श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८१- विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपशविमोचक लिङ्ग-व्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य
| ३१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| विशोध्य तेषां देवानां पशुत्वं परमेश्वरः।<br>व्रतं पाशुपतं चैव स्वयं देवो महेश्वरः॥ ५५<br>उपदिश्य मुनीनां च सहास्ते चाम्बया भवः।<br>तदाप्रभृति ते देवाः सर्वे पाशुपताः स्मृताः॥ ५६<br>पशूनां च पतिर्यस्मात्तेषां साक्षाद्धि देवताः।<br>तस्मात्पाशुपताः प्रोक्तास्तपेस्तेपुश्च ते पुनः॥ ५७<br>ततो द्वादशवर्षान्ते मुक्तपाशाः सुरोत्तमाः।<br>ययुर्यथागतं सर्वे ब्रह्मणा सह विष्णुना॥ ५८<br>एतद्वः कथितं सर्वं पितामहमुखाच्छ्रुतम्।<br>पुरा सनत्कुमारेण तस्माद् व्यासेन धीमता॥ ५९<br>यः श्रावयेच्छुचिर्विप्राञ्छृणुयाद्वा शुचिर्नरः।<br>स देहभेदमासाद्य पशुपाशैः प्रमुच्यते॥ ६० | मुनियोंके पशुत्वभावका शोधनकर उन्हें पाशुपतव्रतका स्वयं उपदेश करके उमाके साथ बैठ गये। तभीसे वे सब देवता पाशुपत कहे जाने लगे। वे शिव उन पशुओंके साक्षात् पति हैं, अतः देवता पाशुपत कहे गये हैं। इसके बाद उन सबने पुनः तपस्या की। तदनन्तर बारह वर्षके अन्तमें सभी श्रेष्ठ देवता पशुपाशसे मुक्त हो गये और जैसे आये थे, वैसे ही ब्रह्मा तथा विष्णुके साथ वापस लौट गये॥ ५४–५८॥<br><br>[हे मुनियो!] मैंने आप लोगोंसे यह सब कह दिया; पूर्वकालमें इसे सनत्कुमारने ब्रह्माजीके मुखसे तथा बुद्धिमान् व्यासजीने उन [सनत्कुमार]-से सुना था। जो मनुष्य शुद्ध होकर इसे ब्राह्मणोंको सुनाता है अथवा शुद्ध होकर [स्वयं] सुनता है, वह दूसरा शरीर प्राप्त करके पशुपाशोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५९-६०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यं नामाशीतितमोऽध्यायः॥ ८०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्य' नामक अस्सीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८०॥
इक्यासीवाँ अध्याय
विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य
| ऋषय ऊचुः<br>व्रतमेतत्त्वया प्रोक्तं पशुपाशविमोक्षणम्।<br>व्रतं पाशुपतं लैङ्गं पुरा देवैरनुष्ठितम्॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथापूर्वं त्वया श्रुतम्।<br><br>सूत उवाच<br>पुरा सनत्कुमारेण पृष्टः शैलादिरादरात्॥ २<br>नन्दी प्राह वचस्तस्मै प्रवदामि समासतः।<br>देवैर्दैत्यैस्तथा सिद्धैर्गन्धर्वैः सिद्धचारणैः॥ ३<br>मुनिभिश्च महाभागैरनुष्ठितमनुत्तमम्।<br>व्रतं द्वादशलिङ्गाख्यं पशुपाशविमोक्षणम्॥ ४<br>भोगदं योगदं चैव कामदं मुक्तिदं शुभम्।<br>अवियोगकरं पुण्यं भक्तानां भयनाशनम्॥ ५<br>षडङ्गसहितान् वेदान् मथित्वा तेन निर्मितम्।<br>सर्वदानोत्तमं पुण्यमश्वमेधायुताधिकम्॥ ६ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] आपने पशुपाशसे मुक्त करनेवाले इस व्रतको बता दिया; पूर्वकालमें देवताओंने लिङ्गसम्बन्धी पाशुपतव्रतका अनुष्ठान किया था, अतः आपने पहले [इसके विषयमें] जैसा भी श्रवण किया था, उसे हम लोगोंको बताइये॥ १ १/२॥<br><br>सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] पूर्वकालमें सनत्कुमारने [इस सम्बन्धमें] शिलादपुत्र नन्दीसे आदरपूर्वक पूछा था; तब नन्दीने उनसे जो बात कही थी, वही मैं भी आप लोगोंको संक्षेपमें बताता हूँ—देवताओं, दैत्यों, सिद्धों, गन्धर्वों, चारणों तथा महाभाग्यवान् मुनियोंने पशुपाशसे मुक्त करनेवाले इस अत्युत्तम द्वादश लिङ्ग नामक व्रतको किया था। यह भोग (सुख) प्रदान करनेवाला, योग देनेवाला, मनोरथ पूर्ण करनेवाला, मुक्ति देनेवाला, शिवसे सदा अवियोग करानेवाला, पुण्य देनेवाला, भक्तोंके भयका नाश करनेवाला, छः अंगोंसहित वेदोंका मंथन करके उन [शिव]-के द्वारा निर्मित, समस्त |
अध्याय ८१ ] विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान ३९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वमङ्गलदं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।<br>संसारार्णवमग्नानां जन्तूनामपि मोक्षदम्॥ ७<br>सर्वव्याधिहरं चैव सर्वज्वरविनाशनम्।<br>देवैरनुष्ठितं पूर्वं ब्रह्मणा विष्णुना तथा॥ ८ | दानोंमें उत्तम, दस हजार अश्वमेध यज्ञोंसे अधिक पुण्य देनेवाला, सभी मंगल प्रदान करनेवाला, पवित्र, समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाला, संसार-सागरमें डूबे हुए प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला, सभी रोगोंको नष्ट करनेवाला तथा सभी ज्वरोंका विनाश करनेवाला है; इसे पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओंने किया था॥ २–८॥ |
| कृत्वाकनीयसं लिङ्गं स्नाप्य चन्दनवारिणा।<br>चैत्रमासादि विप्रेन्द्राः शिवलिङ्गव्रतं चरेत्॥ ९<br>कृत्वा हैमं शुभं पद्मं कर्णिकाकेसरान्वितम्।<br>नवरत्नैश्च खचितमष्टपत्रं यथाविधि॥ १०<br>कर्णिकायां न्यसेल्लिङ्गं स्फाटिकं पीठसंयुतम्।<br>तत्र भक्त्या यथान्यायमार्चयेद् बिल्वपत्रकैः॥ ११<br>सितैः सहस्त्रकमलै रक्तैर्नीलोत्पलैरपि।<br>श्वेतार्ककर्णिकारैश्च करवीरैर्बकैरपि॥ १२<br>एतैरन्यैर्यथालाभं गायत्र्या तस्य सुव्रताः।<br>सम्पूज्य चैव गन्धाद्यैर्धूपैर्दीपैश्च मङ्गलैः॥ १३<br>नीराजनाद्यैश्चान्यैश्च लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्।<br>अगरुं दक्षिणे दद्यादघोरेण द्विजोत्तमाः॥ १४<br>पश्चिमे सद्यमन्त्रेण दिव्यां चैव मनःशिलाम्।<br>उत्तरे वामदेवेन चन्दनं वापि दापयेत्॥ १५<br>पुरुषेण मुनिश्रेष्ठा हरितालं च पूर्वतः।<br>सितागरूद्भवं विप्रास्तथा कृष्णागरूद्भवम्॥ १६<br>तथा गुग्गुलुधूपं च सौगन्धिकमनुत्तमम्।<br>सितारं नाम धूपं च दद्यादीशाय भक्तितः॥ १७<br>महाचरुर्निवेद्यः स्यादाढकान्नमथापि वा।<br>एतद्वः कथितं पुण्यं शिवलिङ्गमहाव्रतम्॥ १८ | हे विप्रेन्द्रो! एक विशाल लिङ्ग बनाकर इसे चन्दनमिश्रित जलसे स्नान कराकर चैत्र महीनेसे प्रारम्भ करके इस शिवलिङ्गव्रतको करना चाहिये। केसरकी कर्णिकासे युक्त, नौ रत्नोंसे जटित तथा आठ दलोंवाले एक सुन्दर सुवर्णमय कमलकी रचना करके उसकी कर्णिकामें विधिके अनुसार वेदीयुक्त स्फटिकके लिङ्गकी स्थापना करनी चाहिये। हे सुव्रतो! उसमें भक्तिपूर्वक विधिके अनुसार बिल्वपत्रोंसे, हजार श्वेत-लाल-नीले कमलोंसे, श्वेतमदारके कर्णिकारोंसे, कनैल पुष्पोंसे, कुरबकपुष्पोंसे तथा अन्य उपलब्ध पुष्पोंसे रुद्रगायत्री मन्त्रद्वारा उस लिङ्गका अर्चन करना चाहिये। हे उत्तम द्विजो! गन्ध, धूप, दीप, नीराजन आदि मंगल उपचारोंसे लिङ्गमूर्ति महेश्वरका पूजन करके अघोर मन्त्रसे दक्षिणभागमें अगरु देना चाहिये, सद्योजात मन्त्रसे पश्चिम भागमें दिव्य मनःशिला और वामदेव मन्त्रसे उत्तर भागमें चन्दन अर्पित करना चाहिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! तत्पुरुष मन्त्रसे पूर्व भागमें हरिताल प्रदान करना चाहिये। हे विप्रो! श्वेत अगरुसे तथा कृष्ण अगरुसे उत्पन्न धूप, सुगन्धित तथा उत्तम गुग्गुलधूप और सितार नामक धूप भक्तिपूर्वक महेश्वरको अर्पित करना चाहिये। तत्पश्चात् महाचरुका नैवेद्यके रूपमें अर्पित करना चाहिये अथवा आढक-परिमाणमें अन्न निवेदित करना चाहिये। [हे विप्रो!] मैंने आप लोगोंको यह पुण्यदायक शिवलिङ्ग महाव्रत बता दिया॥ ९–१८॥ |
| सर्वमासेषु सामान्यं विशेषोऽपि च कीर्त्यते।<br>वैशाखे वज्रलिङ्गं च ज्येष्ठे मारकतं तथा॥ १९<br>आषाढे मौक्तिकं लिङ्गं श्रावणे नीलनिर्मितम्।<br>मासि भाद्रपदे लिङ्गं पद्मरागमयं शुभम्॥ २०<br>आश्विने चैव विप्रेन्द्राः गोमेदकमयं शुभम्।<br>प्रवालेनैव कार्त्तिक्यां तथा वै मार्गशीर्षके॥ २१ | यह सभी महीनोंमें सामान्य शिवलिङ्गव्रत है; अब मैं विशेषका वर्णन करता हूँ। हे विप्रेन्द्रो! वैशाखमें वज्र (हीरा)-निर्मित लिङ्ग, ज्येष्ठमें मरकतनिर्मित लिङ्ग, आषाढ़में मोतीसे निर्मित लिङ्ग, सावनमें नीलमणिसे निर्मित लिङ्ग, भाद्रपदमासमें पद्मरागसे निर्मित सुन्दर लिङ्ग, आश्विन (क्वार)-में गोमेदसे निर्मित शुभ लिङ्ग, कार्त्तिकमें प्रवाल |
