श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
पैंतीसवाँ सर्ग
पैंतीसवाँ सर्ग
माल्यवान्का रावणको श्रीरामसे संधि करनेके लिये समझाना
शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले महाबाहु श्रीरामने शङ्खध्वनिसे मिश्रित हो तुमुल नाद करनेवाली भेरीकी आवाजके साथ लङ्कापर आक्रमण किया॥ १ ॥
उस भेरीनादको सुनकर राक्षसराज रावणने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करनेके पश्चात् अपने मन्त्रियोंकी ओर देखा॥ २ ॥
उन सब मन्त्रियोंको सम्बोधित करके जगत्को संताप देनेवाले, महाबली, क्रूर राक्षसराज रावणने सारी सभाको प्रतिध्वनित करके किसीपर आक्षेप न करते हुए कहा— ॥ ३ १/२ ॥
‘आपलोगोंने रामके पराक्रम, बल-पौरुष तथा समुद्र-लङ्घनकी जो बात बतायी है, वह सब मैंने सुन ली; परंतु मैं तो आपलोगोंको भी, जो इस समय रामके पराक्रमकी बातें जानकर चुपचाप एक-दूसरेका मुँह देख रहे हैं, संग्रामभूमिमें सत्यपराक्रमी वीर समझता हूँ’॥ ४-५ ॥
रावणके इस आक्षेपपूर्ण वचनको सुननेके पश्चात् महाबुद्धिमान् माल्यवान् नामक राक्षसने, जो रावणका नाना था, इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥
‘राजन्! जो राजा चौदहों विद्याओंमें सुशिक्षित और नीतिका अनुसरण करनेवाला होता है, वह दीर्घकालतक राज्यका शासन करता है। वह शत्रुओंको भी वशमें कर लेता है॥ ७ ॥
‘जो समयके अनुसार आवश्यक होनेपर शत्रुओंके साथ संधि और विग्रह करता है तथा अपने पक्षकी वृद्धिमें लगा रहता है, वह महान् ऐश्वर्यका भागी होता है॥ ८ ॥
‘जिस राजाकी शक्ति क्षीण हो रही हो अथवा जो शत्रुके समान ही शक्ति रखता हो, उससे संधि कर लेनी चाहिये। अपनेसे अधिक या समान शक्तिवाले शत्रुका कभी अपमान न करे। यदि स्वयं ही शक्तिमें बढ़ा-चढ़ा हो, तभी शत्रुके साथ वह युद्ध ठाने॥ ९ ॥
‘इसलिये रावण! मुझे तो श्रीरामके साथ संधि करना ही अच्छा लगता है। जिसके लिये तुम्हारे ऊपर आक्रमण हो रहा है, वह सीता तुम श्रीरामको लौटा दो॥
‘देखो देवता, ऋषि और गन्धर्व सभी श्रीरामकी विजय चाहते हैं, अतः तुम उनसे विरोध न करो। उनके साथ संधि कर लेनेकी ही इच्छा करो॥ ११ ॥
‘भगवान् ब्रह्माने सुर और असुर दो ही पक्षोंकी सृष्टि की है। धर्म और अधर्म ही इनके आश्रय हैं॥ १२ ॥
‘सुना जाता है महात्मा देवताओंका पक्ष धर्म है। राक्षसराज! राक्षसों और असुरोंका पक्ष अधर्म है॥ १३ ॥
‘जब सत्ययुग होता है, तब धर्म बलवान् होकर अधर्मको ग्रस लेता है और जब कलियुग आता है, तब अधर्म ही धर्मको दबा देता है॥ १४ ॥
‘तुमने दिग्विजयके लिये सब लोकोंमें भ्रमण करते हुए महान् धर्मका नाश किया है और अधर्मको गले लगाया है, इसलिये हमारे शत्रु हमसे प्रबल हैं॥
‘तुम्हारे प्रमादसे बढ़ा हुआ अधर्भरूपी अजगर अब हमें निगल जाना चाहता है और देवताओंद्वारा पालित धर्म उनके पक्षकी वृद्धि कर रहा है॥ १६ ॥
‘विषयोंमें आसक्त होकर जो कुछ भी कर डालनेवाले तुमने जो मनमाना आचरण किया है, इससे अग्निके समान तेजस्वी ऋषियोंको बड़ा ही उद्वेग प्राप्त हुआ है॥ १७ ॥
‘उनका प्रभाव प्रज्वलित अग्निके समान दुर्धर्ष है। वे ऋषि-मुनि तपस्याके द्वारा अपने अन्तःकरणको शुद्ध करके धर्मके ही संग्रहमें तत्पर रहते हैं॥ १८ ॥
‘ये द्विजगण मुख्य-मुख्य यज्ञोंद्वारा यजन करते, विधिवत् अग्निमें आहुति देते और उच्च स्वरसे वेदोंका पाठ करते हैं॥ १९ ॥
‘उन्होंने राक्षसोंको अभिभूत करके वेदमन्त्रोंकी ध्वनिका विस्तार किया है, इसलिये ग्रीष्म ऋतुमें मेघकी भाँति राक्षस सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग खड़े हुए हैं॥ २० ॥
‘अग्नितुल्य तेजस्वी ऋषियोंके अग्निहोत्रसे प्रकट हुआ धूम दसों दिशाओंमें व्याप्त होकर राक्षसोंके तेजको हर लेता है॥ २१ ॥
‘भिन्न-भिन्न देशोंमें पुण्य कर्मोंमें ही लगे रहकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषिलोग जो तीव्र तपस्या करते हैं, वही राक्षसोंको संताप दे रही है॥ २२ ॥
‘तुमने देवताओं, दानवों और यक्षोंसे ही अवध्य होनेका वर प्राप्त किया है, मनुष्य आदिसे नहीं। परंतु यहाँ तो मनुष्य, वानर, रीछ और लंगूर आकर गरज रहे हैं। वे सब-के-सब हैं भी बड़े बलवान्, सैनिकशक्तिसे सम्पन्न तथा सुदृढ़ पराक्रमी॥ २३ ॥
‘नाना प्रकारके बहुत-से भयंकर उत्पातोंको लक्ष्य करके मैं तो इन समस्त राक्षसोंके विनाशका ही अवसर उपस्थित देख रहा हूँ॥ २४॥
‘घोर एवं भयंकर मेघ प्रचण्ड गर्जन-तर्जनके साथ लङ्कापर सब ओरसे गर्म खूनकी वर्षा कर रहे हैं॥ २५॥
