श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
बानबेवाँ सर्ग
बानबेवाँ सर्ग
श्रीरामके अश्वमेध-यज्ञमें दान-मानकी विशेषता
इस प्रकार सब सामग्री पूर्णरूपसे भेजकर भरतके बड़े भाई श्रीरामने उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न तथा कृष्णसार मृगके समान काले रंगवाले एक घोड़ेको छोड़ा॥ १ ॥
ऋत्विजोंसहित लक्ष्मणको उस अश्वकी रक्षाके लिये नियुक्त करके श्रीरघुनाथजी सेनाके साथ नैमिषारण्यको गये॥ २ ॥
वहाँ बने हुए अत्यन्त अद्भुत यज्ञ-मण्डपको देखकर महाबाहु श्रीरामको अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई और वे बोले—'बहुत सुन्दर है'॥ ३ ॥
नैमिषारण्यमें निवास करते समय श्रीरामचन्द्रजीके पास भूमण्डलके सभी नरेश भाँति-भाँतिके उपहार ले आये और श्रीरामचन्द्रजीने उन सबका स्वागत-सत्कार किया॥
उन्हें अन्न, पान, वस्त्र तथा अन्य सब आवश्यक सामान दिये गये। शत्रुघ्नसहित भरत उन राजाओंके स्वागत-सत्कारमें नियुक्त किये गये थे॥ ५ ॥
सुग्रीवसहित महामनस्वी वानर परम पवित्र एवं संयतचित्त हो उस समय वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे॥ ६ ॥
बहुतेरे राक्षसोंसे घिरे हुए विभीषण अत्यन्त सावधान रहकर उग्र तपस्वी ऋषियोंके सेवाकार्यमें संलग्न थे॥ ७ ॥
महाबली नरश्रेष्ठ श्रीरामने सेवकोंसहित महा-मनस्वी भूपालोंको ठहरनेके लिये बहुमूल्य वासस्थान (खेमे) दिये॥ ८ ॥
इस प्रकार सुन्दर ढंगसे अश्वमेध-यज्ञका कार्य प्रारम्भ हुआ और लक्ष्मणके संरक्षणमें रहकर घोड़ेके भूमण्डलमें भ्रमणका कार्य भी भलीभाँति सम्पन्न हो गया॥ ९ ॥
राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी महात्मा श्रीरघुनाथजीका वह श्रेष्ठ यज्ञ इस प्रकार उत्तम विधिसे होने लगा। उस अश्वमेध-यज्ञमें केवल एक ही बात सब ओर सुनायी पड़ती थी—जबतक याचक संतुष्ट न हों, तबतक उनकी इच्छाके अनुसार सब वस्तुएँ दिये जाओ, इसके सिवा दूसरी बात नहीं सुनायी देती थी। इस प्रकार महात्मा श्रीरामके श्रेष्ठ यज्ञमें नाना प्रकारके
गुड़के बने हुए खाद्य पदार्थ और खाण्डव आदि तबतक निरन्तर दिये जाते थे जबतक कि पानेवाले पूर्णतः संतुष्ट होकर बस न कर दें॥ १०-११ १/२ ॥
जबतक याचकोंके मनकी बात ओठसे बाहर नहीं निकलने पाती थी, तबतक ही राक्षस और वानर उन्हें उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दे देते थे। यह बात सबने देखी॥ १२ १/२ ॥
राजा श्रीरामके उस श्रेष्ठ यज्ञमें हृष्ट-पुष्ट मनुष्य भरे हुए थे, वहाँ कोई भी मलिन, दीन अथवा दुर्बल नहीं दिखायी देता था॥ १३ १/२ ॥
उस यज्ञमें जो चिरजीवी महात्मा मुनि पधारे थे, उन्हें ऐसे किसी भी यज्ञका स्मरण नहीं था, जिसमें दानकी ऐसी धूम रही हो। वह यज्ञ दानराशिसे पूर्णतः अलंकृत दिखायी देता था॥ १४ १/२ ॥
जिसे सुवर्णकी आवश्यकता थी, वह सुवर्ण पाता था, धन चाहनेवालेको धन मिलता था और रत्नकी इच्छावालेको रत्न॥ १५ १/२ ॥
वहाँ निरन्तर दिये जानेवाले चाँदी, सोने, रत्न और वस्त्रोंके ढेर लगे दिखायी देते थे॥ १६ १/२ ॥
वहाँ आये हुए तपस्वी मुनि कहते थे कि ऐसा यज्ञ तो पहले कभी इन्द्र, चन्द्रमा, यम और वरुणके यहाँ भी नहीं देखा गया॥ १७ १/२ ॥
वानर और राक्षस सर्वत्र हाथोंमें देनेकी सामग्री लिये खड़े रहते थे और वस्त्र, धन तथा अन्नकी इच्छा रखनेवाले याचकोंको अधिक-से-अधिक देते थे॥ १८ १/२ ॥
राजसिंह भगवान् श्रीरामका ऐसा सर्वगुणसम्पन्न यज्ञ एक वर्षसे भी अधिक कालतक चलता रहा। उसमें कभी किसी बातकी कमी नहीं हुई॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९२ ॥
तिरानबेवाँ सर्ग
तिरानबेवाँ सर्ग
श्रीरामके यज्ञमें महर्षि वाल्मीकिका आगमन और उनका रामायणगानके लिये कुश और लवको आदेश
इस प्रकार वह अत्यन्त अद्भुत यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय भगवान् वाल्मीकि मुनि अपने शिष्योंके साथ उसमें शीघ्रतापूर्वक पधारे॥ १ ॥
उन्होंने उस दिव्य एवं अद्भुत यज्ञका दर्शन किया और ऋषियोंके लिये जो बाड़े बने थे, उनके पास ही उन्होंने अपने लिये भी सुन्दर पर्णशालाएँ बनवायीं॥ २ ॥
वाल्मीकिजीके सुन्दर बाड़ेके समीप अन्न आदिसे भरे-पूरे बहुत-से छकड़े खड़े कर दिये गये थे। साथ ही अच्छे-अच्छे फल और मूल भी रख दिये गये थे॥ ३ ॥
राजा श्रीराम तथा बहुसंख्यक महात्मा मुनियोंद्वारा भलीभाँति पूजित एवं सम्मानित हो महातेजस्वी आत्मज्ञानी वाल्मीकि मुनिने बड़े सुखसे वहाँ निवास किया॥ ४ ॥
