श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ४१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक (मूल संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजतेनापि ताम्रेण यथाविभवविस्तरम्।<br>प्रतिष्ठाप्य समभ्यर्च्य स्थापयेच्छङ्करालये॥ २९<br>सा च सार्धं महादेव्या मोदते नात्र संशयः। | उसकी प्रतिष्ठा तथा पूजा करके शिवालयमें स्थापित करती है, वह महादेवके साथ आनन्दित रहती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २८-२९१/२ ॥ |
| चैत्रे भवं कुमारं च भवानीं च यथाविधि॥ ३०<br>ताम्राद्यैर्विधिवत्कृत्वा प्रतिष्ठाप्य यथाविधि।<br>भवान्या मोदते सार्धं दत्त्वा रुद्राय शम्भवे॥ ३१ | चैत्र मासमें ताँबे आदिसे शिव, कुमार (कार्तिकेय) तथा भवानीकी मूर्तियाँ यथाविधि बनाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके उन्हें रुद्र शम्भुको अर्पण करनेसे स्त्री भवानीके साथ आनन्दित रहती है॥ ३०-३१॥ |
| कृत्वलयं हि कौबेरं रजतं रजतेन वै।<br>ईश्वरोमासमायुक्तं गणैशैश्च समन्ततः॥ ३२<br>सर्वरत्नसमायुक्तं प्रतिष्ठाप्य यथाविधि।<br>स्थापयेत्परमेशस्य भवस्यायतने शुभे॥ ३३<br>वैशाखे वै चरेदेवं कैलासाख्यं व्रतोत्तमम्।<br>कैलासपर्वतं प्राप्य भवान्या सह मोदते॥ ३४ | कुबेरका रजतमय कैलास आलय बनाकर उसे चारों ओरसे सभी रत्नोंसे युक्त करके उसमें शिव, उमा तथा गणेश्वरोंकी रजतमय मूर्ति रखकर उसकी यथाविधि प्रतिष्ठा करके उसे परमेश्वर शिवके सुन्दर मन्दिरमें स्थापित करना चाहिये; जो [स्त्री] वैशाख मासमें इस प्रकार कैलास नामक उत्तम व्रतको करती है, वह कैलासपर्वत पहुँचकर भवानीके साथ आनन्द करती है॥ ३२-३४॥ |
| ज्येष्ठे मासि महादेवं लिङ्गमूर्तिमुमापतिम्।<br>कृताञ्जलिपुटैनैव ब्रह्मणा विष्णुना तथा॥ ३५<br>मध्ये भवेन संयुक्तं लिङ्गमूर्तिं द्विजोत्तमाः।<br>हंसेन च वराहेण कृत्वा ताम्रादिभिः शुभाम्॥ ३६<br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः।<br>शिवाय शिवमासाद्य शिवस्थाने यथाविधि॥ ३७ | हे उत्तम ब्राह्मणो ! ज्येष्ठ मासमें उमापति महादेवकी ताम्र आदिसे एक शुभ्र लिङ्गमूर्ति बनवाये, जो हाथ जोड़े हुए हंसपर सवार ब्रह्मा तथा वाराहपर सवार विष्णुसे संयुक्त हो और मध्यमें भव (महेश्वर) विराजमान हों—ऐसी लिङ्गमूर्ति बनवाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करनेके अनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और अपने कल्याणके लिये शिवको प्रसन्न करके ब्राह्मणोंको साथ लेकर शिवालयमें उसे विधिपूर्वक स्थापित करके वह देवीका सायुज्य प्राप्त कर लेती है॥ ३५-३७॥ |
| ब्राह्मणैः सहितां स्थाप्य देव्याः सायुज्यमाप्नुयात्।<br>आषाढे च शुभे मासे गृहं कृत्वा सुशोभनम्॥ ३८<br>पक्वेष्टकाभिर्विधिवद्यथाविभवविस्तरम् ।<br>सर्वबीजरसैश्चापि सम्पूर्णं सर्वशोभनैः॥ ३९<br>गृहोपकरणैश्चैव मुसलोलूखलादिभिः।<br>दासीदासादिभिश्चैव शयनैरशनादिभिः॥ ४०<br>सम्पूर्णंश्च गृहं वस्त्रैराच्छाद्य च समन्ततः।<br>देवं घृतादिभिः स्नाप्य महादेवमुमापतिम्॥ ४१<br>ब्राह्मणानां सहस्त्रं च भोजयित्वा यथाविधि।<br>विद्याविनयसम्पन्नं ब्राह्मणं वेदपारगम्॥ ४२<br>प्रथमाश्रमिणं भक्त्या सम्पूज्य च यथाविधि।<br>कन्यां सुमध्यमां यावत्कालजीवनसंयुताम्॥ ४३<br>क्षेत्रं गोमिथुनं चैव तद्गृहे च निवेदयेत्।<br>सायनैर्विविधैर्दिव्यैर्मेरुपर्वतसन्निभैः ॥ ४४ | जो स्त्री शुभ आषाढ़ महीनेमें अपने सामर्थ्यके अनुसार पके हुए ईंटोंसे विधिवत् गृह बनवाकर उसे सभी बीजरसोंसे, परम सुन्दर मूसल-उलूखल आदि गृहोपयोगी सामग्रियोंसे, दास-दासी आदिसे, [पलंग-विस्तर आदि] शयन-वस्तुओंसे, [अन्न आदि] खाद्य पदार्थोंसे युक्त करके उस गृहको सभी ओरसे पूर्ण वस्त्रोंसे ढँककर उमापति प्रभु महादेवको घृत आदिसे स्नान कराकर विधिपूर्वक एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर विद्या-विनयसे सम्पन्न तथा वेदमें पारंगत ब्रह्मचारी ब्राह्मणकी भक्तिपूर्वक यथाविधि पूजा करके पूर्ण जीवनभरके लिये एक परम सुन्दरी कन्या, क्षेत्र (खेत), गोमिथुन और मेरुपर्वतके समान महाराशिवाले अनेक प्रकारके दिव्य सामानोंसहित |
अध्याय ८४] उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान ४१३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| गोलोकं समनुप्राप्य भवान्या सह मोदते।<br>भवान्या सदृशी भूत्वा सर्वकल्पेषु साव्यया॥ ४५<br><br>भवान्याश्चैव सायुज्यं लभते नात्र संशयः।<br>सर्वधातुसमाकीर्णं विचित्रध्वजशोभितम्॥ ४६ | वह गृह [शिवको] समर्पित करती है; वह गोलोक प्राप्त करके भवानीके साथ आनन्द करती है, भवानीके सदृश होकर सभी कल्पोंमें अव्यय (शाश्वत) बनी रहती है और [अन्तमें] भवानीका सायुज्य प्राप्त करती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३८—४५ १/२ ॥ |
| निवेदयीत शर्वाय श्रावणे तिलपर्वतम्।<br>वितानध्वजवस्त्राद्यैर्धातुभिश्च निवेदयेत्॥ ४७<br><br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूर्वोक्तमखिलं भवेत्।<br>कृत्वा भाद्रपदे मासि शोभनं शालिपर्वतम्॥ ४८ | सावन महीनेमें सभी धातुओंसे युक्त तथा विचित्र ध्वजोंसे सुशोभित तिलपर्वत शिवको समर्पित करना चाहिये। जो [स्त्री] वितान, ध्वज, वस्त्र, धातु आदि सहित तिलपर्वत निवेदित करती है और [अन्तमें] ब्राह्मणोंको भोजन कराती है, उसे पूर्वमें कहा गया सबकुछ प्राप्त हो जाता है॥ ४६-४७ १/२ ॥ |
| वितानध्वजवस्त्राद्यैर्धातुभिश्च निवेदयेत्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च दापयेच्च यथाविधि॥ ४९<br><br>सा च सूर्यांशुसङ्काशा भवान्या सह मोदते।<br>कृत्वा चाश्वयुजे मासि विपुलं धान्यपर्वतम्॥ ५० | जो भाद्रपद मासमें वितान, ध्वज, वस्त्र, धातु आदिसहित शालि चावलका सुन्दर पर्वत बनाकर उसे शिवको समर्पित करती है और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर विधिपूर्वक उसका दान करती है, वह सूर्यकी किरणोंके समान होकर भवानीके साथ आनन्द करती है॥ ४८-४९ १/२ ॥ |
| सुवर्णवस्त्रसंयुक्तं दत्त्वा सम्पूज्य शङ्करम्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूर्वोक्तमखिलं भवेत्॥ ५१<br><br>सर्वधान्यसमायुक्तं सर्वबीजरसादिभिः।<br>सर्वधातुसमायुक्तं सर्वरत्नोपशोभितम्॥ ५२<br><br>शृङ्गैश्चतुर्भिः संयुक्तं वितानच्छत्रशोभितम्।<br>गन्धमाल्यैस्तथा धूपैश्चित्रैश्चापि सुशोभितम्॥ ५३<br><br>विचित्रैर्नृत्यगेयैश्च शङ्खवीणादिभिस्तथा।<br>ब्रह्मघोषैर्महापुण्यं मङ्गलैश्च विशेषतः॥ ५४<br><br>महाध्वजाष्टसंयुक्तं विचित्रकुसु्मोज्ज्वलम्।<br>नगेन्द्रं मेरुनामानं त्रैलोक्याधारमुत्तमम्॥ ५५<br><br>तस्य मूर्ध्नि शिवं कुर्यान्मध्यतो धातुनैव तु।<br>दक्षिणे च यथान्यायं ब्रह्माणं च चतुर्मुखम्॥ ५६<br><br>उत्तरे देवदेवेशं नारायणमनामयम्।<br>इन्द्रादिलोकपालांश्च कृत्वा भक्त्या यथाविधि॥ ५७<br><br>प्रतिष्ठाप्य ततः स्नाप्य समभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>देवस्य दक्षिणे हस्ते शूलं त्रिदशपूजितम्॥ ५८ | आश्विन महीनेमें सुवर्ण तथा वस्त्रसे युक्त एक विशाल धान्यपर्वत बनाकर उसे शिवको अर्पण करके शंकरकी विधिवत् पूजा करके ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे पूर्वमें कहा गया सबकुछ प्राप्त हो जाता है। तीनों लोकोंके आधारस्वरूप मेरु नामक उत्तम पर्वतराजका निर्माण करे, जो सभी धान्योंसे युक्त हो, सभी बीजों तथा रसोंसे परिपूर्ण हो, सभी धातुओंसे संयुक्त हो, सभी रत्नोंसे सुशोभित हो, चार शृंगों (शिखर)-से युक्त हो, वितान तथा छत्रसे सुशोभित हो, गन्ध-पुष्प एवं अद्भुत धूपोंसे सुशोभित हो, विचित्र नृत्य-गानोंसे शोभायमान हो, शंख-वीणाकी ध्वनियोंसे युक्त हो, वेदध्वनियोंसे और विशेषकर मंगलसूचक प्रार्थना आदिसे अत्यन्त पवित्र हो, आठ बड़ी ध्वजाओंसे युक्त हो और विचित्र पुष्पोंसे सुशोभित हो। उस [पर्वत]-के शिखरपर मध्यमें धातुनिर्मित शिवको विराजमान करे। दक्षिणमें चतुर्मुख ब्रह्मा, उत्तरमें निर्विकार देवदेवेश नारायण, इन्द्र आदि लोकपालोंको भक्तिपूर्वक यथाविधि विराजमान करके उनकी प्रतिष्ठा करनेके अनन्तर स्नान कराकर महेश्वरकी पूजा करके महादेवके दाहिने हाथमें देवपूजित त्रिशूल तथा बायें हाथमें पाश, भवानीके |
