तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१०४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१०४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧ चरदनृतमित्युच्यते। अतः वि- | व्यभिचरित होनेपर वह मिथ्या कहा कारोऽनृतम्। "वाचारम्भणं | जाता है। इसलिये विकार मिथ्या विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव | है। "विकार केवल वाणीसे आरम्भ होनेवाला और नाममात्र है, बस, सत्यम्” (छा० उ० ६।१।४) | मृत्तिका ही सत्य है" इस प्रकार एवं सदेव सत्यमित्यवधारणात्। | निश्चय किया जानेके कारण सत् अतः सत्यं ब्रह्मेति ब्रह्म विका- | ही सत्य है। अतः 'सत्यं ब्रह्म' रान्निवर्तयति। | यह वाक्य ब्रह्मको विकारमात्रसे निवृत्त करता है। अतः कारणत्वं प्राप्तं ब्रह्मणः। | इससे ब्रह्मका कारणत्व प्राप्त [ज्ञानमित्यस्य तात्पर्यम्] कारणस्य च कार- | होता है, और वस्तुरूप होनेसे कत्वं वस्तुत्वान्मृद्व- | कारणमें कारकत्व रहा करता है। [ज्ञानकर्तृत्वभाव-निरूपणं च] दचिद्रूपता च प्रा- | अतः मृत्तिकाके समान उसकी जड- प्ता त इदमुच्यते | रूपताका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है। इसीसे 'ज्ञानं ब्रह्म' ऐसा कहा ज्ञानं ब्रह्मेति। ज्ञानं ज्ञप्तिरव- | है। 'ज्ञान' ज्ञप्ति यानी अवबोधको बोधः, भावसाधनो ज्ञानशब्दो | कहते हैं। 'ज्ञान' शब्द भाववाचक न तु ज्ञानकर्तृ ब्रह्मविशेषण- | है; 'सत्य' और 'अनन्त' के साथ ब्रह्मका विशेषण होनेके कारण त्वात्सत्यानन्ताभ्यां सह। न | उसका अर्थ 'ज्ञानकर्ता' नहीं हो सकता। उसका ज्ञानकर्तृत्व स्वीकार हि सत्यतानन्तता च ज्ञान- | करनेपर ब्रह्मकी सत्यता और कर्तृत्वे सत्युपपद्यते। ज्ञान- | अनन्तता सम्भव नहीं है। ज्ञान- कर्तृत्वेन हि विक्रियमाणं कथं | कर्तारूपसे विकारको प्राप्त होनेवाला होकर ब्रह्म सत्य और अनन्त कैसे सत्यं भवेदनन्तं च। यद्धि न | हो सकता है? जो किसीसे भी
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५ कुतश्चित्प्रविभज्यते तदनन्तम् । | विभक्त नहीं होता वही अनन्त हो ज्ञानकर्तृत्वे च ज्ञेयज्ञानाभ्यां | सकता है । ज्ञानकर्ता होनेपर तो प्रविभक्तमित्यनन्तता न स्यात् । | वह ज्ञेय और ज्ञानसे विभक्त होगा; “यत्र नान्यद्विजानाति स भूमा | इसलिये उसकी अनन्तता सिद्ध नहीं अथ यत्रान्यद्विजानाति तदल्पम्” | हो सकेगी । “जहाँ किसी दूसरेको ( छा० उ० ७ । २४ । १ ) इति | नहीं जानता वह भूमा है और जहाँ श्रुत्यन्तरात् । | किसी दूसरेको जानता है वह अल्प | है” इस एक दूसरी श्रुतिसे यही | सिद्ध होता है । नान्यद्विजानातीति विशेष- | इस श्रुतिमें ‘दूसरेको नहीं | जानता’ इस प्रकार विशेषका प्रतिषेधादात्मानं विजानातीति | प्रतिषेध होनेके कारण वह स्वयं | अपनेको ही जानता है-ऐसी यदि चेन्न; भूमलक्षणविधिपरत्वाद्वा- | कोई शङ्का करे तो ठीक नहीं; | क्योंकि यह वाक्य भूमाके लक्षणका क्यस्य । यत्र नान्यत्पश्यतीत्यादि | विधान करनेमें प्रवृत्त है । ‘यत्र | नान्यत्पश्यति’ इत्यादि वाक्य भूमाके भूम्नो लक्षणविधिपरं वाक्यम् । | लक्षणका विधान करनेमें तत्पर है । | अन्य अन्यको देखता है—इस लोक- यथा प्रसिद्धमेवान्योऽन्यत्पश्य- | प्रसिद्ध वस्तुस्थितिको स्वीकार कर | ‘जहाँ ऐसा नहीं है वह भूमा है’—इस तीत्येतदुपादाय यत्र तन्नास्ति | प्रकार उसके द्वारा भूमाके स्वरूपका | बोध कराया जाता है । ‘अन्य’ स भूमेति भूमस्वरूपं तत्र ज्ञाप्य- | शब्दका ग्रहण तो यथाप्राप्त द्वैतका | प्रतिषेध करनेके लिये है; अतः यह ते। अन्यग्रहणस्य प्राप्तप्रतिषेधार्थ- | वाक्य अपनेमें क्रियाका अस्तित्व | प्रतिपादन करनेके लिये नहीं है । त्वान्न स्वात्मनि क्रियास्तित्वपरं | और स्वात्मामें तो भेदका अभाव वाक्यम् । स्वात्मनि च भेदा- | होनेके कारण उसका विज्ञान होना
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
भावाद्धिज्ञानानुपपत्तिः । आत्म- | सम्भव ही नहीं है । आत्माका | विज्ञेयत्व स्वीकार करनेपर तो ज्ञाताके नश्च विज्ञेयत्वे ज्ञातृभावप्रसङ्गः; | अभावका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता | है; क्योंकि वह तो विज्ञेयरूपसे ही ज्ञेयत्वेनैव विनियुक्तत्वात् । | विनियुक्त ( प्रयुक्त ) हो चुका है । | [ अब उसे ज्ञाता कैसे माना जाय ? ] एक एवात्मा ज्ञेयत्वेन ज्ञातृ- | शङ्का—एक ही आत्मा ज्ञेय और | ज्ञाता दोनों प्रकारसे हो सकता है— त्वेन चोभयथा भवतीति चेत् ? | ऐसा मानें तो ? न युगपदनंशत्वात् । न हि | समाधान—नहीं, वह अंशरहित | होनेके कारण एक साथ उभयरूप निरवयवस्य युगपज्ज्ञेयज्ञातृत्वो- | नहीं हो सकता । निरवयव ब्रह्मका | एक साथ ज्ञेय और ज्ञाता होना पपत्तिः । आत्मनश्च घटादिवद्विज्ञे- | सम्भव नहीं है । इसके सिवा यदि | आत्मा घटादिके समान विज्ञेय हो यत्वे ज्ञानोपदेशानर्थक्यम् । न | तो ज्ञानके