श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
अठारहवाँ सर्ग
अठारहवाँ सर्ग
रावणद्वारा मरुत्तकी पराजय तथा इन्द्र आदि देवताओंका मयूर आदि पक्षियोंको वरदान देना
अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन! वेदवतीके अग्निमें प्रवेश कर जानेपर रावण पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो पृथ्वीपर सब ओर भ्रमण करने लगा॥ १ ॥
उसी यात्रामें उशीरबीज नामक देशमें पहुँचकर रावणने देखा, राजा मरुत्त देवताओंके साथ बैठकर यज्ञ कर रहे हैं॥ २ ॥
उस समय साक्षात् बृहस्पतिके भाई तथा धर्मके मर्मको जाननेवाले ब्रह्मर्षि संवर्त सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे रहकर वह यज्ञ करा रहे थे॥ ३ ॥
ब्रह्माजीके वरदानसे जिसको जीतना कठिन हो गया था, उस राक्षस रावणको वहाँ देखकर उसके आक्रमणसे भयभीत हो देवतालोग तिर्यग्-योनिमें प्रवेश कर गये॥ ४ ॥
इन्द्र मोर, धर्मराज कौआ, कुबेर गिरगिट और वरुण हंस हो गये॥ ५ ॥
शत्रुसूदन श्रीराम! इसी तरह दूसरे-दूसरे देवता भी जब विभिन्न रूपोंमें स्थित हो गये, तब रावणने उस यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया, मानो कोई अपवित्र कुत्ता वहाँ आ गया हो॥ ६ ॥
राजा मरुत्तके पास पहुँचकर राक्षसराज रावणने कहा—‘मुझसे युद्ध करो या अपने मुँहसे यह कह दो कि मैं पराजित हो गया’॥ ७ ॥
तब राजा मरुत्तने पूछा—‘आप कौन हैं?’ उनका प्रश्न सुनकर रावण हँस पड़ा और बोला—॥ ८ ॥
‘भूपाल! मैं कुबेरका छोटा भाई रावण हूँ। फिर भी तुम मुझे नहीं जानते और मुझे देखकर भी तुम्हारे मनमें न तो कौतूहल हुआ, न भय ही; इससे मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ॥ ९ ॥
‘तीनों लोकोंमें तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा राजा होगा, जो मेरे बलको न जानता हो। मैं वह रावण हूँ, जिसने अपने भाई कुबेरको जीतकर यह विमान छीन लिया है’॥ १० ॥
तब राजा मरुत्तने रावणसे कहा—‘तुम धन्य हो, जिसने अपने बड़े भाईको रणभूमिमें पराजित कर दिया॥ ११ ॥
‘तुम्हारे-जैसा स्पृहणीय पुरुष तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है। तुमने पूर्वकालमें किस शुद्ध धर्मका आचरण करके वर प्राप्त किया है॥ १२ ॥
‘तुम स्वयं जो कुछ कह रहे हो, ऐसी बात मैंने पहले कभी नहीं सुनी है। दुर्बुद्धे! इस समय खड़े तो रहो। मेरे हाथसे जीवित बचकर नहीं जा सकोगे। आज अपने पैने बाणोंसे मारकर तुम्हें यमलोक पहुँचाये देता हूँ’॥ १३ १/२ ॥
तदनन्तर राजा मरुत्त धनुष-बाण लेकर बड़े रोषके साथ युद्धके लिये निकले, परंतु महर्षि संवर्तने उनका रास्ता रोक लिया॥ १४ १/२ ॥
उन महर्षिने महाराज मरुत्तसे स्नेहपूर्वक कहा— ‘राजन्! यदि मेरी बात सुनना और उसपर ध्यान देना उचित समझो तो सुनो। तुम्हारे लिये युद्ध करना उचित नहीं है॥ १५ १/२ ॥
‘यह माहेश्वर यज्ञ आरम्भ किया गया है। यदि पूरा न हुआ तो तुम्हारे समस्त कुलको दग्ध कर डालेगा। जो यज्ञकी दीक्षा ले चुका है, उसके लिये युद्धका अवसर ही कहाँ है? यज्ञदीक्षित पुरुषमें क्रोधके लिये स्थान ही कहाँ है?॥ १६ १/२ ॥
‘युद्धमें किसकी विजय होगी, इस प्रश्नको लेकर सदा संशय ही बना रहता है। उधर वह राक्षस अत्यन्त दुर्जय है।’ अपने आचार्यके इस कथनसे पृथ्वीपति मरुत्त युद्धसे निवृत्त हो गये। उन्होंने धनुष-बाण त्याग दिया और स्वस्थभावसे वे यज्ञके लिये उन्मुख हो गये॥ १७-१८ ॥
तब उन्हें पराजित हुआ मानकर शुकने यह घोषणा कर दी कि महाराज रावणकी विजय हुई और वह बड़े हर्षके साथ उच्चस्वरसे सिंहनाद करने लगा॥ १९ ॥
उस यज्ञमें आकर बैठे हुए महर्षियोंको खाकर उनके रक्तसे पूर्णतः तृप्त हो रावण फिर पृथ्वीपर विचरने लगा॥ २० ॥
रावणके चले जानेपर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता पुनः अपने स्वरूपमें प्रकट हो उन-उन प्राणियोंको (जिनके रूपमें वे स्वयं प्रकट हुए थे) वरदान देते हुए बोले॥ २१ ॥
सबसे पहले इन्द्रने हर्षपूर्वक नीले पंखवाले मोरसे कहा— ‘धर्मज्ञ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें सर्पसे भय नहीं होगा॥ २२ ॥
‘मेरे जो ये सहस्र नेत्र हैं, इनके समान चिह्न तुम्हारी पाँखमें प्रकट होंगे। जब मैं मेघरूप होकर वर्षा करूँगा, उस समय तुम्हें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त होगी। वह प्रसन्नता मेरी प्राप्तिको लक्षित करानेवाली होगी।’ इस प्रकार देवराज इन्द्रने मोरको वरदान दिया॥ २३-२४ ॥
