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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

by आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर

Source: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished364 pages
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तत्त्वमसिप्रकरणम् २११ अविविच्येति—आत्मा और अहङ्कार दोनों का विवेक न करके यदि श्रुति ऐसा कहती है तो उक्त वाक्य के अर्थ का ग्रहण हो सकता है, और यदि अहमर्थ (शुद्ध चेतन) से अहंकार का विवेक करके उसके विषय में 'तत् त्वमसि तू वह (ब्रह्म) है, इस प्रकार श्रुति, यदि ब्रह्म का अहङ्कारनिष्ठत्व बताती है तो उक्त दोष (मिथ्याभाषण का दोष) का प्रसङ्ग प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥ हृदयस्पर्शिनी चिदाभास के अनभ्युपगमपक्ष में बन्ध-मोक्ष की अनुपपत्ति बताकर अपने पक्ष में उसकी उपपत्ति बताते हैं। यदि श्रुति, आत्मा और अहंकार दोनों का विवेक न करके ऐसा कहती है, तब तो इस वाक्य के अर्थ का ग्रहण हो सकता है। 'तत्त्वमसि' तू ब्रह्म है—इस प्रकार का श्रुति का कथन चिदाभास के द्वारा आत्मा और अहंकार का अविवेक होने पर ही सार्थक हो सकता है। क्योंकि संसारदुःख से दुःखी हुआ अहंकार ही मोक्ष की इच्छा कर सकता है और आत्मज्ञान द्वारा उसी का मोक्ष होना संभव हो सकता है। यदि अहमर्थ (शुद्ध चेतन) से अहंकार का विवेक कर उसके विषय में 'तू वह (ब्रह्म) है' इस प्रकार ब्रह्म का अहंकारनिष्ठत्व श्रुति ने बताया हो तो उपर्युक्त मिथ्या भाषण का दोष आता है। तात्पर्य यह है कि यदि 'आत्मा' शब्द से अहंकार को मानकर उसे ब्रह्मरूप कहते हैं तो श्रुति को मिथ्या कहना पड़ेगा। अतः श्रुति का यह 'तत्त्वमसि' उपदेश उसी के लिये है, जिसने अध्यास के द्वारा अविवेकवशात् अहंकार के दुःखित्वादि का आत्मा में आरोप किया है। अर्थात् सांख्य का कहना है कि अहंकार को ही श्रोता मान लिया जाय तो आत्माभास के स्वीकार करने की क्या आवश्यकता है ? उसपर कहते हैं कि यदि श्रुतिवाक्य प्रत्यक्चैतन्य से अहंकार को, पाते से गन्ने के समान पृथक् करके केवल अहंकार को 'तू ही ब्रह्म है' इस प्रकार श्रुतिद्वारा आचार्य यदि कहें, तब तो 'तत्त्वमसि' श्रुति के अहंकारनिष्ठ होने से मिथ्यावादित्व का दोष प्रसक्त हो सकेगा, अन्यथा नहीं ॥ ७८ ॥ त्वमित्यध्यक्षनिष्ठश्चेदहमध्यक्षयोः कथम्। सम्बन्धो वाच्य एवात्र येन त्वमिति लक्ष्येत् ॥७९॥ त्वमिति—'त्वम्' पद अहङ्कार का वाचक होने पर भी उसे साक्षोपरक भी यदि स्वीकार कर लिया जाय तो यह बताना होगा कि साक्षी और अहङ्कार का सम्बन्ध किस प्रकार का है, जिससे कि 'त्वम्' पद 'साक्षी' को लक्षित कर सकेगा ॥ ७९ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहङ्कर्तृविषयक 'त्वं' शब्द से अध्यक्ष (साक्षी) लक्ष्यमाण होने से यह अहङ्कर्तृविषयक उपदेश तो अध्यक्ष (साक्षी) में ही पर्यवसित होगा, आभास को मानने की क्या आवश्यकता है ? इस शंका का समाधान कर रहे हैं—यदि यह कहें कि 'त्वं' यह पद अहंकारवाचक होकर अध्यक्ष को बोधित करता है, तथापि अहंकार और अध्यक्ष दोनों के सम्बन्धग्रह के बिना वाक्यार्थबोध का होना संभव नहीं। अहं और अध्यक्ष का सम्बन्ध तो बताना ही होगा। जिस संबंध से त्वं-पद अध्यक्ष को लक्षित कर सके, वह सम्बन्ध कैसे उपपन्न होगा ? अतः सम्बन्ध बताना आवश्यक है ॥ ७९ ॥ द्रष्टृदृश्यत्वसम्बन्धो यद्यध्यक्षेऽक्रिये कथम् ॥८०॥ द्रष्ट्रीति—यदि दोनों का 'द्रष्टृ-दृश्यत्व' सम्बन्ध कहा जाय तो साक्षी में उस सम्बन्ध का ग्रहण कैसे होगा ? क्योंकि वह अक्रिय है ॥ ८० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर यदि पूर्वपक्षी कहे कि 'हाँ, सम्बन्ध है', तो उसकी शंका को दूर करते हैं। यदि अहंकार और अध्यक्ष (साक्षी) का द्रष्टृ-दृश्यत्वरूप सम्बन्ध कहें तो वह भी संभव नहीं है। क्योंकि साक्षी (अध्यक्ष) तो विकाररहित (निर्विकार) है, उस कारण उसमें सम्बन्धग्रहणकर्तृत्वरूप धर्म (विकार) नहीं रह सकता। तथा अहंकार जड़ हैं, उस कारण वह भी उस सम्बन्ध का ग्रहण नहीं कर सकता। अतः उक्त सम्बन्ध अनुपपन्न है ॥ ८० ॥

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२१२ उपदेशसाहस्री *अविक्रियत्वेऽपि तादात्म्यमध्यक्षस्य भवेद्यदि । आत्माध्यक्षो ममास्तीति सम्बन्धाग्रहणे न धीः ॥८१॥ अक्रियत्वे इति—यदि यह कहें कि साक्षी चेतन (अध्यक्ष) के अक्रिय होने पर भी उसका अहङ्कार के साथ तादात्म्य का उपदेश श्रुति करती है, तो सम्बन्ध का ग्रहण न होने पर ‘मेरा आत्मा साक्षी है’—यह बुद्धि भी नहीं होगी ॥ ८१ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वोक्त रीति के अनुसार सम्बन्धग्रहण भले ही न हो, अर्थात् सम्बन्धग्रहण का कर्तृत्वरूप विकार साक्षी में न रहने पर भी अहंकार के साथ साक्षी के तादात्म्यसम्बन्ध का उपदेश तो श्रुति ने किया ही है। अतः सम्बन्ध का ग्रहण यदि नहीं मानेंगे तो 'मेरा आत्मा साक्षी है, यह बुद्धि कैसे उत्पन्न हो सकेगी ? जैसे लोकव्यवहार में ‘घटस्य शौक्ल्यम्’- घट की शुक्लता कहने पर घट और शुक्लता का सम्बन्ध यदि न जाना जाय तो दोनों के तादात्म्य का ज्ञान होना संभव नहीं, वैसे ही 'ममात्मा अध्यक्षः अस्ति'—मेरा आत्मा साक्षी है, यहाँ पर भी अपना और आत्मा दोनों के सम्बन्ध का ज्ञान हुए बिना दोनों में तादात्म्य बुद्धि कैसे हो पायेगी ॥ ८१ ॥ सम्बन्धग्रहणं शास्त्रादिति चेन्मन्यसे न हि । पूर्वोक्ताः †स्युस्त्रिधा दोषा ग्रहो वा स्यान्ममेति च ॥८२॥ सम्बन्धेति—यदि यह कहें कि उनके सम्बन्ध का ज्ञान तो शास्त्र से ही हो जायगा, तो पूर्वोक्त तीन दोष ( १-अहंकार जड़ है, २-साक्षी निर्विकार है, ३-जड़ के प्रति श्रुति का बोधकत्व सिद्ध नहीं होना ) प्राप्त होंगे। तथा उसका ग्रहण भी 'मेरा आत्मा साक्षी है' इस प्रकार से ही हो सकेगा, यानी 'मैं साक्षी हूँ' ऐसा नहीं हो सकता ॥ ८२ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि दोनों के (अहंकार और साक्षी) के सम्बन्ध का ज्ञान “एष म आत्मान्तर्हृदये अणीयान्”१, “एष म आत्मान्तर्हृदये एतद्ब्रह्म”२ इस शास्त्र से ही हो जायगा, तो पूर्वोक्त तीन दोष उपस्थित होंगे। (१) अहंकार तो जड़ है, अतः उससे सम्बन्ध का ग्रहण नहीं किया जा सकता। (२) आत्मा (साक्षी) निर्विकार है, इस कारण वह भी सम्बन्ध का ग्रहण नहीं कर सकता। (३) जड़ (अहंकार) के प्रति श्रुति का बोधन करना (बोधक होना) संभव नहीं। यदि कथंचित् सम्बन्धग्रहण की कल्पना कर भी लें तो भी तादात्म्याध्यास को न मानने के कारण ‘एष म आत्मान्तर्हृदये अणीयान्.........एतद् ब्रह्म”—यह मेरा सूक्ष्म आत्मा हृदय के अन्तर्गत है, यह ब्रह्म है, —इस श्रुति वाक्य में ‘मेरा आत्मा' ऐसा पद होने के कारण 'मैं साक्षी हूँ' यह ग्रहण नहीं हो सकता, किन्तु 'मेरा आत्मा साक्षी है' इस प्रकार ही हो सकता है। श्लोक गत 'च' से प्रतीत होता है कि ‘ममाध्यक्षः अस्ति’ यह ग्रहण भी नहीं हो सकता है, क्योंकि अहंकार तो जड़ है ॥ ८२ ॥ अदृशिर्दृशिरूपेण भाति बुद्धैर्यदा तदा । प्रत्यया अपि तस्याः स्युस्तप्तायोविस्फुलिङ्गवत् ॥८३॥ अदृशिरिति—चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ने से जब अचेतन बुद्धि भी चेतन के समान प्रकाशयुक्त होती है, तो तप्त हुए लोहे के विस्फुलिङ्गों के समान उसकी वृत्तियाँ भी चेतनरूप हो जाती हैं ॥ ८३ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आत्मा और अनात्मा का परपक्ष में सम्बन्ध ही नहीं बन सकता, यह बताकर अब अपने पक्ष में मिथ्या तादात्म्यसम्बन्ध की उपपत्ति को बनाते हैं, क्योंकि जड़ (अचेतन) बुद्धि, चेतन का प्रतिबिम्ब पड़ने से उसके १. ( छा. उ. ३।१४।३ ) २. ( छा. उ. ३।१४।४ ) * अक्रियस्वेऽपि०—पाठान्तरम् । † स्युस्त्रयो ०—पाठान्तरम् ।

