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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ १६ श्रवनू लै जाइ करि नाद कौ लै डारै पासि, नैनवा लै जाइ करि रूप वसि कर्यौ है । नथुवा लै जाइ करि बहुत सुंघावै फूल, रसनू लै जाइ करि स्वाद मन हर्यौ है ॥ चरनू लै जाइ करि नारी सों सपर्श करै, सुन्दर कोऊक साध ठगन तें डर्यौ है । काम ठग क्रोध ठग लोभ ठग मोह ठग, ठगन की नगरी मैं जीव आइ पर्यौ है ॥११॥ पायौ है मनुष देह औसर बन्यौ है आइ, ऐसी देह बार बार कहौ कहां पाइये । भूलत है बावरे ! तूं अबकै सयानौ होइ, रतन अमोल यह काहे कौ ठगाइये ॥ समुझि विचारि करि ठगन कौ संग त्यागि, ठगा बाजी देखि कहुं मन न डुलाइये । सुन्दर कहत तोहि अब सावधान होइ, हरि कौ भजन करि हरि मैं समाइये ॥१२॥ (११) पासि-पाश, फांसी बंधन । रसनू-जीभ । सपर्श-स्पर्श । वाद-सुन्दर शब्द । (१२) औसर-अवसर । सयानौ-बुद्धिमान ।

२० ] ।। सुन्दर विलास ।। घरी घरी घटत छीजत जात छिन छिन, भीजत ही गरि जात माटी कौ सौ ढेल है । मुक्ति हू कै द्वारे आइ सावधान क्यों न होई, वार वार चढत न “त्रिया कौ सौ तेल है” ॥ करि लै सुकृत हरि भजन अखड उर, याही मैं अन्तर परै यामैं ब्रह्म मेल है । मनुष जन्म पाउ जीति भावै हारि अब, सुन्दर कहत यामैं जूवा कौ सौ खेल है ॥१३॥ जोवन कौ गयौ राज और सब भयौ साज, आपुनि दुहाई फेरि दामामौ वजायौ है । लकुटी हथियार लिये नैनन की ढाल दीये, सेत वार भये ताकौ तंबू सौ तनायौ है ॥ दशन गये सु मानौ, दरवान दूरि कीये, झींगरी परी सु औरै बिछौना बिछायौ है । सीस कर कंपत सु सुन्दर निकार्यौ रिपु, देषत ही देषत बुढापौ दौरि आयौ है ॥१४॥ (१३) सुकृत-सत्कर्म । और-भेद, दूरी । भावै-चाहे । (१४) सेतवार-सफेद बाल । दशन, दात । झींगरी परी-चमड़ी सिकुड़ गई ।

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ २१ ईंदव छंद घीच तुचा कटि है लटकी, कचऊ पलटे अजहू रत वामी । दत भया मुख के उखरे, नषरे न गये सुखरौ खर कामी ॥ कपति देह सनेह सु दपति, सपति झपति है निस जामी । सुन्दर अन्त हु भौन तज्यौ, “न भज्यो भगवत सु लौन हरामी ।१५। देह घटी पग भूमि मडै नहि, औ लटिया पुनि हाथ लईजू । आंखिहु नाक परै मुख तै जल, सीस हलै कटि घीच नईजू ॥ ईश्वर कौ कबहू न सभारत, दुख परै तब त्राहि दई जू । सुन्दर तौहु बिषै सुख बछत, “घोरे गये पै बगै न गई जू” ॥१६॥ (१५) घीच-गदन । तुचा त्वचा, चमडी । कच शिर के बाल । वामी-स्त्री । रत-आसक्त । भया-भैया । सूखरे-पूरे । खर-गधा । झपति है-जपता है । निसजामी-रात दिन । भौन-भवन, शरीरका घर । लौनहरामी-नमकहरामी । (१६) बगै-पशुओ के स्थान पर उडने वाली मक्खी ।

