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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / २५ हैं। इसी से वह अपने पति से द्वारिकापुरी जाने का आग्रह करती है, उसका यह दृढ़ विश्वास है कि वे दीनबन्धु उनकी नौका को भी किनारे लगा देंगे— “दीनदयाल कौ ऐसोई द्वार है दीनन की सुधि लेत सदाई । द्रौपदी तें गज तें प्रहलाद तें जानि परी कछु बार न लाई ॥” 'सुदामा-चरित' के श्रीकृष्ण अन्तर्यामी भी हैं, वे अपने मित्र की पीड़ा को जानकर कि वह तीन दिन निरन्तर चलते-चलते थककर चूर हो गया है, उसे सोते-सोते में ही को गोमती के तीर पर पहुँचा देते हैं। इसी प्रकार वे अपने मित्र की घोर निर्धनता के निवारण के निमित्त द्वारिकापुरी से भी अधिक सुन्दर सुदामापुरी का निर्माण करा देते हैं। सभी कार्य उनके अति मानवीय रूप को व्यंजित करते हैं। वस्तुतः नरोत्तमदास की काव्य-कला श्रीकृष्ण के लौकिक एवं अलौकिक दोनों रूपों का अद्भुत सामंजस्य प्रस्तुत करने में ही अपनी सार्थकता समझती है। सुदामा-चरित का काव्य-रूप बन्ध के विचार से काव्य के दो भेद किए गए हैं—प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य। प्रबन्ध काव्य के पुनः तीन भेद माने जाते हैं—महाकाव्य, खण्ड- काव्य और एकार्थकाव्य। इन सभी काव्य-भेदों में 'सुदामा-चरित' को खण्डकाव्य की संज्ञा दी जा सकती है। खण्डकाव्य में किसी महापुरुष के खण्ड जीवन या जीवन की किसी समस्या के किसी विशेष पहलू आदि का चित्रण महाकाव्योचित शैली में होता है। इसमें प्रासंगिक कथाओं का अभाव होता है। इसकी कथा- वस्तु विकास की विविध अवस्थाओं से गुजरती हुई एक निश्चित उद्देश्य का सिद्धि को पाकर समाप्त हो जाती है। इसका आकार लघु होता है और इसमें कवि की तीव्र अनुभूतियों एवं भाव प्रवणता को विशेष प्रश्रय मिलता है। महा- काव्य के समान इसका प्रारम्भ भी ईश्वर वन्दना, आशीर्वाद, नमस्कार आदि से होता है और इसमें महाकाव्य की कई अन्य विशेषताओं का समावेश भी बड़ी कलात्मकता के साथ किया जाता है। किन्तु नायक के सम्पूर्ण कथावृत्त तथा जातीय जीवन की विस्तृत चर्चा खण्डकाव्य में सम्भव नहीं होती है। इसकी परिधि सीमित होती है, यह एक देशीय होता है। इसे महाकाव्य का एक अंग भी