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २१३ (चेतन के) समान दृशिरूप से (प्रकाशयुक्त) भासित होती है। अतः अति सन्तप्त हुए लोहे के स्फुलिंगों के (चिनगारियों के) समान उसकी (बुद्धि की) वृत्तियाँ भी चेतनरूप हो जाती हैं। तात्पर्य यह है कि दाह करना अग्नि का कार्य है, किन्तु जिस समय अयःपिण्ड में अग्नि का तादात्म्य हो जाता है, तब 'अयो दहति'—लोहा जलाता है, ऐसा कहते हैं। उसी प्रकार चिदाभास से व्याप्त हुई बुद्धि की जो वृत्तियाँ हैं, उनमें जो ज्ञानकर्तृत्व है, वह चिदाभास का ही धर्म है, बुद्धि में तो अविवेक के कारण उसका आरोप मात्र किया जाता है ॥ ८३ ॥ आभासस्तदभावश्च दृशेः सीम्नो न चान्यथा । लोकस्य युक्तितः स्यातां तद्ग्रहश्च तथा सति ॥८४॥ आभास इति—समस्त वस्तुओं की अवधि 'आत्मा' ही है। उस अवधिभूत आत्मा के प्रति लोक का आभास तथा अभाव का होना युक्ति से सिद्ध हो सकता है, उसकी सिद्धि अन्य किसी प्रकार से नहीं हो सकती। ऐसी स्थिति में ही 'मैं हूँ' इस प्रकार 'आत्मा' का ग्रहण हो सकता है ॥ ८४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पक्ष में लौकिक-वैदिक व्यवहार की सिद्धि भी सहज उपपन्न हो पाती है। सबके अवधिभूत चिदात्मा (दृशि) से ही लोक का आभास तथा उसका अभाव (प्रत्यय और उसका अभाव) युक्ति से सिद्ध हो सकता है, उसे सिद्ध करने का अन्य कोई प्रकार नहीं है। तथा इस अवस्था में ही 'मैं हूँ' इस प्रकार आत्मा का ग्रहण हो सकता है। निष्कर्ष यह है कि 'आत्मा' समस्त वस्तुओं की परमावधि है, क्योंकि समस्त वस्तुओं का निषेध कर देने पर एकमात्र आत्मा ही शेष रह जाता है। और उसका निषेध भी नहीं किया जा सकता। लोक का आभास तथा उसका अभाव बुद्धिवृत्तिरूप है, किन्तु वे बुद्धिवृत्तियाँ न तो जड़ बुद्धि की ही विषय हो सकती हैं और न निर्विकार आत्मा की ही विषय हो सकती हैं। अतः उनकी सिद्धि के लिये चिदाभास को स्वीकार करना ही होगा। उसीके द्वारा आत्मा, बुद्धि- वृत्तियों का साक्षी होता है, और उसी से 'अहमस्मि'—मैं हूँ—इस प्रकार विशेषरूप से आत्मसत्ता का ग्रहण होता है ॥ ८४ ॥ नन्वेवं दृशिसंक्रान्तिरयःपिण्डेऽग्निवद्भवेत् । मुखाभासवदित्येतदादर्शं तन्निराकृतम् ॥८५॥ नन्विति—पूर्वपक्षो का कहना है कि इस प्रकार लोहे के गोले में अग्नि के समान बुद्धि में आत्मा का प्रवेश (संक्रमण) सिद्ध होता है। उस पर सिद्धान्ती का कहना है कि ऐसी बात नहीं है। शीशे में मुख के प्रतिबिम्ब के समान अर्थात् बुद्धि में आत्मा का जो आभास पड़ता है उसके समान—यह दृष्टान्त बताया है। इस दृष्टान्त के द्वारा पूर्वपक्षी के कथन का निराकरण कर दिया गया है ॥ ८५ ॥ हृदयस्पर्शिनी 'प्रतप्त लोहपिण्ड में अग्नस्फुलिङ्ग के समान' इस दृष्टान्त के बताने से आत्मा के विकारी होने की शंका होती है कि बुद्धि (अहंकार) में आत्मा का प्रवेश (सङ्क्रमण) सिद्ध होता है। अर्थात् तप्त लोहपिण्ड में अग्नि का जैसे प्रवेश होता है, वैसे ही बुद्धि में दृशिसङ्क्रान्तिरूप विकार (आत्मा का संक्रमण = प्रवेशरूप विकार) होगा। तब सिद्धान्ती ने उत्तरार्ध के द्वारा उत्तर दिया कि आदर्श (दर्पण) में मुखाभास (मुखप्रतिबिम्ब) के समान बुद्धि में आत्मा का आभास (प्रतिबिम्ब) पड़ता है। अर्थात् आदर्श में प्रतिबिम्बित मुख, आदर्शस्थत्वेन रूपेण मिथ्या है, उसी प्रकार बुद्धि में प्रतिबिम्बित हुआ आत्मा का प्रतिबिम्ब, बुद्धिधर्मत्वेन रूपेण मिथ्या है, इस तरह शंका का निराकरण हो जाता है। अतः आत्मा के विकारी होने की शंका नहीं करनी चाहिये ॥ ८५ ॥ कृष्णायो लोहिताभासमित्येतद्दृष्टमुच्यते । दृष्टदृष्टान्ततुल्यत्वं न तु सर्वात्मना क्वचित् ॥८६॥ कृष्णेति—काले लोहे में लाल वर्ण का आभास होता है। इसलिये वह केवल दृष्टान्त मात्र है। दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त की सर्वथा (पूर्ण रूप से) समानता नहीं हुआ करती ॥ ८६ ॥

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२१४ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि सिद्धान्ती के कथनानुसार आत्मा विकारी नहीं है, तो सन्तप्त लोहपिण्ड के विस्फुलिंग का दृष्टान्त क्यों बताया गया है ? वे तो विकार के रूप में प्रसिद्ध हैं, अतः यह दृष्टान्त तो दाष्ट्रान्तिक के अनुरूप नहीं हुआ । उत्तर में यह कहा जा रहा है कि कृष्णवर्ण के लोहे का लोहितवर्ण (लाल रंग) आभास मात्र है, अतः यह केवल दृष्टान्तमात्र है। जड़ बुद्धि में भी चैतन्य का आभास मात्र है। दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त की सर्वथा (पूर्णरूप में) समानता कभी नहीं हुआ करती। अन्यथा अप्रकाशरूप मुख के लिये चन्द्र का दृष्टान्त ही नहीं दिया जायगा, किन्तु दिया जाता है, अतः आंशिक समानता ही विवक्षित होती है ॥ ८६ '। तथैव चेतनाभासं चित्तं चैतन्यवद्द्भवेत् । मुखाभासो यथाऽऽदर्शे आभासश्चोदितो मृषा ॥८७॥ तथैवेति—उसी प्रकार चिदाभासविशिष्ट चित्त चैतन्यवत् प्रतीत होता है तथा जिस प्रकार शीशे में मुख का प्रतिबिम्ब पड़ता है, उसी प्रकार उस चिदाभास को मिथ्या (असत्य) ही बताया गया है ॥ ८७ ॥ हृदयस्पर्शिनी दृष्टान्त में विवक्षित अंश बताकर दाष्ट्रान्तिक में भी उस प्रकार के अंश का प्रदर्शन करते हैं। जिसमें चेतना का आभासमात्र है, ऐसा जो चेतनाभास चित्त (बुद्धि) है, वह चैतन्य की तरह अर्थात् चेतन के तुल्य हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि चिदाभासविशिष्ट चित्त चैतन्यवत् प्रतीत होने लगता है। जिस प्रकार दर्पण में मुखाभास विकृत है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये। उपाधिस्थ के रूप में आभास दिखाई देता है, अतः वह मृषा ( मिथ्या ) है। चिदाभास को मिथ्या बता ही चुके हैं ॥ ८७ ॥ चित्तं चेतनमित्येतच्छास्त्रयुक्तिविवर्जितम् । देहस्यापि प्रसङ्गः स्याच्चक्षुरादेस्तथैव च ॥८८॥ चित्तमिति—'चित्त' को चेतन बताना शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध है। चित्त को चेतन कहने पर तो देह और चक्षुरादि इन्द्रियों को भी चेतन कहा जा सकेगा, किन्तु वह अभीष्ट नहीं है ॥ ८८ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि कोई कहे कि चिदाभास की व्याप्ति से चित्त को चेतन के तुल्य क्यों माना जाता है ? उसे (चित्त को) ही स्वतः चेतन मानने में क्या आपत्ति है। इसका उत्तर यह कि है उसे स्वतः (स्वयं) चेतन मानने में न कोई प्रमाण है, और न कोई न्याय ही है। अर्थात् चित्त को ही चेतन कहना शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध है। क्योंकि चित्त तो अन्य- दृश्य होने से उत्पत्ति-विनाशशील है। चेतनता को चित्त का ही स्वभाव माना जाय तो चक्षुरादि इन्द्रियों को भी चेतन कहना पड़ेगा। इस प्रकार अतिप्रसंग होगा, जो दुष्परिहर होगा ॥ ८८ ॥ तदप्यस्त्विति चेत्तन्न लोकायतिकसङ्गतेः । न च धीर्दृशिरस्मीति यद्याभासो न चेतसि ॥८९॥ तदिति—देहेन्द्रियादि को चेतन समझना तो अनुचित होगा। अन्यथा चार्वाक मत का अंगीकार किया समझा जायगा। यदि चित्त में चिदाभास का अस्तित्व स्वीकार न किया जाय तो 'मैं चेतन हूँ'—यह बुद्धि (प्रतीति) न हो सकेगी ॥ ८९ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि इष्टापत्ति कहे तो वह उचित न होगी। क्योंकि जड़ चित्त को ही चेतन कहने पर चार्वाक के अवैदिक सिद्धान्त को मान लिया-सा होगा। चित्त में चिदाभास को यदि न माने तो किसी द्वार (माध्यम) के न होने से 'अहं

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २१५ ब्रह्मास्मि' - मैं चेतन (ब्रह्म) हूँ, यह आगन्तुकवाक्यजन्य ऐक्यज्ञान नहीं हो सकेगा। अर्थात् चित्त में चिदाभास की सत्ता यदि न हो तो 'मैं दृशि (आत्मा) ब्रह्म हूँ', यह बुद्धि (ज्ञान) नहीं होगी। केवल चित्त तो जड़ है और चिन्मात्र (आत्मा) कूटस्थ है ॥ ८९ ॥ सदस्मीति धियोऽभावे व्यर्थं स्यात्तत्त्वमस्यपि । युष्मदस्मद्विभागज्ञे स्यादर्थवदिदं वचः ॥९०॥ सदिति—'मैं सत्स्वरूप हूँ' इस प्रकार की बुद्धि के अभाव में 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य भी व्यर्थ हो जायगा । यह महावाक्य तो युष्मत्पदवाच्य 'जड़ वस्तु' और अस्मत्पदलक्ष्य 'आत्मा' का विभाग (विवेक, भेद) समझने वाले पुरुष के लिये ही सार्थक हो सकता है ॥ ९० ॥ हृदयस्पर्शिनी 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान यदि न हो तो क्या हानि है ? इस प्रश्न के होनेपर यह उत्तर दिया है कि 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान नहीं हुआ तो ऐक्यग्राहक 'तत्त्वमसि' यह महावाक्य ही व्यर्थ (अप्रमाण) हो जायगा। यदि कहें कि वह वाक्य व्यर्थ हो जाय तो क्या क्षति है ? क्योंकि उस वाक्य के सभी श्रोताओं को तत्काल 'ब्रह्मास्मि' इस प्रकार की बुद्धि उत्पन्न होती दिखाई भी तो नहीं देती। इसका उत्तर यह है कि 'अधिकारिणः प्रमितिजनको वेदः' अधिकारियों को ज्ञान करानेवाला 'वेद' होता है' इस न्याय से सम्यक्पदार्थविज्ञान वाले का ही वाक्यार्थ बोध (वाक्यार्थ ज्ञान) में अधिकार होता है। अतः अनात्म पदवाच्य (युष्मत्पदवाच्य) जड़ वस्तु और आत्मा के भेद का ज्ञान रखने वाले पुरुष के प्रति ही यह वाक्य अर्थवत् (सार्थक) होता है, सभी के लिये (अनधिकारियों के लिये) यह वाक्य झटिति बोधक नहीं है ॥ ९० ॥ ममेदंप्रत्ययौ ज्ञेयौ युष्मद्येव न संशयः । अहमित्यस्मदोष्ठः स्यादयमस्मीति चोभयोः ॥९१॥ ममेति—जिन वस्तुओं के विषय में 'मम' (मेरा) और 'इदम्' (यह) ज्ञान होता है, उन्हें युष्मत्पदवाच्य ही समझना चाहिये, इसमें सन्देह नहीं है। तथा 'अहम्' (मैं) यह ज्ञान, अस्मत्पदवाच्य 'व्यावहारिक आत्मा' में होता है। उसी तरह 'यह' (देहादि) में हूँ'-यह ज्ञान, आत्मा और अनात्मा दोनों ही में हो सकता है ॥ ९१ ॥ हृदयस्पर्शिनी उसी युष्मद्-अस्मत् के विवेक को बताते हैं। जिन पुत्रादि अनात्म पदार्थों में 'इदम्' 'मम' (यह-मेरा) यह ज्ञान (प्रत्यय) होता है, निःसन्देह उन्हें 'युष्मत्' पदवाच्य ही समझना चाहिये । पुत्रादि बाह्य पदार्थों का देहाध्यास- परंपरा से ही अस्मदर्थ में प्रवेश होता है। अतः बाह्यार्थ सम्बन्ध भी अनात्मधर्म ही है, यह उचित ही कहा गया है। 'अहम्' (मैं) यह ज्ञान, अस्मत्पदवाच्य व्यावहारिक आत्मा में (अहंकार में) माना जाता है। तथा 'यह (देहादि) मैं हूँ' ऐसा ज्ञान, आत्मा और अनात्मा दोनों में ही हो सकता है ॥ ९१ ॥ अन्योन्यापेक्षया तेषां प्रधानगुणतेष्यते । विशेषणविशेष्यत्वं तथा ग्राह्यं हि युक्तितः ॥९२॥ अन्योन्येति- इन आत्मविषयक और अनात्मविषयक ज्ञानों (प्रत्ययों) में एक-दूसरे की अपेक्षा से प्रधानता और अप्रधानता मानी जाती है। उसी प्रकार इनके विशेषण-विशेष्य भाव को भी युक्तिसहित समझना चाहिये ॥ ९२ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मानात्मविषयक प्रत्ययों के संकीर्ण और असंकीर्णरूप विषयों को बताकर उक्त विवेक के लिये गुण-प्रधान भाव से विशेषण-विशेष्यभाव को स्पष्ट करते हैं । इन आत्मविषयक और अनात्मविषयक प्रत्ययों

