भारतकोश
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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

१४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ विज्ञानं यज्ञं तनुते । विज्ञान- | विज्ञान यज्ञका विस्तार करता विज्ञानमयो- वान्हि यज्ञं तनोति | है अर्थात् विज्ञानवान् पुरुष ही पासनम् श्रद्धादिपूर्वकम् । | श्रद्धादिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करता अतो विज्ञानस्य कर्तृत्वं तनुत | है। अतः यज्ञानुष्ठानमें विज्ञानका कर्तृत्व है और तनुते—इसका भाव इति कर्माणि च तनुते । यस्मा- | यह है कि वही कर्मोंका भी द्विज्ञानकर्तृकं सर्वं तस्माद्युक्तं | विस्तार करता है। इस प्रकार क्योंकि सब कुछ विज्ञानका ही विज्ञानमय आत्मा ब्रह्मेति । | किया हुआ है इसलिये 'विज्ञानमय आत्मा ब्रह्म है' ऐसा कहना ठीक किं च विज्ञानं ब्रह्म सर्वे देवा | ही है। यही नहीं, इन्द्रादि सम्पूर्ण इन्द्रादयो ज्येष्ठं प्रथमजत्वात्सर्व- | देवगण विज्ञानब्रह्मकी, जो सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला होनेसे प्रवृत्तीनां वा तत्पूर्वकत्वात्प्रथमजं | ज्येष्ठ है अथवा समस्त वृत्तियाँ विज्ञानपूर्वक होनेके कारण जो विज्ञानं ब्रह्मोपासते ध्यायन्ति | प्रथमोत्पन्न है, उस विज्ञानरूप ब्रह्मकी तस्मिन्विज्ञानमये ब्रह्मण्यभि- | उपासना अर्थात् ध्यान करते हैं। तात्पर्य यह है कि वे उस विज्ञानमय मानं कृत्वोपासत इत्यर्थः । | ब्रह्ममें अभिमान करके उसकी .उपासना करते हैं। अतः वे उस तस्मात्ते महतो ब्रह्मण उपा- | महद्ब्रह्मकी उपासना करनेसे ज्ञान सनाज्ज्ञानैश्वर्यवन्तो भवन्ति । | और ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं। तच्च विज्ञानं ब्रह्म चेद्यदि वेद | उस विज्ञानरूप ब्रह्मको यदि विजानाति न केवलं वेदैव तस्मा- | जान ले—केवल जान ही न ले बल्कि द्ब्रह्मणश्चेन्न प्रमाद्यति बाह्येष्वेवा- | यदि उससे प्रमाद भी न करे; बाह्य अनात्म पदार्थोंमें आत्मबुद्धि की नात्मस्वात्मभावितत्वात्प्राप्तं वि- | हुई है, उसके कारण विज्ञानमय ज्ञानमये ब्रह्मण्यात्मभावनायाः | ब्रह्ममें की हुई आत्मभावनासे प्रमाद

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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४३ प्रमदनं तन्निवृत्त्यर्थमुच्यते तस्मा- | होना सम्भव है; उसकी निवृत्तिके च्चेन्न प्रमाद्यतीति, अन्नमयादिष्वा- | लिये कहते हैं—'यदि उससे प्रमाद त्मभावं हित्वा केवले विज्ञान- | न करे' इत्यादि । तात्पर्य यह है मये ब्रह्मण्यात्मत्वं भावयन्नास्ते | कि यदि अन्नमय आदिमें आत्मभाव- चेदित्यर्थः । | को छोड़कर केवल विज्ञानमय ब्रह्ममें ततः किं स्यादित्युच्यते— | ही आत्मत्वकी भावना करके स्थित [विज्ञानब्रह्मो-पासनफलम्] शरीरे पाप्मनो हित्वा । शरीराभि- | रहे— माननिमित्ता हि सर्वे पाप्मानः | तो क्या होगा ? इसपर कहते तेषां च विज्ञानमये ब्रह्मण्यात्माभि- | हैं—शरीरके पापोंको त्यागकर, मानान्निमित्तापाये हानमुपपद्यते, | सम्पूर्ण पाप शरीराभिमानके कारण छत्रापाय इवच्छायापायः । | ही होनेवाले हैं; विज्ञानमय ब्रह्ममें तस्माच्छरीराभिमाननिमित्तान् | आत्मत्वका अभिमान करनेसे निमित्त- सर्वान्पाप्मनः शरीरप्रभवाञ्शरीर | का क्षय हो जानेपर उनका भी एव हित्वा विज्ञानमयब्रह्मस्वरू- | क्षय होना उचित ही है, जिस पापन्नस्तत्स्थान्सर्वान्कामान्विज्ञा- | प्रकार कि छातेके हटा लिये जानेपर नमयेनैवात्मना समश्नुते सम्य- | छायाकी भी निवृत्ति हो जाती है । ग्भुङ्क्त इत्यर्थः । | अतः शरीराभिमानके कारण होने- तस्य पूर्वस्य मनोमयस्यात्मैष | वाले शरीरजनित सम्पूर्ण पापोंको [आनन्दमयस्य कार्यात्मत्वस्थापनम्] एव शरीरे मनोमये भवः शारीरः। कः ? | शरीरहीमें त्यागकर विज्ञानमय ब्रह्म- य एष विज्ञानमयः । तस्माद्वा | स्वरूपको प्राप्त हुआ साधक उसमें स्थित सारे भोगोंको विज्ञानमय स्वरूपसे ही सम्यक्प्रकारसे प्राप्त कर लेता है अर्थात् उनका पूर्णतया उपभोग करता है । उस पूर्वकथित मनोमयका शारीर— मनोमय शरीरमें रहनेवाला आत्मा भी यही है । कौन ? यह जो विज्ञानमय है । 'तस्माद्वा एतस्मात्'