‘घोड़े-हाथी आदि वाहन रो रहे हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रुविन्दु झर रहे हैं। दिशाएँ धूल भर जानेसे मलिन हो अब पहलेकी भाँति प्रकाशित नहीं हो रही हैं॥ २६॥
मांसभक्षी हिंसक पशु, गीदड़ और गीध भयंकर बोली बोलते हैं तथा लङ्काके उपवनमें घुसकर झुंड बनाकर बैठते हैं॥ २७॥
‘सपनेमें काले रंगकी स्त्रियाँ अपने पीले दाँत दिखाती हुँऽइ सामने आकर खड़ी हो जाती और प्रतिकूल बातें कहकर घरके सामान चुराती हुँऽइ जोर-जोरसे हँसती हैं॥ २८॥
‘घरोंमें जो बलिकर्म किये जाते हैं, उस बलि-सामग्रीको कुत्ते खा जाते हैं। गौओंसे गधे और नेवलोंसे चूहे पैदा होते हैं॥ २९॥
‘बाघोंके साथ बिलाव, कुत्तोंके साथ सूअर तथा राक्षसों और मनुष्योंके साथ किन्नर समागम करते हैं॥
‘जिनकी पाँखें सफेद और पंजे लाल हैं, वे कबूतर पक्षी दैवसे प्रेरित हो राक्षसोंका भावी विनाश सूचित करनेके लिये यहाँ सब ओर विचरते हैं॥ ३१॥
‘घरोंमें रहनेवाली सारिकाएँ कलहकी इच्छावाले दूसरे पक्षियोंसे चें-चें करती हुँऽइ गुँथ जाती हैं और उनसे पराजित हो पृथ्वीपर गिर पड़ती हैं॥ ३२॥
‘पक्षी और मृग सभी सूर्यकी ओर मुँह करके रोते हैं। विकराल, विकट, काले और भूरे रंगके मूँड़ मुड़ाये हुए पुरुषका रूप धारण करके काल समय-समयपर हम सबके घरोंकी ओर देखता है॥ ३३ १/२॥
‘ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। मैं ऐसा समझता हूँ कि साक्षात् भगवान् विष्णु ही मानवरूप धारण करके राम होकर आये हैं। जिन्होंने समुद्रमें अत्यन्त अद्भुत सेतु बाँधा है, वे दृढ़पराक्रमी रघुवीर साधारण मनुष्यमात्र नहीं हैं। रावण! तुम नरराज श्रीरामके साथ संधि कर लो। श्रीरामके अलौकिक कर्मों और लङ्कामें होनेवाले उत्पातोंको जानकर जो कार्य भविष्यमें सुख देनेवाला हो, उसका निश्चय करके वही करो’॥ ३४—३६॥
यह बात कहकर तथा राक्षसराज रावणके मनोभावकी परीक्षा करके उत्तम मन्त्रियोंमें श्रेष्ठ पौरुषशाली महाबली माल्यवान् रावणकी ओर देखता हुआ चुप हो गया॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५ ॥
छत्तीसवाँ सर्ग
छत्तीसवाँ सर्ग
माल्यवान्पर आक्षेप और नगरकी रक्षाका प्रबन्ध करके रावणका अपने अन्तःपुरमें जाना
दुष्टात्मा दशमुख रावण कालके अधीन हो रहा था, इसलिये माल्यवान्की कही हुई हितकर बातको भी वह सहन नहीं कर सका॥ १ ॥
वह क्रोधके वशीभूत हो गया। अमर्षसे उसके नेत्र घूमने लगे। उसने भौंहें टेढ़ी करके माल्यवान्से कहा—॥ २ ॥
‘तुमने शत्रु्का पक्ष लेकर हित-बुद्धिसे जो मेरे अहितकी कठोर बात कही है, वह पूरी तौरसे मेरे कानोंतक नहीं पहुँची॥ ३ ॥
‘बेचारा राम एक मनुष्य ही तो है, जिसने सहारा लिया है कुछ बंदरोंका। पिताके त्याग देनेसे उसने वनकी शरण ली है। उसमें कौन-सी ऐसी विशेषता है, जिससे तुम उसे बड़ा सामर्थ्यशाली मान रहे हो॥ ४ ॥
‘मैं राक्षसोंका स्वामी तथा सभी प्रकारके पराक्रमोंसे सम्पन्न हूँ, देवताओंके मनमें भी भय उत्पन्न करता हूँ; फिर किस कारणसे तुम मुझे रामकी अपेक्षा हीन समझते हो ?॥ ५ ॥
‘तुमने जो मुझे कठोर बातें सुनायी हैं, उनके विषयमें मुझे शङ्का है कि तुम या तो मुझ-जैसे वीरसे द्वेष रखते हो या शत्रुसे मिले हुए हो अथवा शत्रुओंने ऐसा कहने या करनेके लिये तुम्हें प्रोत्साहन दिया है॥ ६ ॥
‘जो प्रभावशाली होनेके साथ ही अपने राज्यपर प्रतिष्ठित है, ऐसे पुरुषको कौन शास्त्रतत्त्वज्ञ विद्वान् शत्रु्का प्रोत्साहन पाये बिना कटुवचन सुना सकता है?॥ ७ ॥
‘कमलहीन कमलाकी भाँति सुन्दरी सीताको वनसे ले आकर अब केवल रामके भयसे मैं कैसे लौटा दूँ?॥ ८ ॥
‘करोड़ों वानरोंसे घिरे हुए सुग्रीव और लक्ष्मण-सहित रामको मैं कुछ ही दिनोंमें मार डालूँगा, यह तुम अपनी आँखों देख लेना॥ ९ ॥
‘जिसके सामने द्वन्द्वयुद्धमें देवता भी नहीं ठहर पाते हैं, वही रावण युद्धमें किससे भयभीत होगा॥ १० ॥
‘मैं बीचसे दो टूक हो जाऊँगा, पर किसीके सामने झुक नहीं सकूँगा, यह मेरा सहज दोष है और स्वभाव किसीके लिये भी दुर्लङ्घ्य होता है।। ११ ।।
‘यदि रामने दैववश समुद्रपर सेतु बाँध लिया तो इसमें विस्मयकी कौन बात है, जिससे तुम्हें इतना भय हो गया है?।। १२ ।।
‘मैं तुम्हारे आगे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि समुद्र पार करके वानरसेनासहित आये हुए राम यहाँसे जीवित नहीं लौट सकेंगे’।। १३ ।।
ऐसी बातें कहते हुए रावणको क्रोधसे भरा हुआ एवं रुष्ट जानकर माल्यवान् बहुत लज्जित हुआ और उसने कोई उत्तर नहीं दिया।। १४ ।।