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२१६ उपदेशसाहस्री में एक-दूसरे की अपेक्षा से प्रधानता और अप्रधानता मानी जाती है। इसी प्रकार युक्तिपूर्वक इनके विशेष्य- विशेषणभाव को भी समझना चाहिये ॥ ९२ ॥ ममेदं द्वयमप्येतन्मध्यमस्य विशेषणम् । धनी गोमान्यथा तद्वद्देहोऽहंकर्तुरेव च ॥९३॥ ममेति—'मम' और 'इदम्'—ये दोनों पूर्व श्लोक (९१) के मध्य में निर्दिष्ट 'अहमर्थ' के विशेषण हैं। जिस प्रकार 'धनी' और 'गोमान्' इनमें 'धन' और 'गो' दोनों 'पुरुष' के विशेषण हैं, उसी प्रकार 'शरीर' भी 'अहंकार' का विशेषण है ॥ ९३ ॥ हृदयस्पर्शिनो उक्त विशेष्य-विशेषणभाव का विवेचन करते हैं—'मम' और 'इदम्' ये दोनों पूर्व श्लोक (९१) के मध्य में निर्दिष्ट अहमर्थ के विशेषण हैं। जिस प्रकार 'धनी' तथा 'गायवाला' इनमें 'धन' और 'गो' पुरुष के विशेषण हैं, उसी प्रकार शरीर, अहंकार का विशेषण है। श्लोक ९२ और ९३ में यह आशय व्यक्त किया गया है कि जिन लोगों को आत्मा और अनात्मा (देहादि) के भेद का ज्ञान रहता है, वे लोग बाह्य पदार्थों की अपेक्षा उत्तरोत्तर आभ्यन्तर पदार्थों को प्रधान मानते हैं। अतः जिस प्रकार धन के कारण मनुष्य को धनी तथा गौ के कारण गायवाला कहते हैं, और ये शब्द उसके विशेषण होते हैं, उसी प्रकार 'मम' 'इदम्' आदि समस्त प्रत्यय 'आत्मा' के विशेषण हैं। यहाँ प्रधान को विशेष्य और अप्रधान को विशेषण समझना चाहिए। 'आत्मा' सभी की अपेक्षा प्रधान और आन्तरतम है। इसलिए वही सबका विशेष्य है ॥ ९३ ॥ बुद्धयारूढं सदा सर्वं साहंकर्त्रा च साक्षिणः । तस्मात्सर्वोवभासो ज्ञः किञ्चिदप्यस्पृशन्सदा ॥९४॥ बुद्धचेति—बुद्धिवृत्ति के विषयभूत सभी पदार्थ और उसी प्रकार 'अहंकार' के सहित सूक्ष्म विषय, ये सभी 'साक्षी आत्मा' के विशेषण हैं। अतः 'आत्मा' उनमें से किसी का भी स्पर्श नहीं करता, तथापि सबको प्रकाशित करता रहता हैं। क्योंकि वह (आत्मा) ज्ञानस्वरूप है ॥ ९४ ॥ हृदयस्पर्शिनी समस्त पदार्थ बुद्धिवृत्ति के विषय हैं। वे अहंकार के सहित सबके साक्षी, अतिसूक्ष्म आत्मा के विशेषण हैं। अतः आत्मा किसी को भी स्पर्श न करता हुआ सर्वदा सबको प्रकाशित करता हुआ ज्ञानस्वरूप है ॥ ९४ ॥ प्रतिलोममिदं सर्वं यथोक्तं लोकबुद्धितः । अविवेकधियामस्ति नास्ति सर्वं विवेकिनाम् ॥९५॥ प्रतिलोममिति—साधारण लोगों की बुद्धि के अनुसार पूर्व बताया हुआ सम्पूर्ण विशेषण-विशेष्य भाव विपरीत (प्रतिलोम) है। वास्तव में वह विशेषण-विशेष्य भाव का क्रम विवेकरहित पुरुषों की दृष्टि से होता है, किन्तु विवेकी पुरुषों की दृष्टि में वह सब नहीं है ॥ ९५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यह उक्त मार्ग विवेकी लोगों का है। किन्तु अविवेकियों का उसके विपरीत है। अर्थात् उक्त विशेष्य- विशेषणभाव लौकिक व्यवहार में विपरीत दिखाई देता है। वास्तव में यह विशेष्य-विशेषणादि क्रम विवेकहीन पुरुषों की दृष्टि से है। निष्कर्ष यह है कि यह विशेष्य-विशेषणभाव उन्हीं की दृष्टि से है, जो आत्मा और अनात्मा दोनों की स्वतन्त्र सत्ता मानते हैं, और आत्मा की अपेक्षा अनात्मा को प्रधान समझते हैं। किन्तु तत्त्वज्ञों की दृष्टि में तो आत्मा से भिन्न किसी भी वस्तु की सत्ता ही नहीं है। इस कारण यह विशेष्य-विशेषणभाव भी नहीं है। संसारी पुरुष तो

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २१७ शरीरादि अनात्मा को ही प्रधान समझते हैं, इसलिए उनकी दृष्टि में आत्मा ही अनात्मा का विशेषण है। अतः अध्या- रोपापवादन्याय से यथाप्रतीति सत्ता को लेकर विवेकियों की आत्मविषयक बुद्धि कराने के लिये विशेषण-विशेष्यादि प्रबन्ध कल्पना की गई है ।। ९५ ।। अन्वयव्यतिरेकौ हि पदार्थस्य पदस्य च । स्यादेतदहमित्यत्र युक्तिरेवावधारणे ।।९६।। अन्वयेति—आत्मानात्मरूप पदार्थ तथा पद के अन्वय-व्यतिरेक, ये 'अहम्' इस वस्तु की अवधारणा (निश्चय) करने में युक्ति मात्र हैं ।। ९६ ।। हृदयस्पर्शिनो पद-पदार्थ के अन्वय-व्यतिरेक से ही सर्वसंसारविनिर्मुक्त आत्मा का ज्ञान हो ही जायगा, तब वाक्य की क्या आवश्यकता ? पदार्थ का अन्वय-व्यतिरेक इस प्रकार है—आत्मपदार्थ सबका द्रष्टा (साक्षी) है, वह कभी भी दृश्य अथवा साक्ष्य नहीं होता, क्योंकि वह अलुप्तप्रकाशसन्मात्र होने से स्वयंप्रकाश है। अतः अन्याश्रय न होने से कभी भी और किसी का भी विशेषण होकर वह नहीं रहता। तथा अहंकार से लेकर उनके अपने विषयों तक सब साक्ष्य (साक्षीभास्य) हैं, उनका प्रकाश अन्याधीन होने से अन्याश्रय है अर्थात् अन्याश्रित है। इसलिए अप्रधान होने के कारण वह अहंकारादि विषयान्तपदार्थ सर्वदा आत्मा का विशेषण होकर ही रहता है। तस्मात् अनागमापायी वह दृगात्मरूप (आत्मा) शुक्ति के समान सत्य है। और उससे विपरीत जो भी अतिरिक्त पदार्थ है, वह सभी रजत के समान असत्य हैं और अनृत, जड़, परिच्छिन्न, पराधीन, पराक् अर्थ से व्यावृत्त (भिन्न) सत्य, ज्ञान, अनन्त, प्रत्यक्, आनन्दरूप 'आत्मा' है, इस प्रकार से पराक् और प्रत्यक् का विवेचन करना ही पदार्थ का अन्वय-व्यतिरेक कहा जाता है। 'तथा' पद का अन्वय-व्यतिरेक इस प्रकार है—आत्मा, चैतन्य, प्रज्ञान, ब्रह्म, सत् आदि पद, कर्ता आदि उपपदों से रहित रहते हैं, तब वे शुद्ध आत्मा के बोधक होते हैं। इसीलिए किसी के विशेषण न होने से वे तद्विशिष्ट किसी अन्य वस्तु का ज्ञान (बोध) नहीं करा सकते। क्योंकि विशिष्ट का बोधन कराने की सामर्थ्य उन शब्दों में नहीं है। किन्तु कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता, द्रष्टा, श्रोता, वक्ता, गन्ता, कृश, स्थूल-ये शब्द (पद) देहेन्द्रियादिविशिष्ट आत्मा के बोधक हुआ करते हैं, शुद्ध आत्मा के बोधक नहीं होते हैं। क्योंकि इन शब्दों का प्रयोग, अन्य के अधीन क्रिया आदि की उपरागदशा में ही हुआ करता है। इस प्रकार के विवेचन को ही पद का अन्वय-व्यतिरेक कहा करते हैं। इस रीति से पद और उसके अर्थों के अन्वय-व्यतिरेक को समझ लेने से ही आत्मज्ञान सहज हो सकता है, तब वाक्य की क्या आवश्यकता ? इस प्रकार पद या पदार्थ का जो अन्वय-व्यतिरेक है, वह तो अस्मदर्थ विषय के अवधारण करने में युक्ति- रूप ही है, अर्थात् विवेकावधारण का उपायमात्र है; वाक्यार्थ की एकता में, पदार्थ की एकता में उसका व्यापार नहीं है। तस्मात् इतने विवेक से आत्मा का देहादि से वैलक्षण्य का अवधारण हो जाने पर भी 'मैं कौन हूँ' यह जिज्ञासा बनी ही रहती है। 'तत्त्वमसि' यह वाक्य जिज्ञासित स्वरूपविशेष का समर्पक है, अतः उसकी अपेक्षा तो अवश्य ही करनी होगी ।। ९६ ।। नाद्राक्षमहमित्यस्मिन्सुषुप्तेऽन्यन्मनागपि । न वारयति दृष्टिं स्वां प्रत्ययं तु निषेधति ॥९७॥ नाद्राक्षमिति—इस सुषुप्ति की स्थिति में 'अन्यत् मनागपि अहम् नाद्राक्षम्'—मैंने कुछ भी अन्य वस्तु नहीं देखी—यह जो अनुभव है, वह अपनी दृष्टि का निषेध नहीं कर रहा है, वह केवल प्रत्यय का ही निषेध करता है, अर्थात् प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयात्मक त्रिपुटी का ही निषेध करता है ।। ९७ ।। हृदयस्पर्शिनो तीन अवस्थाएँ परस्पर व्यभिचारी हैं, किन्तु चैतन्यात्मा कदापि व्यभिचारी नहीं है, इस प्रकार प्रकारान्तर से आत्मानात्म-विवेक को बताते हैं। इस सुषुप्त में (इस आत्मा में) या इस सुषुप्ति अवस्था में 'आत्मस्वरूप के २८