| ४१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| वामे पाशं भवान्याश्च कमलं हेमभूषितम्।<br>विष्णोश्च शङ्खं चक्रं च गदामब्जं प्रयत्नतः ॥ ५९<br>ब्रह्मणश्चाक्षसूत्रं च कमण्डलुमनुत्तमम्।<br>इन्द्रस्य वज्रमग्नेश्च शक्त्याख्यं परमायुधम् ॥ ६०<br>यमस्य दण्डं निर्ऋतेः खड्गं निशिचरस्य तु।<br>वरुणस्य महापाशं नागाख्यं रुद्रमद्भुतम् ॥ ६१<br>वायोर्यष्टिं कुबेरस्य गदां लोकप्रपूजिताम्।<br>टङ्कं चेशानदेवस्य निवेद्यैवं क्रमेण च ॥ ६२<br>शिवस्य महतीं पूजां कृत्वा चरुसमन्विताम्।<br>पूजयेत्सर्वदेवांश्च यथाविभवविस्तरम् ॥ ६३<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूजां कृत्वा प्रयत्नतः।<br>महामेरुव्रतं कृत्वा महादेवाय दापयेत् ॥ ६४<br>महामेरुमनुप्राप्य महादेव्या प्रमोद्ते।<br>चिरं सायुज्यमाप्नोति महादेव्या न संशयः ॥ ६५ | हाथमें हेमभूषित कमल, विष्णुके हाथोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म, ब्रह्माके हाथोंमें अक्षमाला तथा उत्तम कमण्डलु, इन्द्रके हाथमें वज्र, अग्निके हाथमें शक्ति नामक महान् आयुध, यमके हाथमें दण्ड, निशिचर निर्ऋतिके हाथमें खड्ग, वरुणके हाथमें नाग नामक भयंकर तथा अद्भुत महापाश, वायुदेवके हाथमें यष्टि (छड़ी), कुबेरके हाथमें लोकपूजित गदा और ईशान देवके हाथमें टंक—इस प्रकार क्रमसे निवेदित करके शिवकी चरुसमन्वित महान् पूजा करके अपने सामर्थ्यके अनुसार सभी देवताओंकी पूजा करे। इसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराकर प्रयत्नपूर्वक उनका सम्मान करके महामेरुव्रत सम्पन्नकर महादेवको समर्पित कर दे। ऐसा करनेवाली स्त्री महामेरुपर्वत पहुँचकर महादेवीके साथ आनन्द करती है और चिरकालतक महादेवीका सायुज्य प्राप्त किये रहती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५०-६५॥ | | कार्तिक्यामपि या नारी कृत्वा देवीमुमां शुभाम्।<br>सर्वाभरणसम्पूर्णां सर्वलक्षणलक्षिताम् ॥ ६६<br>हेमताम्रादिभिश्चैव प्रतिष्ठाप्य विधानतः।<br>देवं च कृत्वा देवेशं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥ ६७<br>तयोरग्रे हुताशं च स्रुवहस्तं पितामहम्।<br>नारायणं च दातारं सर्वाभरणभूषितम् ॥ ६८<br>लोकपालैस्तथा सिद्धैः संवृतं स्थाप्य यत्नतः।<br>रुद्रालये व्रतं तस्मै दापयेद्भक्तिपूर्वकम् ॥ ६९ | जो स्त्री कार्तिक मासमें सोने अथवा ताँबेकी सभी आभरणोंसे युक्त तथा सभी लक्षणोंसे समन्वित देवी उमाकी सुन्दर प्रतिमा बनाकर; साथ ही देवेश महादेवकी भी सभी लक्षणोंसे युक्त मूर्ति बनाकर विधानपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करके उन दोनोंके सम्मुख अग्निको, हाथमें स्रुव लिये हुए ब्रह्माको और लोकपालों तथा सिद्धोंसे घिरे हुए एवं सभी आभूषणोंसे विभूषित कन्या-दाता नारायणको यत्नपूर्वक स्थापित करके भक्तिपूर्वक इस व्रतको रुद्रालयमें उन [शिव]-को समर्पित करती है, वह भवानीका स्वरूप प्राप्त करके शिवके साथ आनन्द करती है॥ ६६-६९ १/२ ॥ | | सा भवान्यास्तनुं गत्वा भवेन सह मोदते।<br>एकभक्तव्रतं पुण्यं प्रतिमासमनुक्रमात् ॥ ७०<br>मार्गशीर्षकमासादिकार्तिकान्तं प्रवर्तितम्।<br>नरनार्यादिजन्तूनां हिताय मुनिसत्तमाः ॥ ७१<br>नरः कृत्वा व्रतं चैव शिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>नारी देव्या न सन्देहः शिवेन परिभाषितम् ॥ ७२ | एक बार भोजन करके प्रत्येक मासके पुण्यप्रद व्रतको क्रमसे करे; हे श्रेष्ठ मुनियो! नर, नारी आदि प्राणियोंके कल्याणके लिये मार्गशीर्षसे आरम्भ करके कार्तिकतक किये जानेवाले इस व्रतको प्रवर्तित किया गया है। शिवके द्वारा बताये गये इस व्रतको करके पुरुष शिवका सायुज्य प्राप्त करता है और नारी देवी [पार्वती]-का सायुज्य प्राप्त करती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७०-७२ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उमामहेश्वरव्रतं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उमामहेश्वरव्रत' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥
८५- पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा
अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१५
पचासीवाँ अध्याय
पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>सर्वव्रतेषु सम्पूज्य देवदेवमुमापतिम्।<br>जपेत्पञ्चाक्षरीं विद्यां विधिनैव द्विजोत्तमाः॥ १<br><br>जपादेव न सन्देहो व्रतानां वै विशेषतः।<br>समाप्तिर्नान्यथा तस्माज्जपेत्पञ्चाक्षरीं शुभाम्॥ २ | सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ द्विजो! समस्त व्रतोंमें देवदेव उमापतिकी पूजा करके विधिपूर्वक पंचाक्षरीविद्या (मन्त्र)-का जप करना चाहिये। जपसे ही विशेषकर व्रतोंकी पूर्णता होती है, अन्यथा नहीं; इसमें सन्देह नहीं है। अतः उत्तम पंचाक्षरीविद्याका जप [अवश्य] करना चाहिये॥ १-२॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>कथं पञ्चाक्षरी विद्या प्रभावो वा कथं वद।<br>क्रमोपायं महाभाग श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ ३ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] पंचाक्षरीविद्या क्या है और इसका प्रभाव कैसा होता है? हे महाभाग! क्रमसे इसकी विधि बताइये; इसे सुननेकी हमलोगोंकी [बड़ी] उत्सुकता है॥ ३॥ |
| सूत उवाच<br>पुरा देवेन रुद्रेण देवदेवेन शम्भुना।<br>पार्वत्याः कथितं पुण्यं प्रवदामि समासतः॥ ४ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] पूर्वकालमें देवदेव रुद्र भगवान् शम्भुके द्वारा पार्वतीसे कहे गये इस पुण्यप्रद मन्त्रको मैं संक्षेपमें बता रहा हूँ॥ ४॥ |
| श्रीदेव्युवाच<br>भगवन् देवदेवेश सर्वलोकमहेश्वर।<br>पञ्चाक्षरस्य माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ ५ | श्रीदेवी बोलीं— हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे सर्वलोक-महेश्वर! मैं यथार्थरूपसे पंचाक्षरमन्त्रका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ॥ ५॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>पञ्चाक्षरस्य माहात्म्यं वर्षकोटिशतैरपि।<br>न शक्यं कथितुं देवि तस्मात्सङ्क्षेपतः शृणु॥ ६ | श्रीभगवान् बोले— हे देवि! सौ करोड़ वर्षोंमें भी पंचाक्षरमन्त्रका माहात्म्य नहीं कहा जा सकता है; अतः इसे संक्षेपमें सुनिये॥ ६॥ |
| प्रलये समनुप्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>नष्टे देवासुरे चैव नष्टे चोरगराक्षसे॥ ७ | हे देवि! प्रलयके उपस्थित होनेपर जब समस्त |
| ४१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| सर्वं प्रकृतिमापन्नं त्वया प्रलयमेष्यति।<br>एकोऽहं संस्थितो देवि न द्वितीयोऽस्ति कुत्रचित्॥ ८<br><br>तस्मिन् वेदाश्च शास्त्राणि मन्त्रे पञ्चाक्षरे स्थिताः।<br>ते नाशं नैव सम्प्राप्ता मच्छक्त्या ह्यनुपालिताः॥ ९ | चराचर जगत्, देवता तथा असुर, नाग एवं राक्षस नष्ट हो जाते हैं और आपसहित सभी पदार्थ प्रकृतिमें लीन होकर प्रलयको प्राप्त हो जाते हैं, उस समय एकमात्र मैं रह जाता हूँ; दूसरा कुछ भी नहीं रह जाता है। उस समय सभी वेद तथा शास्त्र उसी पंचाक्षरमन्त्रमें स्थित रहते हैं; मेरी शक्तिसे अनुपालित होनेके कारण वे नष्ट नहीं होते हैं॥७-९॥ | | अहमेको द्विधाप्यासं प्रकृत्यात्मप्रभेदतः।<br>स तु नारायणः शेते देवो मायामयीं तनुम्॥ १०<br><br>आस्थाय योगपर्यङ्कशयने तोयमध्यगः।<br>तन्नाभिपङ्कजाज्जातः पञ्चवक्त्रः पितामहः॥ ११<br><br>सिसृक्षमाणो लोकान् वै त्रीनशक्तोऽसहायवान्।<br>दश ब्रह्मा ससर्जादौ मानसानमितौजसः॥ १२ | मैं एक होता हुआ भी उस समय प्रकृति तथा आत्माके भेदसे दो रूपोंमें रहता हूँ। वे भगवान् नारायण मायामय शरीर धारणकर जलके मध्यमें योगरूपी पर्यंकपर शयन करते हैं। उनके नाभिकमलसे पाँच मुखवाले ब्रह्मा उत्पन्न हुए; तीनों लोकोंका सृजन करनेकी इच्छावाले उन ब्रह्माने [इस कार्यमें] असमर्थ तथा सहायकविहीन होनेके कारण प्रारम्भमें अमित तेजवाले दस मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया॥१०-१२॥ | | तेषां सृष्टिप्रसिद्ध्यर्थं मां प्रोवाच पितामहः।<br>मत्पुत्राणां महादेव शक्तिं देहि महेश्वर॥ १३<br><br>इति तेन समादिष्टः पञ्चवक्त्रधरो ह्यहम्।<br>पञ्चाक्षरान् पञ्चमुखैः प्रोक्तवान् पद्मयोनये॥ १४<br><br>तान् पञ्चवदनैर्गृह्णन् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>वाच्यवाचकभावेन ज्ञातवान् परमेश्वरम्॥ १५<br><br>वाच्यः पञ्चाक्षरैर्देवि शिवस्त्रैलोक्यपूजितः।<br>वाचकः परमो मन्त्रस्तस्य पञ्चाक्षरः स्थितः॥ १६ | उनकी सृष्टिकी वृद्धिके लिये ब्रह्माने मुझसे कहा—'हे महादेव! हे महेश्वर! मेरे पुत्रोंको शक्ति प्रदान कीजिये।' उनके ऐसा कहनेपर पाँच मुख धारण करनेवाले मैंने कमल्योनि (ब्रह्मा)-के लिये [अपने] पाँचमुखोंसे पाँच अक्षरोंका उच्चारण किया। अपने पाँच मुखोंसे उन [अक्षरों]-को ग्रहण करते हुए लोकपितामह ब्रह्माने वाच्यवाचक भावसे परमेश्वरको जान लिया। हे देवि! तीनों लोकोंमें पूजित शिव पंचाक्षरोंसे वाच्य हैं और [यह] परम पंचाक्षरमन्त्र उनके वाचकके रूपमें स्थित है॥१३-१६॥ | | ज्ञात्वा प्रयोगं विधिना च सिद्धिं<br>लब्ध्वा तथा पञ्चमुखो महात्मा।<br>प्रोवाच पुत्रेषु जगद्धिताय<br>मन्त्रं महार्थं किल पञ्चवर्णम्॥ १७ | पाँच मुखवाले महात्मा ब्रह्माने विधिपूर्वक इसके प्रयोगको जानकर तथा सिद्धि प्राप्त करके जगत्के कल्याणके लिये अपने पुत्रोंको महान् अर्थवाले इस पंचाक्षरमन्त्रका उपदेश किया॥१७॥ | | ते लब्ध्वा मन्त्ररत्नं तु साक्षाल्लोकपितामहात्।<br>तमाराधयितुं देवं परात्परतरं शिवम्॥ १८ | तदनन्तर साक्षात् लोकपितामहसे इस मन्त्ररत्नको प्राप्तकर वे उन परात्पर देव शिवकी आराधना करनेमें तत्पर हो गये॥१८॥ | | ततस्तुतोष भगवान् त्रिमूर्तीनां परः शिवः।<br>दत्तवानखिलं ज्ञानमणिमादिगुणाष्टकम्॥ १९ | तब त्रिदेवोंमें श्रेष्ठ भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान तथा अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ प्रदान कीं॥१९॥ |
अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१७
| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेऽपि लब्ध्वा वरान् विप्रास्तदाराधनकाङ्क्षिणः।<br>मेरोस्तु शिखरे रम्ये मुञ्जवान्नाम पर्वतः॥ २०<br><br>मत्प्रियः सततं श्रीमान् मद्भूतैः परिरक्षितः।<br>तस्याभ्याशे तपस्तीव्रं लोकसृष्टिसमुत्सुकाः॥ २१<br><br>दिव्यवर्षसहस्रं तु वायुभक्षाः समाचरन्।<br>तिष्ठन्तोऽनुग्रहार्थाय देवि ते ऋषयः पुरा॥ २२ | तत्पश्चात् [उन] वरोंको प्राप्तकर वे विप्र [मेरी] आराधनाकी आकांक्षा करने लगे। मेरुके रम्य शिखरपर मुंजवान् नामक पर्वत है। शोभासम्पन्न यह पर्वत मुझे प्रिय है और मेरे भूतोंके द्वारा भलीभाँति रक्षित है। हे देवि! पूर्वकालमें उस [पर्वत]-के समीप स्थित रहते हुए लोकसृष्टिके इच्छुक उन ऋषियोंने मेरे अनुग्रहहेतु वायुके आहारपर रहकर हजार दिव्य वर्षोंतक कठोर तप किया॥ २०–२२॥ |
| तेषां भक्तिमहं दृष्ट्वा सद्यः प्रत्यक्षतामियाम्।<br>पञ्चाक्षरमृषिच्छन्दो दैवतं शक्तिबीजवत्॥ २३<br><br>न्यासं षडङ्गं दिग्बन्धं विनियोगमशेषतः।<br>प्रोक्तवानहमार्याणां लोकानां हितकाम्यया॥ २४ | [हे देवि!] उनकी भक्ति देखकर मैं शीघ्र ही उनके समक्ष प्रकट हो गया और मैंने लोकोंके कल्याणकी इच्छासे उन महात्माओंको पंचाक्षरमन्त्र, उसके ऋषि, छन्द, देवता, शक्ति, बीजसहित षडंग न्यास, दिग्बन्ध तथा विनियोग पूर्ण रूपसे बता दिया॥ २३-२४॥ |
| तच्छ्रुत्वा मन्त्रमाहात्म्यमृषयस्ते तपोधनाः।<br>मन्त्रस्य विनियोगं च कृत्वा सर्वमनुष्ठिताः॥ २५<br><br>तन्माहात्म्यात्तदा लोकान् सदेवासुरमानुषान्।<br>वर्णान् वर्णविभागांश्च सर्वधर्मांश्च शोभनान्॥ २६<br><br>पूर्वकल्पसमुद्भूताञ्छ्रुतवन्तो यथा पुरा।<br>पञ्चाक्षरप्रभावाच्च लोका वेदा महर्षयः॥ २७<br><br>तिष्ठन्ति शाश्वता धर्मा देवाः सर्वमिदं जगत्।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि शृणु चावहिताखिलम्॥ २८ | उस मन्त्रका माहात्म्य सुनकर उन तपोधन ऋषियोंने मन्त्रका विनियोग करके सभी अनुष्ठान पूर्ण किये। उसके बाद उन्होंने उस मन्त्रकी महिमासे लोकों, देवताओं, असुरों, मनुष्यों, वर्णों, वर्णविभागों तथा समस्त उत्तम धर्मोंको जो पूर्व कल्पमें उत्पन्न हुए थे—उन सबका श्रवण किया। पंचाक्षरमन्त्रके प्रभावसे ही लोक, वेद, महर्षिगण, शाश्वत धर्म, देवता तथा यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। अब मैं उसके विषयमें सब कुछ बताऊँगा; सावधान होकर सुनिये॥ २५–२८॥ |
| अल्पाक्षरं महार्थं च वेदसारं विमुक्तिदम्।<br>आज्ञासिद्धमसन्दिग्धं वाक्यमेतच्छिवात्मकम्॥ २९ | यह मन्त्र अल्प अक्षरोंवाला, महान् अर्थोंवाला, वेदोंका सार, मुक्तिप्रद, आज्ञासिद्ध, असन्दिग्ध तथा शिवस्वरूप है॥ २९॥ |
| नानासिद्धियुतं दिव्यं लोकचित्तानुरञ्जकम्।<br>सुनिश्चितार्थं गम्भीरं वाक्यं मे पारमेश्वरम्॥ ३० | यह मेरा मन्त्र अनेक सिद्धियोंसे युक्त, अलौकिक, लोगोंके चित्तको आनन्दित करनेवाला, सुनिश्चित अर्थोंवाला, गम्भीर तथा परमेश्वरस्वरूप है॥ ३०॥ |
| मन्त्रं मुखसुखोच्चार्यमशेषार्थप्रसाधकम्।<br>तद्बीजं सर्वविद्यानां मन्त्रमाद्यं सुशोभनम्॥ ३१<br><br>अतिसूक्ष्मं महार्थं च ज्ञेयं तद्वटबीजवत्।<br>वेदः स त्रिगुणातीतः सर्वज्ञः सर्वकृत्प्रभुः॥ ३२ | यह मन्त्र मुखसे सुखपूर्वक उच्चारणयोग्य, सम्पूर्ण प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाला, सभी विद्याओंका बीजस्वरूप, आद्य (सबसे पहला) मन्त्र, परम सुन्दर, अति सूक्ष्म एवं महान् अर्थोंवाला है। इसे वटवृक्षके बीजकी भाँति समझना चाहिये। यह वेदस्वरूप, तीनों गुणोंसे परे, सर्वज्ञ, सब कुछ करनेवाला तथा सर्वसमर्थ है॥ ३१-३२॥ |
| ओमित्येकाक्षरं मन्त्रं स्थितः सर्वगतः शिवः।<br>मन्त्रे षडक्षरे सूक्ष्मे पञ्चाक्षरतनूः शिवः॥ ३३ | ॐ—यह एक अक्षरवाला मन्त्र है; सर्वव्यापी |
| ४१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वाच्यवाचकभावेन स्थितः साक्षात्स्वभावतः।<br>वाच्यः शिवः प्रमेयत्वान्मन्त्रस्तद्वाचकः स्मृतः॥ ३४<br>वाच्यवाचकभावोऽयमनादिः संस्थितस्तयोः।<br>वेदे शिवागमे वापि यत्र यत्र षडक्षरः॥ ३५<br>मन्त्रः स्थितः सदा मुख्यो लोके पञ्चाक्षरो मतः।<br>किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः शास्त्रैर्वा बहुविस्तृतैः॥ ३६<br>यस्यैवं हृदि संस्थोऽयं मन्त्रः स्यात्पारमेश्वरः।<br>तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम्॥ ३७<br>यो विद्वान् वै जपेत्सम्यगधीत्यैव विधानतः।<br>एतावद्धि शिवज्ञानमेतावत्परमं पदम्॥ ३८<br>एतावद् ब्रह्मविद्या च तस्मान्नित्यं जपेद् बुधः।<br>पञ्चाक्षरैः सप्रणवो मन्त्रोऽयं हृदयं मम॥ ३९<br>गुह्याद् गुह्यतरं साक्षान्मोक्षज्ञानमनुत्तमम्। | शिव इसमें स्थित रहते हैं। पाँच अक्षररूपी शरीरवाले शिव स्वभावसे ही सूक्ष्म षडक्षर (छः अक्षरोंवाले)-मन्त्रमें वाच्य-वाचक भावसे विराजमान हैं। प्रमेयत्वके कारण शिव वाच्य हैं तथा मन्त्र उनका वाचक कहा गया है। यह वाच्य-वाचक भाव (सम्बन्ध) उन दोनोंमें अनादि है। वेद अथवा शिवागममें षडक्षरमन्त्र स्थित है; किंतु लोकमें पंचाक्षरमन्त्रको मुख्य माना गया है। जिसके हृदयमें परमेश्वररूप यह मन्त्र स्थित है उसे बहुत मन्त्रों अथवा अतिविस्तृत शास्त्रोंसे क्या प्रयोजन! जो विद्वान् विधानपूर्वक इसका ज्ञान प्राप्तकर इसे ठीक-ठीक जपता है, उसने मानो वेदोंका अध्ययन कर लिया और सबकुछ अनुष्ठित कर लिया। मात्र यही शिवज्ञान है, यही परम पद है और यही ब्रह्मविद्या है; अतः विद्वान्को नित्य इसका जप करना चाहिये। प्रणव (ॐ)-सहित पाँच अक्षरोंसे युक्त यह मन्त्र [ॐ नमः शिवाय] मेरा हृदय है। यह गूढ़से भी गूढ़ है और साक्षात् सर्वोत्तम मोक्षज्ञान है॥ ३३-३९ १/२॥ |
| अस्य मन्त्रस्य वक्ष्यामि ऋषिच्छन्दोऽधिदैवतम्॥ ४०<br>बीजं शक्तिं स्वरं वर्णं स्थानं चैवाक्षरं प्रति।<br>वामदेवो नाम ऋषिः पङ्क्तिश्छन्द उदाहृतः॥ ४१<br>देवता शिव एवाहं मन्त्रस्यास्य वरानने।<br>नकारादीनि बीजानि पञ्चभूतात्मकानि च॥ ४२<br>आत्मानं प्रणवं विद्धि सर्वव्यापिनमव्ययम्।<br>शक्तिस्त्वमेव देवेशि सर्वदेवनमस्कृते॥ ४३<br>त्वदीयं प्रणवं किञ्चिन्मदीयं प्रणवं तथा।<br>त्वदीयं देवि मन्त्राणां शक्तिभूतं न संशयः॥ ४४<br>अकारोकारमकारा मदीये प्रणवे स्थिताः। | [हे देवि!] अब मैं इस मन्त्रके और प्रत्येक अक्षरके ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, स्वर, वर्ण तथा स्थानका वर्णन करूँगा। इस मन्त्रके ऋषि वामदेव तथा छन्द पंक्ति कहा गया है। हे वरानने! इस मन्त्रका देवता [स्वयं] मैं शिव ही हूँ। पंचभूतस्वरूप 'न'कार आदि इसके बीज हैं। प्रणवको सर्वव्यापी तथा शाश्वत आत्मा समझो। हे सभी देवताओंसे नमस्कृत देवेशि! [स्वयं] तुम ही इसकी शक्ति हो। कुछ प्रणव तुम्हारा है और कुछ प्रणव हमारा है। हे देवि! तुम्हारा प्रणव सभी मन्त्रोंका शक्तिस्वरूप है; इसमें संशय नहीं है॥ ४०-४४॥ |
| उकारं च मकारं च अकारं च क्रमेण वै॥ ४५<br>त्वदीयं प्रणवं विद्धि त्रिमात्रं प्लुतमुत्तमम्।<br>ओङ्कारस्य स्वरोदात्त ऋषिर्ब्रह्मा सितं वपुः॥ ४६<br>छन्दो देवी च गायत्री परमात्माधिदेवता।<br>उदात्तः प्रथमस्तद्वच्चतुर्थश्च द्वितीयकः॥ ४७<br>पञ्चमः स्वरितश्चैव मध्यमो निषधः स्मृतः।<br>नकारः पीतवर्णश्च स्थानं पूर्वमुखं स्मृतम्॥ ४८ | हे देवि! 'अ', 'उ', 'म' मेरे प्रणवमें स्थित हैं। क्रमसे 'उ', 'म', 'अ' तुम्हारे प्रणवके हैं; तुम इस उत्तम प्रणवको प्लुत तीन मात्राओंवाला जानो। ओंकारका स्वर उदात्त है, इसके ऋषि ब्रह्मा हैं, इसका शरीर श्वेत है, छन्द देवी गायत्री हैं और इसके अधिदेवता परमात्मा हैं। इसका पहला, दूसरा तथा चौथा वर्ण उदात्त; पाँचवाँ वर्ण स्वरित और मध्यम वर्ण निषध [निषादस्वर] कहा गया है॥ ४५-४७ १/२॥ |
अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्रोऽधिदैवतं छन्दो गायत्री गौतमो ऋषिः।<br>मकारः कृष्णवर्णोऽस्य स्थानं वै दक्षिणामुखम्॥ ४९<br><br>छन्दोऽनुष्टुप् ऋषिश्चात्री रुद्रो दैवतमुच्यते।<br>शिकारो धूम्रवर्णोऽस्य स्थानं वै पश्चिमं मुखम्॥ ५०<br><br>विश्वामित्र ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दो विष्णुस्तु दैवतम्।<br>वाकारो हेमवर्णोऽस्य स्थानं चैवोत्तरं मुखम्॥ ५१<br><br>ब्रह्माधिदैवतं छन्दो बृहती चाङ्गिरा ऋषिः।<br>यकारो रक्तवर्णश्च स्थानमूर्ध्वं मुखं विराट्॥ ५२<br><br>छन्दो ऋषिर्भरद्वाजः स्कन्दो दैवतमुच्यते।<br>न्यासमस्य प्रवक्ष्यामि सर्वसिद्धिकरं शुभम्॥ ५३ | ‘न’ पीले रंगका है और स्थान पूर्वमुख (पूरबकी ओर मुखवाला) कहा गया है। इसके अधिदेवता इन्द्र हैं, इसका छन्द गायत्री है और इसके ऋषि गौतम हैं। ‘म’ कृष्ण वर्णवाला है, इसका स्थान दक्षिणमुख है, इसका छन्द अनुष्टुप् है, इसके ऋषि अत्रि हैं और इसके अधिदेवता रुद्र कहे जाते हैं। ‘शि’ धूम्र वर्णवाला है, इसका स्थान पश्चिममुख है, इसके ऋषि विश्वामित्र हैं, इसका छन्द त्रिष्टुप् है और इसके देवता विष्णु हैं। ‘वा’ हेम वर्णवाला है, इसका स्थान उत्तरमुख है, इसके अधिदेवता ब्रह्मा हैं, इसका छन्द बृहती है और इसके ऋषि अंगिरा हैं। ‘य’ लाल रंगवाला है, इसका स्थान ऊर्ध्वमुख है, इसका छन्द विराट् है, इसके ऋषि भरद्वाज हैं और इसके देवता स्कन्द कहे जाते हैं॥ ४८—५२ १/२॥ |