२२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ पाइ अमोलक देह इहै नर, क्यौं न बिचार करै दिल अन्दर । कामहु क्रोधहु लोभहु मोह हु, लूटत है दस हू दिसि दुर्दर ॥ तूं अब बाछत है सुरलोक हि, कालहु पाड परै सु पुरदर । छाडि कुबुद्धि सुबुद्धि हृदै धरि, "आतमराम भजै किन सुन्दर" ॥१७॥ इन्द्रिय के सुख मानत हैं शठ, याहित तै बहुते दुख पावै । ज्यौं जल मैं झष मास हि लीलत, स्वाद बध्यो जल बाहरि आवै ॥ ज्यौं कपि मूठि न छाडत है, रसना बस वदि पर्यो बिललावै । सुन्दर बर्षा पहिलै न सभारत, "जो गुर पाट सु कान विंधावै" ॥ १८ ॥ कौन कुबुद्धि भई घट अंतर, तू अपने प्रभु सों मन चोरै । (१७) दुर्दर-द्वन्द्व । पुरंदर-इन्द्र । किन-क्यों नहीं । (१८) झष-मछली। लीलत-खाने के लिए । गुर-गुरु ।

॥ उपदेश चितावनी को अग ॥ [ २३ भूलि गयौ विषया सुख मैं गठ, लालच लागि रह्यौ अति थोरै ॥ ज्यौ कोऊ कचन छार मिलावत, लेकरि पाथर सौ नग फोरै । सुन्दर या नर देह अमोलिक, तीर लगी नवका कत वोरै ॥१६॥ देषित के नर सोभित हैं जैसे, आहि अनूपम केरि कौ खंभा । भीतर तौ कुछ सार नही पुनि, ऊपर छीलक अवर दभा ॥ बोलत है पर नाही कछू सुधि, ज्यौ बबयारि तैं बाजत कुम्भा । रूसि रहै कपि ज्यौं छिन माहिमु, याहि तै सुन्दर होत अचभा ॥२०॥ देषत के नर दीसत हैं पर, लक्षन तौ पसु के सबही है । बोलत चालत पीवत खात सु, वै घर वै बन जात सही है ॥ (१६) छार-राख । नग-हीरा मोती । कत-क्यो । वोरै-डुबाता है । (२०) केरि-केला । अवर-दभा-आडवर । बवियारि- फूंक । कुम्भा-घडा ।

२४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ प्रात गये रजनी फिर आवत, सुन्दर यौ नित भार वही है ! और तो लक्षण आइ मिलै सब, एक कमी सिर शृङ्ग नही है ॥२१॥ प्रेत भयौ कि पिशाच भयौ कि, निशाचर सौ जितही तित डोलै । तूं अपनी सुधि भूलि गयौ, मुख तै कछु और को और ई बोलै ॥ भोई उपाड करै जु मरै पचि, बधन तौ कवहू नही खोलै । सुन्दर जा तन मैं हरि पावत, सो तन नाश कियौ मति भोलै ॥२२॥ पेट ते बाहिर होत हि बालक, आड कें मात पयोधर पीनीं । मोह बढ़यौ दिन ही दिन औग, तरुन्न भयौ त्रिय के रस भीनीं ॥ पुत्र पडन बढ्यौ परिवार मु, ऐसो ही भाति गये पन तीनों । सुन्दर राम कौ नाम विसारिन्, आपुहि आपकौ वधन कीनीं ॥२३॥ (२३) पयोधर-स्तन । तरुन्न-तरुण, जवान । त्रिय- स्त्री । पडन पौत्र, पोता । पन तीनों-तीनों अवस्था ।

॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ [ २५ मात पिता सुत भाइ बध्यौ, जुवती के कहे कहा कान करे है । चोरी करै बटमारी करै किरषी बनजी कर पेट भरै है ॥ शीत सहै सिर घाम सहै, कहि सुन्दर सो रन माहि मरै है । वाध रह्यौ ममता सब सौ नर, ताहि तैं बाध्यौ ई बाँध्यो फिरै है ॥२४॥ तू ठगि कै धन और कौ ल्यावत, तेरेऊ तौ घर औरई फोरै । आगि लगै सबही जरि जाइ सु, तू दमरी दमरी कर जोरै ॥ हाकिम कौ डर नाहि न सूझत, सुन्दर एक हि वार निचोरै । तू षरचै नहिं आपु न षाइ सु, “तेरी ही चातुरी तोहि ले बोरै” ॥२५॥ (२४) जुवती-युवती । किरषी-खेती । बनजी-व्यापार । (२५) चातुरी-चतुराई ।