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२१८ उपदेशसाहस्री अतिरिक्त किंचिन्मात्र भी मैंने नहीं देखा' ऐसा परामर्श करनेवाला मनुष्य, अपनी दृष्टि (चैतन्य) का निषेध नहीं करता। किन्तु केवल प्रत्यय का निषेध करता है। 'प्रतीयते इति प्रत्ययः' इस व्युत्पत्ति से प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय रूप सभी विशेष का ग्रहण किया जाता है। तस्मात् परस्परव्यभिचारिता होने से दृष्ट, नष्ट स्वभाववाली मिथ्याभूत अवस्थाओं से भिन्न अव्यभिचारी, चिद्रूप, साक्षी, सत्य आत्मा है, यह विवेक सिद्ध होता है॥ ९७॥ स्वयंज्योतिर्न हि द्रष्टुरित्येवं संविदोऽस्तिताम् । कौटस्थ्यं च तथा तस्याः प्रत्ययस्य तु लुप्तताम् ॥ स्वयमेवाब्रवीच्छास्त्रं प्रत्ययावगती पृथक् ॥९८॥ स्वयमिति—इस अवस्था में 'यह पुरुष स्वयंप्रकाश है', उसी तरह 'द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता'—ये श्रुति वचन स्वयं ही उस अवस्था में चैतन्य के अस्तित्व और कौटस्थ्य (कूटस्थता) और उसके प्रत्यय के लोप को बताते हैं। इसलिये 'प्रत्यय' और 'ज्ञान' परस्पर भिन्न हैं॥ ९८॥ हृदयस्पर्शिनी ऊपर निर्दिष्ट किये गये अन्वय-व्यतिरेक शास्त्रसम्मत हैं, केवल अपनी बुद्धि का कल्पनाविलास मात्र नहीं है, यह विश्वास दिलाने के लिये शास्त्र बताते हैं। "अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः"१ "नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते"२ ये शास्त्रवाक्य बता रहे हैं कि इस अवस्था में यह पुरुष स्वयंप्रकाश होता है तथा द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता। इस प्रकार चेतना के सद्भाव (अस्तिता) को और उसकी कूटस्थता (निर्विकारता) को श्रुति ने बताया है। तथा प्रत्यय (प्रमाण-प्रमाता-प्रमेय) की लुप्तता (लोप) अर्थात् असत्ता को "न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तम्"३—इत्यादि शास्त्र ने स्वयं ही बताया है। अतः प्रत्यय और अवगति (ज्ञान) पृथक् (असंकीर्ण) हैं, शास्त्र ने ही इनका विवेचन किया है॥ ९८॥ एवं विज्ञातवाक्यार्थे* श्रुतिलोकप्रसिद्धितः । श्रुतिस्तत्त्वमसीत्याह श्रोतुर्मोहापनुत्तये ॥९९॥ एवमिति—इस प्रकार श्रुतिवचन और लोकप्रसिद्धि अर्थात् 'अन्वय-व्यतिरेक' के द्वारा वाक्यार्थ का जिसे ज्ञान हो गया हो, उसी पुरुष के मोह (अज्ञान) की निवृत्ति के लिये श्रुति 'तत्त्वमसि' का उपदेश करती है॥ ९९॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अवान्तरवाक्यकृत युष्मदस्मद् विवेक को उपपत्ति से बताकर, पदार्थतत्व का ज्ञान जिसे हो चुका है, ऐसे पुरुष में ही यह महावाक्य सफल विज्ञान को उत्पन्न करता है। इस प्रकार श्रुति और लोक की प्रसिद्धि से अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा जिसे अवान्तर वाक्यार्थ का ज्ञान हो गया है, उस पुरुष के मोह की निवृत्ति के लिये (सकार्य अविद्या की निवृत्ति के लिये) महावाक्यात्मिका 'तत्त्वमसि' श्रुति 'तू ब्रह्म है' ऐसा उपदेश करती है॥ ९९॥ ब्रह्मा दाशरथेर्यद्वदुक्त्यैवापानुदत्तमः । तस्य विष्णुत्वसंबोधे न यत्नान्तरमूचिवान् ॥१००॥ ब्रह्मेति—जिस तरह ब्रह्मदेव ने 'हे राम ! तुम विष्णु हो'—इस वाक्य को कह कर ही दशरथकुमार राम का 'अज्ञान' दूर कर दिया था। ब्रह्मा जी को उन्हें 'विष्णु' होने का बोध कराने में किसी अन्य प्रयत्न का आश्रय नहीं करना पड़ा॥ १००॥ १. (वृ. उ. ४।३।९, १४) २. (वृ. उ. ४।३।२३) ३. (वृ. उ. ४।३।२३-३०)

  • वाक्यार्थे—इति नै. सि. ४।२४ पाठः ।
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तत्त्वमसिप्रकरणम् २१९ हृदयस्पर्शिनी वाक्यश्रवणमात्र से मोह के अपोहन में पुराणसिद्ध दृष्टान्त को बता रहे हैं। दाशरथी राम ने देवकार्य संपादन करने के लिये मनुष्यावतार के अभिनय द्वारा संकल्प पूर्वक अपने माहात्म्य का आच्छादन जो किया था, उसे ही यहाँ पर अज्ञान (तमस्) शब्द से कहा गया है। क्योंकि परमेश्वर को संमोह होना संभव नहीं है। संक्षेपशारीरक में कहा गया है- “संकल्पपूर्वकमभूद् रघुनन्दनस्य नाहं विजान इति कांचन कालमेतत् । ब्रह्मोपदेशमुपलभ्य निमित्तमात्रं तच्चोत्ससर्ज स कृते सति देवकार्ये”॥ ब्रह्मदेव ने 'हे राम ! तुम विष्णु हो, केवल दशरथपुत्र नहीं हो।' इस वाक्य के द्वारा ही दशरथकुमार राम का अज्ञान निवृत्त कर दिया था। ब्रह्मा ने उनके विष्णुत्व का बोध कराने में उक्त वाक्यार्थ का उपदेश करने के अतिरिक्त कोई अन्य प्रयत्न नहीं किया था ॥ १०० ॥ अहंशब्दस्य निष्ठा या ज्योतिषि प्रत्यगात्मनि । सैवोक्ता सदसीत्येवं फलं तत्र विमुक्तता ॥१०१॥ अह्मिति—उसी प्रकार 'अहम्' शब्द की जो निष्ठा है, उसी का 'तू सत्स्वरूप है'—इस वाक्य के द्वारा उपदेश किया गया है और उसका फल 'मोक्ष' है ॥ १०१ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसी प्रकार पराक् (बाह्य) अर्थों से व्यावृत्त निरुपाधिक ज्योतिःस्वरूप, साक्षित्वप्रकाशस्वभाव प्रत्यगात्मा में 'अहं' शब्द की जो निष्ठा है, अर्थात् 'अहं' शब्द से जो स्वयंप्रकाश सर्वसाक्षी परब्रह्म लक्षित होता है, उसी निष्ठा का 'त्वं तदसि' 'अहं तत् ब्रह्मास्मि' इस वाक्य के द्वारा उपदेश किया गया है। उससे विमुक्तता अर्थात् मोह का अपोह- रूप फल प्राप्त होता है। अथवा इसी को एक अन्य प्रकार से भी बताया जा सकता है। तथाहि—दाशरथी राम को विष्णुत्व के उपदेशमात्र से 'विष्णुरहमस्मि'-मैं विष्णु हूँ—इस प्रकार का बोध तत्काल हो सकता है, क्योंकि वह दाशरथी राम महान् महिमा से सम्पन्न है। किन्तु आज के जो लोग हैं; जो कर्ता, भोक्ता आदि प्रत्यक्ष की तरह अनुभव में आनेवाले परन्तु वस्तुतः मिथ्या प्रत्यय से ग्रसित हैं; उनको ब्रह्मोपदेशमात्र से 'अहं ब्रह्मास्मि'—मैं ब्रह्म हूँ, इस प्रकार का निर्विचिकित्स ज्ञान होना कैसे संभव हो सकता है? यह शंका हो सकती है। किन्तु त्वं-पदार्थ का शोधन जिसने कर लिया है, ऐसे पुरुष को ही अर्थात् जो अपने को कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि का साक्षीमात्र समझता है, जिसे अहं आदि शब्द लक्षणा के द्वारा बताते हैं, उसी के लिये यह ब्रह्मात्मोपदेश है, अन्य के लिये नहीं, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥ १०१ ॥ श्रुतमात्रेण चेन्न स्यात्कार्यं तत्र भवेद् ध्रुवम् । व्यवहारात्पुरापीष्टः सद्भावः स्वयमात्मनः ॥१०२॥ श्रुतमिति—वाक्य के सुनने मात्र से यदि ज्ञान की उत्पत्ति न हो तो ज्ञानोत्पत्त्यर्थ उसे कार्य की आवश्यकता पड़ सकती है, किन्तु प्रत्यगात्मा की सत्ता तो वाक्योपदेशात्मक व्यवहार के पूर्व भी निश्चित रूप से है, यह सभी जानते हैं ॥ १०२ ॥ हृदयस्पर्शिनी पद-पदार्थ का ज्ञान जिसे हो गया है, उसे वाक्य से ही 'अहं ब्रह्मास्मि' यह ज्ञान हो जाता है, किन्तु उस ज्ञान से यदि समूल संसार की निवृत्ति न मानी जाय तो वेदप्रामाण्य की सिद्धि के लिये उसे कार्यपरक ही मान लेना चाहिए। किन्तु यह कथन विद्वानों के अनुभव के विरुद्ध होने से उचित नहीं है, अथवा इस तरह से भी कह सकते हैं कि पदार्थतत्त्व का ज्ञान प्राप्त किये हुए पुरुष को वाक्य से ही समूल संसारनिवृत्तिरूप फलात्मक ज्ञान हो ही जाता है, तब उस स्थिति में प्रामाण्यसिद्ध्यर्थ श्रुति को कार्यपरक मानने का आग्रह करना व्यर्थ है। उक्त न्याय से

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वाक्य के श्रवणमात्र से विज्ञानरूप उक्त फल न हो तो वहाँ कार्य की कल्पना अवश्य करनी होगी। अन्यथा अर्थवादादि- वाक्य के तुल्य स्वार्थ में उसका प्रामाण्य उपपन्न न हो सकेगा। यहाँ तो तत्क्षण ही फल का अनुभव होने से वैसी कल्पना की कोई आवश्यकता ही नहीं है। किञ्च यदि वाक्यश्रवण को सिद्ध ब्रह्मात्मज्ञानरूप तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति में प्रमाण न माना जाय तो उसका अप्रामाण्य चार प्रकार से होगा—(१) विपर्यासलक्षण, (२) निष्फलत्वलक्षण, (३) संशय- लक्षण, (४) अनुपपत्तिलक्षण। उक्त चार प्रकारों में से प्रथम प्रकार के विपर्यासलक्षण अप्रामाण्य का खण्डन इस पद्य के उत्तरार्ध से किया गया है। अभिप्राय यह है कि 'तत्त्वमसि' इस वाक्योपदेश से पूर्व आत्मा की सत्ता है ही, क्योंकि कोई बाधक नहीं है। अतः 'तत्त्वमसि' इस वाक्योपदेश के द्वारा उसके यथावस्थित अज्ञान की निवृत्ति हो जाने पर आत्मस्वरूप का ही जो ज्ञान होता है, वह शुक्ति-रजत के समान अप्रामाणिक नहीं हो सकता। क्योंकि 'अहं ब्रह्मास्मि' इस अनुभववाक्य से यथावस्थित आत्मस्वरूप का ही अनुभव होता रहता है ॥ १०२ ॥

अशनायादिनिर्मुक्त्यै तत्काला जायते प्रमा। तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थे त्रिषु कालेष्वसंशयः ॥१०३॥

अशनायेति—किञ्च आप्तवाक्य के श्रवण से जो 'तत्त्वज्ञान' होता है, वह भी क्षुधा-पिपासामय संसार की निवृत्ति का कारण होता है। उसी तरह 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य के अर्थ में कभी किसी काल में भी किसी को संदेह नहीं होता है ॥ १०३ ॥

हृदयस्पर्शिनी

अप्रामाण्य का द्वितीय प्रकार भी ठीक नहीं है, क्योंकि अनुभवविरोध होता है। आप्तवाक्यश्रवण काल में ही होनेवाला तत्त्वज्ञान क्षुत्पिपासादिरूप संसार की निवृत्ति कराने में हेतु होता है। अतः वह निष्फल नहीं है। एवञ्च वाक्योपदेश के निष्फलत्वरूप अप्रामाण्य का भी खण्डन हो गया। क्योंकि विद्वानों का यह प्रत्यक्ष अनुभव है। इसी प्रकार तृतीय प्रकार के अप्रामाण्य का भी अनुभवविरोध होने से खण्डन करते हैं। क्योंकि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य के अर्थ में किसी प्रकार का और कभी भी (तीनों कालों में) संशय नहीं है। अतः इसका संशयलक्षण अप्रामाण्य भी नहीं कहा जा सकता ॥ १०३ ॥

प्रतिबन्धविहीनत्वात्स्वयं चानुभवात्मनः। जायेतैव प्रमा तत्र स्वात्मन्येव न संशयः ॥१०४॥

प्रतिबन्धेति—किञ्च पदार्थों के अज्ञान रूप प्रतिबन्ध के न रहने से तथा स्वयं ज्ञान रूप होने के कारण आत्मा में तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति भी हो जाती है, इस विषय में भी संशय नहीं है ॥ १०४ ॥

हृदयस्पर्शिनी

पदार्थ का अज्ञान ही, वाक्यार्थज्ञान के होने में प्रतिबन्धक हुआ करता है। पदार्थ का अज्ञान न रहने पर अर्थात् पद-पदार्थ का ज्ञान प्राप्त किये हुए पुरुष को वाक्यश्रवणकाल में ही आत्मविषयक प्रमाज्ञान (यथार्थ ज्ञान) हो ही जाता है, इसमें किञ्चिन्मात्र भी संशय नहीं है। अतः वाक्यार्थोपदेशमात्र से तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति होगी या नहीं, ऐसा संदेह नहीं करना चाहिये। उस कारण 'हुँ फट्' आदि शब्द की तरह अनुपत्तिलक्षण अप्रामाण्य भी नहीं कहा जा सकता ॥ १०४॥