| ३९४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| वैडूर्यनिर्मितं लिङ्गं पुष्परागेण पुष्यके।<br>माघे च सूर्यकान्तेन फाल्गुने स्फाटिकेन च॥ २२<br><br>सर्वमासेषु कमलं हैममेकं विधीयते।<br>अलाभे रजतं वापि केवलं कमलं तु वा॥ २३<br><br>रत्नानामप्यलाभे तु हेम्ना वा रजतेन वा।<br>रजतस्याप्यलाभे तु ताम्रलोहेन कारयेत्॥ २४<br><br>शैलं वा दारुजं वापि मृन्मयं वा सवेदिकम्।<br>सर्वगन्धमयं वापि क्षणिकं परिकल्पयेत्॥ २५ | (मूँगा)-से निर्मित लिङ्ग, मार्गशीर्ष (अगहन)-में वैडूर्यसे निर्मित लिङ्ग, पौषमें पुष्पराग (पुखराज)-से निर्मित लिङ्ग, माघमें सूर्यकान्तमणिसे निर्मित लिङ्ग तथा फाल्गुनमें स्फटिकसे निर्मित लिङ्गका यजन करना चाहिये॥ १९-२२॥<br><br>सभी महीनोंमें सुवर्णमय एक कमल बनानेका विधान है। सुवर्णके अभावमें चाँदीका कमल बनाना चाहिये। रत्नोंके अभावमें सोने अथवा चाँदीसे निर्माण करना चाहिये। चाँदीके भी अभावमें ताँबे अथवा लोहेसे बनाना चाहिये। वेदीसहित पाषाणका अथवा काष्ठका अथवा मिट्टीका सर्वगन्धमय लिङ्ग बनाये अथवा क्षणिक लिङ्गकी रचना करे॥ २३-२५॥ | | हैमन्तिके महादेवं श्रीपत्रेणैव पूजयेत्।<br>सर्वमासेषु कमलं हैममेकमथापि वा॥ २६<br><br>रजतं वापि कमलं हैमकर्णिकमुत्तमम्।<br>रजतस्याप्यभावे तु बिल्वपत्रैः समर्चयेत्॥ २७<br><br>सहस्रकमलालाभे तदर्धेनापि पूजयेत्।<br>तदर्धार्धेन वा रुद्रमष्टोत्तरशतेन वा॥ २८ | हेमन्त ऋतुमें बिल्वपत्रसे महादेवकी पूजा करनी चाहिये। सभी महीनोंमें एक सुवर्णमय कमल बनाना चाहिये अथवा सुवर्णकी कर्णिकायुक्त चाँदीका उत्तम कमल बनाना चाहिये और चाँदीके अभावमें बिल्वपत्रोंसे ही [शिवका] पूजन करना चाहिये। हजार कमलोंके अभावमें उसके आधेसे ही पूजन करना चाहिये अथवा उसके भी आधेसे अथवा कम-से-कम एक सौ आठ कमलोंसे रुद्रका पूजन करना चाहिये॥ २६-२८॥ | | बिल्वपत्रे स्थिता लक्ष्मीर्देवी लक्षणसंयुता।<br>नीलोत्पलेऽम्बिका साक्षादुत्पले षण्मुखः स्वयं॥ २९<br><br>पद्माश्रितो महादेवः सर्वदेवपतिः शिवः।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्रीपत्रं न त्यजेद् बुधः॥ ३०<br><br>नीलोत्पलं चोत्पलं च कमलं च विशेषतः।<br>सर्ववश्यकरं पद्मं शिला सर्वार्थसिद्धिदा॥ ३१<br><br>कृष्णागरुसमुद्भूतं सर्वपापनिकृन्तनम्।<br>गुग्गुलुप्रभृतीनां च दीपानां च निवेदनम्॥ ३२<br><br>सर्वरोगक्षयं चैव चन्दनं सर्वसिद्धिदम्।<br>सौगन्धिकं तथा धूपं सर्वकामार्थसाधकम्॥ ३३<br><br>श्वेतागरूद्भवं चैव तथा कृष्णागरूद्भवम्।<br>सौम्यं सीतारिधूपं च साक्षान्निर्वाणसिद्धिदम्॥ ३४ | बिल्वपत्रमें सर्वलक्षणयुक्त देवी लक्ष्मी, नीलोत्पलमें साक्षात् अम्बिका और उत्पलमें स्वयं षडानन विराजमान रहते हैं; सभी देवताओंके स्वामी महादेव शिव पद्ममें निवास करते हैं, अतः बुद्धिमान् मनुष्यको पूरे प्रयत्नसे बिल्वपत्रका [कभी भी] त्याग नहीं करना चाहिये और नीलोत्पल, उत्पल तथा विशेषकर कमलका त्याग नहीं करना चाहिये। पद्म सभीको वशमें करनेवाला होता है और शिला (मनःशिला) सभी सिद्धियोंको देनेवाली होती है। कृष्ण अगरुसे उत्पन्न धूप सभी पापोंको हरनेवाला, गुग्गुल आदिके दीपोंका निवेदन सभी रोगोंका क्षय करनेवाला, चन्दन सभी सिद्धियोंको देनेवाला और सुगन्धित धूप सभी कामनाओं तथा अर्थोंका साधक है। श्वेत अगरु तथा कृष्ण अगरुसे बनाया हुआ धूप और सौम्य सीतारि [नामक] धूप साक्षात् निर्वाण-सिद्धि प्रदान करनेवाला है॥ २९-३४॥ |
अध्याय ८१] विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान ३९५
| श्वेतार्ककुसुमे साक्षाच्चतुर्वक्त्रः प्रजापतिः।<br>कर्णिकारस्य कुसुमे मेधा साक्षाद् व्यवस्थिता ॥ ३५<br><br>करवीरे गणाध्यक्षो बके नारायणः स्वयम्।<br>सुगन्धिषु च सर्वेषु कुसुमेषु नगात्मजा ॥ ३६<br><br>तस्मादेतैैर्यथालाभं पुष्पधूपादिभिः शुभैः।<br>पूजयेद्देवदेवेशं भक्त्या वित्तानुसारतः ॥ ३७ | श्वेत मदारके पुष्पमें साक्षात् चतुर्मुख ब्रह्मा निवास करते हैं और कर्णिकारके पुष्पमें साक्षात् [देवी] मेधा निवास करती हैं। करवीरके पुष्पमें गणाध्यक्ष, बक पुष्पमें स्वयं नारायण और सभी सुगन्धित पुष्पोंमें [भगवती] पार्वती विराजमान हैं। अतः यथोपलब्ध इन पुष्पोंसे तथा शुभ पुष्प, धूप, दीप आदिसे भक्तिपूर्वक अपने वित्त-सामर्थ्यके अनुसार देवदेवेश [शिव]-की पूजा करनी चाहिये॥ ३५-३७॥ |
| निवेदयत्ततो भक्त्या पायसं च महाचरुम्।<br>सघृतं सोपदंशं च सर्वद्रव्यसमन्वितम् ॥ ३८<br><br>शुद्धान्नं वापि मुद्गान्नमाढकं सार्धकं तु वा।<br>चामरं तालवृन्तं च तस्मै भक्त्या निवेदयेत् ॥ ३९<br><br>उपहाराणि पुण्यानि न्यायेनैवार्जितान्यपि।<br>नानाविधानि चार्हाणि प्रोक्षितान्यम्भसा पुनः ॥ ४० | तदनन्तर भक्तिपूर्वक पायस तथा महाचरु निवेदित करे और घृतयुक्त, व्यंजनोंसहित तथा अन्य द्रव्ययुक्त शुद्ध अन्न अथवा मूँगका अन्न एक आढक (चार प्रस्थ) अथवा उसका आधा समर्पित करे। पुनः चामर और तालवृन्त (ताड़का पंखा) उन्हें भक्तिपूर्वक निवेदित करे। इसी प्रकार न्यायपूर्वक अर्जित किये गये अनेक प्रकारके पवित्र पूजायोग्य उपहारोंको जलसे प्रोक्षित करके भक्तियुक्त चित्तसे [भगवान्] रुद्रको समर्पित करे॥ ३८-४० १/२॥ |
| निवेदयेच्च रुद्राय भक्तियुक्तेन चेतसा।<br>क्षीराब्धौ सर्वदेवानां स्थित्यर्थममृतं ध्रुवम् ॥ ४१<br><br>विष्णुना जिष्णुना साक्षादन्ने सर्वं प्रतिष्ठितम्।<br>भूतानामन्नदानेन प्रीतिर्भवति शङ्करे ॥ ४२<br><br>तस्मात्सम्पूजयेद्देवमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः।<br>उपहारे तथा तुष्टिर्व्यजने पवनः स्वयम् ॥ ४३<br><br>सर्वात्मको महादेवो गन्धतोये ह्यपांपतिः।<br>पीठे वै प्रकृतिः साक्षान्महदाद्यैर्व्यवस्थिता ॥ ४४<br><br>तस्माद्देवं यजेद्भक्त्या प्रतिमासं यथाविधि।<br>पौर्णमास्यां व्रतं कार्यं सर्वकामार्थसिद्धये ॥ ४५<br><br>सत्यं शौचं दया शान्तिः सन्तोषो दानमेव च।<br>पौर्णमास्याममावास्यामुपवासं च कारयेत् ॥ ४६ | जीतनेकी इच्छावाले विष्णुने सभी देवताओंकी स्थितिके लिये क्षीरसागरसे सारा अमृत खींचकर साक्षात् अन्नके भीतर स्थापित कर दिया। प्राणियोंको अन्नदान करनेसे शिवजीके प्रति अनुराग हो जाता है, अतः अन्नसे शिवकी पूजा करनी चाहिये। अन्नमें प्राण प्रतिष्ठित रहते हैं। उपहारमें तुष्टि विद्यमान रहती है। पंखेमें स्वयं वायुदेव वास करते हैं। महादेव सभी वस्तुओंमें विराजमान रहते हैं। जलदेवता (वरुण) सुगन्धित जलमें विद्यमान हैं। पीठ (वेदी)-में महत् आदिके साथ साक्षात् [देवी] प्रकृति विराजमान हैं। अतः प्रत्येक महीने विधिके अनुसार भक्तिपूर्वक शिवकी पूजा करनी चाहिये। समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये पूर्णिमाको व्रत [अवश्य] करना चाहिये। [व्रतमें] सत्य, शुद्धता, दया, शान्ति, सन्तोष तथा दानशीलताका पालन करना चाहिये। पूर्णिमा तथा अमावस्याके दिन उपवास करना चाहिये॥ ४१-४६॥ |
| संवत्सरान्ते गोदानं वृषोत्सर्गं विशेषतः।<br>भोजयेद् ब्राह्मणान् भक्त्या श्रोत्रियान् वेदपारगान् ॥ ४७<br><br>तल्लिङ्गं पूजितं तेन सर्वद्रव्यसमन्वितम्।<br>स्थापयेद्वा शिवक्षेत्रे दापयेद् ब्राह्मणाय वा ॥ ४८ | वर्षके अन्तमें गोदान तथा विशेषरूपसे वृषोत्सर्ग करना चाहिये। वेदके पारगामी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक भोजन कराना चाहिये। पूजा किये गये उस शिवलिङ्गको |
| ३९६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| | सभी सामग्रियोंसहित शिवक्षेत्रमें स्थापित कर देना चाहिये अथवा ब्राह्मणको समर्पित कर देना चाहिये ॥ ४७-४८ ॥ | | य एवं सर्वमासेषु शिवलिङ्गमहाव्रतम्।<br>कुर्याद्भक्त्या मुनिश्रेष्ठाः स एव तपतां वरः ॥ ४९<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानै रत्नभूषितैः।<br>गत्वा शिवपुरं दिव्यं नेहायाति कदाचन ॥ ५०<br>अथवा ह्येकमासं वा चरेदेवं व्रतोत्तमम्।<br>शिवलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ५१<br>अथवा सक्तचित्तश्चेद्यान्यान् सञ्चिन्तयेद्वरान्।<br>वर्षमेकं चरेदेवं तांस्तान् प्राप्य शिवं व्रजेत् ॥ ५२<br>देवत्वं वा पितृत्वं वा देवराजत्वमेव च।<br>गाणपत्यपदं वापि सक्तोऽपि लभते नरः ॥ ५३ | हे श्रेष्ठ मुनियो! जो इस प्रकार सभी मासोंमें शिवलिङ्ग महाव्रतको करता है, वही तप करनेवालोंमें श्रेष्ठ है और वह करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान तथा रत्नोंसे सुशोभित विमानोंसे शिवलोक पहुँचकर [वहाँसे] कभी भी इस लोकमें वापस नहीं आता है; अथवा जो एक महीने भी इसी प्रकार [इस] उत्तम व्रतको करता है, वह शिवलोक प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अथवा [सांसारिक भोगोंमें] आसक्तचित्तवाला व्यक्ति एक वर्षतक यदि इस प्रकार करे, तो वह जिन-जिन कामनाओंको [मनमें] संचित किये रहता है, उन-उनको प्राप्त करके शिवलोक जाता है। आसक्त मनुष्य भी [इसे करके] देवत्व, पितृत्व, इन्द्रत्व तथा गणाधिपतित्व प्राप्त कर लेता है ॥ ४९-५३ ॥ | | विद्यार्थी लभते विद्यां भोगार्थी भोगमाप्नुयात्।<br>द्रव्यार्थी च निधिं पश्येदायुःकामश्चिरायुषम् ॥ ५४<br>यान्यांश्चिन्तयते कामांस्तांस्तान्प्राप्येह मोदते।<br>एकमासव्रतादेव सोऽन्ते रुद्रत्वमाप्नुयात् ॥ ५५ | विद्या चाहनेवाला विद्या प्राप्त करता है, भोग चाहनेवाला भोग प्राप्त करता है, धन चाहनेवाला धन प्राप्त करता है और आयुकी कामना करनेवाला दीर्घ आयु प्राप्त करता है। जिन-जिन कामनाओंका मनुष्य चिन्तन करता है, उन-उनको एक मासके ही व्रतसे प्राप्त करके इस लोकमें आनन्दित रहता है और अन्तमें वह रुद्रत्व प्राप्त करता है ॥ ५४-५५ ॥ | | इदं पवित्रं परमं रहस्यं<br>व्रतोत्तमं विश्वसृजापि सृष्टम्।<br>हिताय देवासुरसिद्धमर्त्य-<br>विद्याधराणां परमं शिवेन ॥ ५६ | विश्वका सृजन करनेवाले शिवने देवताओं, असुरों, सिद्धों, मनुष्यों तथा विद्याधरोंके हितके लिये इस परम पवित्र, परम रहस्यमय एवं उत्तम व्रतकी सृष्टि की है ॥ ५६ ॥ | | सम्पूज्य पूज्यं विधिनेवमीशं<br>प्रणम्य मूर्ध्ना सह भृत्यपुत्रैः।<br>व्यपोहनं नाम जपेत्स्तवं च<br>प्रदक्षिणं कृत्य शिवं प्रयत्नात् ॥ ५७ | इस प्रकार विधिपूर्वक ईश्वरकी पूजा करके सेवकों तथा पुत्रोंके साथ सिर झुकाकर प्रणाम करके प्रयत्नपूर्वक शिवकी प्रदक्षिणा करके व्यपोहन नामक स्तवका जप करना चाहिये ॥ ५७ ॥ | | पुराकृतं विश्वसृजा स्तवं च<br>हिताय देवेन जगत्त्रयस्य।<br>पितामहेनैव सुरैश्च सार्धं<br>महानुभावेन महार्घ्यमेतत् ॥ ५८ | पूर्व कालमें विश्वकी रचना करनेवाले महानुभाव देव पितामह (ब्रह्मा)-ने देवताओंके साथ तीनों लोकोंके हितके लिये इस महामूल्यवान् स्तवको बनाया था ॥ ५८ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पशूपाशविमोचनलिङ्गपूजादिकथनं नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पशूपाशविमोचनलिङ्गपूजादिकथन' नामक इक्यासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८१ ॥