२६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मनहर छंद । करत प्रपंच इनि पंचनि कैं वसि पर्यौ, परदारा रत भै न आनत बुराई कौ । पर धन हर पर जीव की करत घात, मद्य मास षाइ लव लेस न भलाई कौ ॥ होइगो हिसाब तब मुषतैं न आवै ज्वाब, सुन्दर कहत लेषा लेत राई राई कौ । इहा तैं किये बिलास जम की न तोहि त्रास, उहातौ न व्है है कछु राज पोपाबाई कौ ॥२६॥ दुनिया कौ दौडता है औरति कौ लोडता है, औजूद कौ मोडता है बटोही सराइ का । मुरगी कौ मोसता है बकरी कौ रोसता है, गरीबू कौ शोसता है बेमिहर गाइ का ॥ जुलम कौ करता है धनी सौ न डरता है, दोजग कौ भरता है खजाना बलाइ का । (२६) प्रपच-जंजाल । परदारा-पराई स्त्री । भै-भय । घात-हत्या । बिलास-भोग विलास । त्रास-डर । पोपाबाई को राज-पोल का राज्य ।

॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ [ २७ होइगा हिसाव तब आवैगा न ज्वाव कछु, सुन्दर कहत गुन्हैगार है खुदाइ का ॥२७॥ कर कर आयौ जब घर घर काट्यौ नार, भर भर बाज्यौ ढोल घर घर जान्यौ है । दर दर दौर्यौ जाइ नर नर आगै दीन, बर बर बकत न नेक अलसान्यौ है ॥ सर सर सोधै धन तर तर तोरै पात, जर जर काटत अधिक मोद मान्यौ है । फर फर फूल्यौ फिरै डर डरपै न मूढ, हर हर हसत न सुन्दर सकान्यौ है ।२८।।। जनम सिरानौ जाइ भजन बिमुख शठ, काहे कौ भवन कूप बिन मीच मरि है । ग्रहित अविद्या जानि शुक नलिनी ज्यौ मूढ, करम विकरम करत नहि डरि है । (२७) लोड ता है-भोगता है । औजूद-शरीर । बेमिहर- निर्दय । दोजग-दोजख, नर्क । बलाई का-पापो का । गुन्हैगार-अपराधी । धनी-स्वामी, परमेश्वर । (२८) कर कर आयो-पाप पुण्य करके जन्म लिया । नार-नाभिनात । भर-भर भड भड । दर दर-घर घर के दरवाजे । बर वर-बड वड । सर-सर सोधै-सूत-सूत कर इकट्ठा करे । तर तर-तरड तरड । जर जर-जरड-जरड । मोद-आनद ।

२८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ आपु ही तै जात अध नरकनि बार बार, अजहु न शक मन माहि अव करि है । दुख कौ समूह अवलोकिकै न त्रास होइ, सुन्दर कहत नर नागपासि परि है ॥२६॥ जग मग पग तजि सजि भजि राम नाम, काम कौ न तन मन घेर घेर मारिये । झूठ मूठ हठ त्यागि जागि भागि सुनि पुनि, गुनि ग्यान आन आन वारि वारि डारिये ॥ गहि ताहि जाहि शेष ईश शीस सुर नर, और बात हेत तात फेरि फेरि जारिये । सुन्दर दरद धोइ धोइ धोइ बार बार, सार सग रग अग हेरि हेरि धारिये ॥३०॥ झूठौ जग ऐन सुन नित्य गुरु बैन देखे, आपने हु नैन तोऊ अध रहै ज्वानी मे । केते राव राजा रक भये रहे चलि गये, मिलि गये धूर माहि आये ते कहानी मं । (२६) जनम-जीवन । सिरानो जाय-बीत रहा है । मीच-मौत । गहित-अविद्या-अज्ञान ग्रस्त । विकरम-विकर्म, पापकर्म । नागपास-संसार का फदा । (३०) जगमग पग-संसारी मार्ग पर चलना । ज्ञान आन ज्ञान ले । आन-और बातें । हेत-प्रेम । दरद-दुख । सार सग-सत्संग । हेरि हेरि-तलाश कर कर ।

