भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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पृष्ठ 28

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ १६ श्रवनू लै जाइ करि नाद कौ लै डारै पासि, नैनवा लै जाइ करि रूप वसि कर्यौ है । नथुवा लै जाइ करि बहुत सुंघावै फूल, रसनू लै जाइ करि स्वाद मन हर्यौ है ॥ चरनू लै जाइ करि नारी सों सपर्श करै, सुन्दर कोऊक साध ठगन तें डर्यौ है । काम ठग क्रोध ठग लोभ ठग मोह ठग, ठगन की नगरी मैं जीव आइ पर्यौ है ॥११॥ पायौ है मनुष देह औसर बन्यौ है आइ, ऐसी देह बार बार कहौ कहां पाइये । भूलत है बावरे ! तूं अबकै सयानौ होइ, रतन अमोल यह काहे कौ ठगाइये ॥ समुझि विचारि करि ठगन कौ संग त्यागि, ठगा बाजी देखि कहुं मन न डुलाइये । सुन्दर कहत तोहि अब सावधान होइ, हरि कौ भजन करि हरि मैं समाइये ॥१२॥ (११) पासि-पाश, फांसी बंधन । रसनू-जीभ । सपर्श-स्पर्श । वाद-सुन्दर शब्द । (१२) औसर-अवसर । सयानौ-बुद्धिमान ।