सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
स्वामी सुन्दरदासों जयचित्तरा ज्ञानिना श्रेष्ठ
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॥ श्री परमात्मने नम ॥ अथ श्री स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत सवैया ग्रंथ श्री सुंदर विलास प्रारम्भ '। अथ गुरुदेव को अग ॥१॥ इन्दव छन्द । मौज करी गुरुदेव दया करि, शब्द सुनाइ कह्यो हरि नेरो । ज्याँ रवि के प्रगटे निशि जातसु, दूरि कियो भ्रम भांन अधेरो ॥ कायिक वाचिक मानस हू करि, है गुरुदेव हि वदन मेरो । सुन्दरदास कहै कर जोरि जु, दादूदयालु को हू नित चेरो ॥१॥ (१) मौज करी-आनन्द कर दिया । शब्द सुनाइ- नोपदेश देकर । कह्यो हरि नेरो-हृदय मे ही भगवान के र्शन करा दिये । भ्रमभान अधेरो-भ्रमज्ञान का अधेरा । यिक-शरीर से । वाचिक-वाणी से । मानस-मन से । र जोरि-हाथ जोड़कर । चेरो-सेवक ।
२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ पूरन ब्रह्म विचार निरतर, काम न क्रोध न लोभ न मोहै। श्रोत्र त्वचा रसना अरु घ्राण सु, देखि कछू कहु नैन न मोहै॥ ज्ञान स्वरूप अरूप निरुपम, जासु गिरा सुनि मोहन मोहै। सुन्दरदास कहै कर जोरि जु, दादूदयालु हि मोर नमो है ॥२। धीरजवत अडिग्ग जितेन्द्रिय, निर्मेल ज्ञांन गह्यो दृढ आदू। शील संतोष क्षमा जिनके घट, लागि रह्यो सु अनाहद नादू॥ भेष न पक्ष निरतर लक्ष्यजु, और नही कछु वाद विवादू। (२) पूरण-पूर्ण, सर्वव्यापक। निरतर-सदा, अ या अव्यवहित, यथा (दादू निरतर पीव पाइया)। ग वाणी, उपदेश। (३) निर्मेल-निर्दोष, भ्रमसंशयादि दोषरहि दृढ-अविचल-निश्चयात्मक। निरतर-निष्पक्षभाव। हृदय मे। अनाहदनादू-अनाहत नाद, स्वत उद् सोऽहम् ध्वनि।
॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ३ ये सब लक्षण हैं जिन माहि सो, ' सुन्दर के उर है गुरु दादू ॥३॥ भौजल में बहि जातहुते जिन, काढ़ि लिये अपने करि आदू । और सदेह मिटाइ दिये सब, काननि टेर सुनाइ कै नादू ॥ पूरण ब्रह्म प्रकास कियौ पुनि, छूटि गये सब वाद विवादू । ऐसी कृपा जु करी हम ऊपरि सुन्दर के उर है गुरु दादू ॥४॥ कोउक गोरख कौ गुरु थापत, कोउक दत्त दिगंबर आदू । कोउक कथर कोउ भरत्थर, कोउ कबीर कौ राषत नादू ॥ कोउ कहै हरदास हमारे जु, यौँ करि ठानत वाद विवादू । और तो सत सबै सिर ऊपरि, सुन्दर के उर है गुरु दादू ॥५॥ (४) भौजल-भवजल, ससारसागर। काननि टेर सुनाई-गुरुमंत्र देकर। (५) दत्त--दत्तात्रेय । भरत्थर- भर्तृहरि ।