नरेश्वर श्रीराम! इस वरदानके पहले मोरोंके पंख केवल नीले रंगके ही होते थे। देवराजसे उक्त वर पाकर सब मयूर वहाँसे चले गये॥ २५॥
श्रीराम! तदनन्तर धर्मराजने प्राग्वंशकी* छतपर बैठे हुए कौएसे कहा—‘पक्षी! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। प्रसन्न होकर जो कुछ कहता हूँ, मेरे इस वचनको सुनो॥ २६॥
‘जैसे दूसरे प्राणियोंको मैं नाना प्रकारके रोगोंद्वारा पीड़ित करता हूँ, वे रोग मेरी प्रसन्नताके कारण तुमपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकेंगे; इसमें संशय नहीं है॥ २७॥
‘विहङ्गम! मेरे वरदानसे तुम्हें मृत्युका भय नहीं होगा। जबतक मनुष्य आदि प्राणी तुम्हारा वध नहीं करेंगे, तबतक तुम जीवित रहोगे॥ २८॥
‘मेरे राज्य—यमलोकमें स्थित रहकर जो मानव भूखसे पीड़ित हैं, उनके पुत्र आदि इस भूतलपर जब तुम्हें भोजन करावेंगे, तब वे बन्धु-बान्धवोंसहित परम तृप्त होंगे’॥ २९॥
तत्पश्चात् वरुणने गङ्गाजीके जलमें विचरनेवाले हंसको सम्बोधित करके कहा—‘पक्षिराज! मेरा प्रेमपूर्ण वचन सुनो—॥ ३०॥
‘तुम्हारे शरीरका रंग चन्द्रमण्डल तथा शुद्ध फेनके समान परम उज्ज्वल, सौम्य एवं मनोरम होगा॥ ३१॥
‘मेरे अङ्गभूत जलका आश्रय लेकर तुम सदा कान्तिमान् बने रहोगे और तुम्हें अनुपम प्रसन्नता प्राप्त होगी। यही मेरे प्रेमका परिचायक चिह्न होगा’॥ ३२॥
श्रीराम! पूर्वकालमें हंसोंका रंग पूर्णतः श्वेत नहीं था। उनकी पाँखोंका अग्रभाग नीला और दोनों भुजाओंके बीचका भाग नूतन दूर्वादलके अग्रभाग-सा कोमल एवं श्याम वर्णसे युक्त होता था॥ ३३॥
तदनन्तर विश्रवाके पुत्र कुबेरने पर्वतशिखरपर बैठे हुए कृकलास (गिरगिट)-से कहा—‘मैं प्रसन्न होकर तुम्हें सुवर्णके समान सुन्दर रंग प्रदान करता हूँ॥ ३४॥
‘तुम्हारा सिर सदा ही सुवर्णके समान रंगका एवं अक्षय होगा। मेरी प्रसन्नतासे तुम्हारा यह (काला) रंग सुनहरे रंगमें परिवर्तित हो जायगा’॥ ३५॥
इस प्रकार उन्हें उत्तम वर देकर वे सब देवता वह यज्ञोत्सव समाप्त होनेपर राजा मरुत्तके साथ पुनः अपने भवन—स्वर्गलोकको चले गये॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १८ ॥
* यज्ञशालाके पूर्वभागमें यजमान और उसकी पत्नी आदिके ठहरनेके लिये बने हुए गृहको प्राग्वंश कहते हैं। यह घर हविर्गृहके पूर्व ओर होता है। दुष्यन्त, सुरथ, गाधि, गय, राजा पुरूरवा—इन सभी भूपालोंने अपने-अपने राजत्वकालमें रावणके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर ली॥ ५ १/२ ॥
उन्नीसवाँ सर्ग
उन्नीसवाँ सर्ग
रावणके द्वारा अनरण्यका वध तथा उनके द्वारा उसे शापकी प्राप्ति
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) पूर्वोक्त रूपसे राजा मरुत्तको जीतनेके पश्चात् राक्षसराज दशग्रीव क्रमशः अन्य नरेशोंके नगरोंमें भी युद्धकी इच्छासे गया॥ १ ॥
महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी उन महाराजोंके पास जाकर वह राक्षसराज उनसे कहता—‘राजाओ! तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा यह कह दो कि ‘हम हार गये।’ यही मेरा अच्छी तरह किया हुआ निश्चय है। इसके विपरीत करनेसे तुम्हें छुटकारा नहीं मिलेगा’॥ २-३ ॥
तब निर्भय, बुद्धिमान् तथा धर्मपूर्ण विचार रखनेवाले बहुत-से महाबली राजा परस्पर सलाह करके शत्रु की प्रबलताको समझकर बोले—‘राक्षसराज! हम तुमसे हार मान लेते हैं’॥ ४ ½ ॥
दुष्यन्त, सुरथ, गाधि, गय, राजा पुरूरवा—इन सभी भूपालोंने अपने-अपने राजत्वकालमें रावणके सामने अपनी पराजय स्वीकार कर ली॥ ५ ½ ॥
इसके बाद राक्षसोंका राजा रावण इन्द्रद्वारा सुरक्षित अमरावतीकी भाँति महाराज अनरण्यद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें आया। वहाँ पुरन्दर (इन्द्र)-के समान पराक्रमी पुरुषसिंह राजा अनरण्यसे मिलकर बोला—‘राजन्! तुम मुझसे युद्ध करनेका वचन दो अथवा कह दो कि ‘मैं हार गया।’ यही मेरा आदेश है’॥ ६—८ ॥
उस पापात्माकी वह बात सुनकर अयोध्यानरेश अनरण्यको बड़ा क्रोध हुआ और वे उस राक्षसराजसे बोले—॥ ९ ॥
‘निशाचरपते! मैं तुम्हें द्वन्द्वयुद्धका अवसर देता हूँ। ठहरो, शीघ्र युद्धके लिये तैयार हो जाओ। मैं भी तैयार हो रहा हूँ’॥ १० ॥
राजाने रावणकी दिग्विजयकी बात पहलेसे ही सुन रखी थी, इसलिये उन्होंने बहुत बड़ी सेना इकट्ठी कर ली थी। नरेशकी वह सारी सेना उस समय राक्षसके वधके लिये उत्साहित हो नगरसे बाहर निकली॥ ११ ॥
नरश्रेष्ठ श्रीराम! दस हजार हाथीसवार, एक लाख घुड़सवार, कई हजार रथी और पैदल सैनिक पृथ्वीको आच्छादित करके युद्धके लिये आगे बढ़े। रथों और पैदलोंसहित सारी सेना