उपदेशकी व्यर्थता हो | जायगी । जो वस्तु घटादिके समान हि घटादिवत्प्रसिद्धस्य ज्ञानोप- | प्रसिद्ध है उसके ज्ञानका उपदेश | सार्थक नहीं हो सकता । अतः देशोऽर्थवान् । तस्माज्ज्ञातृत्वे | उसका ज्ञातृत्व माननेपर उसकी | अनन्तता नहीं रह सकती । ज्ञान- सति आनन्त्यानुपपत्तिः । | कर्तृत्वादि विशेषसे युक्त होनेपर | उसका सन्मात्रत्व भी सम्भव नहीं सन्मात्रत्वं चानुपपन्नं ज्ञान- | है । और “वह सत्य है” इस एक | अन्य श्रुतिसे उसका सत्यरूप होना कर्तृत्वादिविशेषवत्त्वे सति । स- | ही सन्मात्रत्व है । अतः 'सत्य' और | 'अनन्त' शब्दोंके साथ विशेषण- न्मात्रत्वं च सत्यत्वम्, "तत्स- त्यम्” ( छा० उ० ६ । ८ । १६ ) इति श्रुत्यन्तरात् । तस्मा- त्सत्यानन्तशब्दाभ्यां सह विशे-
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७ षणत्वेन ज्ञानशब्दस्य प्रयोगा- | रूपसे 'ज्ञान' शब्दका प्रयोग किया द्भावसाधनो ज्ञानशब्दः । ज्ञानं | जानेके कारण वह भाववाचक है । | अतः 'ज्ञानं ब्रह्म' इस विशेषणका उसके ब्रह्मेति कर्तृत्वादिकारकनिवृत्त्यर्थं | कर्तृत्वादि कारकोंकी निवृत्तिके लिये | तथा मृत्तिका आदिके समान उसकी मृदादिवदचिद्रूपतानिवृत्त्यर्थं च | जडरूपताकी निवृत्तिके लिये प्रयोग प्रयुज्यते । | किया जाता है । ज्ञानं ब्रह्मेतिवचनात्प्राप्तमन्त- | 'ज्ञानं ब्रह्म' ऐसा कहनेसे ब्रह्मका अन्तवत्त्व प्राप्त होता है; क्योंकि [अनन्तमित्यस्य निरुक्तिः] वत्त्वम् । लौकिकस्य | लौकिक ज्ञान अन्तवान् ही देखा ज्ञानस्यान्तवत्त्वदर्श- | गया है । अतः उसकी निवृत्ति- नात् । अतस्तन्निवृत्त्यर्थमाह— | के लिये 'अनन्तम्' ऐसा कहा अनन्तमिति । | है । सत्यादीनामनृतादिधर्मनिवृत्ति- | शङ्का—सत्यादि शब्द तो अनृतादि धर्मोंकी निवृत्तिके लिये हैं [ब्रह्मणः शून्यार्थ- त्वमाशङ्क्यते] परत्वाद्विशेष्यस्य | और उनका विशेष्य ब्रह्म कमल ब्रह्मण उत्पलादि- | आदिके समान प्रसिद्ध नहीं है; अतः वदप्रसिद्धत्वात् "मृगतृष्णाम्भसि | "मृगतृष्णाके जलमें स्नान करके स्नातः खपुष्पकृतशेखरः । | शिरपर आकाशकुसुमका मुकुट | धारण किये तथा हाथमें शशशृङ्गका एष वन्ध्यासुतो याति शशशृङ्ग- | धनुष लिये यह वन्ध्याका पुत्र जा धनुर्धरः" इतिवच्छून्यार्थतैव | रहा है" इस उक्तिके समान इस | 'सत्यं ज्ञानम्' इत्यादि वाक्यकी प्राप्ता सत्यादिवाक्यस्येति चेत् ? | शून्यार्थता ही प्राप्त होती है । न; लक्षणार्थत्वात् । विशे- | समाधान—नहीं, क्योंकि वे षणत्वेऽपि सत्यादीनां लक्षणार्थ- | [सत्यादि] लक्षण करनेके लिये हैं ।
१०८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१०८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[वाम स्तम्भ - भाष्यम्] प्राधान्यमित्यवोचाम । शून्ये हि लक्ष्येऽनर्थकं लक्षणवचनं लक्षणा- र्त्थत्वान्मन्म्यामहे न शून्यार्थतेति । विशेषणार्थत्वेऽपि च सत्यादीनां स्वार्थापरित्याग एव । शून्यार्थत्वे हि सत्यादि- शब्दानां विशेष्यनियन्तृत्वानुप- पत्तिः । सत्याद्यर्थैरर्थवत्त्वे तु तद्विपरीतधर्मवद्भ्यो विशेष्येभ्यो ब्रह्मणो विशेष्यस्य नियन्तृत्वमुप- पद्यते । ब्रह्मशब्दोऽपि स्वार्थेनार्थ- वानेव । तत्रानन्तशब्दोऽन्तवत्त्व- प्रतिषेधद्वारेण विशेषणम् । सत्य- ज्ञानशब्दौ तु स्वार्थसमर्पणेनैव विशेषणे भवतः ! "तस्माद्वा एतस्मादात्मनः" इति ब्रह्मण्येवात्मशब्दप्रयोगाद्वेदितु-
[दक्षिण स्तम्भ - भाषानुवाद] सत्यादि शब्द विशेषण होनेपर भी उनका प्रधान प्रयोजन लक्षणके लिये होना ही है—यह हम पहले ही कह चुके हैं । यदि लक्ष्य शून्य हो तब तो उसका लक्षण बतलाना भी व्यर्थ ही होगा । अतः लक्षणार्थ होनेके कारण उनकी शून्यार्थता नहीं है— ऐसा हम मानते हैं । विशेषणके लिये होनेपर भी सत्यादि शब्दके अपने अर्थका त्याग तो होता ही नहीं है । यदि सत्यादि शब्दोंकी शून्यार्थता हो तो वे अपने विशेष्यके नियन्ता हैं—ऐसा नहीं माना जा सकता । सत्यादि अर्थोंसे अर्थवान् होनेपर ही उनके द्वारा अपनेसे विपरीत धर्मवाले विशेष्योंसे अपने विशेष्य ब्रह्म- का नियन्तृत्व बन सकता है । 'ब्रह्म' शब्द भी अपने अर्थसे अर्थवान् ही है । उन [ सत्यादि तीन शब्दों ] में 'अनन्त' शब्द उसके अन्तवत्त्वका प्रतिषेध करनेके द्वारा उसका विशेषण होता है तथा 'सत्य' और 'ज्ञान' शब्द तो अपने अर्थोंके समर्पणद्वारा ही उसके विशेषण होते हैं । शङ्का—"उस इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ" इस श्रुतिमें 'आत्मा' शब्दका प्रयोग ब्रह्मके ही लिये
अनु० १ ]
शाङ्करभाष्यार्थ
१०९
[मूल संस्कृत (वाम स्तम्भ)]