।। उपदेश चितावनी को अग ।। [ २६ सुन्दर कहत अब ताहि न सुरत आवे, चेते क्यो न मूढ चित लाय हिरदानी मे । भूले जन दाव जात लोह को सो ताव जात, आप जात ऐसे जैसे नाव जात पानी मे ।।३१।। डुमिला छंद हठ योग धरौ तन जात भिया, हरि नाम विना मुख धूर परै । शठ सोक हरौ छन गात किया, चरि चाम दिना भुष पूरि जरै ॥ भठ भोग परौ गन पात धिया, अरि काम किना सुख भूरि मरै । मठ रोग करौ घन घात हिया, परि राम तिना दुख दूरि करै ।।३२।। (३१) ऐन-ठीक से । ज्वानी-जवानी । रक-निर्धन । सुरत-ध्यान । हिरदानी-हृदय । (३२) भिया-अरे भाई। तन जात-जीव।-जा रहा है । शोक-चिंता । छन गात क्रिया-शरीर क्षणभंगुर है । चाम-चमडी या शरीर । चरि-परिवर्तनशील है । दिना भुष- आयु के दिन भोगकर । करि जरै-भस्म होगा । भठ भोग परो-भोगो की भट्टी मे पडा है । गन-गण, विषय समुदाय। खात-धिया-वृद्धि को खा रहे है । अरि काम किना-शत्रु का मो काम कर रहे है । मठ-घर बार परिवार को । रोग

३० ] ।। सुन्दर विलास ।। गुरु ग्यान गहै अति होइ सुखी, मन मोह तजै सब काज सरै । धुर ध्यान रहै पति खोइ मुखी, रन लोह बजै तब लाज परै ॥ सुरतान उहै हति दोइ 'रुखी, तन.छोह सजै अब आज मरै । पुरथान लहै मति धोइ दुखी, जन वोह रजै जब राज करै ॥३३॥ इति उपदेश चितावनी को अग सम्पूर्ण करो-व्याधि समझो । घन-घात हिया-हृदय पर गहरी चोट करो । (३३) धुर-दृढ । पति-सासारिक प्रतिष्ठा । खोइ- याग कर । मुखी-गुरुमुखी है । रन लोह बजै-विघ्न बाधाओ ने युद्ध करे । तन छोह तजे-देह का मोह छोड दे । अब नाज मरे-मरने जीनेदी चिन्ता न करे । पुरथान लहै-परम पद प्राप्त करे । मति धोइ-बुद्धि को शुद्ध करे ।

॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ३१ अथ काल चितावनी को अंग ॥२॥ इन्दव छन्द मन्दिर माल विलाइत है, गज ऊट दमामे दिना इक दो है । तातहु मात त्रिया सुत बधव, देषि धौ पामर होत बिछोहै ॥ झूठ प्रपंच सौ गचि रह्यौ शठ, काठ की पूतरि ज्यौ कपि मो है । मेरि ही मेरि करै नित सुन्दर, आँखि लगै कहि कौनको को है ॥१॥ ये मेरे देश बिलाइत है गज, ये मेरे मन्दिर या मेरी थाती । ये मेरे मात पिता पुनि बधव, ये मेरे पूत सु ये मेरे नाती ॥ ये मेरी काँमनि केलि करै नित, ये मेरे सेवक है दिन राती । सुन्दर वैसे हि छाडि गयौ सब, तेल जर्र्यौ रु बुझी जब बाती ॥२॥ तैं दिन च्यारि बिराम लियौ शठ, तेरै कहै कछू व्है गई तेरी । जैसे हि बाप दादा गये छाडि सु, तैसेही तू तजि है पल फेरी ॥

