श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक (मूल संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
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| राजतेनापि ताम्रेण यथाविभवविस्तरम्।<br>प्रतिष्ठाप्य समभ्यर्च्य स्थापयेच्छङ्करालये॥ २९<br>सा च सार्धं महादेव्या मोदते नात्र संशयः। | उसकी प्रतिष्ठा तथा पूजा करके शिवालयमें स्थापित करती है, वह महादेवके साथ आनन्दित रहती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २८-२९१/२ ॥ |
| चैत्रे भवं कुमारं च भवानीं च यथाविधि॥ ३०<br>ताम्राद्यैर्विधिवत्कृत्वा प्रतिष्ठाप्य यथाविधि।<br>भवान्या मोदते सार्धं दत्त्वा रुद्राय शम्भवे॥ ३१ | चैत्र मासमें ताँबे आदिसे शिव, कुमार (कार्तिकेय) तथा भवानीकी मूर्तियाँ यथाविधि बनाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके उन्हें रुद्र शम्भुको अर्पण करनेसे स्त्री भवानीके साथ आनन्दित रहती है॥ ३०-३१॥ |
| कृत्वलयं हि कौबेरं रजतं रजतेन वै।<br>ईश्वरोमासमायुक्तं गणैशैश्च समन्ततः॥ ३२<br>सर्वरत्नसमायुक्तं प्रतिष्ठाप्य यथाविधि।<br>स्थापयेत्परमेशस्य भवस्यायतने शुभे॥ ३३<br>वैशाखे वै चरेदेवं कैलासाख्यं व्रतोत्तमम्।<br>कैलासपर्वतं प्राप्य भवान्या सह मोदते॥ ३४ | कुबेरका रजतमय कैलास आलय बनाकर उसे चारों ओरसे सभी रत्नोंसे युक्त करके उसमें शिव, उमा तथा गणेश्वरोंकी रजतमय मूर्ति रखकर उसकी यथाविधि प्रतिष्ठा करके उसे परमेश्वर शिवके सुन्दर मन्दिरमें स्थापित करना चाहिये; जो [स्त्री] वैशाख मासमें इस प्रकार कैलास नामक उत्तम व्रतको करती है, वह कैलासपर्वत पहुँचकर भवानीके साथ आनन्द करती है॥ ३२-३४॥ |
| ज्येष्ठे मासि महादेवं लिङ्गमूर्तिमुमापतिम्।<br>कृताञ्जलिपुटैनैव ब्रह्मणा विष्णुना तथा॥ ३५<br>मध्ये भवेन संयुक्तं लिङ्गमूर्तिं द्विजोत्तमाः।<br>हंसेन च वराहेण कृत्वा ताम्रादिभिः शुभाम्॥ ३६<br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः।<br>शिवाय शिवमासाद्य शिवस्थाने यथाविधि॥ ३७ | हे उत्तम ब्राह्मणो ! ज्येष्ठ मासमें उमापति महादेवकी ताम्र आदिसे एक शुभ्र लिङ्गमूर्ति बनवाये, जो हाथ जोड़े हुए हंसपर सवार ब्रह्मा तथा वाराहपर सवार विष्णुसे संयुक्त हो और मध्यमें भव (महेश्वर) विराजमान हों—ऐसी लिङ्गमूर्ति बनवाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करनेके अनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और अपने कल्याणके लिये शिवको प्रसन्न करके ब्राह्मणोंको साथ लेकर शिवालयमें उसे विधिपूर्वक स्थापित करके वह देवीका सायुज्य प्राप्त कर लेती है॥ ३५-३७॥ |
| ब्राह्मणैः सहितां स्थाप्य देव्याः सायुज्यमाप्नुयात्।<br>आषाढे च शुभे मासे गृहं कृत्वा सुशोभनम्॥ ३८<br>पक्वेष्टकाभिर्विधिवद्यथाविभवविस्तरम् ।<br>सर्वबीजरसैश्चापि सम्पूर्णं सर्वशोभनैः॥ ३९<br>गृहोपकरणैश्चैव मुसलोलूखलादिभिः।<br>दासीदासादिभिश्चैव शयनैरशनादिभिः॥ ४०<br>सम्पूर्णंश्च गृहं वस्त्रैराच्छाद्य च समन्ततः।<br>देवं घृतादिभिः स्नाप्य महादेवमुमापतिम्॥ ४१<br>ब्राह्मणानां सहस्त्रं च भोजयित्वा यथाविधि।<br>विद्याविनयसम्पन्नं ब्राह्मणं वेदपारगम्॥ ४२<br>प्रथमाश्रमिणं भक्त्या सम्पूज्य च यथाविधि।<br>कन्यां सुमध्यमां यावत्कालजीवनसंयुताम्॥ ४३<br>क्षेत्रं गोमिथुनं चैव तद्गृहे च निवेदयेत्।<br>सायनैर्विविधैर्दिव्यैर्मेरुपर्वतसन्निभैः ॥ ४४ | जो स्त्री शुभ आषाढ़ महीनेमें अपने सामर्थ्यके अनुसार पके हुए ईंटोंसे विधिवत् गृह बनवाकर उसे सभी बीजरसोंसे, परम सुन्दर मूसल-उलूखल आदि गृहोपयोगी सामग्रियोंसे, दास-दासी आदिसे, [पलंग-विस्तर आदि] शयन-वस्तुओंसे, [अन्न आदि] खाद्य पदार्थोंसे युक्त करके उस गृहको सभी ओरसे पूर्ण वस्त्रोंसे ढँककर उमापति प्रभु महादेवको घृत आदिसे स्नान कराकर विधिपूर्वक एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर विद्या-विनयसे सम्पन्न तथा वेदमें पारंगत ब्रह्मचारी ब्राह्मणकी भक्तिपूर्वक यथाविधि पूजा करके पूर्ण जीवनभरके लिये एक परम सुन्दरी कन्या, क्षेत्र (खेत), गोमिथुन और मेरुपर्वतके समान महाराशिवाले अनेक प्रकारके दिव्य सामानोंसहित |