रणक्षेत्रमें जा पहुँची॥ १२ १/२ ॥
युद्धविशारद रघुवीर! फिर तो राजा अनरण्य और निशाचर रावणमें बड़ा अद्भुत संग्राम होने लगा॥ १३ १/२ ॥
उस समय राजाकी सारी सेना रावणकी सेनाके साथ टक्कर लेकर उसी तरह नष्ट होने लगी, जैसे अग्निमें दी हुई आहुति पूर्णतः भस्म हो जाती है॥ १४ १/२ ॥
उस सेनाने बहुत देरतक युद्ध किया, बड़ा पराक्रम दिखाया; परंतु तेजस्वी रावणका सामना करके वह बहुत थोड़ी संख्यामें शेष रह गयी और अन्ततोगत्वा जैसे पतिङ्गे आगमें जलकर भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार कालके गालमें चली गयी॥ १५-१६ ॥
राजाने देखा, मेरी विशाल सेना उसी प्रकार नष्ट होती चली जा रही है, जैसे जलसे भरी हुई सैकड़ों नदियाँ महासागरके पास पहुँचकर उसीमें विलीन हो जाती हैं॥ १७ ॥
तब महाराज अनरण्य क्रोधसे मूर्छित हो अपने इन्द्रधनुषके समान महान् शरासनको टंकारते हुए रावणका सामना करनेके लिये आये॥ १८ ॥
फिर तो जैसे सिंहको देखकर मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार मारीच, शुक, सारण तथा प्रहस्त—ये चारों राक्षस मन्त्री राजा अनरण्यसे परास्त होकर भाग खड़े हुए॥
तत्पश्चात् इक्ष्वाकुवंशको आनन्दित करनेवाले राजा अनरण्यने राक्षसराज रावणके मस्तकपर आठ सौ बाण मारे॥ २० ॥
परंतु जैसे बादलोंसे पर्वतशिखरपर गिरती हुई जलधाराएँ उसे क्षति नहीं पहुँचातीं, उसी प्रकार वे बरसते हुए बाण उस निशाचरके शरीरपर कहीं घाव न कर सके॥ २१ ॥
इसके बाद राक्षसराजने कुपित होकर राजाके मस्तकपर एक तमाचा मारा। इससे आहत होकर राजा रथसे नीचे गिर पड़े॥ २२ ॥
जैसे वनमें वज्रपातसे दग्ध हुआ साखूका वृक्ष धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार राजा अनरण्य व्याकुल हो भूमिपर गिरे और थर-थर काँपने लगे॥ २३ ॥
यह देख रावण जोर-जोरसे हँस पड़ा और उन इक्ष्वाकुवंशी नरेशसे बोला—'इस समय मेरे साथ युद्ध करके तुमने क्या फल प्राप्त किया है?'॥ २४ ॥
'नरेश्वर! तीनों लोकोंमें कोई ऐसा वीर नहीं है, जो मुझे द्वन्द्वयुद्ध दे सके। जान पड़ता है तुमने भोगोंमें अधिक आसक्त रहनेके कारण मेरे बल-पराक्रमको नहीं सुना था'॥ २५ ॥
राजाकी प्राणशक्ति क्षीण हो रही थी। उन्होंने इस प्रकार बातें करनेवाले रावणका वचन सुनकर कहा— ‘राक्षसराज! अब यहाँ क्या किया जा सकता है? क्योंकि कालका उल्लङ्घन करना अत्यन्त दुष्कर है॥ २६ ॥
‘राक्षस! तू अपने मुँहसे अपनी प्रशंसा कर रहा है; किंतु तूने जो आज मुझे पराजित किया है, इसमें काल ही कारण है। वास्तवमें कालने ही मुझे मारा है। तू तो मेरी मृत्युमें निमित्तमात्र बन गया है॥ २७ ॥
‘मेरे प्राण जा रहे हैं, अतः इस समय मैं क्या कर सकता हूँ? निशाचर! मुझे संतोष है कि मैंने युद्धसे मुँह नहीं मोड़ा। युद्ध करता हुआ ही मैं तेरे हाथसे मारा गया हूँ॥ २८ ॥
‘परंतु राक्षस! तूने अपने व्यङ्ग्यपूर्ण वचनसे इक्ष्वाकुकुलका अपमान किया है, इसलिये मैं तुझे शाप दूँगा—तेरे लिये अमङ्गलजनक बात कहूँगा। यदि मैंने दान, पुण्य, होम और तप किये हों, यदि मेरे द्वारा धर्मके अनुसार प्रजाजनोंका ठीक-ठीक पालन हुआ हो तो मेरी बात सत्य होकर रहे॥ २९ ॥
‘महात्मा इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंके इस वंशमें ही दशरथनन्दन श्रीराम प्रकट होंगे, जो तेरे प्राणोंका अपहरण करेंगे’॥ ३० ॥
राजाके इस प्रकार शाप देते ही मेघके समान गम्भीर स्वरमें देवताओंकी दुन्दुभि बज उठी और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी॥ ३१ ॥
राजाधिराज श्रीराम! तदनन्तर राजा अनरण्य स्वर्गलोकको सिधारे। उनके स्वर्गगामी हो जानेपर राक्षस रावण वहाँसे अन्यत्र चला गया॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १९ ॥
बीसवाँ सर्ग
बीसवाँ सर्ग
नारदजीका रावणको समझाना, उनके कहनेसे रावणका युद्धके लिये यमलोकको जाना तथा नारदजीका इस युद्धके विषयमें विचार करना
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) इसके बाद राक्षसराज रावण मनुष्योंको भयभीत करता हुआ पृथ्वीपर विचरने लगा। एक दिन पुष्पकविमानसे यात्रा करते समय उसे बादलोंके बीचमें मुनिश्रेष्ठ देवर्षि नारदजी मिले॥ १ ॥
निशाचर दशग्रीवने उनका अभिवादन करके कुशल-समाचारकी जिज्ञासा की और उनके आगमनका कारण पूछा—॥ २ ॥
तब बादलोंकी पीठपर खड़े हुए अमित कान्तिमान् महातेजस्वी देवर्षि नारदने पुष्पकविमानपर बैठे हुए रावणसे कहा—॥ ६ ॥
‘उत्तम कुलमें उत्पन्न विश्रवणकुमार राक्षसराज रावण! सौम्य! ठहरो, मैं तुम्हारे बढ़े हुए बल-विक्रमसे बहुत प्रसन्न हूँ॥ ४ ॥