| सर्वपापहरं चैव त्रिविधो न्यास उच्यते।<br>उत्पत्तिस्थितिसंहारभेदतस्त्रिविधः स्मृतः॥ ५४<br><br>ब्रह्मचारिगृहस्थानां यतीनां क्रमशो भवेत्।<br>उत्पत्तिर्ब्रह्मचारीणां गृहस्थानां स्थितिः सदा॥ ५५<br><br>यतीनां संहृतिन्यासः सिद्धिर्भवति नान्यथा।<br>अङ्गन्यासः करन्यासो देहन्यास इति त्रिधा॥ ५६ | [हे देवि!] अब मैं सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले, मंगलमय तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाले इसके न्यासको बताऊँगा। न्यास तीन प्रकारका कहा जाता है। उत्पत्ति, स्थिति (पालन) तथा संहारके भेदसे यह तीन प्रकारका कहा गया है; यह क्रमशः ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियोंके लिये होता है। उत्पत्ति [न्यास] ब्रह्मचारियोंका, स्थिति [न्यास] गृहस्थोंका और संहृति (संहार) न्यास यतियोंका होता है; अन्यथा सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती॥ ५३—५५ १/२॥ |
| उत्पत्त्यादित्रिभेदेन वक्ष्यते ते वरानने।<br>न्यसेत्पूर्वं करन्यासं देहन्यासमनन्तरम्॥ ५७<br><br>अङ्गन्यासं ततः पश्चादक्षराणां विधिक्रमात्।<br>मूर्धादिपादपर्यन्तमुत्पत्तिन्यास उच्यते॥ ५८<br><br>पादादिमूर्धपर्यन्तं संहारो भवति प्रिये।<br>हृदयास्यगलन्यासः स्थितिन्यास उदाहृतः॥ ५९<br><br>ब्रह्मचारिगृहस्थानां यतीनां चैव शोभने।<br>सशिरस्कं ततो देहं सर्वमन्त्रेण संस्पृशेत्॥ ६० | अंगन्यास, करन्यास, देहन्यास—यह तीन प्रकारका न्यास होता है; हे वरानने! अब मैं उत्पत्ति आदि तीन भेदोंसे इन्हें भी आपको बताऊँगा। सबसे पहले करन्यास उसके बाद देहन्यास पुनः अंगन्यास मन्त्रके अक्षरोंके क्रमसे करना चाहिये। सिरसे प्रारम्भ होकर पैरोंतकका न्यास उत्पत्तिन्यास कहा जाता है। हे प्रिये! पैरोंसे प्रारम्भ होकर सिरतकका न्यास संहारन्यास होता है। हृदय, मुख और कण्ठका न्यास स्थितिन्यास कहा गया है। हे शोभने! यह न्यास [क्रमशः] ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियोंके लिये है॥ ५६—५९ १/२॥ |
| स देहन्यास इत्युक्तः सर्वेषां सम एव सः।<br>दक्षिणाङ्गुष्ठमारभ्य वामाङ्गुष्ठान्त एव हि॥ ६१ | तत्पश्चात् सम्पूर्ण मन्त्रसे सिरसहित देहका स्पर्श करना चाहिये। वह देहन्यास कहा गया है; वह सबके |
| ४२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न्यस्यते यत्तदुत्पत्तिर्विपरीतं तु संहृतिः।<br>अङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्तं न्यस्यते हस्तयोर्द्वयोः॥ ६२<br>अतीव भोगदो देवि स्थितिन्यासः कुटुम्बिनाम्।<br>करन्यासं पुरा कृत्वा देहन्यासमनन्तरम्॥ ६३ | लिये समान है। दाहिने हाथके अँगूठेसे प्रारम्भ करके बायें हाथके अँगूठेतक जो न्यास किया जाता है, वह उत्पत्तिन्यास है और इसके विपरीत करना संहृति (संहार) न्यास है। दोनों हाथोंमें अँगूठेसे प्रारम्भ करके कनिष्ठातक जो न्यास किया जाता है, वह स्थितिन्यास होता है; हे देवि! वह [न्यास] गृहस्थोंको परम सुख प्रदान करनेवाला है। सर्वप्रथम करन्यास करके देहन्यास करना चाहिये और उसके बाद अंगन्यास करना चाहिये; यह सामान्य विधि है॥ ६०-६३ १/२॥ |
| अङ्गन्यासं न्यसेत्पश्चादेष साधारणो विधिः।<br>ओङ्कारं सम्पुटीकृत्य सर्वाङ्गेषु च विन्यसेत्॥ ६४<br>करयोरुभयोश्चैव दशाग्राङ्गुलिषु क्रमात्।<br>प्रक्षाल्य पादावाचम्य शुचिर्भूत्वा समाहितः॥ ६५ | प्रत्येक मन्त्रको ओंकारसे सम्पुटित करके सभी अंगोंमें, दोनों हाथोंमें तथा दसों अँगुलियोंके अग्रभागमें क्रमसे न्यास करना चाहिये। दोनों पैर धोकर आचमन करके शुद्ध होकर समाहित चित्त होकर पूर्वकी ओर अथवा उत्तरकी ओर मुख करके न्यासकर्म करना चाहिये॥ ६४-६५ १/२॥ |
| प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि न्यासकर्म समाचरेत्।<br>स्मरेत्पूर्वमृषिं छन्दो दैवतं बीजमेव च॥ ६६<br>शक्तिं च परमात्मानं गुरुं चैव वरानने।<br>मन्त्रेण पाणी सम्मृज्य तलयोः प्रणवं न्यसेत्॥ ६७<br>अङ्गुलीनां च सर्वेषां तथा चाद्यन्तपर्वसु।<br>सबिन्दुकानि बीजानि पञ्चमध्यमपर्वसु॥ ६८<br>उत्पत्त्यादित्रिभेदेन न्यसेदाश्रमतः क्रमात्।<br>उभाभ्यामेव पाणिभ्यामापादतलमस्तकम्॥ ६९<br>मन्त्रेण संस्पृशेद्देहं प्रणवेनैव सम्पुटम्।<br>मूर्ध्नि वक्त्रे च कण्ठे च हृदये गुह्यके तथा॥ ७०<br>पादयोरुभयोश्चैव गुह्ये च हृदये तथा।<br>कण्ठे च मुखमध्ये च मूर्ध्नि च प्रणवादिकम्॥ ७१<br>हृदये गुह्यके चैव पादयोर्मूर्ध्नि वाचि वा।<br>कण्ठे चैव न्यसेदेव प्रणवादित्रिभेदतः॥ ७२<br>कृत्वाऽङ्गन्यासमेवं हि मुखानि परिकल्पयेत्।<br>पूर्वादि चोर्ध्वपर्यन्तं नकारादि यथाक्रमम्॥ ७३<br>षडङ्गानि न्यसेत्पश्चाद्यथास्थानं च शोभनम्।<br>नमः स्वाहा वषड् हुं च वौषट्फट्कारकैः सह॥ ७४ | हे वरानने! प्रारम्भमें ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, परमात्मा तथा गुरुका स्मरण करना चाहिये। मन्त्रके उच्चारणके साथ दोनों हाथोंको धोकर दोनों करतलोंमें प्रणवका न्यास करना चाहिये। सभी अँगुलियोंके आदि-अन्त पर्वोपर और पाँचों मध्यम पर्वोंपर बिन्दुयुक्त पाँच बीजोंका उत्पत्ति आदि तीन भेदोंसे तथा ब्रह्मचर्य आदिके क्रमसे न्यास करना चाहिये। दोनों हाथोंसे मस्तकसे लेकर पैरतक प्रणवके द्वारा सम्पुटित मन्त्रसे देहका स्पर्श करना चाहिये। प्रणवयुक्त मन्त्रसे सिर, मुख, कण्ठ, हृदय, गुह्यस्थान एवं दोनों पैरोंमें; गुह्यस्थान, हृदय, कण्ठ, मुख तथा सिरमें; पुनः हृदय, गुह्यस्थान, दोनों पैरों, सिर, मुख तथा कण्ठमें तीन प्रकारका न्यास करना चाहिये। इस प्रकार अंगन्यास करके प्रणवसहित नकारसे प्रारम्भ होकर यकारपर पूर्ण होनेवाले इन नकार आदि वर्णोंकी क्रमशः अपने शरीरमें भावना करे। इसके बाद मन्त्रमें नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् तथा फट्के साथ यथास्थान छहों अंगोंमें उत्तम रीतिसे न्यास करना चाहिये॥ ६६-७४॥ |
| प्रणवं हृदयं विद्यान्नकारः शिर उच्यते।<br>शिखा मकार आख्यातः शिकारः कवचं तथा॥ ७५ | प्रणवको हृदय जानना चाहिये, 'न' को सिर कहा जाता है, 'म' को शिखा कहा गया है, 'शि' को कवच |
| अध्याय ८५ ] | पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा | ४२१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वाकारो नेत्रमस्त्रं तु यकारः परिकीर्तितः।<br>इत्थमङ्गानि विन्यस्य ततो वै बन्धयेद्दिशः॥ ७६<br>विघ्नेशो मातरो दुर्गा क्षेत्रज्ञो देवता दिशः।<br>आग्नेयादिषु कोणेषु चतुर्ष्वपि यथाक्रमम्॥ ७७<br>अङ्गुष्ठतर्जन्यग्राभ्यां संस्थाप्य सुमुखं शुभम्।<br>रक्षध्वमिति चोक्त्वा तु नमस्कुर्यात्पृथक् पृथक्॥ ७८ | कहा गया है, 'वा' को नेत्र और 'य' को अस्त्र कहा गया है। इस प्रकार अंगोंका न्यास करनेके अनन्तर दिशाओंको बाँधना चाहिये। आग्नेय आदि चारों कोणोंमें क्रमशः विघ्नेश, माताएँ, दुर्गा तथा क्षेत्रज्ञ दिशाओंके देवता हैं। अंगुष्ठ तथा तर्जनीके अग्रभागोंसे कल्याणप्रद तथा सुन्दर मुखवाले गणेश आदिको दिशाओंमें स्थापित करके 'रक्षा कीजिये'—ऐसा कहकर इन्हें पृथक्-पृथक् नमस्कार करना चाहिये॥ ७५-७८॥ |
| गले मध्ये तथाङ्गुष्ठे तर्जन्याद्यङ्गुलीषु च।<br>अङ्गुष्ठेन करन्यासं कुर्यादेव विचक्षणः॥ ७९<br>एवं न्यासमिमं प्रोक्तं सर्वपापहरं शुभम्॥<br>सर्वसिद्धिकरं पुण्यं सर्वरक्षाकरं शिवम्॥ ८०<br>न्यस्ते मन्त्रेऽथ सुभगे शङ्करप्रतिमो भवेत्।<br>जन्मान्तरकृतं पापमपि नश्यति तत्क्षणात्॥ ८१<br>एवं विन्यस्य मेधावी शुद्धकायो दृढव्रतः।<br>जपेत्पञ्चाक्षरं मन्त्रं लब्ध्वाचार्यप्रसादतः॥ ८२ | बुद्धिमान्को चाहिये कि कण्ठमें, मध्यमें, अँगूठेमें, तर्जनी आदि अँगुलियोंमें अँगूठेसे ही करन्यास करे। इस प्रकार यह न्यास सभी पापोंको हरनेवाला, शुभ, सभी सिद्धियाँ देनेवाला, पुण्यप्रद, सबकी रक्षा करनेवाला तथा कल्याणकारी कहा गया है। हे सुभगे! मन्त्रका न्यास कर लेनेपर साधक शिवतुल्य हो जाता है और उसके द्वारा पूर्व जन्ममें किया गया पाप भी उसी क्षण नष्ट हो जाता है। इस प्रकार न्यास करके मेधावीको शुद्ध शरीरवाला तथा दृढव्रती होकर आचार्यकी कृपासे ग्रहण करके पंचाक्षर-मन्त्रका जप करना चाहिये॥ ७९-८२॥ |
| अतः परं प्रवक्ष्यामि मन्त्रसङ्ग्रहणं शुभे।<br>यं विना निष्फलं नित्यं येन वा सफलं भवेत्॥ ८३<br>आज्ञाहीनं क्रियाहीनं श्रद्धाहीनममानसम्।<br>आज्ञप्तं दक्षिणाहीनं सदा जप्तं च निष्फलम्॥ ८४<br>आज्ञासिद्धं क्रियासिद्धं श्रद्धासिद्धं सुमानसम्।<br>एवं च दक्षिणासिद्धं मन्त्रं सिद्धं यतस्ततः॥ ८५ | हे शुभे! अब मैं इस मन्त्रको ग्रहण करनेकी विधि बताऊँगा, जिसके बिना यह निष्फल हो जाता है और जिसके द्वारा यह सफल होता है। आज्ञाहीन, क्रियाहीन, श्रद्धाहीन, ध्यानहीन, आज्ञप्त तथा दक्षिणाहीन मन्त्र जपे जानेपर सदा निष्फल होता है। आज्ञासिद्ध, क्रियासिद्ध, श्रद्धासिद्ध, सुमानस (पूर्ण ध्यानयुक्त) तथा दक्षिणासिद्ध मन्त्र सदा सफल होता है॥ ८३-८५॥ |
