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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( १३५ ) “अतिरिक्त” और ‘अन्य’ शब्द का एक ही अर्थ में प्रयोग किया गया है, जिससे ज्ञात होता है कि “अतिरिक्त शब्द, अपने से भिन्न आत्मवाची है। “अन्य शब्द उस आत्मा का ज्ञानाकार रूप होने से, अन्याकारता (असमानता) का प्रतिषेधक है। कहने का तात्पर्य यह है कि—यदि मुझसे भिन्न कोई भी आत्मा मेरे आकार रूप ज्ञानाकार से भिन्न आकार का है तो, वहाँ कहा जायगा कि—“मैं इस आकार का” तथा “यह अन्य प्रकार के आकार का है।” सभी आत्माएं परमात्मा से अनुस्यूत ज्ञानाकार होने से समान आकार वाली हों, ऐसा भी नहीं है [ज्ञानैका- कार होते हुए भी भिन्न-भिन्न वासनाओं से अभिभूत होने के कारण आत्माओं में पार्थक्य का व्यवहार होता है ] “वेणुरंध्रविभेदेन” इत्यत्राप्याकारवैषम्यमात्मनां न स्वरूपकृतं अपितु देवादिपिण्डप्रवेशकृतमित्युपदिश्यते, नात्मैक्यम्। दृष्टान्ते चानेकरन्ध्र वर्त्तिनां वाय्वंशानां न स्वरूपैक्यम्, अपित्वाकार साम्यमेव। तेषांवायुत्वेनैकाकाराणां रन्ध्रभेदनिष्क्रमणकृतो हि षड्जादिसंज्ञाभेदः। एवमात्मना देवादि संज्ञाभेदः। यथा तैजसाप्यपार्थिवद्रव्यांश भूतानां पदार्थानां तत्तद्द्रव्यत्वे नैक्यमेव न स्वरूपैक्यम्, तथा वायवीयानामंशा- नामपि स्वरूपभेदोऽवर्जनीयः। “वेणुरंध्र के भेद से” इस श्लोक में भी आत्माओं का आकार वैषम्य बतलाया गया है, स्वरूप वैषम्य नहीं। देव आदि पिंड विशेष में प्रवेश करने से भिन्नता बतलाई गई है, आत्मैक्य का उल्लेख नहीं है। दृष्टान्त रूप से प्रस्तुत वेणु के अनेक रन्ध्रवर्ती वायु के, अंशो की ध्वनि विषमता बतलाई गई है वायु के स्वरूप की विषमता का कोई प्रश्न ही नहीं है। एक ही वायु विभिन्न छिद्रों से विभिन्न ध्वनियों में प्रतिध्वनित होकर षड्ज आदि नामों से व्यवहार की जाती है। ऐसे ही देव मनुष्य आदि में प्रविष्ट आत्मा का नामपरक भेद है। जैसे, तैजस, जलीय, पार्थिव द्रव्यों के अंश (कण) भिन्न-भिन्न आकार के हैं एक से नहीं हैं, वैसे ही वायवीय अंश भी स्वरूपतः भिन्न हैं। “सोऽहं सचत्वम्” इति सर्वात्मनां पूर्वोक्तं ज्ञानाकारत्वं तत् शब्देन परामृश्य तत्समानाधिकरण्येनाहं त्वमित्यादीनामर्थानां ज्ञान-

मेवाकार इत्युपसंहरन् देवाद्याकार भेदेनाऽत्मसु भेदमोहं परित्यजे- ताह । अन्यथा देहातिरिक्त आत्मोपदेश्य-स्वरूपे अहं त्वं सर्वमेतदा- त्म स्वरूपमिति भेदनिर्देशो न घटते । अहं त्वमादिशब्दानां उपलक्ष्येण सर्वमेतदात्मस्वरूपमित्यनेन सामानाधिकरण्यादुपलक्षणत्वमपि न संगच्छते । सोऽपि यथोपदेशमकरोदित्याह "तत्याजभेदं परमार्थं दृष्टिः" इति । कुतश्चैष निर्णय इति चेत् देहात्मविवेकविषयत्वादुप- देशस्य । तच्च "पिण्डः पृथग्यतः पुंसश्शिरः पाण्यादिलक्षणः" इतिप्रक्रमात् । "वही मै वही तुम हो" इत्यादि वाक्य में भी तत (सः) शब्द द्वारा समस्त आत्माओं की ज्ञानाकारता का निर्देश करके पुनः ज्ञानाकार उस आत्मा के साथ अहं और त्वं पद का अभेद निर्देश करते हुए उप- संहार किया गया है, इसमें देवादि आकार भेद से आत्माओ में हुई भेद भ्रान्ति को छोड़ने का उपदेश दिया गया है।

अभिचाकशीति”—“ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्यलोके गुहांप्रविष्टौ परमे परार्ध्ये, छाया तपौ ब्रह्मविदो वदंति पंचाग्नयो येच त्रिणाचिकेताः” —“अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा” इत्याद्याः । अस्मि- न्नपि शास्त्रे “ससर्वभूतं प्रकृतिं विकारान् गुणादि दोषश्च मुने व्यतीतः, अतीतसर्वावरणोऽखिलात्मा तेनाऽस्तृतं यद्भुवनान्तराले” —“समस्त कल्याण गुणात्मकोऽसौ”—“परः पराणां सकला न यत्र क्लेशादयस्संति परावरेशे”—“अविद्या कर्म संज्ञाऽन्या तृतीया शक्ति- रिष्यते, ययाक्षेत्रज्ञ शक्तिस्सा वेष्टिता नृप सर्वगा” इति भेदव्यपदे- शात् । “उभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते”—“भेदव्यपदेशाच्चान्यः” —“अधिकंतुभेद निर्देशात्” इत्यादि सूत्रेषु च । “य आत्मनि तिष्ठन् नात्मनोऽन्तरो यमात्मा नवेद, यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति “प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तः”—“प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः” इत्यादिभिः उभयोरन्योन्यप्रत्यनीकाकारेण स्वरूप निर्णयात् ।

“विभेदजनके ज्ञाने” इत्यादि वाक्य भी जीवात्मा-परमात्मा की स्वरूपगत एकता का प्रतिपादक नहीं है । और न जीवात्मा-परमात्मा की स्वरूपगत एकता का उक्त कथनानुसार निषेध ही होता है । जीवात्मा परमात्मा की स्वरूपगत एकता देह और आत्मा की तरह नहीं हो सकती । श्रुति का भी उक्त मत है—“दो पक्षी एक वृक्ष पर बैठे हैं, जो कि सहचर सखा हैं, उनमें से एक (जीव) परिपक्व (भोग के उपयुक्त) पिप्पल (कर्म) फल का भोग करता है, और दूसरा (परमात्मा) भोग नहीं करता केवल देखता (साक्षी) मात्र है ।” ब्रह्मविद और पंचाग्नि साधक लोग तथा तीन बार नाचिकेताग्नि का चयन करने वालों ने कहा है कि-इस लोक (देह) में पुण्य फल भोक्ता छाया और आतप के समान दो स्वरूप (जीवात्मा और परमात्मा) बुद्धि रूप उत्तम गुहा में स्थित हैं । “वह सर्वात्मक सभी के अन्तःकरण में स्थित होकर शासन करता है ।” इत्यादि । और शास्त्र (विष्णुपुराण) में भी इसी प्रकार का उपदेश है—“वह (परमात्मा) समस्त भूतों के उपादान प्रकृति और उसके

