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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished261 pages

नेन मन्त्रेण । अधीहि अध्यापय | 'हे भगवन् ! आप मुझे ब्रह्मका

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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५

ब्रह्म विजिज्ञासुरुपससारोपगत- | जाननेकी इच्छावाला होकर अपने वान्, अधीहि भगवो ब्रह्मेत्य- | पिता वरुणके पास गया। अर्थात् नेन मन्त्रेण । अधीहि अध्यापय | 'हे भगवन् ! आप मुझे ब्रह्मका कथय । स च पिता विधिवदुप- | उपदेश कीजिये' इस मन्त्रके द्वारा सन्नाय तस्मै पुत्रायैतद्वचनं | [ उसने गुरूपसदन किया ] । प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं | 'अधीहि' शब्दका अर्थ अध्यापन मनो वाचमिति । | ( उपदेश ) कीजिये—कहिये ऐसा अन्नं शरीरं तदभ्यन्तरं च | समझना चाहिये । उस पिताने [वरुणोपदिष्ट-ब्रह्मप्राप्तिद्वाराणि] प्राणमत्तारमुपल- | अपने पास विधिपूर्वक आये हुए ब्धिसाधनानि चक्षुः | उस पुत्रसे यह वाक्य कहा—'अन्नं श्रोत्रं मनो वाचमित्येतानि ब्रह्मो- | प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनः वाचम् ।' पलब्धौ द्वाराण्युक्तवान् । उक्त्वा | 'अन्न अर्थात् शरीर उसके भीतर च द्वारभूतान्येतान्यन्नादीनि तं | अन्न भक्षण करनेवाला प्राण, भृगुं होवाच ब्रह्मणो लक्षणम् । | तदनन्तर विषयोंकी उपलब्धिके किं तत् ? | साधनभूत चक्षु, श्रोत्र, मन और यतो यस्माद्वा इमानि ब्रह्मा- | वाक् ये ब्रह्मकी उपलब्धिमें द्वाररूप [ब्रह्मलक्षणम्] दीनि स्तम्बपर्यन्तानि | हैं'—ऐसा उसने कहा । इस भूतानि जायन्ते । | प्रकार इन द्वारभूत अन्नादिको येन जातानि जीवन्ति प्राणा- | बतलाकर उसने उस भृगुको ब्रह्मका न्धारयन्ति वर्धन्ते । विनाशकाले | लक्षण बतलाया। वह क्या है ? | [ सो बतलाते हैं— ] | जिससे ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त | ये सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, | जिसके आश्रयसे ये जन्म लेनेके | अनन्तर जीवित रहते—प्राण धारण | करते अर्थात् वृद्धिको प्राप्त होते हैं | तथा विनाशकाल उपस्थित होनेपर

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२१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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[Page Header] २१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३


[बायाँ स्तम्भ / Sanskrit Text]

च यत्प्रयन्ति यद्ब्रह्म प्रतिगच्छ- न्ति, अभिसंविशन्ति तादात्म्य- मेव प्रतिपद्यन्ते । उत्पत्तिस्थिति- लयकालेषु यदात्मतां न जहति भूतानि तदेतद्ब्रह्मणो लक्षणम् । तद्ब्रह्म विजिज्ञासस्व विशेषेण ज्ञातुमिच्छस्व । यदेवंलक्षणं ब्रह्म तदन्नादिद्वारेण प्रतिपद्यस्वे- त्यर्थः । श्रुत्यन्तरं च—"प्राण- स्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रमन्नस्यान्नं मनसो ये मनो विदुस्ते निचिक्युर्ब्रह्म पुराण- मग्य्रम्” ( बृ० उ० ४ । ४ । १८ ) इति ब्रह्मोपलब्धौ द्वारा- ण्येतानीति दर्शयति । स भृगुर्ब्रह्मोपलब्धिद्वाराणि [पार्श्व टिप्पणी: ब्रह्मोपलब्धये भृगोस्तपः] ब्रह्मलक्षणं च श्रुत्वा पितुस्तपो ब्रह्मोप- लब्धिसाधनत्वेनातप्यत तप्त- वान् । कुतः पुनरनुपदिष्टस्यैव तपसः साधनत्वप्रतिपत्तिर्भृगोः ?