किं सदेवाह्मस्मीति किंवाऽन्यत्प्र तिपद्यते। सदेव चेदहंशब्दः सता मुख्यार्थ इष्यताम् ॥१०५॥

किमिति—'तत्त्वमसि' वाक्य के अर्थ को सुनकर 'मैं सत् ही हूँ'यह ज्ञान हो होता है, अथवा अन्य कोई ज्ञान होता है ? यदि 'अहम्' शब्द 'सत्' से भिन्न नहीं है, तो 'सत्' के साथ ही उसका मुख्यार्थ जानना चाहिये ॥ १०५ ॥

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २२१ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार प्रमाणस्वरूपनिरूपण के द्वारा 'अहं ब्रह्मास्मि' इस ज्ञान का उपपादन करके अब प्रतिपत्तव्य ( ज्ञातव्य ) अर्थ के स्वरूपनिरूपण के द्वारा भी उसे बताना प्रारंभ कर रहे हैं। 'तत्त्वमसि' वाक्य के अर्थ का श्रवण करने के बाद 'अहमस्मि'-मैं सत् ही हूँ, ऐसा ज्ञान होता है, या अन्य कोई और ज्ञान होता है ? यदि 'अहम्' शब्द सत् ही है, तो सत् के साथ ही उसका मुख्य अर्थ समझना चाहिये। अर्थात् 'सत्' शब्द और 'अहम्' शब्द दोनों का एक ही अर्थ में पर्यवसान होने से 'एकात्मता' ही वाक्यार्थ है। 'संसर्ग' वाक्यार्थ नहीं है। इस प्रकार अपरोक्ष ज्ञान की सिद्धि हो जाती है ॥ १०५ ॥ अन्यच्चेत् *सदहंग्राहप्रतिपत्तिर्मृषैव सा। तस्मान्मुख्यग्रहे नास्ति वारणाऽवगतेरिह ॥१०६॥ अन्यदिति-यदि 'सत्' कोई अन्य वस्तु है, अर्थात् आत्मा से भिन्न वस्तु है, तो उसमें जो यह 'अहम्' इत्या- कारक ज्ञान होता है, उसे मिथ्या ही कहना होगा। इसलिये इस वाक्य का मुख्यर्थि ग्रहण करने में यथार्थ ज्ञान का निषेध नहीं होता है। तात्पर्य यह है कि 'मैं सत् हूँ' इस वाक्य का मुख्यार्थ ग्रहण करने पर इस वाक्य की सार्थकता हो पाती है, अन्यथा नहीं ॥ १०६ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि 'सत्', वस्तु, आत्मा से भिन्न कोई और है, तो उसमें यह 'अहंग्रहरूप जो प्रतिपत्ति' अर्थात् अहंग्ज्ञान है, वह संपदादि ज्ञान के समान मृषा (मिथ्या) ही होगा, तब वाक्य को अप्रमाण ही कहना पड़ेगा। प्रमाण-प्रमेय के स्वभाव की पर्यालोचना करने पर प्रतीत होता है कि अपरोक्ष फलवत् आत्मतत्त्वज्ञान वाक्य से ही उत्पन्न होता है। अतः इस वाक्य का मुख्य अर्थ ग्रहण करने में यथार्थ ज्ञान का निषेध नहीं होता। अर्थात् 'मैं सत् हूँ' इस वाक्य का मुख्यार्थ ग्रहण करने पर ही उसकी सार्थकता है, अर्थात् यथार्थ अनुभव का निवारण नहीं होता। और वही संसार- दुःख से पीड़ित हुए मुमुक्षु के लिये अभीष्ट भी है ॥ १०६ ॥ प्रत्ययी प्रत्ययश्चैव यदाभासौ तदर्थता। तयोरचितिमत्त्वाच्च चैतन्ये कल्प्यते फलम् ॥१०७॥ प्रत्ययीति- 'प्रत्ययी' (अन्तःकरण) और 'प्रत्यय' (उसकी वृत्तियाँ) जिनके आभास हैं, उसी के ये शेष- भूत भी हैं। इन दोनों के जड़ (अचेतन) होने के कारण इस वाक्य का फल (तात्पर्य) चैतन्य आत्मा में ही समझा जाता है ॥ १०७ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि 'आत्मा' कूटस्थ होने के कारण ज्ञाता नहीं हो सकता, तब फलसम्बन्ध भी उपपन्न नहीं होगा। इस प्रकार आत्मज्ञानरूप यथार्थ ज्ञान का निवारण हो जायगा। किन्तु यह शंका उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्ययी अर्थात् परिणामी अन्तःकरण और प्रत्यय अर्थात् उसकी वृत्तियाँ (परिणाम), जिस चिदात्मा के आभास हैं, उसी के ये शेषभूत भी हैं। इन दोनों के अचेतन (जड़) होने के कारण इस वाक्य का फल, चैतन्य आत्मा में ही माना जाता है। क्योंकि जड़ वस्तु फलस्वरूप अथवा फल का उपादान नहीं हो सकती। अतः अन्तःकरण और चिदाभास में फल संभव न होने के कारण निर्व्यापार होने पर भी उनके अधिष्ठानभूत चेतन आत्मा में ही उसका तात्पर्य प्रतीत होता है ॥ १०७ ॥ कूटस्थेऽपि फलं योग्यं राजनीव जयादिकम्। †तदन्तात्मत्वहेतुभ्यां क्रियायाः प्रत्ययस्य च ॥१०८॥

  • ग्राहि०-पाठन्तरम् । † तदनात्म०-पाठान्तरम् ।
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२२२ उपदेशसाहस्री कूटस्थे इति—जिस प्रकार सेना के जय-पराजय का राजा पर आरोप किया जाता है, उसी प्रकार अन्तः- करण की 'अहम्' इत्याकारिका वृत्ति और चिदाभास 'अनात्मरूप' (जड़) होने से कूटस्थ आत्मा में ही फल समझना चाहिये ॥ १०८ ॥ हृदयस्पर्शिनी व्यापारशून्य का भी फल के साथ संबंध होने में दृष्टान्त बता रहे हैं। जिस प्रकार सेना के जय- पराजय का राजा पर आरोप किया जाता है, उसी प्रकार अन्तःकरण की अहमात्मिका वृत्ति और चिदाभास, ये दोनों अनात्मभूत जड़ होने के कारण कूटस्थ आत्मा में फल का संबंध समझना चाहिये। यहाँ यह शंका हो सकती है कि दृष्टान्त में तो स्व-स्वामिभावसम्बन्ध निमित्त हो सकता है, किन्तु प्रकृत में अध्यक्ष और अध्यक्ष्य में वैसा सम्बन्ध न दिखाई देने से उपर्युक्त दृष्टान्त कैसे संगत हो सकेगा ? उक्त शंका के समाधान में कहा गया है कि यहाँ भी अधिष्ठान-अधिष्ठेयभावरूप सम्बन्ध, फलसम्बन्ध होने में हेतु हो सकता है। मूल में उक्त 'हेतुभ्यां' को 'हेतुत्वाभ्यां' ऐसा भावप्रधान समझना चाहिये । उसी तरह 'क्रिया' को 'अहमात्मिका वृत्ति' समझनी चाहिये । और 'प्रत्यय' शब्द से 'प्रत्यर्थमयति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'अन्तःकरणसाभास' अर्थात् वृत्ति और वृत्तिमान् का साभास समझना चाहिए । उसी तरह आत्मत्वं च हेतुत्वं च आत्महेतुत्वे, तस्य = फलस्य न आत्महेतुत्वे, तदनात्मत्वहेतुत्वे ताभ्यां तदनात्मत्वहेतुत्वाभ्याम् । तथाच जड़भूत क्रिया और प्रत्यय, दोनों फलस्वरूप न होने से और फल के उपादन भी न होने से तद्व्यापारनिबन्धन फल, उसके अधिष्ठानरूप कूटस्थ के निर्व्यापार रहने पर भी उसी में होगा। अतः दृष्टान्त यहाँ पर संगत हो जाता है ॥ १०८॥ आदर्शस्तु यदाभासो मुखाकारः स एव सः । यथैवं प्रत्ययादर्शो यदाभासस्तदा ह्यहम् ॥१०९॥ आदर्श इति—आदर्श (दर्पण) जिसके आभास से युक्त होता है, उसी का आकार भी प्रतीत होता है। जैसे जब दर्पण, मुख के आभास से युक्त होता है, तब उसमें ग्रीवास्थ मुख का आकार भी प्रतीत होता है, उसी प्रकार अहंकार जिस चेतन के प्रतिबिम्ब द्वारा प्रकाशित होता है, वह 'परमात्मा' ही है। अतः 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों का फल चिदात्मा में होना योग्य ही है ॥ १०९ ॥ हृदयस्पर्शिनी शुद्ध आत्मा में प्रमातृत्व नहीं होने से ही यह कहा गया कि कूटस्थ में विशिष्ट प्रमातृकृत फल का उपचार किया जाता है। यह बात राजा के दृष्टान्त से बताई गई है। वस्तुतः स्वात्मा में अध्यस्त स्वोपाधि के व्यापार से चित्प्रतिबिम्ब में ही प्रमातृत्व रहता है। अतः प्रतिबिम्बभावनिबन्धन फलसम्बन्ध अविकृत चिदात्मा से ही होता है। इसे दृष्टान्त देकर बता रहे हैं—जैसे आदर्श (दर्पण) जिस मुख के आभास से विशिष्ट हुआ प्रतीत होता है, वही ग्रीवास्थ मुख का आकार भी होता है, उसी प्रकार अहंकार जिस चेतन के प्रतिबिम्ब द्वारा प्रकाशित है, वह परमात्मा ही है। अतः 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्यों का फल चिदात्मा में होना उचित ही है ॥ १०९ ॥ इत्येवं प्रतिपत्तिः स्यात्सदस्मीति च नान्यथा । तत्त्वमित्युपदेशोऽपि द्वाराभावादनर्थकः ॥११०॥ इतीति—चिदाभास का जब स्वीकार करते हैं, तभी 'मैं सत्स्वरूप हूँ'—यह ज्ञान होना संभव हो सकता है, अन्यथा नहीं । चिदाभास के स्वीकार न करने पर कोई रहेगा ही नहीं, तब 'तू सत्स्वरूप है'—यह उपदेश ही व्यर्थ हो जायगा ॥ ११० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस रीति से चिदाभास का स्वीकार करने पर ही 'मैं सत्स्वरूप हूँ' यह ज्ञान हो सकता है, अन्यथा नहीं हो सकता । क्योंकि आभास को न मानने पर किसी के न रहने से 'तू सत्स्वरूप है' यह उपदेश भी व्यर्थ हो जायगा ॥ ११० ॥