( १३८ ) विकारों एवं हर प्रकार के गुण दोषों से रहित, सभी प्रकार के ज्ञानां- वरणों से रहित, समस्त भूतों के आत्मा हैं, भुवन के अन्तराल में जो कुछ भी है वह उन्हीं से व्याप्त है। वे सब प्रकार के मंगलमय गुणों से पूर्ण, श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतर हैं। वे सर्वेश्वर क्लेश आदि दोषों से रहित हैं। भगवान की कर्म नामक एक तीसरी अविद्या शक्ति है, जिससे सर्वगत क्षेत्रज्ञ (तटस्थ जीव) शक्ति वेष्टित है। "इत्यादि श्लोकों में परस्पर भेद का निर्देश किया गया है। "उमयेऽपि हि भेदे नैनमधीयते" "भेदव्यपदेशाच्चान्यः" "अधिकन्तु भेदनिर्देशात्" आदि सूत्रों में सूत्रकार भी उक्त कथन की पुष्टि करते हैं। "जो आत्मा में स्थित होकर संयम करते हैं, जीवात्मा जिन्हे नहीं जानता, आत्मा ही जिनका शरीर है"- "प्राज्ञ परमात्मा से संसक्त होकर"- "प्राज्ञ परमात्मा से अधिष्ठित होकर" इत्यादि श्रुतियाँ, जीवात्मा और परमात्मा के परस्पर विलक्षण रूप का निरूपण करती हैं। नापि साधनानुष्ठानेन निर्मुक्ताविद्यस्यपरेण स्वरूपैक्य संभवः अविद्याश्रयत्वयोग्यस्य तदनर्हत्वासंभवात् । यथोक्तम्-"परमात्मा त्मनोर्योगः परमार्थ इतीष्यते, मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैति तद्द्रव्यतां यतः" इति । मुक्तस्य तु तद्धर्मतापत्तिरेवेति भगवद्गीतासूक्तम्- "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम् साधर्म्यमागताः, सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।" इति इहापि-"आत्मभावं नयंत्येनं तद्ब्रह्म- ध्यायिनं मुने, विकार्यमात्मनः शक्त्या लोहमाकर्षको यथा।" इति । साधन विशेष के अनुष्ठान द्वारा, अविद्या के क्षय हो जाने के बाद भी जीवात्मा की परमात्मा के साथ एकता संभव नहीं है, क्यों कि- अविद्याश्रित जीव की अविद्या से बचे रहने की क्षमता नहीं हैं। जैसा कि कहते हैं-"परमात्मा और जीवात्मा की एकता को सत्य कहना, मिथ्या भ्रम है, क्यों कि-एक द्रव्य कभी दूसरा द्रव्य नही हो सकता।" मुक्तात्मा को भगवान के समान गुण ही प्राप्त होते हैं, ऐसा भगवद्गीता में कहा गया है-"ज्ञान का आश्रय लेकर जो मेरे समान गुणों को प्राप्त करते हैं, वे सृष्ठि में जन्म नहीं पाते और प्रलय में दुःखी नहीं होते।" ankurnagpal108@gmail.com

( १३६ ) विष्णुपुराण में भी जैसे—"जैसे अग्नि लोहे के विकारों को समाप्त कर देती है, उसी प्रकार, परमात्मा भी अपने ध्यान करने वालों को आकृष्ट कर आत्मभाव प्रदान करते हैं।" आत्मभावम् आत्मनस्स्वभावम् । नहि आकर्षकस्वरूपापत्तिः आकृष्यमाणस्य । वक्ष्यति च "जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहि- तत्त्वाच्च"—"भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च"— "मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच्च" इति । वृत्तिरपि—"जगद्व्यापारवर्जं समानो ज्योतिषा" इति । द्रवि- डभाष्यकारश्च— "देवता सायुज्यादशरीरस्यापि देवतावत्सर्वार्थसिद्ध- स्स्यात्" । इत्याह-श्रुतयश्च—"यःइहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति"—"ब्रह्मवि- दाप्नोतिपरम्"—"सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सहब्रह्मणा विपश्चिता"- — "एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य, इमान् लोकान् कामान्नीकामरू- प्यनुसंचरन्"—"सतत्रपर्य्येति"—"रसो वै सः, रसह्येवायं लब्ध्वाऽ- नंदीभवति "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे अस्तंगच्छन्ति नामरूपे विहाय, तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्"—"तदा विद्वान् पुण्यपापे विहाय निरंजनः परमं साम्यमु- पैति" इत्याद्याः । 'आत्मभावम्' का तात्पर्य है, आत्मा का स्वभाव । आकृष्ट होने वाली वस्तु आकर्षक के स्वरूप को प्राप्ति नहीं कर पाती । जैसा कि—सूत्रकार— "जगद्व्यापारवर्जं, भोगमात्र साम्य मुक्तोपसृप्य०" इत्यादि सूत्रों में उक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करते हैं । "जगत् रचना की क्षमता न होने से जीवात्मा की ज्योति ही परमात्मा के समान होती है" ऐसी वृत्ति भी है । द्रविडभाष्यकार भी कहते हैं—"भगवत् सायुज्य प्राप्त मुक्तात्मा भी भगवान् के समान सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त करते हैं।" श्रुतियां भी उक्त वस्तु की पुष्टि करती हैं जैसे—"जो परमात्मा के ऐसे स्वरूप तथा सत्य कामनाओं को जानकर, इस लोक से प्रयाण करते हैं, उनकी समस्त ankurnagpal108@gmail.com

( १४० ) लोकों में अप्रतिहत गति होती है।” ब्रह्मवेत्ता परमात्मा को प्राप्त करते हैं—“वह परमात्मा के साथ समस्त कामनाओं को भोगता है।” इस आनन्दमय परमात्मा को प्राप्त कर सभी प्रकार के काम्यफलों का भोग करता है। “परमात्मा रस स्वरूप है, उस रस का आस्वाद कर जीवात्मा आनन्दित होता है।” मुक्तपुरुष वहाँ जाता है। “नदियाँ जैसे समुद्र में मिलने पर अपने नाम रूप का परित्याग कर देती है, वैसे ही जीवात्मा भी अपने नाम रूप से छूटकर उस परात्पर दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है।” ब्रह्मज्ञ पुरुष पुण्य पाप से छूट कर निरंजन परमात्मा की समता प्राप्त करता है।” इत्यादि । पराविद्यासु सर्वासु सगुणमेव ब्रह्मोपास्यम् । फलं चैकरूपमेव । अतो विद्याविकल्प इति सूत्रकारेणैव—“आनन्दादयः प्रधानस्य” “विकल्पोऽविशिष्ट फलत्वात्” इत्यादिषूक्तम्। वाक्यकारेण च सगु- णस्यैवोपास्यत्वं विद्याविकल्पश्चोक्तः “युक्तं तद् गुणकोपासनात्” इति । भाष्यकृता व्याख्यातं च “यद्यपि सच्चितः” इत्यादिना । “ब्रह्मवेद ब्रह्मैवभवति” इत्यत्रापि-“नामरूपादविमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैतिदिव्यम्”—“निरंजनः परमं साम्यमुपैति”—“परंज्योति- रूपसंपद्य स्वेनरूपेणाभिनिष्पद्यते” इत्यादिभिरैकार्थ्यात् प्राकृत- नाम रूपाभ्यां विनिर्मुक्तस्य निरस्ततत्कृतभेदस्य ज्ञानैकाकारतया ब्रह्मप्रकारतोच्यते । प्रकारैक्ये च तत्वव्यवहारो मुख्यएव, यथा सेयं गौरिति । सभी ब्रह्मविद्याओं में सगुणब्रह्म को ही उपास्य तथा ब्रह्मसारूप्यता को मोक्ष बतलाया गया है। विद्याओं की समान प्रणाली का “आनन्द- दयः प्रधानस्य” विकल्पोऽविशिष्ट फलत्वात् “सूत्रों में सूत्रकार प्रतिपादन करते हैं। वाक्यकार भी सगुण की उपास्यता तथा विद्याओं की समानता का प्रतिपादन” युक्तं तद्गुणकोपासनात्” कह कर करते हैं। “यद्यपि सच्चितः” इत्यादि में भाष्यकार भी उक्त तथ्य की ही पुष्टि करते हैं। “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है”, नामरूप से विमुक्त परात्पर दिव्य पुरुष ankurnagpal108@gmail.com