८२- सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव और उसके पाठका फल
अध्याय ८२ ] सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव ३१७
बयासीवाँ अध्याय
सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव और उसके पाठका फल
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>व्यपोहनस्तवं वक्ष्ये सर्वसिद्धिप्रदं शुभम्।<br>नन्दिनश्च मुखाच्छ्रुत्वा कुमारेण महात्मना ॥ १<br>व्यासाय कथितं तस्माद् बहुमानेन वै मया।<br>नमः शिवाय शुद्धाय निर्मलाय यशस्विने ॥ २<br>दुष्टान्तकाय सर्वाय भवाय परमात्मने।<br>पञ्चवक्त्रो दशभुजो ह्यक्षपञ्चदशैर्युतः ॥ ३<br>शुद्धस्फटिकसङ्काशः सर्वाभरणभूषितः।<br>सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सर्वोपरि सुसंस्थितः ॥ ४<br>पद्मासनस्थः सोमेशः पापमाशु व्यपोहतु। | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] अब मैं सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले मंगलमय व्यपोहनस्तवको बताऊँगा; इसे नन्दीके मुखसे सुनकर महात्मा सनत्कुमारने व्यासजीको बताया और उनसे परम आदरपूर्वक मैंने सुना। कल्याणकारी, शुद्ध, निर्मल, यशस्वी, दुष्टोंका नाश करनेवाले, सर्व, भव तथा परमात्माको नमस्कार है। पाँच मुखोंवाले, दस भुजाओंवाले, पन्द्रह नेत्रोंसे युक्त, शुद्ध स्फटिकके सदृश कान्तिमान्, सभी आभूषणोंसे विभूषित, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, शान्त, सबसे ऊपर प्रतिष्ठित तथा पद्मासनपर स्थित उमासहित भगवान् शिव पापको शीघ्र दूर करें॥ १-४ १/२ ॥ |
| ईशानः पुरुषश्चैव अघोरः सद्य एव च ॥ ५<br>वामदेवश्च भगवान् पापमाशु व्यपोहतु।<br>अनन्तः सर्वविद्येशः सर्वज्ञः सर्वदः प्रभुः ॥ ६<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु।<br>सूक्ष्मः सुरासुरेशानो विश्वेशो गणपूजितः ॥ ७<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु।<br>शिवोत्तमो महापूज्यः शिवध्यानपरायणः ॥ ८<br>सर्वगः सर्वदः शान्तः स मे पापं व्यपोहतु।<br>एकाक्षो भगवानीशः शिवार्चनपरायणः ॥ ९<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु। | ईशान, तत्पुरुष, अघोर, सद्योजात तथा भगवान् वामदेव पापको शीघ्र दूर करें। वे अनन्त, सर्वविद्येश, सर्वज्ञ, सर्वद, प्रभु तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पापको दूर करें। वे सूक्ष्म, सुरासुरेशान, विश्वेश, गणपूजित तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पापको दूर करें। वे शिवोत्तम, महापूज्य, शिवध्यानपरायण, सर्वग, सर्वद तथा शान्त मेरे पापको दूर करें। वे एकाक्ष, भगवान्, ईश, शिवार्चन-परायण तथा शिवध्यानैकसम्पन्न सदा मेरे पापको दूर करें॥ ५-९ १/२ ॥ |
| त्रिमूर्तिर्भगवानीशः शिवभक्तिप्रबोधकः ॥ १०<br>शिवध्यानैकसम्पन्नः स मे पापं व्यपोहतु।<br>श्रीकण्ठः श्रीपतिः श्रीमान् शिवध्यानरतः सदा ॥ ११<br>शिवार्चनरतः साक्षात् स मे पापं व्यपोहतु।<br>शिखण्डी भगवान् शान्तः शवभस्मानुलेपनः ॥ १२<br>शिवार्चनरतः श्रीमान् स मे पापं व्यपोहतु। | वे त्रिमूर्ति, भगवान्, ईश, शिवभक्तिप्रबोधक तथा शिवध्यानैकसम्पन्न मेरे पापको दूर करें। वे श्रीकण्ठ, श्रीपति, श्रीमान्, सदा शिवध्यानरत तथा शिवार्चनरत मेरे पापको दूर करें। वे शिखण्डी, भगवान्, शान्त, शवभस्मानुलेपन, शिवार्चनरत तथा श्रीमान् मेरे पापको दूर करें॥ १०-१२ १/२ ॥ |
| त्रैलोक्यनमिता देवी सोल्काकारा पुरातनी ॥ १३<br>दाक्षायणी महादेवी गौरी हैमवती शुभा।<br>एकपर्णाग्रजा सौम्या तथा वै चैकपाटला ॥ १४<br>अपर्णा वरदा देवी वरदानैकतत्परा।<br>उमासुरहरा साक्षात्कौशिकी वा कपर्दिनी ॥ १५ | जो तीनों लोकोंद्वारा नमस्कृत, उल्काके आकारवाली, सनातनी देवी, दक्षकन्या, महादेवी, गौरी, हिमालयपुत्री, कल्याणमयी, एकपर्णा, अग्रजा, सौम्या, एकपाटला, अपर्णा, वरदायिनी, वरप्रदान करनेमें सदा तत्पर, उमा, असुरोंका संहार करनेवाली साक्षात् कौशिकी, कपर्दिनी, |
३१८ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग खट्वाङ्गधारिणी दिव्या कराग्रतरुपल्लवा। खट्वांग धारण करनेवाली, दिव्य, हाथके अग्रभागमें नैगमेयादिभिर्दिव्यैश्चतुर्भिः पुत्रकैर्वृता ॥ १६ वृक्षका पल्लव धारण करनेवाली, नैगमेय* आदि चारों मेनाया नन्दिनी देवी वारिजा वारिजेक्षणा। दिव्य पुत्रोंसे घिरी हुई, मेनाकी पुत्री, जलसे उत्पन्न, अम्बा या वीतशोकस्य नन्दिनश्च महात्मनः ॥ १७ कमलके समान नेत्रोंवाली, शोकरहित महात्मा नन्दीकी अम्बा (माता), शुभावतीकी सखी, शान्त स्वभाववाली, शुभावत्याः सखी शान्ता पञ्चचूडा वरप्रदा। पंचचूड़ा, वर प्रदान करनेवाली, सभी प्राणियोंकी सृष्ट्यर्थं सर्वभूतानां प्रकृतित्वं गताव्यया ॥ १८ सृष्टिके लिये प्रकृतिके स्वरूपको प्राप्त, अव्यय त्रयोविंशतिभिस्तत्त्वैर्महदाद्यैर्विजृम्भिता । (शाश्वत), महत् आदि तेईस तत्त्वोंसे सम्पन्न, लक्ष्मी लक्ष्मादिशक्तिभिर्नित्यं नमिता नन्दनन्दिनी ॥ १९ आदि शक्तियोंसे सदा नमस्कृत, नन्दनन्दिनी, महादेवी मनोन्मनी महादेवी मायावी मण्डनप्रिया। मनोन्मनी, मायामयी, अलंकरणसे प्रीति करनेवाली, मायया या जगत्सर्वं ब्रह्माद्यं सचराचरम् ॥ २० [अपनी] मायासे ब्रह्मा आदि तथा चराचरसहित सम्पूर्ण क्षोभिणी मोहिनी नित्यं योगिनां हृदि संस्थिता। जगत्को क्षुब्ध एवं मोहित करनेवाली, योगियोंके एकानेकस्थिता लोके इन्दीवरनिभेक्षणा ॥ २१ हृदयमें सर्वदा विराजमान, संसारमें एक तथा अनेक रूपोंमें स्थित, नीलकमलके समान नेत्रोंवाली, गणेश्वरों- भक्त्या परमया नित्यं सर्वदेवैरभिष्टुता। ब्रह्मा-इन्द्र-यम-कुबेर आदि सभी देवताओंके द्वारा परम गणेश्राम्भोजगर्भेन्द्रयमवित्तेशपूर्वकैः ॥ २२ भक्तिसे नित्य स्तुत होनेवाली, [उनके द्वारा] स्तुत होकर संस्तुता जननी तेषां सर्वोपद्रवनाशिनी। उनकी माताके रूपमें सभी विपत्तियोंका नाश करनेवाली, भक्तानामार्तिहा भव्या भवभावविनाशिनी ॥ २३ भक्तोंके कष्टोंका हरण करनेवाली, भव्य, सांसारिक भावोंको नष्ट करनेवाली, दिव्य और बिना प्रयासके भुक्तिमुक्तिप्रदा दिव्या भक्तानामप्रयत्नतः। सा मे साक्षान्महादेवी पापमाशु व्यपोहतु ॥ २४ भक्तोंको भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं—वे साक्षात् महादेवी मेरे पापको शीघ्र दूर करें ॥ १३–२४॥ चण्डः सर्वगणेशानो मुखाच्छम्भोर्विनिर्गतः। जो सभी गणोंके ईश, शम्भुके मुखसे निकले हुए, शिवार्चनरतः श्रीमान् स मे पापं व्यपोहतु ॥ २५ शिवार्चनमें लीन तथा श्रीयुक्त चण्ड हैं; वे मेरे पापको शालङ्कायनपुत्रस्तु हलमार्गोत्थितः प्रभुः। दूर करें। शालंकायनके पुत्र, हलमार्गसे उत्पन्न, ऐश्वर्यशाली, जामाता मरुतां देवः सर्वभूतमहेश्वरः ॥ २६ मरुतोंके जामाता, देवता, सभी भूतोंके महेश्वर, सर्वव्यापी, सर्वगः सर्वदृक् शर्वः सर्वेशसदृशः प्रभुः। सर्वद्रष्टा, शर्व, सर्वेश्वरके समान प्रभुत्वसम्पन्न, नारायण- सनारायणकैर्देवैः सेन्द्रचन्द्रदिवाकरैः ॥ २७ इन्द्र-चन्द्र-सूर्य आदि देवताओं-सिद्धों-यक्षों-गन्धर्वों- सिद्धैश्च यक्षगन्धर्वैर्भूतैर्भूतविधायकैः। भूतों, भूतोंका सृजन करनेवालों-उरगों-ऋषियों-महात्मा उरगैर्ऋषिभिश्चैव ब्रह्मणा च महात्मना ॥ २८ ब्रह्माके द्वारा स्तुत, तीनों लोकोंके स्वामी, मुनियोंके स्तुतस्त्रैलोक्यनाथस्तु मुनिरन्तःपुरं स्थितः। हृदयमें विराजमान और सबके द्वारा सर्वदा पूजित नन्दी सर्वदा पूजितः सर्वैर्नन्दी पापं व्यपोहतु ॥ २९ [मेरे] पापको दूर करें ॥ २५–२९ ॥
- सुश्रुतसंहिताके उत्तरतन्त्र अध्याय २७-३७ तकमें छोटे शिशुओंमें जो रोग होते हैं, उन्हें ग्रहोंसे उत्पन्न बताया गया है। स्कन्दग्रह, स्कन्दापस्मार, शकुनी, रेवती, पूतना, अन्धपूतना, शीतपूतना, मुखमण्डिका और नैगमेय (पितृग्रह)—ये नौ ग्रह बताये गये हैं। इन नौ ग्रहोंसे पीड़ित बालकके लक्षण अलग-अलग होते हैं। लक्षणोंके आधारपर यह ज्ञान होता है कि बालक अमुक ग्रहसे पीड़ित है। नैगम ग्रहसे पीड़ित बालकके मुखसे झाग गिरता है, वह हर समय बेचैन रहता है तथा ऊपरकी ओर देखता हुआ बराबर रोता है,