| उपगम्य गुरुं विप्रं मन्त्रतत्त्वार्थवेदिनम्।<br>ज्ञानिनं सद्गुणोपेतं ध्यानयोगपरायणम्॥ ८६<br>तोषयेत्तं प्रयत्नेन भावशुद्धिसमन्वितः।<br>वाचा च मनसा चैव कायेन द्रविणेन च॥ ८७<br>आचार्यं पूजयेच्छिष्यः सर्वदातिप्रयत्नतः।<br>हस्त्यश्वरथरत्नानि क्षेत्राणि च गृहाणि च॥ ८८<br>भूषणानि च वासांसि धान्यानि विविधानि च।<br>एतानि गुरवे दद्याद्भक्त्या च विभवे सति॥ ८९<br>वित्तशाठ्यं न कुर्वीत यदिच्छेद्सिद्धिमात्मनः।<br>पश्चान्निवेदयेद्देवि आत्मानं सपरिच्छदम्॥ ९० | शिष्यको चाहिये कि मन्त्रके वास्तविक अर्थके ज्ञाता, ज्ञानसम्पन्न, सद्गुणोंसे युक्त तथा ध्यानयोगपरायण ब्राह्मण गुरुके पास जाकर भावशुद्धिसे युक्त हो मन-वचन-शरीर तथा धनसे उन्हें प्रयत्नपूर्वक सन्तुष्ट करे और बड़े प्रयत्नके साथ उन आचार्यकी सर्वदा पूजा करे। वैभव रहनेपर हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, क्षेत्र, गृह, आभूषण, वस्त्र तथा विविध धान्य—ये सब गुरुको भक्तिपूर्वक देना चाहिये। यदि वह अपनी सिद्धि चाहता हो तो धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये। हे देवि! |
| ४२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं सम्पूज्य विधिवद्यथाशक्ति त्ववञ्चयन्।<br>आददीत गुरोर्मन्त्रं ज्ञानं चैव क्रमेण तु॥ ९१<br><br>एवं तुष्टो गुरुः शिष्यं पूजितं वत्सरोषितम्।<br>शुश्रूषमनहङ्कारमुपवासकृशं शुचिम्॥ ९२ | इसके बाद सेवक आदि सहित अपने आपको भी समर्पित कर देना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक यथाशक्ति [गुरुकी] पूजा करके निष्कपट भाव रखते हुए [शिष्यको] गुरुसे क्रमपूर्वक मन्त्र तथा ज्ञान ग्रहण करना चाहिये॥ ८६—९१॥ |
| स्नापयित्वा तु शिष्याय ब्राह्मणानपि पूज्य च।<br>समुद्रतीरे नद्यां च गोष्ठे देवालयेऽपि वा॥ ९३<br><br>शुचौ देशे गृहे वापि काले सिद्धिकरे तिथौ।<br>नक्षत्रे शुभयोगे च सर्वदा दोषवर्जिते॥ ९४<br><br>अनुगृह्य ततो दद्याच्छिवज्ञानमनुत्तमम्।<br>स्वरेणोच्चारयेत्सम्येगकान्तेऽपि प्रसन्नधीः॥ ९५<br><br>उच्चार्योच्चारयित्वा तु आचार्यः सिद्धिदः स्वयम्।<br>शिवं चास्तु शुभं चास्तु शोभनोऽस्तु प्रियोऽस्त्विति॥ ९६ | इस प्रकार सन्तुष्ट गुरु वर्षपर्यन्त पास रहकर सेवामें परायण, अहंकाररहित, उपवाससे दुर्बल शरीरवाले तथा शुद्धियुक्त पूजित शिष्यको स्नान कराकर ब्राह्मणोंकी पूजा करके [किसी] समुद्रतटपर, नदीतटपर, गोशालामें, देवालयमें, पवित्र स्थानमें अथवा घरमें ही सिद्धिकारक समयमें, उत्तम तिथिमें तथा दोषरहित नक्षत्र एवं शुभयोगमें शिष्यपर अनुग्रह करके उसे अत्युत्तम शिवज्ञान प्रदान करे; साथ ही प्रसन्नचित्त होकर एकान्तमें स्वरसे सम्यक् उच्चारण करे। स्वयं उच्चारणकर तथा उच्चारण कराकर मन्त्रदाता आचार्य बोले—[तुम्हारा] कल्याण हो, शुभ हो, कुशल हो, प्रिय हो॥ ९२—९६॥ |
| एवं लब्ध्वा परं मन्त्रं ज्ञानं चैव गुरोस्ततः।<br>जपेन्नित्यं ससङ्कल्पं पुरश्चरणमेव च॥ ९७<br><br>यावज्जीवं जपेन्नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम्।<br>अनश्नंस्तत्परो भूत्वा स याति परमां गतिम्॥ ९८ | इस प्रकार गुरुसे श्रेष्ठ मन्त्र तथा ज्ञान प्राप्त करके नित्य इसका ससंकल्प जप करना चाहिये और पुरश्चरण भी करना चाहिये। जो बिना भोजन किये तत्पर होकर आजीवन नित्य इसका एक हजार आठ बार जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥ ९७-९८॥ |
| जपेदक्षरलक्षं वै चतुर्गुणितमादरात्।<br>नक्ताशी संयमी यश्च पौरश्चरणिकः स्मृतः॥ ९९<br><br>पुरश्चरणजापी वा अपि वा नित्यजापकः।<br>अचिरात्सिद्धिकाङ्क्षी तु तयोरन्यतरो भवेत्॥ १०० | नक्तव्रत करते हुए तथा नियमोंका पालन करते हुए जो श्रद्धापूर्वक मन्त्रकी अक्षरसंख्याका चार लाख गुना जप करता है, उसे पुरश्चरणकर्ता कहा गया है। पुरश्चरणजप करनेवाला अथवा नित्य जप करनेवाला शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है। दोनोंमें किसी एकको अवश्य करना चाहिये॥ ९९-१००॥ |
| यः पुरश्चरणं कृत्वा नित्यजापी भवेन्नरः।<br>तस्य नास्ति समो लोके स सिद्धः सिद्धिदो वशी॥ १०१ | जो मनुष्य पुरश्चरण करके इसका नित्य जप करनेवाला है, उसके समान लोकमें कोई नहीं है; वह सिद्ध, सिद्धिदाता तथा इन्द्रियजित् होता है॥ १०१॥ |
| आसनं रुचिरं बद्ध्वा मौनी चैकाग्रमानसः।<br>प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि जपेन्मन्त्रमनुत्तमम्॥ १०२ | सुखदायक आसन लगाकर मौन तथा एकाग्रचित्त होकर पूर्वकी ओर अथवा उत्तरकी ओर मुख करके [इस] सर्वोत्तम मन्त्रका जप करना चाहिये॥ १०२॥ |
| आद्यन्तयोर्जपस्यापि कुर्याद्वै प्राणसंयमान्।<br>तथा चान्ते जपेद्बीजं शतमष्टोत्तरं शुभम्॥ १०३ | जपके प्रारम्भ और अन्तमें [तीन-तीन] प्राणायाम करना चाहिये और अन्तमें एक सौ आठ बार बीजमन्त्रका |
अध्याय ८५ ] पञ्चाक्षरीविद्या ( पञ्चाक्षरमन्त्र ), जपविधान तथा उसकी महिमा [ ४२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चत्वारिंशत्समावृत्ति प्राणानायम्य संस्मरेत्।<br>पञ्चाक्षरस्य मन्त्रस्य प्राणायाम उदाहृतः ॥ १०४<br><br>प्राणायामाद्भवेत्क्षिप्रं सर्वपापपरिक्षयः।<br>इन्द्रियाणां वशित्वं च तस्मात्प्राणांश्च संयमेत् ॥ १०५ | जप करना चाहिये। श्वास रोककर चालीस बार जप करना चाहिये। यह पञ्चाक्षरमन्त्रका प्राणायाम कहा गया है। प्राणायामसे शीघ्र ही सभी पापोंका नाश और इन्द्रियोंका निग्रह हो जाता है, अतः प्राणायाम [अवश्य] करना चाहिये॥ १०३-१०५॥ |
| गृहे जपः समं विद्याद् गोष्ठे शतगुणं भवेत्।<br>नद्यां शतसहस्रं तु अनन्तः शिवसन्निधौ ॥ १०६<br><br>समुद्रतीरे देवह्रदे गिरौ देवालयेषु च।<br>पुण्याश्रमेषु सर्वेषु जपः कोटिगुणो भवेत् ॥ १०७<br><br>शिवस्य सन्निधाने च सूर्यस्याग्रे गुरोरपि।<br>दीपस्य गोर्जलेस्यापि जपकर्म प्रशस्यते ॥ १०८ | घरमें किये गये जपको सामान्य फलवाला जानना चाहिये। गोशालामें किया गया जप उससे सौ गुना फलदायक होता है। नदीके तटपर किया गया जप लाख गुना और शिवके सान्निध्यमें किया गया जप अनन्त गुना फलदायक होता है। समुद्रके तटपर, देवसरोवरोंमें, पर्वतपर, देवालयमें अथवा सभी पवित्र आश्रमोंमें किया गया जप करोड़ गुना फलदायक होता है। शिवकी सन्निधिमें, सूर्य, गुरु, दीपक, गौ अथवा जलके समक्ष जपकर्म श्रेष्ठ माना जाता है॥ १०६-१०८॥ |
| अङ्गुलीजपसंख्यानमेकमेकं शुभानने।<br>रेखैरष्टगुणं प्रोक्तं पुत्रजीवफलैर्दश ॥ १०९<br><br>शतं वै शङ्खमणिभिः प्रवालैश्च सहस्रकम्।<br>स्फाटिकैर्दशसाहस्रं मौक्तिकैर्लक्षमुच्यते ॥ ११०<br><br>पद्माक्षैर्दशलक्षं तु सौवर्णैः कोटिरुच्यते।<br>कुशाग्रन्ध्या च रुद्राक्षैरनन्तगुणमुच्यते ॥ १११ | हे शुभानने! एक-एक करके अँगुलीसे जपकी गणना करनेपर वह सामान्य फल प्रदान करता है; रेखाओंसे करनेपर वह आठ गुना फलदायक कहा गया है। पुत्रजीव-फलोंसे जप करनेपर दस गुना, शंखमणियोंसे करनेपर सौ गुना, प्रवालों (मूँगा)-से करनेपर हजार गुना, स्फटिकोंसे करनेपर दस हजार गुना और मोतियोंसे करनेपर लाख गुना फलदायक कहा जाता है। कमलके बीजसे करनेपर दस लाख गुना और सोनेके सुवर्णखण्डोंसे करनेपर जप करोड़ गुना फलदायक कहा जाता है। कुशाकी ग्रन्थिसे तथा रुद्राक्षोंसे गणना करनेपर जप अनन्त गुना फलदायक होता है॥ १०९-१११॥ |
| पञ्चविंशति मोक्षार्थं सप्तविंशति पौष्टिकम्।<br>त्रिंशच्च धनसम्पत्त्यै पञ्चाशच्चाभिचारिकम् ॥ ११२<br><br>तत्पूर्वाभिमुखं वश्यं दक्षिणं चाभिचारिकम्।<br>पश्चिमं धनदं विद्यादुत्तरं शान्तिकं भवेत् ॥ ११३ | पचीस मणियोंकी माला मोक्षके लिये, सत्ताईसकी [माला] पुष्टिके लिये, तीसकी धन-सम्पदाके लिये और पचासकी अभिचार कर्मके लिये होती है। पूर्वकी ओर मुख करके किया गया जप वशीकरणकी शक्ति देनेवाला और दक्षिणकी ओर मुख करके किया गया जप अभिचारकर्मकी शक्ति देनेवाला होता है। पश्चिमकी ओर मुख करके किये गये जपको धन प्रदान करनेवाला जानना चाहिये। उत्तरकी ओर मुख करके किया गया जप शान्ति प्रदान करनेवाला होता है॥ ११२-११३॥ |
| अङ्गुष्ठं मोक्षदं विद्यात्तर्जनी शत्रुनाशनी।<br>मध्यमा धनदा शान्तिं करोत्येषा ह्यनामिका ॥ ११४ | अँगुठेको मोक्ष देनेवाला जानना चाहिये। तर्जनी |
| ४२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [पूर्वभाग |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कनिष्ठा रक्षणीया सा जपकर्मणि शोभने।<br>अङ्गुष्ठेन जपेज्जप्यमन्यैरङ्गुलिभिः सह॥ ११५<br><br>अङ्गुष्ठेन विना कर्म कृतं तदफलं यतः। | [अँगुली] शत्रु का नाश करनेवाली तथा मध्यमा धन प्रदान करनेवाली है। अनामिका शान्ति प्रदान करती है। हे शोभने! जपकर्ममें कनिष्ठा रक्षणीय होती है। अँगूठेसे अन्य अँगुलियोंके साथ मन्त्रका जप करना चाहिये; क्योंकि बिना अँगूठेके जो जपकर्म किया जाता है, वह निष्फल होता है॥ ११४-११५ १/२ ॥ |
| शृणुष्व सर्वयज्ञेभ्यो जपयज्ञो विशिष्यते॥ ११६<br><br>हिंसया ते प्रवर्तन्ते जपयज्ञो न हिंसया।<br>यावन्तः कर्म यज्ञाः स्युः प्रदानानि तपांसि च॥ ११७<br><br>सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्। | [हे देवि!] सुनो, जपयज्ञ सभी यज्ञोंसे श्रेष्ठ है; वे सभी यज्ञ हिंसाके साथ हुआ करते हैं, किंतु जपयज्ञ बिना हिंसाके होता है। जितने भी अनुष्ठान, यज्ञ, दान तथा तप हैं, वे सब [इस] जपयज्ञकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं॥ ११६-११७ १/२ ॥ |