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को प्राप्त करता है, "निरंजन की समता प्राप्त करता है", परमात्मा की ज्योति से संपन्न अपने वास्तविक स्वरूप से निष्पन्न होता है, "इत्यादि श्रुतियाँ भी प्राकृत लौकिक, नामरूप के लोप तथा नामरूप जन्य भेद दृष्टि के लुप्त हो जाने पर जो एकाकार ज्ञान होता है, इतने अंशमात्र में ही, जीवात्मा परमात्मा की एकता का प्रतिपादन करती हैं । एक ही प्रकार की वस्तु में जो एकता का व्यवहार होता है, वह मुख्यता परक ही होता है, जैसे कि—"यह वही गौ है ।" अत्रापि—"विज्ञानं प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव, प्रापणी- यस्तथैवात्मा प्रक्षीणशेषभावनः" इति । परब्रह्मध्यानादात्मा परब्रह्म- वत् प्रक्षीणशेषभावनः कर्मभावना, ब्रह्मभावना,उभयभावना, इति भावनात्रय रहितः । प्रापणीय इत्यभिधाय—"क्षेत्रज्ञः करणी ज्ञानं करणं तस्य वै द्विज, निष्पाद्य मुक्तिकार्यं हि कृतकृत्यं निवर्त्तयेत्" इति करणस्य परब्रह्मध्यानरूपस्य प्रक्षीणाशेषभावनात्मस्वरूप प्राप्त्या कृतकृत्यत्वेन निवृत्ति वचनात् सिद्धि अनुष्ठेयम् इत्युक्त्वा--"तद्- भावभावमापन्नः तदासौ परमात्मना भवत्यभेदोभेदश्च तस्याज्ञान- कृतोभवेत् ।" इति मुक्तस्य स्वरूपमाह । तद्भावः ब्रह्मणोभावः स्वभावः । नतु स्वरूपैक्यम्, तद्भावभावमापन्न इति द्वितीयभाव- शब्दानन्वयात् पूर्वोक्तार्थ विरोधाच्च । यद् ब्रह्मणः प्रक्षीणाशेषभावनत्वं तदापत्तिस्तद् भावभावापत्तिः । यदैवमापन्नस्तदासौ परमात्मा अभेदी भवति, भेदरहितो भवति । ज्ञानैकाकारतया परमात्मनैक प्रकारस्यास्य तस्माद् भेदो देवादिरूपः। तदन्वयोऽस्य कर्मरूपाज्ञानमूलः। न स्वरूपकृतः, सतु देवादिभेदः परब्रह्मध्यानेन मूलभूताज्ञानरूपे कर्मणि विनष्टे हेत्वभावात् निवर्त्तते इति अभेदी भवति । यथोक्तम्— "एक स्वरूपभेदस्तु बाह्य कर्म प्रवृत्तिजः देवादिभेदेऽपध्वस्ते नास्त्येवावरणोहि सः । इति । विष्णुपुराण में भी जैसे—"परब्रह्म ही जीव के लिए एकमात्र प्राप्य है, विज्ञान ही एकमात्र प्रापक ( प्राप्ति का उपाय ) है तथा समस्त ankurnagpal108@gmail.com

( १४२ ) भावनाओं से रहित आत्मा भी उसी प्रकार प्रापणीय है।' परब्रह्म के ध्यान से जीवात्मा परब्रह्म के समान समस्त भावनाओं से शून्य हो जाता है। भावनाये तीन प्रकार की है, कर्मभावना (शुभाशुभ संस्कार) ब्रह्म भावना तथा कमब्रह्म उभयभावना। इन तीनो प्रकार की भावनाओं से रहित होना ही अभिधेय है। ऐसी स्थिति की प्राप्ति को बतलाकर “क्षेत्रज्ञ जीवात्मा करणी (उपासक) तथा उपासना करण (उपास) है, इसके द्वारा मुक्ति कार्य का संपादन कर कृतकृत्य होना चाहिए।” इस वाक्य मे परब्रह्म ध्यान रूप करण से पूर्वोक्त भावनात्रय रहित आत्म- स्वरूप प्राप्ति की कृतार्थता बतलाई गई है। सिद्ध किया गया है कि- जब तक फल सिद्धि न हो जाय तब तक अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए। इसके बाद-“तद्भाव को प्राप्त यह उपासक, परमात्मा के साथ अभिन्न हो जाता है, उस स्थिति मे अज्ञान कृत भेद भी रहता है।” इस वाक्य मे मुक्तात्मा का स्वरूप बतलाया गया है तद्भाव का तात्पर्य है, ब्रह्म का भाव अर्थात् स्वभाव। तद्भाव का तात्पर्य स्वरूपैक्य नहीं है। “तद्भावभावभापन्नः” इस वाक्य में द्वितीय भाव शब्द का उक्त प्रकार का अन्वय नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त अर्थ से विरुद्ध होगा। ब्रह्म की जैसी समस्त भावना रहित स्थिति रहती है वैसे ही मोक्षावस्था में जीवात्मा की भी हो जाती है, यही तद्भावभावापत्ति का तात्पर्य है। जीवात्मा उस स्थिति को प्राप्त कर ही परमात्मा के साथ अभिन्न हो पाता है, अर्थात् भेद भाव रहित हो जाता है। मुक्तपुरुष एक मात्र ज्ञानमय आकार प्राप्त कर ही परमात्मा के आकार का होता है, फिर भी देव मनुष्यादि रूप से उसका भेद रहता है उसकी यह भेदावस्था कर्ममय अज्ञान जन्य होती है, स्वरूपतः नहीं होती। जिस समय परब्रह्म के ध्यान से, भेद- कारक अज्ञानरूपी कर्म विनष्ट हो जाता है, उस समय कारण के अभाव से, कार्यरूप देव आदि भेद भी लुप्त हो जाते हैं। वही अभेदरूपता की स्थिति होती है। जैसा कि कहते हैं-“आत्मा स्वरूपतः एक है, केवल वाह्य देहादिकृत कर्ममय आवरण से आवृत्त होने से उसका भेद होता है, देवादि भेदों के नष्ट हो जाने पर आभ्यन्तर आवरण भी नष्ट हो जाता है।” एतदेव विवृणोति-“विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते, आत्मनो ब्रह्मणोभेदमसन्तं कः करिष्यति “इति। विभेदः विविधो ankurnagpal108@gmail.com