४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ कोउ बिभूति जटा नष धारि, कहै यह भेष हमारी ही आदू । कोउक कान फराइ फिरै पुनि, कोउक सींगि बजावत नादू ॥ कोउक केश लुचाई करै ब्रत, कोउक जगम कै शिव वादू । ये सब भूलि परै जित ही तित, सुन्दर के उर है गुरु दादू ॥६॥ जोगी कहैं गुरु जैन कहैं गुरु, बौध कहैं गुरु जगम मानै । 'भक्त कहैं गुरु न्यासी कहै, बनवासी कहै गुरु और बषानै ॥ सेख कहै गुरु सोफी कहै गुरु, याही तें सुन्दर होत हैगनै । वाहु कहैं गुरु वाहु कहैं गुरु, है गुरु सोई सबै भ्रम भानै ॥७॥ सो गुरुदेव लिपै न छिपै कछु, सत्व रजो तम ताप निवारी । इन्द्रिय देह मृषा करि जानत, शीतलता समता उर धारी ॥ (७) मृषा-असत्य, क्षणिक विनाशी । शीतलता-शांति । द्वैत उपाधि-भेदभाव ।
॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ २ व्यापक ब्रह्म विचार अखंडित, द्वैत उपाधि सबै जिन टारी । शब्द सुनाइ सदेह मिटावत, सुन्दर वा गुरु की बलिहारी ॥८॥ पूरण ब्रह्म बताइ दियौ जिन, एक अखंडित व्यापक सारै । राग रु द्वेष करै अब कौन सौं, जोई है मूल सोई सब डारै ॥ संशय शौक मिट्यौ मन को सब, तत्व विचार कह्यौ निरधारै । सुन्दर शुद्ध किये मल धोइ सु, है गुरु को उर ध्यान हमारै ॥९॥ ज्यौं कपरा दरजी गहि व्यौंतत, काष्ठ हि कौं बढई कसि आनै । कंचन कौ जु सुनार कसै पुनि, लोह कौ घाट लुहार ही जानै ॥ पाहन कौं कसि लेत सिलावट, पात्र कुम्हार कै हाथ निपॉनै । तैसे ही शिष्य कसै गुरुदेव जु, सुन्दरदास तबै मन मानै ॥१०॥ (९) निरधारे-निश्चित । (१०) घाट-घडना । पाहन- प षाण, पत्थर । झिलावट-मूर्तिका । निपाने-बनता है ।
६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मनहर छंद । ॅशत्रु है न मित्र कोऊ जाकै सब है समांन, देह कौ ममत्व छाडि आतमा ही राम है । और हू उपाधि जाकै कब हूँ न देषियत, सुख के समुद्र मे रहत आठो जाम है ॥ रिद्धि अरु सिद्धि जाकै हाथ जोरि आगै खरी, सुन्दर कहत ताकै सब ही गुलाम हैं । अधिक प्रशंसा हम कसै करि कहि सकै, ऐसै गुरुदेवकौ हमारी जु प्रणांम है ॥११॥ झांन कौ प्रकास जाकै अन्धकार भयौ नास, देह अभिमान जिन तज्यौ जानि सारधी । सोई सखसागर उजागर बैरागर ज्यौ, जाकै बैन सुनत बिलात है बिकारधी ॥ अगम अगाध अति कोऊ नहि जानै गति, आतमा कौ अनुभव अधिक अपारधी । ऐसौ गुरुदेव वदनीक तिहुँ लोक माहि, सुन्दर विराजमान शोभत उदारधी ॥१२॥ (११) ममत्व-ममता, आसक्ति । उपाधि-लागलपेट । आठों जाम-आठो पहर । (१२) सारधी-सारतत्व । बैन- वचन उपदेश । विकार धी-विकृत विचार । बिलात है-नष्ट हो जाते हैं । वदनीक-वदनीय । वैरागर-हीरा
॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ७ काहू सौं न रोष तोष काहू सौं न राग दोष, काहू सौं न वैरभाव काहू की न घात है । काहू सो न बकवाद काहू सो नही विवाद काहू सौं न संग न तौ कोऊ पक्षपात है ॥ काहू सौं न दुष्ट वैन काहू सौं न लैन देन, ब्रह्म कौ विचार कछू और न मुहात है । सुन्दर कहत सोई ईशनि कौ महा ईश, सोई गुरुदेव जाकै दूसरी न बात है ॥१३॥ लोह कौ ज्यौं पारस पखान हू पलटि लेत, कंचन छुवत होइ जग मै प्रमानिये । द्रुम कौ ज्यौं चंदन हू पलटि लगाइ वास, आपु कै समान ता मै शीतलता आनिये ॥ कीट को ज्यौं भृङ्ग हू पलटि कै करत भृङ्ग, सोई उडि जाइ ताकौ अचरिज मानिये । सुन्दर कहत यह सगर प्रसिद्ध बात, सद्य शिष्य पलटै सु सत्यगुरु जानिये ॥१४॥ गुरु बिन ज्ञान नाहि गुरु बिन ध्यान नाहि, गुरु बिन आतम-बिचार न लहतु है । (१४) पारस पख न-पारसमणि । द्रुम-साधारण वृक्ष । भृङ्ग-भोरा । सद्य तत्काल । पलटे-जीव से शिव बनादे ।
८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ गुरु विन प्रेम नाहि गुरु विन प्रीति नांहि, गुरु विन शील ह सन्तोष न गहतु है ॥ गुरु विन प्यास नाहि बुधि कौ प्रकाश नाहि, भ्रम हू कौ नाश नाहि संशय रहतु है । गुरु विन वाट नाहि कोटा विन हाट नाहि, सुन्दर प्रगट लोक वेद याँ कहतु है ॥१५॥ पढ़े के न बैठै पास ग्रन्थिर न वाचि सकै, विन ही पढ़े तें कैसे आवत है फारसी । जौहरी के मिलै विन परख न जानै कोउ, हाथ नग लिये फिरै मगै नहिं टारसी ॥ वैद हू मिल्यौ न कोऊ बूटी की बताइ देत, भेद विनु पाये वाकै औषध है क्षारसी । सुन्दर कहत मुख रच हू न देख्यो जाइ, गुरु विन ज्ञान ज्यौ अंधेरे माहि आरसी ॥१६॥ गुरु के प्रसाद बुधि उत्तम दशा कौ ग्रहै, गुरु के प्रसाद भव दुख बिसराइये । गुरु के प्रसाद प्रेम प्रीति हू अधिक बढै, गुरु के प्रसाद राम नाम गुन गाइये ॥ गुरु के प्रसाद सब जोग की जुगति जानै, (१५) प्यास आत्मजिज्ञासा । कोडा-धन (१६) वैद-वैद्य, औषध विशेषज्ञ । क्षार सी-राख के बराबर ।
॥ गुरुदेव को अग ॥ [ ९ गुरु के प्रसाद शून्य मैं समाधि लागे । सुन्दर कहत गुरुदेव जो कृपालु होहि, तिनके प्रसाद तत्व ज्ञान पुनि पाइये ॥१७॥ बूडत भी सागर मैं आडके बंधावै धीर, पारऊ लगाइ देत नाय कों ज्या खेवसी । पर उपकारी सब जीवनि के सारै काज, कबहू न आवै जाके गुननि कौ छेव सौ ॥ बचन सुनाइ भय भ्रम सब दूरि करै, सुन्दर दिखाइ देत अनप अभेव सौ । और हू सनेही हम नीके करि देखे सोधि, जग में न कोऊ हितकारी गुरुदेव सौ ॥१८॥ गुरु तात गुरु मात गुरु बंधु निज गात, गुरुदेव सब सिष्य सकल सवाऱ्यो है । गुरु दिये दिव्य नैन गुरु दिये मुख वैन, गुरुदेव श्रवन दे सब्द हू उचाऱ्यो है ॥ गुरु दिये हाथ पाव गुरु दियो सीस भाव, (१७) प्रसाद-कृपा । उत्तम दशा-शुद्ध अवस्था । भवदुख-संसार के दुख । शून्य मे-निरंजन निराकार ब्रह्म मे । (१८) बूडत-डूबते हुओ को । भी-भव । खेव सौ-खेने वाला । छेवै-पार । सोधि-परीक्षा करके ।
१० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ गुरुदेव पिंड माहि प्राण आइ डार्यो है । सुन्दर कहत गुरुदेव जू कृपालु होइ, फेरि घाट घरि करि मोहि निसतार्यो है ॥१९॥ कोऊ देत पुत्र धन कोऊ दल बल धन, कोऊ देत राज साज देव रिषि मुन्यौ है । कोऊ देत जस मान कोऊ देत रस आन, कोऊ देत विद्या ज्ञान जगत मे गुन्यो है ॥ कोऊ देत रिधि सिधि कोऊ देत नव निधि, कोऊ देत और कछु तातै सीस धुन्यौ है । सुन्दर कहत एक दियौ जिन राम नाम, गुरु सौ उदार कोऊ देख्यो है न सुन्यौ है ॥२०॥ भूमि हू की रेणु की तौ स ख्या कोऊ कहत है, भार हू अठारा द्रुम तिनके जो पात है । मेघन की स ख्या सोऊ रिषिन कही विचार, बू दन की स ख्या तेऊ आइकै बिलात है ॥ तारन की स ख्या सोऊ कही है पुरान माहि, रोमन की स ख्या पुनि जितनेक गात है । सुन्दर जहा लौ जत सबही को आवै अंत, गुरु के अनत गुन कापै कहे जात है ॥२१॥ (१६) गात-शरीर । (२१) रेणु-धल के कण । जन्त-जन्तु, जीव ।
॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ [ ११ गोविंद के कीये जीव जात है रसताल कौ, गुरु उपदेशे सो तो छूटै जम फद त । गोविंद के कीये जीव बस परे कर्मन के, गुरु के निवाजे सो फिरत है स्वच्छंद तै ॥ गोविंद के कीये जीव बूडत भौसागर मे, सुन्दर कहत गुरु काढै दुख द्वंद तै । और हू कहा लौ कछु मुख तै कहै बनाइ, गुरु की तौ महिमा अधिक है गोविंद तै ॥२२॥ चिंतामनि पारस कलपतरु कामधेनु, और हू अनेक निधि वारि वारि नाषिये । जोई कछु देखिये सो सकल विनाशवत, बुद्धि मै विचार करि बहु अभिलाषिये ॥ तातै अव मन वच क्रम करि कर जोरि, सुन्दर कहत सीस मेलि दीन भापिये । बहुत प्रकार तीनो लोक सब मोधे हम, ऐसी कौन भेट गुरुदेव आगे राखिए ॥२३॥ महादेव वामदेव रिषभ कपिलदेव, व्यासदेव शुकदेव जयदेव नामदेव जू । रामानन्द मुग्धानंद कट्टिय अनतानंद, (२२) रसातल-पाताललोक । जमफंद-यम की फाँसी । (२३) मन वच क्रम-मन वाणी कर्म । मोधे-खोज लिये ।
१२ ] ।। सुन्दर विलास ।। सुरेसुरानद हू कै आनद अच्छेव जू ॥ रैदास कबीरदास मोभादास पीपादास, धनादास हू कै दासभाव ही की टेव जू । सुन्दर सकल सत प्रगट जगत मांहि, तै से गुरु दादूदेव लागे हरि सेव जू ॥२४॥ गुरुदेव सर्वोपरि अधिक विराजमान, गुरुदेव सब ही तै अधिक गरिष्ठ है । गुरुदेव दत्तात्रेय नारद शुकादि मुनि, गुरुदेव ज्ञानघन प्रगट वसिष्ठ हैं ॥ गुरुदेव परम आनदमय देखियत, गुरुदेव वर वरीयान हू वरिष्ठ है । सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ, ऐसे गुरुदेव दादू मेरे सिर इष्ट है ॥२५॥ जोगी जैन जंगम सन्यासी वनवासी बौद्ध, और कोऊ भेष पक्ष सब भ्रम भान्यो है । तापस रिषीसुर मुनीसुर कवीसुर ऊ, : सबन को मत देखि तत पहिचान्यो है ॥ वेदसार तंत्रसार स्मृति रु पुरान सार, ग्रन्थन को सार सोई हृदै माँहि आन्यो है, (२५) गरिष्ठ-महान् । वरिष्ठ-श्रेष्ठ । इष्ट-आराध्य देव । सिर-सर्वोपरि ।