३२ ] ।। सुन्दर विलास ।। मारि है काल चपेटि अचानक, होइ घरी माहि राख की ढेरी । सुन्दर ले न चलै कछु सग सु, भूलि कहै नर मेरी ही मेरी ॥३॥ कै यह देह जराइ कै छार, किया कि किया कि किया कि किया है । कै यह देह जमी महि षोदि, दिया कि दिया कि दिया कि दिया है ॥ कै यह देह रहै दिन चारि, जिया कि जिया कि जिया कि जिया है । दर काल अचानक आइ, लिया कि लिया कि लिया कि लिया है ॥४॥ त सदा उपदेश बतावत, केश सबै सिर शेत भये हैं । ममता अजहू नही छाडत, मौत हू आइ सदेश दिये हैं ॥ ज कि काल्हि चलै उठि मुरिख, तेरे ही देखत केते गये हैं । दर क्यों नहिं राम सभारत, या जग मैं कहि कौन रहे हैं ॥५॥ मनेह न छाडत है नर, ानत है शठ है थिर येहा ।

॥ काल चितावनी को अग ॥ [ ३३ छीजत जाइ घटै दिन ही दिन, दीसत है घट कौ नित छेहा ॥ काल अचानक आइ गहै कर, ढाहि गिराइ करै तन खेहा । सुन्दर जानि इहै निहचै धरि, एक निरंजन सौ करि नेहा ॥६॥ तू कछु और बिचारत है नर, तेरौ बिचार धर्यौ ई रहैगौ । कोटि उपाइ करै धन कै हित, भाग लिख्यौ तितनौ ई लहैगौ ॥ भोर कि साझ घरी पल माझसु, काल अचानक आइ गहैगो । राम भज्यौ न कियौ कछु सुकृत, सुन्दर यौं पछताइ कहैगौ ॥७॥ भूल गयौ हरि नाम कौ तू, शठ, देखि धौं कौन सयोग बन्यौ है । काल अचानक आइ गहै कठ, पेखि धौं झूठौ सौ तानो तन्यौ है ॥ छार करै सब चामकौ लूटै, अनादि कौ ऐसे हि जीव हन्यौ है । कोऊ न होत सहाइ कौं कूटै, अनादि कौ मुन्दर यासी सन्यौ है ॥८॥

३४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ बीत गये पिछले सबही दिन, आवत है अगिले दिन नेरे । काल महा बलवत बडौ रिपु, साधि रह्यौ सिर ऊपरि तेरे ॥ एक घरी महि मारि गिरावत, लागत ताहि कछू नहि बेरे । सुन्दर सत पुकारि कहैं सब, हू पुनि तोहि कहू अब टेरे ॥६॥ सोइ रह्यौ कहा गाफिल व्है करि, तो सिर ऊपर काल दहारे । धामस धूमस लागि रह्यौ शठ, आइ अचानक तोहि पछारे ॥ ज्यौं वन मैं मृग कूदत फादत, चित्रक लै नख सौ उर फारे । सुन्दर काल डरै जिहि के डर, ता प्रभुकौ कह क्यो न सभारे ॥१०॥ (१०) धामस धूमस-धूमधाम मे । चित्रक-चीता । (११) मूड ही मूड-सिर ही सिर । भराभर वाजे-आपस मे टकराते है, फूटने लगते है ।

॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ३५ चेतत क्यौ न अचेतन १ ऊघ न, काल सदा सिर ऊपरि गाजै । रोकि रहै गढ के सब द्वारनि, तू तब कौन गली होइ भाजै ॥ आइ अचानक केश गहै जब, पाकरि कै पुनि तोहि झुलाजै । सुन्दर कौन सहाइ करै जब, मूडहि मूड भराभरि बाजै ॥११॥ तू अति गाफिल होइ रह्यौ शठ, कुंजर ज्यौ कछु शक न आनै । माइ नही तन मै अपने बल, मत्त भयौ विषया सुख ठानै ॥ खोसत खोसत बै दिन बीतत, नीति अनीति कछू नहिं जानै । सुन्दर केहरि काल महारिपु, दंत उपारि कुम्भस्थल भानै ॥१२॥ (१२) खोसत खासत-छीना झपटी मे । केहरि काल-रूपी शेर । कुम्भ स्थल-मस्तक ।