१४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

एतस्मादित्युक्तार्थम् । आनन्द- | इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा मय इति कार्यात्मप्रतीतिरधि- | जा चुका है। 'आनन्दमय' इस शब्दसे कार्यात्माकी प्रतीति होती कारान्मयट्शब्दाच्च । अन्नादि- | है; क्योंकि यहाँ उसीका अधिकार (प्रसङ्ग) है और आनन्दके साथ मया हि कार्यात्मानो भौतिका | 'मयट्' शब्दका प्रयोग किया गया है। यहाँ अन्नमय आदि भौतिक इहाधिकृताः । तदधिकारपतित- | कार्यात्माओंका अधिकार है; उन्हींके अन्तर्गत यह आनन्दमय भी है। श्चायमानन्दमयः, मयट् चात्र वि- | 'मयट्' प्रत्यय भी यहाँ विकारके अर्थमें देखा गया है; जैसा कि कारार्थे दृष्टो यथान्नमय इत्यत्र । | 'अन्नमय' इस शब्दमें है। अतः आनन्दमय कार्यात्मा है—ऐसा तस्मात्कार्यात्मानन्दमयः प्रत्ये- | जानना चाहिये । तव्यः । | संक्रमणके कारण भी यही बात संक्रमणाच्च; आनन्दमयमा- | सिद्ध होती है। 'वह आनन्दमय आत्माके प्रति संक्रमण करता है त्मानमुपसंक्रामतीति वक्ष्यति । | [अर्थात् आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है]' ऐसा आगे (अष्टम कार्यात्मनां च संक्रमणमनात्मनां | अनुवाकमें) कहेंगे । अन्नमयादि अनात्मा कार्यात्माओंका ही संक्रमण दृष्टम् । संक्रमणकर्मत्वेन चा- | होता देखा गया है। और संक्रमणके कर्मरूपसे आनन्दमय आत्माका नन्दमय आत्मा श्रूयते । यथान्न- | श्रवण होता है, जैसे कि 'यह अन्नमय आत्माके प्रति संक्रमण मयमात्मानमुपसंक्रामतीति । न | (गमन) करता है' [इस वाक्यमें देखा जाता है]। स्वयं आत्माका चात्मन एवोपसंक्रमणम् । अधि- | ही संक्रमण होना सम्भव है नहीं; क्योंकि इससे उस प्रसङ्गमें विरोध कारविरोधादसंभवाच्च । न ह्या- | आता है और ऐसा होना सम्भव भी नहीं है। आत्माका आत्माक

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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५

त्मनैवात्मन उपसंक्रमणं संभ- | ही प्राप्त होना कभी सम्भव नहीं वति । स्वात्मनि भेदाभावात् । | है; क्योंकि अपने आत्मामें भेदका आत्मभूतं च ब्रह्म सङ्क्रमितुः । | सर्वथा अभाव है और ब्रह्म भी | संक्रमण करनेवालेका आत्मा ही है । शिरआदिकल्पनानुपपत्तेश्च । | [ आत्मामें ] शिर आदिकी न हि यथोक्तलक्षण आकाशादि- | कल्पना असम्भव होनेके कारण भी कारणेऽकार्यपतिते शिरआद्यवयव- | [ आनन्दमय कार्यात्मा ही है ] । रूपकल्पनोपपद्यते । "अदृश्ये- | आकाशादिके कारण और कार्यवर्गके ऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयने" (तै० | अन्तर्गत न आनेवाले उपर्युक्त उ० २ । ७ । १) "अस्थूल- | लक्षणविशिष्ट आत्मामें शिर आदि मनणु" (बृ० उ० ३ । ८ । ८) | अवयवरूप कल्पनाका होना संगत "नेति नेत्यात्मा" (बृ० उ० ३। ९ । | नहीं है । आत्मामें विशेष धर्मोंका २६) इत्यादिविशेषापोहश्रुति- | बाध करनेवाली "अदृश्य, अशरीर, भ्यश्च । | अनिर्वचनीय और अनाश्रयमें" "स्थूल | और सूक्ष्मसे रहित" "आत्मा यह | नहीं है यह नहीं है" इत्यादि श्रुतियोंसे | भी यही बात सिद्ध होती है । मन्त्रोदाहरणानुपपत्तेश्च । न | [ आनन्दमयको यदि आत्मा हि प्रियशिरआद्यवयवविशिष्टे | माना जाय तो ] आगे कहे हुए प्रत्यक्षतोऽनुभूयमान आनन्दमय | मन्त्रका उदाहरण देना भी नहीं आत्मनि ब्रह्मणि नास्ति ब्रह्मेत्या- | बनता । शिर आदि अवयवोंसे युक्त शङ्काभावात् "असन्नेव स | आनन्दमय आत्मारूप ब्रह्मके प्रत्यक्ष भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत्" | अनुभव होनेपर तो ऐसी शंका ही (तै० उ० २ । ६ । १) इति | नहीं हो सकती कि ब्रह्म नहीं है, | जिससे कि [ उस शंकाकी निवृत्ति- | के लिये ] "जो पुरुष, ब्रह्म नहीं | है—ऐसा जानता है वह असद्रूप तै० उ० १९-२०—

१४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

[ वाम भाग / संस्कृत ]

मन्त्रोदाहरणमुपपद्यते । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठेत्यपि चानुपपन्नं पृथग्ब्र- ह्मणः प्रतिष्ठात्वेन ग्रहणम् । तस्मात्कार्यपतित एवानन्दमयो न पर एवात्मा । आनन्द इति विद्याकर्मणोः [आनन्दमयकोश-प्रतिपादनम्] फलं तद्विकार आ- नन्दमयः । स च विज्ञानमयादान्तरः । यज्ञा- दिहेतोर्विज्ञानमयादस्यान्तरत्व- श्रुतेः । ज्ञानकर्मणोर्हि फलं भोक्त्रर्थत्वादान्तरतमं स्यात् । आन्तरतमश्चानन्दमय आत्मा पूर्वेभ्यः । विद्याकर्मणोः प्रिया- द्यर्थत्वाच्च । प्रियादिप्रयुक्ते हि विद्याकर्मणी । तस्मात्प्रियादीनां फलरूपाणामात्मसंनिकर्षाद्वि- ज्ञानमयस्याभ्यन्तरत्वमुपपद्यते । प्रियादिवासनानिर्वृत्तो ह्यानन्द-


[ दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद ]

ही है" इस मन्त्रका उल्लेख संगत हो सके । तथा 'ब्रह्म पुच्छ-प्रतिष्ठा है' इस वाक्यके अनुसार प्रतिष्ठा- रूपसे ब्रह्मको पृथक् ग्रहण करना भी नहीं बन सकता । अतः यह आनन्दमय कार्यवर्गके अन्तर्गत ही है—परमात्मा नहीं है । 'आनन्द' यह उपासना और कर्मका फल है, उसका विकार आनन्दमय कहलाता है । वह विज्ञानमय कोशसे आन्तर है; क्योंकि श्रुतिके द्वारा वह यज्ञादिके कारणभूत विज्ञानमयकी अपेक्षा आन्तर बतलाया गया है । उपासना और कर्मका फल भोक्ताके ही लिये है, इसलिये वह सबसे आन्तरतम होना चाहिये; सो पूर्वोक्त सब कोशोंकी अपेक्षा आनन्दमय आत्मा आन्तरतम है ही; क्योंकि विद्या और कर्म भी [ प्रधानतया ] प्रिय आदिके ही लिये हैं । प्रिय आदिकी प्राप्तिके उद्देश्यसे ही उपासना और कर्मका अनुष्ठान किया जाता है; अतः उनके फलरूप प्रिय आदिका आत्मासे सान्निध्य होनेके कारण विज्ञानमयकी अपेक्षा इस ( आनन्दमय कोश ) का आन्तरतम होना उचित ही है । प्रिय आदिकी वासनासे निष्पन्न


