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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

सुदामा-चरित / २५ हैं। इसी से वह अपने पति से द्वारिकापुरी जाने का आग्रह करती है, उसका यह दृढ़ विश्वास है कि वे दीनबन्धु उनकी नौका को भी किनारे लगा देंगे— “दीनदयाल कौ ऐसोई द्वार है दीनन की सुधि लेत सदाई । द्रौपदी तें गज तें प्रहलाद तें जानि परी कछु बार न लाई ॥” 'सुदामा-चरित' के श्रीकृष्ण अन्तर्यामी भी हैं, वे अपने मित्र की पीड़ा को जानकर कि वह तीन दिन निरन्तर चलते-चलते थककर चूर हो गया है, उसे सोते-सोते में ही को गोमती के तीर पर पहुँचा देते हैं। इसी प्रकार वे अपने मित्र की घोर निर्धनता के निवारण के निमित्त द्वारिकापुरी से भी अधिक सुन्दर सुदामापुरी का निर्माण करा देते हैं। सभी कार्य उनके अति मानवीय रूप को व्यंजित करते हैं। वस्तुतः नरोत्तमदास की काव्य-कला श्रीकृष्ण के लौकिक एवं अलौकिक दोनों रूपों का अद्भुत सामंजस्य प्रस्तुत करने में ही अपनी सार्थकता समझती है। सुदामा-चरित का काव्य-रूप बन्ध के विचार से काव्य के दो भेद किए गए हैं—प्रबन्ध काव्य और मुक्तक काव्य। प्रबन्ध काव्य के पुनः तीन भेद माने जाते हैं—महाकाव्य, खण्ड- काव्य और एकार्थकाव्य। इन सभी काव्य-भेदों में 'सुदामा-चरित' को खण्डकाव्य की संज्ञा दी जा सकती है। खण्डकाव्य में किसी महापुरुष के खण्ड जीवन या जीवन की किसी समस्या के किसी विशेष पहलू आदि का चित्रण महाकाव्योचित शैली में होता है। इसमें प्रासंगिक कथाओं का अभाव होता है। इसकी कथा- वस्तु विकास की विविध अवस्थाओं से गुजरती हुई एक निश्चित उद्देश्य का सिद्धि को पाकर समाप्त हो जाती है। इसका आकार लघु होता है और इसमें कवि की तीव्र अनुभूतियों एवं भाव प्रवणता को विशेष प्रश्रय मिलता है। महा- काव्य के समान इसका प्रारम्भ भी ईश्वर वन्दना, आशीर्वाद, नमस्कार आदि से होता है और इसमें महाकाव्य की कई अन्य विशेषताओं का समावेश भी बड़ी कलात्मकता के साथ किया जाता है। किन्तु नायक के सम्पूर्ण कथावृत्त तथा जातीय जीवन की विस्तृत चर्चा खण्डकाव्य में सम्भव नहीं होती है। इसकी परिधि सीमित होती है, यह एक देशीय होता है। इसे महाकाव्य का एक अंग भी

२६ / सुदामा-चरित माना जा सकता है, किन्तु यह अंग अपने आप में सर्वांगीण होता है, उसी से यह अत्यन्त प्रभावोत्पादक बनता है। इसमें जीवन के किसी खण्ड की कोई सुनि- श्चित कथा तथा उदात्त उद्देश्य निहित रहता है। इसमें प्रायः एक रस की प्रधानता होती है। 'सुदामा-चरित' में खण्डकाव्य की अधिकांश विशिष्टताओं का सहज सौंदर्य देखा जा सकता है। इसकी कथावस्तु 'श्रीमद्भागवत' के दशम् स्कन्ध से ले गई है। इसमें सुदामा नामक तपोनिष्ठ ब्राह्मण के प्रौढ़ जीवन का वर्णन हुआ है, जिसमें घोर निर्धनता ने अपना साम्राज्य स्थापित कर रखा था। द्वारिकापति श्रीकृष्ण उसके सहपाठी तथा बाल सखा थे। दरिद्र सुदामा उनके पास जाना नहीं चाहता था, उसका स्वाभिमानी ब्राह्मण व्यक्तित्व इसमें सबसे बड़ी दीवार थी। सुदामा-पत्नी के अचूक तर्क-तीरों से वह दीवार अन्ततः टूटती है और श्रीकृष्ण की उदात्त मैत्री से उसका दरिद्रय दूर हो जाता है। उसके जीवन के इस खण्ड या आर्थिक समस्या का वर्णन कवि ने बड़ी कलात्मकता के साथ किया है। उसने सुदामा के जीवन के इस मार्मिक अंग को केन्द्र बनाकर कथा की योजना की है, उसमें न तो किसी प्रासंगिक कथा का समावेश किया है और न उसमें किसी प्रकार की नीरसता आने दी है। उसकी कथावस्तु विकास की विभिन्न अव- स्थाओं को पार करती हुई लक्ष्य-सिद्धि को प्राप्त करती है। 'नियताप्ति' की अवस्था, जहाँ पाठक को ज्ञात हो जाता है कि फल प्राप्ति निश्चित है, उसे कवि ने छोड़ दिया है। इससे कथानक में कौतूहल की सृष्टि हुई है और काव्य-सौंदर्य बढ़ा है। 'सुदामा-चरित' का आकार खण्डकाव्योचित है। इसमें कथानायक के समस्त कथावृत्त और जातीय जीवन की विस्तृत व्याख्या को प्रस्तुत नहीं किया गया है। कवि ने निर्धन सुदामा के दारिद्रय से सम्बद्ध तीव्र अनुभूतियों और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री की उदात्त भावनाओं को ही व्यंजित किया है। इस क्षेत्र में उसकी सफलता असाधारण है। उसने गणेश-वंदना से अपने इस खण्डकाव्य का श्रीगणेश करके, मूलसंवेद्य से सम्बद्ध कथा को तीव्र गति से आगे बढ़ाया है। मंगलाचरण में ही उसने रचना के प्रतिपाद्य-विषय का संकेत दे दिया है—