उन्होंने अपने हृष्ट-पुष्ट दो शिष्योंसे कहा—‘तुम दोनों भांऽइ एकाग्रचित्त हो सब ओर घूम-फिरकर बड़े आनन्दके साथ सम्पूर्ण रामायण-काव्यका गान करो॥ ५ ॥
‘ऋषियों और ब्राह्मणोंके पवित्र स्थानोंपर, गलियोंमें, राजमार्गोंपर तथा राजाओंके वासस्थानोंमें भी इस काव्यका गान करना॥ ६ ॥
‘श्रीरामचन्द्रजीका जो गृह बना है, उसके दरवाजेपर, जहाँ ब्राह्मणलोग यज्ञकार्य कर रहे हैं, वहाँ तथा ऋत्विजोंके आगे भी इस काव्यका विशेषरूपसे गान करना चाहिये॥ ७ ॥
‘यहाँ पर्वतके शिखरोंपर नाना प्रकारके स्वादिष्ट एवं मीठे फल लगे हैं, (भूख लगनेपर) उनका स्वाद ले-लेकर इस काव्यका गान करते रहना॥ ८ ॥
‘बच्चो! यहाँके सुमधुर फल-मूलोंका भक्षण करनेसे न तो तुम्हें कभी थकावट होगी और न तुम्हारे गलेकी मधुरता ही नष्ट होने पायेगी॥ ९ ॥
‘यदि महाराज श्रीराम तुम दोनोंको गान सुननेके लिये बुलावें तो तुम उनसे तथा वहाँ बैठे हुए ऋषि-मुनियोंसे यथायोग्य विनयपूर्ण बर्ताव करना॥ १० ॥
‘मैंने पहले भिन्न-भिन्न संख्यावाले श्लोकोंसे युक्त रामायण काव्यके सर्गोंका जिस तरह तुम्हें उपदेश दिया है, उसीके अनुसार प्रतिदिन बीस-बीस सर्गोंका मधुर स्वरसे गान करना॥ ११
॥
‘धनकी इच्छासे थोड़ा-सा भी लोभ न करना, आश्रममें रहकर फल-मूल भोजन करनेवाले वनवासियोंको धनसे क्या काम?॥ १२ ॥
‘यदि श्रीरघुनाथजी पूछें—‘बच्चो! तुम दोनों किसके पुत्र हो?’ तो तुम दोनों महाराजसे इतना ही कह देना कि हम दोनों भांऽइ महर्षि वाल्मीकिके शिष्य हैं॥ १३ ॥
‘ये वीणाके सात तार हैं। इनसे बड़ी मधुर आवाज निकलती है। इसमें अपूर्व स्वरोंका प्रदर्शन करनेवाले ये स्थान बने हैं। इनके स्वरोंको झंकृत करके— मिलाकर सुमधुर स्वरमें तुम दोनों भांऽइ काव्यका गान करो और सर्वथा निश्चिन्त रहो॥ १४ ॥
‘आरम्भसे ही इस काव्यका गान करना चाहिये। तुमलोग ऐसा कोऽइ बर्ताव न करना, जिससे राजाका अपमान हो; क्योंकि राजा धर्मकी दृष्टिसे सम्पूर्ण प्राणियोंका पिता होता है॥ १५ ॥
‘अतएव तुम दोनों भांऽइ प्रसन्न और एकाग्रचित्त होकर कल सबेरेसे ही वीणाके लयपर मधुर स्वरसे रामायण-गान आरम्भ कर दो’॥ १६ ॥
इस तरह बहुत कुछ आदेश देकर वरुणके पुत्र परम उदार महामुनि वाल्मीकि चुप हो गये॥ १७ ॥
मुनिके इस प्रकार आदेश देनेपर मिथिलेशकुमारी सीताके वे दोनों शत्रुदमन पुत्र ‘बहुत अच्छा, हम ऐसा ही करेंगे’ यह कहकर वहाँसे चल दिये॥ १८ ॥
शुक्राचार्यकी बनायी हुंऽइ नीतिसंहिताको धारण करनेवाले अश्विनीकुमारोंकी भाँति ऋषिकी कही हुंऽइ उस अद्भुत वाणीको हृदयमें धारण करके वे दोनों कुमार मन-ही-मन उत्कण्ठित हो वहाँ रातभर सुखसे रहे॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९३ ॥
चौरानबेवाँ सर्ग
चौरानबेवाँ सर्ग
लव-कुशद्वारा रामायण-काव्यका गान तथा श्रीरामका उसे भरी सभामें सुनना
रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब स्नान-संध्याके पश्चात् समिधा-होमका कार्य पूरा करके वे दोनों भाई ऋषिके बताये अनुसार वहाँ सम्पूर्ण रामायणका गान करने लगे॥ १ ॥
श्रीरघुनाथजीने भी वह गान सुना, जो पूर्ववर्ती आचार्योंके बताये हुए नियमोंके अनुकूल था। संगीतकी विशेषताओंसे युक्त स्वरोंके अलापनेकी अपूर्व शैली थी॥ २ ॥
बहुसंख्यक प्रमाणों—ध्वनिपरिच्छेदके साधनभूत द्रुत, मध्य और विलम्बित—इन तीनोंकी आवृत्तियों अथवा सप्तविध स्वरोंके भेदकी सिद्धिके लिये बने हुए स्थानोंसे बँधा और वीणाकी लयसे मिलता हुआ उन दोनों बालकोंका वह मधुर गान सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा कौतूहल हुआ॥ ३ ॥
तदनन्तर पुरुषसिंह राजा श्रीरामने कर्मानुष्ठानसे अवकाश मिलनेपर बड़े-बड़े मुनियों, राजाओं, वेदवेत्ता पण्डितों, पौराणिकों, वैयाकरणों, बड़े-बूढ़े ब्राह्मणों, स्वरों और लक्षणोंके ज्ञाताओं, गीत सुननेके लिये उत्सुक द्विजों, सामुद्रिक लक्षणों तथा संगीत-विद्याके जानकारों, विशेषतः निगमागमके विद्वानों अथवा पुरवासियों, भिन्न-भिन्न छन्दोंके चरणों, उनके गुरु-लघु अक्षरों तथा उनके सम्बन्धोंका ज्ञान रखनेवाले पण्डितों, वैदिक छन्दोंके परिनिष्ठित विद्वानों, स्वरोंकी ह्रस्व, दीर्घ आदि मात्राओंके विशेषज्ञों, ज्योतिष विद्याके पारंगत पण्डितों, कर्मकाण्डियों, कार्यकुशल पुरुषों, विभिन्न भाषाओं और चेष्टा तथा संकेतोंको समझनेवाले पुरुषों एवं सारे महाजनोंको बुलवाया॥ ४—७ ½ ॥