३६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मात पिता जुवती सुत बघव, आइ मिल्यौ इनसौ सनबधा । स्वारथ के अपने अपने सब, सो यह नाहि न जानत अधा ॥ कर्म विकर्म करै तिनकै हित, भार धरै नित आपने कधा । अन्त बिछोह भयौ सब सौ पुनि, याहि तै सुन्दर है जग धधा ॥१३॥ करत करत धध कछुक न जानै अध, आवत निकट दिन आगिलौ चपाकि दै । जैसे बाज तीतर कौ दाबत अचानचक, जैसे बक मच्छगी कौ लीलत लपाकि दै ॥ जैसे मक्षिका की घात मकरी करत आइ, जैसे साप मूपक कौ ग्रसत गपाकि दै । चेति रे अचेत नर सुन्दर सभारि राम, ऐसें तोहि काल आइ लेइगौ टपाकि दै ॥१४॥ (१३) धधा-लेनदेन का व्यापार मात्र । (१४) चपाकि दे-चटपट । लपाकि दे-लपक कर । गपाकि दे-गप्प से । घात-हत्या । टपाकि दे-टप्प से ।

॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ३७ मेरौ देह मेरौ गेह मेरौ परिवार सब, मेरौ धन माल मै तौ बहुबिधि भारौ हौं । मेरे सब सेवक हुकम कोऊ मेटै नाहि, मेरी जुवति कौ मैं नौं अधिक पियारौ हौ ॥ मेरौ बस ऊचौ मेरे बाप दादा ऐसै भये, करत बडाई मैं तौ जगत उज्यारौ हौ । सुन्दर कहत मेरौ मेरौ कर जानै शठ, ऐसै नही जानै मैं तौ कालही कौ चारौ हू ॥१५॥ जब तै जनम धर्यो तब ही तै भूलि पर्यो, बालापन माहि भूलौ समझ्यौ न रुख मैं । जोवन भयौ है जब कामवस भयौ तब, जुवती सौ एकमेक भूल रह्यौ सुख मैं ॥ पुत्र ऊ पोउत्र भये भूलौ तब मोह वाधि, चिंता करि करि भूलौ जाने नहिं दुख मैं । सुन्दर कहत शठ तीनौ पन माहि भूलौ, भूलौ भूजो जाइ पर्यौ कालही के मुख में ॥१६॥ (१५) गेह-घर। जुवति-युवती, स्त्री, पत्नी ।

३८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ ऊठत बैठत काल जागत सोवत काल, चलत फिरत काल काल वोर धर्यो है । कहत सुनत काल खातः हू पीवत काल, काल ही के गाल मांहि हर हर हस्यो है ॥ तात मात बधु काल सुत दारा गृह काल, सकल कुटंब काल काल जाल फस्यो है । सुन्दर कहत एक राम विन सब काल, काल ही कौ कृत्त कियौ अत काल ग्रस्यो है ॥१७॥ जब तै जनम लेत तब ही तै आयु घटै, माई तौ कहत मेरौ वडौ होत जात है । आज और काल्हि और दिन दिन होत और, दौर्यौ दौर्यौ फिरत खेलत अरु खात है ॥ बालापन वीत्यौ जब जोवन लग्यौ है आड, जौवन हू बीते बूढौ डोकरो दिखात है । सुन्दर कहत ऐसे देखत ही वुझि गयौ, तेल घटि गये जैसे दीपक बुझात है ॥१८॥ सव कोऊ ऐसै कहैं काल हम काटत है, काल तौ अखंड नाश सवको करतु है । (१७) कृत्त-कृत्य, काम । कुटम्ब-कुटुम्ब, परिवार । वोर-चारो तरफ ।