| माहात्म्यं वाचिकस्यैव जपयज्ञस्य कीर्तितम्॥ ११८<br><br>तस्माच्छतगुणोपांशुः सहस्रो मानसः स्मृतः।<br>यदुच्चनीचस्वरितैः शब्दैः स्पष्टपदाक्षरैः॥ ११९<br><br>मन्त्रमुच्चारयेद्वाचा जपयज्ञः स वाचिकः।<br>शनैरुच्चारयेन्मन्त्रमीषदोष्ठौ तु चालयेत्॥ १२०<br><br>किञ्चित्कर्णान्तरं विद्यादुपांशुः स जपः स्मृतः।<br>धिया यदक्षरश्रेण्या वर्णाद्वर्णं पदात्पदम्॥ १२१<br><br>शब्दार्थं चिन्तयेद्भूयः स तूक्तो मानसो जपः।<br>त्रयाणां जपयज्ञानां श्रेयान् स्यादुत्तरोत्तरः॥ १२२<br><br>भवेद्यज्ञविशेषेण वैशिष्ट्यं तत्फलस्य च। | वाचिक जपयज्ञका जो माहात्म्य बताया गया है; उपांशु [जपयज्ञ] उससे सौ गुना और मानस [जपयज्ञ] हजार गुना [फलप्रद] कहा गया है। यदि साधक स्पष्ट पद-अक्षरोंवाले शब्दोंके साथ उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरोंमें वाणीके द्वारा मन्त्रका उच्चारण करता है, तो वह जपयज्ञ वाचिक होता है। यदि साधक धीमे स्वरमें मन्त्रका उच्चारण करता है और कुछ-कुछ ओठोंको चलाता है तथा उसे कुछ-कुछ कानमें सुनायी पड़ता है, तो वह जप उपांशु कहा गया है। यदि साधक मनमें अक्षरसमूहके वर्णसे वर्ण तथा पदसे पद शब्दार्थका बार-बार चिन्तन करता है, तो उस जपको मानस जप कहा गया है। तीनों जपयज्ञोंमें उत्तरोत्तर (बादवाला पहलेकी अपेक्षा) श्रेष्ठ है। यज्ञविशेषसे उसके फलका वैशिष्ट्य होता है॥ ११८-१२२ १/२ ॥ |
| जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति॥ १२३<br><br>प्रसन्ना विपुलान् भोगान् दद्यान्मुक्तिं च शाश्वतीम्।<br>यक्षरक्षःपिशाचाश्च ग्रहाः सर्वे च भीषणाः।<br>जापिनं नोपसर्पन्ति भयभीताः समन्ततः॥ १२४ | जपके द्वारा नित्य स्तुति किये जाते हुए देवता प्रसन्न हो जाते हैं और प्रसन्न होकर अत्यधिक भोग तथा चिरस्थायी मुक्ति प्रदान करते हैं। यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा सभी भयंकर ग्रह जप करनेवालेके पास नहीं जाते और उससे पूर्णरूपसे भयभीत रहते हैं॥ १२३-१२४॥ |
| जपेन पापं शमयेदशेषं<br>यत्तत्कृतं जन्मपरम्परासु।<br>जपेन भोगान् जयते च मृत्युं<br>जपेन सिद्धिं लभते च मुक्तिम्॥ १२५ | मनुष्य जन्म-जन्मान्तरमें जो भी पाप किये रहता है, उसे जपके द्वारा नष्ट कर देता है; जपके द्वारा भोगोंको प्राप्त करता है; मृत्युको जीत लेता है; जपके द्वारा सिद्धि तथा मुक्तिको भी प्राप्त कर लेता है॥ १२५॥ |
| एवं लब्ध्वा शिवं ज्ञानं ज्ञात्वा जपविधिक्रमम्॥ १२६ | इस प्रकार शिवज्ञान प्राप्त करके और जपके |
अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सदाचारी जपेन्नित्यं ध्यायन् भद्रं समश्नुते।<br>सदाचारं प्रवक्ष्यामि सम्यक् धर्मस्य साधनम्॥ १२७<br><br>यस्मादाचारहीनस्य साधनं निष्फलं भवेत्।<br>आचारः परमो धर्म आचारः परमं तपः॥ १२८<br><br>आचारः परमा विद्या आचारः परमा गतिः।<br>सदाचारवतां पुंसां सर्वत्राप्यभयं भवेत्॥ १२९ | विधिक्रमको जानकर सदाचारी [मनुष्य] नित्य जप करता हुआ तथा शिवका ध्यान करता हुआ कल्याण प्राप्त करता है॥ १२६१/२॥<br><br>[हे देवि!] अब मैं धर्मके साधनस्वरूप सदाचारका सम्यक् वर्णन करूँगा; क्योंकि आचारहीन [व्यक्ति]-का साधन निष्फल हो जाता है। आचार सर्वश्रेष्ठ धर्म है, आचार परम तप है, आचार परम विद्या है और आचार परम गति है। जिस तरह सदाचारी मनुष्योंको सभी जगह अभय रहता है; उसी तरह आचारीहीनोंको सर्वत्र भय ही रहता है॥ १२७-१२९१/२॥ |
| तद्वदाचारहीनानां सर्वत्रैव भयं भवेत्।<br>सदाचारेण देवत्वमृषित्वं च वरानने॥ १३०<br><br>उपयान्ति कुयोनित्वं तद्वदाचारलङ्घनात्।<br>आचारहीनः पुरुषो लोके भवति निन्दितः॥ १३१<br><br>तस्मात्संसिद्धिमन्विच्छन् सम्यगाचारवान् भवेत्।<br>दुर्वृत्तो शुद्धिभूयिष्ठो पापीयाञ्ज्ञानदूषकः॥ १३२ | हे वरानने! जो सदाचारका पालन करते हैं, वे देवत्व तथा ऋषित्व प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार जो आचारका उल्लंघन करते हैं, वे कुत्सित योनि प्राप्त करते हैं। आचारसे विहीन पुरुष संसारमें निन्दित होता है, अतः सिद्धिकी इच्छा रखनेवालेको पूर्णरूपसे आचारवान् होना चाहिये। महान् शुद्धिसे युक्त होता हुआ भी दुराचारी व्यक्ति पापी तथा ज्ञानको दूषित करनेवाला होता है॥ १३०-१३२॥ |
| वर्णाश्रमविधानोक्तं धर्मं कुर्वीत यत्नतः॥ १३३<br><br>यस्य यद्विहितं कर्म तत्कुर्वन् मत्प्रियः सदा।<br>सन्ध्योपासनशीलः स्यात्सायं प्रातः प्रसन्नधीः॥ १३४<br><br>उदयास्तमयात्पूर्वमारभ्य विधिना शुचिः।<br>कामान्मोहाद्भयाल्लोभात्सन्ध्यां नातिक्रमेद् द्विजः॥ १३५<br><br>सन्ध्यातिक्रमणाद्विप्रो ब्राह्मण्यत्पतते यतः। | वर्णाश्रम-विधानके अनुसार बताये गये धर्मका यत्नपूर्वक पालन करना चाहिये। जिसका जो कर्म विहित है, उसे करनेवाला सर्वदा मुझे प्रिय है। प्रसन्नचित्त होकर प्रातः तथा सायंकाल सन्ध्योपासन करना चाहिये। द्विजको चाहिये कि सूर्योदय तथा सूर्यास्तके पूर्व आरम्भ करके पवित्र होकर विधिपूर्वक सन्ध्या करे और काम, मोह, भय तथा लोभके कारण सन्ध्याका उल्लंघन न करे; क्योंकि सन्ध्याका उल्लंघन करनेसे विप्र ब्राह्मणत्वसे पतित हो जाता है॥ १३३-१३५१/२॥ |
| असत्यं न वदेत्किञ्चिन्न सत्यं च परित्यजेत्॥ १३६<br><br>यत्सत्यं ब्रह्म इत्याहुरसत्यं ब्रह्मदूषणम्।<br>अनृतं परुषं शाठ्यं पैशुन्यं पापहेतुकम्॥ १३७<br><br>परदारान् परद्रव्यं परहिंसां च सर्वदा।<br>क्वचिच्चापि न कुर्वीत वाचा च मनसा तथा॥ १३८ | कुछ भी असत्य नहीं बोलना चाहिये और सत्यका त्याग नहीं करना चाहिये। सत्यको ब्रह्म कहा गया है; असत्य ब्रह्मको दूषित करनेवाला है। असत्य, कठोर वचन, शठता तथा परनिन्दा—ये पापके कारण हैं। वाणी तथा मनसे भी परायी स्त्री तथा पराये धनका हरण और परहिंसा कभी भी नहीं करनी चाहिये॥ १३६-१३८॥ |
| शूद्रान्नं यातयामान्नं नैवेद्यं श्राद्धमेव च।<br>गणान्नं समुदायान्नं राजान्नं च विवर्जयेत्॥ १३९ | शूद्रके अन्न, बासी अन्न, [शिवका] नैवेद्य, श्राद्धके अन्न, अनेक लोगोंके अधिकारवाले अन्न, समुदायविशेषके |
| ४२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अन्नशुद्धौ सत्त्वशुद्धिर्न मृदा न जलेन वै।<br>सत्त्वशुद्धौ भवेत्सिद्धिस्ततोऽन्नं परिशोधयेत्॥ १४० | लिये निर्मित अन्नका तथा राजाके अन्नका त्याग करना चाहिये। अन्नकी शुद्धिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है, न कि मिट्टी अथवा जलसे। अन्तःकरणकी पवित्रतासे सिद्धि प्राप्त होती है, अतः अन्नका शोधन करना चाहिये अर्थात् पवित्र अन्न ग्रहण करना चाहिये॥ १३९-१४०॥ |
| राजप्रतिग्रहैर्दग्धान् ब्राह्मणान् ब्रह्मवादिनः ।<br>स्विन्नानामपि बीजानां पुनर्जन्म न विद्यते॥ १४१<br><br>राजप्रतिग्रहो घोरो बुद्ध्वा चादौ विषोपमः।<br>बुधेन परिहर्त्तव्यः श्वमांसं चापि वर्जयेत्॥ १४२ | जैसे भुने हुए बीजोंका अंकुरण नहीं होता है, वैसे ही ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंको भी राजाओंके प्रतिग्रहसे दग्ध जानना चाहिये। अर्थात् वे ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाते हैं। राजाओंसे प्रतिग्रह लेना पाप है तथा विषके समान है—प्रारम्भमें ही ऐसा जानकर बुद्धिमान्को इसे ग्रहण नहीं करना चाहिये और कुत्तेके मांसके समान इसका त्याग कर देना चाहिये॥ १४१-१४२॥ |
| अस्नात्वा न च भुञ्जीयादजपोऽग्निमपूज्य च।<br>पर्णपृष्ठे न भुञ्जीयाद्रात्रौ दीपं विना तथा॥ १४३<br><br>भिन्नभाण्डे च रथ्यायां पतितानां च सन्निधौ।<br>शूद्रशेषं न भुञ्जीयात्सहान्नं शिशुकैरपि॥ १४४ | बिना स्नान किये, बिना जप किये तथा बिना अग्निपूजन किये भोजन नहीं करना चाहिये। पत्तेके पृष्ठपर भोजन नहीं करना चाहिये तथा रातमें बिना दीपक जलाये भोजन नहीं करना चाहिये। टूटे हुए पात्रमें, मार्गमें एवं पतितजनोंके समीप भोजन नहीं करना चाहिये। शूद्रोंका छोड़ा हुआ अन्न नहीं खाना चाहिये और शिशुओंके साथ भी भोजन नहीं करना चाहिये॥ १४३-१४४॥ |
| शुद्धान्नं स्निग्धमश्नीयात्संस्कृतं चाभिमन्त्रितम्।<br>भोक्ता शिव इति स्मृत्वा मौनी चैकाग्रमानसः॥ १४५<br><br>आस्येन न पिबेत्तोयं तिष्ठन्नाञ्जलिनापि वा।<br>वामहस्तेन शय्यायां तथैवान्यकरेण वा॥ १४६ | शुद्ध, स्निग्ध (चिकना), पका हुआ तथा अभिमन्त्रित अन्न ग्रहण करना चाहिये; भोजन करनेवाला शिव है—ऐसा समझकर मौन तथा एकाग्रचित्त होकर भोजन करना चाहिये। खड़े-खड़े, अंजुलिसे, मुख लगाकर, बायें हाथसे, शय्यापर तथा दायें हाथसे भी पानी नहीं पीना चाहिये॥ १४५-१४६॥ |
| विभीतकार्ककारञ्जस्नुहिच्छायां न चाश्रयेत्।<br>स्तम्भदीपमनुष्याणामन्येषां प्राणिनां तथा॥ १४७ | बहेड़ा, अर्क (मदार), करंज तथा सेंहुड़के वृक्षकी छायामें शरण नहीं लेना चाहिये। किसी खम्भे, दीप, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियोंकी छायामें खड़े नहीं होना चाहिये॥ १४७॥ |
| एको न गच्छेदध्वानं बाहुभ्यां नोत्तरेन्नदीम्।<br>नावरोहेत् कूपादिं नारोहेदुच्चपादपान्॥ १४८ | दूर यात्रापर अकेले नहीं जाना चाहिये, भुजाओंके सहारे तैरकर नदीको पार नहीं करना चाहिये, कूप आदिमें नहीं उतरना चाहिये और लम्बे वृक्षोंपर नहीं चढ़ना चाहिये॥ १४८॥ |