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अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७ मयो विज्ञानमयाश्रितः स्वप्न उप- | हुआ यह आनन्दमय स्वप्नावस्थामें लभ्यते । | विज्ञानमयके अधीन ही उपलब्ध होता है । तस्यानन्दमयस्यात्मन इष्ट- | उस आनन्दमय आत्माका पुत्रादि [आनन्दमयस्य पुरुषविधत्वम्] पुत्रादिदर्शनजं प्रियं | इष्ट पदार्थोंके दर्शनसे होनेवाला शिर इव शिरः | प्रिय ही प्रधानताके कारण शिरके प्राधान्यात् । मोद इति प्रिय- | समान शिर है । प्रिय पदार्थकी लाभनिमित्तो हर्षः । स एव च | प्राप्तिसे होनेवाला हर्ष 'मोद' प्रकृष्टो हर्षः प्रमोदः । आनन्द | कहलाता है; वही हर्ष प्रकृष्ट इति सुखसामान्यमात्मा प्रिया- | ( अतिशय) होनेपर 'प्रमोद' कहा दीनां सुखावयवानाम् । तेष्वनु- | जाता है । 'आनन्द' सामान्य स्यूतत्त्वात् । | सुखका नाम है; वह सुखके अवयवभूत प्रिय आदिका आत्मा है; क्योंकि उसीमें वे सब अनुस्यूत हैं । आनन्द इति परं ब्रह्म । तद्धि | 'आनन्द' यह परब्रह्मका ही शुभकर्मणा प्रत्युपस्थाप्यमाने | वाचक है । वही शुभकर्मद्वारा पुत्रमित्रादिविषयविशेषोपाधाव- | प्रस्तुत किये हुए पुत्र-मित्रादि विशेष न्तःकरणवृत्तिविशेषे तमसा प्र- | विषय ही जिसकी उपाधि हैं उस च्छाद्यमाने प्रसन्नेऽभिव्यज्यते । | सुप्रसन्न अन्तःकरणकी वृत्तिविशेष- तद्विषयसुखमिति प्रसिद्धं लोके । | में, जब कि वह तमोगुणसे आच्छादित तद्वृत्तिविशेषप्रत्युपस्थापकस्य क- | नहीं होता, अभिव्यक्त होता है । र्मणोऽनवस्थितत्वात्सुखस्य क्षणि- | वह लोकमें विषय-सुख नामसे प्रसिद्ध कत्वम् । तद्यदान्तःकरणं तपसा | है । उस वृत्तिविशेषको प्रस्तुत करनेवाले कर्मके अस्थिर होनेके तमोघ्नेन विद्यया ब्रह्मचर्येण श्रद्धया | कारण उस सुखकी भी क्षणिकता है। अतः जिस समय अन्तःकरण तमोगुणको नष्ट करनेवाले तप, उपासना, ब्रह्मचर्य और श्रद्धाके द्वारा

१४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१४८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ च निर्मलत्वमापद्यते यावद्याव- | जितना-जितना निर्मलताको प्राप्त त्तावत्तावद्विविक्ते प्रसन्नेऽन्तः- | होता है उतने-उतने ही स्वच्छ और करण आनन्दविशेष उत्कृष्यते | प्रसन्न हुए उस अन्तःकरणमें विशेष आनन्दका उत्कर्ष होता है अर्थात् विपुलीभवति । वक्ष्यति च— | वह बहुत बढ़ जाता है। यही बात "रसो वै सः । रसँह्येवायं | “वह रस ही है, इस रसको पाकर लब्ध्वानन्दी भवति । एष ह्येवान- | ही पुरुष आनन्दी हो जाता है। न्दयति” ( तै० उ० २ । ७ । | यह रस ही सबको आनन्दित करता है।” इस प्रकार आगे कहेंगे, १) “एतस्यैवानन्दस्यान्यानि | तथा “इस आनन्दके अंशमात्रके भूतानि मात्रामुपजीवन्ति” (बृ० | आश्रय ही सब प्राणी जीवित रहते उ० ४ । ३ । ३२) इति च | हैं” इस अन्य श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। इसी प्रकार काम- श्रुत्यन्तरात् । एवं च कामोप- | शान्तिके उत्कर्षकी अपेक्षा आगे- शमोत्कर्षापेक्षया शतगुणोत्तरो- | आगेके आनन्दका सौ-सौ गुना त्तरोत्कर्ष आनन्दस्य वक्ष्यते । | उत्कर्ष आगे बतलाया जायगा । एवं चोत्कृष्यमाणस्यानन्द- | इस प्रकार परमार्थ ब्रह्मके विज्ञान- मयस्यात्मनः परमार्थब्रह्मविज्ञाना- | की अपेक्षासे क्रमशः उत्कर्षको प्राप्त होनेवाले आनन्दमय आत्माकी पेक्षया ब्रह्म परमेव । यत्प्रकृतं | अपेक्षा ब्रह्म पर ही है। जो प्रकृत ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप है, सत्यज्ञानानन्तलक्षणम्, यस्य | जिसकी प्राप्तिके लिये अन्नमय आदि च प्रतिपत्त्यर्थं पञ्चान्नादिमयाः | पाँच कोशोंका उपन्यास किया गया कोशा उपन्यस्ताः, यच्च तेभ्य | है, जो उन सबकी अपेक्षा अन्तर्वर्ती है, और जिसके द्वारा वे सब आभ्यन्तरम्, येन च ते सर्व | आत्मवान् हैं—वह ब्रह्म ही उस आत्मवन्तः, तद्ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । | आनन्दमयकी पुच्छ-प्रतिष्ठा है।

अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४९

तदेव च सर्वस्याविद्यापरि- अविद्याद्वारा कल्पना किये हुए कल्पितस्य द्वैतस्यावसानभूत- सम्पूर्ण द्वैतका निषेधावधिभूत वह मद्वैतं ब्रह्म प्रतिष्ठा आनन्द- अद्वैत ब्रह्म ही उसकी प्रतिष्ठा है; मयस्य । एकत्वावसानत्वात् । क्योंकि आनन्दमयका पर्यवसान भी अस्ति तदेकमविद्याकल्पितस्य एकत्वमें ही होता है । अविद्या- द्वैतस्यावसानभूतमद्वैतं ब्रह्म परिकल्पित द्वैतका अवसानभूत वह प्रतिष्ठा पुच्छम् । तदेतस्मिन्नप्यर्थ एक और अद्वितीय ब्रह्म उसकी प्रतिष्ठा यानी पुच्छ है । उस इसी एष श्लोको भवति ॥ १ ॥ अर्थमें यह श्लोक है ॥ १ ॥ —••|ॐ|••— इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां पञ्चमोऽनुवाकः ॥ ५ ॥

षष्ठ अनुवाक ब्रह्मको सत् और असत् जाननेवालोंका भेद, ब्रह्मज्ञ और अब्रह्मज्ञकी ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें शंका तथा सम्पूर्ण प्रपञ्चरूपसे ब्रह्मके स्थित होनेका निरूपण असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । अथातोऽनुप्रश्नाः । उता- विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चन गच्छती ३ । आहो विद्वा- नमुं लोकं प्रेत्य कश्चित्समश्नुता ३ उ । सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा इदꣳसर्वमसृजत यदिदं किंच । तत्सृष्ट्वा तदेवानु- प्राविशत् । तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च विज्ञानं चावि- ज्ञानं च । सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् । यदिदं किंच । तत्सत्यमित्याचक्षते । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ यदि पुरुष 'ब्रह्म असत् है' ऐसा जानता है तो वह स्वयं भी असत् ही हो जाता है । और यदि ऐसा जानता है कि 'ब्रह्म है' तो [ ब्रह्मवेत्ता- जन ] उसे सत् समझते हैं । उस पूर्वकथित ( विज्ञानमय ) का यह जो [ आनन्दमय ] है शरीर-स्थित आत्मा है । अब ( आचार्यका ऐसा उपदेश सुननेके अनन्तर शिष्यके ) ये अनुप्रश्न हैं—क्या कोई अविद्वान् पुरुष भी इस शरीरको छोड़नेके अनन्तर परमात्माको प्राप्त हो सकता है ? अथवा कोई विद्वान् भी इस शरीरको छोड़नेके अनन्तर परमात्माको CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५१ प्राप्त होता है या नहीं ? [ इन प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिये आचार्य भूमिका बाँधते हैं— ] उस परमात्माने कामना की 'मैं बहुत हो जाऊँ अर्थात् मैं उत्पन्न हो जाऊँ ।' अतः उसने तप किया । उसने तप करके ही यह जो कुछ है इस सबकी रचना की । इसे रचकर वह इसीमें अनुप्रविष्ट हो गया । इसमें अनुप्रवेश कर वह सत्यस्वरूप परमात्मा मूर्त्त- अमूर्त्त, [ देशकालादि परिच्छिन्नरूपसे ] कहे जानेयोग्य और न कहे जानेयोग्य, आश्रय-अनाश्रय, चेतन-अचेतन एवं व्यावहारिक सत्य-असत्य- रूप हो गया । यह जो कुछ है उसे ब्रह्मवेत्ता लोग 'सत्य' इस नामसे पुकारते हैं । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥१॥

असन्नेवासत्सम एव यथा- | जिस प्रकार असत् ( अविद्यमान ) सन्न पुरुषार्थसंब- | पदार्थ पुरुषार्थसे सम्बन्ध रखनेवाला सदसद्वादिनोर्भेदः | नहीं होता उसी प्रकार वह भी न्ध्येवं स भवति | असत्—असत्के समान ही पुरुषार्थसे सम्बन्ध नहीं रखनेवाला अपुरुषार्थसंबन्धी । कोऽसौ ? | हो जाता है—वह कौन ? जो 'ब्रह्म असत्—अविद्यमान है' ऐसा योऽसदविद्यमानं ब्रह्मेति वेद | जानता है । 'चेत्' शब्दका अर्थ 'यदि' है । इसके विपरीत 'जो विजानाति चेद्यदि । तद्विपर्ययेण | तत्त्व सम्पूर्ण विकल्पोंका आश्रय, समस्त प्रवृत्तियोंका बीजरूप और यत्सर्वविकल्पास्पदं सर्वप्रवृत्ति- | सम्पूर्ण विशेषोंसे रहित भी है वही ब्रह्म है' ऐसा यदि कोई जानता है बीजं सर्वविशेषप्रत्यस्तमितमप्य- | [ तो उसे ब्रह्मवेत्तालोग सद्रूप समझते हैं इस प्रकार इसका आगेके वाक्यसे स्ति तद्ब्रह्मेति वेद चेत् । | सम्बन्ध है ] । कुतः पुनराशङ्का तन्नास्तित्वे ? | किन्तु ब्रह्मके अस्तित्वाभावके विषयमें शंका क्यों की जाती है ? व्यवहारातीतत्वं ब्रह्मण इति | [ इसपर ] हमारा यह कथन है कि ब्रह्म व्यवहारसे परे है । [ इसी- ब्रूमः । व्यवहारविषये हि वाचा- | लिये ] व्यवहारके विषयभूत पदार्थों-

१५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१५२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


[मूल संस्कृत (शाङ्करभाष्य)]

रम्भणमात्रेऽस्तित्वभाविता बुद्धि- स्तद्विपरीते व्यवहारातीते नास्ति- त्वमपि प्रतिपद्यते । यथा घटा- दिर्व्यवहारविषयतयोपपन्नः सं- स्तद्विपरीतोऽसन्निति प्रसिद्धम् । एवं तत्सामान्यादिहापि स्याद्ब्रह्म- णो नास्तित्वप्रत्याशङ्का । तस्मा- दुच्यते—अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेदेति ।

किं पुनः स्यात्तदस्तीति वि- जानतस्तदाह—सन्तं विद्यमान- ब्रह्मस्वरूपेण परमार्थसदात्मापन्न- मेनमेवंविदं विदुर्ब्रह्मविदस्तत- स्तस्मादस्तित्ववेदनात्सोऽन्येषां ब्रह्मवद्विज्ञेयो भवतीत्यर्थः ।