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४०० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग आदित्यश्च तथा सूर्य्यश्वांशुमांश्च दिवाकरः। एते वै द्वादशादित्या व्यपोहन्तु मलं मम ॥४३ गगनं स्पर्शनं तेजो रसश्च पृथिवी तथा। चन्द्रः सूर्य्यस्तथात्मा च तनवः शिवभाषिताः ॥४४ पापं व्यपोहन्तु मम भयं निर्नाशयन्तु मे। वासवः पावकश्चैव यमो निर्ऋतिरेव च ॥४५ वरुणो वायुसोमौ च ईशानो भगवान् हरिः। पितामहश्च भगवान् शिवध्यानपरायणः ॥ ४६ एते पापं व्यपोहन्तु मनसा कर्मणा कृतम्। नभस्वान् स्पर्शनो वायुरनिलो मारुतस्तथा ॥ ४७ प्राणः प्राणेशजीवेशौ मारुतः शिवभाषिताः। शिवार्चनरताः सर्वे व्यपोहन्तु मलं मम ॥ ४८ खेचरी वसुचारी च ब्रह्मेशो ब्रह्म ब्रह्मधीः । सुषेणः शाश्वतः पुष्टः सुपुष्टश्च महाबलः ॥ ४९ एते वै चारणाः शम्भोः पूजयातीव भाविताः । व्यपोहन्तु मलं सर्वं पापं चैव मया कृतम् ॥ ५० मन्त्रज्ञो मन्त्रवित्प्राज्ञो मन्त्रराट् सिद्धपूजितः । सिद्धवत्परमः सिद्धः सर्वसिद्धिप्रदायिनः ॥५१ व्यपोहन्तु मलं सर्वे सिद्धाः शिवपदार्चकाः। यक्षो यक्षेश धनदो जृम्भको मणिभद्रकः ॥ ५२ पूर्णभद्रेश्वरो माली शितिकुण्डलिरेव च। नरेन्द्रश्चैव यक्षेशा व्यपोहन्तु मलं मम ॥५३ अनन्तः कुलिकश्चैव वासुकिस्तक्षकस्तथा। कर्कोटकों महापद्मः शङ्खपालो महाबलः ॥ ५४ शिवप्रणामसम्पन्नाः शिवदेहप्रभूषणाः । मम पापं व्यपोहन्तु विषं स्थावरजङ्गमम् ॥ ५५ वीणाज्ञः किन्नरश्चैव सुरसेनः प्रमर्दनः। अतीशयः सप्रयोगी गीतज्ञश्चैव किन्नराः ॥ ५६ शिवप्रणामसम्पन्नाः व्यपोहन्तु मलं मम। विद्याधरश्च विबुधो विद्याराशीर्विदां वरः ॥ ५७ विबुद्धो विबुधः श्रीमान् कृतज्ञश्च महायशाः। एते विद्याधराः सर्वे शिवध्यानपरायणाः ॥ ५८ व्यपोहन्तु मलं घोरं महादेवप्रसादतः । वामदेवी महाजम्भः कालनेमिर्महाबलः ॥ ५९ सुग्रीवो मर्दकश्चैव पिङ्गलो देवमर्दनः । प्रह्लादश्चाप्यनुह्लादः संह्लादः किल बाष्कलो ॥ ६० जम्भः कुम्भश्च मायावी कार्तवीर्यः कृतञ्जयः । एतेऽसुरा महात्मानो महादेवपरायणाः ॥ ६१ व्यपोहन्तु भयं घोरमासुरं भावमेव च। गरुत्मान् खगतिश्चैव पक्षिराट् नागमर्दनः ॥ ६२ लोकप्रकाशक, लोकसाक्षी, त्रिविक्रम, आदित्य, सूर्य, अंशुमान् तथा दिवाकर - ये बारह आदित्य मेरे पापको दूर करें ॥ ४२-४३ ॥ आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य तथा आत्मा - ये शिवजीकी मूर्तियाँ कही गयी हैं; ये मेरे पापको दूर करें और मेरे भयका नाश करें। इन्द्र, पावक, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, सोम, ईशान, भगवान् हरि तथा शिवध्यानमें लीन प्रभु ब्रह्मा - ये मेरेद्वारा मन तथा कर्मसे किये गये पापको दूर करें ॥ ४४-४६ १/२ ॥ नभस्वान्, स्पर्शन, वायु, अनिल, मारुत, प्राण, प्राणेश और जीवेश - ये सब शिवभाषित तथा शिवार्चनपरायण मारुत मेरे पापको दूर करें। खेचरी, वसुचारी, ब्रह्मेश, ब्रह्म, ब्रह्मधी, सुषेण, शाश्वत, पुष्ट, सुपुष्ट, महाबल - ये चारण जो शम्भुकी पूजासे अत्यन्त पवित्र हैं, मेरेद्वारा किये गये समस्त पाप तथा दोषको दूर करें ॥ ४७-५०॥ मन्त्रज्ञ, मन्त्रविद्, प्राज्ञ, मन्त्रराट्, सिद्धपूजित, सिद्धवत् और परमसिद्ध - ये सभी [सप्त] सिद्धगण जो सभी सिद्धियोंके प्रदाता तथा शिवके चरणोंके उपासक हैं, मेरे पापको दूर करें। यक्ष, यक्षेश, धनद, जृम्भक, मणिभद्रक, पूर्णभद्रेश्वर, माली, शितिकुण्डलि और नरेन्द्र - ये यक्षोंके स्वामी मेरे पापको दूर करें ॥ ५१-५३ ॥ शिवके प्रणाममें रत तथा शिवके शरीरके आभूषणस्वरूप अनन्त, कुलिक, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, महापद्म, शंखपाल और महाबल मेरे पापको तथा स्थावर-जंगम विषको दूर करें ॥ ५४-५५ ॥ शिवको प्रणाम करनेमें तल्लीन वीणाज्ञ, किन्नर, सुरसेन, प्रमर्दन, अतीशय, सप्रयोगी और गीतज्ञ - ये किन्नरगण मेरे पापको दूर करें। विद्याधर विबुध, विद्याराशि, विदांवर, विबुद्ध, विबुध, श्रीमान्, कृतज्ञ और महायश - ये सभी शिवध्यानपरायण विद्याधर महादेवकी कृपासे मेरे घोर पापको दूर करें ॥ ५६-५८ १/२ ॥ वामदेवी, महाजम्भ, कालनेमि, महाबल, सुग्रीव, मर्दक, पिंगल, देवमर्दन, प्रह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद, बाष्कलद्वय, जम्भ, कुम्भ, मायावी, कार्तवीर्य, कृतंजय- ये महादेवपरायण महात्मा असुर मेरे घोर भय तथा
अध्याय ८२] सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव ४०१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नागशत्रुर्हिरण्याङ्गो वैनतेयः प्रभञ्जनः।<br>नागाशीर्विषनाशश्च विष्णुवाहन एव च॥ ६३<br>एते हिरण्यवर्णाभा गरुडा विष्णुवाहनाः।<br>नानाभरणसम्पन्ना व्यपोहन्तु मलं मम॥ ६४ | आसुरी भावको दूर करें। गरुत्मान्, खगति, पक्षिराट्, नागमर्दन, नागशत्रु, हिरण्यांग, वैनतेय, प्रभंजन, नागाशी, विषनाश, विष्णुवाहन—ये सुवर्णके रंगवाले तथा अनेकविध आभूषणोंसे युक्त विष्णुवाहन गरुड़ मेरे पापको दूर करें॥ ६३—६४॥ |
| अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च अङ्गिरा भृगुरेव च।<br>काश्यपो नारदश्चैव दधीचश्च्यवनस्तथा॥ ६५<br>उपमन्युस्तथान्ये च ऋषयः शिवभाविताः।<br>शिवार्चनरताः सर्वे व्यपोहन्तु मलं मम॥ ६६ | अगस्त्य, वसिष्ठ, अंगिरा, भृगु, काश्यप, नारद, दधीच, च्यवन, उपमन्यु—ये तथा अन्य शिवभक्त और शिवार्चनपरायण समस्त ऋषि मेरे पापको दूर करें॥ ६५-६६॥ |
| पितरः पितामहाश्च तथैव प्रपितामहाः।<br>अग्निष्वात्ता बर्हिषदस्तथा मातामहादयः॥ ६७<br>व्यपोहन्तु भयं पापं शिवध्यानपरायणाः।<br>लक्ष्मीश्च धरणी चैव गायत्री च सरस्वती॥ ६८<br>दुर्गा उषा शची ज्येष्ठा मातरः सुरपूजिताः।<br>देवानां मातरश्चैव गणानां मातरस्तथा॥ ६९<br>भूतानां मातरः सर्वा यत्र या गणमातरः।<br>प्रसादाद्देवदेवस्य व्यपोहन्तु मलं मम॥ ७० | शिवके ध्यानमें तल्लीन रहनेवाले पिता, पितामह, प्रपितामह, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् तथा मातामह आदि [मेरे] भय तथा पापको दूर करें। लक्ष्मी, धरणी, गायत्री, सरस्वती, दुर्गा, उषा, शची तथा ज्येष्ठा—ये देवपूजित माताएँ, देवताओंकी माताएँ, गणोंकी माताएँ, भूतोंकी माताएँ तथा अन्य जो भी गणमाताएँ जहाँ-कहीं भी हों—वे सब देवदेव [शिव]-के अनुग्रहसे मेरे पापको दूर करें॥ ६७-७०॥ |
| उर्वशी मेनका चैव रम्भारतिस्तिलोत्तमा।<br>सुमुखी दुर्मुखी चैव कामुकी कामवर्धनी॥ ७१<br>तथान्याः सर्वलोकेषु दिव्याश्चाप्सरसस्तथा।<br>शिवाय ताण्डवं नित्यं कुर्वन्त्योऽतीव भाविताः॥ ७२<br>देव्यः शिवार्चनरता व्यपोहन्तु मलं मम। | अत्यन्त भक्तियुक्त होकर शिवके लिये नित्य ताण्डव [नृत्य] करनेवाली तथा शिवार्चनमें रत रहनेवाली उर्वशी, मेनका, रम्भा, रति, तिलोत्तमा, सुमुखी, दुर्मुखी, कामुकी, कामवर्धनी—ये तथा सभी लोकोंकी अन्य दिव्य अप्सराएँ और देवियाँ मेरे पापको दूर करें॥ ७१-७२ १/२ ॥ |
| अर्कः सोमोऽङ्गारकश्च बुधश्चैव बृहस्पतिः॥ ७३<br>शुक्रः शनैश्चरश्चैव राहुः केतुस्तथैव च।<br>व्यपोहन्तु भयं घोरं ग्रहपीडां शिवार्चकाः॥ ७४<br>मेषो वृषोऽथ मिथुनस्तथा कर्कटकः शुभः।<br>सिंहश्च कन्या विपुला तुला वै वृश्चिकस्तथा॥ ७५<br>धनुश्च मकरश्चैव कुम्भो मीनस्तथैव च।<br>राशयो द्वादश ह्येते शिवपूजापरायणाः॥ ७६<br>व्यपोहन्तु भयं पापं प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>अश्विनी भरणी चैव कृत्तिका रोहिणी तथा॥ ७७<br>श्रीमन्मृगशिरश्चार्द्रा पुनर्वसुपुष्यसार्पकाः।<br>मघा वै पूर्वफाल्गुन्य उत्तराफाल्गुनी तथा॥ ७८<br>हस्तश्चित्रा तथा स्वाती विशाखा चानुराधिका।<br>ज्येष्ठा मूलं महाभागा पूर्वाषाढा तथैव च॥ ७९<br>उत्तराषाढिका चैव श्रवणं च श्रविष्ठिका।<br>शतभिषक्पूर्वभद्रा च तथा प्रोष्ठपदा तथा॥ ८०<br>पौष्णं च देव्यः सततं व्यपोहन्तु मलं मम। | शिवका अर्चन करनेवाले सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु [मेरे] घोर भय तथा ग्रहकष्टका निवारण करें। मेष, वृष, मिथुन, शुभ कर्क, सिंह, कन्या, विशद तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ तथा मीन—ये बारह शिवपूजापरायण राशियाँ महेश्वरकी कृपासे [मेरे] भय तथा पापको दूर करें। अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, श्रीयुक्त मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, महाभाग पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा शतभिषा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद तथा रेवती—ये देवियाँ निरन्तर मेरे पापको दूर करें॥ ७३—८० १/२॥ |
| ज्वरः कुम्भोदरश्चैव शङ्कुकर्णो महाबलः॥ ८१ | ज्वर, कुम्भोदर, शंकुकर्ण, महाबल, महाकर्ण, |