इतना ही नहीं, तर्कके प्रयोगमें निपुण नैयायिकों, युक्तिवादी एवं बहुज्ञ विद्वानों, छन्दों, पुराणों और वेदोंके ज्ञाता द्विजवरों, चित्रकलाके जानकारों, धर्मशास्त्रके अनुकूल सदाचारके ज्ञाताओं, दर्शन एवं कल्पसूत्रके विद्वानों, नृत्य और गीतमें प्रवीण पुरुषों, विभिन्न शास्त्रोंके ज्ञाताओं, नीति-निपुण पुरुषों तथा वेदान्तके अर्थको प्रकाशित करनेवाले ब्रह्मवेत्ताओंको भी वहाँ बुलवाया। इन सबको एकत्र करके भगवान् श्रीरामने रामायण-गान करनेवाले उन दोनों बालकोंको सभामें बुलाकर बिठाया॥ ८—१० ॥
सभासदोंमें श्रोताओंका हर्ष बढ़ानेवाली बातें होने लगीं। उसी समय दोनों मुनिकुमारोंने गाना आरम्भ किया॥ ११ ॥
फिर तो मधुर संगीतका तार बँध गया। बड़ा अलौकिक गान था। गेय वस्तुकी विशेषताओंके कारण सभी श्रोता मुग्ध होकर सुनने लगे। किसीको तृप्ति नहीं होती थी॥ १२ ॥
मुनियोंके समुदाय और महापराक्रमी भूपाल सभी आनन्दमग्न होकर उन दोनोंकी ओर बारम्बार इस तरह देख रहे थे, मानो उनकी रूपमाधुरीको नेत्रोंसे पी रहे हों॥ १३ ॥
वे सब एकाग्रचित्त हो परस्पर इस प्रकार कहने लगे—‘इन दोनों कुमारोंकी आकृति श्रीरामचन्द्रजीसे बिलकुल मिलती-जुलती है। ये बिम्बसे प्रकट हुए प्रतिबिम्बके समान जान पड़ते हैं॥ १४ ॥
‘यदि इनके सिरपर जटा न होती और ये वल्कल न पहने होते तो हमें श्रीरामचन्द्रजीमें तथा गान करनेवाले इन दोनों कुमारोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता’॥ १५ ॥
नगर और जनपदमें निवास करनेवाले मनुष्य जब इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय नारदजीके द्वारा प्रदर्शित प्रथम सर्ग—मूल-रामायणका आरम्भसे ही गान प्रारम्भ हुआ॥ १६ ॥
वहाँसे लेकर बीस सर्गोंतकका उन्होंने गान किया। तत्पश्चात् अपराह्नका समय हो गया। उतनी देरमें बीस सर्गोंका गान सुनकर भ्रातृवत्सल श्रीरघुनाथजीने भाई भरतसे कहा—‘काकुत्स्थ! तुम इन दोनों महात्मा बालकोंको अठारह हजार स्वर्ण-मुद्राएँ पुरस्कारके रूपमें शीघ्र प्रदान करो। इसके सिवा यदि और किसी वस्तुके लिये इनकी इच्छा हो तो उसे भी शीघ्र ही दे दो’॥ १७-१८ १/२ ॥
आज्ञा पाकर भरत शीघ्र ही उन दोनों बालकोंको अलग-अलग स्वर्ण-मुद्राएँ देने लगे; किंतु उस दिये जाते हुए सुवर्णको कुश और लवने नहीं ग्रहण किया॥ १९ १/२ ॥
वे दोनों महामनस्वी बन्धु विस्मित होकर बोले—‘इस धनकी क्या आवश्यकता है। हम वनवासी हैं। जंगली फल-मूलसे जीवन-निर्वाह करते हैं। सोनाचाँदी वनमें ले जाकर क्या करेंगे?’॥ २०-२१ ॥
उनके ऐसा कहनेपर सब श्रोताओंके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ। श्रोता और श्रीराम सभी आश्चर्यचकित हो गये॥ २२ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजी यह सुननेके लिये उत्सुक हुए कि इस काव्यकी उपलब्धि कहाँसे हुई है। फिर उन महातेजस्वी रघुनाथजीने दोनों मुनिकुमारोंसे पूछा—॥
‘इस महाकाव्यकी श्लोक-संख्या कितनी है? इसके रचयिता महात्मा कविका आवासस्थान कौन-सा है? इस महान् काव्यके कर्ता कौन मुनीश्वर हैं और वे कहाँ हैं?’॥ २४ ॥
इस प्रकार पूछते हुए श्रीरघुनाथजीसे वे दोनों मुनिकुमार बोले—‘महाराज! जिस काव्यके द्वारा आपके इस सम्पूर्ण चरित्रका प्रदर्शन कराया गया है, उसके रचयिता भगवान् वाल्मीकि हैं और वे इस यज्ञस्थलमें पधारे हुए हैं॥ २५ ॥
‘उन तपस्वी कविके बनाये हुए इस महाकाव्यमें चौबीस हजार श्लोक और एक सौ उपाख्यान हैं॥ २६ ॥
‘राजन्! उन महात्माने आदिसे लेकर अन्ततक पाँच सौ सर्ग तथा छः काण्डोंका निर्माण किया है। इनके सिवा उन्होंने उत्तरकाण्डकी भी रचना की है॥ २७ ॥
‘हमारे गुरु महर्षि वाल्मीकिने ही उन सबका निर्माण किया है। उन्होंने आपके चरित्रको महाकाव्यका रूप दिया है। इसमें आपके जीवनतककी सारी बातें आ गयी हैं॥ २८ ॥
‘महारथी नरेश! यदि आपने इसे सुननेका विचार किया हो तो यज्ञ-कर्मसे अवकाश मिलनेपर इसके लिये निश्चित समय निकालिये और अपने भाइयोंके साथ बैठकर इसे नियमितरूपसे सुनिये’॥ २९ ॥
‘तब श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘बहुत अच्छा। हम इस काव्यको सुनेंगे।’ तत्पश्चात् श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा ले दोनों भाई कुश और लव प्रसन्नतापूर्वक उस स्थानपर गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकिजी ठहरे हुए थे॥ ३० ॥