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २२३ श्रोतुः स्यादुपदेशश्चेदर्थवत्त्वं *तथा भवेत् । अध्यक्षस्य न चेदिष्टं श्रोतृत्वं कस्य तद्भवेत् ॥१११॥ श्रोतुरिति—उपदेश, श्रोता को किये जाने पर ही सार्थक हो सकता है। यदि कूटस्थ साक्षी आत्मा में श्रोतृत्व न स्वीकार किया जाय तो वह और किसका हो सकता है ? ॥ १११ ॥ अध्यक्षस्य समीपे स्याद्बुद्धेरेवेति चेन्मतम् । न तत्कृतोपकारोऽस्ति काष्ठाद्यद्वन्न कल्प्यते ॥११२॥ अध्यक्षेति— यह कहें कि साक्षी के सन्निध रहने से 'बुद्धि' में ही श्रोतृत्व की कल्पना की जा सकती है किन्तु यह कथन उचित न होगा, क्योंकि जिस प्रकार काष्ठ के समीप रहने से 'बुद्धि' का कोई उपकार नहीं होता, उसी प्रकार 'साक्षी' के द्वारा भी कोई उपकार नहीं हो सकता ॥ ११२ ॥ हृदयस्पर्शिनी अध्यक्ष के लिये उपदेश को न मानने पर भी उसकी (उपदेश की) व्यर्थता कैसे हो सकती है ? हम, साक्षी का सान्निध्य होने से बुद्धि में ही श्रोतृत्व कहेंगे । इस प्रकार शंका करने पर शंका करनेवाले से यह पूछ सकते हैं कि बुद्धि का श्रोतृत्व, क्या अध्यक्ष की सन्निधि की सत्तामात्र की अपेक्षा करता है ? या उसके द्वारा किये गये उपकार की अपेक्षा करता है ? प्रथम पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं कि सन्निहित रहनेवाले अध्यक्ष के द्वारा किया गया उपकाररूप कोई अतिशय बुद्धि में नहीं दिखाई देता । जिस प्रकार काष्ठ आदि की सन्निधि से बुद्धि का कोई उपकार नहीं होता है, उसी प्रकार साक्षी के द्वारा भी बुद्धि का कोई उपकार नहीं होता है ॥ ११२ ॥ बुद्धौ चेत्कृतः कश्चिन्नन्वेवं परिणामिता । आभासेऽपि च को दोषः सति श्रुत्याद्यनुग्रहे ॥११३॥ बुद्धाविति—यदि यह कहें कि 'साक्षी' के द्वारा 'बुद्धि' में कोई विशेषता उत्पन्न हो जाती है, तो 'साक्षी' को परिणामी कहना होगा । अतः श्रुतिप्रमाण के अनुरोध से 'चिदाभास' के स्वीकारने में क्या हानि है ? ॥ ११३ ॥ हृदयस्पर्शिनी द्वितीय पक्ष में भी दोष देते हैं। यदि यह कहें कि साक्षी के द्वारा बुद्धि में कोई विशेषता उत्पन्न होती है, अतः आभास स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं। किन्तु ऐसा कहने पर अध्यक्ष को परिणामी कहना होगा । ऐसी परिस्थिति में श्रुति प्रमाण का अवलम्ब कर 'चिदाभास' ही क्यों न माना जाय ? क्योंकि आभास पक्ष निर्दुष्ट है, अतः वही उपादेय है। अथवा अध्यक्ष की परिणामिता भी मान ली जाय तो भी श्रुतिप्रमाण से सिद्ध आभास को मान लेने में भी तुम्हारी कौन-सी हानि है ? ॥ ११३ ॥ आभासे परिणामश्चेन्न रज्ज्वादिन्निभत्ववत् । सर्पादिश्च तथाऽवोचमादर्शं च मुखत्ववत् ॥११४॥ आभासे इति—यदि यह कहें कि 'चिदाभास' को स्वीकार करने पर भी 'आत्मा' का परिणामित्व सिद्ध होता है, किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि रज्जु आदि की समानता से जैसे सर्प आदि की कल्पना की जाती है, उसी तरह तथा आदर्श (शीशे) में मुख के प्रतिबिम्ब के समान उसे मिथ्या बता चुके हैं ॥ ११४ ॥ १. 'रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव' — (बृ. उ. २।५।१९ तथा कठ. उ. ५।९।१०) और 'एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् — (ब्रह्म बिन्दु उ. १२)

  • तदा०—पाठान्तरम् ।
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२२४ .उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि यह कहें कि चिदाभास मानने पर भी आत्मा परिणामी सिद्ध होगा, तो यह कथन ठीक नहीं है । क्योंकि रज्जु के अज्ञान से कल्पित सर्प में रज्जु की समानता के तुल्य तथा अनिदंरूप रजत में इदमात्मकता के तुल्य चिदात्मा के अज्ञान से कल्पित बुद्धि आदि में चित्तुल्यता मिथ्या ही है । मूलगत 'च' से अभोक्तृस्वरूप आत्मा में भोक्तृत्व का आभास भी मृषा ही है, यह सूचित किया गया है । अर्थात् उसे दर्पण में मुख के प्रतिबिम्ब के समान मिथ्या बता चुके हैं ॥ ११४ ॥ नाऽऽत्माभासत्वसिद्धिश्छेदात्मनो ग्रहणात्पृथक् । मुखादेश्च पृथक्सिद्धिर्हृ त्वन्योन्यसंश्रयः ॥११५॥ नात्मेति—शुद्ध आत्मा के ग्रहण करने से आत्मा के आभास की पृथक् सिद्धि यदि नहीं होती हो तो अन्योन्याश्रय दोष की उपस्थिति होगी । परन्तु यहाँ दृष्टान्त में तो शीशे में पड़े हुए प्रतिबिम्ब से ग्रीवा पर स्थित मुख की स्थिति पृथक् ही है । इसलिये अन्योन्याश्रय दोष के उपस्थित होने की कोई संभावना नहीं है ॥ ११५ ॥ हृदयस्पर्शिनी अहंकार को ही आत्मा समझनेवाला उसके चिन्नभिन्नत्व पर आक्षेप कर रहा है । केवल (शुद्ध) आत्मा का अवभास होते रहने से आत्मा के आभास की पृथक् सिद्धि न होगी, अर्थात् आभास के अवभास से ही यदि आत्मा का आभास कहा जाय तो अन्योन्याश्रय दोष उपस्थित होगा, तात्पर्य यह है कि अपनी-अपनी सिद्धि में एक दूसरे की अपेक्षा होगी । किन्तु दृष्टान्त में दर्पणगत प्रतिबिम्ब से ग्रीवास्थ मुख की सिद्धि पृथक् है, अतः दृष्टान्त विषम है । दृष्टान्त में अन्योन्याश्रय दोष नहीं है ॥ ११५ ॥ अध्यक्षस्य पृथक्सिद्धावाभासस्य तदीयता । आभासस्य तदीयत्वे ह्याध्यक्षव्यतिरिक्तता ॥११६॥ अध्यक्षस्येति—पूर्वपक्षी अन्योन्याश्रय दोष को स्पष्ट करते हुए कहता है कि साक्षी जब पृथक् सिद्ध रहेगा, तभी आभास का उससे सम्बन्ध हो पायगा; एवं आभास उसी का है, इस कारण साक्षी का पृथक्त्व सिद्ध हो पायेगा । यही अन्योन्याश्रय दोष का स्वरूप है ॥ ११६ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी अन्योन्याश्रय दोष को स्पष्ट कर रहा है । साक्षी ( अध्यक्ष ) के पृथक सिद्ध होनेपर आभास का उससे सम्बन्ध; और आभास उसका है, इस कारण साक्षी का पृथक्त्व—इस प्रकार दोनों को परस्पर अपेक्षा रहने से अन्योन्याश्रय दोष होता है । अर्थात् अध्यक्ष की भेदप्रतीति होनेपर चिदाभास की सिद्धि और चिदाभास की सिद्धि होने- पर उससे अध्यक्ष की भेदसिद्धि होगी—यही अन्योन्याश्रय दोष का स्वरूप है । तथाच—'अहम्' के आकार में प्रतीयमान अहंकार ही चेतन आत्मा है ॥ ११६ ॥ नैवं स्वप्ने पृथक्सिद्धेः प्रत्ययस्य दृशेस्तथा । रथादेस्तत्र शून्यत्वात्प्रत्ययस्याऽऽत्मना ग्रहः ॥११७॥ नैवमिति—उस पर सिद्धान्ती कहता है कि तुम्हारा कहना उचित नहीं प्रतीत हो रहा है, क्योंकि स्वप्न में आत्मा और अन्तःकरण की सिद्धि पृथक् पृथक् प्रतीत होती है । तथापि स्वप्न में रथ आदि का अभाव होने से रथादि का ज्ञान केवल चेतन आत्मा के द्वारा ग्रहण किया जाता है ॥ ११७ ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्वपक्षी का उपर्युक्त कथन उचित नहीं है, क्योंकि स्वप्नावस्था में अहंकारात्मक अन्तःकरण दृश्य रूप में ही व्यवस्थित हो चुका है । अतः आत्मा आभासनिरपेक्ष ही सिद्ध होता है । अतः उक्त दृष्टान्त को असंगत कहना

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २२५ ठीक नहीं है। क्योंकि स्वप्न में भी आत्मा और अन्तःकरण की मुख और उसके प्रतिबिम्ब के समान परस्परनिरपेक्षता सिद्ध है। तथापि स्वप्नावस्था में रथादि का अभाव रहने से१ उन रथादि का ज्ञान ही उस स्वप्रकाश चैतन्यस्वरूप आत्मा के द्वारा गृहीत होता है। अर्थात् आत्मा से भिन्न अन्तःकरण तथा उसके विषयादि की सत्ता तो आत्मा के आश्रय से है, किन्तु आत्मा की सिद्धि के लिए किसी अन्य वस्तु की अपेक्षा नहीं है। अतः इनमें अन्योन्याश्रय दोष नहीं है। तथाच प्रत्ययसंवलनविनिर्मुक्त स्वप्रकाशतया भासमान आत्मा ही स्वप्न में विषयाकाराकारित प्रत्यय का साक्षी सिद्ध होता है। स्वप्न में 'प्रत्यय' ही ग्राह्य रहता है। क्योंकि अन्य विषय तो स्वप्न में रहते नहीं, अतः वासनात्मक अन्तःकरण ही आत्मा के अधीन रहने से उसी का ग्रहण होता है ।। ११७ ।। अवगत्या हि संव्याप्तः प्रत्ययो विषयाकृतिः । जायते स यदाकारः स बाह्यो विषयो मतः ।।११८।। अवगत्येति—अन्तःकरण की विषयाकार वृत्ति, आत्मचैतन्य के द्वारा व्याप्त होती है। वह वृत्ति जिस आकार की होती है, उसी को बाह्य विषय कहा जाता है ।। ११८ ।। हृदयस्पर्शिनी अन्तःकरण का साक्षी आत्मा ग्राह्य से भिन्न है, यह बताने के लिए ग्राह्य के स्वरूप को बता रहे हैं। पूर्व श्लोक के द्वारा स्वप्नावस्था में चिदात्मा का प्रत्यय से विवेक (भेद) बताया गया था, और अब जागरित अवस्था में भी उस भेद को बताते हैं। अन्तःकरण की विषयाकारावृत्ति आत्मचैतन्य द्वारा व्याप्त होती है, और वह जिस आकार की रहती है, वही बाह्य विषय माना जाता है। विषय के स्फुरण में यह क्रम हुआ करता है—प्रथमतः आत्माभास से युक्त हुई बुद्धि की वृत्ति इन्द्रियप्रणाली के द्वारा विषय के स्थान पर पहुँचती है। वहाँ पहुँचकर वह विषय को व्याप्त करके विषयाकार हो जाती है। इस प्रकार वह जिस-जिस विषय का आकार ग्रहण करती है, उसी का ज्ञान आत्म- चैतन्य के द्वारा हुआ करता है ।। ११८ ।। कर्मेप्सिततमत्वात्स तद्वान् कार्ये नियुज्यते । आकारो यत्र चार्प्येत करणं तदिहोच्यते ।।११९।। कर्मेति—वह विषय, कर्ता को ईप्सिततम रहने से 'कर्म' कहलाता है। उस कर्ता को उसकी इच्छा होती है, तब वह कार्य में नियुक्त ( प्रवृत्त ) होता है। उसी प्रकार जिस बुद्धिवृत्ति में विषय का आकार अर्पित होता है, उसे करण कहा जाता है ।। ११९ ।। हृदयस्पर्शिनी सम्प्रति कर्म, करण, कर्ता ये तीनों साक्षी से पृथक् हैं, यह बता रहे हैं। विषय, कर्ता का अत्यन्त इष्ट होने से 'कर्म' कहा जाता है। उसकी इच्छा से युक्त हुआ पुरुष कार्य में नियुक्त होता है, तथा जिस बुद्धिवृत्ति में विषय का आकार अर्पित होता है, वह करण कहलाता है। अर्थात् तत्तद्बाह्येन्द्रियविशेषिता तत्तदर्थाकारा बुद्धिवृत्ति, विषयप्रमिति (ज्ञान) के प्रति 'करण' कहलाती है ।। ११९ ।। यदाभासेन संव्याप्तः *स ज्ञातेति निगद्यते । त्रयमेतद्विविच्याऽत्र यो जानाति स आत्मवित् ।।१२०।। यदेति—जब अन्तःकरण चिदाभास से व्याप्त होता है, तब उसे ज्ञाता कहते हैं। एवं च ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों का विवेक करके जो व्यक्ति साक्षी आत्मा को जानता है, उसी को आत्मज्ञानी कहते हैं ।। १२० ।। १. "न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्ति ।” ( बृ. उ. ४।३।१० )