अथवा यो नास्ति ब्रह्मेति मन्यते स सर्वस्यैव सन्मार्गस्य वर्णाश्रमादिव्यवस्थालक्षणस्याश्र-


[हिन्दी अनुवाद]

में ही, जो कि केवल वाणीसे ही उच्चारण किये जानेवाले हैं, अस्तित्व- की भावनासे भावित हुई बुद्धि उनसे विपरीत व्यवहारातीत पदार्थों- में अस्तित्वका भी अनुभव नहीं करती; जैसे कि [ जल लाना आदि ] व्यवहारके विषयरूपसे उपपन्न हुआ घट आदि पदार्थ 'सत्' और उससे विपरीत [ वन्ध्यापुत्रादि ] 'असत्' होता है—इस प्रकार प्रसिद्ध है । उसी प्रकार उसकी समानताके कारण यहाँ भी ब्रह्मके अविद्यमानत्व- के विषयमें शंका हो सकती है । इसीलिये कहा है—'ब्रह्म है-ऐसा यदि कोई जानता है' इत्यादि ।

किन्तु ‘वह ( ब्रह्म ) है’ ऐसा जाननेवाले पुरुषको क्या फल मिलता है ? इसपर कहते हैं—ब्रह्मवेत्तालोग इस प्रकार जाननेवाले इस पुरुषको सत्—विद्यमान अर्थात् ब्रह्मरूपसे परमार्थ सत्स्वरूपको प्राप्त हुआ समझते हैं । तात्पर्य यह है कि इस कारणसे ब्रह्मके अस्तित्वको जाननेके कारण वह दूसरोंके लिये ब्रह्मके समान जाननेयोग्य हो जाता है ।

अथवा जो पुरुष ‘ब्रह्म नहीं है’ ऐसा मानता है वह अश्रद्धालु होनेके कारण, वर्णाश्रमादि व्यवस्था-रूप सारे ही शुभमार्गका,

अनु० ६] शाङ्करभाष्यार्थ १५३ दधानतया नास्तित्वं प्रतिपद्यते- | असत्त्व प्रतिपादन करता है; ऽब्रह्मप्रतिपत्त्यर्थत्वात्तस्य । अतो | क्योंकि वह भी ब्रह्मकी प्राप्तिके ही नास्तिकः सोऽसन्नसाधुरुच्यते | लिये है । अतः वह नास्तिक लोकमें लोके । तद्विपरीतः सन्योऽस्ति | असत्-असाधु कहा जाता है । ब्रह्मेति चेद्वेद स तद्ब्रह्मप्रतिपत्ति- | इसके विपरीत जो पुरुष 'ब्रह्म है' हेतुं सन्मार्गं वर्णाश्रमादिव्यव- | ऐसा जानता है वह 'सत्' है; स्थालक्षणं श्रद्दधानतया यथा- | क्योंकि वह उस ब्रह्मकी प्राप्तिके वत्प्रतिपद्यते यस्मात्ततस्तस्मात् | हेतुभूत वर्णाश्रमादिके व्यवस्थारूप सन्तं साधुमार्गस्थमेनं विदुः | सन्मार्गको श्रद्धापूर्वक ठीक-ठीक साधवः तस्मादस्तीत्येव ब्रह्म | जानता है । इसीलिये साधुलोग उसे प्रतिपत्तव्यमिति वाक्यार्थः । | सत् यानी शुभ मार्गमें स्थित जानते तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष | हैं । अतः 'ब्रह्म है' ऐसा ही एव शरीरे विज्ञानमये भवः | जानना चाहिये—यह इस वाक्यका शारीर आत्मा । कोऽसौ ? य एष | अर्थ है । आनन्दमयः । तं प्रति नास्त्या- | उस विज्ञानमयका यही शारीर— शङ्का नास्तित्वे । अपोढसर्व- | विज्ञानमय शरीरमें रहनेवाला आत्मा विशेषत्वात्तु ब्रह्मणो नास्तित्वं | है । वह कौन ? यह जो आनन्दमय प्रत्याशङ्का युक्ता । सर्वसामा- | है उसके नास्तित्वमें तो कुछ भी न्याच्च ब्रह्मणः । यस्मादेवमत- | शंका नहीं है । किन्तु ब्रह्म सम्पूर्ण स्तस्मात्, अथानन्तरं श्रोतुः | विशेषणोंसे रहित है इसलिये उसके शिष्यस्यानुप्रश्ना आचार्योक्तिमनु | अस्तित्वके अभावमें शंका होना एते प्रश्ना अनुप्रश्नाः । | उचित ही है । इसके सिवा ब्रह्मकी | सबके साथ समानता होनेके कारण | भी [ऐसी शंका हो ही सकती है] । | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये अब— | इसके अनन्तर श्रवण करनेवाले | शिष्यके अनुप्रश्न हैं । आचार्यकी | इस उक्ति के पश्चात् किये जानेवाले | ये प्रश्न—अनुप्रश्न हैं—

१५४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१५४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