सुदामा-चरित / २७ “श्रीगणेश सुमिरन करों, उपजे बुद्धि प्रकाश । सो चरित वरनन करों, जासे दारिद नास ॥” सुदामा के दारिद्रय का नाश हो, यही केन्द्रीय भाव है, जिसे सम्पूर्ण कथा- वृत्त में चित्रित किया गया है । सुदामा की निर्धनता को दूर कराने में उसकी पत्नी सुबुद्धि के योगदान भी अत्यन्त महत्त्व था, जिसकी प्रेरणा से वे द्वारिकापुरी गए । फलतः कवि सुबुद्धि के सबल तर्कों तथा बुद्धि-चातुर्य को समुचित महत्त्व देता हुआ, अन्त में श्रीकृष्ण की भव्य तथा स्तुत्य आदर्श-मैत्री को वाणी देता है । इस प्रकार उसने अपने संक्षिप्त, सुगठित तथा प्रवाहमयी कथा के माध्यम से एक निश्चित उद्देश्य को मुखरित किया है । उसने जीवन के जिस अंग को लिया है, उसकी सर्वांगीण व्याख्या की है । उसके वर्णन सजीव तथा मार्मिक हैं । मर्मस्पर्शी स्थलों पर उसकी भावप्रवणता चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो गई है । सुदामा के दारिद्रय का एक कारुणिक चित्र द्रष्टव्य है— “कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट न चाहति हों दधि दूध मिठौती । × × × या घरतें कबहुँ न गयो पिय, फटो तयौ और टूटी कठौती ॥” सुदामा की दयनीय दशा और श्रीकृष्ण की पावन मैत्री को एक ही छन्द में जिस भावमयता एवं आत्मानुभूति का घना स्पर्श देखकर कवि ने व्यक्त किया है, वह चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो हो गई है— “ऐसे बेहाल बिवाइन सों पग कंटक जाल लगे पुनि जोए । ‘हाय महादुख पायौ सखा ! तुम आए इतै न कितै दिन खोए ॥’ देखि सुदामा की दीन दशा, करुणा करके करुणानिधि रोए । पानी परात को हाथ छुयौ नहीं, नैनन के जल सों पग धोए ॥” कविवर नरोत्तमदास ने कथावस्तु को सर्गों में विभाजित नहीं किया है, उसके मूल में भी कथानक में एकात्मक अन्विति को बनाए रखना है । वे अपने संवेद्य को ही अपना सर्वस्व मानकर, उसी की अभिव्यंजना में अपनी सारी शक्ति व्यय करते हैं । उनकी प्रबन्ध-कल्पना, वस्तु एवं भाव-वर्णन मुख्यतः सुदामा की निर्धनता और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री से सम्बद्ध हैं ।

२८ / सुदामा-चरित 'सुदामा-चरित' में करुण, शांत, अद्भुत, भक्ति आदि अनेक रसों का परिपाक हुआ है, किन्तु सारे खण्डकाव्य पर मित्र-वत्सलता छाई हुई है, जिसे शास्त्रीय दृष्टि से किसी रस का नाम नहीं दिया जा सकता। ऐसी स्थिति में एक रस की प्रधानता के स्थान पर एक केन्द्रीय भाव के प्राधान्य का रसास्वादन किया जा सकता है। सारांशतः 'सुदामा-चरित' में खण्डकाव्य की प्रायः सभी विशेषताएँ मिलती हैं और इसे हिन्दी-साहित्य का एक सफल खण्डकाव्य कहा जा सकता है। सुदामा-चरित का कला-सौष्ठव भाव-पक्ष यदि काव्य की आत्मा है तो कलापक्ष उसका शरीर है। काव्य- पुरुष की आत्मा को सुरक्षित रखने वाले शरीर अर्थात् कलापक्ष के महत्त्व को प्रायः सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है। कलापक्ष से सम्बद्ध उपकरणों में मुख्य हैं---भाषा, वर्णन कुशलता, छन्द-योजना तथा अलंकार-योजना। 'सुदामा-चरित' में व्यंजित भावों की उदात्तता के साथ-साथ कलापक्ष का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है— भाषा—भाषा मुख्यतः ब्रज है, उसमें अवधी, उर्दू, आंचलिक आदि शब्दों का प्रयोग भी यथास्थान हुआ है। इस रचना की ('सुदामा-चरित' की) लोकप्रियता के मूल में उसकी भाषा का वैशिष्ट्य एक प्रधान कारण है। वह सर्वत्र स्वाभा- विक, प्रसादगुण-सम्पन्न, देशकालानुरूप, मधुर-प्रांजल, लोकोक्तियों एवं मुहावरों से युक्त, संघात्मक तथा टकसालीपन के सौन्दर्य को लिए हुए है। उसमें लाक्ष- णिकता, अनुकरणात्मकता, चित्रात्मकता, प्रवाहमयता, व्यंग्यात्मकता आदि गुण भी प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। वह संवेद्य को अधिकाधिक मर्मस्पर्शी बनाने में अपनी सार्थकता समझती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में—"नरोत्तमदास की भाषा बहुत ही परिमार्जित और व्यवस्थित है। बहुतेरे कवियों के समान भरती के शब्द और वाक्य इसमें नहीं हैं।" 'सुदामा-चरित' की भाषा सरल, स्वाभाविक तथा प्रसादगुण-सम्पन्न है। कविवर नरोत्तमदास ने बोलचाल की भाषा को ही साहित्यिक भाषा का सौष्ठव प्रदान कर दिया है। उन्होंने वैसे तो ओज, माधुर्य एवं प्रसाद तीनों गुणों को