‘दैत्योंका विनाश करनेवाले अनेक संग्राम करके भगवान् विष्णुने तथा गन्धर्वों और नागोंको पददलित करनेवाले युद्धोंद्वारा तुमने मुझे समानरूपसे संतुष्ट किया है॥ ५ ॥
‘इस समय यदि तुम सुनोगे तो मैं तुमसे कुछ सुननेयोग्य बात कहूँगा। तात! मेरे मुँहसे निकली हुई उस बातको सुननेके लिये तुम अपने चित्तको एकाग्र करो॥ ६ ॥
‘तात! तुम देवताओंके लिये भी अवध्य होकर इस भूलोकके निवासियोंका वध क्यों कर रहे हो? यहाँके प्राणी तो मृत्युके अधीन होनेके कारण स्वयं ही मरे हुए हैं; फिर तुम भी इन मरे हुओंको क्यों मार रहे हो?॥ ७ ॥
‘देवता, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व और राक्षस भी जिसे नहीं मार सकते, ऐसे विख्यात वीर होकर भी तुम इस मनुष्यलोकको क्लेश पहुँचाओ, यह कदापि तुम्हारे योग्य नहीं है॥ ८ ॥
‘जो सदा अपने कल्याण-साधनमें मूढ़ हैं, बड़ी-बड़ी विपत्तियोंसे घिरे हुए हैं और बुढ़ापा तथा सैकड़ों रोगोंसे युक्त हैं, ऐसे लोगोंको कोई भी वीर पुरुष कैसे मार सकता है?॥ ९ ॥
‘जो नाना प्रकारके अनिष्टोंकी प्राप्तिसे जहाँ कहीं भी पीड़ित है, उस मनुष्यलोकमें आकर कौन बुद्धिमान् वीर पुरुष युद्धके द्वारा मनुष्योंके वधमें अनुरक्त होगा?॥
‘यह लोक तो यों ही भूख, प्यास और जरा आदिसे क्षीण हो रहा है तथा विषाद और शोकमें डूबकर अपनी विवेक-शक्ति खो बैठा है। दैवके मारे हुए इस मर्त्यलोकका तुम विनाश न करो॥ ११ ॥
‘महाबाहु राक्षसराज! देखो तो सही, यह मनुष्यलोक ज्ञानशून्य होनेके कारण मूढ़ होनेपर भी किस तरह नाना प्रकारके क्षुद्र पुरुषार्थोंमें आसक्त है? इसे इस बातका भी पता नहीं है कि कब दुःख और सुख आदि भोगनेका अवसर आयेगा?॥ १२ ॥
‘यहाँ कहीं कुछ मनुष्य तो आनन्दमग्न होकर गाजे-बाजे और नाच आदिका सेवन करते हैं—उनके द्वारा मन बहलाते हैं तथा कहीं कितने ही लोग दुःखसे पीड़ित हो नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए रोते रहते हैं॥ १३ ॥
‘माता, पिता तथा पुत्रके स्नेहसे और पत्नी तथा भाऽइके सम्बन्धमें नाना प्रकारके मनसूबे बाँधनेके कारण यह मनुष्यलोक मोहग्रस्त हो परमार्थसे भ्रष्ट हो रहा है। इसे अपने बन्धनजनित क्लेशका अनुभव ही नहीं होता है॥ १४ ॥
‘इस प्रकार जो मोह (अज्ञान)-के कारण परम पुरुषार्थसे वञ्चित हो गया है, ऐसे मनुष्य-लोकको क्लेश पहुँचाकर तुम्हें क्या मिलेगा? सौम्य! तुमने मनुष्य-लोकको तो जीत ही लिया है, इसमें कोऽइ भी संशय नहीं है॥ १५ ॥
‘शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले पुलस्त्यनन्दन! इन सब मनुष्योंको यमलोकमें अवश्य जाना पड़ता है। अतः यदि शक्ति हो तो तुम यमराजको अपने काबूमें करो। उन्हें जीत लेनेपर तुम सबको जीत सकते हो; इसमें संशय नहीं है’॥ १६ १/२ ॥
नारदजीके ऐसा कहनेपर लङ्कापति रावण अपने तेजसे उद्दीप्त होनेवाले उन देवर्षिको प्रणाम करके हँसता हुआ बोला—॥ १७ १/२ ॥
‘महर्षे! आप देवताओं और गन्धर्वोंके लोकमें विहार करनेवाले हैं। युद्धके दृश्य देखना आपको बहुत ही प्रिय है। मैं इस समय दिग्विजयके लिये रसातलमें जानेको उद्यत हूँ॥ १८ १/२ ॥
‘फिर तीनों लोकोंको जीतकर नागों और देवताओंको अपने वशमें करके अमृतकी प्राप्तिके लिये रसनिधि समुद्रका मन्थन करूँगा’॥ १९ १/२ ॥
यह सुनकर देवर्षि भगवान् नारदने कहा— 'शत्रुसूदन! यदि तुम रसातलको जाना चाहते हो तो इस समय उसका मार्ग छोड़कर दूसरे रास्तेसे कहाँ जा रहे हो? दुर्धर्ष वीर! रसातलका यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है और यमराजकी पुरीसे होकर ही जाता है'॥
नारदजीके ऐसा कहनेपर दशमुख रावण शरद्-ऋतुके बादलकी भाँति अपना उज्ज्वल हास बिखेरता हुआ बोला— 'देवर्षे! मैंने आपकी बात स्वीकार कर ली।' इसके बाद उसने यों कहा —॥ २२ १/२ ॥
'ब्रह्मन्! अब यमराजका वध करनेके लिये उद्यत होकर मैं उस दक्षिण दिशाको जाता हूँ, जहाँ सूर्यपुत्र राजा यम निवास करते हैं॥ २३ १/२ ॥
'प्रभो! भगवन्! मैंने युद्धकी इच्छासे क्रोधपूर्वक प्रतिज्ञा की है कि चारों लोकपालोंको परास्त करूँगा॥
'अतः मैं यहाँसे यमपुरीको प्रस्थान कर रहा हूँ। संसारके प्राणियोंको मौतका कष्ट देनेवाले सूर्यपुत्र यमको स्वयं ही मृत्युसे संयुक्त कर दूँगा'॥ २५ १/२ ॥
ऐसा कहकर दशग्रीवने मुनिको प्रणाम किया और मन्त्रियोंके साथ वह दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया॥
उसके चले जानेपर धूमरहित अग्निके समान महातेजस्वी विप्रवर नारदजी दो घड़ीतक ध्यानमग्न हो इस प्रकार विचार करने लगे—॥ २७ १/२ ॥