[दायाँ स्तम्भ / Hindi Translation]

जिसके प्रति प्रयाण करनेवाले अर्थात् जिस ब्रह्मके प्रति गमन करनेवाले वे जीव उसमें प्रवेश करते—उसके तादात्म्यभावको प्राप्त हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि उत्पत्ति, स्थिति और लयकालमें प्राणी जिसकी तद्रूपताका त्याग नहीं करते यही उस ब्रह्मका लक्षण है। तू उस ब्रह्मको विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा कर; अर्थात् जो ऐसे लक्षणों- वाला ब्रह्म है उसे अन्नादिके द्वारा प्राप्त कर। "ब्रह्म प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र, अन्नका अन्न और मनका मन है—ऐसा जो जानते हैं वे उस पुरातन और श्रेष्ठ ब्रह्मको साक्षात् जान सकते हैं" ऐसी एक दूसरी श्रुति भी इस बातको प्रदर्शित करती है कि ये प्राणादि ब्रह्मकी उपलब्धिमें द्वारस्वरूप हैं। उस भृगुने अपने पितासे ब्रह्मकी उपलब्धिके द्वार और ब्रह्मका लक्षण सुनकर ब्रह्मसाक्षात्कारके साधन- रूपसे तप किया । [ यहाँ प्रश्न होता है कि ] जिसका उपदेश ही नहीं दिया गया था उस तपके [ ब्रह्मप्राप्तिका ] साधन होनेका ज्ञान भृगुको कैसे हुआ ? [ उत्तर—]


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[शीर्षक] अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१७


[मूल संस्कृत - शाङ्करभाष्यम्]

सावशेषोक्तेः । अन्नादि ब्रह्मणः प्रतिपत्तौ द्वारं लक्षणं च यतो वा इमानीत्याद्युक्तवान् । सावशेषं हि तत्साक्षाद्ब्रह्मणोऽनिर्देशात् । अन्यथा हि स्वरूपेणैव ब्रह्म निर्देष्टव्यं जिज्ञासवे पुत्रायेद- मित्थंरूपं ब्रह्मेति । न चैवं निर- दिशत्किं तर्हि ? सावशेषमेवोक्त- वान् । अतोऽवगम्यते नूनं साध- नान्तरमप्यपेक्षते पिता ब्रह्म- विज्ञानं प्रतीति । तपोविशेषप्रति- पत्तिस्तु सर्वसाधकतमत्वात् । सर्वेषां हि नियतसाध्यविषयाणां साधनानां तप एव साधकतमं साधनमिति हि प्रसिद्धं लोके । तस्मात्पित्रानुपदिष्टमपि ब्रह्म- विज्ञानसाधनत्वेन तपः प्रतिपेदे भृगुः । तच्च तपो बाह्यान्तः- करणसमाधानं तद्द्वारकत्वाद्ब्रह्म-


[हिन्दी भाष्यार्थ]

क्योंकि [ उसके पिताका ] कथन सावशेष ( जिसमें कुछ कहना शेष रह गया हो—ऐसा ) था । वरुणने 'यतो वा इमानि भूतानि' इत्यादि रूपसे अन्नादि ब्रह्मकी प्राप्तिका द्वार और लक्षण कहा था । वह सावशेष ( असम्पूर्ण ) था; क्योंकि उससे ब्रह्मका साक्षात् निर्देश नहीं होता । नहीं तो, उसे अपने जिज्ञासु पुत्रके प्रति 'वह ब्रह्म ऐसा है' इस प्रकार उसका स्वरूपसे ही निर्देश करना चाहिये था । किन्तु इस प्रकार उसने निर्देश किया नहीं है । तो किस प्रकार किया है ? उसने उसे सावशेष ही उपदेश किया है । इससे जाना जाता है कि उसके पिताको अवश्य ही ब्रह्मज्ञानके प्रति किसी अन्य साधनकी भी अपेक्षा है । सबसे बड़ा साधन होनेके कारण भृगुने तपको ही विशेष रूपसे ग्रहण किया । जिनके साध्य विषय नियत हैं उन साधनोंमें तप ही सबसे अधिक सिद्धि प्राप्त कराने- वाला साधन है—यह बात लोकमें प्रसिद्ध ही है । इसलिये पिताके उपदेश न देनेपर भी भृगुने ब्रह्म- विज्ञानके साधनरूपसे तपको स्वीकार किया । वह तप बाह्य इन्द्रिय और अन्तःकरणका समाहित करना


[पाद-टिप्पणी / फुटर]: CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२१८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ प्रतिपत्तेः । “मनसश्चेन्द्रियाणां | ही है; क्योंकि ब्रह्मप्राप्ति उसीके च ह्येकाग्र्यं परमं तपः। | द्वारा होनेवाली है । “मन और तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः | इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप | है । वह सब धर्मोंसे उत्कृष्ट है और पर उच्यते” (महा० शा० २५०। | वही परम धर्म कहा जाता है”—इस ४) इति स्मृतेः । स च तपस्त- | स्मृतिसे यही बात सिद्ध होती है । प्त्वा ॥ १ ॥ | उस भृगुने तप करके—॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥ द्वितीय अनुवाक अन्न ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । अन्नेन जातानि जीवन्ति । अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितर- मुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ अन्न ब्रह्म है—ऐसा जाना । क्योंकि निश्चय अन्नसे ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर अन्नसे ही जीवित रहते हैं तथा प्रयाण करते समय अन्नमें ही लीन होते हैं । ऐसा जानकर वह फिर अपने पिता वरुणके पास आया [ और कहा— ] ‘भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये ।’ वरुणने उससे कहा—‘ब्रह्मको तपके द्वारा जाननेकी CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१९ इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है।' तब उसने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥


[मूल संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) एवं हिन्दी अनुवाद]

संस्कृत भाष्य: अन्नं ब्रह्मेति व्यजानाद्वि- | हिन्दी अनुवाद: अन्न ब्रह्म है—ऐसा जाना । वही ज्ञातवान् तद्धि यथोक्तलक्षणो- | उपर्युक्त लक्षणसे युक्त है। सो कैसे ? पेतम् । कथम् ? अन्नाद्ध्येव | क्योंकि निश्चय अन्नसे ही ये सब खल्विमानि भूतानि जायन्ते; | प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर अन्नेन जातानि जीवन्ति अन्नं | अन्नसे ही जीवित रहते हैं तथा प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति तस्मा- | मरणोन्मुख होनेपर अन्नमें ही लीन द्युक्तमन्नस्य ब्रह्मत्वमित्यभि- | हो जाते हैं। अतः तात्पर्य यह है प्रायः । स एवं तपस्तप्त्वाऽन्नं | कि अन्नका ब्रह्मरूप होना ठीक ही ब्रह्मेति विज्ञायान्नलक्षणेनोप- | है। वह इस प्रकार तप करके तथा पत्त्या च पुनरेव संशयमापन्नो | अन्नके लक्षण और युक्तिके द्वारा 'अन्न वरुणं पितरमुपससार अधीहि | ही ब्रह्म है' ऐसा जानकर फिर भी भगवो ब्रह्मेति । | संशयग्रस्त हो पिता वरुणके पास आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये' । कः पुनः संशयहेतुरस्येत्यु- | परन्तु इसमें उसके संशयका च्यते-अन्नस्योत्पत्तिदर्शनात् । | कारण क्या था ? सो बतलाया जाता है। अन्नकी उत्पत्ति देखनेसे [ उसे ऐसा सन्देह हुआ ] । यहाँ तपसः पुनः पुनरुपदेशः साधना- | तपका जो बारम्बार उपदेश किया तिशयत्वावधारणार्थः । यावद्ब्र- | गया है वह उसका प्रधान साधनत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् ह्मणो लक्षणं निरतिशयं न भवति | जबतक ब्रह्मका लक्षण निरतिशय यावच्च जिज्ञासा न निवर्तते | न हो जाय और जबतक तेरी जिज्ञासा शान्त न हो तबतक तप तावत्तप एव ते साधनम् । तप- | ही तेरे लिये साधन है । तात्पर्य यह


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२२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ सैव ब्रह्म विजिज्ञासस्वेत्यर्थः । | है कि तू तपसे ही ब्रह्मको जाननेकी ऋज्वन्यत् ॥ १ ॥ | इच्छा कर । शेष अर्थ सरल है ॥१॥ इति भृगुवल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥ तृतीय अनुवाक प्राण ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसीमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् । प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । प्राणेन जातानि जीवन्ति । प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपो- ऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ प्राण ब्रह्म है—ऐसा जाना । क्योंकि निश्चय प्राणसे ही ये प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर प्राणसे ही जीवित रहते हैं और मरणोन्मुख होनेपर प्राणमें ही लीन हो जाते हैं । ऐसा जानकर वह फिर अपने पिता वरुणके पास आया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये ।' उससे वरुणने कहा—'तू तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर । तप ही ब्रह्म है ।' तब उसने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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चतुर्थ अनुवाक मन ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । मनसा जातानि जीवन्ति । मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳ होवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ मन ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि निश्चय मनसे ही ये जीव उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर मनके द्वारा ही जीवित रहते हैं और अन्तमें प्रयाण करते हुए मनमें ही लीन हो जाते हैं। ऐसा जानकर वह फिर पिता वरुणके पास गया [ और बोला—] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये।' वरुणने उससे कहा—'तू तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है।' तब उसने तप किया और उसने तप करके—॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां चतुर्थोऽनुवाकः ॥ ४ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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पञ्चम अनुवाक विज्ञान ही ब्रह्म है—ऐसा जानकर और उसमें ब्रह्मके लक्षण घटाकर भृगुका पुनः वरुणके पास आना और उसके उपदेशसे पुनः तप करना विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । विज्ञानेन जातानि जीवन्ति । विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १ ॥ विज्ञान ब्रह्म है—ऐसा जाना। क्योंकि निश्चय विज्ञानसे ही ये सब जीव उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर विज्ञानसे ही जीवित रहते हैं और फिर मरणोन्मुख होकर विज्ञानमें ही प्रविष्ट हो जाते हैं। ऐसा जानकर वह फिर पिता वरुणके समीप आया [और बोला—] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्मका उपदेश कीजिये ।' वरुणने उससे कहा—'तू तपके द्वारा ब्रह्मको जाननेकी इच्छा कर । तप ही ब्रह्म है ।' तब उसने तप किया और तप करके—॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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षष्ठ अनुवाक आनन्द ही ब्रह्म है—ऐसा भृगुका निश्चय करना तथा इस भार्गवी वारुणी विद्याका महत्त्व और फल आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् प्रतिष्ठिता । स य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति, प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥ आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना; क्योंकि आनन्दसे ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होनेपर आनन्दके द्वारा ही जीवित रहते हैं और प्रयाण करते समय आनन्दमें ही समा जाते हैं। वह यह भृगुकी जानी हुई और वरुणकी उपदेश की हुई विद्या परमाकाशमें स्थित है। जो ऐसा जानता है वह ब्रह्ममें स्थित होता है; वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता होता है; प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥ एवं तपसा विशुद्धात्मा | इस प्रकार तपसे शुद्धचित्त हुए प्राणादिषु साकल्येन ब्रह्मलक्षण- | भृगुने प्राणादिमें पूर्णतया ब्रह्मका मपश्यञ्शनैः शनैरन्तरनुप्रविश्या- | लक्षण न देखकर धीरे-धीरे भीतरकी ओर प्रवेश कर तपरूप साधनके CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२२४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत मूल एवं भाष्य]