४०२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग महाकर्णः प्रभातश्च महाभूतप्रमर्दनः। प्रभात, महाभूतप्रमर्दन, श्येनजित्, शिवदूत-ये प्रीति- श्येनजिच्छिवदूतश्च प्रमथाः प्रीतिवर्धनाः ॥ ८२ वर्धक प्रमथगण और करोड़ों-करोड़ों भूतोंसहित माताएँ महादेवकी कृपासे [मेरे] भय तथा पापको सर्वदा दूर कोटिकोटिशतैश्चैव भूतानां मातरः सदा। करें ॥ ८१-८३ ॥ व्यपोहन्तु भयं पापं महादेवप्रसादतः ॥ ८३ जो एकमात्र शिवके ध्यानमें तल्लीन, हिमालयसे शिवध्यानैकसम्पन्नो हिमराडम्बुसन्निभः। प्रादुर्भूत गंगाके जलके समान पापनाशक, कुन्द [पुष्प] कुन्देन्दुसदृशाकारः कुम्भकुन्देन्दुभूषणः ॥ ८४ तथा चन्द्रमाके समान आकारवाले, कुम्भ-कुन्दपुष्पों तथा इन्दुको भूषणके रूपमें धारण करनेवाले, बड़वानलके वडवानलशत्रुर्यो वडवामुखभेदनः। शत्रु, बड़वाके मुखका भेदन करनेवाले हैं, चार पैरोंवाले, चतुष्पादसमायुक्तः क्षीरोद इव पाण्डुरः ॥ ८५ क्षीरसागरके समान पाण्डुर वर्णवाले, रुद्रों तथा रुद्रलोके स्थितो नित्यं रुद्रैः सार्धं गणेश्वरैः। गणेश्वरोंके साथ सदा रुद्रलोकमें रहनेवाले, विश्वको वृषेन्द्रो विश्वधृग्देवो विश्वस्य जगतः पिता ॥ ८६ धारण करनेवाले, सम्पूर्ण जगत्के पिता, नन्दा आदि माताओंसे सदा घिरे हुए, यज्ञका नाश करनेवाले तथा वृतो नन्दादिभिर्नित्यं मातृभिर्मखमर्दनः। शिवार्चनपरायण हैं-वे वृषेन्द्र मेरे पापको सदा दूर शिवार्चनरतो नित्यं स मे पापं व्यपोहतु ॥ ८७ करें ॥ ८४-८७ ॥ गङ्गा माता जगन्माता रुद्रलोके व्यवस्थिता। रुद्रलोकमें स्थित जगज्जननी गंगामाता मेरे पापको शिवभक्ता तु या नन्दा सा मे पापं व्यपोहतु ॥ ८८ दूर करें। जो शिवभक्त नन्दा नामक गौ हैं, वे मेरे पापको दूर करें। भद्रपदवाली, शिवलोकमें स्थित, भद्रा भद्रपदा देवी शिवलोके व्यवस्थिता। गायोंकी माता महाभाग्यशालिनी जो देवी भद्रा नामक माता गवां महाभागा सा मे पापं व्यपोहतु ॥ ८९ गौ हैं, वे मेरे पापको दूर करें। सब प्रकारसे कल्याण सुरभिः सर्वतोभद्रा सर्वपापप्रणाशनी। करनेवाली, सभी पापोंका नाश करनेवाली तथा सदा रुद्रपूजारता नित्यं सा मे पापं व्यपोहतु ॥ ९० रुद्रपूजामें लीन रहनेवाली वे सुरभि नामक गौ मेरे पापको दूर करें। शीलसे सम्पन्न, ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली, सुशीला शीलसम्पन्ना श्रीप्रदा शिवभाविता। शिवभक्त तथा नित्य शिवलोकमें रहनेवाली वे सुशीला शिवलोके स्थिता नित्यं सा मे पापं व्यपोहतु ॥ ९१ नामक गौ मेरे पापको दूर करें ॥ ८८-९१ ॥ वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः सर्वकार्याभिचिन्तकः। वेदों तथा शास्त्रोंके अर्थ तथा तत्त्वके ज्ञाता, समस्तगुणसम्पन्नः सर्वदेवेश्वरात्मजः ॥ ९२ समस्त कार्योंका चिन्तन करनेवाले, सभी गुणोंसे सम्पन्न, सर्वदेवेश्वर [शिव]-के पुत्र, श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, सौम्य, ज्येष्ठः सर्वेश्वरः सौम्यो महाविष्णुप्रतनुः स्वयम्। साक्षात् महाविष्णुके विग्रहस्वरूप, देवताओंके सेनापति, आर्यः सेनापतिः साक्षाद् गहनो मखमर्दनः ॥ ९३ गम्भीरतासे युक्त, यज्ञको विनष्ट करनेवाले, ऐरावत हाथीपर सवार, काले तथा घुँघराले केशवाले, कृष्णवर्णके ऐरावतगजारूढः कृष्णकुञ्चितमूर्धजः। अंगवाले, लाल नेत्रोंवाले, चन्द्रमा तथा सर्पके कृष्णाङ्गो रक्तनयनः शशिपन्नगभूषणः ॥ ९४ आभूषणवाले, भूतों-प्रेतों-पिशाचों तथा कूष्माण्डोंसे भूतैः प्रेतैः पिशाचैश्च कूष्माण्डैश्च समावृतः। घिरे हुए और शिवार्चनमें तल्लीन वे आर्य कालभैरव शिवार्चनरतः साक्षात् स मे पापं व्यपोहतु ॥ ९५ मेरे पापको दूर करें ॥ ९२-९५॥
अध्याय ८२] सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव ४०३ ब्रह्माणी चैव माहेशी कौमारी वैष्णवी तथा। वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डाग्नेयिका तथा ॥ ९६ एता वै मातरः सर्वाः सर्वलोकप्रपूजिताः। योगिनीभिर्महापापं व्यपोहन्तु समाहिताः ॥ ९७ वीरभद्रो महातेजा हिमकुन्देन्दुसन्निभः । रुद्रस्य तनयो रौद्रः शूलासक्तमहाकरः ॥ ९८ सहस्रबाहुः सर्वज्ञः सर्वायुधधरः स्वयम्। त्रेताग्निनयनो देवस्त्रैलोक्याभयदः प्रभुः ॥ ९९ मातृणां रक्षको नित्यं महावृषभवाहनः। त्रैलोक्यनमितः श्रीमान् शिवपादार्चने रतः ॥ १०० यज्ञस्य च शिरश्छेत्ता पूष्णो दन्तविनाशनः । वह्नेर्हस्तहरः साक्षाद् भगनेत्रनिपातनः ॥ १०१ पादाङ्गुष्ठेन सोमाङ्गपेषकः प्रभुसंज्ञकः । उपेन्द्रेन्द्रयमादीनां देवानामहङ्गरक्षकः ॥ १०२ सरस्वत्या महादेव्या नासिकोष्ठावकर्तनः । गणेश्वरो यः सेनानीः स मे पापं व्यपोहतु ॥ १०३ ज्येष्ठा वरिष्ठा वरदा वराभरणभूषिता। महालक्ष्मीर्जगन्माता सा मे पापं व्यपोहतु ॥ १०४ महामोहा महाभागा महाभूतगणैर्वृता । शिवार्चनरता नित्यं सा मे पापं व्यपोहतु ॥ १०५ लक्ष्मीः सर्वगुणोपेता सर्वलक्षणसंयुता। सर्वदा सर्वगा देवी सा मे पापं व्यपोहतु ॥ १०६ सिंहारूढा महादेवी पार्वत्यास्तनयाव्यया । विष्णोर्निद्रा महामाया वैष्णवी सुरपूजिता ॥ १०७ त्रिनेत्रा वरदा देवी महिषासुरमर्दिनी। शिवार्चनरता दुर्गा सा मे पापं व्यपोहतु ॥ १०८ ब्रह्माण्डधारका रुद्राः सर्वलोकप्रपूजिताः । सत्याश्च मानसाः सर्वे व्यपोहन्तु भयं मम ॥ १०९ भूताः प्रेताः पिशाचाश्च कूष्माण्डगणनायकाः । कूष्माण्डकाश्च ते पापं व्यपोहन्तु समाहिताः ॥ ११० ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा, आग्नेयिका - समस्त लोकोंसे पूजित तथा योगिनियोंसे घिरी हुई ये सभी माताएँ [मेरे] महापापको दूर करें ॥ ९६-९७ ॥ महातेजस्वी, हिम (बर्फ) - कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमाके सदृश, रुद्रके पुत्र, भयानक, शूलयुक्त विशाल भुजावाले, हजार भुजाओंवाले, सब कुछ जाननेवाले, सभी प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले, तीन अग्निरूप नेत्रवाले, देवस्वरूप, तीनों लोकोंको अभय प्रदान करनेवाले, ऐश्वर्यशाली, माताओंकी सर्वदा रक्षा करनेवाले, महान् वृषभपर आरूढ़, तीनों लोकोंसे नमस्कृत, श्रीयुक्त, शिवके पादार्चनमें तल्लीन, यज्ञके सिरका छेदन करनेवाले, पूषाके दाँतको तोड़नेवाले, अग्निके हाथको नष्ट करनेवाले, साक्षात् भगके नेत्रको नीचे गिरानेवाले, [अपने] पैरके अँगूठेसे सोमके अंगको पीसनेवाले, प्रभु नामवाले, उपेन्द्र-इन्द्र-यम आदि देवताओंके अंगरक्षक, महादेवी सरस्वतीके ओठ तथा नाकको काटनेवाले, गणोंके ईश्वर (स्वामी) तथा सेनानायक जो वीरभद्र हैं- वे मेरे पापको दूर करें ॥ ९८-१०३ ॥ ज्येष्ठ, वरिष्ठ, वरदायिनी, श्रेष्ठ आभूषणोंसे विभूषित तथा जगज्जननी जो महालक्ष्मी हैं- वे मेरे पापको दूर करें। महाभागवती, महान् भूतगणोंसे घिरी हुई तथा शिवपूजनमें सदा रत जो महामोहा (महामाया) हैं- वे मेरे पापको दूर करें। सभी गुणोंसे सम्पन्न, सभी लक्षणोंसे युक्त, सब कुछ देनेवाली और सर्वत्र गमन करनेवाली जो देवी लक्ष्मी हैं-वे मेरे पापको दूर करें। सिंहपर आरूढ़, पार्वतीकी पुत्री, शाश्वत, विष्णुकी निद्रारूपा, महामाया, वैष्णवी (विष्णुकी शक्ति), देवताओंसे पूजित, तीन नेत्रोंवाली, वर प्रदान करनेवाली, महिषासुरका संहार करनेवाली तथा शिवके अर्चनमें तल्लीन जो महादेवी भगवती दुर्गा हैं- वे मेरे पापको दूर करें ॥ १०४-१०८ ॥ ब्रह्माण्डको धारण करनेवाले तथा सभी लोकोंद्वारा पूजित सभी सत्य और मानस रुद्र मेरे भयको दूर करें। जो भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्डगणनायक तथा
४०४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग अनेन देवं स्तुत्वा तु चान्ते सर्वं समापयेत्। प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रतिमासे द्विजोत्तमाः ॥ १११ व्यपोहनस्तवं दिव्यं यः पठेच्छृणुयादपि। विधूय सर्वपापानि रुद्रलोके महीयते ॥ ११२ कन्यार्थी लभते कन्यां जयकामो जयं लभेत्। अर्थकामो लभेदर्थं पुत्रकामो बहून् सुतान् ॥ ११३ विद्यार्थी लभते विद्यां भोगार्थी भोगमाप्नुयात्। यान् यान् प्रार्थयते कामान् मानवः श्रवणादिह ॥ ११४ तान् सर्वान् शीघ्रमाप्नोति देवानां च प्रियो भवेत्। पठ्यमानमिदं पुण्यं यमुद्दिश्य तु पठ्यते ॥ ११५ तस्य रोगा न बाधन्ते वातपित्तादिसम्भवाः। नाकाले मरणं तस्य न सर्पैरपि दंश्यते ॥ ११६ यत्पुण्यं चैव तीर्थानां यज्ञानां चैव यत्फलम्। दानानां चैव यत्पुण्यं व्रतानां च विशेषतः ॥ ११७ तत्पुण्यं कोटिगुणितं जप्त्वा चाप्नोति मानवः। गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च वीरहा ब्रह्महा भवेत् ॥ ११८ शरणागतघाती च मित्रविश्वासघातकः। दुष्टः पापसमाचारो मातृहा पितृहा तथा ॥ ११९ व्यपोह्य सर्वपापानि शिवलोके महीयते ॥ १२० कूष्माण्ड हैं—वे समाहितचित्त होकर [मेरे] पापको दूर करें॥१०९-११०॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! प्रत्येक महीनेमें इस [व्यपोहनस्तव]- से शिवकी स्तुति करके भूमिपर मस्तक टेककर प्रणाम करके अन्तमें सम्पूर्ण अनुष्ठानका समापन करना चाहिये॥१११॥ जो [इस] दिव्य व्यपोहनस्तवको पढ़ता अथवा सुनता है, वह समस्त पापोंको ध्वस्त करके रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥११२॥ कन्याकी अभिलाषा रखनेवाला कन्या प्राप्त करता है, विजयकी कामना करनेवाला विजय प्राप्त करता है, धनकी इच्छा रखनेवाला धन प्राप्त करता है, पुत्रकी कामना करनेवाला अनेक पुत्र प्राप्त करता है, विद्या चाहनेवाला विद्या प्राप्त करता है और सुख चाहनेवाला सुख प्राप्त करता है; मनुष्य जिन-जिन कामनाओंकी प्रार्थना करता है, इसके श्रवणसे इस लोकमें उन सबको शीघ्र प्राप्त कर लेता है और देवताओंका प्रिय हो जाता है। जिस किसीके निमित्त इस पवित्र स्तवको पढ़ा जाता है, उसे वात, पित्त आदिसे होनेवाले रोग पीड़ित नहीं करते हैं, असमयमें उसकी मृत्यु नहीं होती है और उसे सर्प नहीं डँसते हैं॥११३-११६॥ जो पुण्य तीर्थोंकी यात्रा करनेसे, जो फल यज्ञोंके करनेसे, जो पुण्य दान करनेसे और जो पुण्य विशेषरूपसे व्रतोंके करनेसे होता है; उससे करोड़ों गुना फल इसे जप करके मनुष्य प्राप्त करता है। जो गायकी हत्या करनेवाला, कृतघ्न, वीरघाती, ब्रह्महत्यारा, शरणागतका वध करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, दुष्ट, पापमय आचरणवाला और माता-पिताका वध करनेवाला होता है, वह भी [इसके पाठसे] सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥११७-१२०॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे व्यपोहनस्तवनिरूपणं नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥८२॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'व्यपोहनस्तवनिरूपण' नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८२ ॥
८३- विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान
अध्याय ८३ ] विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान ४०५
तिरासीवाँ अध्याय
विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>व्यपोहनस्तवं पुण्यं श्रुतमस्माभिरादरात्।<br>प्रसङ्गाल्लिङ्गदानस्य व्रतान्यपि वदस्व नः॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] हम लोगोंने आदरपूर्वक पवित्र व्यपोहनस्तवको सुन लिया; अब आप प्रसंगसे लिङ्गदानके व्रतोंको भी हमलोगोंको बताइये ॥ १ ॥ |
| सूत उवाच<br>व्रतानि वः प्रवक्ष्यामि शुभानि मुनिसत्तमाः।<br>नन्दिना कथितानीह ब्रह्मपुत्राय धीमते ॥ २<br><br>तानि व्यासादुपश्रुत्य युष्माकं प्रवदाम्यहम्।<br>अष्टम्यां च चतुर्दश्यां पक्षयोरुभयोरपि ॥ ३ | **सूतजी बोले—**हे श्रेष्ठ मुनियो! मैं आप लोगोंको शुभ व्रत बताऊँगा; नन्दीने बुद्धिमान् ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारको उन्हें बताया था, उन्हीं [व्रतों]-को व्यासजीसे सुनकर मैं आप लोगोंको बता रहा हूँ॥ २ १/२ ॥ |
| वर्षमेकं तु भुञ्जानो नक्तं यः पूजयेच्छिवम्।<br>सर्वयज्ञफलं प्राप्य स याति परमां गतिम्॥ ४<br><br>पृथिवीं भाजनं कृत्वा भुक्त्वा पर्वसु मानवः।<br>अहोरात्रेण चैकेन त्रिरात्रफलमश्नुते ॥ ५ | एक वर्षतक दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको केवल रात्रिमें आहार ग्रहण करता हुआ जो [मनुष्य] शिवकी पूजा करता है, वह समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त करके परमगति प्राप्त करता है। पर्वोंपर एक दिन-रात इस व्रतको करके और पृथिवीको पात्र बनाकर भोजन करनेसे मनुष्य तीन रात्रियोंका फल प्राप्त करता है॥ ३–५॥ |
| द्वयोर्मासस्य पञ्चम्योर्द्वयोः प्रतिपदोर्नरः।<br>क्षीरधाराव्रतं कुर्यात्सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ ६<br><br>कृष्णाष्टम्यां तु नक्तेन यावत्कृष्णचतुर्दशी।<br>भुञ्जन् भोगानवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ ७ | जो मनुष्य महीनेकी दोनों पंचमी तथा प्रतिपदा तिथियोंमें क्षीरधाराव्रत करता है अर्थात् केवल दुग्धके आहारपर रहता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है। कृष्णपक्षकी अष्टमीसे कृष्णपक्षकी चतुर्दशीतक [केवल] रातमें भोजन करनेवाला भोगोंको प्राप्त करता है और [अन्तमें] ब्रह्मलोक जाता है ॥ ६-७ ॥ |
| योऽब्दमेकं प्रकुर्वीत नक्तं पर्वसु पर्वसु।<br>ब्रह्मचारी जितक्रोधः शिवध्यानपरायणः ॥ ८<br><br>संवत्सरान्ते विप्रेन्द्रान् भोजयेद्विधिपूर्वकम्।<br>स याति शाङ्करं लोकं नात्र कार्या विचारणा ॥ ९ | जो [मनुष्य] ब्रह्मचर्यमें स्थित रहकर, क्रोधको वशमें करके तथा शिवध्यानपरायण होकर एक वर्षतक सभी पर्वोंमें नक्तव्रत करता है और वर्षके अन्तमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक भोजन कराता है, वह शिवलोक जाता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ८-९ ॥ |
| उपवासात्परं भैक्ष्यं भैक्ष्यात्परमयाचितम्।<br>अयाचितात्परं नक्तं तस्मान्नक्तेन वर्तयेत् ॥ १० | उपवासकी अपेक्षा भिक्षा श्रेष्ठ है, भिक्षाकी अपेक्षा बिना माँगे प्राप्त भोजन श्रेष्ठ है और बिना माँगे प्राप्त भोजनकी अपेक्षा नक्तव्रत श्रेष्ठ है; अतः नक्तव्रत करना चाहिये ॥ १० ॥ |
| देवैर्भुक्तं तु पूर्वाह्णे मध्याह्ने ऋषिभिस्तथा।<br>अपराह्ने च पितृभिः सन्ध्यायां गुह्यकादिभिः ॥ ११ | पूर्वाह्नमें किया गया भोजन देवताओंका, मध्याह्नमें ऋषियोंका, अपराह्नमें पितरोंका और सन्ध्यामें गुह्यकोंका |
| ४०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्ववेलामतिक्रम्य नक्तभोजनमुत्तमम्।<br>हविष्यभोजनं स्नानं सत्यमाहारलाघवम्॥ १२<br><br>अग्निकार्यमधःशय्यां नक्तभोजी समाचरेत्।<br>प्रतिमासं प्रवक्ष्यामि शिवव्रतमनुत्तमम्॥ १३ | होता है, किन्तु सभी कालोंका अतिक्रमण करके रातमें किया गया भोजन उत्तम होता है। रातमें भोजन करनेवालेको हविष्यान्न ग्रहण करना चाहिये, स्नान करना चाहिये, सत्यका पालन करना चाहिये, कम खाना चाहिये, अग्निहोत्र करना चाहिये और भूमिपर शयन करना चाहिये॥ ११-१२१/२॥ |
| धर्मकामार्थमोक्षार्थं सर्वपापविशुद्धये।<br>पुष्यमासे च सम्पूज्य यः कुर्यान्नक्तभोजनम्॥ १४<br><br>सत्यवादी जितक्रोधः शालिगोधूमगोरसैः।<br>पक्षयोरष्टमीं यत्नादुपवासेन वर्तयेत्॥ १५<br><br>भूमिशय्यां च मासान्ते पौर्णमास्यां घृतादिभिः।<br>स्नाप्य रुद्रं महादेवं सम्पूज्य विधिपूर्वकम्॥ १६<br><br>यावकं चौदनं दत्त्वा सक्षीरं सघृतं द्विजाः।<br>भोजयेद् ब्राह्मणाञ्छिष्टाञ्जपेच्छान्तिं विशेषतः॥ १७<br><br>तथा गोमिथुनं चैव कपिलं विनिवेदयेत्।<br>भवाय देवदेवाय शिवाय परमेष्ठिने॥ १८<br><br>स याति मुनिशार्दूल वाह्नेयं लोकमुत्तमम्।<br>भुक्त्वा स विपुलान् लोकान् तत्रैव स विमुच्यते॥ १९ | अब मैं प्रत्येक महीनेमें किये जानेवाले उत्तम शिवव्रतका वर्णन करूँगा, जो धर्म-काम-अर्थ-मोक्षके लिये और सभी पापोंकी शुद्धिके लिये होता है। जो [मनुष्य] सत्यवादी तथा जितक्रोध (क्रोधको वशमें किया हुआ) होकर पुष्य (पौष) मासमें [शिवका] विधिवत् पूजन करके चावल, गेहूँ और गोदुग्धसे बने हुए भोजनको केवल रातमें ग्रहण करता है; दोनों पक्षोंकी अष्टमी तिथिमें यत्नपूर्वक उपवास करता है तथा भूमिपर शयन करता है और हे द्विजो! मासके अन्तमें पूर्णिमाके दिन घृत आदिसे महादेवको स्नान कराकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दुग्ध तथा घृतमिश्रित पके हुए यव तथा चावलका भोजन कराता है एवं विशेषरूपसे शान्तिमन्त्रोंका जप करता है और देवदेव परमेश्वर भव शिवजीको कपिल वर्णका गोमिथुन (गाय तथा वृषभ) समर्पित करता है—<br>हे श्रेष्ठ मुनियो! वह [मनुष्य] उत्तम अग्निलोकको जाता है और अनेक लोकोंके सुखोंका भोग करके वहींपर मुक्त हो जाता है॥ १३-१९॥ |
| माघमासे तु सम्पूज्य यः कुर्यान्नक्तभोजनम्।<br>कृशरं घृतसंयुक्तं भुञ्जानः संयतेन्द्रियः॥ २०<br><br>सोपवासं चतुर्दश्यां भवेदुभयपक्षयोः।<br>रुद्राय पौर्णमास्यां तु दद्याद्वै घृतकम्बलम्॥ २१<br><br>कृष्णं गोमिथुनं दद्यात्पूजयेच्चैव शङ्करम्।<br>भोजयेद् ब्राह्मणांश्चैव यथाविभवविस्तरम्॥ २२<br><br>याम्यमासाद्य वै लोकं यमेन सह मोदते।<br>फाल्गुने चैव सम्प्राप्ते कुर्याद्वै नक्तभोजनम्॥ २३ | माघ मासमें जो [मनुष्य] पूजन करके केवल नक्त भोजन करता है, घृतयुक्त कृशरका आहार ग्रहण करता है, इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, दोनों पक्षोंकी चतुर्दशीमें उपवास करता है, पूर्णिमाके दिन रुद्रको घृतकम्बल अर्पित करता है, कृष्ण वर्णका गोमिथुन प्रदान करता है, शिवकी पूजा करता है, [अपने] सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह यमलोक पहुँचकर यमके साथ आनन्द मनाता है॥ २०-२२१/२॥ |
| श्यामाकान्नघृतक्षीरैर्जितक्रोधो जितेन्द्रियः।<br>चतुर्दश्यामथाष्टम्यामुपवासं च कारयेत्॥ २४ | फाल्गुन मास आनेपर जो घी तथा दूधमें पकाये हुए साँवाँकि अन्नका नक्त भोजन करता है, इन्द्रियोंको तथा क्रोधको वशमें किये रहता है, अष्टमी तथा चतुर्दशीके |