श्रीरामचन्द्रजी भी महात्मा मुनियों और राजाओंके साथ उस मधुर संगीतको सुनकर कर्मशाला (यज्ञमण्डप) में चले गये॥ ३१ ॥
इस प्रकार प्रथम दिन कतिपय सर्गोंसे युक्त सुन्दर स्वर एवं मधुर शब्दोंसे पूर्ण, ताल और लयसे सम्पन्न तथा वीणाके लयकी व्यञ्जनासे युक्त वह काव्यगान, जिसे कुश और लवने गाया था, श्रीरामने सुना॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९४ ॥
पञ्चानबेवाँ सर्ग
पञ्चानबेवाँ सर्ग
श्रीरामका सीतासे उनकी शुद्धता प्रमाणित करनेके लिये शपथ करानेका विचार
इस प्रकार श्रीरघुनाथजी ऋषियों, राजाओं और वानरोंके साथ कॆंइ दिनोंतक वह उत्तम रामायण-गान सुनते रहे॥ १ ॥
उस कथासे ही उन्हें यह मालूम हुआ कि ‘कुश और लव दोनों कुमार सीताके ही सुपुत्र हैं।’ यह जानकर सभाके बीचमें बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीने शुद्ध आचारविचार वाले दूतोंको बुलाया और अपनी बुद्धिसे विचारकर कहा—‘तुमलोग यहाँसे भगवान् वाल्मीकि मुनिके पास जाओ और उनसे मेरा यह संदेश कहो॥ २-३ ॥
‘यदि सीताका चरित्र शुद्ध है और यदि उनमें किसी तरहका पाप नहीं है तो वे आप महामुनिकी अनुमति ले यहाँ आकर जनसमुदायमें अपनी शुद्धता प्रमाणित करें’॥ ४ ॥
‘तुम इस विषयमें महर्षि वाल्मीकि तथा सीताके भी हार्दिक अभिप्रायको जानकर शीघ्र मुझे सूचित करो कि क्या वे यहाँ आकर अपनी शुद्धिका विश्वास दिलाना चाहती हैं॥ ५ ॥
‘कल सबेरे मिथिलेशकुमारी जानकी भरी सभामें आवें और मेरा कलंक दूर करनेके लिये शपथ करें’॥
श्रीरघुनाथजीका यह अत्यन्त अद्भुत वचन सुनकर दूत उस बाड़ेमें गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकि विराजमान थे॥ ७ ॥
महात्मा वाल्मीकि अमित तेजस्वी थे और अपने तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रहे थे। उन दूतोंने उन्हें प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजीके वचन मधुर एवं कोमल शब्दोंमें कह सुनाये॥ ८ ॥
उन दूतोंकी वह बात सुनकर और श्रीरामके हार्दिक अभिप्रायको समझकर वे महातेजस्वी मुनि इस प्रकार बोले-॥९ ॥
‘ऐसा ही होगा, तुमलोगोंका भला हो। श्रीरघुनाथजी जो आज्ञा देते हैं, सीता वही करेगी; क्योंकि पति स्त्रीके लिये देवता है’॥ १० ॥
मुनिके ऐसा कहनेपर वे सब राजदूत महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीके पास लौट आये। उन्होंने मुनिकी कही हुॆंइ सारी बातें ज्यों-की-त्यों कह सुनायीं॥ ११ ॥
महात्मा वाल्मीकिकी बातें सुनकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने वहाँ आये हुए ऋषियों तथा राजाओंसे कहा—॥ १२ ॥
‘आप सब पूज्यपाद मुनि शिष्योंसहित सभामें पधारें। सेवकोंसहित राजालोग भी उपस्थित हों तथा दूसरा भी जो कोई सीताकी शपथ सुनना चाहता हो, वह आ जाय। इस प्रकार सब लोग एकत्र होकर सीताका शपथ-ग्रहण देखें’॥ १३ ॥
महात्मा राघवेन्द्रका यह वचन सुनकर समस्त महर्षियोंके मुखसे महान् साधुवादकी ध्वनि गूँज उठी॥ १४ ॥
राजालोग भी महात्मा रघुनाथजीकी प्रशंसा करते हुए बोले— ‘नरश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर सभी उत्तम बातें केवल आपमें ही सम्भव हैं, दूसरे किसीमें नहीं’॥ १५ ॥
इस प्रकार दूसरे दिन सीतासे शपथ लेनेका निश्चय करके शत्रुसूदन श्रीरामने उस समय सबको बिदा कर दिया॥ १६ ॥
इस प्रकार दूसरे दिन सबेरे सीतासे शपथ लेनेका निश्चय करके महानुभाव महात्मा राजसिंह श्रीरामने उन सब मुनियों और नरेशोंको अपने-अपने स्थानपर जानेकी अनुमति दे दी॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पञ्चानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९५ ॥
छानबेवाँ सर्ग
छानबेवाँ सर्ग
महर्षि वाल्मीकिद्वारा सीताकी शुद्धताका समर्थन
रात बीती, सबेरा हुआ और महातेजस्वी राजा श्रीरामचन्द्रजी यज्ञशालामें पधारे। उस समय उन्होंने समस्त ऋषियोंको बुलवाया॥ १ ॥
वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, विश्वामित्र, दीर्घतमा, महातपस्वी दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, वामन, दीर्घजीवी मार्कण्डेय, महायशस्वी मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, धर्मज्ञ शतानन्द, तेजस्वी भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, महायशस्वी गौतम, कात्यायन, सुयज्ञ और तपोनिधि अगस्त्य—ये तथा दूसरे कठोर व्रतका पालन करनेवाले सभी बहुसंख्यक महर्षि कौतूहलवश वहाँ एकत्र हुए॥ २—६ ॥