  • संजाता०—पाठान्तरम् । २९
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२२६ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी विषय और करण को बताकर अब कर्ता को बता रहे हैं—जब अन्तःकरण चिदाभास से व्याप्त होता है तब वह ज्ञाता कहलाता है। अर्थात् जब चित्प्रतिबिम्ब के आभास से संव्याप्त हुआ अहंकार परिणत होता है, तब उसे चिदात्मप्रतिबिम्ब ‘ज्ञाता’ कहा जाता है। इस प्रकार ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय तीनों का विवेचन करके जो साक्षी आत्मा को जानता है, वही आत्मवेत्ता है अर्थात् वह त्वंपद से लक्ष्य प्रत्यगात्मा का ज्ञानी कहलाता है। यही बात श्रीमद्भागवत में बताई गई है— “एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे । त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥” (२।१०।९) श्रीमद्भागवत में अनेक स्थानों पर अनेक ग्रन्थियाँ हैं, जिनका भेदन करना सर्वसाधारण का कार्य नहीं है। उन ग्रन्थियों में से ही यह श्लोक भी एक ग्रन्थिरूप ही है। इस श्लोक का अर्थ, पूर्व श्लोकार्थ के ज्ञान के अधीन है। अतः उसी की व्याख्या प्रथमतः करते हैं। “योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः । यस्तत्रोभयविच्छेदः स स्मृतो ह्याधिभौतिकः ॥ (श्री. भा. २।१०।८) जो यह आध्यात्मिक पुरुष, चक्षुरादि करणों (इन्द्रियों) का अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही यह आधिदैविक पुरुष सूर्य आदि है। यहाँ पर पुरुष (जीव) की उपाधि होने से इन्द्रियादि में ‘पुरुष’ शब्द का प्रयोग किया गया है। क्योंकि “स वा पुरुषोऽन्नरसमयः”१—इत्यादि श्रुति बता रही है। जो यह अध्यात्म चक्षुरादि करण है, वही यह आधि- दैविक चक्षुरादि का अधिष्ठाता सूर्यादि पुरुष कहा गया है। क्योंकि इन्द्रिय और उनका अधिष्ठान दोनों ही सूर्यादि के अंशरूप होने से एकरूप हैं। एक ही में आध्यात्मिक और आधिदैविक दोनों का जो भेद (विच्छेद), जिससे प्रतीत हो रहा है, वह जो चक्षुर्गोलकादि से उपलक्षित दृश्य देह है, उसे ही आधिभौतिक पुरुष कहा गया है। करण और उसके अधिष्ठाता दोनों के अभिन्न रहनेपर भी उनमें भेद प्रतीति करानेवाला यह गोलक ही है। क्योंकि अन्यत्र करण की स्थिति न होने से भेद का बोधन नहीं होता है। एवंच ‘इन्द्रिय’ आध्यात्मिक है, ‘देवता’ आधिदैविक है, और ‘गोलक’ आधिभौतिक है, विषय भी आधिभौतिक है। अभिप्राय यह है—जो नेत्र आदि इन्द्रियों का अभिमानी द्रष्टा जीव है, वही इन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवता सूर्य आदि के रूप में भी है, और जो नेत्र गोलक आदि से युक्त दृश्य देह है, वही उन दोनों को अलग-अलग करता है। अब प्रकृत श्लोक का अर्थ इस प्रकार होगा कि इन तीनों में यदि एक का भी अभाव हो जाय तो दूसरे दो की उपलब्धि नहीं हो सकती। अतः इन तीनों से अलग रहकर जो इन तीनों को जानता है, वही सबका अधिष्ठान ‘आश्रय’ तत्त्व है। उसका आश्रय वह स्वयं ही है, दूसरा कोई नहीं है ॥ १२० ॥ सम्यक्संशयमिथ्योक्ताः प्रत्यया व्यभिचारिणः । एकैवावगतिस्तेषु भेदस्तु प्रत्ययार्पितः ॥१२१॥ सम्यगिति—विवेक का प्रकार यह है—प्रत्यय को ही सम्यक् (यथार्थ), संशय और मिथ्या शब्द से कहते हैं। ये त्रिविध प्रत्यय आगमापायी होने से व्यभिचारी हैं। किन्तु उनमें ‘ज्ञान’ एकरूप ही है, केवल प्रत्ययों का भेद किया हुआ है ॥ १२१ ॥ आधिभेदाद्यथा भेदो मणेरवगतेस्तथा । अशुद्धिः परिणामश्च सर्वं प्रत्ययसंश्रयात् ॥१२२॥ आधीति—जिस प्रकार जपापुष्पादि उपाधियों के भेद से मणि में भेद प्रतीत होता है, उसी प्रकार समस्त अशुद्धि और परिणाम, प्रत्यय (अहंकार एवं चिदाभास) के सम्बन्ध से होते हैं ॥ १२२ ॥ १. (तै. उ. २।१)

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २२७ प्रथनं ग्रहणं सिद्धिः प्रत्ययानामिहाऽन्यतः । आपरोक्ष्यात्तदेवोक्तमनुमानं प्रदीपवत् ॥१२३॥ प्रथनमिति—व्यवहार दशा में प्रत्ययों की स्फूर्ति, ग्रहण और स्थिति, किसी अन्य अपरोक्ष स्वभाव वस्तु के कारण होती हैं। इस विषय में दीपक के समान कहकर अनुमान प्रमाण बताया गया है ॥ १२३ ॥ हृदयस्पर्शिनी ग्राह्य, ग्रहण और ग्राहक से अतिरिक्त आत्मा की सिद्धि में क्या प्रमाण है ? इस प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि जाग्रत्, स्वप्न अवस्थाओं के विषयाकार प्रत्ययों का स्फुरण (प्रथन) है। और ग्रहण का अर्थ है उपादान या स्थिति अथवा व्यवहार तथा सिद्धि का अर्थ है स्वरूपलाभ । ये तीनों तभी हो पाते हैं, जब कोई अन्य अपरोक्षस्वभाव वस्तु कारण हो । जिस प्रकार घट-पटादि पदार्थ दीपक के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार जड़ होने के कारण बुद्धि की वृत्तियाँ भी किसी स्वयंप्रकाश वस्तु से प्रकाशित होनी चाहिये। जिससे वे प्रकाशित होती हैं, वही स्वयंप्रकाश आत्मा है। समस्त प्रत्यय उसीमें अध्यस्त हैं और उसी के अधीन उनकी सत्ता भी है। आत्मातिरिक्त समस्त वस्तु आगमापायी होने से अचित्स्वभाव है। यह बात अनुमान-प्रमाण से सिद्ध हो रही है। अनुमान का आकार इस प्रकार होगा— “विमताः प्रत्ययाः स्वविलक्षणानाधीनप्रथनग्रहणसिद्धिकाः अचित्स्वभावत्वात् प्रदीपवत् ।” इस प्रकार तो सामान्य दृष्टांतनुमान से “अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः१”, “आत्मैवास्य ज्योतिः२”, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति३” इत्यादि श्रुतियों में प्रसिद्ध स्वप्रकाश आत्मा की संभावना सिद्ध होती है ॥ १२३ ॥ किमन्यद्ग्राहयेत्कश्चित् प्रमाणेन तु केनचित् । विनैव तु प्रमाणेन निवृत्त्याऽन्यस्य शेषतः ॥१२४॥ किमिति—वह वादी समस्त अनात्म (जड़) पदार्थों का प्रतिषेध करके अवशिष्ट के रूप में आत्मा का ग्रहण करता है, तो वह किसी प्रमाण के द्वारा करता है अथवा किसी प्रमाण के विना ही करता है ? ॥ १२४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार अनुमान प्रमाण द्वारा विधिमुख से आत्मा की सिद्धि बतायी है। अब जो लोग निषेधमुख से ही प्रमाण के द्वारा आत्मा की सिद्धि कहते हैं, विधिमुख से नहीं, उनके मत के निराकरणार्थ विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं— मूल में प्रथम 'तु' शब्द 'एव' के अर्थ में है और द्वितीय 'तु' शब्द 'वा' के अर्थ में है। क्या निषेधमुखवादी अनात्म पदार्थों का निषेध करके अवशिष्टरूप से आत्मा का ग्रहण किसी प्रमाण के द्वारा कराता है, अथवा किसी प्रमाण के बिना ही अर्थात् अन्य की निवृत्ति होने के कारण परिशेषात् ही आत्मा की सिद्धि करता है ? ॥ १२४ ॥ शब्देनैव प्रमाणेन निवृत्तिश्चेदिहोच्यते । अध्यक्षस्या*प्रसिद्धत्वाच्छून्यतैव प्रसज्यते ॥१२५॥ शब्देनैवेति—यदि केवल शब्द प्रमाण से ही अनात्म (जड़) वस्तु का प्रतिषेध कहते हैं तो साक्षी की प्रसिद्धि न होने से शून्यता की ही प्रसक्ति होती है ॥ १२५ ॥ हृदयस्पर्शिनी विधिमुख से ही प्रमाण की प्रवृत्ति होती है, इस प्रथम पक्ष के स्वीकार करने पर इष्टहानि स्पष्ट ही है, अतः द्वितीय पक्ष को लेकर कहते हैं—यदि केवल शब्दप्रमाण से ही अनात्म वस्तु की निवृत्ति (निषेध) कही जा १. ( बृ. उ. ४।३।९ ) २. ( बृ. उ. ४।३।६ ) ३. ( कठ. उ. ५।१५, श्वे. उ. ६।१४, मुं. उ. २।२।१० )

  • प्रसिद्धित्वा ०— पाठान्तरम् ।
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२२८ उपदेशसाहस्री रही है, तो अध्यक्ष (साक्षी) का सद्भाव, अन्य किसी प्रमाण से प्रसिद्ध न होने के कारण परिशेष की असिद्धि है, तब शून्यता ही अवशिष्ट रहती है, आत्मा नहीं ॥ १२५ ॥ चेतनस्त्वं कथं देह इति चेन्नाप्रसिद्धितः । चेतनस्याऽन्यतः सिद्धावेवं स्यादन्यहानतः ॥१२६॥ चेतन इति—तू चेतन आत्मा है, तब तुझे अचेतन देह कैसे कह सकते हैं ? अर्थात् चेतन का अचेतन होना संभव नहीं है। किन्तु अभी किसी प्रमाण से चेतन तत्त्व की सिद्धि ही कहाँ हो पाई है ? अतः तुम्हारा उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है। चेतन तत्त्व की किसी प्रमाण के द्वारा सिद्धि हो जाने पर ही अन्य अचेतन पदार्थों का निषेध करते-करते अवशिष्ट का निर्देश कर सकते हो ॥ १२६ ॥ हृदयस्पर्शिनी चेतन और अचेतन विरुद्ध स्वभाववाले हैं, इस कथन से अचेतन का बाध (अन्यनिवृत्ति) शब्द के द्वारा किया गया है। अतः अचेतन के विरुद्ध स्वभाववाला चेतन अवशिष्ट रह जाता है। इस रीति से शून्यता का प्रसंग नहीं होगा। निषेधमुखवादी के इस प्रकार कहने पर सिद्धान्ती उत्तर दे रहा है कि प्रतियोगीरूप धर्मी के सिद्ध होनेपर 'अयं, अयं न भवति' ऐसा तादात्म्यनिषेध करने से विरुद्धरूपता का उपदेश होना संभव हो सकता है, किन्तु अद्यापि चेतन पदार्थ पृथक् सिद्ध ही नहीं है। निषेधमुख से ही सिद्ध कर रहे हो, और उसके सिद्ध होने पर ही (अयं, अयं न भवति) इत्याकारक तादात्म्यनिषेध कर पाओगे, ऐसी स्थिति में अन्योन्याश्रय दोष होगा ॥ १२६ ॥ अध्यक्षः स्वयमस्त्येव चेतनस्याऽपरोक्षतः । तुल्य एवं प्रबोधः स्यादन्यस्याऽसत्त्ववादिना ॥१२७॥ अध्यक्ष इति—पूर्व पक्षी कहता है कि चेतन तत्त्व तो अपरोक्ष ही है, अतः साक्षी स्वयं ही सिद्ध है। उस पर सिद्धान्ती कहता है कि इस प्रकार तो बौद्ध विद्वान् भी शून्य को स्वयं सिद्ध ही बताते हैं। अतएव वे आत्मा को शून्यरूप ही मानते हैं ॥ १२७ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस पर निषेधमुखवादी पुनः शंका करता है कि आत्मा अत्यन्त अप्रसिद्ध नहीं है। वह तो स्वतः सिद्ध है। अर्थात् वह स्वतः अपरोक्ष है। तब सिद्धान्ती कहता है कि तुम्हारा यह कथन तो शून्यवादी बौद्ध के समान ही है, क्योंकि वह भी शून्य को स्वतः सिद्ध ही मानता है। अर्थात् जैसे वह प्रमाण के बिना ही शून्य को स्वतः सिद्ध मानकर 'शून्यम् आत्मा' कहता है, जिससे प्रबोध (ज्ञान) रूप आत्मा सिद्ध नहीं होता है, उसी प्रकार तुम्हारा कथन (चेतन अपरोक्ष होने के कारण साक्षी तो स्वयं सिद्ध ही है) भी बौद्धसमकक्ष ही है ॥ १२७ ॥ अहमज्ञासिषं चेदमिति लोकस्मृतेरिह । करणं कर्म कर्ता च सिद्धास्त्वेकक्षणे किल ॥१२८॥ अहमिति—'मैं इसे जानता था'—इस प्रकार लोगों को स्मरण हुआ करता है। अतः लोकव्यवहार में करण, कर्म और कर्त्ता की एक क्षण में ही युगपत् सिद्धि हो जाती है। इस रीति से प्रमाता यानी आत्मा की सिद्धि बताई जा सकती है ॥ १२८ ॥ हृदयस्पर्शिनी इसपर पूर्वपक्षी पुनः स्मृतिबल से स्वतः सिद्ध अध्यक्ष की सिद्धि की आशंका कर रहा है—वह कहता है कि अनुभूत विषय की ही स्मृति हुआ करती है—यह नियम है। लोकव्यवहार में कहते भी हैं कि 'अहमिदमज्ञासिषम्' 'मैं इसे जानता था'—इस स्मरणात्मक वाक्य में कर्ता, कर्म और करण की युगपत् प्रतीति होती है, अतः इसी से प्रमाता