अध्याय ८३ ] विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान [ ४०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पौर्णमास्यां महादेवं स्नाप्य सम्पूज्य शङ्करम्।<br>दद्याद् गोमिथुनं वापि ताम्राभं शूलपाणये॥ २५<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु प्रार्थयेत्परमेश्वरम्।<br>स याति चन्द्रसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा॥ २६ | दिन उपवास करता है, पूर्णिमाके दिन महादेव शंकरको स्नान कराकर उनकी पूजा करके उन शूलपाणि [शिव]-को ताम्रवर्णका गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर परमेश्वरसे प्रार्थना करता है, वह चन्द्रमाका सायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २३-२६॥ |
| चैत्रेऽपि रुद्रमभ्यर्च्य कुर्याद्वै नक्तभोजनम्।<br>शाल्यन्नं पयसा युक्तं घृतेन च यथासुखम्॥ २७<br>गोष्ठशायी मुनिश्रेष्ठाः क्षितौ निशि भवं स्मरेत्।<br>पौर्णमास्यां शिवं स्नाप्य दद्याद् गोमिथुनं सितम्॥ २८<br>ब्राह्मणान् भोजयेच्चैव निर्ऋतेः स्थानमाप्नुयात्। | हे श्रेष्ठ मुनियो! जो चैत्र महीनेमें रुद्रकी पूजा करके घी और दूधसे युक्त तथा पके हुए शालि-चावलको अपनी रुचिके अनुसार रात्रिमें ग्रहण करता है, रातमें गोशालामें भूमिपर शयन करता है, शिवजीका स्मरण करता है, पूर्णिमासीके दिन शिवको स्नान कराकर श्वेतवर्णका गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह निर्ऋतितिलोकको प्राप्त करता है॥ २७-२८ १/२॥ |
| वैशाखे च तथा मासे कृत्वा वै नक्तभोजनम्॥ २९<br>पौर्णमास्यां भवं स्नाप्य पञ्चगव्यघृतादिभिः।<br>श्वेतं गोमिथुनं दत्त्वा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ ३० | वैशाख महीनेमें नक्तभोजन करके पूर्णमासी तिथिमें पंचगव्य, घृत आदिसे शिवजीको स्नान कराकर श्वेतवर्णका गोमिथुन अर्पित करके वह [मनुष्य] अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है॥ २९-३०॥ |
| ज्येष्ठे मासे च देवेशं भवं शर्वमुमापतिम्।<br>सम्पूज्य श्रद्धया भक्त्या कृत्वा वै नक्तभोजनम्॥ ३१<br>रक्तशाल्यन्नमध्वा च अद्भिः पूतं घृतादिभिः।<br>वीरासनी निशार्धं च गवां शुश्रूषणे रतः॥ ३२<br>पौर्णमास्यां तु सम्पूज्य देवदेवमुमापतिम्।<br>स्नाप्य भक्त्या यथान्यायं चरुं दद्याच्च शूलिने॥ ३३<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च यथाविभवविस्तरम्।<br>धूम्रं गोमिथुनं दत्त्वा वायुलोके महीयते॥ ३४ | ज्येष्ठ मासमें देवेश, भव, शर्व, उमापतिकी श्रद्धापूर्वक पूजा करके मधु-जल-घृतमिश्रित पवित्र शालिचावलका केवल रातमें आहार ग्रहण करके वीर आसनमें स्थित होकर आधी रातमें गायोंकी सेवामें तत्पर रहकर पूर्णिमाके दिन देवदेव उमापतिको स्नान कराकर उनकी पूजा करके विधानपूर्वक शिवजीको चरु अर्पित करके पुनः अपने सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर धूम्रवर्णका गोमिथुन [शिवजीको] अर्पित करनेसे वह वायुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ३१-३४॥ |
| आषाढे मासि चाप्येवं नक्तभोजनतत्परः।<br>भूरिखण्डाज्यसम्मिश्रं सक्तुभिश्चैव गोरसम्॥ ३५<br>पौर्णमास्यां घृताद्यैस्तु स्नाप्य पूज्य यथाविधि।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च श्रोत्रियान् वेदपारगान्॥ ३६<br>दद्याद् गोमिथुनं गौरं वारुणं लोकमाप्नुयात्। | इसी प्रकार आषाढ़ महीनेमें भी चीनी, घृत तथा गोदुग्धमिश्रित सत्तूके नक्त-भोजनमें तत्पर रहते हुए पूर्णिमाके दिन घृत आदिसे [शिवजीको] स्नान कराकर विधिपूर्वक पूजन करके वेदमें पारंगत श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको भोजन कराकर जो गौरवर्णका गोमिथुन अर्पित करता है, वह वरुणलोक प्राप्त करता है॥ ३५-३६ १/२॥ |
| श्रावणे च द्विजा मासे कृत्वा वै नक्तभोजनम्॥ ३७<br>क्षीरषष्टिकभक्तेन सम्पूज्य वृषभध्वजम्।<br>पौर्णमास्यां घृताद्यैस्तु स्नाप्य पूज्य यथाविधि॥ ३८ | हे द्विजो! सावन महीनेमें दूधमिश्रित षष्टिक (साठ दिनमें उत्पन्न होनेवाले शालिचावल)-के भातका नक्तभोजन करके वृषभध्वजकी पूजा करके [अन्तमें] |
| ४०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्राह्मणान् भोजयित्वा च श्रोत्रियान् वेदपारगान्।<br>श्वेताग्रपादं पौण्ड्रं च दद्याद् गोमिथुनं पुनः॥ ३९<br><br>स याति वायुसायुज्यं वायुवत्सर्वगो भवेत्।<br>प्राप्ते भाद्रपदे मासे कृत्वैवं नक्तभोजनम्॥ ४० | पूर्णिमाके दिन घृत आदिसे स्नान कराकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके वेदमें पारंगत श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको भोजन कराकर जो [मनुष्य] सफेद खुरवाला तथा चितकबरा गोमिथुन शिवजीको अर्पित करता है, वह वायुदेवका सायुज्य प्राप्त करता है और वायुके समान सर्वगामी हो जाता है॥ ३७–३९१/२॥ |
| हुतशेषं च विप्रेन्द्रान् वृक्षमूलाश्रितो दिवा।<br>पौर्णमास्यां तु देवेशं स्नाप्य सम्पूज्य शङ्करम्॥ ४१<br><br>नीलस्कन्धं वृषं गां च दत्त्वा भक्त्या यथाविधि।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ४२<br><br>यक्षलोकमनुप्राप्य यक्षराजो भवेन्नरः।<br>ततश्चाश्वयुजे मासि कृत्वैवं नक्तभोजनम्॥ ४३ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसी प्रकार भाद्रपद महीना आनेपर हवनसे बची हुई सामग्रीका नक्तभोजन करके दिनमें वृक्षके मूलका आश्रय लेकर विश्राम करते हुए [अन्तमें] पूर्णिमाके दिन देवेश शंकरको स्नान कराकर [उनकी] पूजा करके भक्तिपूर्वक विधिके अनुसार नीलवर्णके स्कन्धवाला वृषभ तथा एक गाय शिवजीको अर्पित करके वेद-वेदांगमें पारंगत ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य यक्षलोक प्राप्त करके यक्षोंका राजा हो जाता है॥ ४०–४२१/२॥ |
| सघृतं शङ्करं पूज्य पौर्णमास्यां च पूर्ववत्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च शिवभक्तान् सदा शुचीन्॥ ४४<br><br>वृषभं नीलवर्णाभमुरोदेशसमुन्नतम्।<br>गां च दत्त्वा यथान्यायमैशानं लोकमाप्नुयात्॥ ४५ | इसके बाद इसी तरह आश्विन (क्वार) मासमें केवल रातमें घीसे बना हुआ भोजन करके पूर्णिमा तिथिमें पूर्वकी भाँति शंकरकी पूजा करके ब्राह्मणों तथा सर्वदा पवित्र रहनेवाले शिवभक्तोंको भोजन कराकर नीलवर्णकी आभावाले तथा उन्नत उरुदेशवाले एक वृषभ और एक गायका विधिपूर्वक दान करके मनुष्य ईशानलोक प्राप्त करता है॥ ४३–४५॥ |
| कार्तिके च तथा मासे कृत्वा वै नक्तभोजनम्।<br>क्षीरोदनेन साज्येन सम्पूज्य च भवं प्रभुम्॥ ४६<br><br>पौर्णमास्यां च विधिवत्स्नाप्य दत्त्वा चरुं पुनः।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च यथाविभवविस्तरम्॥ ४७<br><br>दत्त्वा गोमिथुनं चैव कापिलं पूर्ववद् द्विजाः।<br>सूर्यसायुज्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥ ४८ | हे द्विजो! कार्तिक मासमें रात्रिमें घृतयुक्त दुग्धोदनका भोजन करके भगवान् शिवका पूजनकर [अन्तमें] पूर्णिमा तिथिमें विधिपूर्वक [शिवजीको] स्नान कराकर पुनः उन्हें चरुका नैवेद्य अर्पित करके अपने सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पूर्वकी भाँति कपिल वर्णका गोमिथुन शिवजीको समर्पित करके मनुष्य सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ४६–४८॥ |
| मार्गशीर्षे च मासेऽपि कृत्वैवं नक्तभोजनम्।<br>यवान्नेन यथान्यायमाज्यक्षीरादिभिः समम्॥ ४९<br><br>पौर्णमास्यां च पूर्वोक्तं कृत्वा शर्वाय शम्भवे।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च दरिद्रान् वेदपारगान्॥ ५०<br><br>दत्त्वा गोमिथुनं चैव पाण्डुरं विधिपूर्वकम्।<br>सोमलोकमनुप्राप्य सोमेन सह मोदते॥ ५१ | मार्गशीर्ष (अगहन) महीनेमें भी विधिपूर्वक दूध तथा घीमें पकाये हुए जौका रात्रिमें भोजन करके [अन्तमें] पूर्णिमाके दिन पूर्वकी भाँति शर्व शम्भुको स्नान कराकर उनकी पूजा करके वेदमें पारंगत निर्धन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर तथा विधिपूर्वक पाण्डुरवर्णका |
८४- उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान
अध्याय ८४] उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान ४०९
| अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं क्षमा दया।<br>त्रिःस्नानं चाग्निहोत्रं च भूशय्या नक्तभोजनम्॥ ५२<br><br>पक्षयोरुपवासं च चतुर्दश्यष्टमीषु च।<br>इत्येतदखिलं प्रोक्तं प्रतिमासं शिवव्रतम्॥ ५३<br><br>कुर्याद्वर्षं क्रमेणैव व्युत्क्रमेणापि वा द्विजाः।<br>स याति शिवसायुज्यं ज्ञानयोगमवाप्नुयात्॥ ५४ | गोमिथुन [शिवजीको] समर्पित करके मनुष्य सोमलोक प्राप्त करके [वहाँपर] सोमके साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ ४९–५१॥<br><br>अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया, तीनों कालमें स्नान, अग्निहोत्र, पृथ्वीपर शयन, रात्रिभोजन और दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको उपवास—इन सबको तथा प्रत्येक महीनेके शिवव्रतको मैंने कह दिया; हे द्विजो! जो [मनुष्य] क्रमसे अथवा विपरीत क्रमसे वर्षभर इसे करता है, वह शिवसायुज्य तथा ज्ञानयोग प्राप्त करता है॥ ५२–५४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवव्रतकथनं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवव्रतकथन' नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८३॥