॥ गुरुदेव कौ अंग ॥ | १३ सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ, ऐसे गुरुदेव दादू मेरे मन मान्यो है ॥२६॥ जीते हैं जु काम क्रोध लोभ मोह दूरि किए, और सब गुननि को मद जिन भान्यो है । उपजै न ताप कोऊ सीतल सुभाव जाको, सबही में समता संतोप उर आन्यो है ॥ काहू सों न राग दोप देत सबही कौ पोष, जीवत ही पायौ मोक्ष एक ब्रह्म जान्यो है । सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ, ऐसो गुरुदेव दादू मेरे मन मान्यो है ॥२७॥ ॥ इति श्री गुरुदेव कौ अंग सम्पूर्ण ॥
(२६) तत-तत्त्व । रिषीसुर-ऋषीश्वर । मुनीसुर- मुनीश्वर । कवीसूर-कवीश्वर । (२७) भान्यो है-दूर कर दिया । दोप-द्वेष । मोक्ष । पोष-पोषण ।
१४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ उपदेश चितावनी को अग ॥२॥ हमाल छंद तो सही चतुर तू जान परवीन अति, परै जनि पिंजरै मोह कूंवा । पाइ उत्तम जनम लाइ लै चपल मत, गाड गोविंद गुन जीति जूवा ॥ आपु ही आपु अज्ञान नलनी बध्यौ, विना प्रभु विमुख कै वार मूवा । दास सुन्दर कहै परम पद तौ लहै, राम हरि राम हरि बोल सूवा ॥१॥ नप्स शतान कौ आपुनौ कैद करि, क्या दुनी मै पर्या खाइ गोता । है गुनहगार भी गुनह ही करत है, खाइगा मार तब फिरै रोता ॥ जिन तुझै खाक सौ अजब पैदा किया, तू उस्से क्यों फरामोस होता । दास सुन्दर कहै सरम तब ही रहै, हक्क तू हक्क तू बोल तोता ॥२॥ (१) परवीन-प्रवीण । अज्ञान नलनी-अज्ञानकी नाली, जैसा कि तोता नाली के द्वारा पकड़ा जाता है । (२) नप्स मन । उस्से-उसमे । फरामोस-विमुख ।
॥ उपदेश चितावनी को अङ्ग ॥ [ ६५ आब की बूंद औजूद पैदा किया, नैन तन मानिषा रंगि सजूती । ख्याल मैला भये उरी लीये फिरै, जानि कै दोप बग करै सूती ॥ भूलि उस खसम को काम नै क्या किया, बेगिले यादि करि मति निपूती । दास सुन्दर कहै गर्व गुल नौ रहे भी तुही ना तुही बोल नूती ॥३॥ श्रवन उस्ताद के कद्म की खाक हौ, दिग्म दुयजार सब छाडि फैना । यार दिलदार दिल माहिं तू याद कर, है तुझी पास तू देखि नैना ॥ जान का जान है, जिद का जिद है, सपुन का सपुन कछु समझि सैना । दास सुन्दर कहै मकान घट मै रहै, एक तू एक तू बोलि मैना ॥४॥ मनहर छन्द कान के गए तै कहा कान ऐसो होत मूढ, नैन के गये तै कहा नैन ऐसे पाइ है । (३) आब-पानी । औजूद-अद्भूत शरीर । करि सजूती- लगाकर । ख्याल-विचार । खसम-स्वामी परमेश्वर ।