माल्यवान्ने ‘महाराजकी जय हो’ इस विजयसूचक आशीर्वादसे राजाको यथोचित बढ़ावा दिया और उससे आज्ञा लेकर वह अपने घर चला गया।। १५ ।।
तदनन्तर मन्त्रियोंसहित राक्षस रावणने परस्पर विचार-विमर्श करके तत्काल लङ्काकी रक्षाका प्रबन्ध किया।। १६ ।।
उसने पूर्व द्वारपर उसकी रक्षाके लिये राक्षस प्रहस्तको तैनात किया, दक्षिण द्वारपर महापराक्रमी महापार्श्व और महोदरको नियुक्त किया तथा पश्चिम द्वारपर अपने पुत्र इन्द्रजित्को रखा, जो महान् मायावी था। वह बहुत-से राक्षसोंद्वारा घिरा हुआ था।। १७-१८ ।।
तदनन्तर नगरके उत्तर द्वारपर शुक और सारणको रक्षाके लिये जानेकी आज्ञा दे मन्त्रियोंसे रावणने कहा— ‘मैं स्वयं भी उत्तर द्वारपर जाऊँगा’।। १९ ।।
नगरके बीचकी छावनीपर उसने बहुसंख्यक राक्षसोंके साथ महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न राक्षस विरूपाक्षको स्थापित किया।। २० ।।
इस प्रकार लङ्कामें पुरीकी रक्षाका प्रबन्ध करके कालप्रेरित राक्षसशिरोमणि रावण अपने-आपको कृतकृत्य मानने लगा।। २१ ।।
इस तरह नगरके संरक्षणकी प्रचुर व्यवस्थाके लिये आज्ञा देकर रावणने सब मन्त्रियोंको विदा कर दिया और स्वयं भी उनके विजयसूचक आशीर्वादसे सम्मानित हो अपने समृद्धिशाली एवं विशाल अन्तःपुरमें चला गया।।
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ।। ३६ ।।
सैंतीसवाँ सर्ग
सैंतीसवाँ सर्ग
विभीषणका श्रीरामसे रावणद्वारा किये गये लङ्काकी रक्षाके प्रबन्धका वर्णन तथा श्रीरामद्वारा लङ्काके विभिन्न द्वारोंपर आक्रमण करनेके लिये अपने सेनापतियोंकी नियुक्ति
शत्रुके देशमें पहुँचे हुए नरराज श्रीराम, सुमित्राकुमार लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव, वायुपुत्र हनुमान्, ऋक्षराज जाम्बवान्, राक्षस विभीषण, वालिपुत्र अङ्गद, शरभ, बन्धु-बान्धवोंसहित सुषेण, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, कुमुद, नल और पनस—ये सब आपसमें मिलकर विचार करने लगे—॥ १—३ ॥
‘यही वह लङ्कापुरी दिखायी देती है, जिसका पालन रावण करता है। असुर, नाग और गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी इसपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है॥ ४ ॥
‘राक्षसराज रावण इस पुरीमें सदा निवास करता है। अब आपलोग इसपर विजय पानेके उपायोंका निर्णय करनेके लिये परस्पर विचार करें’॥ ५ ॥
उन सबके इस प्रकार कहनेपर रावणके छोटे भाई विभीषणने संस्कारयुक्त पद और प्रचुर अर्थसे भरी हुई वाणीमें कहा—॥ ६ ॥
‘मेरे मन्त्री अनल, पनस, सम्पाति और प्रमति— ये चारों लङ्कापुरीमें जाकर फिर यहाँ लौट आये हैं॥ ७ ॥
‘ये सब लोग पक्षीका रूप धारण करके शत्रुकी सेनामें गये थे और वहाँ जो व्यवस्था की गयी है, उसे अपनी आँखों देखकर फिर यहाँ उपस्थित हुए हैं॥ ८ ॥
‘श्रीराम! इन्होंने दुरात्मा रावणके द्वारा किये गये नगर-रक्षाके प्रबन्धका जैसा वर्णन किया है, उसे मैं ठीक-ठीक बताता हूँ। आप वह सब मुझसे सुनिये॥ ९ ॥
‘सेनासहित प्रहस्त नगरके पूर्व द्वारका आश्रय लेकर खड़ा है। महापराक्रमी महापार्श्व और महोदर दक्षिण द्वारपर खड़े हैं॥ १० ॥
‘बहुसंख्यक राक्षसोंसे घिरा हुआ इन्द्रजित् नगरके पश्चिम द्वारपर खड़ा है। उसके साथी राक्षस पट्टिश, खड्ग, धनुष, शूल और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्र हाथोंमें लिये हुए हैं। नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले शूरवीरोंसे घिरा हुआ वह रावणकुमार पश्चिमद्वारकी रक्षाके लिये डटा है॥
‘स्वयं मन्त्रवेत्ता रावण शुक, सारण आदि कई सहस्र शस्त्रधारी राक्षसोंके साथ नगरके उत्तर द्वारपर सावधानीके साथ खड़ा है। वह मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न जान पड़ता है॥ १२-१३ ॥
‘विरूपाक्ष शूल, खड्ग और धनुष धारण करनेवाली विशाल राक्षससेनाके साथ नगरके बीचकी छावनीपर खड़ा है॥ १४ ॥
‘इस प्रकार मेरे सारे मन्त्री लङ्कामें विभिन्न स्थानोंपर नियुक्त हुई इन सेनाओंका निरीक्षण करके फिर शीघ्र यहाँ लौटे हैं॥ १५ ॥
‘रावणकी सेनामें दस हजार हाथी, दस हजार रथ, बीस हजार घोड़े और एक करोड़से भी ऊपर पैदल राक्षस हैं॥ १६ ॥
‘वे सभी बड़े वीर, बल-पराक्रमसे सम्पन्न और युद्धमें आततायी हैं। ये सभी निशाचर राक्षसराज रावणको सदा ही प्रिय हैं॥ १७ ॥
‘प्रजानाथ! इनमेंसे एक-एक राक्षसके पास युद्धके लिये दस-दस लाखका परिवार उपस्थित है’॥ १८ ॥