न्तरतममानन्दं ब्रह्म विज्ञातवां- स्तपसैव साधनेन भृगुः । तस्माद्ब्र- ह्मविजिज्ञासुना बाह्यान्तःकरण- समाधानलक्षणं परमं तपःसाधन- मनुष्ठेयमिति प्रकरणार्थः ।

अधुनाख्यायिकातोऽपसृत्य श्रुतिः स्वेन वचनेनाख्यायिका- निर्वर्त्यमर्थमाचष्टे—सैषा भार्गवी भृगुणा विदिता वरुणेन प्रोक्ता वारुणी विद्या परमे व्योमन्हृदया- काशगुहायां परम आनन्देऽद्वैते प्रतिष्ठिता परिसमाप्तान्नमयादात्म- नोऽधिप्रवृत्ता । य एवमन्योऽपि तपसैव साधनेनानेनैव क्रमेणा- नुप्रविश्यानन्दं ब्रह्म वेद स एवं विद्याप्रतिष्ठानात्प्रतितिष्ठत्यानन्दे परमे ब्रह्मणि ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ।

दृष्टं च फलं तस्योच्यते— अन्नवान्प्रभूतमन्नमस्य विद्यत


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी अनुवाद]

द्वारा ही सबकी अपेक्षा अन्तरतम आनन्दको ब्रह्म जाना । अतः जो ब्रह्मको जाननेकी इच्छावाला हो उसे साधनरूपसे बाह्य इन्द्रिय और अन्तःकरणका समाधानरूप परम तप ही करना चाहिये—यह इस प्रकरणका तात्पर्य है ।

अब आख्यायिकासे निवृत्त होकर श्रुति अपने ही वाक्यसे आख्यायिका- से निष्पन्न होनेवाला अर्थ बतलाती है—अन्नमय आत्मासे प्रारम्भ हुई यह भार्गवी—भृगुकी जानी हुई और वारुणी—वरुणकी कही हुई विद्या परमाकाशमें—हृदयाकाशस्थित गुहा- के भीतर अद्वैत परमानन्दमें प्रतिष्ठित है अर्थात् वहीं इसका पर्यवसान होता है । इसी प्रकार जो कोई दूसरा पुरुष भी इसी क्रमसे तपरूप साधनके द्वारा क्रमशः अनुप्रवेश करके आनन्दको ब्रह्मरूपसे जानता है वह इस प्रकार विद्यामें स्थिति लाभ करनेसे आनन्द अर्थात् परब्रह्ममें स्थिति प्राप्त करता है, यानी ब्रह्म ही हो जाता है ।

अब उसका दृष्ट ( इस लोकमें प्राप्त होनेवाला ) फल बतलाया जाता है—अन्नवान्—जिसके पास


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अनु० ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २२५

