान एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी दिया, जो बड़ा ही निर्मल था॥ २ ॥

वहाँसे आगे बढ़कर वे दोनों इक्ष्वाकुकुलके श्रेष्ठ वीर रघुवंशी बन्धु सीताके साथ नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए एक वनमें पहुँचे॥ ३ ॥

उस घोर वनमें प्रविष्ट हो श्रीरघुनाथजीने एकान्त स्थानमें एक आश्रम देखा, जहाँके वृक्ष प्रचुर फल-फूलोंसे लदे हुए थे। इधर-उधर टँगे हुए चीर वस्त्रोंके समुदाय उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते थे॥ ४ ॥

वहाँ आन्तरिक मलकी शुद्धिके लिये पद्मासन धारण किये सुतीक्ष्ण मुनि ध्यानमग्न होकर बैठे थे। श्रीरामने उन तपोधन मुनिके पास विधिवत् जाकर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

‘सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ महर्षे! भगवन्! मैं राम हूँ और यहाँ आपका दर्शन करनेके लिये आया हूँ, अतः आप मुझसे बात कीजिये’॥ ६ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीरामका दर्शन करके धीर महर्षि सुतीक्ष्णने अपनी दोनों भुजाओंसे उनका आलिङ्गन किया और इस प्रकार कहा— ॥ ७ ॥

‘सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ रघुकुलभूषण श्रीराम! आपका स्वागत है। इस समय आपके पदार्पण करनेसे यह आश्रम सनाथ हो गया॥ ८ ॥

‘महायशस्वी वीर! मैं आपकी ही प्रतीक्षामें था, इसीलिये अबतक इस पृथ्वीपर अपने शरीरको त्यागकर मैं यहाँसे देवलोक (ब्रह्मधाम) में नहीं गया॥ ९ ॥

‘मैंने सुना था कि आप राज्यसे भ्रष्ट हो चित्रकूट पर्वतपर आकर रहते हैं। काकुत्स्थ! यहाँ सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्र आये थे॥ १० ॥

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‘वे महान् देवता देवेश्वर इन्द्रदेव मेरे पास आकर कह रहे थे कि ‘तुमने अपने पुण्यकर्मके द्वारा समस्त शुभ लोकोंपर विजय पायी है’॥ ११ ॥

‘उनके कथनानुसार मैंने तपस्यासे जिन देवर्षिसेवित लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है, उन लोकोंमें आप सीता और लक्ष्मणके साथ विहार करें। मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ वे सारे लोक आपकी सेवामें समर्पित करता हूँ’॥

जैसे इन्द्र ब्रह्माजीसे बात करते हैं, उसी प्रकार मनस्वी श्रीरामने उन उग्र तपस्यावाले तेजस्वी एवं सत्यवादी महर्षिको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३ ॥

‘महामुने! वे लोक तो मैं स्वयं ही आपको प्राप्त कराऊँगा, इस समय तो मेरी यह इच्छा है कि आप बतावें कि मैं इस वनमें अपने ठहरनेके लिये कहाँ कुटिया बनाऊँ?॥ १४ ॥

‘आप समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर तथा इहलोक और परलोककी सभी बातोंके ज्ञानमें निपुण हैं, यह बात मुझसे गौतमगोत्रीय महात्मा शरभङ्गने कही थी’॥ १५ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर उन लोकविख्यात महर्षिने बड़े हर्षके साथ मधुर वाणीमें कहा—॥ १६ ॥

‘श्रीराम! यही आश्रम सब प्रकारसे गुणवान् (सुविधाजनक) है, अतः आप यहीं सुखपूर्वक निवास कीजिये। यहाँ ऋषियोंका समुदाय सदा आता-जाता रहता है और फल-मूल भी सर्वदा सुलभ होते हैं॥ १७ ॥

‘इस आश्रमपर बड़े-बड़े मृगोंके झुंड आते और अपने रूप, कान्ति एवं गतिसे मनको लुभाकर किसीको कष्ट दिये बिना ही यहाँसे लौट जाते हैं। उन्हें यहाँ किसीसे कोई भय नहीं प्राप्त होता है॥ १८ ॥

‘इस आश्रममें मृगोंके उपद्रवके सिवा और कोई दोष नहीं है, यह आप निश्चितरूपसे जान लें।’ महर्षिका यह वचन सुनकर लक्ष्मणके बड़े भाई धीर-वीर भगवान् श्रीरामने हाथमें धनुष-बाण लेकर कहा—॥ १९ १/२ ॥

‘महाभाग! यहाँ आये हुए उन उपद्रवकारी मृगसमूहोंको यदि मैं झुकी हुई गाँठ और तीखी धारवाले बाणसे मार डालूँ तो इसमें आपका अपमान होगा। यदि ऐसा हुआ तो इससे बढ़कर कष्टकी बात मेरे लिये और क्या हो सकती है?॥ २०-२१ ॥

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‘इसलिये मैं इस आश्रममें अधिक समय नहीं निवास करना चाहता।’ मुनिसे ऐसा कहकर मौन हो श्रीरामचन्द्रजी संध्योपासना करने चले गये॥ २२ ॥

सायंकालकी संध्योपासना करके श्रीरामने सीता और लक्ष्मणके साथ सुतीक्ष्ण मुनिके उस रमणीय आश्रममें निवास किया॥ २३ ॥

संध्याका समय बीतनेपर रात हुई देख महात्मा सुतीक्ष्णने स्वयं ही तपस्वी-जनोंके सेवन करने योग्य शुभ अन्न ले आकर उन दोनों पुरुषशिरोमणि बन्धुओंको बड़े सत्कारके साथ अर्पित किया॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७॥