रात्मैव ब्रह्म । "एतमानन्दमयमा- त्मानमुपसंक्रामति" ( तै० उ० २।८।५) इति चात्मतां दर्शयति। तत्प्रवेशाच्च; "तत्सृष्ट्वा तदेवानु- प्राविशत्" (तै० उ० २ । ६ । १) इति च तस्यैव जीवरूपेण शरीर- प्रवेशं दर्शयति । अतो वेदितुः स्वरूपं ब्रह्म । एवं तस्यात्मत्वाज्ज्ञानकर्तृ- त्वम् । आत्मा ज्ञातेति हि प्रसिद्धम् । "सोऽकामयत" ( तै० उ० २।६।१) इति च कामिनो ज्ञानकर्तृत्वाज्ज्ञप्तिर्ब्रह्मेत्ययुक्तम् । अनित्यत्वप्रसङ्गाच्च । यदि नाम ज्ञप्तिर्ज्ञानमिति भावरूपता ब्रह्मणस्तथाप्यनित्यत्वं प्रसज्येत पारतन्त्र्यं च । धात्वर्थानां कारकापेक्षत्वात् । ज्ञानं च
[हिन्दी भाष्यार्थ (दक्षिण स्तम्भ)]
किया जानेके कारण ब्रह्म जाननेवालेका आत्मा ही है । "इस आनन्दमय आत्माको प्राप्त हो जाता है" इस वाक्यसे श्रुति उसकी आत्मता दिखलाती है तथा उसके प्रवेश करनेसे भी [उसका आत्मत्व सिद्ध होता है ] । "उसे रचकर वह उसीमें प्रविष्ट हो गया" ऐसा कहकर श्रुति उसीका जीवरूपसे शरीरमें प्रवेश होना दिखलाती है । अतः ब्रह्म जाननेवालेका स्वरूप ही है । इस प्रकार आत्मा होनेसे तो उसे ज्ञानका कर्तृत्व सिद्ध होता है । 'आत्मा ज्ञाता है' यह बात तो प्रसिद्ध ही है। "उसने कामना की" इस श्रुतिसे कामना करनेवालेके ज्ञानकर्तृत्वकी सिद्धि होती है । अतः ब्रह्मका ज्ञानकर्तृत्व निश्चित होनेके कारण 'ब्रह्म ज्ञप्तिमात्र है' ऐसा कहना अनुचित है । इसके सिवा ऐसा माननेसे अनित्यत्वका प्रसङ्ग भी उपस्थित होता है । यदि 'ज्ञान ज्ञप्तिको कहते हैं' इस व्युत्पत्तिके अनुसार ब्रह्मकी भावरूपता मानी जाय तो भी उसके अनित्यत्व और पारतन्त्र्यका प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है; क्योंकि धातुओंके अर्थ कारकोंकी अपेक्षावाले
११० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
११० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
धात्वर्थोऽतोऽस्यानित्यत्वं पर- । हुआ करते हैं । ज्ञान भी धातुका । अर्थ है; अतः इसकी भी अनित्यता तन्त्रता च । । और परतन्त्रता सिद्ध होती है । । न, स्वरूपाव्यतिरेकेण कार्य- । समाधान—ऐसी बात नहीं है; । क्योंकि ज्ञान ब्रह्मके स्वरूपसे अभिन्न [तन्निरासनम्] त्वोपचारात् । आ- । है, इस कारण उसका कार्यत्व केवल त्मनः स्वरूपं ज्ञप्तिर्न । उपचारसे है । आत्माका स्वरूप जो । 'ज्ञप्ति' है वह उससे व्यतिरिक्त ततो व्यतिरिच्यतेऽतो नित्यैव । । नहीं है । अतः वह ( ज्ञप्ति ) नित्या तथापि बुद्धेरुपाधिलक्षणायाश्च- । ही है । तथापि चक्षु आदिके द्वारा । विषयरूपमें परिणत होनेवाली क्षुरादिद्वारैर्विषयाकारेण परिणा- । उपाधिरूप बुद्धिकी जो शब्दादिरूप मिन्या ये शब्दाद्याकारावभासाः । प्रतीतियाँ हैं वे आत्मविज्ञानकी । विषयभूत होकर उत्पन्न होती हुई त आत्मविज्ञानस्य विषयभूता । आत्मविज्ञानसे व्याप्त ही उत्पन्न उत्पद्यमाना एवात्मविज्ञानेन । होती हैं [ अर्थात् अपनी उत्पत्तिके । समय उन प्रतीतियोँमें तो आत्म- व्याप्ता उत्पद्यन्ते । तस्मादात्म- । विज्ञानसे प्रकाशित होनेकी योग्यता विज्ञानावभासाश्च ते विज्ञान- । रहती है और आत्मविज्ञान उन्हें । प्रकाशित करता रहता है ] । शब्दवाच्याश्च धात्वर्थभूता । अतः वे धातुओंकी अर्थभूत आत्मन एव धर्मा विक्रियारूपा । एवं 'विज्ञान' शब्दवाच्य आत्म- । विज्ञानकी प्रतीतियाँ आत्माका ही इत्यविवेकिभिः परिकल्प्यन्ते । । विकाररूप धर्म हैं—ऐसी अविवेकियों- । द्वारा कल्पना की जाती है । यत्तु यद्ब्रह्मणो विज्ञानं तत् । किन्तु उस ब्रह्मका जो विज्ञान सवितृप्रकाशवदग्न्युष्णवच्च ब्रह्म- । है वह सूर्यके प्रकाश तथा अग्निकी । उष्णताके समान ब्रह्मके स्वरूपसे स्वरूपाव्यतिरिक्तं स्वरूपमेव तत्; । भिन्न नहीं है, बल्कि उसका स्वरूप
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १] शाङ्करभाष्यार्थ १२१ न तत्कारणान्तरसव्यपेक्षम् । | ही है; उसे किसी अन्य कारणकी नित्यस्वरूपत्वात् । सर्वभावानां च | अपेक्षा नहीं है; क्योंकि वह नित्य- | स्वरूप है । तथा उस ब्रह्मसे सम्पूर्ण तेनाविभक्तदेशकालत्वात् काला- | भावपदार्थोंके देश-काल अभिन्न हैं, | और वह काल तथा आकाशादि- काशादिकारणत्वाच्च निरतिशय- | का भी कारण एवं निरतिशय सूक्ष्म सूक्ष्मत्वाच्च । न तस्यान्यदविज्ञेयं | है; अतः ऐसी कोई सूक्ष्म, व्यवहित | (व्यवधानवाली), विप्रकृष्ट (दूर) सूक्ष्मं व्यवहितं विप्रकृष्टं भूतं | तथा भूत, भविष्यत् या वर्तमान भवद्भविष्यद्वास्ति । तस्मात्सर्वज्ञं | वस्तु नहीं है जो उसके द्वारा जानी | न जाती हो; इसलिये वह ब्रह्म तद्ब्रह्म । | सर्वज्ञ है । मन्त्रवर्णाच्च—“अपाणिपादो | “वह बिना हाथ-पाँवके ही वेगसे | चलने और ग्रहण करनेवाला है, बिना जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स | नेत्रके ही देखता है और बिना शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न | कानके ही सुनता है। वह सम्पूर्ण वेद्य- च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं | मात्रको जानता है, उसे जाननेवाला | और कोई नहीं है, उसे सर्वप्रथम परम- पुरुषं महान्तम्” (श्वे० उ० ३ । | पुरुष कहा गया