| सूर्याग्निजलदेवानां गुरूणां विमुखः शुभे।<br>न कुर्यादिह कार्याणि जपकर्म शुभानि वा॥ १४९ | हे शुभे! सूर्य, अग्नि, जल, देवता तथा गुरुजनोंके |
अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४२७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विमुख होकर जपकर्म तथा [अन्य] शुभ कर्म नहीं करने चाहिये॥ १४९॥ | |
| अग्नौ न तापयेत्पादौ हस्तं पद्भ्यां न संस्पृशेत्।<br>अग्नेर्नोर्ध्व्यमासीत नाग्नौ किञ्चिन्मलं त्यजेत्॥ १५० | अग्निमें पैरोंको तपाना नहीं चाहिये, पैरोंसे हाथका स्पर्श नहीं करना चाहिये, अग्निके ऊपर आसन नहीं बनाना चाहिये और अग्निमें कोई मल (दूषित पदार्थ) नहीं डालना चाहिये॥ १५०॥ |
| न जलं ताडयेत्पद्भ्यां नाम्भस्यङ्गमलं त्यजेत्।<br>मलं प्रक्षालयेत्तीरे प्रक्षाल्य स्नानमाचरेत्॥ १५१ | पैरोंसे जल नहीं उछालना चाहिये, शरीरकी मैलको जलमें नहीं छोड़ना चाहिये; तटपर ही मलको साफ करना चाहिये और उसे साफ करके स्नान करना चाहिये॥ १५१॥ |
| नखाग्रकेशनिर्धूतस्नानवस्त्रघटोदकम् ।<br>अश्रीकरं मनुष्याणामशुद्धं संस्पृशेदयदि॥ १५२ | नाखून तथा केशसे टपकता हुआ जल और स्नानवस्त्रका तथा घटका जल मनुष्योंके लिये श्रेयस्कर नहीं होता है; यदि कोई इसे स्पर्श करता है, तो अशुद्ध हो जाता है॥ १५२॥ |
| अजाश्ववानखरोष्ट्राणां मार्जनात्तृषरेणुकाम्।<br>संस्पृशेदयदि मूढात्मा श्रियं हन्ति हरेरपि॥ १५३ | यदि कोई मूढ़ बुद्धिवाला [मनुष्य] बकरी, कुत्ता, गधा, ऊँट आदिसे उठी हुई धूल और झाड़ू लगानेसे उठी हुई धूलका स्पर्श करता है, तो उसकी लक्ष्मी नष्ट हो जाती है, चाहे वह विष्णु ही क्यों न हों॥ १५३॥ |
| मार्जारश्च गृहे यस्य सोऽप्यन्त्यजसमो नरः।<br>भोजयेद्यस्तु विप्रेन्द्रान् मार्जारान् सन्निधौ यदि॥ १५४<br><br>तच्चाण्डालसमं ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा। | जिसके घरमें बिल्ली रहती है, वह चाण्डालके समान होता है। यदि कोई मनुष्य बिल्लीकी सन्निधिमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, तो उसे चाण्डालके समान जानना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १५४ १/२ ॥ |
| स्फिग्वातं शूर्पवातं च वातं प्राणमुखानिलम्॥ १५५<br><br>सुकृतानि हरन्त्येते संस्पृष्टाः पुरुषस्य तु।<br>उष्णीषी कञ्चुकी नग्नो मुक्तकेशो मलावृतः॥ १५६<br><br>अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत्क्वचित्। | दूषित वायु, सूपकी वायु और प्राणियोंके मुखसे निकली हुई वायु—इनका सम्पर्क हो जानेपर ये मनुष्यके पुण्योंको नष्ट कर देते हैं। पगड़ी धारण करके, कंचुक पहनकर, नग्न होकर, केशोंको खोलकर, मैलसे युक्त होकर, अपवित्र हाथसे, अशुद्ध होकर तथा बात-चीत करते हुए कभी भी जप नहीं करना चाहिये॥ १५५-१५६ १/२ ॥ |
| क्रोधो मदः क्षुधा तन्द्रा निष्ठीवनविजृम्भणे॥ १५७<br><br>श्वनीचदर्शनं निद्रा प्रलापास्ते जपद्विषः।<br>एतेषां सम्भवे वापि कुर्यात्सूर्यादिदर्शनम्॥ १५८<br><br>आचम्य वा जपेच्छेषं कृत्वा वा प्राणसंयमम्।<br>सूर्योऽग्निश्चन्द्रमाश्चैव ग्रहनक्षत्रतारकाः॥ १५९ | क्रोध, अहंकार, भूख, आलस्य, थूकना, जम्हाई, कुत्ते तथा नीच व्यक्तिका दर्शन, निद्रा तथा वार्तालाप—ये जपके शत्रु हैं; इनके उत्पन्न होनेपर सूर्य आदिका दर्शन करना चाहिये। पुनः आचमन करके अथवा प्राणायाम करके शेष जप करना चाहिये। सूर्य, अग्नि, |
| ४२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एते ज्योतींषि प्रोक्तानि विद्वद्भिर्ब्राह्मणैस्तथा।<br>प्रसार्य पादौ न जपेत्कुकुटासन एव च॥ १६०<br><br>अनासनः शयानो वा रथ्यायां शूद्रसन्निधौ।<br>रक्तभूम्यां च खट्वायां न जपेज्जापकस्तथा॥ १६१<br><br>आसनस्थो जपेत्सम्यक् मन्त्रार्थगतमानसः।<br>कौशेयं व्याघ्रचर्म वा चैलंतौलमथापि वा॥ १६२<br><br>दारवं तालपर्णं वा आसनं परिकल्पयेत्।<br>त्रिसन्ध्यं तु गुरोः पूजा कर्तव्या हितमिच्छता॥ १६३ | चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, तारे—ये विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा ज्योतिर्गण कहे गये हैं॥ १५७-१५९<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥<br>पैरोंको फैलाकर अथवा कुक्कुट आसनमें बैठकर जप नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार जापकको बिना आसनके, लेटे हुए, मार्गपर, शूद्रके पास, रक्तभूमिपर अथवा चारपाईपर जप नहीं करना चाहिये। आसनपर बैठकर मनमें मन्त्रके अर्थका चिन्तन करते हुए भली-भाँति जप करना चाहिये। रेशमी वस्त्र, व्याघ्रचर्म, वस्त्र, रूई, लकड़ी अथवा ताड़के पत्तेका आसन बनाना चाहिये॥ १६०—१६२<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः।<br>यथा शिवस्तथा विद्या यथा विद्या तथा गुरुः॥ १६४<br><br>शिवविद्या गुरोस्तस्माद्भक्त्या च सदृशं फलम्।<br>सर्वदेवमयो देवि सर्वशक्तिमयो हि सः॥ १६५<br><br>सगुणो निर्गुणो वापि तस्याज्ञां शिरसा वहेत्।<br>श्रेयोऽर्थी यस्तु गुर्वाज्ञां मनसापि न लङ्घयेत्॥ १६६<br><br>गुर्वाज्ञापालकः सम्यक् ज्ञानसम्पत्तिमश्नुते।<br>गच्छंस्तिष्ठन् स्वपन् भुञ्जन् यद्यत्कर्म समाचरेत्॥ १६७<br><br>समक्षं यदि तत्सर्वं कर्तव्यं गुर्वनुज्ञया।<br>गुरोर्देवसमक्षं वा न यथेष्टासनो भवेत्॥ १६८ | अपना हित चाहनेवालेको तीनों सन्ध्याओंमें गुरुकी पूजा करनी चाहिये। जो गुरु हैं, वे शिव कहे गये हैं और जो शिव हैं, वे गुरु कहे गये हैं। जैसे शिव हैं, वैसे ही विद्या; जैसी विद्या वैसे ही गुरु होते हैं। शिवविद्या उन गुरुसे ही ग्रहण की जा सकती है और भक्तिके द्वारा अनुकूल फल प्राप्त होता है। हे देवि! वे [गुरु] सर्वदेवस्वरूप तथा सर्वशक्तिस्वरूप हैं। गुरु सगुण हों अथवा निर्गुण—उनकी आज्ञाको शिरोधार्य करना चाहिये। जो कल्याणका इच्छुक है, उसे मनसे भी गुरुकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। पूर्णरूपसे गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला [शिष्य] ज्ञानसम्पदा प्राप्त करता है। चलते हुए, बैठते हुए, सोते हुए अथवा खाते हुए [शिष्य] जो भी कर्म यदि गुरुके समक्ष करे, वह समस्त कार्य उनकी आज्ञासे ही करना चाहिये॥ १६३—१६७<sup>१</sup>/<sub>२</sub>॥ |
| गुरुर्देवो यतः साक्षात्तद्गृहं देवमन्दिरम्।<br>पापिनां च यथासङ्गात्तत्पापैः पतनं भवेत्॥ १६९<br><br>तद्वदाचार्यसङ्गेन तद्धर्मफलभाग्भवेत्।<br>यथैव वह्निसम्पर्कान्मलं त्यजति काञ्चनम्॥ १७०<br><br>तथैव गुरुसम्पर्कात्पापं त्यजति मानवः।<br>यथा वह्निसमीपस्थो घृतकुम्भो विलीयते॥ १७१<br><br>तथा पापं विलीयेत आचार्यस्य समीपतः।<br>यथा प्रज्वलितो वह्निर्विष्ठां काष्ठं च निर्दहेत्॥ १७२ | गुरुदेवके समक्ष इच्छानुसार आसनपर नहीं बैठना चाहिये; क्योंकि गुरु साक्षात् देवता हैं और उनका घर देवमन्दिर है। जिस प्रकार पापियोंकी संगतिके कारण उनके पापोंसे [व्यक्तिका] पतन हो जाता है, उसी प्रकार गुरुकी संगतिसे [व्यक्ति] उनके धर्मफलका भागी होता है। जैसे सुवर्ण अग्निके सम्पर्कसे अपने मैलका त्याग करता है, वैसे ही मनुष्य गुरुके सम्पर्कसे पापका त्याग करता है। जैसे अग्निके समीप स्थित कुम्भका घृत पिघल जाता है, वैसे ही आचार्य (गुरु)-के सम्पर्कसे [मनुष्यका] पाप विलीन हो जाता है। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि मल तथा काष्ठको जला डालती है, उसी प्रकार प्रसन्न |
अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गुरुस्तुष्टो दहत्येवं पापं तन्मन्त्रतेजसा।<br>ब्रह्मा हरस्तथा रुद्रो देवाश्च मुनयस्तथा॥ १७३ | हुए गुरु अपने मन्त्रके तेजसे [शिष्यके] पापको भस्म कर देते हैं॥ १६८–१७२ १/२॥ |
| कुर्वन्त्यनुग्रहं तुष्टा गुरौ तुष्टे न संशयः।<br>कर्मणा मनसा वाचा गुरोः क्रोधं न कारयेत्॥ १७४ | गुरुके प्रसन्न रहनेपर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सभी देवता तथा मुनि भी [उस व्यक्तिपर] प्रसन्न होकर कृपा करते हैं; इसमें सन्देह नहीं है। मन, वचन तथा कर्मसे गुरुको क्रोधित नहीं करना चाहिये; उनके क्रोधसे आयु, लक्ष्मी (वैभव), ज्ञान और सत्कर्म दग्ध हो जाते हैं। जो लोग उन्हें कुपित करते हैं, उनके यज्ञ, जप तथा अन्य अनुष्ठान व्यर्थ हो जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ १७३–१७५ १/२॥ |
| तस्य क्रोधेन दह्यन्ते आयुः श्रीर्ज्ञानसत्क्रियाः।<br>तत्क्रोधं ये करिष्यन्ति तेषां यज्ञाश्च निष्फलाः॥ १७५ | |
| जपान्द्यनियमश्चैव नात्र कार्या विचारणा।<br>गुरोर्विरुद्धं यद्वाक्यं न वदेत्सर्वयत्नतः॥ १७६ | पूर्ण प्रयत्नपूर्वक गुरुके विरुद्ध कुछ भी वचन नहीं बोलना चाहिये; यदि कोई अज्ञानवश ऐसा बोलता है, तो वह रौरव नरकमें पड़ता है। हे देवि! मन, धन, वचन तथा कर्मसे गुरुको कभी झूठा सिद्ध नहीं करना चाहिये। उनका दुर्गुण कहनेपर व्यक्ति सौ दुर्गुणोंसे युक्त हो जाता है और उनका गुण कहनेपर सभी गुणोंका फल मिलता है। गुरुने आदेश दिया हो अथवा नहीं, सर्वदा उनका हित तथा प्रिय करना चाहिये; गुरु सामने हों अथवा परोक्षमें हों, उनका कार्य करना चाहिये। मन, वचन, शरीर तथा कर्मसे गुरुका हित तथा प्रिय करना चाहिये। ऐसा न करनेवाला नरकमें गिरता है और वहाँ जाकर वहींपर विचरण करता रहता है। अतः सर्वदा उनकी उपासना तथा वन्दना करनी चाहिये। पास रहते हुए भी गुरुसे आज्ञा लेकर तथा उनकी ओर मुख न करके बोलना चाहिये। ऐसा आचारवान्, भक्ति-सम्पन्न, नित्य जप करनेवाला तथा गुरुका प्रिय करनेवाला [शिष्य] इस मन्त्रका विनियोग करनेके योग्य होता है॥ १७६–१८२ १/२॥ |