महाबाहु विभीषणने मन्त्रियोंद्वारा बताये गये लङ्काविषयक समाचारको इस प्रकार बताकर उन मन्त्रीस्वरूप राक्षसोंको भी श्रीरामसे मिलाया और उनके द्वारा लङ्काका सारा वृत्तान्त पुनः उनसे कहलाया॥ १९ १/२ ॥
तदनन्तर रावणके छोटे भाई श्रीमान् विभीषणने कमलनयन श्रीरामसे उनका प्रिय करनेके लिये स्वयं भी यह उत्तम बात कही— ॥ २० १/२ ॥
‘श्रीराम! जब रावणने कुबेरके साथ युद्ध किया था, उस समय साठ लाख राक्षस उसके साथ गये थे। वे सब-के-सब बल, पराक्रम, तेज, धैर्यकी अधिकता और दर्पकी दृष्टिसे दुरात्मा रावणके ही समान थे॥ २१-२२ ॥
‘मैंने जो रावणकी शक्तिका वर्णन किया है, इसको लेकर न तो आपको अपने मनमें दीनता लानी चाहिये और न मुझपर रोष ही करना चाहिये। मैं आपको डराता नहीं, शत्रुके प्रति आपके क्रोधको उभाड़ रहा हूँ; क्योंकि आप अपने बलपराक्रमद्वारा देवताओंका भी दमन करनेमें समर्थ हैं॥ २३ ॥
‘इसलिये आप इस वानरसेनाका व्यूह बनाकर ही विशाल चतुरङ्गिणी सेनासे घिरे हुए रावणका विनाश कर सकेंगे’॥ २४ ॥
विभीषणके ऐसी बात कहनेपर भगवान् श्रीरामने शत्रुओंको परास्त करनेके लिये इस प्रकार कहा—॥
‘बहुसंख्यक वानरोंसे घिरे हुए कपिश्रेष्ठ नील पूर्व द्वारपर जाकर प्रहस्तका सामना करें॥ २६ ॥
‘विशाल वाहिनीसे युक्त वालिकुमार अङ्गद दक्षिण द्वारपर स्थित हो महापार्श्व और महोदरके कार्यमें बाधा दें॥ २७ ॥
‘पवनकुमार हनुमान् अप्रमेय आत्मबलसे सम्पन्न हैं। ये बहुत-से वानरोंके साथ लङ्काके पश्चिम फाटकमें प्रवेश करें॥ २८ ॥
‘दैत्यों, दानवसमूहों तथा महात्मा ऋषियोंका अपकार करना ही जिसे प्रिय लगता है, जिसका स्वभाव क्षुद्र है, जो वरदानकी शक्तिसे सम्पन्न है और प्रजाजनोंको संताप देता हुआ सम्पूर्ण लोकोंमें घूमता रहता है, उस राक्षसराज रावणके वधका दृढ़ निश्चय लेकर मैं स्वयं ही सुमित्राकुमार लक्ष्मणके साथ नगरके उत्तर फाटकपर आक्रमण करके उसके भीतर प्रवेश करूँगा, जहाँ सेनासहित रावण विद्यमान है॥ २९—३१ ॥
‘बलवान् वानरराज सुग्रीव, रीछोंके पराक्रमी राजा जाम्बवान् तथा राक्षसराज रावणके छोटे भाऽइ विभीषण—ये लोग नगरके बीचके मोर्चेपर आक्रमण करें॥ ३२ ॥
‘वानरोंको युद्धमें मनुष्यका रूप नहीं धारण करना चाहिये। इस युद्धमें वानरोंकी सेनाका हमारे लिये यही संकेत या चिह्न होगा॥ ३३ ॥
‘इस स्वजनवर्गमें वानर ही हमारे चिह्न होंगे। केवल हम सात व्यक्ति ही मनुष्यरूपमें रहकर शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे॥ ३४ ॥
‘मैं अपने महातेजस्वी भाऽइ लक्ष्मणके साथ रहूँगा और ये मेरे मित्र विभीषण अपने चार मन्त्रियोंके साथ पाँचवें होंगे (इस प्रकार हम सात व्यक्ति मनुष्यरूपमें रहकर युद्ध करेंगे)’॥ ३५ ॥
अपने विजयरूपी प्रयोजनकी सिद्धिके लिये विभीषणसे ऐसा कहकर बुद्धिमान् भगवान् श्रीरामने सुवेल पर्वतपर चढ़नेका विचार किया। सुवेल पर्वतका तटप्रान्त बड़ा ही रमणीय था,
उसे देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३६ ॥
तदनन्तर महामना महात्मा श्रीराम अपनी विशाल सेनाके द्वारा वहाँकी सारी पृथ्वीको आच्छादित करके शत्रुवधका निश्चय किये बड़े हर्ष और उत्साहसे लङ्काकी ओर चले॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३७ ॥
अड़तीसवाँ सर्ग
अड़तीसवाँ सर्ग
श्रीरामका प्रमुख वानरोंके साथ सुवेल पर्वतपर चढ़कर वहाँ रातमें निवास करना
सुवेल पर्वतपर चढ़नेका विचार करके जिनके पीछे लक्ष्मणजी चल रहे थे, वे भगवान् श्रीराम सुग्रीवसे और धर्मके ज्ञाता, मन्त्रवेत्ता, विधिज्ञ एवं अनुरागी निशाचर विभीषणसे भी उत्तम एवं मधुर वाणीमें बोले— ॥ १-२ ॥
‘मित्रो! यह पर्वतराज सुवेल सैकड़ों धातुओंसे भलीभाँति भरा हुआ है। हम सब लोग इसपर चढ़ें और आजकी इस रातमें यहीं निवास करें॥ ३ ॥
‘यहाँसे हमलोग उस राक्षसकी निवासभूत लङ्कापुरीका भी अवलोकन करेंगे, जिस दुरात्माने अपनी मृत्युके लिये ही मेरी भार्याका अपहरण किया है॥ ४ ॥
‘जिसने न तो धर्मको जाना है, न सदाचारको ही कुछ समझा है और न कुलका ही विचार किया है; केवल राक्षसोचित नीच बुद्धिके कारण ही वह निन्दित कर्म किया है॥ ५ ॥
‘उस नीच राक्षसका नाम लेते ही उसपर मेरा रोष जाग उठता है। केवल उसी अधम निशाचरके अपराधसे मैं समस्त राक्षसोंका वध देखूँगा॥ ६ ॥
‘कालके पाशमें बँधा हुआ एक ही पुरुष पाप करता है, किंतु उस नीचके अपने ही दोषसे सारा कुल नष्ट हो जाता है’॥ ७ ॥
इस प्रकार चिन्तन करते हुए ही श्रीराम रावणके प्रति कुपित हो विचित्र शिखरवाले सुवेल पर्वतपर निवास करनेके लिये चढ़ गये॥ ८ ॥