है।” इस मन्त्रवर्ण- १९) इति । “न हि विज्ञातुर्वि- | से तथा “अविनाशी होनेके कारण ज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविना- | विज्ञाताके ज्ञानका कभी लोप नहीं | होता और उससे भिन्न कोई दूसरा शित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति” | भी नहीं है [जो उसे देखे]” (बृ० उ० ४ । ३ । ३०) इत्यादि | इत्यादि श्रुतियोंसे भी यही सिद्ध श्रुतेश्च । विज्ञातृस्वरूपाव्यतिरेका- | होता है । अपने विज्ञातृस्वरूपसे | अभिन्न तथा इन्द्रियादि साधनोंकी त्करणादिनिमित्तानपेक्षत्वाच्च ब्र- | अपेक्षासे रहित होनेके कारण ज्ञान- ह्मणो ज्ञानस्वरूपत्वेऽपि नित्यत्व- | स्वरूप होनेपर भी ब्रह्मका नित्यत्व
११२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
११२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ प्रसिद्धिरतो नैव धात्वर्थस्तद्- | भली प्रकार सिद्ध ही है। अतः क्रियारूपत्वात् । | क्रियारूप न होनेके कारण वह | (ज्ञान) धातुका अर्थ भी नहीं है। अत एव च न ज्ञानकर्तृ, | इसीलिये वह ज्ञानकर्ता भी नहीं तस्मादेव च न ज्ञानशब्दवाच्य- | है और इसीसे वह ब्रह्म 'ज्ञान' मपि तद्ब्रह्म । तथापि तदाभास- | शब्दका वाच्य भी नहीं है । तो भी वाचकेन बुद्धिधर्मविषयेण ज्ञान- | ज्ञानाभासके वाचक तथा बुद्धि- | के धर्मविषयक 'ज्ञान' शब्दसे वह शब्देन तल्लक्ष्यते न तूच्यते । | लक्षित होता है-कहा नहीं जाता; शब्दप्रवृत्तिहेतुजात्यादिधर्मरहित- | क्योंकि वह शब्दकी प्रवृत्तिके हेतु- | भूत जाति आदि धर्मोंसे रहित है । त्वात् । तथा सत्यशब्देनापि। सर्व- | इसी प्रकार 'सत्य' शब्दसे भी विशेषप्रत्यस्तमितस्वरूपत्वाद्ब्रह्मणो | [उसको लक्षित ही किया जा सकता | है]। ब्रह्मका स्वरूप सम्पूर्ण विशेषणों- बाह्यसत्तासामान्यविषयेण सत्य- | से शून्य है; अतः वह सामान्यतः | सत्ता ही जिसका विषय-अर्थ है शब्देन लक्ष्यते सत्यं ब्रह्मेति न | ऐसे 'सत्य' शब्दसे 'सत्यं ब्रह्म' इस | प्रकार केवल लक्षित होता है-ब्रह्म तु सत्यशब्दवाच्यमेव ब्रह्म । | 'सत्य' शब्दका वाच्य ही नहीं है । एवं सत्यादिशब्दा इतरेतर- | इस प्रकार ये सत्यादि शब्द संनिधावन्योन्यनियम्यनियाम- | एक-दूसरेकी सन्निधिसे एक-दूसरेके | नियम्य और नियामक होकर काः सन्तः सत्यादिशब्दवाच्या- | सत्यादि शब्दोंके वाच्यार्थसे ब्रह्मको त्तन्निवर्तका ब्रह्मणो लक्षणार्थाश्च | अलग रखनेवाले और उसका लक्षण भवन्तीत्यतः सिद्धम् "यतो वाचो | करनेमें उपयोगी होते हैं । अतः निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" | "जहांसे मनके सहित वाणी उसे
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
( तै० उ० २ । ४ । १ ) “अ- | न पाकर लौट आती है” “न कहने निरुक्तेऽनिलयने” (तै० उ० २ । | योग्य और अनाश्रितमें” इत्यादि ७ । १) इति चावाच्यत्वं | श्रुतियोंके अनुसार ब्रह्मका सत्यादि नीलोत्पलवदवाक्यार्थत्वं च | शब्दोंका अवाच्यत्व और नील-कमलके समान अवाक्यार्थत्व सिद्ध ब्रह्मणः । | होता है ।* तद्यथाव्याख्यातं ब्रह्म यो वेद | उपर्युक्त प्रकारसे व्याख्या किये [गुहाशब्दार्थ-निर्वचनम्] विजानाति निहितं | हुए उस ब्रह्मको जो पुरुष गुहामें स्थितं गुहायाम् । | निहित ( छिपा हुआ ) जानता है । संवरण अर्थात् आच्छादन अर्थ- गूहतेः संवरणार्थस्य निगूढा | वाले 'गूह्' धातुसे 'गुहा' शब्द अस्यां ज्ञानज्ञेयज्ञातृपदार्था इति | निष्पन्न होता है; इस ( गुहा ) में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञातृ पदार्थ निगूढ गुहा बुद्धिः । गूढावस्थां भोगा- | ( छिपे हुए ) हैं इसलिये 'गुहा' पवर्गौ पुरुषार्थाविति वा तस्यां | बुद्धिका नाम है । अथवा उसमें भोग और अपवर्ग-ये पुरुषार्थ निगूढ परमे प्रकृष्टे व्योमन्व्योम्न्याका- | अवस्थामें स्थित हैं; अतः गुहा है । शेऽव्याकृताख्ये । तद्धि परमं | उसके भीतर परम-प्रकृष्ट व्योम-आकाशमें अर्थात् अव्याकृताकाशमें, व्योम “एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्या- | क्योंकि “हे गार्गि ! निश्चय इस काशः” ( बृ० उ० ३ । ८ । ११) | अक्षरमें ही आकाश [ ओतप्रोत है ]” इस श्रुतिके अनुसार अक्षरकी इत्यक्षरसंनिकर्षात् । गुहायां | सन्निधिमें होनेसे यह अव्याकृताकाश
*तात्पर्य यह है कि वाच्य-वाचक-भाव ब्रह्मका बोध करानेमें समर्थ नहीं हो सकता; अतः ब्रह्म इन शब्दोंका वाच्य नहीं हो सकता और सम्पूर्ण द्वैतकी निवृत्तिके अधिष्ठानरूपसे लक्षित होनेके कारण वह नीलकमल आदिके समान गुण-गुणीरूप संसर्गसूचक वाक्योंका भी अर्थ नहीं हो सकता । तै० उ० १५-१६- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
११४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