महापराक्रमी राक्षस और महाबली वानर—ये सभी महामना कौतूहलवश वहाँ आये॥ ७ ॥
नाना देशोंसे पधारे हुए तीक्ष्ण व्रतधारी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ उपस्थित हुए॥ ८ ॥
सीताजीका शपथ-ग्रहण देखनेके लिये ज्ञाननिष्ठ, कर्मनिष्ठ और योगनिष्ठ सभी तरहके लोग पधारे थे॥
राजसभामें एकत्र हुए सब लोग पत्थरकी भाँति निश्चल होकर बैठे हैं—यह सुनकर मुनिवर वाल्मीकि सीताजीको साथ लेकर तुरंत वहाँ आये॥ १० ॥
महर्षिके पीछे सीता सिर झुकाये चली आ रही थीं। उनके दोनों हाथ जुड़े थे और नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे। वे अपने हृदयमन्दिरमें बैठे हुए श्रीरामका चिन्तन कर रही थीं॥ ११ ॥
वाल्मीकिके पीछे-पीछे आती हुई सीता ब्रह्माजीका अनुसरण करनेवाली श्रुतिके समान जान पड़ती थीं। उन्हें देखकर वहाँ धन्य-धन्यकी भारी आवाज गूँज उठी॥ १२ ॥
उस समय समस्त दर्शकोंका हृदय दुःख देनेवाले महान् शोकसे व्याकुल था। उन सबका कोलाहल सब ओर व्याप्त हो गया॥ १३ ॥
कोई कहते थे—‘श्रीराम! तुम धन्य हो।’ दूसरे कहते थे—‘देवि सीते! तुम धन्य हो’ तथा वहाँ कुछ अन्य दर्शक भी ऐसे थे, जो सीता और राम दोनोंको उच्च स्वरसे साधुवाद दे रहे
थे॥ १४ ॥
तब उस जनसमुदायके बीचमें सीतासहित प्रवेश करके मुनिवर वाल्मीकि श्रीरघुनाथजीसे इस प्रकार बोले— ॥ १५ ॥
‘दशरथनन्दन! यह सीता उत्तम व्रतका पालन करनेवाली और धर्मपरायणा है। आपने लोकापवादसे डरकर इसे मेरे आश्रमके समीप त्याग दिया था॥ १६ ॥
‘महान् व्रतधारी श्रीराम! लोकापवादसे डरे हुए आपको सीता अपनी शुद्धताका विश्वास दिलायेगी। इसके लिये आप इसे आज्ञा दें॥ १७ ॥
‘ये दोनों कुमार कुश और लव जानकीके गर्भसे जुड़वे पैदा हुए हैं। ये आपके ही पुत्र हैं और आपके ही समान दुर्धर्ष वीर हैं, यह मैं आपको सच्ची बात बता रहा हूँ॥ १८ ॥
‘रघुकुलनन्दन! मैं प्रचेता (वरुण) का दसवाँ पुत्र हूँ। मेरे मुँहसे कभी झूठ बात निकली हो, इसकी याद मुझे नहीं है। मैं सत्य कहता हूँ ये दोनों आपके ही पुत्र हैं॥ १९ ॥
‘मैंने कई हजार वर्षोंतक भारी तपस्या की है। यदि मिथिलेशकुमारी सीतामें कोई दोष हो तो मुझे उस तपस्याका फल न मिले॥ २० ॥
‘मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा भी पहले कभी कोई पाप नहीं किया है। यदि मिथिलेशकुमारी सीता निष्पाप हों, तभी मुझे अपने उस पापशून्य पुण्यकर्मका फल प्राप्त हो॥ २१ ॥
‘रघुनन्दन! मैंने अपनी पाँचों इन्द्रियों और मन-बुद्धिके द्वारा सीताकी शुद्धताका भलीभाँति निश्चय करके ही इसे अपने संरक्षणमें लिया था। यह मुझे जंगलमें एक झरनेके पास मिली थी॥ २२ ॥
‘इसका आचरण सर्वथा शुद्ध है। पाप इसे छू भी नहीं सका है तथा यह पतिको ही देवता मानती है। अतः लोकापवादसे डरे हुए आपको अपनी शुद्धताका विश्वास दिलायेगी॥ २३ ॥
‘राजकुमार! मैंने दिव्य दृष्टिसे यह जान लिया था कि सीताका भाव और विचार परम पवित्र है; इसलिये यह मेरे आश्रममें प्रवेश पा सकी है। आपको भी यह प्राणोंसे अधिक प्यारी है और आप यह भी जानते हैं कि सीता सर्वथा शुद्ध है तथापि लोकापवादसे कलुषितचित्त होकर आपने इसका त्याग किया है’॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें छानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९६ ॥
सत्तानबेवाँ सर्ग
सत्तानबेवाँ सर्ग
सीताका शपथ-ग्रहण और रसातलमें प्रवेश
महर्षि वाल्मीकिके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजी सुन्दरी सीतादेवीकी ओर एक बार दृष्टि डालकर उस जनसमुदायके बीच हाथ जोड़कर बोले— ॥ १ ॥
‘महाभाग! आप धर्मके ज्ञाता हैं। सीताके सम्बन्धमें आप जैसा कह रहे हैं, वह सब ठीक है। ब्रह्मन्! आपके इन निर्दोष वचनोंसे मुझे जनकनन्दिनीकी शुद्धतापर पूरा विश्वास हो गया है॥ २ ॥
‘एक बार पहले भी देवताओंके समीप विदेह-कुमारीकी शुद्धताका विश्वास मुझे प्राप्त हो चुका है। उस समय सीताने अपनी शुद्धिके लिये शपथ की थी, जिसके कारण मैंने इन्हें अपने भवनमें स्थान दिया॥ ३ ॥
‘किंतु आगे चलकर फिर बड़े जोरका लोकापवाद उठा, जिससे विवश होकर मुझे मिथिलेशकुमारीका त्याग करना पड़ा। ब्रह्मन्! यह जानते हुए भी कि सीता सर्वथा निष्पाप हैं, मैंने केवल समाजके भयसे इन्हें छोड़ दिया था; अतः आप मेरे इस अपराधको क्षमा करें॥ ४ ॥