इत्यन्नवान् । सत्तामात्रेण तु | बहुत-सा अन्न हो उसे अन्नवान् | कहते हैं।* अन्नकी सत्तामात्रसे तो सर्वो ह्यन्नवानिति विद्याया | सभी अन्नवान् हैं, अतः [यदि उस | प्रकार अर्थ किया जाय तो] विशेषो न स्यात् । एवमन्नमत्ती- | विद्याकी कोई विशेषता नहीं रहती। | इसी प्रकार वह अन्नाद-जो अन्नभक्षण त्यन्नादो दीप्ताग्निर्भवतीत्यर्थः । | करे यानी दीप्ताग्नि हो जाता है। वह महान्भवति । केन महत्त्वमित्यत | महान् हो जाता है। उसका महत्त्व | किस कारणसे होता है ? इसपर आह--प्रजया पुत्रादिना पशु- | कहते हैं-पुत्रादि प्रजा, गौ, अश्व | आदि पशु तथा ब्रह्मतेज यानी शम, भिर्गवाश्वादिभिर्ब्रह्मवर्चसेन शम- | दम एवं ज्ञानादिके कारण होनेवाले दमज्ञानादिनिमित्तेन तेजसा । | तेजसे तथा कीर्ति यानी शुभाचरणके | कारण होनेवाली ख्यातिसे वह महान्भवति कीर्त्या ख्यात्या | महान् हो जाता है ॥ १ ॥ शुभप्रचारनिमित्तया ॥१॥ इति भृगुवल्ल्यां षष्ठोऽनुवाकः ॥६॥

  • मूलमें केवल 'अन्नवान्' है, भाष्यमें उसका अर्थ 'प्रभूत (बहुतसे) अन्नवाला' किया गया है। इससे यह शंका होती है कि 'प्रभूत' विशेषणका प्रयोग क्यों किया गया। इसीका समाधान करनेके लिये आगेका वाक्य है। तै० उ० २९-३०- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
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सप्तम अनुवाक अन्नकी निन्दा न करनारूप व्रत तथा शरीर और प्राणरूप अन्न- ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान् भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥१॥ अन्नकी निन्दा न करे। यह ब्रह्मज्ञका व्रत है। प्राण ही अन्न है और शरीर अन्नाद है। प्राणमें शरीर स्थित है और शरीरमें प्राण स्थित है। इस प्रकार [ एक दूसरेके आश्रित होनेसे वे एक दूसरेके अन्न हैं; अतः ] ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित ( प्रख्यात ) होता है, अन्नवान् और अन्नभोक्ता होता है। प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥

किं चान्नेन द्वारभूतेन ब्रह्मइसके सिवा क्योंकि द्वारभूत
विज्ञातं यस्मात्तस्माद्गुरुमिवअन्नके द्वारा ही ब्रह्मको जाना है इसलिये गुरुके समान अन्नकी भी
अन्नं न निन्द्यात्तदस्यैवं ब्रह्म-निन्दा न करे। इस प्रकार ब्रह्म-वेत्ताके लिये यह व्रत उपदेश किया
विदो व्रतमुपदिश्यते । व्रतोप-जाता है। यह व्रतका उपदेश