भेदः, देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मकः । यथोक्तः शौनकेनापि-- “चतुर्विधोऽपिभेदोऽयं मिथ्याज्ञाननिबन्धनः “इति । आत्मनि ज्ञान रूपे देवादिरूपविविधभेदहेतुभूतकर्माख्याऽज्ञाने परब्रह्म ध्यानेनात्यं- तिक नाशं गते सति हेत्वभावात् असन्तं परस्मात् ब्रह्मण आत्मनो देवादिरूपभेदं कः करिष्यति इत्यर्थः । “अविद्या कर्मसंज्ञाऽन्या “इति हि अत्रैवोक्तम् । उक्त तथ्य का ही विवेचन करते हुए कहते है— “विभेद जनक अज्ञान के एक दम नष्ट हो जाने पर, आत्मा ब्रह्म के असत् भेद को कौन कर सकेगा । “विभेद का तात्पर्य है ,देव पशु मनुष्य स्थावरादि विविध भेद । जैसा कि शौनक ने भी कहा है- “स्थावर आदि चार प्रकार के भेद , मिथ्या ज्ञान से होते है। “अर्थात् ज्ञान रूप आत्मा में देवादि रूप विविध भेदों के कारणरूपी कर्म नामक अज्ञान के, परब्रह्म की ध्यान रूपी उपासना से एकदम नष्ट होने पर, कारण के अभाव में परमात्मा और जीवात्मा के देवादि रूप भेद को करने वाला कौन शेष रह जाता है । यहीं पर कहा भी गया है—“कर्म नामक अविद्या भेद रूपा है”। “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” इत्यादिना अन्तर्यामिरूपेण सर्वे- ष्यात्मतयैक्याभिधानमन्यथा “क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते, उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः “इत्यादिनिर्विरोधः । अन्तर्यामिरूपेण सर्वेषामात्मत्वं तत्रैव भगवताऽभिहितम्-“ईश्वरस्सर्वभूतानां हृद्दे- शेऽर्जुन तिष्ठति” सर्वस्य चाहं हृदिसंनिविष्ट. “इति च । “अहमा- त्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः “इति च तदेवोच्यते । भूतशब्दो- हि आत्मपर्यन्तदेहवचनः । यतः सर्वेषामयमात्मा तत एव सर्वेषा तच्छरीरतया पृथगवस्थानं प्रतिषिध्यते– ‘ न तदस्ति विनायत्स्यात् “इति, भगवद्विभूत्युपसंहारश्चायमिति तथैवाभ्युपगन्तव्यम् । तत इदमुच्यते –“यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा तत्तदेवाव- गच्छत्वं मम तेजोंऽशसंभवम् “विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो

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जगत्” इति। अतः शास्त्रेषु न निर्विशेष वस्तुप्रतिपादनमस्ति। नाप्यर्थजातस्य भ्रांतत्वप्रतिपादनम्। नापि चिदचिदीश्वराणां स्वरू- पभेद निषेधः। “क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो” इस भगवद् वाक्य में अन्तर्यामी रूप से परमात्मा के सर्वात्म भाव ऐक्य को बतलाया गया है; यदि ऐसा नहीं मानेगे तो, “सभी भूतों को क्षर, कूटस्थ आत्मा को अक्षर तथा इनसे भिन्न श्रेष्ठ उत्तम पुरुषोत्तम है “इत्यादि वाक्य से विरुद्ध होगा। अन्तर्यामी रूप से सभी की आत्मता को गीता मे स्वयं भगवान् ने स्वीकारा है- “अर्जुन ! समस्त प्राणियो के अन्तः करण में ईश्वर विराजमान है “सभी के अन्तः करणों में, मै प्रविष्ट हूँ “इत्यादि ।” गुडाकेश! समस्त प्राणियो के अन्तःकरण में स्थित मैं आत्मा हूँ” इत्यादि में भी वही बात कही गई है। भूत शब्द आत्मा के देह तक सभी का द्योतक है। जैसे परमात्मा सभी के अन्तर्यामी आत्मा है, उसी प्रकार सारा ही भूतवर्ग उनका शरीर स्थानीय है ,इसलिए समस्त भूतों से उनकी पृथक्ता का निषेध किया गया है। “जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे परमात्मा से भिन्न कहा जा सके” यह भगवद् विभूति के उपसंहार का वाक्य है, अतः इसे ही प्रकरण का तात्पर्य मानना चाहिए। इस पर ही कहा गया कि-“जो जो विभूतिमान तथा अलौकिक प्रभा संपन्न हैं ,उन्हें मेरे तेजांश से ही प्रकट समझो, एक अंश से मै ही सारे जगत मे व्याप्त हूँ ।” इत्यादि से ज्ञात होता है कि- शास्त्रों में निर्विशेष वस्तु का प्रतिपादन नही है और न समस्त जागतिक विषयों के मिथ्यात्व का प्रतिपादन है ' जड चेतन ईश्वरीय विभूतियों के स्वरूप भेद का भी निषेध नही है। यदप्युच्यते-निर्विशेषे स्वयंप्रकाशे वस्तुनि दोषपरिकल्पित- मीशेशितव्याद्यनन्तविकल्पं सर्वं जगत्। दोषश्च स्वरूपतिरोधान विविधविचित्र विक्षेपकारी सदसदनिर्वचनीयाऽनाद्यविद्या। सा च अवश्याभ्युपगमनीया; “अनृतेन हि प्रत्यूढाः “इत्यादिभिः श्रुतिभिः, ब्रह्मादस्तत्त्वमस्यादिवाक्यसामानाधिकरण्यावगतजीवैक्यानुपपत्त्या च सातु न सती, भ्रांतिबाधयोरयोगात्। नाप्यसती, ख्यातिबाधयोश्चा- ankurnagpal108@gmail.com