'आयु क्षीण होनेपर जिनके द्वारा धर्मपूर्वक इन्द्रसहित तीनों लोकोंके चराचर प्राणी क्लेशमें डाले जाते—दण्डित होते हैं, वे कालस्वरूप यमराज इस रावणके द्वारा कैसे जीते जायेंगे?॥ २८ १/२ ॥
'जो जीवोंके दान और कर्मके साक्षी हैं, जिनका तेज द्वितीय अग्निके समान है, जिन महात्मासे चेतना पाकर सम्पूर्ण जीव नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं, जिनके भयसे पीड़ित हो तीनों लोकोंके प्राणी उनसे दूर भागते हैं, उन्हींके पास यह राक्षसराज स्वयं ही कैसे जायगा?॥ २९-३० १/२ ॥
'जो त्रिलोकीको धारण-पोषण करनेवाले तथा पुण्य और पापके फल देनेवाले हैं और जिन्होंने तीनों लोकोंपर विजय पायी है, उन्हीं कालदेवको यह राक्षस कैसे जीतेगा? काल ही
सबका साधन है। यह राक्षस कालके अतिरिक्त दूसरे किस साधनका सम्पादन करके उस कालपर विजय प्राप्त करेगा?॥ ३१-३२ ॥
‘अब तो मेरे मनमें बड़ा कौतूहल उत्पन्न हो गया है, अतः इन यमराज और राक्षसराजका युद्ध देखनेके लिये मैं स्वयं भी यमलोकको जाऊँगा’॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
२० ॥
इक्कीसवाँ सर्ग
इक्कीसवाँ सर्ग
रावणका यमलोकपर आक्रमण और उसके द्वारा यमराजके सैनिकोंका संहार
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) ऐसा विचारकर शीघ्र चलनेवाले विप्रवर नारदजी रावणके आक्रमणका समाचार बतानेके लिये यमलोकमें गये॥ १ ॥
वहाँ जाकर उन्होंने देखा, यमदेवता अग्निको साक्षीके रूपमें सामने रखकर बैठे हैं और जिस प्राणीका जैसा कर्म है, उसीके अनुसार फल देनेकी व्यवस्था कर रहे हैं॥ २ ॥
महर्षि नारदको वहाँ आया देख यमराजने आतिथ्य-धर्मके अनुसार उनके लिये अर्घ्य आदि निवेदन करके कहा—॥ ३ ॥
‘देवताओं और गन्धर्वोंसे सेवित देवर्षे! कुशल तो है न ? धर्मका नाश तो नहीं हो रहा है? आज यहाँ आपके शुभागमनका क्या उद्देश्य है?’॥ ४ ॥
तब भगवान् नारद मुनि बोले—‘पितृराज! सुनिये— मैं एक आवश्यक बात बता रहा हूँ, आप सुनकर उसके प्रतीकारका भी कोई उपाय कर लें। यद्यपि आपको जीतना अत्यन्त कठिन है, तथापि यह दशग्रीव नामक निशाचर अपने पराक्रमोंद्वारा आपको वशमें करनेके लिये यहाँ आ रहा है॥ ५-६ ॥
‘प्रभो! इसी कारणसे मैं तुरंत यहाँ आया हूँ कि आपको इस सङ्कटकी सूचना दे दूँ, परंतु आप तो कालदण्डरूपी आयुधको धारण करनेवाले हैं, आपकी उस राक्षसके आक्रमणसे क्या हानि होगी?’॥ ७ ॥
इस प्रकारकी बातें हो ही रही थीं कि उस राक्षसका उदित हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमान दूरसे आता दिखायी दिया॥ ८ ॥
महाबली रावण पुष्पककी प्रभासे उस समस्त प्रदेशको अन्धकारशून्य करके अत्यन्त निकट आ गया॥
महाबाहु दशग्रीवने यमलोकमें आकर देखा कि यहाँ बहुत-से प्राणी अपने-अपने पुण्य तथा पापका फल भोग रहे हैं॥ १० ॥
उसने यमराजके सेवकोंके साथ उनके सैनिकोंको भी देखा। उसकी दृष्टिमें यमयातनाका दृश्य भी आया। घोर रूपधारी उग्र प्रकृतिवाले भयानक यमदूत कितने ही प्राणियोंको मारते और
क्लेश पहुँचाते थे, जिससे वे बड़े जोर-जोरसे चीखते और चिल्लाते थे॥ ११-१२ ॥
किन्हींको कीड़े खा रहे थे और कितनोंको भयंकर कुत्ते नोच रहे थे। वे सब-के-सब दुःखी हो-होकर कानोंको पीड़ा देनेवाला भयानक चीत्कार करते थे॥ १३ ॥
किन्हींको बारम्बार रक्तसे भरी हुई वैतरणी नदी पार करनेके लिये विवश किया जाता था और कितनोंको तपायी हुई बालुकाओंपर बार-बार चलाकर संतप्त किया जाता था॥ १४ ॥
कुछ पापी असिपत्र-वनमें, जिसके पत्ते तलवारकी धारके समान तीखे थे, विदीर्ण किये जा रहे थे। किन्हींको रौरव नरकमें डाला जाता था। कितनोंको खारे जलसे भरी हुई नदियोंमें डुबाया जाता था और बहुतोंको छुरोंकी धारोंपर दौड़ाया जाता था। कोई प्राणी भूख और प्याससे तड़प रहे थे और थोड़े-से जलकी याचना कर रहे थे। कोई शवके समान कङ्काल, दीन, दुर्बल, उदास और खुले बालोंसे युक्त दिखायी देते थे। कितने ही प्राणी अपने अङ्गोंमें मैल और कीचड़ लगाये दयनीय तथा रूखे शरीरसे चारों ओर भाग रहे थे। इस तरहके सैकड़ों और हजारों जीवोंको रावणने मार्गमें यातना भोगते देखा॥ १५–१७ ॥
दूसरी ओर रावणने देखा कुछ पुण्यात्मा जीव अपने पुण्यकर्मोंके प्रभावसे अच्छे-अच्छे घरोंमें रहकर संगीत और वाद्योंकी मनोहर ध्वनिसे आनन्दित हो रहे हैं॥ १८ ॥
गोदान करनेवाले गोरसको, अन्न देनेवाले अन्नको और गृह प्रदान करनेवाले लोग गृहको पाकर अपने सत्कर्मोंका फल भोग रहे हैं॥ १९ ॥