उनके पीछे लक्ष्मण भी महान् पराक्रममें तत्पर एवं एकाग्रचित्त हो धनुष-बाण लिये हुए उस पर्वतपर आरूढ़ हो गये॥ ९ ॥
तत्पश्चात् सुग्रीव, मन्त्रियोंसहित विभीषण, हनुमान्, अङ्गद, नील, मैन्द, द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, पनस, कुमुद, हर, यूथपति रम्भ, जाम्बवान्, सुषेण, महामति ऋषभ, महातेजस्वी दुर्मुख तथा कपिवर शतवलि—ये और दूसरे भी बहुत-से शीघ्रगामी वानर जो वायुके समान वेगसे चलनेवाले तथा पर्वतोंपर ही विचरनेवाले थे, उस सुवेलगिरिपर चढ़ गये॥ १०—१३ ॥
सुवेल पर्वतपर जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे, वे सैकड़ों वानर थोड़ी ही देरमें चढ़ गये और चढ़कर सब ओर विचरने लगे॥ १४ ॥
उन वानर-यूथपतियोंने सुवेलपर्वतके शिखरपर खड़े हो उस सुन्दर लङ्कापुरीका निरीक्षण किया, जो आकाशमें ही बनी हुई-सी जान पड़ती थी। उसके फाटक बड़े मनोहर थे। उत्तम परकोटे उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे तथा वह पुरी राक्षसोंसे भरी-पूरी थी॥
उत्तम परकोटोंपर खड़े हुए नीलवर्णके राक्षस ऐसे जान पड़ते थे, मानो उन परकोटोंपर दूसरा परकोटा बना दिया गया हो। उन श्रेष्ठ वानरोंने वह सब कुछ देखा॥ १६-१७ ॥
युद्धकी इच्छा रखनेवाले राक्षसोंको देखकर वे सब वानर श्रीरामके देखते-देखते नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगे॥ १८ ॥
तदनन्तर संध्याकी लालीसे रँगे हुए सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और पूर्णचन्द्रमासे प्रकाशित उजेली रात वहाँ सब ओर छा गयी॥ १९ ॥
तत्पश्चात् विभीषणद्वारा सादर सम्मानित हो वानरसेनाके स्वामी श्रीरामने अपने भाई लक्ष्मण और यूथपतियोंके समुदायके साथ सुवेल पर्वतके पृष्ठभागपर सुखपूर्वक निवास किया॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८ ॥
उनतालीसवाँ सर्ग
उनतालीसवाँ सर्ग
वानरोंसहित श्रीरामका सुवेल-शिखरसे लङ्कापुरीका निरीक्षण करना
वानर-यूथपतियोंने वह रात उस सुवेलपर्वतपर ही बितायी और वहाँसे उन वीरोंने लङ्काके वन और उपवन भी देखे॥ १ ॥
वे बड़े ही चौरस, शान्त, सुन्दर, विशाल और विस्तृत थे तथा देखनेमें अत्यन्त रमणीय जान पड़ते थे। उन्हें देखकर उन सब वानरोंको बड़ा विस्मय हुआ॥ २ ॥
चम्पा, अशोक, बकुल, शाल और ताल-वृक्षोंसे व्याप्त, तमाल-वनसे आच्छादित और नागकेसरोंसे आवृत्त लङ्कापुरी हिंताल, अर्जुन, नीप (कदम्ब), खिले हुए छितवन, तिलक, कनेर तथा पाटल आदि नाना प्रकारके दिव्य वृक्षोंसे जिनके अग्रभाग फूलोंके भारसे लदे थे तथा जिनपर लताबल्लरियाँ फैली हुई थीं, इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी॥ ३—५ ॥
विचित्र फूलोंसे युक्त लाल कोमल पल्लवों, हरी-हरी घासों तथा विचित्र वनश्रेणियोंसे भी उस पुरीकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ ६ ॥
जैसे मनुष्य आभूषण धारण करते हैं, उसी प्रकार वहाँके वृक्ष सुगन्धित फूल और अत्यन्त रमणीय फल धारण करते थे॥ ७ ॥
चैत्ररथ और नन्दनवनके समान वहाँका मनोहर वन सभी ऋतुओंमें भ्रमरोंसे व्याप्त हो रमणीय शोभा धारण करता था॥ ८ ॥
दात्यूह, कोयष्टि, बक और नाचते हुए मोर उस वनको सुशोभित करते थे। वनमें झरनोंके आसपास कोकिलकी कूक सुनायी पड़ती थी॥ ९ ॥
लङ्काके वन और उपवन नित्य मतवाले विहङ्गमोंसे विभूषित थे। वहाँ वृक्षोंकी डालियोंपर भौंरे मँडराते रहते थे। उनके प्रत्येक खण्डमें कोकिलाएँ कुहू-कुहू बोला करती थीं। पक्षी चहचहाते रहते थे। भृङ्गराजके गीत मुखरित होते थे। कुररके शब्द गूँजा करते थे। कोणालकके कलरव होते रहते थे तथा सारसोंकी स्वरलहरी सब ओर छायी रहती थी। कुछ वानरवीर उन वनों और उपवनोंमें घुस गये॥ १०-११ ॥
वे सभी वीर वानर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, उत्साही और आनन्दमग्न थे। उन महातेजस्वी वानरोंके वहाँ प्रवेश करते ही फूलोंके संसर्गसे सुगन्धित तथा घ्राणेन्द्रियको सुख
देनेवाली मन्द वायु चलने लगी। दूसरे बहुत-से यूथपति उन वानरवीरोंके समूहसे निकलकर सुग्रीवकी आज्ञा ले ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत लङ्कापुरीमें गये॥ १२-१३ ॥
गर्जनेवाले लोगोंमेंसे श्रेष्ठ वे वानरवीर अपने सिंहनादसे पक्षियोंको डराते, मृगों और हाथियोंके हर्ष छीनते तथा लङ्काको कम्पित करते हुए आगे बढ़ रहे थे॥ १४ ॥
वे महान् वेगशाली वानर पृथ्वीको जब चरणोंसे दबाते थे, उस समय उनके पैरोंसे उठी हुई धूल सहसा ऊपरको उड़ जाती थी॥ १५ ॥