११४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[संस्कृत-मूलम् / भाष्यम्] व्योम्नीति वा सामानाधिकरण्या- दव्याकृताकाशमेव गुहा। तत्रा- पि निगूढाः सर्वे पदार्थास्त्रिषु कालेषु कारणत्वात्सूक्ष्मतरत्वा- च्च। तस्मिन्नन्तर्निहितं ब्रह्म। हार्दमेव तु परमं व्योमेति न्याय्यं विज्ञानाङ्गत्वेनोपासनाङ्ग- त्वेन व्योम्नो विवक्षितत्वात्। "यो वै स बहिर्धा पुरुषादा- काशः" (छा० उ० ३।१२। ७) "यो वै सोऽन्तःपुरुष आकाशः" (छा० उ० ३।१२। ८) "योऽयमन्तर्हृदय आकाशः" (छा० उ० ३।१२।९) इति श्रुत्यन्तरात्प्रसिद्धं हार्दस्य व्योम्नः परमत्वम्। तस्मिन्हार्दे व्योम्नि या बुद्धिर्गुहा तस्यां निहितं ब्रह्म तद्वृत्त्या विविक्त- तयोपलभ्यत इति। न ह्यन्यथा विशिष्टदेशकालसंबन्धोऽस्ति ब्र- ह्मणः सर्वगतत्वान्निर्विशेषत्वाच्च।
[हिन्दी-अनुवाद/व्याख्या] ही परमाकाश है। अथवा 'गुहायां व्योम्नि' इस प्रकार इन दोनों पदों- का सामानाधिकरण्य होनेके कारण आकाशको ही गुहा कहा गया है; क्योंकि सबका कारण और सूक्ष्मतर होनेके कारण उसमें भी तीनों कालोंमें सारे पदार्थ छिपे हुए हैं। उसीके भीतर ब्रह्म भी स्थित है। परन्तु युक्तियुक्त तो यही है कि हृदयाकाश ही परमाकाश है; क्योंकि उस आकाशको विज्ञानाङ्ग यानी उपासनाके अंगरूपसे बतलाना यहाँ इष्ट है "जो आकाश इस [ शरीर- संज्ञक ] पुरुषसे बाहर है" "जो आकाश इस पुरुषके भीतर है" "जो यह आकाश हृदयके भीतर है" इस प्रकार एक अन्य श्रुतिसे हृदयाकाश- का परमत्व प्रसिद्ध है। उस हृदया- काशमें जो बुद्धिरूप गुहा है उसमें ब्रह्म निहित है; अर्थात् उस (बुद्धि- वृत्ति) से वह व्यावृत्त (पृथक्) रूपसे स्पष्टतया उपलब्ध होता है; अन्यथा ब्रह्मका किसी भी विशेष देश या कालसे सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि वह सर्वगत और निर्विशेष है।
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५ ꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥꕥ स एवं ब्रह्म विजानन्किमि- | वह इस प्रकार ब्रह्मको जानने- | वाला क्या करता है ? इसपर श्रुति ब्रह्मविद त्याह-अश्नुते भुङ्क्ते | कहती है—वह सम्पूर्ण अर्थात् निः- ऐश्वर्यम् सर्वान्निरवशिष्टान्का- | शेष कामनाओं यानी इच्छित भोगों- | को प्राप्त कर लेता है अर्थात् उन्हें मान्भोगानित्यर्थः । किमस्मदादि- | भोगता है । तो क्या वह हमारे- | तुम्हारे समान पुत्र एवं स्वर्गादि वत्पुत्रस्वर्गादीन्पर्यायेण नेत्याह । | भोगोंको क्रमसे भोगता है ? इसपर सह युगपदेकक्षणोपारूढानेव | श्रुति कहती है—नहीं, उन्हें एक | साथ भोगता है । वह एक ही क्षणमें एकयोपलब्ध्या सवितृप्रकाशवत् | बुद्धिवृत्तिपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण | भोगोंको सूर्यके प्रकाशके समान नित्यया ब्रह्मस्वरूपाव्यतिरिक्तया | नित्य तथा ब्रह्मस्वरूपसे अभिन्न एक | ही उपलब्धिके द्वारा, जिसका हमने यामवोचाम सत्यं ज्ञानमनन्त- | 'सत्यं ज्ञानमनन्तम्' ऐसा निरूपण मिति । एतत्तदुच्यते—ब्रह्मणा | किया है, भोगता है । 'ब्रह्मणा | सह सर्वान्कामानश्नुते' इस वाक्यसे सहेति । | यही अर्थ कहा गया है । ब्रह्मभूतो विद्वान्ब्रह्मस्वरूपे- | ब्रह्मभूत विद्वान् ब्रह्मस्वरूपसे णैव सर्वान्कामान्सहाश्नुते, न | ही एक साथ सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्त | कर लेता है । अर्थात् दूसरे लोग यथोपाधिकृतेन स्वरूपेणात्मना | जिस प्रकार जलमें प्रतिबिम्बित | सूर्यके समान अपने औपाधिक और जलसूर्यकादिवत्प्रतिबिम्बभूतेन | संसारी आत्माके द्वारा धर्मादि सांसारिकेण धर्मादिनिमित्तापे- | निमित्तकी अपेक्षावाले तथा चक्षु | आदि इन्द्रियोंकी अपेक्षासे युक्त क्षांश्चक्षुरादिकरणापेक्षांश्च कामान् | सम्पूर्ण भोगोंको क्रमशः भोगते हैं | उस प्रकार उन्हें नहीं भोगता । तो पर्यायेणाश्नुते लोकः; कथं तर्हि ? | फिर कैसे भोगता है ? वह उपर्युक्त यथोक्तेन प्रकारेण सर्वज्ञेन सर्व- |
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
११६ | तैत्तिरीयोपनिषद् | [ वल्ली २
| ११६ | तैत्तिरीयोपनिषद् | [ वल्ली २ |
|---|
गतेन सर्वात्मना नित्यब्रह्मात्म- | प्रकारसे सर्वज्ञ सर्वगत सर्वात्मक स्वरूपेण धर्मादिनिमित्तानपेक्षां- | एवं नित्यब्रह्मात्मस्वरूपसे, धर्मादि श्चक्षुरादिकरणनिरपेक्षांश्च सर्वा- | निमित्तकी अपेक्षासे रहित तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भी निरपेक्ष सम्पूर्ण भोगोंको एक साथ ही प्राप्त कर लेता है—यह इसका तात्पर्य है । विपश्चित्—मेधावी अर्थात् सर्वज्ञ ब्रह्मरूपसे । ब्रह्मका जो सर्वज्ञत्व है वही उसकी विपश्चित्ता (विद्वत्ता) है। उस सर्वज्ञस्वरूप ब्रह्मरूपसे ही वह उन्हें भोगता है । मूलमें ‘इति’ शब्द मन्त्रकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। न्कामान्सहैवाश्नुत इत्यर्थः । | विपश्चिता मेधाविना सर्वज्ञेन । | तद्धि वैपश्चित्यं यत्सर्वज्ञत्वं तेन | सर्वज्ञस्वरूपेण ब्रह्मणाश्नुत इति । | इतिशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः । | सर्व एव वल्ल्यर्थो ब्रह्मविदा- | ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इस ब्राह्मण- प्नोति परमिति ब्राह्मणवाक्येन | वाक्यद्वारा इस सम्पूर्ण वल्लीका अर्थ सूत्ररूपसे कह दिया है । उस सूत्रभूत अर्थकी ही मन्त्रद्वारा संक्षेप- सूत्रितः । स च सूत्रितोऽर्थः | संक्षेपतो मन्त्रेण व्याख्यातः । | से व्याख्या कर दी गयी है । अब पुनस्तस्यैव विस्तरेणार्थनिर्णयः | फिर उसीका अर्थ विस्तारसे निर्णय कर्तव्य इत्युत्तरस्तद्वृत्तिस्थानीयो | करना है—इसीलिये उसका वृत्तिरूप ग्रन्थ आरभ्यते तस्माद्वा एतस्मा- | ‘तस्माद्वा एतस्मात्’ इत्यादि आगेका दित्यादिः । | ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । तत्र च सत्यं ज्ञानमनन्तं | उस मन्त्रमें सबसे पहले ‘सत्यं ^(सत्यं ज्ञानमनन्तं) ब्रह्मेत्युक्तं मन्त्रादौ | ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ऐसा कहा है । वह ^(ब्रह्मेति मीमांस्यते) तत्कथं सत्यं ज्ञान- | सत्य, ज्ञान और अनन्त किस प्रकार मनन्तं चेत्यत आह । तत्र | है ? सो बतलाते हैं—अनन्तता त्रिविधं ह्यानन्त्यं देशतः कालतो | तीन प्रकारकी है—देशसे, कालसे वस्तुतश्चेति । तद्यथा देशतो- | और वस्तुसे । उनमें जैसे आकाश ऽनन्त आकाशः। न हि देशतस्तस्य | देशतः अनन्त है । उसका देशसे
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७ परिच्छेदोऽस्ति । न तु काल- | परिच्छेद नहीं है । किन्तु कालसे तश्चानन्त्यं वस्तुतश्चाकाशस्य । | और वस्तुसे आकाशकी अनन्तता कस्मात्कार्यत्वात् । नैवं ब्रह्मण | नहीं है । क्यों नहीं है ? क्योंकि वह आकाशवत्कालतोऽप्यन्तवत्त्वम- | कार्य है । किन्तु आकाशके समान कार्यत्वात् । कार्यं हि वस्तु | किसीका कार्य न होनेके कारण कालेन परिच्छिद्यते । अकार्यं | ब्रह्मका इस प्रकार कालसे भी च ब्रह्म । तस्मात्कालतोऽस्यानन्त्यम् । | अन्तवत्त्व नहीं है । जो वस्तु किसी- | का कार्य होती है वही कालसे | परिच्छिन्न होती है । और ब्रह्म | किसीका कार्य नहीं है, इसलिये | उसकी कालसे अनन्तता है । तथा वस्तुतः । कथं पुनर्वस्तुत | इसी प्रकार वह वस्तुसे भी आनन्त्यं सर्वानन्यत्वात् । भिन्नं हि | अनन्त है । वस्तुसे उसकी अनन्तता वस्तु वस्त्वन्तरस्यान्तो भवति, | किस प्रकार है ? क्योंकि वह सबसे वस्त्वन्तरबुद्धिर्हि प्रसक्ताद्वस्त्व- | अभिन्न है । भिन्न वस्तु ही किसी न्तरान्निवर्तते । यतो यस्य बुद्धे- | अन्य भिन्न वस्तुका अन्त हुआ र्विनिवृत्तिः स तस्यान्तः । तद्यथा | करती है; क्योंकि किसी भिन्न वस्तुमें गोत्वबुद्धिरश्वत्वाद्विनिवर्तत इति | गयी हुई बुद्धि ही किसी अन्य प्रसक्त अश्वत्वान्तं गोत्वमित्यन्तवदेव | वस्तुसे निवृत्त की जाती है । जिस भवति । स चान्तो भिन्नोषु वस्तुषु | [ पदार्थसम्बन्धिनी ] बुद्धिकी जिस दृष्टः । नैवं ब्रह्मणो भेदः । अतो | पदार्थसे निवृत्ति होती है वही उस वस्तुतोऽप्यानन्त्यम् । | पदार्थका अन्त है । जिस प्रकार | गोत्वबुद्धि अश्वत्वबुद्धिसे निवृत्त होती | है, अतः गोत्वका अन्त अश्वत्व हुआ, | इसलिये वह अन्तवान् ही है और | उसका वह अन्त भिन्न पदार्थोंमें ही | देखा जाता है । किन्तु ब्रह्मका ऐसा | कोई भेद नहीं है । अतः वस्तुसे | भी उसकी अनन्तता है ।
११८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
११८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]
कथं पुनः सर्वानन्यत्वं ब्रह्मण [ब्रह्मणः सर्वात्म्यं निरूप्यते] इत्युच्यते—सर्व- वस्तुकारणत्वात् । सर्वेषां हि वस्तूनां कालाकाशा- दीनां कारणं ब्रह्म । कार्यापेक्षया वस्तुतोऽन्तवत्त्वमिति चेन्न; अनृतत्वात्कार्यवस्तुनः । न हि कारणव्यतिरेकेण कार्यं नाम वस्तुतोऽस्ति यतः कारणबुद्धि- र्विनिवर्तेत । “वाचारम्भणं वि- कारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) एवं सदेव सत्यमिति श्रुत्य- न्तरात् । तस्मादाकाशादिकारणत्वाद्दे- शतस्तावदनन्तं ब्रह्म । आकाशो ह्यनन्त इति प्रसिद्धं देशतः, तस्येदं कारणं तस्मात्सिद्धं देशत आत्मन आनन्त्यम् । न ह्यसर्व- गतात्सर्वगतमुत्पद्यमानं लोके किंचिद् दृश्यते । अतो निरति- शयमात्मन आनन्त्यं देशतस्तथा-
[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]