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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७ देशोऽन्नस्तुतये, स्तुतिभाक्त्वं | अन्नकी स्तुतिके लिये है और अन्नकी | स्तुतिपात्रता ब्रह्मोपलब्धिका साधन चान्नस्य ब्रह्मोपलब्ध्युपायत्वात् । | होनेके कारण है । प्राणो वा अन्नम्, शरीरान्त- | प्राण ही अन्न है; क्योंकि प्राण र्भावात्प्राणस्य । यद्यस्यान्तः- | शरीरके भीतर रहनेवाला है । जो प्रतिष्ठितं भवति तत्तस्यान्नं भव- | जिसके भीतर स्थित रहता है वह तीति । शरीरे च प्राणः प्रति- | उसका अन्न हुआ करता है । प्राण ष्ठितस्तस्मात्प्राणोऽन्नं शरीरमन्ना- | शरीरमें स्थित है, इसलिये प्राण दम् । तथा शरीरमप्यन्नं प्राणो- | अन्न है और शरीर अन्नाद है । ऽन्नादः । कस्मात् ? प्राणे शरीरं | इसी प्रकार शरीर भी अन्न है और प्रतिष्ठितम्; तन्निमित्तत्वाच्छरी- | प्राण अन्नाद है; कैसे ?—प्राणमें रस्थितेः । तस्मात्तदेतदुभयं शरीरं | शरीर स्थित है; क्योंकि शरीरकी प्राणश्चान्न मन्नादश्च । येनान्योन्य- | स्थिति प्राणके ही कारण है अतः स्मिन्प्रतिष्ठितं तेनान्नम् । येना- | ये दोनों शरीर और प्राण अन्न और न्योन्यस्य प्रतिष्ठा तेनान्नादः । | अन्नाद हैं; क्योंकि वे एक दूसरेमें तस्मात्प्राणः शरीरं चोभयमन्न- | स्थित हैं इसलिये अन्न हैं और मन्नादं च । | क्योंकि एक दूसरेके आधार हैं | इसलिये अन्नाद हैं । अतएव प्राण | और शरीर दोनों ही अन्न और | अन्नाद हैं । स य एवमेतदन्नमन्ने प्रति- | वह जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें ष्ठितं वेद प्रतितिष्ठत्यन्नादा- | स्थित जानता है, अन्न और अन्नाद- त्मनैव । किं चान्नवानन्नादो भव- | रूपसे ही स्थित होता है तथा अन्न- तीत्यादि पूर्ववत् ॥१॥ | वान् और अन्नाद होता है—इत्यादि | शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥७॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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अष्टम अनुवाक अन्नका त्याग न करना Schneider/व्रत तथा जल और ज्योतिरूप अन्न-ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन अन्नं न परिचक्षीत। तद्व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्न- मन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान्कीर्त्या ॥१॥ अन्नका त्याग न करे। यह व्रत है। जल ही अन्न है। ज्योति अन्नाद है। जलमें ज्योति प्रतिष्ठित है और ज्योतिमें जल स्थित है। इस प्रकार ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद होता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥ अन्नं न परिचक्षीत न परि- | अन्नका प्रत्याख्यान अर्थात् त्याग | न करे, यह व्रत है—यह कथन हरेत्। तद्व्रतं पूर्ववत्स्तुत्यर्थम्। | पूर्ववत् स्तुतिके लिये है। इस | प्रकार शुभाशुभकी कल्पनासे उपेक्षा तदेवं शुभाशुभकल्पनया अपरि- | न किया हुआ अन्न ही यहाँ स्तुत हियमाणं स्तुतं महीकृतमन्नं स्यात्। | एवं महिमान्वित किया जाता है। एवं यथोक्तमुत्तरेष्वप्यापो वा | तथा आगेके 'आपो वा अन्नम्' | इत्यादि वाक्योंमें भी पूर्वोक्त अर्थकी अन्नमित्यादिषु योजयेत् ॥१॥ | ही योजना करनी चाहिये ॥१॥ इति भृगुवल्ल्यामष्टमोऽनुवाकः ॥ ८ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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नवम अनुवाक अन्नसञ्चयरूप व्रत तथा पृथिवी और आकाशरूप अन्न-ब्रह्मके उपासकको प्राप्त होनेवाले फलका वर्णन अन्नं बहु कुर्वीत । तद्व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान्कीर्त्या ॥ १ ॥ अन्नको बढ़ावे--यह व्रत है। पृथिवी ही अन्न है। आकाश अन्नाद है। पृथिवीमें आकाश स्थित है और आकाशमें पृथिवी स्थित है। इस प्रकार ये दोनों अन्न ही अन्नमें प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्नको अन्नमें स्थित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नाद होता है, प्रजा, पशु और ब्रह्मतेजके कारण महान् होता है तथा कीर्तिके कारण भी महान् होता है ॥ १ ॥ अप्सु ज्योतिरित्यब्ज्योति- | पूर्वोक्त 'अप्सु ज्योतिः' आदि मन्त्रके अनुसार जल और ज्योतिकी अन्न और अन्नाद गुणसे उपासना षोरन्नान्नादगुणत्वेनोपासकस्या- | करनेवालेके लिये 'अन्नको बढ़ाना व्रत है' [-यह बात इस मन्त्रमें न्नस्य बहुकरणं व्रतम् ॥ १ ॥ | कही गयी है] ॥ १ ॥ इति भृगुवल्ल्यां नवमोऽनुवाकः ॥ ९ ॥ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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दशम अनुवाक गृहागत अतिथिको आश्रय और अन्न देनेका विधान एवं उससे प्राप्त होनेवाला फल; तथा प्रकारान्तरसे ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन न कंचन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद्व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्न- मित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नꣳराद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वै मध्यतोऽन्नꣳराद्धम् । मध्यतो- ऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नꣳराद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नꣳराध्यते ॥ १ ॥ य एवं वेद । क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति ॥ २ ॥ यश इति पशुषु ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृत- मानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे । तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह इत्युपासीत । महान् भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान् भवति ॥ ३ ॥ तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान् भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१ इत्युपासीत । पर्यैणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः ॥ ४ ॥ अपने यहाँ रहनेके लिये आये हुए किसीका भी परित्याग न करे। यह व्रत है । अतः किसी-न-किसी प्रकारसे बहुत-सा अन्न प्राप्त करे; क्योंकि वह (अन्नोपासक) उस (गृहगत अतिथि) से 'मैंने अन्न तैयार किया है' ऐसा कहता है । जो पुरुष मुख्यतः (प्रथम अवस्थामें अथवा मुख्यवृत्तिसे यानी सत्कारपूर्वक) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे मुख्यवृत्तिसे ही अन्नकी प्राप्ति होती है । जो मध्यतः (मध्यम आयुमें अथवा मध्यम वृत्तिसे) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे मध्यम वृत्तिसे ही अन्नकी प्राप्ति होती है । तथा जो अन्ततः (अन्तिम अवस्थामें अथवा निकृष्ट वृत्तिसे) सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे निकृष्ट वृत्तिसे ही अन्न प्राप्त होता है ॥ १ ॥ जो इस प्रकार जानता है [उसे पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है । अब आगे प्रकारन्तरसे ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन किया जाता है—] ब्रह्म वाणीमें क्षेम (प्राप्त वस्तुके परिरक्षण) रूपसे [स्थित है—इस प्रकार उपासनीय है], योगक्षेमरूपसे प्राण और अपानमें, कर्मरूपसे हाथोंमें, गतिरूपसे चरणोंमें और त्यागरूपसे पायुमें [उपासनीय है], यह मनुष्यसम्बन्धिनी उपासना है । अब देवताओंसे सम्बन्धित उपासना कही जाती है—तृप्तिरूपसे वृष्टिमें, बलरूपसे विद्युत्में ॥ २ ॥ यशोरूपसे पशुओंमें, ज्योतिरूपसे नक्षत्रोंमें, पुत्रादि प्रजा, अमृतत्व और आनन्दरूपसे उपस्थमें तथा सर्वरूपसे आकाशमें [ब्रह्मकी उपासना करे]। वह ब्रह्म सबका प्रतिष्ठा (आधार) है—इस भावसे उसकी उपासना करे। इससे उपासक प्रतिष्ठावान् होता है । वह महः [नामक व्याहृति अथवा तेज] है—इस भावसे उसकी उपासना करे। इससे उपासक महान् होता है । वह मन है—इस प्रकार उपासना करे । इससे उपासक मानवान् (मनन करनेमें समर्थ) होता है ॥ ३ ॥ वह नमः है—इस CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