‘मैं यह भी जानता हूँ कि ये जुड़वे उत्पन्न हुए कुमार कुश और लव मेरे ही पुत्र हैं, तथापि जनसमुदायमें शुद्ध प्रमाणित होनेपर ही मिथिलेशकुमारीमें मेरा प्रेम हो सकता है’॥ ५ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके अभिप्रायको जानकर सीताके शपथके समय महेन्द्र आदि सभी मुख्य-मुख्य महा-तेजस्वी देवता पितामह ब्रह्माजीको आगे करके वहाँ आ गये॥ ६ १/२ ॥
आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, समस्त साध्यदेव, सभी महर्षि, नाग, गरुड़ और सम्पूर्ण सिद्धगण प्रसन्नचित्त हो सीताजीके शपथ-ग्रहणको देखनेके लिये घबराये हुए-से वहाँ आ पहुँचे॥ ७-८ १/२ ॥
देवताओं तथा ऋषियोंको उपस्थित देख श्रीरघुनाथजी फिर बोले—‘सुरश्रेष्ठगण! यद्यपि मुझे महर्षि वाल्मीकिके निर्दोष वचनोंसे ही पूरा विश्वास हो गया है, तथापि जन-समाजके बीच विदेहकुमारीकी विशुद्धता प्रमाणित हो जानेपर मुझे अधिक प्रसन्नता होगी’॥ ९-१० ॥
तदनन्तर दिव्य सुगन्धसे परिपूर्ण, मनको आनन्द देनेवाले परम पवित्र एवं शुभकारक सुरश्रेष्ठ वायुदेव मन्दगतिसे प्रवाहित हो सब ओरसे वहाँके जनसमुदायको आह्लाद प्रदान करने
लगे॥ ११ ॥
समस्त राष्ट्रोंसे आये हुए मनुष्योंने एकाग्रचित्त हो प्राचीन कालके सत्ययुगकी भाँति यह अद्भुत और अचिन्त्य-सी घटना अपनी आँखों देखी॥ १२ ॥
उस समय सीताजी तपस्विनियोंके अनुरूप गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए थीं। सबको उपस्थित जानकर वे हाथ जोड़े, दृष्टि और मुखको नीचे किये बोलीं— ॥ १३ ॥
‘मैं श्रीरघुनाथजीके सिवा दूसरे किसी पुरुषका (स्पर्श तो दूर रहा) मनसे चिन्तन भी नहीं करती; यदि यह सत्य है तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें॥ १४ ॥
‘यदि मैं मन, वाणी और क्रियाके द्वारा केवल श्रीरामकी ही आराधना करती हूँ तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें॥ १५ ॥
‘भगवान् श्रीरामको छोड़कर मैं दूसरे किसी पुरुषको नहीं जानती, मेरी कही हुई यह बात यदि सत्य हो तो भगवती पृथ्वीदेवी मुझे अपनी गोदमें स्थान दें’॥ १६ ॥
विदेहकुमारी सीताके इस प्रकार शपथ करते ही भूतलसे एक अद्भुत सिंहासन प्रकट हुआ, जो बड़ा ही सुन्दर और दिव्य था॥ १७ ॥
दिव्य रत्नोंसे विभूषित महापराक्रमी नागोंने दिव्य रूप धारण करके उस दिव्य सिंहासनको अपने सिरपर धारण कर रखा था॥ १८ ॥
सिंहासनके साथ ही पृथ्वीकी अधिष्ठात्री देवी भी दिव्य रूपसे प्रकट हुईं। उन्होंने मिथिलेशकुमारी सीताको अपनी दोनों भुजाओंसे गोदमें उठा लिया और स्वागतपूर्वक उनका अभिनन्दन करके उन्हें उस सिंहासनपर बिठा दिया॥
सिंहासनपर बैठकर जब सीतादेवी रसातलमें प्रवेश करने लगीं, उस समय देवताओंने उनकी ओर देखा। फिर तो आकाशसे उनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी लगातार वर्षा होने लगी॥ २० ॥
देवताओंके मुँहसे सहसा ‘धन्य-धन्य’ का महान् शब्द प्रकट हुआ। वे कहने लगे—‘सीते! तुम धन्य हो, धन्य हो। तुम्हारा शील-स्वभाव इतना सुन्दर और ऐसा पवित्र है’॥ २१ ॥
सीताका रसातलमें प्रवेश देखकर आकाशमें खड़े हुए देवता प्रसन्नचित्त हो इस तरहकी बहुत-सी बातें कहने लगे॥ २२ ॥
यज्ञमण्डपमें पधारे हुए सभी मुनि और नरश्रेष्ठ नरेश भी आश्चर्यसे भर गये॥ २३ ॥
अन्तरिक्षमें और भूतलपर सभी चराचर प्राणी तथा पातालमें विशालकाय दानव और नागराज भी आश्चर्यचकित हो उठे॥ २४ ॥
कोई हर्षनाद करने लगे, कोई ध्यानमग्न हो गये, कोई श्रीरामकी ओर देखने लगे और कोई हक्के-बक्के-से होकर सीताजीकी ओर निहारने लगे॥ २५ ॥
सीताका भूतलमें प्रवेश देखकर वहाँ आये हुए सब लोग हर्ष, शोक आदिमें डूब गये। दो घड़ीतक वहाँका सारा जनसमुदाय अत्यन्त मोहाच्छन्न-सा हो गया॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सत्तानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९७ ॥
अट्ठानबेवाँ सर्ग
अट्ठानबेवाँ सर्ग
सीताके लिये श्रीरामका खेद, ब्रह्माजीका उन्हें समझाना और उत्तरकाण्डका शेष अंश सुननेके लिये प्रेरित करना
विदेहकुमारी सीताके रसातलमें प्रवेश कर जानेपर श्रीरामके समीप बैठे हुए सम्पूर्ण वानर तथा ऋषि-मुनि कहने लगे—‘साध्वी सीते! तुम धन्य हो’॥ १ ॥
किंतु स्वयं भगवान् श्रीराम बहुत दुःखी हुए। उनका मन उदास हो गया और वे गूलरके दण्डका सहारा लिये खड़े हो सिर झुकाये नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे॥ २ ॥