वानरोंके उस सिंहनादसे त्रस्त एवं भयभीत हुए रीछ, सिंह, भैंसे, हाथी, मृग और पक्षी दसों दिशाओंकी ओर भाग गये॥ १६ ॥
त्रिकूट पर्वतका एक शिखर बहुत ऊँचा था। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो स्वर्गलोकको छू रहा हो। उसपर सब ओर पीले रंगके फूल खिले हुए थे, जिनसे वह सोनेका-सा जान पड़ता था॥ १७ ॥
उस शिखरका विस्तार सौ योजन था। वह देखनेमें बड़ा ही सुन्दर, स्वच्छ, स्निग्ध, कान्तिमान् और विशाल था। पक्षियोंके लिये भी उसकी चोटीतक पहुँचना कठिन होता था॥ १८ ॥
लोग त्रिकूटके उस शिखरपर मनके द्वारा चढ़नेकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। फिर क्रियाद्वारा उसपर आरूढ़ होनेकी तो बात ही क्या है? रावणद्वारा पालित लङ्का त्रिकूटके उसी शिखरपर बसी हुई थी॥ १९ ॥
वह पुरी दस योजन चौड़ी और बीस योजन लंबी थी। सफेद बादलोंके समान ऊँचे-ऊँचे गोपुर तथा सोने और चाँदीके परकोटे उसकी शोभा बढ़ाते थे॥ २० ॥
जैसे ग्रीष्मके अन्तकाल—वर्षा ऋतुमें घनीभूत बादल आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार प्रासादों¹
और विमानोंसे² लङ्कापुरी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी॥
उस पुरीमें सहस्र खम्भोंसे अलंकृत एक चैत्यप्रासाद था, जो कैलास-शिखरके समान दिखायी देता था। वह आकाशको मापता हुआ-सा जान पड़ता था॥ २२ ॥
राक्षसराज रावणका वह चैत्यप्रासाद लङ्कापुरीका आभूषण था। कई सौ राक्षस रक्षाके सभी साधनोंसे सम्पन्न होकर प्रतिदिन उसकी रक्षा करते थे॥ २३ ॥
इस प्रकार वह पुरी बड़ी ही मनोहर, सुवर्णमयी, अनेकानेक पर्वतोंसे अलंकृत, नाना प्रकारकी विचित्र धातुओंसे चित्रित और अनेक उद्यानोंसे सुशोभित थी॥
भाँति-भाँतिके विहङ्गम वहाँ अपनी मधुर बोली बोल रहे थे। नाना प्रकारके मृग आदि पशु उसका सेवन करते थे। अनेक प्रकारके फूलोंकी सम्पत्तिसे वह सम्पन्न थी और विविध प्रकारके आकारवाले राक्षस वहाँ निवास करते थे॥ २५ ॥
धन-धान्यसे सम्पन्न तथा सम्पूर्ण मनोवाञ्छित वस्तुओंसे भरी-पूरी उस रावण-पुरीको लक्ष्मणके बड़े भाऽई लक्ष्मीवान् श्रीरामने वानरोंके साथ देखा॥ २६ ॥
बड़े-बड़े महलोंसे सघन बसी हुऽई उस स्वर्गतुल्य नगरीको देखकर पराक्रमी श्रीराम बड़े विस्मित हुए॥
इस प्रकार अपनी विशाल सेनाके साथ श्रीरघुनाथजीने अनेक प्रकारके रत्नोंसे पूर्ण, तरह-तरहकी रचनाओंसे सुसज्जित, ऊँचे-ऊँचे महलोंकी पंक्तिसे अलंकृत और बड़े-बड़े यन्त्रोंसे युक्त मजबूत किवाड़ोंवाली वह अद्भुत पुरी देखी॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३९ ॥
१. अमरकोशके अनुसार देवताओंके मन्दिरों तथा राजाओंके महलोंको प्रासाद कहते हैं। प्राचीन वास्तुविद्याके अनुसार बहुत लंबा, चौड़ा, ऊँचा और कऽइ भूमियोंका पक्का या पत्थरका बना हुआ भव्य भवन जिसमें अनेक शृङ्ग, शृङ्खला और अण्डक आदि हों ‘प्रासाद’ कहा गया है। उसमें बहुत-से गवाक्षोंसे युक्त त्रिकोण, चतुष्कोण, आयत और वृत्तशालाएँ बनी होती हैं।कृतिके भेदसे पुराणोंमें प्रासादके पाँच भेद किये गये हैं—चतुरस्र, चतुरायत, वृत्त, वृत्तायत और अष्टास्र। इनका नाम क्रमशः वैराज, पुष्पक, कैलास, मालक और त्रिविष्टप है। भूमि, अण्डक और शिखर आदिकी न्यूनता-अधिकताके कारण इन पाँचोंके नौ-नौ भेद माने गये हैं। जैसे वैराजके मेरु, मन्दर, विमान, भद्रक, सर्वतोभद्र, रुचक, नन्दन, नन्दिवर्धन और श्रीवत्स; पुष्पकके वलभी, गृहराज, शालागृह, मन्दिर, विमान, ब्रह्ममन्दिर, भवन, उत्तम और शिविकावेश्म; कैलासके वलय, दुन्दुभि, पद्म, महापद्म, भद्रक, सर्वतोभद्र, रुचक, नन्दन, गवाक्ष और गवावृत्त; मालकके गज, वृषभ, हंस, गरुड़, सिंह, भूमुख, भूधर, श्रीजय और पृथ्वीधर तथा त्रिविष्टपके वज्र, चक्र, मुष्टिक या वभ्रु, वक्र, स्वस्तिक, खड्ग, गदा, श्रीवृक्ष और विजय।
२. आकाशमार्गसे गमन करनेवाला रथ जो देवता आदिके पास होता है ‘विमान’ कहलाता है। सात मंजिलके मकानको भी विमान कहते हैं। प्राचीन वास्तुविद्याके अनुसार उस देवमन्दिरको विमानकी संज्ञा दी गयी है जो ऊपरकी ओर पतला होता चला गया हो। मानसार नामक प्राचीन ग्रन्थके अनुसार विमान गोल, चौपहला और आठपहला होता है। गोलको बेसर, चौपहलेको नागर और आठपहलेको द्रावि कहते हैं (हिंदी-शब्दसागरसे)।
चालीसवाँ सर्ग
चालीसवाँ सर्ग
सुग्रीव और रावणका मल्लयुद्ध
तदनन्तर वानरयूथोंसे युक्त सुग्रीवसहित श्रीराम सुवेल पर्वतके सबसे ऊँचे शिखरपर चढ़े, जिसका विस्तार दो योजनका था॥ १ ॥