सुदामा-चरित / २६ विषयानुसार प्रश्रय दिया है किन्तु प्रसादगुण अपनी स्वच्छता एवं द्रवणशीलता में सभी से आगे बढ़ गया है और वह अन्य गुणों को आत्मसात् करता प्रतीत होता है। वे शब्दों का चयन करते समय देशकाल को दृष्टि में रखते हैं। सुदामा के दारिद्रय का वर्णन करने के लिए वे ग्रामीण शब्दावली – 'जुरतो', 'हठौती', 'टूटो तयौ', 'फूटी कठौती' आदि का और द्वारिकापुरी के अपार वैभव का वर्णन करने के लिए सुसंस्कृत भाषा की शब्दावली—'वसुधा', 'अभिराम', 'सुषमा', 'सन्ताप', 'कनक', 'सुरभी', 'घृत', 'दुति' आदि का प्रयोग करते हैं। अपनी भाषा को सहज तथा बोधगम्य बनाने के लिए वे लोक-प्रचलित विदेशी शब्दों का प्रयोग भी करते हैं। 'अफ़सोस, 'गरीबनवाज' 'सामा', 'लायक' आदि शब्दों का प्रयोग इसी तथ्य की पुष्टि करता है। इसी प्रकार भाषा के सौष्ठव को बढ़ाने वाले अवधी के प्रयोग—'कठौती', 'पंडाइन', 'कोदी सवाँ' आदि भी कम महत्त्व- पूर्ण नहीं हैं। आंचलिक प्रयोगों में 'छूछी छाम' 'पेलि पठौती', लदाय लड़ा' आदि का प्रयोग अत्यन्त प्रभावोत्पादक बन गया है। 'सुदामा-चरित' में प्रयुक्त मुहावरों एवं लोकोक्तियों ने उसकी भाषा की व्यंजना-शक्ति को बढ़ाने में अत्यधिक सहयोग दिया है। इससे वह जन- भाषा के अति निकट पहुँच गई है और संवेद्य अपेक्षाकृत अधिक मार्मिक बन गया है। कवि ने लोक प्रसिद्ध लोकोक्तियों, सूक्तियों तथा मुहावरों का बड़ी निपुणता के साथ प्रयोग किया है। यथा—'जेंइए जो मित्र के तो आपहु जेंवाइए', 'विपति परे पै द्वार मित्र के न जाइए' आदि लोकोक्तियों या सूक्तियों और 'सुख दुख करि दिन काटे ही बनेंगे', 'भेंटे लपटाय हिय' आदि मुहावरों का जैसा सफल एवं सार्थक प्रयोग 'सुदामा-चरित' में मिलता है, वैसा अन्यत्र सरलता से नहीं मिल सकता है। इस कला में कवि की दक्षता सराहनीय है। वह लोकोक्तियों आदि के प्रयोग से अपनी भाषा को टकसाली बनाने में पर्याप्त सफल रहा है। उससे काव्य-सौष्ठव में निखार आया है और भावों की प्रभाव-शक्ति बढ़ी है— “कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती। या घर ते कबहूं न गयौ पिय टूटौ तयौ अरु फूटी कठौती॥” 'सुदामा-चरित' में परिस्थितियों के अनुरूप अनुकरणात्मक, लाक्षणिक तथा

३० / सुदामा-चरित व्यंग्यात्मक प्रयोग देखे जा सकते हैं। अनुकरणात्मक शब्दों में 'जगर-मगर' 'सिसि- यात', 'मिठौती' आदि का प्रयोग अत्यन्त सार्थक है। लाक्षणिक प्रयोगों में कवि- कौशल चरमोत्कर्ष को प्राप्त हो गया है, उससे भावों की मार्मिकता को बल मिला है। वे अत्यन्त प्रभावशाली बन गए हैं— “पानी परात को हाथ छुयौ नहीं, नैनन के जल सों पग धोये ।” कवि हास्य-व्यंग्य संचार करने के लिए व्यंग्योक्तियों का प्रयोग करने में भी सिद्धहस्त है। सुदामा अपने फटे-पुराने कपड़े में बँधे चावल, श्रीकृष्ण को भेंट करने में अति संकोच अनुभव करता है, जिसे वे भाँप लेते हैं और मीठी चुटकियों एवं व्यंग्योक्तियों के प्रयोग का सुअवसर समझकर कह उठते हैं— “आगे चना गुरु मातु दए ते तुम खाए हमें नहीं दीने। स्याम कही मुस्काय सुदामा सों चोरी की बानि में हू जे प्रवीने॥” श्रीकृष्ण सुदामा का अत्यधिक आदर-सत्कार करते हैं, किन्तु जाते समय उसे प्रत्यक्ष रूप में कुछ नहीं देते हैं। इसकी सुदामा पर तीव्र प्रतिक्रिया हुई, उसी को वह व्यंग्यात्मक रूप में व्यंजित करता हुआ कहता है – “हौं आवत नाहीं हुतौ, वाहि पठयो ठेलि। कहिहौं धन सौं जाइके, अब धन धरौ सकेलि॥” ‘सुदामा-चरित’ की भाषा में संगीतात्मकता, चित्रात्मकता, प्रवाहमयता आदि का वैशिष्ट्य भी यत्र-तत्र देखा जा सकता है। इस दिशा में उसका शब्द- चयन सर्वाधिक सहायक रहा है। कवि मधुर-प्रांजल शब्दों; बिम्ब प्रस्तुत करने में समर्थ शब्दावली का प्रयोग करने में बड़ी निपुणता दिखाता है। उससे भाषा वेगमयी, बिम्बात्मक तथा हृदयस्पर्शी बन गई है। वर्णन-कौशल—‘सुदामा-चरित’ का रचयिता वस्तु एवं भाव दोनों के वर्णन में असाधारण सफलता प्राप्त करता है। उसका वर्णन कौशल सुदामा के दारिद्रय चित्रण, श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री के प्रतिष्ठापन और सुदामा के अन्तर्द्वन्द्व को व्यंजित करने में जिस निपुणता का परिचय देता है, वह निःसन्देह सराहनीय है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का यह कथन ‘सुदामा-चरित’ पर पूर्णतः चारितार्थ होता है—‘‘कवि की भावुकता कथा प्रसंगों के मार्मिक स्थलों की पहचान में

