भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( १३५ ) “अतिरिक्त” और ‘अन्य’ शब्द का एक ही अर्थ में प्रयोग किया गया है, जिससे ज्ञात होता है कि “अतिरिक्त शब्द, अपने से भिन्न आत्मवाची है। “अन्य शब्द उस आत्मा का ज्ञानाकार रूप होने से, अन्याकारता (असमानता) का प्रतिषेधक है। कहने का तात्पर्य यह है कि—यदि मुझसे भिन्न कोई भी आत्मा मेरे आकार रूप ज्ञानाकार से भिन्न आकार का है तो, वहाँ कहा जायगा कि—“मैं इस आकार का” तथा “यह अन्य प्रकार के आकार का है।” सभी आत्माएं परमात्मा से अनुस्यूत ज्ञानाकार होने से समान आकार वाली हों, ऐसा भी नहीं है [ज्ञानैका- कार होते हुए भी भिन्न-भिन्न वासनाओं से अभिभूत होने के कारण आत्माओं में पार्थक्य का व्यवहार होता है ] “वेणुरंध्रविभेदेन” इत्यत्राप्याकारवैषम्यमात्मनां न स्वरूपकृतं अपितु देवादिपिण्डप्रवेशकृतमित्युपदिश्यते, नात्मैक्यम्। दृष्टान्ते चानेकरन्ध्र वर्त्तिनां वाय्वंशानां न स्वरूपैक्यम्, अपित्वाकार साम्यमेव। तेषांवायुत्वेनैकाकाराणां रन्ध्रभेदनिष्क्रमणकृतो हि षड्जादिसंज्ञाभेदः। एवमात्मना देवादि संज्ञाभेदः। यथा तैजसाप्यपार्थिवद्रव्यांश भूतानां पदार्थानां तत्तद्द्रव्यत्वे नैक्यमेव न स्वरूपैक्यम्, तथा वायवीयानामंशा- नामपि स्वरूपभेदोऽवर्जनीयः। “वेणुरंध्र के भेद से” इस श्लोक में भी आत्माओं का आकार वैषम्य बतलाया गया है, स्वरूप वैषम्य नहीं। देव आदि पिंड विशेष में प्रवेश करने से भिन्नता बतलाई गई है, आत्मैक्य का उल्लेख नहीं है। दृष्टान्त रूप से प्रस्तुत वेणु के अनेक रन्ध्रवर्ती वायु के, अंशो की ध्वनि विषमता बतलाई गई है वायु के स्वरूप की विषमता का कोई प्रश्न ही नहीं है। एक ही वायु विभिन्न छिद्रों से विभिन्न ध्वनियों में प्रतिध्वनित होकर षड्ज आदि नामों से व्यवहार की जाती है। ऐसे ही देव मनुष्य आदि में प्रविष्ट आत्मा का नामपरक भेद है। जैसे, तैजस, जलीय, पार्थिव द्रव्यों के अंश (कण) भिन्न-भिन्न आकार के हैं एक से नहीं हैं, वैसे ही वायवीय अंश भी स्वरूपतः भिन्न हैं। “सोऽहं सचत्वम्” इति सर्वात्मनां पूर्वोक्तं ज्ञानाकारत्वं तत् शब्देन परामृश्य तत्समानाधिकरण्येनाहं त्वमित्यादीनामर्थानां ज्ञान-