२३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

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२३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३ भावसे उसकी उपासना करे। इससे सम्पूर्ण काम्य पदार्थ उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं। वह ब्रह्म है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। इससे वह ब्रह्मनिष्ठ होता है। वह ब्रह्मका परिमर (आकाश) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। इससे उससे द्वेष करनेवाले उसके प्रति- पक्षी मर जाते हैं, तथा जो अप्रिय भ्रातृव्य (भाईके पुत्र) होते हैं वे भी मर जाते हैं। वह, जो कि इस पुरुषमें है और वह जो इस आदित्यमें है, एक है ॥ ४ ॥

तथा पृथिव्याकाशोपासकस्य | तथा पृथिवी और आकाशकी आतिथ्योपदेशः वसतौ वसतिनि- | [ अन्न एवं अन्नादरूपसे ] उपासना मित्तं कंचन कंचि- | करनेवालेके यहाँ रहनेके लिये कोई दपि न प्रत्याचक्षीत वसत्यर्थ- | भी आवे उसे उसका परित्याग नहीं मागतं न निवारयेदित्यर्थः । | करना चाहिये। अर्थात् अपने यहाँ वासे च दत्तेऽवश्यं ह्यशनं दात- | निवास करनेके लिये आये हुए व्यम् । तस्माद्यया कया च | किसी भी व्यक्तिका वह निवारण विधया येन केन च प्रकारेण | न करे। जब किसीको रहनेका बह्वन्नं प्राप्नुयाद्बह्वन्नसंग्रहं | स्थान दिया जाय तो उसे भोजन भी कुर्यादित्यर्थः । | अवश्य देना चाहिये । अतः जिस- | किसी भी विधिसे यानी किसी-न- | किसी प्रकार बहुत-सा अन्न प्राप्त | करे; अर्थात् खूब अन्न-संग्रह करे।

यस्मादन्नवन्तो विद्वांसोऽभ्या- | क्योंकि अन्नवान् उपासकगण गतायान्नार्थिनेऽराधि संसिद्ध- | अपने यहाँ आये हुए अन्नार्थीसे मष्मा अन्नमित्याचक्षते न | 'अन्न तैयार है' ऐसा कहते हैं- नास्तीति प्रत्याख्यानं कुर्वन्ति । | 'अन्न नहीं है' ऐसा कहकर उसका तस्माच्च हेतोर्बह्वन्नं प्राप्नुयादिति | परित्याग नहीं करते। इसलिये भी पूर्वेण संबन्धः । अपि चान्ना- | बहुत-सा अन्न उपार्जन करे—इस | प्रकार इसका पूर्ववाक्यसे सम्बन्ध