दूसरे धर्मात्मा पुरुष वहाँ सुवर्ण, मणि और मुक्ताओंसे अलंकृत हो यौवनके मदसे मत्त रहनेवाली सुन्दरी स्त्रियोंके साथ अपनी अङ्गकान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं॥ २० ॥
महाबाहु राक्षसराज रावणने इन सबको देखा। देखकर बलवान् राक्षस दशग्रीवने अपने पाप-कर्मोंके कारण यातना भोगनेवाले प्राणियोंको पराक्रमद्वारा बलपूर्वक मुक्त कर दिया॥ २१-२२ ॥
इससे थोड़ी देरतक उन पापियोंको बड़ा सुख मिला, उसके मिलनेकी न तो उन्हें सम्भावना थी और न उसके विषयमें वे कुछ सोच ही सके थे। उस महान् राक्षसके द्वारा जब सभी प्रेत यातनासे मुक्त कर दिये गये, तब उन प्रेतोंकी रक्षा करनेवाले यमदूत अत्यन्त कुपित हो राक्षसराजपर टूट पड़े॥ २३ १/२ ॥
फिर तो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओरसे धावा करनेवाले धर्मराजके शूरवीर योद्धाओंका महान् कोलाहल प्रकट हुआ॥ २४ १/२ ॥
जैसे फूलपर झुंड-के-झुंड भौंरे जुट जाते हैं, उसी प्रकार पुष्पकविमानपर सैकड़ों-हजारों शूरवीर यमदूत चढ़ आये और प्रासों, परिघों, शूलों, मूसलों, शक्तियों तथा तोमरोंद्वारा उसे तहस-नहस करने लगे। उन्होंने पुष्पकविमानके आसन, प्रासाद, वेदी और फाटक शीघ्र ही तोड़ डाले॥ २५-२६ १/२ ॥
देवताओंका अधिष्ठानभूत वह पुष्पकविमान उस युद्धमें तोड़ा जानेपर भी ब्रह्माजीके प्रभावसे ज्यों-कात्यों हो जाता था; क्योंकि वह नष्ट होनेवाला नहीं था॥ २७ १/२ ॥
महामना यमकी विशाल सेना असंख्य थी। उसमें सैकड़ों-हजारों शूरवीर आगे बढ़कर युद्ध करनेवाले थे॥
यमदूतोंके आक्रमण करनेपर रावणके वे महावीर मन्त्री तथा स्वयं राजा दशग्रीव भी वृक्षों, पर्वत-शिखरों तथा यमलोकके सैकड़ों प्रासादोंको उखाड़कर उनके द्वारा पूरी शक्ति लगाकर इच्छानुसार युद्ध करने लगे॥
राक्षसराजके मन्त्रियोंके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे थे। सम्पूर्ण शस्त्रोंके आघातसे वे घायल हो चुके थे। फिर भी उन्होंने बड़ा भारी युद्ध किया॥ ३१ ॥
महाबाहु श्रीराम! यमराज तथा रावणके वे महाभाग मन्त्री एक-दूसरेपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा बड़े जोरसे आघात-प्रत्याघात करने लगे॥ ३२ ॥
तत्पश्चात् यमराजके महाबली योद्धाओंने रावणके मन्त्रियोंको छोड़कर उस दशग्रीवके ही ऊपर शूलोंकी वर्षा करते हुए धावा किया॥ ३३ ॥
रावणका सारा शरीर शस्त्रोंकी मारसे जर्जर हो गया। वह खूनसे लथपथ हो गया और पुष्पक-विमानके ऊपर फूले हुए अशोक वृक्षके समान प्रतीत होने लगा॥ ३४ ॥
तब बलवान् रावणने अपने अस्त्र-बलसे यमराजके सैनिकोंपर शूल, गदा, प्रास, शक्ति, तोमर, बाण, मूसल, पत्थर और वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ की॥ ३५ ॥
वृक्षों, शिलाखण्डों और शस्त्रोंकी वह अत्यन्त भयंकर वृष्टि भूतलपर खड़े हुए यमराजके सैनिकोंपर पड़ने लगी॥ ३६ ॥
वे सैनिक भी सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें एकत्र हो उसके सारे आयुधोंको छिन्न-भिन्न करके उसके द्वारा छोड़े हुए दिव्यास्त्रका भी निवारण कर एकमात्र उस भयंकर राक्षसको ही मारने लगे॥ ३७ ॥
जैसे बादलोंके समूह पर्वतपर सब ओरसे जलकी धाराएँ गिराते हैं, उसी प्रकार यमराजके समस्त सैनिकोंने रावणको चारों ओरसे घेरकर उसे भिन्दिपालों और शूलोंसे छेदना आरम्भ कर दिया। उसको दम लेनेकी भी फुरसत नहीं दी॥ ३८ ॥
रावणका कवच कटकर गिर पड़ा। उसके शरीरसे रक्तकी धारा बहने लगी। वह उस रक्तसे नहा उठा और कुपित हो पुष्पकविमान छोड़कर पृथ्वीपर खड़ा हो गया॥ ३९ ॥
वहाँ दो घड़ीके बाद उसने अपने-आपको सँभाला। फिर तो वह धनुष और बाण हाथमें ले बढ़े हुए उत्साहसे सम्पन्न हो समराङ्गणमें कुपित हुए यमराजके समान खड़ा हुआ॥ ४० ॥
उसने अपने धनुषपर पाशुपत नामक दिव्य अस्त्रका संधान किया और उन सैनिकोंसे ‘ठहरो-ठहरो’ कहते हुए उस धनुषको खींचा॥ ४१ ॥
जैसे भगवान् शङ्करने त्रिपुरासुरपर पाशुपतास्त्रका प्रयोग किया था, उसी प्रकार उस इन्द्रद्रोही रावणने अपने धनुषको कानतक खींचकर वह बाण छोड़ दिया॥
उस समय उसके बाणका रूप धूम और ज्वालाओंके मण्डलसे युक्त हो ग्रीष्म-ऋतुमें जंगलको जलानेके लिये चारों ओर फैलते हुए दावानलके समान प्रतीत होने लगा॥ ४३ ॥
रणभूमिमें ज्वालामालाओंसे घिरा हुआ वह बाण धनुषसे छूटते ही वृक्षों और झाड़ियोंको जलाता हुआ तीव्र गतिसे आगे बढ़ा और उसके पीछे-पीछे मांसाहारी जीव-जन्तु चलने लगे॥ ४४ ॥
उस युद्धस्थलमें यमराजके वे सारे सैनिक पाशुपतास्त्रके तेजसे दग्ध हो इन्द्रध्वजके समान नीचे गिर पड़े॥ ४५ ॥