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तत्त्वमसिप्रकरणम् २२९ चेतन (आत्मा) की स्वतः सिद्धि हो जाती है। क्योंकि उक्त स्मृति, अनुभव के बिना तो हो नहीं रही है, अतः करण, कर्म, कर्ता तीनों एक क्षण में ही पूर्व से सिद्ध ही हैं। एवं च अध्यक्ष स्वतः सिद्ध है ॥ १२८ ॥ प्रामाण्येऽपि स्मृतेः शैघ्याद्यौगपद्यं विभाव्यते। क्रमेण ग्रहणं पूर्वं स्मृतेः पश्चात्तथैव च ॥१२९॥ प्रामाण्येति—पूर्वपक्षी के इस कथन पर सिद्धान्ती कहता है कि स्मृति को प्रमाण मानने पर भी कर्त्ता, कर्म और करण का जो एक साथ अनुभव होना बता रहे हो, वह ठीक नहीं है, वस्तुतः उनके युगपत् अनुभव की प्रतीति तो शीघ्रता के कारण होती है। स्मृति के पूर्व जैसे क्रमशः अनुभव हुआ था, वैसे ही अनुभव के पश्चात् भी तदनुसार उनका स्मरण भी क्रमशः ही होगा ॥ १२९ ॥ हृदयस्पर्शिनी सिद्धान्ती पूर्वपक्षी की आशंका का निराकरण कर रहा है—पूर्वानुभव की गमक होने से स्मृति की प्रामा- णिकता रहने पर भी वह युगपत् त्रितयसिद्धि की गमक नहीं है, क्योंकि पूर्व (अनुभवकाल) में कर्त्रादिकों का ग्रहण क्रमशः हुआ था, ठीक उसी प्रकार उत्तर काल में स्मृति होती है। अतः कर्त्ता, कर्म, करण की प्रतीति क्रमशः होती हुई भी वह इतनी शीघ्र होती है कि युगपत् हुई-सी लगती है, वस्तुतः वह यौगपद्य-प्रतीति मिथ्या ही है। कर्त्रादि त्रिक की एकस्मृत्यवभास्यता निश्चित होनेपर तो यौगपद्य कहा जा सकता है, किन्तु अभी तो उसका निश्चय ही नहीं हो पाया है। क्योंकि 'अहमिदं जानामि' यह शब्दप्रयोग तो क्रमशः किया जा रहा है। अतः ग्राह्य स्फुरण में ग्राहक और ग्रहण की आकारता का संभव न रहने से ग्राह्यस्फुरणकाल में अन्य दोनों का भान होना संभव नहीं है। उसी तरह ग्राहक के स्फुरणकाल में ग्राह्य का स्फुरण होना भी संभव नहीं है। परस्पर विरुद्ध आकारवाले दोनों का भी एक प्रमाणज्ञान में स्फुरण होना संभव नहीं। उसी तरह विषय के साथ एकाकार हुआ ज्ञान जब स्फुरित होता है, तब उसके स्फुरण से ज्ञातृस्फूर्ति होती है। इस प्रकार क्रम से ही ज्ञात्रादि की सिद्धि होती है, यह पहले समझना चाहिये। अतः कमलदलशतभेदन में यौगपद्याभिमान के समान युगपत् स्मृति का केवल अभिमानमात्र है। अतः जिस प्रकार स्मृति से पूर्व उनका क्रमशः ग्रहण होता था, उसी प्रकार उसके पश्चात् भी होगा। किन्तु शीघ्रता के कारण उसका अनुभव नहीं हो पाता ॥ १२९ ॥ अज्ञासिषमिदं मां चेत्यपेक्षा जायते ध्रुवम् । विशेषोऽपेक्ष्यते यत्र तत्र नैवैककालता ॥१३०॥ अज्ञासिषमिति—यौगपद्य न होने में एक अन्य कारण और भी है। 'अज्ञासिषमिदं मां च'—मैंने इसे और अपने को जाना, इस ज्ञान में क्रम (पौर्वापर्य) की अपेक्षा का होना निश्चित ही है। जहाँ विशेष की अपेक्षा होती है, वहाँ यौगपद्य का होना संभव नहीं होता ॥ १३० ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञात्रादि त्रिक के यौगपद्याभाव में एक अन्य कारण भी बताते हैं। 'अज्ञासिषमिदंमां च'—मैंने इसे और अपने को जाना—इस प्रकार के ज्ञान में निश्चित रूप से पौर्वापर्यरूप क्रम की अपेक्षा है, क्योंकि 'यह'—इदंवृत्ति का विषय है और 'अपने को'—अहंवृत्ति का विषय है। इस कारण उन दोनों का ज्ञान एक ही क्षण में एक साथ नहीं हो सकता। वस्तुतः जहाँ विशेष की अपेक्षा होती है, वहाँ एककालिकता नहीं हो सकती ॥ १३० ॥ आत्मनो ग्रहणे चाऽपि त्रयाणामिह संभवात् । आत्मन्यासक्तकर्तृत्वं न स्यात्करणकर्मणोः ॥१३१॥ आत्मन इति—विषय के ग्रहण में जैसे त्रिपुटी (कर्ता-कर्म-करण) की अपेक्षा रहती है, उसी तरह प्रमाता (आत्मा), प्रमेय और प्रमा आदि प्रत्येक के ग्रहण में भी त्रिपुटी (कर्ता, कर्म और करण) की अपेक्षा रहती है, किन्तु आत्मा में चरितार्थ होनेवाला कर्तृत्व, 'करण और कर्म' की सिद्धि में कारण नहीं होता है ॥ १३१ ॥

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२३० उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी विषय और स्वरूप की दृष्टि से त्रिक स्मृति का यौगपद्य संभव न होने से कर्त्रादि की सिद्धि हो जाने मात्र से उनके ऐक्य का अनुमान नहीं किया जा सकता, यह बता चुके । अब कर्त्रादिकों का युगपत् अनुभवसाधन न होने से भी उनकी युगपत्सिद्धि की संभावना नहीं है, यह बता रहे हैं। जैसे विषय ग्रहण में कर्ता, कर्म, करण इन तीनों की अपेक्षा रहती है, उसी तरह कर्त्रादि प्रत्येक के ग्रहण में भी तीनों की अपेक्षा होती है। तथाच प्रमाता, प्रमेय प्रमाणज्ञान के ग्रहण में भी कर्त्रादि तीनों की अपेक्षा रहना संभव है। अन्यथा तत्तत्कर्त्रादिस्फुरण के बिना तत्तदर्थ के अनुभूत होने का नियम न हो पाने से कर्त्रादि की अनवस्था प्राप्त होगी। क्योंकि आत्मा में चरितार्थ होने वाला कर्तृत्व तो करण और कर्म की सिद्धि में कारण नहीं हो सकता । जो क्रिया के करने में स्वतन्त्र होता है, उसे कर्ता कहते हैं । वही सब कारकों का प्रयोक्ता माना जाता है। अतः उसकी सत्ता पहले होनी चाहिये, उसके पश्चात् अन्य कारकों की सत्ता रहेगी । अतः कर्ता, कर्म और करण की सत्ता एकसाथ सिद्ध नहीं हो सकती, उसमें क्रम का होना नितान्त आवश्यक है । एवं च कर्त्रादि त्रिक का युगपदनुभवसाधन करना कभी संभव ही नहीं है ॥ १३१ ॥ व्याप्तुमिष्टं च यत्कर्तुः क्रियया कर्म तत्स्मृतम् । अतो हि कर्तृतन्त्रत्वं तस्येष्टं नाऽन्यतन्त्रता ॥ १३२॥ व्याप्तुमिति—कर्ता की क्रिया द्वारा व्याप्त करने के लिये जो इष्टतम होता है, उसे कर्म कहा गया है१। अतः उसका सकलकारकप्रयोक्ता स्वतन्त्र कर्त्ता के अधीन रहना ही इष्ट है। उससे भिन्न किसी अध्यक्ष के अधीन रहना इष्ट नहीं है ॥ १३२ ॥ शब्दाद्वाऽनुमितेर्वाऽपि प्रमाणाद्वा ततोऽन्यतः । सिद्धिः सर्वपदार्थानां स्यादज्ञं प्रति नाऽन्यथा ॥ १३३॥ शब्दाद्वेति—इसलिये आत्मतत्त्व की सिद्धि विधिरूप से प्रवृत्त होने वाले शब्द प्रमाण अथवा अनुमान प्रमाण से ही होना उचित है। क्योंकि समस्त पदार्थों की सिद्धि, शब्द अथवा अनुमान प्रमाण से ही होती है। इन प्रमाणों से भिन्न प्रत्यक्षादि प्रमाणों से किसी वस्तु की सिद्धि तो अज्ञानियों के प्रति की जाती है ॥ १३३ ॥ अध्यक्षस्यापि सिद्धिः स्यात्प्रमाणेने विनैव वा । विना स्वस्य प्रसिद्धेस्तु नाज्ञं प्रत्युपयुज्यते ॥ १३४॥ अध्यक्षस्येति—भले ही जड़ वस्तुओं की सिद्धि प्रमाण से ही हो, किन्तु चेतन आत्मा तो स्वयंप्रकाश है, अतः प्रमाण के बिना भी उसकी सिद्धि हो सकती है। क्योंकि प्रमाण के अधीन तो केवल जड़ वस्तुओं की सिद्धि है। अतएव ग्रंथकार ने विकल्प उपस्थित करके पूछा है कि अज्ञानी के प्रति साक्षी की सिद्धि भी किसी प्रमाण से ही होगी अथवा प्रमाण के बिना भी हो जायगी ? किन्तु प्रमाण रहित आत्मसिद्धि, अज्ञानी के उपयुक्त नहीं है। अर्थात् स्वरूपभूत चैतन्य की सिद्धि में प्रमाण की आवश्यकता न रहने पर उसके साक्षित्व की सिद्धि में तो प्रमाण की आवश्यकता है ही ॥१३४॥ तस्यैवाऽज्ञत्वमिष्टं चेज्ज्ञानत्वेऽन्या मतिर्भवेत् । अन्यस्यैवाऽज्ञतायां च तद्विज्ञाने ध्रुवा भवेत् ॥१३५॥ तस्यैवाज्ञत्वमिति—अब अध्यक्ष के स्वरूप में भी विकल्प उपस्थित कर उसकी प्रमाणाधीन सिद्धि का प्रदर्शन करते हुए प्रथम पक्ष को बताते हैं। यदि ज्ञानस्वरूप आत्मा की अज्ञता (जड़ता) ही इष्ट हो तो उसके ज्ञानत्व (चेतनत्व) के विषय में किसी अन्य अर्थात् प्रमाणजनित मति की अपेक्षा होगी, किन्तु अज्ञता (जड़ता) तो जड़ (अचेतन) अहंकार आदि की ही होने से उस अध्यक्ष (आत्मतत्त्व) के विज्ञान में अन्य मति अर्थात् शास्त्र प्रमाण से ही निश्चित बुद्धि हो जायेगी। दोनों प्रकार से अध्यक्ष की सिद्धि, विधिमुख प्रमाणाधीन ही है ॥ १३५ ॥ १. 'कर्तुरीप्सिततमं कर्म'—( पा. सू. १।४।४९ )