सुदामा-चरित / ३१ निहित है। वहा भावुक कहा जा सकता है जो मार्मिक स्थलों को शब्द चित्रों द्वारा अंकित कर सजीव दृश्य उपस्थित कर दे, जिसे पढ़कर पाठक आत्म-विभोर हो जायँ और उसी भाव में डूबने-उतरने लगें।" कविवर नरोत्तमदास ने मार्मिक स्थलों की पहचान और उन्हें शब्द-चित्रों द्वारा सजीव दृश्यों में उपस्थित करने में अपनी गहन अनुभूति तथा भाव प्रवणता को व्यक्त किया है। उसी से इन मार्मिक स्थलों को पढ़ते समय पाठक आत्म-विभोर हो जाते हैं और उन्हीं भावों में डूबने-उतरने लगते हैं। सुदामा की निर्धनता का वे इतना कारुणिक हृदय- विदारक तथा यथार्थ दृश्य प्रस्तुत करते हैं कि पाठकों का हृदय द्रवित हो उठता है - "कोदों सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती। सीत वितीत भयौ सिसियातहि, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती॥ जो जनती न हितू हरि-सौँ, तो काहे को द्वारिका पेलि पठौती। या घर ते कबहूँ न गयौ पिय, टूट्यो तयो अरु फूटी कठौती॥" 'सुदामा-चरित' का दूसरा प्रमुख मार्मिक स्थल श्रीकृष्ण और सुदामा का मार्मिक मिलन है। सुदामा की दयनीय दशा पाठकों के हृदय को जहाँ अत्यधिक द्रवित करती है वहाँ श्रीकृष्ण की उदात्त मैत्री-भावना का दृश्य पाठकों को अलौ- किक आनन्द से आत्मविभोर कर देता है— "ऐसे बेहाल विवाइन सों पग कंटक जाल लगे पुनि जोये। हाय महा दुख पायौ सखा, तुम आये इतै न कितै दिन खोये॥ देखि सुदामा की दीन दसा करुणा करिकै करुणानिधि रोये। पानी परात को हाथ छुऔ नहिं नैनन के जल सों पग धोये॥" कविवर नरोत्तमदास जिस तीसरे मार्मिक स्थल का चयन करते हैं, वह है सुदामा की उस मनः स्थिति का वर्णन जिसमें वह कभी अपनी पत्नी पर और कभी अपने मित्र श्रीकृष्ण की कृपणता पर झुँझलाते हैं— "घर-घर ओढ़त फिरे तनक दही के काज, कहा भयौ जो अब भयौ, हरि को राज समाज।

३२ / सुदामा-चरित हौं आवत नाहीं हुतौ, वाही पठियौ ठलि, कहि हौं धन सों जाइके, अब धन धरौ सकेलि ॥” भाव-वर्णन में ही नहीं, वस्तु-वर्णन में भी कवि कई मर्मस्पर्शी शब्द-चित्र अंकित करता है। वे शब्द-चित्र मुख्यतः द्वारिकापुरी के वैभव और उसके बाद सुदामापुरी के वैभव से सम्बद्ध हैं। श्रीकृष्ण जो अपार वैभव सुदामा को देते हैं, उसे देखकर राजा इन्द्र भी लजा जाते हैं। उसी का एक शब्द-चित्र प्रस्तुत करता हुआ कवि कहता है— कै वह टूटी सी छानी हुती, कहाँ कंचन के सब धाम सुहावत, कै पग में पनही न हुती, कहाँ लै गजराजहु ठाढ़े महावत । भूमि कठोर पै रैन कटै, कहाँ कोमल सेज पै नींद न आवत, कै जुरतौ नहिं कोदों सवाँ, प्रभु के प्रताप ते दाख न भावत ॥” ‘सुदामा-चरित’ का वर्णन कौशल मुख्यतः दो शैलियों में मुखरित हुआ है – वर्णनात्मक शैली और नाटकीय शैली । कथा-प्रसंगों को गतिशीलता प्रदान करने के लिए वर्णनात्मक शैली को और भावपूर्ण मार्मिक स्थलों के लिए नाटकीय शैली को अपनाना कवि अधिक उपयुक्त समझता है। भावपूर्ण स्थलों के चित्रण में कवि का मन विशेष रूप से रमा है और ऐसे स्थल भाव-सम्पदा के अनूठे उदाहरण बन गए हैं। इन स्थलों के कलात्मक सौष्ठव का श्रेय उसकी नाटकीय शैली को दिया जा सकता है। इस शैली के प्रयोग से इस रचना में कौतूहल, रोचकता, प्रभावोत्पादकता तथा मार्मिकता का संचार हुआ है। छन्द-योजना—‘सुदामा-चरित’ में मुख्यतः दोहा, कवित्त, सवैया आदि छन्दों की योजना हुई है। ये छन्द विषय एवं प्रसंग के अनुरूप अपने स्वाभाविक रूप में प्रयुक्त हुए हैं। इन छन्दों में दोहा छन्द का प्रयोग कवि ने वर्णनात्मक प्रसंगों में कथा-विकास को दृष्टि में रखकर किया है। वह कथावस्तु के विविध मोड़ों और आग-पीछे के प्रसंगों को परस्पर जोड़ने के निमित्त इस छन्द के प्रयोग को सर्वाधिक उपयोगी समझता है। कथावृत्त का प्रारम्भ, द्वारिकापुरी में प्रवेश, वहाँ से प्रस्थान और सुदामापुरी में प्रवेश के विभिन्न अवसरों पर यह छन्द विशेषतः प्रयुक्त हुआ है। इस छन्द का सौष्ठव सांकेतिक अभिव्यंजना और