तदनन्तर अपने मन्त्रियोंके साथ वह भयानक पराक्रमी राक्षस पृथ्वीको कम्पित करता हुआ-सा बड़े जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २१ ॥
बाईसवाँ सर्ग
बाईसवाँ सर्ग
यमराज और रावणका युद्ध, यमका रावणके वधके लिये उठाये हुए कालदण्डको ब्रह्माजीके कहनेसे लौटा लेना, विजयी रावणका यमलोकसे प्रस्थान
(अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन!) रावणके उस महानादको सुनकर सूर्यपुत्र भगवान् यमने यह समझ लिया कि ‘शत्रु विजयी हुआ और मेरी सेना मारी गयी’॥ १ ॥
‘मेरे योद्धा मारे गये’—यह जानकर यमराजके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे उतावले होकर सारथिसे बोले—‘मेरा रथ ले आओ’॥ २ ॥
तब उनके सारथिने तत्काल एक दिव्य एवं विशाल रथ वहाँ उपस्थित कर दिया और वह सामने विनीतभावसे खड़ा हो गया। फिर वे महातेजस्वी यम देवता उस रथपर आरूढ़ हुए॥ ३ ॥
उनके आगे प्रास और मुद्गर हाथमें लिये साक्षात् मृत्यु-देवता खड़े थे, जो प्रवाहरूपसे सदा बने रहनेवाले इस समस्त त्रिभुवनका संहार करते हैं॥ ४ ॥
उनके पार्श्वभागमें कालदण्ड मूर्तिमान् होकर खड़ा हुआ, जो उनका मुख्य एवं दिव्य आयुध है। वह अपने तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था॥ ५ ॥
उनके दोनों बगलमें छिद्ररहित कालपाश खड़े थे और जिसका स्पर्श अग्निके समान दुःसह है, वह मुद्गर भी मूर्तिमान् होकर उपस्थित था॥ ६ ॥
समस्त लोकोंको भय देनेवाले साक्षात् कालको कुपित हुआ देख तीनों लोकोंमें हलचल मच गयी। समस्त देवता काँप उठे॥ ७॥
तदनन्तर सारथिने सुन्दर कान्तिवाले घोड़ोंको हाँका और वह रथ भयानक आवाज करता हुआ उस स्थानपर जा पहुँचा, जहाँ राक्षसराज रावण खड़ा था॥ ८ ॥
इन्द्रके घोड़ोंके समान तेजस्वी और मनके समान शीघ्रगामी उन घोड़ोंने यमराजको क्षणभरमें उस स्थानपर पहुँचा दिया, जहाँ वह युद्ध चल रहा था॥ ९ ॥
मृत्युदेवताके साथ उस विकराल रथको आया देख राक्षसराजके सचिव सहसा वहाँसे भाग खड़े हुए॥ १० ॥
उनकी शक्ति थोड़ी थी। इसलिये वे भयसे पीड़ित हो अपना होश-हवाश खो बैठे और ‘हम यहाँ युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हैं’ ऐसा कहकर विभिन्न दिशाओंमें भाग गये॥ ११ ॥
परंतु समस्त संसारको भयभीत करनेवाले वैसे विकराल रथको देखकर भी दशग्रीवके मनमें न तो क्षोभ हुआ और न भय ही॥ १२ ॥
अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए यमराजने रावणके पास पहुँचकर शक्ति और तोमरोंका प्रहार किया तथा रावणके मर्मस्थानोंको छेद डाला॥ १३ ॥
तब रावणने भी सँभलकर यमराजके रथपर बाणोंकी झड़ी लगा दी, मानो मेघ जलकी वर्षा कर रहा हो॥ १४ ॥
तदनन्तर उसकी विशाल छातीपर सैकड़ों महाशक्तियोंकी मार पड़ने लगी। वह राक्षस शल्योंके प्रहारसे इतना पीड़ित हो चुका था कि यमराजसे बदला लेनेमें समर्थ न हो सका॥ १५ ॥
इस प्रकार शत्रुसूदन यमने नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए रणभूमिमें लगातार सात रातोंतक युद्ध किया। इससे उनका शत्रु रावण अपनी सुध-बुध खोकर युद्धसे विमुख हो गया॥ १६ ॥
वीर रघुनन्दन! वे दोनों योद्धा समरभूमिसे पीछे हटनेवाले नहीं थे और दोनों ही अपनी विजय चाहते थे; इसलिये उन यमराज और राक्षस दोनोंमें उस समय घोर युद्ध होने लगा॥ १७ ॥
तब देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षिगण प्रजापतिको आगे करके उस समराङ्गणमें एकत्र हुए॥ १८ ॥
उस समय राक्षसोंके राजा रावण तथा प्रेतराज यमके युद्धपरायण होनेपर समस्त लोकोंके प्रलयका समय उपस्थित हुआ-सा जान पड़ता था॥ १९ ॥
राक्षसराज रावण भी इन्द्रकी अशनिके सदृश अपने धनुषको खींचकर बाणोंकी वर्षा करने लगा, इससे आकाश ठसाठस भर गया—उसमें तिलभर भी खाली जगह नहीं रह गयी॥ २० ॥
उसने चार बाण मारकर मृत्युको और सात बाणोंसे यमके सारथिको भी पीड़ित कर दिया। फिर जल्दी-जल्दी लाख बाण मारकर यमराजके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी॥ २१ ॥
तब यमराजके क्रोधकी सीमा न रही। उनके मुखसे वह रोष अग्नि बनकर प्रकट हुआ। वह आग ज्वालामालाओंसे मण्डित, श्वासवायुसे संयुक्त तथा धूमसे आच्छन्न दिखायी देती थी॥ २२ ॥
देवताओं तथा दानवोंके समीप यह आश्चर्यजनक घटना देखकर रोषावेशसे भरे हुए मृत्यु एवं कालको बड़ा हर्ष हुआ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् मृत्युदेवने अत्यन्त कुपित होकर वैवस्वत यमसे कहा—‘आप मुझे छोड़िये—आज्ञा दीजिये, मैं समराङ्गणमें इस पापी राक्षसको अभी मारे डालता हूँ॥