बहुत देरतक रोकर बारम्बार आँसू बहाते हुए क्रोध और शोकसे युक्त हो श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार बोले—॥ ३ ॥
‘आज मेरा मन अभूतपूर्व शोकमें डूबना चाहता है; क्योंकि इस समय मेरी आँखोंके सामनेसे मूर्तिमती लक्ष्मीके समान सीता अदृश्य हो गयीं॥ ४ ॥
‘पहली बार सीता समुद्रके उस पार लङ्कामें जाकर मेरी आँखोंसे ओझल हुईं थीं। किंतु जब मैं वहाँसे भी उन्हें लौटा लाया, तब पृथ्वीके भीतरसे ले आना कौन बड़ी बात है?’॥ ५ ॥
(यों कहकर वे पृथ्वीसे बोले—) ‘पूजनीये भगवति वसुन्धरे! मुझे सीताको लौटा दो; अन्यथा मैं अपना क्रोध दिखाऊँगा। मेरा प्रभाव कैसा है? यह तुम जानती हो॥ ६ ॥
‘देवि! वास्तवमें तुम्हीं मेरी सास हो। राजा जनक हाथमें फाल लिये तुम्हींको जोत रहे थे, जिससे तुम्हारे भीतरसे सीताका प्रादुर्भाव हुआ॥ ७ ॥
‘अतः या तो तुम सीताको लौटा दो अथवा मेरे लिये भी अपनी गोदमें जगह दो; क्योंकि पाताल हो या स्वर्ग, मैं सीताके साथ ही रहूँगा॥ ८ ॥
‘तुम मेरी सीताको लाओ! मैं मिथिलेशकुमारीके लिये मतवाला (बेसुध) हो गया हूँ। यदि इस पृथ्वीपर तुम उसी रूपमें सीताको मुझे लौटा नहीं दोगी तो मैं पर्वत और वनसहित तुम्हारी स्थितिको नष्ट कर दूँगा। सारी भूमिका विनाश कर डालूँगा। फिर भले ही सब कुछ जलमय ही हो जाय’॥ ९-१० ॥
श्रीरघुनाथजी जब क्रोध और शोकसे युक्त हो इस प्रकारकी बातें कहने लगे, तब देवताओंसहित ब्रह्माजीने उन रघुकुलनन्दन श्रीरामसे कहा—॥ ११ ॥
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रीराम! आप मनमें संताप न करें। शत्रुसूदन! अपने पूर्व स्वरूपका स्मरण करें॥ १२ ॥
‘महाबाहो! मैं आपको आपके परम उत्तम स्वरूपका स्मरण नहीं दिला रहा हूँ। दुर्धर्ष वीर! केवल यह अनुरोध कर रहा हूँ कि इस समय आप ध्यानके द्वारा अपने वैष्णव स्वरूपका स्मरण करें॥ १३ ॥
‘साध्वी सीता सर्वथा शुद्ध हैं। वे पहलेसे ही आपके ही परायण रहती हैं। आपका आश्रय लेना ही उनका तपोबल है। उसके द्वारा वे सुखपूर्वक नागलोकके बहाने आपके परमधाममें चली गयी हैं॥ १४ ॥
‘अब पुनः साकेतधाममें आपकी उनसे भेंट होगी; इसमें संशय नहीं है। अब इस सभामें मैं आपसे जो कुछ कहता हूँ, उसपर ध्यान दीजिये॥ १५ ॥
‘आपके चरित्रसे सम्बन्ध रखनेवाला यह काव्य, जिसे आपने सुना है, सब काव्योंमें उत्तम है। श्रीराम! यह आपके सारे जीवन-वृत्तका विस्तारसे ज्ञान करायेगा, इसमें संदेह नहीं है॥ १६ ॥
‘वीर! आविर्भावकालसे ही जो आपके द्वारा सुख-दुःखोंका (स्वेच्छासे) सेवन हुआ है, उसका तथा सीताके अन्तर्धान होनेके बाद जो भविष्यमें होनेवाली बातें हैं, उनका भी महर्षि वाल्मीकिने इसमें पूर्णरूपसे वर्णन कर दिया है॥ १७ ॥
‘श्रीराम! यह आदिकाव्य है। इस सम्पूर्ण काव्यकी आधारशिला आप ही हैं—आपके ही जीवनवृत्तान्तको लेकर इस काव्यकी रचना हुई है। रघुकुलकी शोभा बढ़ानेवाले आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा यशस्वी पुरुष नहीं है, जो काव्योंका नायक होनेका अधिकारी हो॥
‘देवताओंके साथ मैंने पहले आपसे सम्बन्धित इस सम्पूर्ण काव्यका श्रवण किया है। यह दिव्य और अद्भुत है। इसमें कोई भी बात छिपायी नहीं गयी है। इसमें कही गयी सारी बातें सत्य हैं॥ १९ ॥
‘पुरुषसिंह रघुनन्दन! आप धर्मपूर्वक एकाग्रचित्त हो भविष्यकी घटनाओंसे युक्त शेष रामायण काव्यको भी सुन लीजिये॥ २० ॥
‘महायशस्वी एवं महातेजस्वी श्रीराम! इस काव्यके अन्तिम भागका नाम उत्तरकाण्ड है। उस उत्तम भागको आप ऋषियोंके साथ सुनिये॥ २१ ॥
‘काकुत्स्थवीर रघुनन्दन! आप सर्वोत्कृष्ट राजर्षि हैं। अतः पहले आपको ही यह उत्तम काव्य सुनना चाहिये, दूसरेको नहीं’॥ २२ ॥
इतना कहकर तीनों लोकोंके स्वामी ब्रह्माजी देवताओं एवं उनके बन्धु-बान्धवोंके साथ अपने लोकको चले गये॥ २३ ॥
वहाँ जो ब्रह्मलोकमें रहनेवाले महातेजस्वी महात्मा ऋषि विद्यमान थे, वे ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर भावी वृत्तान्तोंसे युक्त उत्तरकाण्डको सुननेकी इच्छासे लौट आये (उनके साथ ब्रह्मलोकमें नहीं गये)॥ २४ १/२ ॥
तत्पश्चात् देवाधिदेव ब्रह्माजीकी कही हुई उस शुभ वाणीको याद करके परम तेजस्वी श्रीरामजीने महर्षि वाल्मीकिसे इस प्रकार कहा— ॥ २५ १/२ ॥
‘भगवन्! ये ब्रह्मलोकके निवासी महर्षि मेरे भावी चरित्रोंसे युक्त उत्तरकाण्डका शेष अंश सुनना चाहते हैं। अतः कल सबेरेसे ही उसका गान आरम्भ हो जाना चाहिये’॥ २६ ॥