सामान्यं हि ब्रह्माकाशादि- | आकाशादिका कारण होनेसे [हाशिया: विद्वदविद्वद्भेदेन] कारणत्वाद्विदुषो- | ब्रह्म विद्वान् और अविद्वान् दोनों- [हाशिया: ब्रह्मप्राप्तावाक्षेपः] ऽविदुषश्च। तस्माद्- | हीके लिये समान है । इससे विदुषोऽपि ब्रह्मप्राप्तिराशङ्क्यते- | अविद्वान्को भी ब्रह्मकी प्राप्ति होती उत अपि अविद्वानमुं लोकं | है—ऐसी आशंका की जाती है— परमात्मानमितः प्रेत्य कश्चन, | क्या कोई अविद्वान् पुरुष भी इस चनशब्दोऽप्यर्थे, अविद्वानपि | शरीरको छोड़नेके अनन्तर इस लोक गच्छति प्राप्नोति किं वा न गच्छ- | अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाता तीति द्वितीयोऽपि प्रश्नो द्रष्ट- | है ?—'कश्चन' में 'चन' शब्द 'अपि व्योऽनुप्रश्ना इति बहुवचनात् । | (भी)' के अर्थमें है । 'अथवा | नहीं होता ?' यह इसके साथ | दूसरा प्रश्न भी समझना चाहिये; | क्योंकि यहाँ 'अनुप्रश्नाः' ऐसा बहु- | वचनका प्रयोग किया गया है । विद्वांसं प्रत्यन्यौ प्रश्नौ । यद्य- | विद्वान्सामान्यं कारणमपि ब्रह्म | अन्य दो प्रश्न विद्वान्के विषयमें न गच्छति ततो विदुषोऽपि | हैं—ब्रह्म सबका साधारण कारण है, ब्रह्मागमनमाशङ्क्यते । अतस्तं | तब भी यदि अविद्वान् उसे प्राप्त प्रति प्रश्न आहो विद्वानिति । | नहीं होता तो विद्वान्के भी ब्रह्मको उकारं च वक्ष्यमाणमधस्तादप- | प्राप्त न होनेकी आशंका होती है; कृष्य तकारं च पूर्व- | अतः उसके उद्देश्यसे पूछा जाता स्मादुतशब्दाद्व्यासज्याहो इत्ये- | है—'क्या विद्वान् भी' आदि । तस्मात्पूर्वमुतशब्दं संयोज्य | [मूल मन्त्रमें] आगे कहे जानेवाले पृच्छति—उताहो विद्वानिति । | 'उ' को आगेसे खींचकर और | पूर्वोक्त 'उत' शब्दसे उसमें 'त' | जोड़कर 'आहो' इस शब्दके पहले | 'उत' शब्द जोड़कर 'उताहो विद्वान्' | इत्यादि प्रकारसे पूछता है—क्या CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ विद्वान्ब्रह्मविदपि कश्चिदितः प्रे- | कोई विद्वान् अर्थात् ब्रह्मवेत्ता भी त्यामुं लोकं समश्नुते प्राप्नोति | इस शरीरको छोड़कर इस लोकको | प्राप्त कर लेता है ? यहाँ मूलमें समश्नुते उ इत्येवंस्थिते, | 'समश्नुते उ' ऐसा पद था । उसमें अयादेशे यलोपे च कृते- | 'अय्' आदेश करके [ ‘लोपः | शाकल्यस्य' इस सूत्रके अनुसार ] ऽकारस्य प्लुतिः समश्नुता ३ उ | 'य्' का लोप करनेपर 'समश्नुत उ' | ऐसा प्रयोग सिद्ध होता है । फिर इति । विद्वान्समश्नुतेऽमुं | 'त' के अकारको प्लुत करनेपर | 'समश्नुता ३ उ' ऐसा पाठ हुआ लोकम् । किं वा यथाविद्वानेवं | है । विद्वान् इस लोकको प्राप्त होता | है ? अथवा अविद्वान्‌के समान विद्वानपि न समश्नुत इत्यपरः | विद्वान् भी उसे प्राप्त नहीं होता ? प्रश्नः । | यह एक अन्य प्रश्न है । द्वावेव वा प्रश्नौ विद्वदविद्व- | अथवा विद्वान् और अविद्वान्‌से द्विषयौ । बहुवचनं तु सामर्थ्य- | सम्बन्धित ये केवल दो ही प्रश्न हैं । | इनकी सामर्थ्यसे प्राप्त एक और प्राप्तप्रश्नान्तरापेक्षया घटते । | प्रश्नकी अपेक्षासे ही बहुवचन हो 'असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति | गया है । 'ब्रह्म असत् है — यदि | ऐसा जानता है' तथा 'ब्रह्म है- ब्रह्मेति चेद्वेद' इति श्रवणादस्ति | यदि ऐसा जानता है' ऐसी श्रुति नास्तीति संशयस्ततोऽर्थप्राप्तः कि- | होनेसे 'ब्रह्म है या नहीं' ऐसा | सन्देह होता है । अतः 'ब्रह्म है या मस्ति नास्तीति प्रथमोऽनुप्रश्नः । | नहीं' यह अर्थतः प्राप्त पहला अनु- ब्रह्मणोऽपक्षपातित्वादविद्वान् | प्रश्न है । और ब्रह्म पक्षपाती है नहीं, गच्छति न गच्छतीति द्वितीयः । | इसलिये 'अविद्वान् उसे प्राप्त होता | है या नहीं ?' यह दूसरा अनुप्रश्न ब्रह्मणः समत्वेऽप्यविदुष इव | है तथा ब्रह्म समान है, इसलिये

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१५६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ विदुषोऽप्यगमनमाशङ्क्यते किं | अविद्वान्‌के समान विद्वान्‌की भी विद्वान्समश्नुते न समश्नुत इति | ब्रह्मप्राप्तिके विषयमें 'विद्वान् उसे प्राप्त | होता है या नहीं?' ऐसी शंका की तृतीयोऽनुप्रश्नः । | जाती है। यह तीसरा अनुप्रश्न है। एतेषां प्रतिवचनार्थमुत्तरग्रन्थ | आगेका ग्रन्थ इन प्रश्नोंका उत्तर [ब्रह्मणः सत्त्व-] आरभ्यते । तत्रा- | देनेके लिये ही आरम्भ किया जाता [रूपत्वस्थापनम्] स्तित्वमेव तावदु- | है । उसमें सबसे पहले ब्रह्मके | अस्तित्वका ही वर्णन किया जाता च्यते । यच्चोक्तम् 'सत्यं ज्ञान- | है । 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है', मनन्तं ब्रह्म' इति, तच्च कथं | ऐसा जो पहले कह चुके हैं सो सत्यत्वमित्येतद्वक्तव्यमितीदमु- | वह ब्रह्मकी सत्यता किस प्रकार | है—यह बतलाना चाहिये । इस- च्यते सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्यते । | पर कहते हैं—उसकी सत्ता उक्तं हि "सदेव सत्यम्" इति । | बतलानेसे ही उसके सत्यत्वका भी | प्रतिपादन हो जाता है । "सत् ही तस्मात्सत्त्वोक्त्यैव सत्यत्वमुच्य- | सत्य है" ऐसा अन्यत्र कहा भी ते । कथमेवमर्थतावगम्यतेऽस्य | है । अतः उसकी सत्ता बतलानेसे ग्रन्थस्य शब्दानुगमात् । अने- | ही उसका सत्यत्व भी बतला | दिया जाता है । किन्तु इस ग्रन्थ- नैव ह्यर्थेनान्वितान्युत्तराणि | का भी यही तात्पर्य है—यह कैसे वाक्यानि "तत्सत्यमित्याच- | जाना गया ? इसपर कहते हैं— क्षते" ( तै० उ० २ । ६ । १ ) | शब्दोंके अनुगमन ( अभिप्राय ) से; "यदेष आकाश आनन्दो न | क्योंकि "वह सत्य है—ऐसा कहते | हैं", "यदि यह आनन्दमय आकाश स्यात्" ( तै० उ० २ । ७ । १ ) | न होता" आदि आगेके वाक्य भी इत्यादीनि । | इसी अर्थसे युक्त हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७