किन्तु ब्रह्मकी सबसे अभिन्नता किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं— क्योंकि वह सम्पूर्ण वस्तुओंका कारण है—ब्रह्म काल-आकाश आदि सभी वस्तुओंका कारण है । यदि कहो कि अपने कार्यकी अपेक्षासे तो उसका वस्तुसे अन्तवत्त्व हो ही जायगा, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि कार्यरूप वस्तु तो मिथ्या है—वस्तुतः कारणसे भिन्न कार्य है ही नहीं जिससे कि कारणबुद्धिकी निवृत्ति हो “वाणीसे आरम्भ होनेवाला विकार केवल नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है” इसी प्रकार “सत् ही सत्य है”—ऐसा एक अन्य श्रुतिसे भी सिद्ध होता है । अतः आकाशादिका कारण होनेसे ब्रह्म देशसे भी अनन्त है । आकाश देशतः अनन्त है—यह तो प्रसिद्ध ही है, और यह उसका कारण है; अतः आत्माका देशतः अनन्तत्व सिद्ध ही है; क्योंकि लोकमें असर्वगत वस्तुसे कोई सर्वगत वस्तु उत्पन्न होती नहीं देखी जाती । इसलिये आत्माका देशतः अनन्तत्व निरतिशय है [ अर्थात् उससे बड़ा और कोई नहीं है ] । इसी प्रकार
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९ ══════════════════════════════════════════════════════════════════════ कार्यत्वात्कालतः, तद्भिन्नवस्त्व- | किसीका कार्य न होनेके कारण वह | कालतः और उससे भिन्न पदार्थका न्तराभावाच्च वस्तुतः । अत एव | सर्वथा अभाव होनेके कारण वस्तुतः | भी अनन्त है । इसलिये आत्माका निरतिशयसत्यत्वम् । | सबसे बढ़कर सत्यत्व है । * | तस्मादिति मूलवाक्यसूत्रितं | [ मन्त्रमें ] 'तस्मात्' ( उससे ) ब्रह्म परामृश्यते । | इस पदद्वारा मूलवाक्यमेंसे सूत्र- सृष्टिक्रमः | रूपसे कहे हुए 'ब्रह्म' पदका एतस्मादितिमन्त्र- | परामर्श किया जाता है । तथा इसके | अनन्तर 'एतस्मात्' इत्यादि मन्त्र- वाक्येनानन्तरं यथालक्षितम् । | वाक्यसे भी पूर्वनिर्दिष्ट ब्रह्मका ही | उल्लेख किया गया है । [ तात्पर्य यह यद्ब्रह्मादौ ब्राह्मणवाक्येन सूत्रितं | है— ] जिस ब्रह्मका पहले ब्राह्मण- | वाक्यद्वारा सूत्ररूपसे उल्लेख किया यच्च सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेत्य- | गया है और जो उसके पश्चात् | 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस प्रकार नन्तरमेव लक्षितं तस्मादेतस्मा- | लक्षित किया गया है उस इस ब्रह्म | —आत्मासे, अर्थात् 'आत्मा' शब्द- द्व्रह्मण आत्मन आत्म- | वाच्य ब्रह्मसे—क्योंकि “तत् सत्यं स | आत्मा” इत्यादि एक अन्य श्रुतिके शब्दवाच्यात् । आत्मा हि | अनुसार वह सबका आत्मा है; अतः तत्सर्वस्य “तत्सत्यं स आत्मा” | यहाँ ब्रह्म ही आत्मा है—उस इस ( छा० उ० ६ । ८–१६ ) इति | आत्मस्वरूप ब्रह्मसे आकाश संभूत— श्रुत्यन्तरादतो ब्रह्मात्मा । तस्मा- | उत्पन्न हुआ । देतस्माद्ब्रह्मण आत्मस्वरूपादाका- | शः संभूतः समुत्पन्नः । | आकाशो नाम शब्दगुणोऽव- | जो शब्द-गुणवाला और समस्त | मूर्त्त पदार्थोंको अवकाश देनेवाला है काशकरो मूर्तद्रव्याणाम् । तस्माद् | उसे 'आकाश' कहते हैं । उस ──────────────────────────────────────────────────────────────────────
- क्योंकि जो वस्तु अनन्त होती है वही सत्य होती है, परिच्छिन्न पदार्थ कभी सत्य नहीं हो सकता । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ आकाशात्स्वेन स्पर्शगुणेन पूर्वेण | आकाशसे अपने गुण 'स्पर्श' और च कारणगुणेन शब्देन द्विगुणो | अपने पूर्ववर्ती आकाशके गुण वायुः संभूत इत्यनुवर्तते । | 'शब्द' से युक्त दो गुणवाला वायु वायोश्च स्वेन रूपगुणेन पूर्वाभ्यां | उत्पन्न हुआ । यहाँ प्रथम वाक्यके च त्रिगुणोऽग्निः संभूतः । अग्नेः | 'सम्भूतः' ( उत्पन्न हुआ ) इस स्वेन रसगुणेन पूर्वैश्च त्रिभिश्चतु- | क्रिया पदकी [ सर्वत्र ] अनुवृत्ति की र्गुणा आपः संभूताः । अद्भ्यः | जाती है । वायुसे अपने गुण 'रूप' स्वेन गन्धगुणेन पूर्वैश्चतुर्भिः | और पहले दो गुणोंके सहित तीन पञ्चगुणा पृथिवी संभूता । पृथि- | गुणवाला अग्नि उत्पन्न हुआ । तथा व्या ओषधयः । ओषधीभ्यो- | अग्निसे अपने गुण 'रस' और ऽन्नम् । अन्नाद्रेतोरूपेण परिणतात् | पहले तीन गुणोंके सहित चार पुरुषः शिरःपाण्याद्याकृतिमान् । | गुणवाला जल हुआ । और जलसे स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयो- | अपने गुण 'गन्ध' और पहले चार ऽन्नरसविकारः । पुरुषाकृति- | गुणोंके सहित पाँच गुणवाली पृथिवी भावितं हि सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः | उत्पन्न हुई । पृथिवीसे ओषधियाँ, संभूतं रेतो बीजम्; तस्माद्यो | ओषधियोंसे अन्न और वीर्यरूपमें जायते सोऽपि तथा पुरुषाकृतिरेव | परिणत हुए अन्नसे शिर तथा हाथ- स्यात् । सर्वजातिषु जायमानानां | पाँवरूप आकृतिवाला पुरुष उत्पन्न | हुआ । | वह यह पुरुष अन्नरसमय अर्थात् | अन्न और रसका विकार है । | पुरुषाकारसे भावित [ अर्थात् पुरुष- | के आकारकी वासनासे युक्त ] तथा | उसके सम्पूर्ण अङ्गोंसे उत्पन्न हुआ | तेजोरूप जो शुक्र है वह उसका | बीज है । उससे जो उत्पन्न होता | है वह भी उसीके समान पुरुषाकार | ही होता है; क्योंकि सभी जातियोंमें | उत्पन्न होनेवाले देहोंमें पिताके
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
[वाम भाग / Left Column - मूल पाठ]