( १४५ ) योगात् । श्रतः कोटिद्वयविनिर्मुक्ते'यमविद्येति तत्त्वविदः इति तद- युक्तम् । (वाद) इसपर भी यह कहते हैं कि—“निर्विशेष स्वयं प्रकाश ईश्वर ही एक मात्र शासन कर्त्ता है तथा समस्त जगत उनका शास्य है ‘ऐसा’ मानना दोष परिकल्पित है । स्वरूप को ढकने वाली—विविध विचित्र विक्षेपों को करने वाली, सद् असद् कुछ भी न कह सकने योग्य, अनादि अविद्या ही दोष है । “अनृतेन ही प्रत्यूढाः “इत्यादि श्रुति के अनुसार उक्त प्रकार की अविद्या का अस्तित्व स्वीकारना पड़ेगा, अस्वीकार करने से तत्वमसि “इत्यादि वाक्य से जो जीव ब्रह्म की एकता की प्रतीति होती है, वह संगत न हो सकेगी । वह अविद्या सत् पदार्थ भी नहीं है, उसे सत् मानने से उसकी भ्रांतिजनकता और ज्ञानाबाध्यता संभव नहीं होगी। अविद्या असत् भी नहीं है, असत् मानने से उसकी सामयिकी प्रतीति और बाध नहीं हो सकेगी । इसलिए तत्त्वविदों ने इसे सद् असद् कोटियों से विल- क्षण अविद्या कहा है । इसलिए तुम्हारा उपर्युक्त शास्य शासन वाला कथन असंगत है । (प्रतिवाद) सा हि किमाश्रित्य भ्रमं जनयति ? न तावज्जीव- माश्रित्यश्रविद्या परिकल्पितत्वात् जीवभावस्य । नापि ब्रह्माश्नित्य तस्य स्वयंप्रकाश ज्ञानस्वरूपत्वेनाविद्याविरोधित्वात् । सा हि ज्ञानबाध्याऽभिमता । “ज्ञानरूपं परंब्रह्म तन्निवर्त्यं मृषात्मकम् , अज्ञानंचेत् तिरस्कुर्यात् कः प्रभुः तन्निवर्त्तने”—ज्ञानं ब्रह्मेति चेत् ज्ञानमज्ञानस्य निवर्त्तकम् , ब्रह्मवत् तत्प्रकाशकत्वात् अपि हि अनिव- र्त्तकम्”—“ज्ञानं ब्रह्मेति विज्ञानमस्ति चेत्स्यात्प्रमेयता ,ब्रह्मणोऽननु- भूतित्वं त्वदुक्त्यैव प्रसज्यते”। ज्ञानस्वरूपं ब्रह्मेति ज्ञानंतस्या अविद्यायाः बाधकम्,। न स्व- रूपभूतं ज्ञानमिति चेत् ,न, उभयोरपि ब्रह्मस्वरूप प्रकाशत्वे सत्यन्यत- रस्यानविद्याविरोधित्वं अन्यतरस्यनेति विशेषानवगमात् । ankurnagpal108@gmail.com

(प्रतिवाद) वह अविद्या किसके आश्रय से भ्रमोत्पादन करती है ? जीव के आश्रय से तो कर नहीं सकती, क्यों कि जीव भाव स्वयं ही अवि- द्या परिकल्पित है। ब्रह्म के आश्रय से भी नहीं कर सकती, क्यों कि वह स्वयंप्रकाश और ज्ञानस्वरूप है, जो कि अविद्या विरोधी रूप है। वह तो ज्ञान बाध्या ही मानी गई है। “परब्रह्म ज्ञानस्वरूप हैं, मिथ्यात्मक ज्ञान उनसे निवर्त्य है, अज्ञान यदि ज्ञानमय ब्रह्म को ही आवृत कर लेगा तो उसका निवारण करने में कौन समर्थ है ? यदि ज्ञान ही ब्रह्म है, और वही अज्ञान का नि- वर्त्तक है, सो ऐसा ज्ञान भी अज्ञान का निवारक नहीं हो सकता क्यों कि, वह भी ब्रह्म की तरह, उसके प्रकाश से प्रकाशित है। यदि कहो कि-ब्रह्म ज्ञान स्वरूप है, ऐसा विशेष ज्ञान होने मात्र से अज्ञान नष्ट हो जायगा, सो ऐसा मानने से ब्रह्म प्रमेय हो जायगा तथा तुम्हारे ही कथन से तुम्हारी अभिमत ब्रह्म की अनुभूतिता बाधित हो जायगी।” यदि कहो कि--ब्रह्म ज्ञान स्वरूप है, ऐसा ज्ञान ही उस अविद्या का बाधक है, ब्रह्म का स्वरूपगत ज्ञान अविद्या निवर्त्तक नहीं है, सो ऐसा कहना भी उपयुक्त न होगा क्यों कि-दोनों ही प्रकार के ज्ञान ब्रह्म के स्वरूप से प्रकाशित होने के कारण प्रकाश स्वरूप हैं, इसलिए उनमें एक अविद्या का विरोधी हो और दूसरा अविरोधी, यह कैसे संभव है। एतदुक्तं भवति--ज्ञानस्वरूपं ब्रह्मेत्यनेनज्ञानेनब्रह्मणि यस्स्वभा- वोऽवगम्यते, स ब्रह्मणः स्वयं प्रकाशत्वेन स्वयमेव प्रकाशते, इति अविद्या विरोधित्वेन कश्चिद् विशेषस्वरूपस्तद्विषयज्ञानयोः इति किंच अनुभवस्वरूपस्यब्रह्मणोऽनुभवान्तरानुभाव्यत्वेन भवतो न तद्विषयं ज्ञानमस्ति। अतो ज्ञानमज्ञान विरोधि चेत् स्वयमेव विरोधि भवतीति, नास्या ब्रह्माश्रयत्व संभवः। शुक्त्यादयस्तु स्वयाथात्म्यप्रकाशे स्वयमसमर्थास्तु अज्ञानाविरोधिनः तन्निवर्त्तने च ज्ञानान्तरमपेक्षन्ते। ब्रह्म तु स्वानुभवसिद्धस्वयाथात्म्यमिति स्वाज्ञानविरोध्येव। तत एव निवर्त्तकान्तरं च नापेक्षते। अथोच्येत ankurnagpal108@gmail.com

( १४७ ) ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य मिथ्यात्वज्ञानमज्ञान विरोधि इति। न इदं ब्रह्मव्यतिरिक्तमिथ्यात्वज्ञानं किं ब्रह्म याथात्म्य ज्ञान विरोधि ? उत् प्रपंच सत्यत्वरूपाज्ञानविरोधीति विवेचनीयम् न तावद्ब्रह्म- याथात्म्यज्ञानविरोधि अतद्विषयत्वात् , ज्ञानाज्ञानयोरेकविषयत्वेन हि विरोधः। प्रपंच मिथ्यात्वज्ञानं तत् सत्यस्वरूपा ज्ञानेन विरुध्यते । तेन प्रपंचसत्यत्वरूपाज्ञानमेव बाधितमिति ब्रह्मस्वरूपाज्ञानं तिष्ठत्येव । ब्रह्मस्वरूपाज्ञानं नाम तस्य सद्वितीयत्वमेव । तत्तु तद् व्यतिरिक्तस्य मिथ्यात्वज्ञानेन निवृत्तम् । स्वरूपंतु स्वानुभवसिद्धमिति चेन्न, ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वं स्वरूपं स्वानुभवसिद्धमिति तद्विरोधि सद्वितीय- त्वरूपाज्ञानं न बाधश्च न स्याताम् । अद्वितीयत्वंधर्मं इति चेन्न, अनुभवस्वरूपस्य ब्रह्मणोऽनुभाव्यधर्मं विरहस्य भवतैव प्रतिपा- दित्वात् अतोज्ञानस्वरूपस्य ब्रह्मणो विरोधादेव ना ज्ञानाश्रयत्वं । कथन यह है कि—"ज्ञान स्वरूप ब्रह्म" ऐसे ज्ञान से ब्रह्म स्वभाव की जो प्रतीति होती है, वह ब्रह्म के स्वयं प्रकाश होने से स्वतः ही प्रकाशित होता है, उसका माहात्म्यज्ञान ही अविद्या का निवारक हो, यह कोई आवश्यक बात नहीं है । बात दोनों ही एक हैं, स्वरूप ज्ञान और माहात्म्य ज्ञान दोनों ही समान वस्तु हैं । और तुम्हारे मतानुसार ब्रह्म स्वयं ही अनुभव स्वरूप है, उसके लिए किसी दूसरे अनुभव की अपेक्षा नहीं है, इसलिए तद्विषयक कोई ज्ञान नाम की वस्तु भी नहीं है ज्ञान को यदि स्वभावतः अज्ञान का विरोधी कहा जाय तो, वह स्वयं ही विरोधी हो जायगा, फिर भी उस अविद्या की ब्रह्माश्रयता संभव नहीं है । शुक्ति आदि अपनी वास्तविकता की प्रतीति कराने में स्वयं असमर्थ हैं, अज्ञान स्वरूप शुक्ति आदि को उस अज्ञान की निवृत्ति के लिए किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा होती है । ब्रह्म तो स्वानुभव सिद्ध है, उसे अपने वास्तविक स्वरूप का स्वयमेव ज्ञान है, इसलिए वह स्वयं ही अज्ञान का विरोधी है । तभी उसे किसी अन्य निवर्त्तक ज्ञान की अपेक्षा नहीं है । इस पर यदि यह कहो कि—ब्रह्म के अतिरिक्त पदार्थ के मिथ्यात्व का ज्ञान ही अज्ञान का विरोधी है, सो बात भी ठीक नहीं है—जिसे तुम ankurnagpal108@gmail.com