तत्रासदेव ब्रह्मेत्याशङ्क्यते ।                |  इसमें यह आशंका की जाती है
कस्मात् ? यदस्ति तद्विशेषतो                |  कि ब्रह्म असत् ही है । ऐसा क्यों
|  है ? क्योंकि जो वस्तु होती है वह
गृह्यते यथा घटादि । यन्नास्ति                |  विशेषरूपसे उपलब्ध हुआ करती
|  है; जैसे कि घट आदि । और जो
तन्नोपलभ्यते यथा शशविषाणा-              |  नहीं होती उसकी उपलब्धि भी नहीं
|  होती; जैसे-शशशृंगादि । इसी
दि । तथा नोपलभ्यते ब्रह्म ।                 |  प्रकार ब्रह्मकी भी उपलब्धि नहीं
|  होती । अतः विशेषरूपसे ग्रहण न
तस्माद्विशेषतोऽग्रहणान्नास्तीति ।          |  किया जानेके कारण वह है ही नहीं ।
तन्न; आकाशादिकारणत्वा-                  |  ऐसी बात नहीं है; क्योंकि ब्रह्म
|  आकाशादिका कारण है । ब्रह्म नहीं
द्ब्रह्मणः । न नास्ति ब्रह्म । कस्मा-         |  है-ऐसी बात नहीं है । क्यों नहीं
दाकाशादि हि सर्वं कार्यं ब्रह्मणो          |  है ? क्योंकि ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ
|  आकाशादि सम्पूर्ण कार्यवर्ग
जातं गृह्यते । यस्माच्च जायते               |  देखनेमें आता है । जिससे किसी
किंचित्तदस्तीति दृष्टं लोके; यथा             |  वस्तुका जन्म होता है वह पदार्थ
|  होता ही है-ऐसा लोकमें देखा गया
घटाङ्कुरादिकारणं मृद्बीजादि ।             |  है; जैसे कि घट और अङ्कुरादिके
|  कारण मृत्तिका एवं बीज आदि ।
तस्मादाकाशादिकारणत्वादस्ति               |  अतः आकाशादिका कारण होनेसे
ब्रह्म ।                                     |  ब्रह्म है ही ।
न चासतो जातं किंचिद्                      |  लोकमें असत्से उत्पन्न हुआ
|  कोई भी पदार्थ नहीं देखा जाता ।
गृह्यते लोके कार्यम् । असतश्चेन्ना-        |  यदि नाम-रूपादि कार्यवर्ग असत्से
मरूपादि कार्यं निरात्मकत्वा-              |  उत्पन्न हुआ होता तो वह निराधार

१५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१५८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

नोपलभ्येत । उपलभ्यते तु; होनेके कारण ग्रहण ही नहीं किया तस्मादस्ति ब्रह्म । असतश्चेत्कार्यं जा सकता था । किन्तु वह ग्रहण किया ही जाता है; इसलिये ब्रह्म है गृह्यमाणमप्यसदनुन्वितमेव तत् ही । यदि यह कार्यवर्ग असत्से स्यात् । न चैवम्; तस्मादस्ति उत्पन्न हुआ होता तो ग्रहण किये जानेपर भी असदात्मक ही ग्रहण ब्रह्म तत्र । “कथमसतः सज्जायेत” किया जाता । किन्तु ऐसी बात है नहीं । इसलिये ब्रह्म है ही । इसी ( छा० उ० ६ । २ । २ ) इति सम्बन्धमें “असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है” ऐसी एक अन्य श्रुत्यन्तरमसतः सज्जन्मासंभव- श्रुतिने युक्तिपूर्वक असत्से सत्का जन्म होना असम्भव बतलाया है । मन्वाचष्टे न्यायतः । तस्मात्सदेव इसलिये ब्रह्म सत् ही है—यही मत ब्रह्मेति युक्तम् । ठीक है । तद्यदि मृद्बीजादिवत्कारणं शङ्का—यदि ब्रह्म मृत्तिका और बीज आदिके समान [ जगत्का स्यादचेतनं तर्हि ? उपादान ] कारण है तो वह अचेतन होना चाहिये । न, कामयितृत्वात् । न हि समाधान—नहीं, क्योंकि वह कामना करनेवाला है । लोकमें कोई ब्रह्मगणश्चित्स्वरूपत्व- कामयित्रचेतनमस्ति भी कामना करनेवाला अचेतन नहीं विवेचनम् लोके । सर्वज्ञं हि हुआ करता । ब्रह्म सर्वज्ञ है—यह ब्रह्मेत्यवोचाम । अतः कामयि- हम पहले कह चुके हैं । अतः उसका कामना करना भी युक्त तृत्वोपपत्तिः । ही है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९ कामयितृत्वत्वादस्मदादिवदना- | शङ्का—कामना करनेवाला होनेसे | तो वह हमारी-तुम्हारी तरह अनाप्त- प्तकाममिति चेत् ? | काम (अपूर्ण कामनावाला) सिद्ध होगा। | न, स्वातन्त्र्यात् । यथारन्यान् | समाधान—ऐसी बात नहीं है, | क्योंकि वह स्वतन्त्र है। जिस प्रकार परवशीकृत्य कामादिदोषाः | काम आदि दोष अन्य जीवोंको | विवश करके प्रवृत्त करते हैं प्रवर्तयन्ति न तथा ब्रह्मणः | उस प्रकार वे ब्रह्मके प्रवर्तक नहीं | हैं। तो वे कैसे हैं ? वे सत्य-ज्ञान- प्रवर्तकाः कामाः । कथं तर्हि | स्वरूप एवं स्वात्मभूत होनेके | कारण विशुद्ध हैं। उनके द्वारा सत्यज्ञानलक्षणाः स्वात्मभूतत्वा- | ब्रह्म प्रवृत्त नहीं किया जाता; बल्कि | जीवोंके प्रारब्ध-कर्मोंकी अपेक्षासे द्विशुद्धा न तैर्ब्रह्म प्रवर्त्यते । | वह ब्रह्म ही उनका प्रवर्तक है। | अतः कामनाओंके करनेमें ब्रह्मकी तेषां तु तत्प्रवर्तकं ब्रह्म प्राणि- | स्वतन्त्रता है। इसलिये ब्रह्म अनाप्त- | काम नहीं है। कर्मापेक्षया । तस्मात्स्वातन्त्र्यं | | किन्हीं अन्य साधनोंकी अपेक्षा- कामेषु ब्रह्मणः । अतो नानाप्त- | वाला न होनेसे भी कामनाओंके | विषयमें ब्रह्मकी स्वतन्त्रता है। जिस कामं ब्रह्म । | प्रकार धर्मादि कारणोंकी अपेक्षा | रखनेवाली अन्य जीवोंकी अनात्मभूत साधनान्तरानपेक्षत्वाच्च । किं | कामनाएँ अपने आत्मासे अतिरिक्त | देह और इन्द्रियरूप अन्य साधनों- च यथान्येषामनात्मभूता धर्मा- | की अपेक्षावाली होती हैं उस प्रकार | ब्रह्मको निमित्त आदिकी अपेक्षा दिनिमित्तापेक्षाः कामाः स्वात्म- व्यतिरिक्तकार्यकरणसाधनान्त- रापेक्षाश्च न तथा ब्रह्मणो निमि-