सुदामा-चरित / ३३ कथावस्तु को लघु आकार प्रदान करने में देखा जा सकता है। भावपूर्ण मार्मिक स्थलों की अभिव्यक्ति के निमित्त कवि कवित्त एवं सवैया नामक छन्दों का अधिक प्रयोग करता है। भाव-व्यंजना को उपयुक्त विस्तार देने के लिए इन छन्दों का उपयोग अपेक्षाकृत अधिक समीचीन था। इस रचना के नाटकीय सौष्ठव लाने के लिए सवैया छन्द और परिस्थिति-चित्रण के लिए कवित्त छन्द का प्रयोग भी बहुत उपयुक्त रहा है। वस्तुतः विषय एवं प्रसंग के अनुकूल छन्दों का चयन एवं प्रयोग कवि की सूझ-बूझ का परिचायक है। वह छन्द-शास्त्र से न केवल परिचित है वरन् उसके उपयुक्त उपयोग का भी पारखी है। 'सुदामा-चरित' की छन्द-योजना की कतिपय निजी विशेषताएँ भी उसके महत्त्व को बढ़ाती हैं। कवि ने लय, तुक, यति, गति आदि का प्रयोग कुछ इस प्रकार से किया है कि उसके कवित्व में एक विशिष्ट संगीत, प्रवाह, भावमयता तथा सरसता आ गई है। कवि का छन्द-गठन पर पूर्ण अधिकार है, वह तुक- पूर्ति के लिए न तो शब्दों की अधिक तोड़-मरोड़ करता है और न अनावश्यक शब्दों की भरती करता है। 'सामा', 'मिठौती', 'हठौती' आदि प्रयुक्त तुकें ब्रज- भाषा व्याकरण के अति निकट हैं और छन्द-गठन में उनकी उपयोगिता निर्विवाद है। फलतः इस रचना के छन्दों में पाठकों को भाव-विभोर कर लेने की पर्याप्त क्षमता है। वे अपने संगीत एवं मर्मस्पर्शी भाव-व्यंजना के नाते बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं। पाठक उन्हें बार-बार पढ़ने, कंठस्थ करने तथा उनका रसास्वादन करने में मग्न हो जाता है। सवैया छन्द का एक उत्कृष्ट उदाहरण द्रष्टव्य है - “सीस पगा न झगा तन में प्रभु जानै को आहि बसै केहि ग्रामा। धोती फटी सी लटी दुपटी अरु पायं उपानहु को नहिं सामा ॥ द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक रह्यौ चकि सौं वसुधा अभिरामा। पूछत दीनदयाल को धाम बतावत आपनौ नाम सुदामा ॥” अलंकार-योजना—'सुदामा-चरित' की अलंकार-योजना पूर्णतः स्वाभाविक एवं भावानुकूल है। कवि ने कहीं भी सायास अलंकारों का प्रयोग नहीं किया है; उनका विधान आप-से-आप हो गया है। भाव, लय तथा कथा-प्रसंग के

३४ / सुदामा-चरित अनुसार कवि ने अनुप्रास, यमक, स्वभावोक्ति, परिकरांकुर, उदात्त, सार, सन्देह, रूपक आदि अलंकारों का सहज प्रयोग किया है। लय और गेयता को दृष्टि में रखकर उसने अनुप्रास जैसे अलंकारों को विशेष महत्त्व दिया है। कथा-प्रसंगों तथा परिस्थितियों की प्रभावोत्पादक व्यंजना में परिकुरांकुर अलं- कार का मुख्य रूप से सहयोग लिया गया है। इस रचना में दस से भी अधिक बार यह अलंकार प्रयुक्त हुआ है। इसी प्रकार यमक, उदात्त, सन्देह आदि अलंकारों का सहज प्रयोग भी भावों की अभिव्यंजना में अत्यधिक सहायक रहा है। ये अलंकार कविता-कामिनी के लिए श्रृंगार ही बने हैं, भार नहीं। इनके प्रयोग से काव्य में कहीं भी जटिलता या नीरसता का संचार नहीं हुआ है। सच तो यह है कि 'सुदामा-चरित' स्फूर्त काव्य, है इसमें कहीं भी प्रयत्न पूर्वक अलं- कारों को भरने या लादने का यत्न नहीं किया गया है। कवि ने केवल उन अलंकारों ही का स्वागत किया है जो उसके रचना प्रवाह में आप-से-आप आकर घुल-मिल गए हैं। कतिपय प्रमुख अलंकारों का सौष्ठव द्रष्टव्य है— १. यमक—"हौं आवत नाहीं हुतौ, वाही पठयो ठेलि । कहिहौं धन सौं जाइकै, अब धन धरो सकेलि ॥" २. परिकर—"दीनदयाल को ऐसेई द्वार है दीनन की सुधि लेत सदाई ।" ३. सन्देह—"कहँ वह टूटी सी छानी हुती, कहँ कंचन के सब धाम सुहावत ।" ४. रूपक—"लोचन कमल दुख मोचन कमल भाल ।" ५. स्वभावोक्ति—"टूटी-सी मड़ैया मेरी परी हुती याही ठौर तामें परी दुःख काटैं, कहाँ हेम-धाम री ।" ६. उपमा—"देवता से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं ।" सुदामा-चरित में रस-व्यंजना काव्य-शास्त्र की दृष्टि से हम 'सुदामा-चरित' में करुण, शांत, अद्भुत, भक्ति आदि विविध रसों की व्यंजना खोज सकते हैं और इनमें भक्ति रस को इसका

सुदामा-चरित / ३५ अंगी रस मान सकते हैं। किन्तु इस रचना का निर्माता आदर्श-मैत्री के उदात्त भाव को सर्वोच्च प्राथमिकता देता प्रतीत होता है। यही मित्र वत्सलता का उदात्त भाव इस खण्ड-काव्य का केन्द्रीय भाव है, जिसकी प्रतिष्ठा ही कवि का अभीष्ट है। 'सुदामा-चरित' के प्रारम्भ में कवि सुदामा की दीन-हीन दशा का मर्म- स्पर्शी निरूपण करके पाठकों के हृदय में स्थित करुणभाव को जागृत करता है। सुदामा का दाम्पत्य जीवन करुण रस से परिप्लावित है। पाठक उससे पूर्णतः सहानुभूति रखते हैं। श्रीकृष्ण भी उसकी दयनीय दशा देखकर द्रवित हो जाते हैं— "देखि सुदामा की दीन दशा करुणा करिके करुणानिधि रोये । पानी परात कौ हाथ छुयौ नहिं नैनन के जल सों पग धोए ॥" सुदामा की वैराग्य-भावना, प्रभु-भक्ति, सांसारिक वैभव के प्रति उदा- सीनता आदि के निरूपण में शांत रस की व्यंजना दृष्टिगत होती है। सुदामा का सन्तोष एवं निष्काम भक्ति-भाव पाठकों के निर्वेद स्थायी भाव को जागृत करता है। पाठक शांत-रस का रसास्वादन करने लगते हैं। किन्तु अद्भुत और भक्ति-रस की व्यंजना अपेक्षाकृत अधिक होने से पाठक उन्हीं की ओर आकृष्ट होते प्रतीत होते हैं। ये रस परस्पर विरोधी नहीं कहे जा सकते हैं। अद्भुत- रस का स्थायी भाव विस्मय है और भक्ति-रस का भक्ति । दोनों में चमत्कार या विस्मय का भाव निश्चित रूप से निहित रहता है। "सुदामा-चरित्र' में एक ओर भाग्य का और दूसरी ओर भक्ति का चमत्कार व्यंजित हुआ है। सुदामा की अपार निर्धनता और ऐश्वर्य की कहानी मुख्यतः भाग्य के रज्जू से बंधी हुई है। भाग्य के चमत्कार से ही टूटी-फूटी झोंपड़ी में रहने वाला दरिद्र सुदामा, सोने के भवन में रहने लगता है। कवि इस विस्मयकारी परिवर्तन का निरूपण करता हुआ कहता है— "कै वह टूटी सी छानी हुती, कहं कंचन के सब धाम सुहावत । कै पग में पनही न हुती, कहं गजराजहु ठाढ़े महावत ।