( १४८ ) अन्य पदार्थ के मिथ्यात्व का ज्ञान बतला रहे हो, क्या वह ब्रह्म से यथार्थ ज्ञान का विरोधी है ? अथवा जगत सत्यता रूप अज्ञान का विरोधी है ? इस विषय पर विवेचन करना होगा । ब्रह्म के यथार्थ ज्ञान का विरोधी तो हो नही सकता, क्यों कि—अज्ञान का ब्रह्मविषयक होना संभव नही है। ज्ञान और अज्ञान एकविषयक होते भी नहीं। प्रपंचमय जगत की मिथ्यात्व की प्रतीति, उसकी सत्यस्वरूपा प्रतीति से स्वयं ही विरुद्ध है। इससे प्रपंचमय की सत्यता रूप प्रतीति का बाध हो जाता है, जगत की सत्यता की प्रतीति का बाध ब्रह्म के स्वरूप का बाध है, अद्वैत ब्रह्म में द्वैतभाव भावना ही तो ब्रह्म के स्वरूप से संबंधी अज्ञान है, इस प्रकार जगत की सत्यता की प्रतीति के बाध का तात्पर्य है ब्रह्म जगत के अद्वैत स्वरूप का बाध, ऐसे बाध को स्वीकारने का तात्पर्य है कि ब्रह्म में अज्ञान की स्वीकृति । अद्वैत ब्रह्म में जो द्वैतभाव है, वह ब्रह्म से भिन्न किसी वस्तु के मिथ्यात्व मानने से ही निवृत्त हो सकता है, ब्रह्म संबंधी वस्तु के मिथ्यात्व की स्वीकृति तो द्वैतभाव की ही स्वीकृति है। ब्रह्म का स्वरूप ही केवल स्वानुभव सिद्ध है, ऐसा नही कहा जा सकता । ब्रह्म से अभिन्न जगत का स्वरूप भी स्वानुभव सिद्ध है। ऐसा मानने से, ब्रह्म के अद्वैत ज्ञान के विरोधी द्वैतरूपी अज्ञान और उस अज्ञान के बाध का प्रश्न ही नही रह जाता । यदि कहें कि—द्वैतभाव ब्रह्म का धर्म है, सो कहना तो आपके इस कथन “अनुभव स्वरूप ब्रह्म अनुभव्य नहीं हो सकता" के सर्वथा विपरीत होगा । इसलिए अज्ञान का विरोधी ब्रह्म कभी अज्ञान का आश्रय नहीं हो सकता । तिरोधान किं च अविद्यया प्रकाशैकस्वरूपं ब्रह्म तिरोहितमिति वदता, स्वरूपनाश एवोक्तः स्यात्, प्रकाश तिरोधानं नाम, प्रकाशोत्पत्ति प्रतिबन्धो विद्यमानस्य विनाशो वा । प्रकाशस्यानुत्पाद्यत्वाभ्युपगमेन प्रकाश तिरोधानं प्रकाश नाश एव । प्रकाशैक स्वरूप ब्रह्म को अविद्या से तिरोहित कहना, ब्रह्म का स्वरूप नाश ही मानना है। प्रकाशोत्पत्ति का प्रतिबन्ध ही प्रकाश का तिरोधान है, अथवा उसके अस्तित्व का विनाश है। प्रकाश की अनुत्पा- द्यता तो हो नहीं सकती, इसलिए प्रकाश के तिरोधान का तात्पर्य, प्रकाश नाश ही कहना होगा । ankurnagpal108@gmail.com

स्वरूपानुपपत्ति ( १४६ ) अपि च निर्विषया निराश्रया स्वप्रकाशेयमनुभूतिः स्वाश्रय- दोषवशात् अनंताश्रयमनन्तविषयमात्मानमनुभवतीत्यत्र किमयं स्वाश्रयदोषः परमार्थ भूत. ? उत् अपरमार्थभूत इति विवेच- नीयम् । न तावत् परमार्थः, अनभ्युपगमात्। नाप्यपरमार्थः, तथा सति हि द्रष्टृत्वेन वा, दृश्यत्वेन वा, दृशित्वेनवाऽभ्युपगमनीयः । न तावद्दृशिः, दृशिस्वरूपभेदानभ्युपगमात्, भ्रमाधिष्ठानभूतायास्तु साक्षात् दृशेर्माध्यमिक पक्ष प्रसंगेनापारमार्थ्यानभ्युपगमाच्च । द्रष्टृ दृश्ययोस्तदवच्छिन्नाया दृशेश्च काल्पनिकत्वेन मूलदोषान्तराऽपेक्षयाऽ- ननवस्था स्यात् । अथैतत्परिजिहीर्षया परमार्थसत्यनुभूतिरेव ब्रह्मरूपा दोष इति चेत्, ब्रह्मैव चेद्दोषः प्रपंचदर्शनस्यैव तन्मूलं स्यात् । कि प्रपंचतुल्याऽविद्यान्तर परिकल्पनेन ? ब्रह्मणो दोषत्वे सति तस्य नित्यत्वेनानिर्मोक्षश्च स्यात् । अतो यावद्ब्रह्मं व्यतिरिक्त पारमार्थिक दोषानभ्युपगमः, न तावद् भ्रांतिरूपपादिता भवति । निर्विषय और निराश्रय स्वप्रकाश अनुभूति, अपने आश्रय दोष से, अनंत आश्रय, अनंत विषयों का स्वयं अनुभव करती है इस कथन में जो आश्रय दोष की बात है, वह आश्रय दोष परमार्थिक है, या अपारमार्थिक यह विवेचनीय विषय है । पारमार्थिक तो हो नहीं सकता क्योंकि-दोष की सत्यता संभव नहीं है । अपारमार्थिक भी नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने में प्रश्न होता है कि, वह दोष द्रष्टा है, दृश्य है, या दृशि (ज्ञान) है ? दृशि तो हो नहीं सकता क्यों कि उसमें भेद की सम्भावना नही है । यदि भ्रांति के आश्रय भूत दृशि (ज्ञान) के भेद स्वीकार लिए जाये तो, वह बौद्धमद की बात हो जायगी, जिससे उसकी अयथार्थता नहीं मानी जा सकती । द्रष्टा, दृश्य और दृशि जब काल्पनिक हैं, तो उसका मूलभूत कोई दोष अवश्य होना चाहिए, तथा उस मूल दोष का भी कोई मूल दोष होना चाहिए, ऐसी अनवस्था होती है । इस अनवस्था के निवारण के लिए यदि ब्रह्मरूप सत्य अनुभूति को ही दोष माना जाय तो वह ब्रह्म ही दोष हुआ, फिर प्रपंचमय सारे जगत के लिए, जो कि ब्रह्ममूलक ही है, ankurnagpal108@gmail.com