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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३३ [संस्कृत-मूल/भाष्य] नस्य माहात्म्यमुच्यते । यथा । यत्कालं प्रयच्छत्यन्नं तथा तत्कालमेव प्रत्युपनमते । कथ- मिति तदेतदाह— एतद्वा अन्नं मुखतो मुख्ये [हाशिया: वृत्तिभेदेनान्न-दानस्य फलभेदः] प्रथमे वयसि मु- ख्यया वा वृत्त्या पूजापुरःसरमभ्यागतायान्नार्थिने राद्धं संसिद्धं प्रयच्छतीति वाक्य- शेषः । तस्य किं फलं स्यादि- त्युच्यते—मुखतः पूर्वे वयसि मुख्यया वा वृत्त्यास्मा अन्नादा- यान्नं राध्यते यथादत्तमुपतिष्ठत इत्यर्थः । एवं मध्यतो मध्यमे वयसि मध्यमेन चोपचारेण । तथाऽन्ततोऽन्ते वयसि जघन्येन चोपचारेण परिभवेन तथैवास्मै राध्यते संसिध्यत्यन्नम् ॥ १ ॥ य एवं वेद य एवमन्नस्य यथोक्तं माहात्म्यं वेद तद्दानस्य च फलम्, तस्य यथोक्तं फल- मुपनमते । [भाष्यार्थ / हिन्दी अनुवाद] है । अब अन्नदानका माहात्म्य कहा जाता है—जो पुरुष जिस प्रकार और जिस समय अन्न-दान करता है उसे उसी प्रकार और उसी समय उसकी प्राप्ति होती है । ऐसा किस प्रकार होता है ? सो बतलाते हैं— जो पुरुष मुखतः—मुख्य—प्रथम अवस्थामें अथवा मुख्य वृत्तिसे यानी सत्कारपूर्वक राद्ध अर्थात् सिद्ध (पक्व) अन्नको अपने यहाँ आये हुए अन्नार्थी अतिथिको देता है— यहाँ प्रयच्छति (देता है) यह क्रियापद वाक्यशेष (अनुक्त अंश) है—उसे क्या फल मिलता है, सो बतलाया जाता है—इस अन्नदाताको मुखतः—प्रथम अवस्थामें अथवा मुख्य वृत्तिसे अन्न प्राप्त होता है; अर्थात् जिस प्रकार दिया जाता है उसी प्रकार प्राप्त होता है । इसी प्रकार मध्यतः मध्यम आयुमें अथवा मध्यम वृत्तिसे तथा अन्ततः—अन्तिम आयुमें अथवा निकृष्ट वृत्तिसे यानी तिरस्कारपूर्वक देनेसे इसे उसी प्रकार अन्नकी प्राप्ति होती है ॥१॥ जो इस प्रकार जानता है—जो इस प्रकार अन्नका पूर्वोक्त माहात्म्य और उसके दानका फल जानता है उसे पूर्वोक्त फलकी प्राप्ति होती है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

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२३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

[संस्कृत-भाष्यम् / Left Column]

[पार्श्व-टिप्पणी:] ब्रह्मोपासन-प्रकारान्तराणि 'मानुषी समाज्ञा'

इदानीं ब्रह्मण उपासनप्रकार उच्यते--क्षेम इति वाचि । क्षेमो ना- मोपात्तपरिरक्षणम् । ब्रह्म वाचि क्षेमरूपेण प्रतिष्ठित- मित्युपास्यम् । योगक्षेम इति, योगोऽनुपात्तस्योपादानम्, तौ हि योगक्षेमौ प्राणापानयोः सतो- र्भवतो यद्यपि तथापि न प्राणा- पाननिमित्तावेव किं तर्हि ब्रह्म- निमित्तौ; तस्माद्ब्रह्म योगक्षेमा- त्मना प्राणापानयोः प्रतिष्ठित- मित्युपास्यम् । एवमुत्तरेष्वन्येषु तेन तेना- त्मना ब्रह्मैवोपास्यम् । कर्मणो ब्रह्मनिर्वर्त्यत्वाद्धस्तयोः कर्मा- त्मना ब्रह्म प्रतिष्ठितमित्युपा- स्यम् । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इत्येता मानुषीर्मनुष्येषु भवा मानुष्यः


[हिन्दी-अनुवाद / Right Column]

अब ब्रह्मकी उपासनाका [ एक और ] प्रकार बतलाया जाता है— 'क्षेम है' इस प्रकार वाणीमें । प्राप्त पदार्थकी रक्षा करनेका नाम 'क्षेम' है । वाणीमें ब्रह्म क्षेमरूपसे स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । 'योगक्षेम'—अप्राप्त वस्तुका प्राप्त करना 'योग' कहलाता है । वे योग और क्षेम यद्यपि बलवान् प्राण और अपानके रहते हुए ही होते हैं, तो भी उनका कारण प्राण एवं अपान ही नहीं है । तो उनका कारण क्या है ? वे ब्रह्मके कारण ही होते हैं । अतः योगक्षेमरूपसे ब्रह्म प्राण और अपान- में स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । इसी प्रकार आगेके अन्य पर्यायों- में भी उन-उनके रूपसे ब्रह्मकी ही उपासना करनी चाहिये । कर्म ब्रह्मकी ही प्रेरणासे निष्पन्न होता है; अतः हाथोंमें ब्रह्म कर्मरूपसे स्थित है—इस प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिये । चरणोंमें गतिरूपसे और पायुमें विसर्जनरूपसे [ प्रतिष्ठित समझकर उसकी उपासना करे ] । इस प्रकार यह मानुषी—मनुष्योंमें


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