३६ / सुदामा-चरित भूमि कठोर पै रात कटै, कहं कोमल सेज पै नींद न आवत । कै जुरतो नहिं कोदों सवाँ, प्रभु के परताप तें दाख न भावत ॥" 'सुदामा-चरित' में कवि वितर्क, भ्रम, भय आदि संचारी भावों की व्यवस्था करके निश्चय ही अद्भुत-रस की सफल व्यंजना करता है किन्तु यह अद्भुत- रस भक्ति-रस पर अवलम्बित है और अन्त में उसी का अंग बन जाता है । सुदामा को घोर दारिद्र्य से छुटकारा दिलाने तथा अपार धन-वैभव को प्राप्त कराने का श्रेय श्रीकृष्ण की भक्त वत्सलता को ही देना समीचीन है । श्रीकृष्ण करुणानिधान दीनदयाल, भक्त-वत्सल अन्तर्यामी तथा पतित-पावन हैं । दुखियों के दुख को दूर करके उन्हें सुख-शान्ति प्रदान करना ही उनका मुख्य कार्य है । उन्हीं की कृपा से सुदामा का भी उद्धार होता है । फलतः विस्मय-रस का रसा- स्वादन करते-करते पाठक भक्ति-रस में आत्म-विभोर हो जाता है और उसी को इस रचना का अंगीरस माना जा सकता है । 'सुदामा-चरित' की भक्ति-भावना परम्परा से कुछ पृथक् दृष्टिगत होती है। कवि श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप की अपेक्षा मित्रवत्सलता के रूप को अधिक प्रश्रय देता है। श्रीकृष्ण सुदामा का उद्धार अपने भक्त के नाते नहीं वरन् बाल- सखा के रूप में करते हैं। वे मैत्री के उच्च आदर्श को स्थापित करने के लिए अपना सर्वस्व उसे सौंप देना चाहते हैं। उनकी इस आदर्श-मैत्री का निरूपण ही कवि का प्रमुख अभीष्ट लगता है। काव्य-शास्त्र की दृष्टि से मित्रवत्सलता के भाव को चाहे किसी रूप में परिणत न किया जा सके किन्तु 'सुदाम-चरित' में वह पूर्णतः व्याप्त है । कृष्ण-काव्य-परम्परा और सुदामा-चरित कृष्ण-भक्ति-काव्य में श्रीकृष्ण के लोकरंजन रूप को ही अधिक प्रश्रय दिया गया है । उनके लोक रक्षक रूप को बहुत थोड़े कवियों ने प्रस्तुत किया है । मध्यकालीन कवियों ने उनके बाल-रूप तथा तरुण रूप की मनमोहक लीलाओं को अपने ही काव्य का विषय बनाया। उनके महिमामय विराट व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं को प्रायः छोड़ दिया या उसका सांकेतिक वर्णन कर देना ही पर्याप्त

सुदामा-चरित / ३७ समझा। 'महाभारत' एवं 'श्रीमद्भागवत' में उनके महान् व्यक्तित्व की जो असंख्य मणियाँ विकीर्ण मिलती हैं, उन्हें भली प्रकार से संजोने का कार्य अभी शेष है। इस गुरुतर कार्य के एक अंश को पूरा करने का स्तुत्य प्रयास हम 'सुदामा-चरित' में देखते हैं। कविवर नरोत्तमदास ने श्रीकृष्ण के उदात्त मैत्री- आदर्श को अपनी इस रचना में प्रतिष्ठित किया है। निस्सन्देह 'सुदामा-चरित' की पूर्ववर्त्ती एवं परवर्त्ती काव्य-रचनाओं में सुदामा के दारिद्र्य-भंजन की कथा को लेकर अनेक कवियों ने लेखनी उठाई। किन्तु इस दिशा में जो सफलता कविवर नरोत्तमदास को मिली वह अन्य किसी कवि को नहीं। सुदामा के दारिद्र्य-वर्णन और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का मर्मस्पर्शी वर्णन करने में 'सुदामा-चरित' के निर्माता अपूर्व सफलता गौरवमयी है। उसी से यह काव्य युग-युगों तक पाठकों के हृदय-तल को स्पर्श करता रहेगा। और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का सन्देश देता रहेगा। कविवर नरोत्तमदास से पूर्व महाकवि सूरदास ने निर्धन सुदामा की कथा को अपने 'सूरसागर' के बीस पदों में चित्रित किया है, किन्तु इस भावपूर्ण प्रसंग को वे अधिक मार्मिकता प्रदान नहीं कर सके हैं। श्रीकृष्ण के उदात्त मैत्री- आदर्श को प्रतिष्ठित करना उनका अभीष्ट भी प्रतीत नहीं होता है। अष्टछाप के दूसरे प्रसिद्ध कवि नन्ददास ने भी 'सुदामा-चरित' का सृजन किया था, किन्तु वह अनुपलब्ध है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह उनकी 'सम्पूर्ण भाषा भागवत' नामक अप्राप्य रचना का अंश है। नरोत्तमदास कृत 'सुदामा-चरित' अपने पूर्व- वर्त्ती सुदामा विषयक काव्य-ग्रन्थों से निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ रचना है। नरोत्तमदास के परवर्त्ती अनेक कवियों ने भी इस क्षेत्र में कार्य किया, यथा—सं० १६८३ के आसपास आलम कवि ने 'सुदामा-चरित' की रचना रेखता में की। यह केवल ६० पद्यों का लघु काव्य है। सं० १७३१ में के लग- भग कवि कालीराम ने 'सुदामा-चरित' का सृजन ब्रजभाषा में किया। अठा- रहवीं शताब्दी में जिन कवियों ने सुदामा-चरित से सम्बद्ध काव्य-रचनाओं का सृजन किया, उनमें माखन, खण्डन, वीर आदि कवियों के नाम उल्लेखनीय हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में इस परम्परा को विकास प्रदान करने वाले प्रमुख कवि