१६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ नासिका गये तै कहा नासिका सुगन्ध लेत, मुख के गये तै कहा मुख ऐसै गाइ है ॥ हाथ के गये तै कहा हाथ ऐसौ काम होत, पाव के गये तै ऐसै पाव कत धाइ है । याहि तै बिचारि देखि सुन्दर कहत तोहि, देह के गये तै ऐसी देह नही आई है ॥५॥ बार बार कह्यौ तोहि सावधान क्यौ न होहि, ममता की पोट सिर काहे कौं धरतु है । मेरो धन मेरो धाम मेरे सुत मेरी बाम, मेरो पशु मेरो ग्राम भूलौ यौ फिरतु है ॥ तौ भयौ बावरौ बिकाई गई बुद्धि तेरी, ऐसौ अन्धकूप गृह तामै तू परतु है । सुन्दर कहत तोहि नैक हू न आवै लाज, काज कौ बिगारि कै अकाज क्यौ करतु है ॥६॥ (४) अबल उस्ताद-आदि जगद्गुरु । कदम की खाक- पैरो की धूल । हिरस बुगुजार-कामना छोड । फैना-छल कपट । जान का जान-प्रणो का प्राण । जिंद का जिंद- जीवन का जीवन । सखुन का सखुन-सब सारो सार । (६) बाम-वामागना, स्त्री । नेक-थोडी सी भी । काज- कार्य । अकाज-अकार्य ।
१. अंग १-५: गुरु-देव अंग, विरह अंग, ज्ञान-योग अंग व अद्वैत विचार
॥ उपदेश चितावनी को अंग ॥ | ९७ ने रैं तौ कुपेच पर्यो गाठि अति पूरि गई, ब्रह्मा आइ छोरै पगो तौ छूटन न जबहू । तेल सौं भिजोड करि नोलग लपेटि राखै, कूकुर की पूंछ सूधी होइ नहीं तबहू ॥ मानू देत सीप बहु कीरी की भिनत जाउ, कहत कहत दिन बीत गयो सबहू । सुन्दर अज्ञान ऐसो छाड्यो नही अभिमान, निकसन प्रान लग देत्यो नहि कवहू ॥७॥ वालू माहि तेल नहि निकसत काहू विधि, पाथर न भीजै बहु वरषन घन है । पानी के मथे तं कहु घीव नहि पाइयत, कूकस कें कूटै नहि निकसत कन है ॥ शून्य कूं मूठी भरे तै हाथ न परत कछु, ऊसर के वाहै कहा उपजत अन्न है । उपदेश औषध कवन विधि लाग ताहि, सुन्दर असाध्य रोग भयौ जाकै मन है ॥८॥ (७) कुपेच-दुर्बुद्धि । छोरे-छुटावे सुलझावे । कीरीकी- कीडी के समान । (८) घन-ब दल । कूकस-भूसा । कन-कण, अन्न के दाने । शून्य-सूना आकाश । ऊसर-खारडे की जमीन ।
१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ बैरी घर मांहि तेरे जानत सनेही मेरे, दारा सुत वित्त तेरौ पोसि पोसि खाहिंगे । और ऊ कुटुम्ब लोग लूटैं चहू ओर ही तैं, मीठी मीठी बात कहि तोसौ लपटाहिंगे ॥ सकट परैगो जब कोऊ नहि तेरौ तब, अति ही कठिन वाकी बेर उठि जाहिंगे । सुन्दर कहत तानै झूठौ ही प्रपंच यह, सुपन की नाईं सब देखत विलाहिंगे ॥९॥ वारू कै मदिर माहि बैठि रह्यौ थिर होइ, राखत है जीवने की आसा कैऊ दिन की । पल पल छीजत घटत जात घरी घरी, बिनसत वार कहा षवरि न छिनकी ॥ करत उपाइ झूठै लेन देन षान पान, मूसा इत उत फिरै ताकि रही मिनकी । सुन्दर कहत मेरी मेरो करि भूलौ शठ, चंचल चपल माया भई किन किन की ॥१०॥ अन अन्त । (९) सनेही-प्रेमी । वित्त-धन । बाकी बेर-उनके मौक़ पर । उठि जाहिंगे-मुंह फेर लेंगे । (१०) बारू-बालू मिट्टी । छिन की-क्षणभर की । मूसा-चूहा। मिनकी-बिल्ली । शठ-दुष्ट, मूर्ख ।