‘महाराज! यह मेरी स्वभावसिद्ध मर्यादा है कि मुझसे भिड़कर यह राक्षस जीवित नहीं रह सकता। श्रीमान् हिरण्यकशिपु, नमुचि, शम्बर, निसन्दि, धूमकेतु, विरोचनकुमार बलि, शम्भु नामक दैत्य, महाराज वृत्र तथा बाणासुर, कितने ही शास्त्रवेत्ता राजर्षि, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग, ऋषि, सर्प, दैत्य, यक्ष, अप्सराओंके समुदाय, युगान्तकालमें समुद्रों, पर्वतों, सरिताओं और वृक्षोंसहित पृथ्वी—ये सब मेरे द्वारा क्षयको प्राप्त हुए हैं। ये तथा दूसरे बहुतेरे बलवान् एवं दुर्जय वीर भी मेरे द्वारा विनाशको प्राप्त हो चुके हैं, फिर यह निशाचर किस गिनतीमें है?॥ २५—२९ ॥
‘धर्मज्ञ! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैं इसे अवश्य मार डालूँगा। जिसे मैं देख लूँ, वह कोई बलवान् होनेपर भी जीवित नहीं रह सकता॥ ३० ॥
‘काल! मेरी दृष्टि पड़नेपर वह रावण दो घड़ी भी जीवन धारण नहीं कर सकेगा। मेरे इस कथनका तात्पर्य केवल अपने बलको प्रकाशित करना मात्र नहीं है; अपितु यह स्वभावसिद्ध मर्यादा है’॥ ३१ ॥
‘मृत्युकी यह बात सुनकर प्रतापी धर्मराजने उससे कहा—‘तुम ठहरो, मैं ही इसे मारे डालता हूँ’॥ ३२ ॥
तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखें करके सामर्थ्यशाली वैवस्वत यमने अपने अमोघ कालदण्डको हाथसे उठाया॥
उस कालदण्डके पार्श्वभागोंमें कालपाश प्रतिष्ठित थे और वज्र एवं अग्नितुल्य तेजस्वी मुद्गर भी मूर्तिमान् होकर स्थित था॥ ३४ ॥
वह कालदण्ड दृष्टिमें आनेमात्रसे प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण कर लेता था। फिर जिससे उसका स्पर्श हो जाय अथवा जिसके ऊपर उसकी मार पड़े, उस पुरुषके प्राणोंका संहार करना उसके लिये कौन बड़ी बात है?॥ ३५ ॥
ज्वालाओंसे घिरा हुआ वह कालदण्ड उस राक्षसको दग्ध-सा कर देनेके लिये उद्यत था। बलवान् यमराजके हाथमें लिया हुआ वह महान् आयुध अपने तेजसे प्रकाशित हो उठा॥ ३६ ॥
उसके उठते ही समराङ्गणमें खड़े हुए समस्त सैनिक भयभीत होकर भाग चले। कालदण्ड उठाये यमराजको देखकर समस्त देवता भी क्षुब्ध हो उठे॥ ३७ ॥
यमराज उस दण्डसे रावणपर प्रहार करना ही चाहते थे कि साक्षात् पितामह ब्रह्मा वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने दर्शन देकर इस प्रकार कहा— ॥ ३८ ॥
‘अमित पराक्रमी महाबाहु वैवस्वत! तुम इस कालदण्डके द्वारा निशाचर रावणका वध न करो॥ ३९ ॥
‘देवप्रवर! मैंने इसे देवताओंद्वारा न मारे जा सकनेका वर दिया है। मेरे मुँहसे जो बात निकल चुकी है, उसे तुम्हें असत्य नहीं करना चाहिये॥ ४० ॥
‘जो देवता अथवा मनुष्य मुझे असत्यवादी बना देगा, उसे समस्त त्रिलोकीको मिथ्याभाषी बनानेका दोष लगेगा, इसमें संशय नहीं है॥ ४१ ॥
‘यह कालदण्ड तीनों लोकोंके लिये भयंकर तथा रौद्र है। तुम्हारे द्वारा क्रोधपूर्वक छोड़ा जानेपर यह प्रिय और अप्रिय जनोंमें भेदभाव न रखता हुआ सामने पड़ी हुई समस्त प्रजाका संहार कर डालेगा॥ ४२ ॥
‘इस अमित तेजस्वी कालदण्डको भी पूर्वकालमें मैंने ही बनाया था। यह किसी भी प्राणीपर व्यर्थ नहीं होता है। इसके प्रहारसे सबकी मृत्यु हो जाती है॥ ४३ ॥
‘अतः सौम्य! तुम इसे रावणके मस्तकपर न गिराओ। इसकी मार पड़नेपर कोई एक मुहूर्त भी जीवित नहीं रह सकता॥ ४४ ॥
‘कालदण्ड पड़नेपर यदि यह राक्षस रावण न मरा तो अथवा मर गया तो—दोनों ही दशाओंमें मेरी बात असत्य होगी॥ ४५ ॥
‘इसलिये हाथमें उठाये हुए इस कालदण्डको तुम लङ्कापति रावणकी ओरसे हटा लो। यदि समस्त लोकोंपर तुम्हारी दृष्टि है तो आज रावणकी रक्षा करके मुझे सत्यवादी बनाओ’॥ ४६ ॥
ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा यमराजने उत्तर दिया— ‘यदि ऐसी बात है तो लीजिये मैंने इस दण्डको हटा लिया। आप हम सब लोगोंके प्रभु हैं (अतः आपकी आज्ञाका पालन करना हमारा कर्तव्य है)॥ ४७ ॥
‘परंतु वरदानसे युक्त होनेके कारण यदि मेरे द्वारा इस निशाचरका वध नहीं हो सकता तो इस समय इसके साथ युद्ध करके ही मैं क्या करूँगा?॥ ४८ ॥
‘इसलिये अब मैं इसकी दृष्टिसे ओझल होता हूँ, यों कहकर यमराज रथ और घोड़ोंसहित वहीं अन्तर्धान हो गये॥ ४९ ॥
इस प्रकार यमराजको जीतकर अपने नामकी घोषणा करके दशग्रीव रावण पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो यमलोकसे चला गया॥ ५० ॥
तदनन्तर सूर्यपुत्र यमराज तथा महामुनि नारदजी ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गमें गये॥ ५१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २२ ॥