( १५० ) किसी अन्य अविद्या नाम दोष की कल्पना की आवश्यकता ही क्या है ? ब्रह्म की दोषता सिद्ध हो जाने से, उसकी स्वाभाविक नित्यता के कारण दोष से कभी मोक्ष तो हो न सकेगा । इसलिए जब तक ब्रह्म से भिन्न किसी दोष नामक वस्तु को नहीं माना जाया, तब तक जगत को मिथ्या या भ्रान्त नहीं कहा जा सकता । अनिर्वचनीयत्वं च किमभिप्रेतम् ? सदसद्विलक्षणत्वमिति चेत्, तथाविधस्य वस्तुनः प्रमाणशून्यत्वेन अनिर्वचनीयतैव स्यात् । एतदुक्तं भवति—सर्वं हि वस्तुना तं प्रतीतिव्यवस्थाप्यम् । सर्वा च प्रतीतिः सदसदाकारा । सदसदाकारायास्तु प्रतीतेः सदसद् विलक्षणं विषय इत्यभ्युपगम्यमाने सर्वं सर्व प्रतीतेर्विषयस्यात्—इति । अनिर्वचनीयता से तुम्हारा क्या तात्पर्य है ? सद्असद् विलक्षणता को मानते हो तो, ऐसी वस्तु का कोई प्रमाण नहीं मिलता इसलिए वह अनिर्वचनीय तो है ही । कथन यह है कि-सारी वस्तुएं प्रतीति के आधार पर निर्धारित होती हैं, सारी वस्तुएं सद् या असद् रूप में ही होती हैं । सद् असद् आकार वाली यदि सद् असद् विलक्षण वस्तु को ही प्रमाणित करने लगेगी तो कोई भी वस्तु प्रतीति का विषय ही न रह जायगी । अथस्यात्—वस्तुस्वरूपतिरोधानकरमान्तरवाह्यरूपविविधाध्या- सोपादानं सदसदनिर्वचनीयमविद्यानादिपदवाच्यंवस्तुयाथात्म्य ज्ञान निवर्त्यं ज्ञानप्रागभावातिरेकेण भावरूपमेव किंचिद् वस्तु प्रत्यक्षानुमानाभ्यां प्रतीयते । तदुपहितब्रह्मोपादानश्चाविकारे स्व- प्रकाशचिन्मात्रवपुषि तेनैवतिरोहित स्वरूपे प्रत्यगात्मन्यहंकार ज्ञान- ज्ञेय विभागरूपोऽध्यासः । तस्यैवावस्थारूपेणाध्यासरूपे जगति ज्ञानबाध्य सर्परजतादिवस्तु तत्तज्ज्ञानरूपाध्यासोऽपि जायते । कृत्स्न- स्यमिथ्यारूपस्य तदुपादनत्वं च मिथ्याभूतस्यार्थस्य मिथ्याभूतमेव कारणं भवितुमर्हतीति हेतुबलादवगम्यते । कारणाज्ञानविषयं प्रत्यक्षं तावत् “अहमज्ञो मामन्यं च न जानामि" इत्यपरोक्षावभासः । ankurnagpal108@gmail.com

२. प्रथमाध्याय: समन्वयाध्याय (जन्माद्यस्य यतः आदि सूत्रों का ब्रह्म-समन्वय)

: + ध्या + सों = अध्यासों! Wait, let's look closely at L7: विविध अध्यासों का उपादान - yes, Adhyasa! Adhyasa is the core Advaita concept being discussed! But wait, is it अध्यासों or अभ्यासों? Look at L7: the letter has a loop at the bottom? No, it's ध्! Wait, let's zoom in: In अभ्यन्तर: has a distinct circle on the left with a horizontal stroke to the right. In the word after विविध: it is अध्यासों! Wait, no, look at the top: does it have a loop? It is अध्यासों. Wait, let's check L13: अध्यास. L14: अध्यास. Yes, it's अध्यासों.

Wait, let's check L14: समय जगत् तथा ज्ञान बाध्य सर्प, रजत आदि वस्तु जन्य' अध्यास के Wait, is it अध्या- at the end of L13 and समय at L14? L13 ends with: अध्या- L14 starts with: समय जगत् -> wait! अध्यास-मय जगत्! Yes! अध्या- at the end of L13

स्यानुमेयत्वे अभावाख्यप्रमाणविषयत्वे चेयमनुपपत्तिः समाना । अस्याज्ञानस्यभावरूपत्वे धर्मिप्रतियोगिज्ञान सद्भावेऽपि विरोधाभा- वादयमनुभवो भावरूपाज्ञान विषय एवाभ्युपगंतव्य इति । कथन यह है कि—"मैं अज्ञ हूं" इस प्रकार की प्रतीति में "अहं" संज्ञक आत्मा और उसके (अहं) के अभावधर्मीज्ञान की प्रतियोगी के रूप ने अवगति होती है या नही ? यह विचारणीय प्रश्न है। यदि वैसा ज्ञान रहता है, तो अभावात्मक और भावात्मक ज्ञान की सहस्थिति से ऐसा होना संभव नहीं है। यदि नहीं रहता, तब भी उस अभावात्मक ज्ञान की अवगति संभव नही है, क्योकि—अभाव की प्रतीति का सामान्य नियम है कि—जिसका अभाव जानना है तो उसके प्रतियोगी की जान- कारी आवश्यक है, बिना प्रतियोगी ज्ञान के अभाव का ज्ञान होता है, न हो सकता है। अभावात्मक ज्ञान चाहे अनुभव विषयक हो या अनुपलब्धि प्रमाण विषयक हो दोनों में ही उक्त असंगति समान रूप से होती है। इस अज्ञान को भावरूप मानने पर धर्मि प्रतियोगी ज्ञान की स्थिति में भी "मैं अज्ञान हूं" ऐसी प्रतीति असंगत नहीं होती, क्योंकि—इसमें परस्पर कोई विरोध नहीं रहता, इसलिए उक्त प्रकार की प्रतीति (मैं अज्ञ हूं) को भाव रूप अज्ञान विषयक ही मानना चाहिए। ननु च—भावरूपमप्यज्ञानं वस्तुयाथात्म्यावभासरूपेण साक्षि चैतन्येन विरुध्यते ? मैवम्—साक्षिचैतन्यं न वस्तुयाथात्म्यविषयं अपितु अज्ञानविषयम् अन्यथामिथ्यार्थविभासानुपपत्तेः । नहि अज्ञान विषयेण ज्ञानेनाज्ञानं निवर्त्यते, इति न विरोधः ननु चेदं भावरूपमप्यज्ञानं विषयविशेषव्यावृत्तमेव साक्षिचैतन्यस्य विषयो भवति। स विषयः प्रमाणाधीन सिद्धिरिति कथमिव साक्षि चैतन्येन अस्मदर्थव्यावृत्तमज्ञानं विषयी क्रियते ? नैष दोषः, सर्वं मेववस्तुजातं ज्ञाततया अज्ञाततया वा साक्षि चैतन्यस्य विषयभूतम् तत्र जडत्वेज्ञाततया सिध्यते एव, प्रमाणव्यवधानापेक्षा । अजडस्य तु प्रत्यग्वस्तुनः स्वयं सिध्यतो न प्रमाणव्यवधानापेक्षेति, सदैवा-