चौरासीवाँ अध्याय
उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान
| सूत उवाच<br>उमामहेश्वरं वक्ष्ये व्रतमीश्वरभाषितम्।<br>नरनार्यादिजन्तूनां हिताय मुनिसत्तमाः॥ १<br><br>पौर्णमास्याममावास्यां चतुर्दश्यष्टमीषु च।<br>नक्तमब्दं प्रकुर्वीत हविष्यं पूजयेद्भवम्॥ २ | **सूतजी बोले—**हे श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं नर, नारी आदि प्राणियोंके हितके लिये [स्वयं] शिवजीद्वारा कहे गये उमामहेश्वरव्रतको बताऊँगा। वर्षभर अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या तथा पूर्णिमाको रातमें हविष्य ग्रहण करना चाहिये और शिवजीकी पूजा करनी चाहिये॥ १-२॥ | | उमामहेशप्रतिमां हेम्ना कृत्वा सुशोभनाम्।<br>राजतीं वाथ वर्षान्ते प्रतिष्ठाप्य यथाविधि॥ ३ | [शैलादि बोले—] हे प्रभो [सनत्कुमार]! जो [मनुष्य] सुवर्ण अथवा चाँदीकी उमा-महेशकी परम सुन्दर |
| ४१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्राह्मणान् भोजयित्वा च दत्त्वा शक्त्या च दक्षिणाम्।<br>रथाद्यैर्वापि देवेशं नीत्वा रुद्रालयं प्रति॥ ४<br><br>सर्वातिशयसंयुक्तैश्छत्रचामरभूषणैः ।<br>निवेदयेद् व्रतं चैव शिवाय परमेष्ठिने॥ ५<br><br>स याति शिवसायुज्यं नारी देव्या यदि प्रभो। | प्रतिमा बनाकर वर्षके अन्तमें विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करके पूर्ण सौन्दर्ययुक्त तथा छत्र-चामर-आभूषणोंसे अलंकृत रथ आदिसे देवेश [शिव]-को शिवालयमें ले जाकर इस व्रतको परमेश्वर शिवको निवेदित करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है और यदि नारी हो, तो वह भगवती उमाका सायुज्य प्राप्त करती है॥ ३–५ १/२॥ |
| अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नियता ब्रह्मचारिणी॥ ६<br><br>वर्षमेकं न भुञ्जीत कन्या वा विधवापि वा।<br>वर्षान्ते प्रतिमां कृत्वा पूर्वोक्तविधिना ततः॥ ७<br><br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं दत्त्वा रुद्रालये पुनः।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च भवान्या सह मोदते॥ ८<br><br>या नार्येवं चरेदब्दं कृष्णामेकां चतुर्दशीम्।<br>वर्षान्ते प्रतिमां कृत्वा येन केनापि वा द्विजाः॥ ९<br><br>पूर्वोक्तमखिलं कृत्वा भवान्या सह मोदते। | कन्या हो अथवा विधवा हो—वह एक वर्षतक अष्टमी तथा चतुर्दशीको नियमपूर्वक ब्रह्मचारिणी रहकर भोजन न करे; वर्षके अन्तमें पूर्वोक्त विधिसे प्रतिमा बनाकर विधानके अनुसार उसकी प्रतिष्ठा करके उसे रुद्रालयमें प्रदान करके पुनः ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वह भवानी (पार्वती)-के साथ आनन्द मनाती है। हे द्विजो! जो स्त्री वर्षपर्यन्त केवल कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको यह व्रत करती है और वर्षके अन्तमें जिस किसी पदार्थसे प्रतिमा बनाकर पूर्वोक्त समस्त विधान सम्पन्न करती है, वह भवानीके साथ आनन्द मनाती है॥ ६–९ १/२॥ |
| अमावास्यां निराहारा भवेदब्दं सुयन्त्रिता॥ १०<br><br>शूलं च विधिना कृत्वा वर्षान्ते विनिवेदयेत्।<br>स्नाप्येशानं यजेद् भक्त्या सहस्रैः कमलैः सितैः॥ ११<br><br>रजतं कमलं चैव जाम्बूनदसुकर्णिकम्।<br>दत्त्वा भवाय विप्रेभ्यः प्रदद्याद्दक्षिणामपि॥ १२<br><br>कामतौऽपि कृतं पापं भ्रूणहत्यादिकं च यत्।<br>तत्सर्वं शूलदानेन भिन्द्यान्नारी न संशयः॥ १३<br><br>सायुज्यं चैवमाप्नोति भवान्या द्विजसत्तमाः।<br>कुर्याद्यद्वा नरः सोऽपि रुद्रसायुज्यमाप्नुयात्॥ १४ | स्त्रीको चाहिये कि वर्षपर्यन्त नियन्त्रित रहती हुई अमावस्याके दिन आहार ग्रहण न करे और वर्षके अन्तमें विधिपूर्वक त्रिशूल बनवाकर शिवको निवेदित करे तथा ईशानको स्नान कराकर हजार श्वेत कमलोंसे भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे और सुवर्णमयी कर्णिकासे युक्त चाँदीका कमल शिवजीको समर्पित करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा भी प्रदान करे। वह स्त्री [शिवजीके निमित्त] त्रिशूलके दानसे जानबूझकर भ्रूणहत्या आदि जो भी पाप होता है, उन सबको ध्वस्त कर डालती है; इसमें सन्देह नहीं है और हे श्रेष्ठ द्विजो! वह भवानीका सायुज्य प्राप्त कर लेती है। यदि [कोई] मनुष्य इसे करता है, तो वह भी रुद्रसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ १०–१४॥ |
| पौर्णमास्याममावास्यां वर्षमेकमतन्द्रिता।<br>उपवासरता नारी नरोऽपि द्विजसत्तमाः॥ १५<br><br>नियोगादेव तत्कार्यं भर्तॄणां द्विजसत्तमाः।<br>जपं दानं तपः सर्वमस्वतन्त्राः यतः स्त्रियः॥ १६ | हे श्रेष्ठ द्विजो! पूरे एक वर्षभर पूर्णमासी तथा अमावस्याको आलस्यरहित तथा उपवासपरायण होकर नारीको तथा नरको भी इसे करना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! पतिकी आज्ञासे ही स्त्रियोंको यह व्रत, जप, दान, तप—सब कुछ करना चाहिये; क्योंकि स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं हैं। हे सुव्रतो! वर्षके अन्तमें सभी प्रकारके गन्धोंसे युक्त उस |
अध्याय ८४] उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान ४११
| वर्षान्ते सर्वगन्धाढ्यां प्रतिमां सन्निवेदयेत्।<br>सा भवान्याश्च सायुज्यं सारूप्यं चापि सुव्रता ॥ १७<br><br>लभते नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।<br>कार्तिक्यां वा तु या नारी एकभक्तेन वर्तते ॥ १८ | प्रतिमाको शिवको निवेदित कर देना चाहिये; वह सुव्रता [स्त्री] भवानीका सायुज्य तथा सारूप्य प्राप्त कर लेती है; इसमें सन्देह नहीं है, मैं यह पूर्णतः सत्य कह रहा हूँ॥ १५-१७ १/२ ॥ |
|---|---|
| क्षमाहिंसादिनियमैः संयुक्ता ब्रह्मचारिणी।<br>दद्यात्कृष्णतिलानां च भारमेकममन्द्रिता ॥ १९<br><br>सघृतं सगुडं चैव ओदनं परमेष्ठिने।<br>दत्त्वा च ब्राह्मणेभ्यश्च यथाविभवविस्तरम् ॥ २०<br><br>अष्टम्यां च चतुर्दश्यामुपवासरता च सा।<br>भवान्या मोदते सार्धं सारूप्यं प्राप्य सुव्रता ॥ २१ | जो स्त्री कार्तिक मासमें एक बार भोजन करती है, क्षमा-अहिंसा आदि नियमोंसे युक्त रहती है, ब्रह्मचर्यका पालन करती है, आलस्यरहित होकर एक भार* काला तिल तथा घृत-गुड़ मिलाकर पकाया भात परमेश्वरको निवेदित करती है, ब्राह्मणोंको अपने सामर्थ्यके अनुसार दान देती है और अष्टमी तथा चतुर्दशीको उपवास करती है—वह उत्तम व्रतवाली [स्त्री] भवानीका सारूप्य प्राप्त करके उनके साथ आनन्द मनाती है ॥ १८—२१ ॥ |
| क्षमा सत्यं दया दानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।<br>सर्वव्रतेष्वयं धर्मः सामान्यो रुद्रपूजनम्॥ २२ | समस्त व्रतोंमें क्षमा, सत्य, दया, दान, शुद्धि तथा इन्द्रियोंका निग्रह और रुद्रपूजन—यह सामान्य धर्म है॥ २२॥ |
| समासात्तुः प्रवक्ष्यामि प्रतिमासमनुक्रमात्।<br>मार्गशीर्षकमासादि कार्तिक्यान्तं यथाक्रमम् ॥ २३ | अब मैं संक्षेपमें क्रमसे मार्गशीर्षसे प्रारम्भ करके कार्तिकतक प्रत्येक महीनेके व्रतको बताऊँगा; इस परम पुण्यप्रद व्रतको [स्वयं] नन्दीने कहा था॥ २३ १/२ ॥ |
| व्रतं सुविपुलं पुण्यं नन्दिना परिभाषितम्।<br>मार्गशीर्षकमासेऽथ वृषं पूर्णाङ्गममुत्तमम् ॥ २४<br><br>अलङ्कृत्य यथान्यायं शिवाय विनिवेदयेत्।<br>सा च सार्धं भवान्या वै मोदते नात्र संशयः ॥ २५ | जो [स्त्री] मार्गशीर्ष मासमें पूर्ण अंगोंवाले उत्तम वृषभको अलंकृत करके विधिपूर्वक शिवको निवेदित करती है, वह भवानीके साथ आनन्दित रहती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २४-२५ ॥ |
| पुष्यमासे तु वै शूलं प्रतिष्ठाप्य निवेदयेत्।<br>पूर्वोक्तमखिलं कृत्वा भवान्या सह मोदते ॥ २६ | जो पौष मासमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार सम्पूर्ण कृत्य करके त्रिशूलकी स्थापनाकर उसे [शिवको] समर्पित करती है, वह भवानीके साथ आनन्द मनाती है ॥ २६ ॥ |
| माघमासे रथं कृत्वा सर्वलक्षणलक्षितम्।<br>दद्यात्सम्पूज्य देवेशं ब्राह्मणांश्चैव भोजयेत् ॥ २७ | हे महाभाग मुनियो! जो माघ महीनेमें सभी लक्षणोंसे युक्त रथ बनाकर देवेशकी पूजा करके उसे शिवको समर्पित करती है और ब्राह्मणोंको भोजन कराती है, वह देवी [पार्वती]-के साथ आनन्द करती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २७ १/२ ॥ |
| सा च देव्या महाभागा मोदते नात्र संशयः।<br>फाल्गुने प्रतिमां कृत्वा हिरण्येन यथाविधि ॥ २८ | जो फाल्गुन मासमें अपने सामर्थ्यके अनुसार विधिपूर्वक सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी प्रतिमा बनाकर |
* भारका परिमाण इस प्रकार है—
चतुर्भिर्व्रीहिभिर्गुञ्जं गुञ्जापञ्च पणं पलम्।
अष्टौ धरणमष्टौ च कर्ष तांश्चतुरः पलम्। तुलां पलशतं प्राहुर्भारं स्याद्विंशतिस्तुलाः॥
अर्थात् 'चार व्रीहि (धान)-की एक गुंजा, पाँच गुंजाका एक पण, आठ पणका एक धरण, आठ धरणका एक कर्ष, चार कर्षका एक पल, सौ पलकी एक तुला और बीस तुलाका एक भार कहलाता है।'