३८ / सुदामा-चरित हैं—गोपाल, प्राणनाथ, बालकदास फकीर आदि। बीसवीं शताब्दी में सुदामा विषयक रचनाओं का प्रणयन करने वाले कवियों में हलधर, महाराजदास तथा भूधर के नाम प्रसिद्ध हैं। इस परम्परा को हिन्दी-कवियों ने ही नहीं वरन् पंजाबी के कवियों ने भी प्रोत्साहन दिया; जिनमें साहिबदास, हृदयराम, राम- दास मिश्र आदि कवियों का नाम उल्लेखनीय हैं। किन्तु सुदामा विषयक काव्य-कृतियों की इस दीर्घ परम्परा में नरोत्तमदास का 'सुदामा-चरित' आज भी वेजोड़ काव्य-रचना है। इसकी भाव-व्यंजना एवं कलासौष्ठव अत्यन्त प्रभावोत्पादक है। इसमें प्रतिष्ठित श्रीकृष्ण की आदर्शमैत्री, कृष्ण-काव्य में तो क्या सारे हिन्दी-साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। उदात्त मैत्री-भावना के ऐसे भव्य दृष्टान्त, विश्व-साहित्य में इने-गिने ही मिलेंगे। वस्तुतः कविवर नरोत्तमदास विरचित 'सुदामा-चरित' एक अमर काव्य-रचना है। □□□

सुदामा-चरित (मूल पाठ) (दोहा) श्रीगनेस सुमिर करौं, उपजै बुद्धि प्रकास । सो चरित्र वरनन करी, जातैं दारिद नास ॥१॥ ज्यों गंगा-जल-पान तें, पावत पद निरवान । त्यों सिंधुर-मुख-वात तें, मूढ़ होत बुधिवान ॥२॥ कृस्न-मित्र कइ जन्म को, ताको वरनन कीन्ह । सुख संपति माया मिलै, सो उपदेश जु दीन्ह ॥३॥ बिप्र सुदामा बसत हो, सदा आपने धाम । भीख माँगि भोजन करैं, हिये जपत हरि-नाम ॥४॥ ताकी घरनी पतिब्रता, गहे वेद की रीति । सलज सुसील सुबुद्धि अति, पति-सेवा सौं प्रीति ॥५॥ कह्यौ सुदामा एक दिन, ‘कृस्न हमारे मित्र’ । करत रहति उपदेश तिय, ऐसो परम-विचित्र ॥६॥ स्त्री महादानि जिनके हितू, जदु-कुल-कैरव-चंद । ते दारिद-संताप तें, रहैं न किमि निरद्वंद ॥७॥ कह्यौ सुदामा ‘बाम ! सुने, वृथा और सब भोग । सत्यभजन भगवान को, धर्म-सहित जप-जोग’ ॥८॥

४० / सुदामा-चरित स्त्री (कवित्त) लोचन-कमल दुख-मोचन तिलक भाल, स्रवननि कुंडल मुकुट धरे माथ हैं ओढ़े पीत-बसन गरे मैं बैजयन्ती-माल, संख चक्र गदा और पदम लिए हाथ हैं । कहत नरोत्तम संदीपनि गुरू के पास, तुम ही कहत हम पढ़े एक साथ हैं । द्वारिका के गए हरि दारिद हरेंगे पिय, द्वारिका के नाथ वै अनाथन के नाथ हैं ॥६॥ (सवैया) सुदामा सिच्छक हौं सिगरे जग को तिय, ताको कहा, अब देति है सिच्छा । जे तप कै परलोक सुधारत, संपति की तिन नहिं इच्छा ॥ मेरे हिते हरि के पद-पंकज, वार हजार लै देखु परिच्छा । औरन को धन चाहिय बावरि, बांभन को धन केवल भिच्छा ॥१०॥ स्त्री दानी बड़े तिहुँ लोकन में, जग जीवत नाम सदा जिनको लै । दीनन की सुधि लेत भली विधि, सिद्धि करौ पिय मेरो मतो लै ॥ दीनदयाल के द्वार न जात सो, और के द्वार पै दीन ह्वै बोलै । श्रीजदुनाथ-से जाके हितू, सो तिहूं पन क्यों कन माँगत डोलै ॥११॥ सुदामा छत्रिन के प्रन जुद्ध, जुवा, सजि वाजि, चढ़ें गजराजन ही । बैस को बानिज और कृषि, प्रन सूद्र को सेवन-साजन ही ॥

सुदामा-चरित / ४१ विप्रन को प्रन है जु यही सुख संपति सों कछु काज नहीं। कै पढ़िबो, कै तपोधन है, कन माँगत बाँभनै लाज नहीं ॥१२॥ स्त्री कोदो सवाँ जुरतो भरि पेट, न चाहति हौं दधि दूध मिठौती ॥ सीत बितीत गयौ सिसियातहिं, हौं हठती पै तुम्हें न हठौती । जौ जनती न हितू हरि सों तुम्हें काहे का द्वारिका पेलि पठौती । या घर तें न गयो कबहुँ पिय ! टूटौ तवा अरु फूटी कठौती ॥१३॥ सुदामा छाँड़ि सबै जक तोहि लगी बक, आठहुँ जाम यहै जक ठानी । जातहिं दैहैं लदाय लड़ा भरि लैहौं लदाय यहै जिय जानी ॥ पावैं कहाँ तें अटारी अटा, जिनके विधि दीन्हीं है टूटी-सी छानी । जो पै दरिद्र लिखो है ललाट तौ, काहू-पै मेटि न जात अजानी ॥१४॥ स्त्री पूरन पैज करी प्रह्लाद की, खंभ सों बाँध्यो पिता जिहि बेरे । द्रौपदी ध्यान धर्यौ जबहीं, तबहीं पट-कोट लगे लगे चहुँ फेरे । ग्राह तें छूटि गयंद गयौ पिय ! है हरि को निहचै जिय मेरे । ऐसे दरिद्र हजार हरैं वै, कृपानिधि लोचन-कोर के हेरे ॥१५॥ सुदामा चक्कवै चौंकि रहे चकि-से, तहाँ भूले-से भूप कितेक गनाऊँ । देव गंधर्व और किन्नर जच्छ-से, साँझ लौं देखे खरे जिहि ठाऊँ ॥ तैं दरबार बिलोक्यौ नहीं अब तोहि कहा कहिकै समुझाऊँ । रोकिए लोकन के मुखिया, तहँ हौं दुखिया किमि पैठन पाऊँ ॥१६॥ स्त्री भूले से भूप अनेक खरे रहौ ठाढ़े रहौ तिमि चक्कवै भारी । देव गंधर्व और किन्नर जच्छ-से रोके जे लोकन के अधिकारी ॥