जनकाकृतिनियमदर्शनात् । सर्वेषामप्यन्नरसविकारत्वे ब्र- ह्मवंशयत्वे चाविशिष्टे कस्मात्पुरुष एव गृह्यते ? प्राधान्यात् । किं पुन: प्राधान्यम् ? कर्मज्ञानाधिकार: । पुरुष एव [कथं पुरुषस्य प्राधान्यम्] हि शक्तत्वाद- र्थित्वादपर्युदस्त- त्वाच्च कर्मज्ञानयोरधिक्रियते— “पुरुषे त्वेवाविस्तरामात्मा स हि प्रज्ञानेन संपन्नतमो विज्ञातं वदति विज्ञातं पश्यति वेद श्वस्तनं वेद लोकालोकौ मर्त्ये- नामृतमीक्षतीत्येवं संपन्न: । अथेतरेषां पशूनामशनायापिपासे एवाभिविज्ञानम् ।” इत्यादि- श्रुत्यन्तरदर्शनात् ।
[दक्षिण भाग / Right Column - हिन्दी भाष्यार्थ]
समान आकृति होनेका नियम देखा जाता है । शङ्का—सृष्टिमें सभी शरीर समान- रूपसे अन्न और रसके विकार तथा ब्रह्माके वंशमें उत्पन्न हुए हैं; फिर यहाँ पुरुषको ही क्यों ग्रहण किया गया है ? समाधान—प्रधानताके कारण । शङ्का—उसकी प्रधानता क्या है ? समाधान—कर्म और ज्ञानका अधिकार ही उसकी प्रधानता है । [ कर्म और ज्ञानके साधनमें ] समर्थ, [ उनके फलकी ] इच्छावाला और उससे उदासीन न होनेके कारण पुरुष ही कर्म और ज्ञानका अधिकारी है । “पुरुषमें ही आत्माका पूर्णतया आविर्भाव हुआ है; वही प्रकृष्ट ज्ञानसे सबसे अधिक सम्पन्न है । वह जानी-बूझी बात कहता है, जाने-बूझे पदार्थोंको देखता है, वह कल होनेवाली बात भी जान सकता है, उसे उत्तम और अधम लोकोंका ज्ञान है तथा वह कर्म-ज्ञानरूप नश्वर साधनके द्वारा अमर पदकी इच्छा करता है—इस प्रकार वह विवेकसम्पन्न है । उसके सिवा अन्य पशुओंको तो केवल भूख- प्यासका ही विशेष ज्ञान होता है” ऐसी एक दूसरी श्रुति देखनेसे भी [ पुरुषकी प्रधानता सिद्ध होती है ] ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
वाम भाग (संस्कृत पाठ)
स हि पुरुष इह विद्ययान्तर- तमं ब्रह्म संक्रामयितुमिष्टः । तस्य च बाह्याकारविशेषेष्वनात्मस्वा- त्मभाविता बुद्धिरनालम्ब्य विशेषं कंचित्सहसान्तरतमप्रत्यगात्म- विषया निरालम्बना च कर्तु- मशक्येति दृष्टशरीरात्मसामान्य- कल्पनया शाखाचन्द्रनिदर्शन- वदन्तः प्रवेशयन्नाह — तस्येदमेव शिरः । तस्यास्य पुरुषस्यान्नरसमय- स्येदमेव शिरः प्रसिद्धम् । प्राणमयादिष्वशिरसां शिरस्त्वदर्शनादिहापि तत्प्रसङ्गो मा भूदितीदमेव शिर इत्युच्यते । एवं पक्षादिषु योजना । अयं
पार्श्व-टिप्पणी (Marginal Note)
पक्ष्यात्मनान्न- मयस्य निरूपणम्
दक्षिण भाग (हिन्दी अनुवाद)
उस पुरुषको ही यहाँ ( इस वल्लीमें ) विद्याके द्वारा सबकी अपेक्षा अन्तरतम ब्रह्मके पास ले जाना अभीष्ट है । किन्तु उसकी बुद्धि, जो बाह्याकार विशेषरूप अनात्म पदार्थोंमें आत्मभावना किये हुए है, किसी विशेष आलम्बनके बिना एकाएक सबसे अन्तरतम प्रत्य- गात्मसम्बन्धिनी तथा निरालम्बना की जानी असम्भव है; अतः इस दिखलायी देनेवाले शरीररूप आत्मा- की समानताकी कल्पनासे शाखा- चन्द्र दृष्टान्तके समान उसका भीतरकी ओर प्रवेश कराकर श्रुति कहती है— उसका यह [ शिर ] ही शिर है । उस इस अन्नरसमय पुरुषका यह प्रसिद्ध शिर ही [ शिर है ] । [ अगले अनुवाकमें ] प्राणमय आदि शिररहित कोशोंमें भी शिरस्त्व देखा जानेके कारण यहाँ भी वही बात न समझी जाय [ अर्थात् इस अन्नमय कोशको भी वस्तुतः शिररहित न समझा जाय ] इसलिये 'यह प्रसिद्ध शिर ही उसका शिर है'—ऐसा कहा जाता है । इसी प्रकार पक्षादिके विषयमें लगा लेना चाहिये । पूर्वाभि-
पाद-लेख (Footer)
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३
दक्षिणो बाहुः पूर्वाभिमुखस्य | मुख व्यक्तिका यह दक्षिण [ दक्षिण दक्षिणः पक्षः । अयं सव्यो बाहु- | दिशाकी ओरका ] बाहु दक्षिण रुत्तरः पक्षः । अयं मध्यमो देह- | पक्ष है, यह वाम बाहु उत्तर पक्ष भाग आत्माङ्गानाम् । "मध्यं | है तथा यह देहका मध्यभाग अङ्गों- ह्येषामङ्गानामात्मा" इति श्रुतेः । | का आत्मा है; जैसा कि "मध्यभाग इदमिति नाभेरधस्ताद्यदङ्गं | ही इन अङ्गोंका आत्मा है" इस तत्पुच्छं प्रतिष्ठा । प्रतितिष्ठत्यन- | श्रुतिसे प्रमाणित होता है । और येति प्रतिष्ठा पुच्छमिव पुच्छम् | यह जो नाभिसे नीचेका अङ्ग है अधोलम्बनसामान्याद्यथा गोः | वही पुच्छ—प्रतिष्ठा है । इसके पुच्छम् । | द्वारा वह स्थित होता है, इसलिये यह एतत्प्रकृत्योत्तरेषां प्राणमया- | उसकी प्रतिष्ठा है । नीचेकी ओर दीनां रूपकत्वसिद्धिः; मूषानिषि- | लटकनेमें समानता होनेके कारण क्तद्रुतताम्रप्रतिमावत् । तदप्येष | वह पुच्छके समान पुच्छ है; जैसे श्लोको भवति । तत्तस्मिन्नेवार्थे | कि गौकी पूँछ । ब्राह्मणोक्तेऽन्नमयात्मप्रकाशक | इस अन्नमय कोशसे आरम्भ एष श्लोको मन्त्रो भवति ॥ १ ॥ | करके ही साँचेमें डाले हुए पिघले | ताँबेकी प्रतिमाके समान आगेके | प्राणमय आदि कोशोंके रूपकत्वकी | सिद्धि होती है । उसके विषयमें ही | यह श्लोक है; अर्थात् अन्नमय | आत्माको प्रकाशित करनेवाले उस | ब्राह्मणोक्त अर्थमें ही यह श्लोक | अर्थात् मन्त्र है ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