वहाँ दो घड़ी ठहरकर दसों दिशाओंकी ओर दृष्टिपात करते हुए श्रीरामने त्रिकूट पर्वतके रमणीय शिखरपर सुन्दर ढंगसे बसी हुई विश्वकर्माद्वारा निर्मित लङ्कापुरीको देखा, जो मनोहर काननोंसे सुशोभित थी॥
उस नगरके गोपुरकी छतपर उन्हें दुर्जय राक्षसराज रावण बैठा दिखायी दिया, जिसके दोनों ओर श्वेत चँवर डुलाये जा रहे थे, सिरपर विजय-छत्र शोभा दे रहा था। रावणका सारा शरीर रक्तचन्दनसे चर्चित था। उसके अङ्ग लाल रंगके आभूषणोंसे विभूषित थे॥ ३-४ ॥
वह काले मेघके समान जान पड़ता था। उसके वस्त्रोंपर सोनेके काम किये गये थे। ऐरावत हाथीके दाँतोंके अग्रभागसे आहत होनेके कारण उसके वक्षःस्थलमें आघातचिह्न बन गया था॥ ५ ॥
खरगोशके रक्तके समान लाल रंगसे रँगे हुए वस्त्रसे आच्छादित होकर वह आकाशमें संध्याकालकी धूपसे ढकी हुई मेघमालाके समान दिखायी देता था॥ ६ ॥
मुख्य-मुख्य वानरों तथा श्रीरघुनाथजीके सामने ही राक्षसराज रावणपर दृष्टि पड़ते ही सुग्रीव सहसा खड़े हो गये॥ ७ ॥
वे क्रोधके वेगसे युक्त और शारीरिक एवं मानसिक बलसे प्रेरित हो सुवेलके शिखरसे उठकर उस गोपुरकी छतपर कूद पड़े॥ ८ ॥
वहाँ खड़े होकर वे कुछ देर तो रावणको देखते रहे। फिर निर्भय चित्तसे उस राक्षसको तिनकेके समान समझकर वे कठोर वाणीमें बोले— ॥ ९ ॥
‘राक्षस! मैं लोकनाथ भगवान् श्रीरामका सखा और दास हूँ। महाराज श्रीरामके तेजसे आज तू मेरे हाथसे छूट नहीं सकेगा’॥ १० ॥
ऐसा कहकर वे अकस्मात् उछलकर रावणके ऊपर जा कूदे और उसके विचित्र मुकुटोंको खींचकर उन्होंने पृथ्वीपर गिरा दिया॥ ११ ॥
उन्हें इस प्रकार तीव्र गतिसे अपने ऊपर आक्रमण करते देख रावणने कहा—‘अरे! जबतक तू मेरे सामने नहीं आया था, तभीतक सुग्रीव (सुन्दर कण्ठसे युक्त) था। अब तो तू अपनी इस ग्रीवासे रहित हो जायगा’॥
ऐसा कहकर रावणने अपनी दो भुजाओंद्धारा उन्हें शीघ्र ही उठाकर उस छतकी फर्शपर दे मारा। फिर वानरराज सुग्रीवने भी गेंदकी तरह उछलकर रावणको दोनों भुजाओंसे उठा लिया और उसी फर्शपर जोरसे पटक दिया॥ १३ ॥
फिर तो वे दोनों आपसमें गुँथ गये। दोनोंके ही शरीर पसीनेसे तर और खूनसे लथपथ हो गये तथा दोनों ही एक-दूसरेकी पकड़में आनेके कारण निश्चेष्ट होकर खिले हुए सेमल और पलाश नामक वृक्षोंके समान दिखायी देने लगे॥ १४ ॥
राक्षसराज रावण और वानरराज सुग्रीव दोनों ही बड़े बलवान् थे, अतः दोनों घूँसे, थप्पड़, कोहनी और पंजोंकी मारके साथ बड़ा असह्य युद्ध करने लगे॥ १५ ॥
गोपुरके चबूतरेपर बहुत देरतक भारी मल्लयुद्ध करके वे भयानक वेगवाले दोनों वीर बार-बार एक-दूसरेको उछालते और झुकाते हुए पैरोंको विशेष दाँव-पेंचके साथ चलाते-चलाते उस चबूतरेसे जा लगे॥ १६ ॥
एक-दूसरेको दबाकर परस्पर सटे हुए शरीरवाले वे दोनों योद्धा किलेके परकोटे और खाँईके बीचमें गिर गये। वहाँ हाँफते हुए दो घड़ीतक पृथ्वीका आलिङ्गन किये पड़े रहे। तत्पश्चात् उछलकर खड़े हो गये॥ १७ ॥
फिर वे एक-दूसरेका बार-बार आलिङ्गन करके उसे बाहुपाशमें जकड़ने लगे। दोनों ही क्रोध, शिक्षा (मल्लयुद्ध-विषयक अभ्यास) तथा शारीरिक बलसे सम्पन्न थे; अतः उस युद्धस्थलमें कुश्तीके अनेक दाँव-पेंच दिखाते हुए भ्रमण करने लगे॥ १८ ॥
जिनके नये-नये दाँत निकले हों, ऐसे बाघ और सिंहके बच्चों तथा परस्पर लड़ते हुए गजराजके छोटे छौनोंके समान वे दोनों वीर अपने वक्षःस्थलसे एक-दूसरेको दबाते और हाथोंसे परस्पर बल आजमाते हुए एक साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़े॥ १९ ॥
दोनों ही कसरती जवान थे और युद्धकी शिक्षा तथा बलसे सम्पन्न थे। अतः युद्ध जीतनेके लिये उद्यमशील हो एक-दूसरेपर आक्षेप करते हुए युद्धमार्गपर अनेक प्रकारसे विचरण करते थे तथापि उन वीरोंको जल्दी थकावट नहीं होती थी॥ २० ॥
मतवाले हाथियोंके समान सुग्रीव और रावण गजराजके शुण्ड-दण्डकी भाँति मोटे एवं बलिष्ठ बाहुदण्डोंद्वारा एक-दूसरेके दाँवको रोकते हुए बहुत देरतक बड़े आवेशके साथ युद्ध करते और शीघ्रतापूर्वक पैंतरे बदलते रहे॥ २१ ॥
वे परस्पर भिड़कर एक-दूसरेको मार डालनेका प्रयत्न कर रहे थे। जैसे दो बिलाव किसी भक्ष्य वस्तुके लिये क्रोधपूर्वक स्थित हो परस्पर दृष्टिपात कर बारंबार गुर्राते रहते हैं, उसी तरह रावण और सुग्रीव भी लड़ रहे थे॥ २२ ॥
विचित्र मण्डल¹ और भाँति-भाँतिके स्थानका² प्रदर्शन करते हुए गोमूत्रकी रेखाके समान कुटिल गतिसे चलते और विचित्र रीतिसे कभी आगे बढ़ते और कभी पीछे हटते थे॥ २३ ॥
वे कभी तिरछी चालसे चलते, कभी टेढ़ी चालसे दायें-बायें घूम जाते, कभी अपने स्थानसे हटकर शत्रुके प्रहारको व्यर्थ कर देते, कभी बदलेमें स्वयं भी दाँव-पेंचका प्रयोग करके शत्रुके आक्रमणसे अपनेको बचा लेते, कभी एक खड़ा रहता तो दूसरा उसके चारों ओर दौड़ लगाता, कभी दोनों एक-दूसरेके सम्मुख शीघ्रतापूर्वक दौड़कर आक्रमण करते, कभी झुककर या मेढककी भाँति धीरेसे उछलकर चलते, कभी लड़ते हुए एक ही जगहपर स्थिर रहते, कभी पीछेकी ओर लौट पड़ते, कभी सामने खड़े-खड़े ही पीछे हटते, कभी विपक्षीको पकड़नेकी इच्छासे अपने शरीरको सिकोड़कर या झुकाकर उसकी ओर दौड़ते, कभी प्रतिद्वन्द्वीपर पैरसे प्रहार करनेके लिये नीचे मुँह किये उसपर टूट पड़ते, कभी प्रतिपक्षी योद्धाकी बाँह पकड़नेके लिये अपनी बाँह फैला देते और कभी विरोधीकी पकड़से बचनेके लिये अपनी बाँहोंको पीछे खींच लेते। इस प्रकार मल्लयुद्धकी कलामें परम प्रवीण वानरराज सुग्रीव तथा रावण एक दूसरेपर आघात करनेके लिये मण्डलाकार विचर रहे थे॥
इसी बीचमें राक्षस रावणने अपनी मायाशक्तिसे काम लेनेका विचार किया। वानरराज सुग्रीव इस बातको ताड़ गये; इसलिये सहसा आकाशमें उछल पड़े। वे विजयोल्लाससे सुशोभित होते थे और थकावटको जीत चुके थे। वानरराज रावणको चकमा देकर निकल गये और वह खड़ा-खड़ा देखता ही रह गया॥ २७-२८ ॥
जिन्हें संग्राममें कीर्ति प्राप्त हुई थी, वे वानरराज सूर्यपुत्र सुग्रीव निशाचरपति रावणको युद्धमें थकाकर अत्यन्त विशाल आकाशमार्गका लङ्घन करके वानरोंकी सेनाके बीच श्रीरामचन्द्रजीके पास आ पहुँचे॥ २९ ॥
इस प्रकार वहाँ अद्भुत कर्म करके वायुके समान शीघ्रगामी सूर्यपुत्र सुग्रीवने दशरथराजकुमार श्रीरामके युद्धविषयक उत्साहको बढ़ाते हुए बड़े हर्षके साथ वानरसेनामें प्रवेश किया। उस समय प्रधान-प्रधान वानरोंने वानरराजका अभिनन्दन किया॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४० ॥
१. भरतने मल्लयुद्धमें चार प्रकारके मण्डल बताये हैं। इनके नाम हैं—चारिमण्डल, करणमण्डल, खण्डमण्डल और महामण्डल। इनके लक्षण इस प्रकार हैं—एक पैरसे आगे बढ़कर चक्कर काटते हुए शत्रुपर आक्रमण करना चारिमण्डल कहलाता है। दो पैरसे मण्डलाकार घूमते हुए आक्रमण करना करणमण्डल कहा गया है। अनेक करणमण्डलोंका संयोग होनेसे खण्डमण्डल होता है और तीन या चार खण्डमण्डलोंके संयोगसे महामण्डल कहा गया है।
२. भरत मुनिने मल्लयुद्धमें छः स्थानोंका उल्लेख किया है—वैष्णव, समपाद, वैशाख, मण्डल, प्रत्यालीढ़ और अनालीढ़। पैरोंको आगे-पीछे अगल-बगलमें चलाते हुए विशेष प्रकारसे उन्हें यथास्थान स्थापित करना ही स्थान कहलाता है। कोई-कोई बाघ, सिंह आदि जन्तुओंके समान खड़े होनेकी रीतिको ही स्थान कहते हैं।
इकतालीसवाँ सर्ग
इकतालीसवाँ सर्ग
श्रीरामका सुग्रीवको दुःसाहससे रोकना, लङ्काके चारों द्वारोंपर वानरसैनिकोंकी नियुक्ति,
रामदूत अङ्गदका रावणके महलमें पराक्रम तथा वानरोंके आक्रमणसे राक्षसोंको भय
सुग्रीवके शरीरमें युद्धके चिह्न देखकर लक्ष्मणके बड़े भाऽइ श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
‘सुग्रीव! तुमने मुझसे सलाह लिये बिना ही यह बड़े साहसका काम कर डाला। राजालोग ऐसे दुःसाहसपूर्ण कार्य नहीं किया करते हैं॥ २ ॥
‘साहसप्रिय वीर! तुमने मुझको, इस वानरसेनाको और विभीषणको भी संशयमें डालकर जो यह साहसपूर्ण कार्य किया है, इससे हमें बड़ा कष्ट हुआ॥ ३ ॥
‘शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर! अब फिर तुम ऐसा दुःसाहस न करना। शत्रुसूदन महाबाहो! यदि तुम्हें कुछ हो गया तो मैं, सीता, भरत, लक्ष्मण, छोटे भाऽइ शत्रुघ्न तथा अपने इस शरीरको भी लेकर क्या करूँगा?॥
‘महेन्द्र और वरुणके समान महाबली! यद्यपि मैं तुम्हारे बल-पराक्रमको जानता था, तथापि जबतक तुम यहाँ लौटकर नहीं आये थे, उससे पहले मैंने यह निश्चित विचार कर लिया था कि युद्धमें पुत्र, सेना और वाहनों-सहित रावणका वध करके लङ्काके राज्यपर विभीषणका अभिषेक कर दूँगा और अयोध्याका राज्य भरतको देकर अपने इस शरीरको त्याग दूँगा’॥ ६-७ १/२ ॥
ऐसी बातें कहते हुए श्रीरामको सुग्रीवने यों उत्तर दिया— ‘वीर रघुनन्दन! अपने पराक्रमका ज्ञान रखते हुए मैं आपकी भार्याका अपहरण करनेवाले रावणको देखकर कैसे क्षमा कर सकता था?’॥ ८-९ ॥
वीर सुग्रीवने जब ऐसी बात कही, तब उनका अभिनन्दन करके श्रीरामचन्द्रजीने शोभासम्पन्न लक्ष्मणसे कहा— ॥ १० ॥
‘लक्ष्मण! शीतल जलसे भरे हुए जलाशय और फलोंसे सम्पन्न वनका आश्रय ले हमलोग इस विशाल वानरसेनाका विभाग करके व्यूहरचना कर लें और युद्धके लिये उद्यत हो जायें॥ ११ ॥