४२ / सुदामा-चरित अंतरजामी वे आपुहि जानिहैं, मानौ यहै सिख लेहु हमारी । द्वारिकानाथ के द्वार गए सबतें पहिले सुधि लैहैं तुम्हारी ॥१७॥ सुदामा दीनदयाल को ऐसोई द्वार है, दीनन की सुधि लेति सदाई । द्रौपदी तें, गज तें, प्रह्लाद तें, जानि परा न विलंब लगाई ॥ याहि तें भावत मो-मन दीनता, जौ निबहैं निबही जस आई । जौ ब्रजराज सों प्रीति नहीं, केहि काज सुरेसहु की ठकुराई ॥१८॥ (कवित्त) स्त्री फाटे पट टूटी छानि खायौ भीख माँगि आनि, बिना जग्य बिमुख रहत देव-पित्रई । वै हैं दीनबन्धु दुखी देखिकै दयालु ह्वैहैं, दैहैं कछु भलो, सो हौं जानत अगत्रई ॥ द्वारिका लौं जात पिय ! केतौ अलसात तुम, काहे कौ लजात, भई कौन-सी विचित्रई । जौ पै सब जन्म या दरिद्र ही सतायौ तौ पे, कौन काज आइहैं कृपानिधि की मित्रई ॥१६॥ सुदामा तैं तो कही नीकी सुनि बात हित-ही की, यही रीति मित्रई की नित प्रीति सरसाइए । मित्र के तें चित्त चाहिए परस्पर, मित्र के जो जेंइए तो आपहू जेंवाइए ॥ वै हैं महाराज जोरि बैठत समाज भूप, तहाँ यदि रूप जाइ कहा सकुचाइए ।

सुदामा-चरित / ४३ सुख दुख करि दिन काटे ही बनैंगे, भूलि बिपति परे पै द्वार मित्र के न जाइए ॥२०॥ स्त्री विप्र के भगत हरि जगत-बिदित-बंधु, लेते सब ही की सुधि ऐसे महादानि हैं। पढ़े एक चटसार कही तुम कैयों बार, लोचन अपार वै तुम्हें न पहिचानिहैं ? एक दीनबन्धु, कृपासिन्धु फेरि गुरुबन्धु, तुम-सम कौन दीन जाकौ जिय जानिहैं ? नाम लेत चौगुनी, गए तें द्वार सौगुनी सो, देखत सहस्र गुनी प्रीति प्रभु मानिहैं ॥२१॥ (सवैया) सुदामा प्रीति मैं चूक न है उनके, हरि मों मिलिहैं उठि कंठ लगायकै । द्वार गये कछु दैहैं पै दैहैं वे, द्वारिकानाथजू हैं सब लायकै ॥ या विधि बीति गई पन द्वै, अब तौ पहुँचौ बिरधापन आयकै । जीवन केतौ है जाके लिए, हरि सों अब होहुँ कनावड़ौ जायकै ॥२२॥ स्त्री हूजे कनावड़ौ बार हजार-लौं, जौ हितू दीनदयाल-सों पाइए । तीनहुँ लोक के ठाकुर है, तिनके दरबार न जात लजाइए ॥ मेरी कही जिय में धरिके पिय, भूलि न और प्रसंग चलाइए । और के द्वार सा द्वार कहा पिय ! द्वारिकानाथ के द्वार सिधाइए ॥२३॥

४४ / सुदामा-चरित (सवैया) सुदामा द्वारिका जाहु जू द्वारिका जाहु जू, आठहु जाम यहै जक तेरे । जौ न कहौ करिए तो बड़ो दुख, जैए कहाँ अपनी गति हेरे ॥ द्वार खरे प्रभु के छरिया तहँ भूपति जान न पावत नेरे । पांच सुपारी, तैं देख विचारिकै भेंट को चारि न चाउर मेरे ॥२४॥ (दोहा) यह सुनिकै तब ब्राह्मनी, गई परोसिनि-पास । पाव-सेर चाउर लिए, आई सहित-हुलास ॥२५॥ सिद्धि करी गनपति सुमिरि, वाँधि दुपटिया-खूँट । मांगत खात चलै तहाँ, मारग बाली-बूट ॥२६॥ तीन दिवस चलि विप्र के, दूखि उठे जब पाँय । एक ठौर सोए कहूँ, घास-प्यार बिछाय ॥२७॥ अंतरजामी आपु हरि, जानि भगत की पीर । सोवत लै ठाढ़ो कियो, नदी गोमती-तीर ॥२८॥ प्रात गोमती-दरस तें, अति प्रसन्न भो चित्त । बिप्र तहाँ असनान करि, कीन्हों नित्त-निमित्त ॥२९॥ भाल तिलक घसिकै दियौ, गही सुमिरिनी हाथ । देखि दिव्य द्वारावती, भयौ अनाथ सनाथ ॥३०॥ (कवित्त) दीठि चकचौंधि गई देखत सुबर्नमई, एक तें सरस एक द्वारिका के भौन हैं। पूछे बिन कोऊ कहूँ काहू सों न करै बात, देवता-से बैठे सब साधि-साधि मौन हैं ॥ देखत सुदामैं धाय पौरजन गहे पाय, “कृपा करि कहौ बिप्र कहाँ कीन्ह गौन हैं ?”