ऐसा निश्चय करके श्रीरघुनाथजीने जनसमुदायको बिदा कर दिया और कुश तथा लवको साथ लेकर वे अपनी पर्णशालामें आये। वहाँ सीताका ही चिन्तन करते-करते उन्होंने रात व्यतीत की॥ २७-२८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९८ ॥
निन्यानबेवाँ सर्ग
निन्यानबेवाँ सर्ग
सीताके रसातल-प्रवेशके पश्चात् श्रीरामकी जीवनचर्या, रामराज्यकी स्थिति तथा माताओंके परलोक-गमन आदिका वर्णन
रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजीने बड़े-बड़े मुनियोंको बुलाकर अपने दोनों पुत्रोंसे कहा— 'अब तुम निःशङ्क होकर शेष रामायणका गान आरम्भ करो'॥ १ ॥
महात्मा महर्षियोंके यथास्थान बैठ जानेपर कुश और लवने भगवान्के भविष्य जीवनसे सम्बन्ध रखनेवाले उत्तरकाण्डका, जो उस महाकाव्यका एक अंश था, गान आरम्भ किया॥ २ ॥
इधर अपनी सत्यरूप सम्पत्तिके बलसे सीताजीके रसातलमें प्रवेश कर जानेपर उस यज्ञके अन्तमें भगवान् श्रीरामका मन बहुत दुःखी हुआ॥ ३ ॥
विदेहकुमारीको न देखनेसे उन्हें यह सारा संसार सूना जान पड़ने लगा। शोकसे व्यथित होनेके कारण उनके मनको शान्ति नहीं मिली॥ ४ ॥
तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने सब राजाओंको, रीछों, वानरों और राक्षसोंको, जनसमुदायको तथा मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंको भी धन देकर बिदा किया। इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञको समाप्त करके कमलनयन श्रीरामने सबको बिदा करनेके पश्चात् उस समय सीताका मन-ही-मन स्मरण करते हुए अयोध्यामें प्रवेश किया॥ ५-६ १/२ ॥
यज्ञ पूरा करके रघुकुलनन्दन राजा श्रीराम अपने दोनों पुत्रोंके साथ रहने लगे। उन्होंने सीताके सिवा दूसरी किसी स्त्रीसे विवाह नहीं किया। प्रत्येक यज्ञमें जब-जब धर्मपत्नीकी आवश्यकता होती, श्रीरघुनाथजी सीताकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवा लिया करते थे॥ ७-८ ॥
उन्होंने दस हजार वर्षोंतक यज्ञ किये। कितने ही अश्वमेध यज्ञों और उनसे दसगुने वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान किया, जिसमें असंख्य स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणाएँ दी गयी थीं॥ ९ ॥
श्रीमान् रामने पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम, अतिरात्र, गोसव तथा अन्य बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया, जिनमें अपार धनराशि खर्च की गयी॥ १० ॥
इस प्रकार राज्य करते हुए महात्मा भगवान् श्रीरघुनाथजीका बहुत बड़ा समय धर्मपालनके प्रयत्नमें ही बीता॥ ११ ॥
रीछ, वानर और राक्षस भी श्रीरामकी आज्ञाके अधीन रहते थे। भूमण्डलके सभी राजा प्रतिदिन श्रीरघुनाथजीको प्रसन्न रखते थे॥ १२ ॥
श्रीरामके राज्यमें मेघ समयपर वर्षा करते थे। सदा सुकाल ही रहता था—कभी अकाल नहीं पड़ता था। सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न दिखायी देती थीं तथा नगर और जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे रहते थे॥ १३ ॥
श्रीरामके राज्यशासन करते समय किसीकी अकाल-मृत्यु नहीं होती थी। प्राणियोंको कोई रोग नहीं सताता था और संसारमें कोई उपद्रव खड़ा नहीं होता था॥ १४ ॥
इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होनेपर पुत्र-पौत्रोंसे घिरी हुईं परम यशस्विनी श्रीराममाता कौसल्या कालधर्म (मृत्यु) को प्राप्त हुईं॥ १५ ॥
सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयीने भी उन्हींके पथका अनुसरण किया। ये सभी रानियाँ जीवनकालमें नाना प्रकारके धर्मका अनुष्ठान करके अन्तमें साकेतधामको प्राप्त हुईं और बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ राजा दशरथसे मिलीं। उन महाभागा रानियोंको सब धर्मोंका पूरा-पूरा फल प्राप्त हुआ॥ १६-१७ ॥
श्रीरघुनाथजी समय-समयपर अपनी सभी माताओंके निमित्त बिना किसी भेदभावके तपस्वी ब्राह्मणोंको बड़े-बड़े दान दिया करते थे॥ १८ ॥
धर्मात्मा श्रीराम श्राद्धमें उपयोगी उत्तमोत्तम वस्तुएँ ब्राह्मणोंको देते तथा पितरों और देवताओंको संतुष्ट करनेके लिये बड़े-बड़े दुस्तर यज्ञों (पिण्डात्मक पितृयज्ञों) का अनुष्ठान करते थे॥ १९ ॥
इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा सर्वदा विविध धर्मोंका पालन करते हुए श्रीरघुनाथजीके कई हजार वर्ष सुख-पूर्वक बीत गये॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९९ ॥