| वदेद्यदि महामोहाद्रौरवं नरकं व्रजेत्।<br>चित्तेनैव च वित्तेन तथा वाचा च सुव्रताः*॥ १७७ | |
| मिथ्या न कारयेद्देवि क्रियया च गुरोः सदा।<br>दुर्गुणे ख्यापिते तस्य नैर्गुण्यशतभागभवेत्॥ १७८ | |
| गुणे तु ख्यापिते तस्य सार्वगुण्यफलं भवेत्।<br>गुरोर्हितं प्रियं कुर्यादादिष्टो वा न वा सदा॥ १७९ | |
| असमक्षं समक्षं वा गुरोः कार्यं समाचरेत्।<br>गुरोर्हितं प्रियं कुर्यान्मनोवाक्कायकर्मभिः॥ १८० | |
| कुर्वन् पतत्यधो गत्वा तत्रैव परिवर्तते।<br>तस्मात्स सर्वदोपास्यो वन्दनीयश्च सर्वदा॥ १८१ | |
| समीपस्थोऽप्यनुज्ञाप्य वदेत्तद्विमुखो गुरुम्।<br>एवमाचारवान् भक्तो नित्यं जपपरायणः॥ १८२ | |
| गुरुप्रियकरो मन्त्रं विनियोक्तुं ततोऽर्हति।<br>विनियोगं प्रवक्ष्यामि सिद्धमन्त्रप्रयोजनम्॥ १८३ | [हे देवि!] अब मैं सिद्धमन्त्रके प्रयोजनस्वरूप विनियोगको बताऊँगा; विनियोग न जाननेवालेका वह मन्त्र प्रभावहीन हो जाता है। जिसका जिस कार्यके साथ विशेष रूपसे संयोजन किया जाय, उसे विनियोग कहा गया है। यह इस लोकमें तथा परलोकमें फल प्रदान करता है। विनियोगसे आयु, आरोग्य, शरीरकी नित्यता, राज्य, ऐश्वर्य, उत्तम ज्ञान, स्वर्ग तथा मोक्ष—ये सब |
| दौर्बल्यं याति तन्मन्त्रं विनियोगमजानतः।<br>यस्य येन वियुञ्जीत कार्येण तु विशेषतः॥ १८४ | |
| विनियोगः स विज्ञेय ऐहिकामुष्मिकं फलम्।<br>विनियोगजमायुष्यमारोग्यं तनुनित्यता॥ १८५ | |
| राज्यैश्वर्यं च विज्ञानं स्वर्गो निर्वाण एव च।<br>प्रोक्षणं चाभिषेकं च अघमर्षणमेव च॥ १८६ |
* सुव्रताः—यह सम्बोधन सूतजीद्वारा ऋषियोंके लिये प्रयुक्त है।
| ४३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्नाने च सन्ध्ययोश्चैव कुर्यादेकादशेन वै।<br>शुचिः पर्वतमारुह्य जपेल्लक्षमन्द्वितः॥ १८७<br><br>महानद्यां द्विलक्षं तु दीर्घमायुरवाप्नुयात्।<br>दूर्वाङ्कुरास्तिला वाणी गुडूची घुटिका तथा॥ १८८ | प्राप्त होते हैं॥ १८३-१८४ १/२॥<br><br>स्नानमें तथा [प्रातः-सायं] दोनों सन्ध्याओंमें ग्यारह बार पंचाक्षरमन्त्रसे प्रोक्षण, अभिषेक तथा अघमर्षण करना चाहिए। जो शुद्ध होकर पर्वतपर चढ़कर आलस्यरहित हो एक लाख बार मन्त्रका जप करता है अथवा किसी महानदीके तटपर दो लाख बार जप करता है, वह दीर्घ आयु प्राप्त करता है॥ १८६-१८७ १/२॥ |
| तेषां तु दशसाहस्रं होममायुष्यवर्धनम्।<br>अश्वत्थवृक्षमाश्रित्य जपेल्लक्षद्वयं सुधीः॥ १८९<br><br>शनैश्चरदिने स्पृष्ट्वा दीर्घायुष्यं लभेन्नरः।<br>शनैश्चरदिनेऽश्वत्थं पाणिभ्यां संस्पृशेत्सुधीः॥ १९० | दूर्वांकुर, तिल, वाणी, गुरुच और घुटिका—इनका दस हजार होम आयुकी वृद्धि करनेवाला होता है। बुद्धिमान्को चाहिये कि पीपलके वृक्षका आश्रय लेकर दो लाख जप करे। शनिवारको पीपल वृक्षका स्पर्श करके मनुष्य दीर्घ आयु प्राप्त करता है। बुद्धिमान्को शनैश्चरके दिन [अपने] दोनों हाथोंसे पीपलके वृक्षका स्पर्श करना चाहिये और एक सौ आठ बार [मन्त्रका] जप करना चाहिये; यह भी अकाल मृत्युको दूर करनेवाला होता है॥ १८८-१९० १/२॥ |
| जपेदष्टोत्तरशतं सोऽपमृत्युहरो भवेत्।<br>आदित्याभिमुखो भूत्वा जपेल्लक्षमनन्यधीः॥ १९१<br><br>अर्कैरष्टशतं नित्यं जुह्वन् व्याधेर्विमुच्यते।<br>समस्तव्याधिशान्त्यर्थं पलाशसमिधैर्नरः॥ १९२<br><br>हुत्वा दशसहस्रं तु निरोगी मनुजो भवेत्।<br>नित्यमष्टशतं जप्त्वा पिबेदम्भोऽर्कसन्निधौ॥ १९३ | सूर्यकी ओर मुख करके एकाग्रचित्त होकर एक लाख जप करना चाहिये; अर्ककी समिधाओंसे प्रतिदिन एक सौ आठ होम करनेवाला [व्यक्ति] रोगसे मुक्त हो जाता है। मनुष्यको समस्त रोगोंके शमनके लिये पलाश-समिधाओंसे होम करना चाहिये; इससे दस हजार होम करके मनुष्य रोगरहित हो जाता है। प्रतिदिन एक सौ आठ बार जप करके सूर्यके समक्ष जल पीना चाहिये; ऐसा करनेवाला एक महीनेमें ही सभी उदर-सम्बन्धी रोगोंसे मुक्त हो जाता है॥ १९१-१९३ १/२॥ |
| औदर्यैर्व्याधिभिः सर्वैर्मासैनेकेन मुच्यते।<br>एकादशेन भुञ्जीयादन्नं चैवाभिमन्त्रितम्॥ १९४<br><br>भक्ष्यं चान्यत्तथा पेयं विषमप्यमृतं भवेत्।<br>जपेल्लक्षं तु पूर्वाह्ने हुत्वा चाष्टशतेन वै॥ १९५<br><br>सूर्यं नित्यमुपस्थाय सम्यगारोग्यमाप्नुयात्।<br>नदीतोयेन सम्पूर्णं घटं संस्पृश्य शोभनम्॥ १९६<br><br>जप्त्वायुतं च तत्स्नानाद्रोगाणां भेषजं भवेत्। | ग्यारह बार मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके अन्न तथा अन्य भक्ष्य-पेय पदार्थ ग्रहण करना चाहिये; इससे विष भी अमृत हो जाता है। प्रतिदिन पूर्वाह्नमें एक सौ आठ आहुति देकर तथा सूर्योपस्थान करके एक लाख जप करना चाहिये; ऐसा करनेवाला पूर्ण आरोग्य प्राप्त करता है। नदीके जलसे भरे हुए सुन्दर घड़ेको स्पर्श करते हुए दस हजार जप करनेसे तथा उसी जलसे स्नान करनेसे सभी रोगोंकी चिकित्सा हो जाती है॥ १९४-१९६ १/२॥ |
| अष्टाविंशज्जपित्वान्नमश्नीयादन्वहं शुचिः॥ १९७<br><br>हुत्वा च तावत्पालाशैरेवं वारोग्यमश्नुते।<br>चन्द्रसूर्यग्रहे पूर्वमुपोष्य विधिना शुचिः॥ १९८ | पवित्र होकर प्रतिदिन अट्ठाईस बार [मन्त्रका] जप करके अन्न ग्रहण करना चाहिये और बादमें उतनी |
अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा [४३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यावद्ग्रहणमोक्षं तु तावन्नद्यां समाहितः।<br>जपेत्समुद्रगामिन्यां विमोक्षे ग्रहणस्य तु॥ १९९<br><br>अष्टोत्तरसहस्रेण पिबेद् ब्राह्मीरसं द्विजाः।<br>ऐहिकां लभते मेधां सर्वशास्त्रधरां शुभाम्॥ २०० | ही पलाश-समिधाओंसे हवन करनेसे [व्यक्ति] आरोग्य प्राप्त करता है। चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणके अवसरपर पवित्र होकर विधिपूर्वक उपवास करके जबतक ग्रहणका मोक्ष हो, तबतक किसी समुद्रगामिनी नदीमें एकाग्रचित्त होकर जप करना चाहिये और हे द्विजो! ग्रहणके समाप्त होनेपर एक हजार आठ मन्त्रका जप करके ब्राह्मीरसका पान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला सभी शास्त्रोंको धारण करनेवाली कल्याणमयी लौकिक प्रतिभा प्राप्त करता है और उसकी वाणी अतिमानुषी होकर देवी सरस्वतीकी वाणीके तुल्य हो जाती है॥ १९७-२०० १/२॥ |
| सारस्वती भवेद्देवी तस्य वागतिमानुषी।<br>ग्रहनक्षत्रपीडासु जपेद्भक्त्यायुतं नरः॥ २०१<br><br>हुत्वा चाष्टसहस्रं तु ग्रहपीडां व्यपोहति।<br>दुःस्वप्नदर्शने स्नात्वा जपेद्वै चायुतं नरः॥ २०२ | ग्रह तथा नक्षत्रके कारण कष्ट होनेपर मनुष्य भक्तिपूर्वक दस हजार जप करके तथा आठ हजार आहुति देकर ग्रहपीडासे मुक्त हो जाता है। दुःस्वप्न देखनेपर स्नान करके मनुष्यको दस हजार जप करना चाहिये; इसके बाद घृतकी एक सौ आठ आहुति देनेसे उसे शीघ्र ही शान्ति प्राप्त होगी॥ २०१-२०२ १/२॥ |
| घृतेनाष्टशतं हुत्वा सद्यः शान्तिर्भविष्यति।<br>चन्द्रसूर्यग्रहे लिङ्गं समभ्यर्च्य यथाविधि॥ २०३<br><br>यत्किञ्चित्प्रार्थयेद्देवि जपेदयुतमादरात्।<br>सन्निधावस्य देवस्य शुचिः संयतमानसः॥ २०४ | चन्द्रग्रहण तथा सूर्यग्रहणके समय विधिपूर्वक लिङ्गका पूजन करके शुद्ध तथा एकाग्रचित्त होकर इन महादेवके समीप आदरपूर्वक दस हजार जप करना चाहिये; हे देवि! वह मनुष्य जो कुछ भी माँगता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०३-२०४ १/२॥ |
| सर्वान् कामानवाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः।<br>गजानां तुरगाणां तु गोजातीनां विशेषतः॥ २०५<br><br>व्याध्यागमे शुचिर्भूत्वा जुहुयात्समिधाहुतिम्।<br>मासमभ्यर्च्य विधिनायुतं भक्तिसमन्वितः॥ २०६ | हाथियों, घोड़ों तथा विशेषकर गोजातिके पशुओंमें रोग उत्पन्न होनेपर शुद्ध होकर तथा भक्तियुक्त होकर विधिपूर्वक महीनेभर पूजन करके समिधाकी दस हजार आहुति देनेसे उन पशुओंके रोगकी शान्ति तथा उनकी वृद्धि होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०५-२०६ १/२॥ |
| तेषामृद्धिश्च शान्तिश्च भविष्यति न संशयः।<br>उत्पाते शत्रुबाधायां जुहुयादयुतं शुचिः॥ २०७<br><br>पालाशसमिधैर्देवि तस्य शान्तिर्भविष्यति।<br>आभिचारिकबाधायामेतद्देवि समाचरेत्॥ २०८ | हे देवि! उपद्रव तथा शत्रुबाधा उत्पन्न होनेपर जो [व्यक्ति] पवित्र होकर पलाशकी समिधाओंसे दस हजार होम करता है; उसकी शान्ति होती है। हे देवि! आभिचारिक बाधामें भी ऐसा ही करना चाहिये; ऐसा करनेसे उसकी शक्ति प्रकट होती है और शत्रुको पीड़ा उत्पन्न होती है। |
| प्रत्यग् भवति तच्छक्तिः शत्रोः पीडा भविष्यति।<br>विद्वेषणार्थं जुहुयाद् वैभीतसमिधाष्टकम्॥ २०९<br><br>अक्षरप्रातिलोम्येन आर्द्रेण रुधिरेण वा।<br>विषेण रुधिराभ्यक्तो विद्वेषणकरं नृणाम्॥ २१० | विद्वेषणके लिये बहेड़ेकी समिधाओंसे आठ आहुति डालनी चाहिये; अथवा रुधिरसे स्नान करके विपरीत अक्षरसे मन्त्रका जप करते हुए गीले |