( १५३ ) ज्ञानस्य व्यावत्त॑कत्वेनावभासो युज्यते । तस्मात् न्यायोपवृंहितेन प्रत्यक्षेण भावरूपमेवाज्ञानं प्रतीयते । तदिदं भावरूपमज्ञानं अनु- मानेनापि सिध्यति । विवादाध्यसितं प्रमाणज्ञानं स्वप्रागभाव- व्यतिरिक्त स्वविषयावरण स्वनिवर्त्त्य स्वदेशगतस्तु अन्तरपूर्वकम्, अप्रकाशितार्थ प्रकाशकत्वात्, अन्धकारे प्रथमोत्पन्न प्रदीपप्रभा- वत् इति । वस्तु के यथार्थ स्वभाव को प्रकाशित करने वाले साक्षी चैतन्य (अनुभविता जीवात्मा) से, भावरूप अज्ञान की विरुद्धता हो गयी ? ऐसा संशय नहीं करना चाहिए, वस्तु का यथार्थ स्वभाव प्रकाशन साक्षी चैत- न्य का विषय नहीं है, अपितु उसका विषय तो अज्ञान प्रकाशन है' अन्यथा वह मिथ्यार्थावभास न कर सकता । अज्ञान (असत्यवस्तु) विषयक अवभास से अज्ञान का निवारण तो हो नहीं सकता, इसलिए चैतन्य के साथ अज्ञान का विरोध भी नहीं है । “मै अज्ञ हूँ” इस प्रतीति में “अहं” पदार्थ आत्मा के साथ अज्ञान की भी प्रतीति होती है । स्वयं सिद्ध स्वयं प्रकाश आत्मा जब किसी भी प्रमाण के अधीन नहीं है, ऐसा साक्षी चैतन्य आत्मा “अहं” पदार्थ को छोड़कर केवल अज्ञान को ही अपना विषय कैसे करता है ? ऐसी आपत्ति भी नही की जा सकती क्योंकि—सभी ज्ञात अज्ञात वस्तुएं साक्षी चैतन्य की प्रतीति की विषय हैं । जडरूप से ज्ञात होने वाली वस्तुओं में प्रमाण अपेक्षित होते हैं । अजड वस्तुएं स्वयं सिद्ध स्वयं प्रकाश होने से, प्रमाणों की अपेक्षा नहीं रखतीं, वो सब तो अज्ञान से भिन्न हैं इसलिए सदा अवभासित हो सकती हैं । इस प्रकार युक्ति सिद्ध प्रत्यक्ष प्रमाण से अज्ञान की भावरूप प्रतीति सिद्ध होती है । अज्ञान पदार्थ भावरूप है, अभावरूप नहीं, यह बात अनुमान से भी प्रमाणित है । प्रमाण समुत्पादित ज्ञान द्वारा अज्ञात विषय प्रकाशित हुआ करता है, ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व, उसके प्रागभाव से भिन्न उसके प्रकाश विषय को आवरक वस्तु स्वयं उसके द्वारा ही निवार्य होती है (अर्थात्— ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व किसी एक ऐसी वस्तु की स्थिति माननी पड़ेगी जो

( १५४ ) उस ज्ञानको आवृत किये रहती हैं। जिसे कि ज्ञान निवारण कर सके, आत्मा से समुत्पन्न यह ज्ञान आत्मा के आश्रित तो रहता ही है, इसलिए आवृत करने वाली वस्तु को ज्ञान का प्रागभाव नहीं कह सकते, अर्थात् ज्ञान की स्थिति नित्य है, उसका प्रागभाव होता नहीं, इसलिए उत्पत्ति के पूर्व वह किसी वस्तु से आवृत रहता है, अभावरूप नहीं रहता) उत्पत्ति के पूर्व वह ज्ञान, अन्धकार में प्रथमोत्पन्न प्रदीपप्रभा की तरह सदा आत्मा के आश्रित विद्यमान रहता है। आलोकाभावमात्रं वा रूपं दर्शनाभावमात्रं वा तमो न द्रव्यान्तरम्, तत्कथं भावरूपाज्ञान साधने निदर्शनतयोपन्यस्यते ? इति चेत् उच्यते-बहुलत्वविरलत्वाद्यवस्थायोगेन रूपवत्तया चोपलब्धेर्द्रव्यान्तरमेव तम इति निरवद्यम्, इति । (संशय) यदि कहो कि—आलोक का अभाव या रूप के दर्शन का अभाव ही तो अन्धकार है, अन्धकार कोई वस्तु नहीं है इसलिए उसे भाव- रूप अज्ञान की सिद्धि के लिए दृष्टान्तरूप से उपस्थित कर रहे है ? (समाधान) हल्के और घने तथा काले रूप से उस अन्धकार की उपलब्धि होती है, इसलिए अन्धकार नाम की कोई वस्तु अवश्य है। अत्रोच्यते-“अहमज्ञो मामन्यंच न जानामि” इत्यत्रोपपत्ति- सहितेन केवलेन च प्रत्यक्षेण न भावरूपमज्ञानं प्रतीयते । वस्तु- ज्ञान प्रागभावविषयत्वे विरोध उक्त., सहि भावरूपाज्ञानेऽपि तुल्यः । विषयत्वेनाश्रयत्वेन चाज्ञानस्य व्यावर्त्तंकया प्रत्यगर्थः प्रतिपन्नो वा अप्रतिपन्नो वा ? प्रतिपन्नश्चेत् तस्वरूपज्ञान निवर्त्यं तद ज्ञानं तस्मिन् प्रतिपन्ने कथमिव तिष्ठति । अप्रतिपन्नश्चेत—व्यावर्त्त- काश्रय विषय ज्ञान शून्यमज्ञानं कथमनुभूयेत ? (पूर्वपक्ष के उक्त तर्क का समाधान)— “मैं अज्ञ अपने को तथा अन्यों को नही जानता” ऐसी जो अज्ञान की प्रतीति होती है, युक्ति या प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा उसे भाव रूप से