१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१६० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ त्ताद्यपेक्षत्वम् । किं तर्हि स्वात्म- | नहीं होती । तो ब्रह्मकी कामनाएँ | कैसी होती हैं ? वे स्वात्मासे नोऽनन्याः । | अभिन्न होती हैं । तदेतदाह सोऽकामयत स | उसीके विषयमें श्रुति कहती है— ब्रह्मणो आत्मायस्मादाकाशः | उसने कामना की—उस आत्माने, बहुभवनसङ्कल्पः संभूतोऽकामयत | जिससे कि आकाश उत्पन्न हुआ | है, कामना की । किस प्रकार कामितवान् । कथम् ? बहु स्यां | कामना की ? मैं बहुत-अधिक बहु प्रभूतं स्यां भवेयम् । कथमे- | रूपमें हो जाऊँ। अन्य पदार्थमें प्रवेश | किये बिना ही एक वस्तुकी बहुलता कस्यार्थान्तराननुप्रवेशे बहुत्वं | कैसे हो सकती है ? इसपर कहते स्यादित्युच्यते । प्रजायेयोत्पद्येय । | हैं—'प्रजायेय' अर्थात् उत्पन्न होऊँ । न हि पुत्रोत्पत्त्येवार्थान्तरविषयं | यह ब्रह्मका बहुत होना पुत्रकी | उत्पत्तिके समान अन्य वस्तुविषयक बहुभवनम्, कथं तर्हि ? आत्म- | नहीं है । तो फिर कैसा है ? अपने- स्थानाभिव्यक्तनामरूपाभिव्य- | में अव्यक्तरूपसे स्थित नाम-रूपोंकी | अभिव्यक्तिके द्वारा ही [ यह अनेक क्त्या । यदात्मस्थे अनभि- | रूप होना है ] । जिस समय व्यक्ते नामरूपे व्याक्रियेते तदा | आत्मामें स्थित अव्यक्त नाम और नामरूपे आत्मस्वरूपापरित्यागे- | रूपोंको व्यक्त किया जाता है उस | समय वे अपने स्वरूपका त्याग किये नैव ब्रह्मणाप्रविभक्तदेशकाले | बिना ही समस्त अवस्थाओंमें ब्रह्मसे सर्वावस्थासु व्याक्रियेते तदा | अभिन्न देश और कालमें ही व्यक्त | किये जाते हैं । यह नाम-रूपका तन्नामरूपव्याकरणं ब्रह्मणो बहु- | व्यक्त करना ही ब्रह्मका बहुत होना भवनम् । नान्यथा निरवयवस्य | है । इसके सिवा और किसी प्रकार | निरवयव ब्रह्मका बहुत अथवा अल्प ब्रह्मणो बहुत्वपत्तिरुपपद्यतेऽल्प- | होना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार

अनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१

त्वं वा । यथाकाशस्याल्पत्वं बहु- | कि आकाशका अल्पत्व और बहुत्व | भी अन्य वस्तुके ही अधीन है त्वं च वस्त्वन्तरकृतमेव । अतस्त- | [उसी प्रकार ब्रह्मका भी है] । अतः | उन (नाम-रूपों) के द्वारा ही ब्रह्म द्द्वारेणैवात्मा बहु भवति । | बहुत हो जाता है । न ह्यात्मनोऽन्यदनात्मभूतं | आत्मासे भिन्न अनात्मभूत, तथा | उससे भिन्न देश-कालमें रहनेवाली तत्प्रविभक्तदेशकालं सूक्ष्मं व्यव- | कोई भी सूक्ष्म, व्यवहित (ओटवाली), | दूरस्थ, अथवा भूत, वर्तमान या भविष्यकालीन हितं विप्रकृष्टं भूतं भवद्भविष्यद्वा | वस्तु नहीं है । अतः सम्पूर्ण वस्तु विद्यते । अतो नामरूपे | अवस्थाओंसे सम्बन्धित नाम और सर्वावस्थे ब्रह्मणैवात्मवती, न | रूप ब्रह्मसे ही आत्मवान् हैं, किन्तु ब्रह्म तदात्मकम् । ते तत्प्रत्या- | ब्रह्म तद्रूप नहीं है । ब्रह्मका निषेध ख्याने न स्त एवेति तदात्मके | करनेपर वे रह ही नहीं सकते, | इसीसे वे तद्रूप कहे जाते हैं । उन उच्येते । ताभ्यां चोपाधिभ्यां | उपाधियोंसे ही ब्रह्म ज्ञाता, ज्ञेय और | ज्ञान-इन शब्दोंका तथा इनके अर्थ ज्ञातृज्ञेयज्ञानशब्दार्थादिसर्वसं- | आदि सब प्रकारके व्यवहारका पात्र व्यवहारभाग्ब्रह्म । | बनता है । स आत्मैवंकामः संस्तपो- | उस आत्माने ऐसी कामनावाला ऽतप्यत । तप इति ज्ञानमुच्यते । | होकर तप किया । 'तप' शब्दसे | यहाँ ज्ञान कहा जाता है, जैसा कि “यस्य ज्ञानमयं तपः” ( मु० उ० | “जिसका ज्ञानरूप तप है” इस अन्य १ । १ । ८) इति श्रुत्यन्तरात् । | श्रुतिसे सिद्ध होता है । आप्तकाम | होनेके कारण आत्माके लिये अन्य आप्तकामताच्चेतरस्यासंभव एव | तप तो असम्भव ही हैं । 'उसने तपसः । तत्तपोऽतप्यत तप्तवान् । | तप किया' इसका तात्पर्य यह है तै० उ० २१-२२- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri