वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८५ न्यायकन्दली सरणीयम् । तस्मादन्यथोच्यते, पक्षो नाम साध्यपर्यायः, साध्यं च तद् भवति, यत् साधनमर्हति, सम्भाव्यमानप्रतिपक्षार्थो न साधनमर्हति, वस्तुनो द्वैरूप्या- भावादित्ययमपक्षधर्म एव । तथा प्रत्यक्षादिविरुद्धोऽपि पक्षो न भवति, रूपान्तरेण सिद्धस्य रूपान्तरेण साधनानर्हत्वात् । अतः प्रकरणसमकालातया- पदिष्टोभौ 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यनेनैव निराकृतौ, अनुमेयाभासाश्रयत्वात् । अतः (अर्थात् पक्षसत्त्वादि तीनों रूपों को ही हेतुत्व का प्रयोजक मानें तो प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में हेतुत्व का वारण किस प्रकार होगा ? अतः इस प्रश्न का हम लोग (सिद्धान्ती) दूसरा समाधान कहते हैं कि (हेतु के बल रूप) पक्षवृत्तित्वादि के घटकीभूत 'पक्ष' शब्द और 'साध्य' शब्द दोनों एक ही अर्थ के बोधक हैं। साध्य वह है जिसका कि साधन हो सके; किन्तु जिस साध्य के प्रतिपक्ष की सम्भावना रहती है, उसका साधन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वस्तुओं के (परस्पर-विरुद्ध) दो रूप नहीं हो सकते 1। अतः प्रकरणसमहेतु 'पक्षधर्म' ही नहीं है, अर्थात् साध्य से युक्त पक्षरूप अनुमेय से अभिन्न साध्य के साथ सम्बद्ध ही नहीं है, इसी प्रकार कालात्ययापदिष्ट हेतु भी 'पक्ष धर्म' न होने के ही कारण 'हेतु' नहीं है, क्योंकि वह्नि की अनुष्णता प्रत्यक्ष से विरुद्ध है, एक प्रकार से सिद्ध वस्तु का दूसरे (विरुद्ध) रूप से साधन करना सम्भव नहीं है, अतः प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट इन दोनों हेत्वाभासों में हेतु का 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इस वाक्य के द्वारा निर्दिष्ट विशेषण ही नहीं है । अतः 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इसके उपादान से ही प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट दोनों हेत्वाभासों में हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति हट जाती है ।
- अभिप्राय यह है कि 'शब्दो नित्योऽनित्यधर्मानुपलब्धेः' एवं 'शब्दोऽनित्यो नित्यधर्मानुप- लब्धेः' इत्यादि प्रकरणसम के स्थल में नित्यत्वविशिष्ट शब्द और अनित्यत्वविशिष्ट शब्द ही 'साध्य' है । शब्दरूप पक्ष का नित्यत्व या अनित्यत्व दो में से कोई एक ही स्वरूप सत्य हो सकता है, अर्थात् शब्द नित्य ही हो सकता है या अनित्य ही, वह नित्य और अनित्य दोनों नहीं हो सकता । चूँकि अनुमान के समय शब्द में नित्यत्व या अनित्यत्व कोई भी सिद्ध नहीं है, अतः नित्यधर्मानुपलब्धि या अनित्यधर्मानुपलब्धि इन दोनों में से कोई भी हेतु 'अनुमेय' अर्थात् नित्यत्व या अनित्यत्वविशिष्ट शब्दरूप 'पक्ष' में विद्यमान नहीं है । अतः प्रकरणसम हेतु में हेतुत्व का प्रयोजक 'पक्षवृत्तित्व' रूप धर्म ही नहीं है । सुतराम् 'अपक्षधर्म' होने के कारण ही प्रकरणसम 'असिद्ध' (स्वरूपासिद्ध) हेत्वाभास है, जिसकी सूचना 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इस वाक्य से ही दे दी गयी है । इसी प्रकार बाधित (कालात्ययापदिष्ट) हेतु भी 'असिद्ध' हेत्वाभास में ही अन्तर्भूत हो जाता है, क्योंकि 'वह्निरनुष्णो द्रव्यत्वात्' इत्यादि स्थलों में वह्नि में यद्यपि द्रव्यत्व है, किन्तु उसमें अनुष्णत्व के विरुद्ध उष्णत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है, अतः अनुष्णत्व बाधित है । अनुष्णत्वविशिष्ट वह्निरूप पक्ष में द्रव्यत्व की सत्ता नहीं है, क्योंकि अनुष्णत्व विशिष्ट वह्नि नाम की कोई वस्तु ही नहीं है । इसकी भी सूचना 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इसी वाक्य से दे दी गयी है ।
४८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे अनुमान- न्यायकन्दली नन्वेवमप्यलक्षणमिदमव्यापकत्वात् । त्रिविधो हि हेतुः-अन्वयी, व्यतिरेकी, अन्वयव्यतिरेकी चेति । तत्रान्वयी विशेषोऽभिधेयः, प्रमेयत्वात्, सामान्यवत् । अस्य हि पक्षादन्यः सर्व एव सदसत्प्रभेदः सपक्षः, प्रमातृमात्रस्य प्रमाणमात्रापेक्षयाऽनभिधेयस्या- प्रमेयस्याभावात् । यश्च पुरुषमात्रस्यानभिधेयोऽप्रमेयश्च, स वाजिविषाणवदसन्नेव, न वा सपक्षो विपक्षो वा स स्यात्, निःस्वभावत्वात् । यश्च सत् स सर्वः सपक्ष एवेति तदभावे च नास्त्येवेत्यव्यापकं लक्षणम्, व्यतिरेकाभावात् । अगमकमेव तदिति चेन्न, अन्वयाव्यभि- चारात् । अन्यस्य सद्भावादन्यस्य सिद्धिरित्यत्रान्वयः कारणम्, तस्य तु व्यभिचार- प्रतीतिरपवादिका । अस्ति तावत् प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोरन्वयः, सर्वत्र प्रमेयेऽभिधेयत्वस्य दर्शनात् । न च व्यभिचारो दृष्टो नापि शङ्कामारोहति, यं यं व्यतिरेकविषयं बुद्धिगोचरी- (प्र.) प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में अतिव्याप्ति के न होने पर भी हेतु का यह लक्षण 'तदभावे च नास्त्येव' इस विशेषण के कारण केवलान्वयि हेतु में अव्याप्त या अव्यापक ही है । अभिप्राय यह है कि (१) अन्वयी (केवलान्वयी), (२) (केवल) व्यतिरेकी, एवं (३) अन्वयव्यतिरेकी भेद से हेतु तीन प्रकार के हैं । इनमें 'विशेषोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् सामान्यवत्' १ इस अनुमान का हेतु अन्वयी (केवलान्वयी) है । इस अनुमान के पक्ष से अतिरिक्त जितने भी भाव और अभाव पदार्थ हैं, वे सभी सपक्ष हैं, क्योंकि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित नहीं है (अर्थात् प्रमेय नहीं है) और किसी (शब्द) प्रमाण का अभिधेय नहीं है । जो न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा शब्द से निर्दिष्ट होता है और न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित ही होता है, वह घोड़े के सींग की तरह सर्वथा असत् होने के कारण न सपक्ष ही हो सकता है, न विपक्ष ही, क्योंकि असत् वस्तुओं का कोई स्वभाव नहीं होता । जितने भी पदार्थ 'सत्' हैं, वे सभी इस अनुमान के सपक्ष ही हैं । अतः इस अनुमान में व्यतिरेक नहीं है, अर्थात् कोई विपक्ष नहीं है । सुतराम् 'तदभावे च नास्त्येव' हेतु लक्षण का यह अंश उक्त केवलान्वयी हेतु में नहीं रहने के कारण हेतु का उक्त लक्षण अव्याप्ति से दुष्ट है । यदि यह कहें कि (प्र.) केवलान्वयी हेतु से अनुमान होता ही नहीं । (उ.) तो यह कहना सम्भव नहीं होगा, क्योंकि एक की सत्ता से दूसरे की जो सिद्धि होती है, इसमें 'अन्वय' ही कारण है । चूँकि इस कार्यकारणभाव में कोई व्यभिचार उपलब्ध नहीं है, (अतः 'केवलान्वयि-हेतु से अनुमिति नहीं होती' यह नहीं कहा जा १. अनुमान प्रयोग का आशय है कि जिस प्रकार घटत्वादि जातियाँ प्रमेय होने के कारण अभिधेय हैं, उसी प्रकार 'विशेष' अर्थात् घटादि व्यक्ति भी प्रमेय होने के कारण अभिधेय हैं।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८७ न्यायकन्दली करोति परस्य च वक्तुमिच्छति, तस्य सर्वस्य प्रमेयत्वाभिधेयत्वप्राप्तेः । न चास्ति विशेषो विपक्षे सत्यव्यभिचारः कारणं न विपक्षाभावादिति । तेन प्रमेयत्वमभिधेयत्वं गमयति । व्यतिरेकी च सात्मकं जीवच्छरीरं प्राणादिमत्त्वादिति । अस्य पक्षादन्यः सर्व एव विपक्षः, तथापि हेतुत्वं विपर्ययसम्बन्धाव्यभिचारात् । घटादिष्वप्राणादिमत्त्वेन निरात्मकत्वस्य व्याप्तिरवगता, अप्राणादिमत्त्वस्य न जीवच्छरीरे निवृत्तिः प्रतीयते । तत्प्रतीत्या व्याप्तस्य निरात्मकत्वस्य निवृत्त्यनुमानम् । अथ मन्यसे योऽर्थो नावगतस्तद्व्यतिरेकोऽपि न शक्यते प्रत्येतुम्, प्रतिषेधस्य विधिविषयत्वात् । आत्मा च न क्वचिदवगतः, कथं तस्य घटादिभ्यो सकता), क्योंकि व्यभिचार की प्रतीति ही अन्वयी हेतु से साध्य की अनुमिति होने में बाधक है, सो प्रकृत में नहीं है । प्रमेयत्व और अभिधेयत्व दोनों में अन्वय या सामानाधिकरण्य अवश्य है; क्योंकि सभी प्रमेयों में अभिधेयत्व की प्रतीति होती है। इन दोनों में व्यभिचार (एक को छोड़कर दूसरे का रहना) कहीं नहीं देखा जाता। एवं उन दोनों में कहीं व्यभिचार की शङ्का भी नहीं है, क्योंकि जो कोई भी स्थल व्यभिचार के लिए कोई सोचेगा या दूसरे को कहना चाहेगा, उन सभी स्थलों में अभिधेयत्व और प्रमेयत्व दोनों ही देखे जाते हैं (अतः इस अनुमान में कोई विपक्ष है ही नहीं) । जिस प्रकार जिन सब स्थलों में विपक्ष प्रसिद्ध है, उन सब स्थलों में यदि व्यभिचार नहीं है, तो वह हेतु अनुमिति का कारण होता है । उसी प्रकार जिन सब स्थलों में विपक्ष की सत्ता ही नहीं है, उन सब स्थलों में भी यदि व्यभिचार की उपलब्धि नहीं होती है, तो वह हेतु साध्य का साधक क्यों नहीं होगा? क्योंकि दोनों स्थितियों में कोई तात्त्विक अन्तर नहीं है । अतः प्रमेयत्व अवश्य ही अभिधेयत्व का ज्ञापक हेतु है । 'जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात्' इस अनुमान का हेतु (केवल) व्यतिरेकी है, क्योंकि पक्ष को छोड़कर और सभी पदार्थ इसके 'विपक्ष' हैं, फिर भी यह 'हेतु' है ही, क्योंकि (साध्य के) विपर्यय (अर्थात् अभाव का हेत्वभाव के साथ) व्यभिचार नहीं हैं । (साध्य का निरात्मकत्वरूप अभाव घटादि में है, उनमें हेतु का अप्राणादिमत्त्वरूप अभाव भी अवश्य ही है, इस प्रकार) अप्राणादिमत्त्वरूप हेत्वभाव के साथ निरात्मकत्वरूप साध्याभाव की व्याप्ति गृहीत है । इससे जीवित शरीर रूप (प्रकृत पक्ष में) अप्राणादिमत्त्वरूप (हेत्वभाव की) निवृत्ति अर्थात् अभाव का बोध होता है । जीवित शरीर में (अप्राणादिमत्त्वाभाव की) इस प्रतीति से उसमें निरात्मकत्वरूप साध्याभाव की निवृत्ति का अनुमान होता है । अगर यह समझते हों कि (प्र.) जिस वस्तु का ज्ञान नहीं होता है, उसके अभाव का भी ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि जिसकी कहीं सत्ता रहती है, उसी का कहीं प्रतिषेध भी
४८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली व्यावृत्तिप्रतीतिरिति । तदयुक्तम् । परस्य तावत् समस्तवस्तुविषयं नैरात्म्यमिच्छतो घटादिभ्यः सिद्धैवात्मव्यावृत्तिः । स्वस्यापि जीवच्छरीरेष्वात्मनो बुद्ध्यादिभिः कार्यैः सह कार्यकारणभावे सिद्धे घटादिभ्यो बुद्ध्यादिव्यावृत्त्या तदुत्पादनसमर्थस्य विशिष्टात्म- सम्बन्धस्याभावसिद्धिः । यथा धूमाभावे क्वचित् तदुत्पादनयोग्यस्य वह्नेरभावसिद्धिः । यद्येवमात्मापि जीवच्छरीरेषु सिद्ध एव, सम्बन्धिप्रतीतिमन्तरेण सम्बन्धप्रतीतेरसम्भवात् । ततश्च व्यतिरेक्यनुमानवैय्यर्थ्यम्, निष्पादितक्रिये कर्मणि साधनस्य साधनन्यायातिपातात् । नैवम्, स्वसिद्धस्यात्मनः परं प्रतिसिद्धस्य साध्यत्वात् । न चान्वयाव्यभिचारः प्रतिपादको न व्यतिरेकाव्यभिचार इत्यस्ति नियमहेतुः । तस्माद् व्यतिरेकिणोऽपि हेतुत्वात् तेन हो सकता है । आत्मा कहीं पर ज्ञात नहीं है, अतः घटादि पदार्थों में भी उसके अभाव की प्रतीति क्यों होगी ? (उ.) तो यह समझना भूल होगी, क्योंकि (बौद्धादि) परमत के अनुसार भी तो घटादि में नैरात्म्य सिद्ध ही है, क्योंकि वे तो सभी वस्तुओं में नैरात्म्य की अभिलाषा करते हैं । 'स्वमत' (वैशेषिकादिमत) में भी जीवित शरीर में ही आत्मा का सम्बन्ध बुद्धि प्रभृति का कारण है, अतः (अवच्छेदकत्व सम्बन्ध) से शरीर में बुद्ध्यादि कार्यों की उत्पत्ति होती है (मृत शरीर एवं घटादि में नहीं), इस प्रकार आत्मा से सम्बद्ध जीवित शरीर और बुद्धि प्रभृत्ति में कार्यकारण भाव की सिद्धि हो जाने पर घटादि में बुद्धि का अभाव सिद्ध हो जाएगा, क्योंकि आत्मा का उक्त विशेष प्रकार का सम्बन्ध ही बुद्धि की उत्पत्ति का कारण है, सो घटादि में नहीं है, अतः उसमें कथित सात्मकत्व भी नहीं है । इस 'स्व' मत में भी निरात्मकत्वरूप साध्याभाव का ज्ञान सम्भावित है । जैसे कि धूम के न रहने पर कहीं पर धूम को उत्पादन करनेवाले वह्नि के अभाव की सिद्धि होती है । (प्र.) (जीवित शरीर में जिस सात्मकत्व की सिद्धि करना चाहते हैं, वह सात्मकत्व आत्मा का सम्बन्ध ही है) सम्बन्ध का ज्ञान बिना प्रतियोगी और अनुयोगी रूप दोनों सम्बन्धियों के ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है । अतः जीवित शरीर में आत्मा तो सिद्ध ही है । तस्मात् उक्त व्यतिरेकी अनुमान व्यर्थ है, क्योंकि निष्पन्न कामों में साधन अपना साधनत्व छोड़ बैठता है (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अपने मत से जीवित शरीर में आत्मा के सिद्ध रहने पर भी नास्तिकों के मत में वह सिद्ध नहीं है । अतः परमत से असिद्ध आत्मा के सम्बन्ध का अनुमान ही प्रकृत में व्यतिरेकी हेतु से किया गया है । यह नियम मान लेने में कोई युक्ति नहीं है कि अन्वय का अव्यभिचार (अन्वयव्याप्ति) ही साध्य का ज्ञापक है और व्यतिरेक का अव्यभिचार (व्यतिरेक) व्याप्ति नहीं। अतः (केवल) व्यतिरेकी भी हेतु अवश्य है । तस्मात् 'प्रसिद्धञ्च तदन्विते' इत्यादि से कथित सपक्षवृत्तित्वरूप
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८९ न्याय्कन्दली प्रसिद्धं च तदन्विते इत्यव्यापकम् । अत्रैक समानतन्त्रप्रसिद्ध्या केवलान्वयिनः केवल- व्यतिरेकिणश्च परिग्रह इति वदन्ति । अपरे तु व्यस्तसमस्तं लक्षणं वदन्ति । अनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्वित इति अन्वयिनो लक्षणम् । अनुमेयेन सम्बद्धं तद्विपरीते च नास्त्येवेति व्यतिरेकिण इति । समस्तं लक्षणमन्वयव्यतिरेकिण इति । साध्यसाधनत्वं सामान्यलक्षणं त्रयाणाम् । यथा प्रमाणानां यथार्थपरिच्छेदकत्वं सामान्यलक्षणम् । विशेषण के न रहने से हेतु का प्रकृतलक्षण (केवल) व्यतिरेकी हेतु में अव्याप्त है । केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु इन दोनों में कथित अव्याप्ति का समाधान कोई इस प्रकार करते हैं कि केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु इन दोनों में हेतुत्व का व्यवहार समानतन्त्र (न्यायदर्शन) के अनुसार समझना चाहिए । (सिद्धान्ततः वैशेषिक मत से वे दोनों हेतु नहीं हैं) । कोई (इन दोनों को वैशेषिक मत से भी हेतु मानते हुए) हेतु के लक्षणवाक्य को सम्पूर्ण और खण्डशः दोनों प्रकार से लक्षण का बोधक मान कर उनमें अव्याप्ति दोष का परिहार करते हैं । तदनुसार 'यदन्नुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यादि श्लोक से निम्नलिखित तीन लक्षणवाक्य निष्पन्न होते हैं (१) यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धञ्च तदन्विते । (अर्थात् जो पक्ष और सपक्ष दोनों में ही रहे, वही हेतु है) । हेतु का यह लक्षण (केवल) अन्वयी ('विशेषोऽभिधेयः प्रमेयत्वात्' इस अनुमान के प्रमेयत्व) हेतु का है (अर्थात् हेतु के इस लक्षण में 'तदभावे च नास्त्येव' इस वाक्य से कथित विपक्षावृत्तित्व का प्रवेश नहीं है, अतः केवलान्वयि स्थल में विपक्ष की अप्रसिद्धि से हेतु लक्षण की अव्याप्ति नहीं है) । (२) यदनुमेयेन सम्बद्धं तदभावे च नास्त्येव । अर्थात् पक्ष में रहे और विपक्ष में न रहे वही 'हेतु' है । हेतु का यह लक्षण (केवल) व्यतिरेकी हेतु के लिए है । अतः 'जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात्' इत्यादि व्यतिरेकी हेतु में सपक्ष की अप्रसिद्धि के कारण अव्याप्ति नहीं है । क्योंकि हेतु के इस लक्षण में 'प्रसिद्धञ्च तदन्विते' इस वाक्य के द्वारा कथित 'सपक्षसत्त्व' का निवेश नहीं है) । (३) 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यादि संपूर्ण श्लोक के द्वारा कथित लक्षण अन्वयव्यतिरेकी हेतु का है, क्योंकि इसमें पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व, एवं विपक्षासत्त्व हेतु के ये तीनों ही लक्षण विद्यमान रहते हैं । कथित तीनों हेतुओं में समान रूप से रहेवाला लक्षण यही है कि 'जो साध्य का साधन करे, वही हेतु है' जैसे 'जो यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करे वही प्रमाण है' यह सभी प्रमाणों का साधारण लक्षण है ।
४९० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- प्रशस्तपादभाष्यम् यत्तु यथोक्तात् त्रिरूपाल्लिङ्गादेकेन धर्मेण द्वाभ्यां वा विपरीतं तदनुमेयस्याधिगमे लिङ्गं न भवतीति । एतदेवाह सूत्रकारः- "अप्रसिद्धोऽन- पदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च" (अ. ३ आ. १ सू. १५) इति । उक्त प्रकार से कहे गये (पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व रूप हेतुत्व के सम्पादक) तीनों धर्मों में से एक या दो धर्मों से रहित कोई वस्तु साध्य की अनुमिति का नहीं (किन्तु हेत्वाभास) है । यही बात (उनका हेत्वाभासत्व) सूत्रकार ने 'अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च' इस सूत्र के द्वारा कही है । न्यायकन्दली विपरीतमतो यत् स्यादिति द्वितीयश्लोकार्थं विवृणोति-यत्त्विति । अनपदेश इति । अपदेशो हेतुर्न भवतीत्यपदेशोऽहेतुरित्यर्थः । अप्रसिद्ध इति विरुद्धासाधारणयोः परिग्रहः, तयोः साध्यधर्मेण सह प्रसिद्धयभावोदहेतुत्वम् । असन्नित्यसिद्धस्यावरोधः, स हि सपक्षे साध्यधर्मेण सह प्रसिद्धोऽपि धर्मिणि वृत्त्यभावादहेतुः । सन्दिग्धश्चेत्यनैकान्तिकाभिधा- नम् । स हि धर्मिणि दृश्यमानः किं साध्यधर्मसहचरितः किं वा तद्रहित इति सन्दिग्धो भवति, न पुनरेकं धर्ममुपस्थापयितुं शक्नोति । उभयथा दृष्टत्वादहेतुः । 'यत्तु' इत्यादि से 'विपरीतमतो यत् स्यात्' इस दूसरे श्लोक की व्याख्या करते हैं । कथित 'अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च' इस सूत्र में प्रयुक्त 'अनपदेश' शब्द का 'अपदेशो हेतुर्न भवति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'अहेतु' (अर्थात् हेत्वाभास) अर्थ है । उक्त सूत्र के 'अप्रसिद्ध' शब्द से विरुद्ध और असाधारण इन दोनों को (हेत्वाभास के अन्तर्गत) समझना चाहिए । ये दोनों इस लिए अहेतु हैं कि साध्यरूप धर्म के साथ इनकी 'प्रसिद्धि' नहीं है, अर्थात् निश्चय नहीं है, फलतः सपक्षसत्त्व नहीं है । 'असन्' शब्द से 'असिद्ध' नाम का हेत्वाभास अभिप्रेत है, क्योंकि असिद्ध हेत्वाभास सपक्ष में साध्य धर्म के साथ रहते हुए भी, अर्थात् सपक्षवृत्ति होते हुए भी 'धर्मी' में अर्थात् पक्ष में ही नहीं रहता है, अतः वह हेतु न होकर हेत्वाभास है । 'सन्दिग्धश्च' इस पद से 'अनैकान्तिक' को हेत्वाभास कहा गया है । अनैकान्तिक यद्यपि पक्ष में देखा जाता है, किन्तु यह सन्देह बना ही रहता है कि वह साध्य के साथ रहनेवाला है ? या साध्याभाव के साथ ? इसी सन्देह के कारण यह साध्य या साध्याभाव रूप किसी एक धर्म को निश्चितरूप से उपस्थित नहीं कर सकता, क्योंकि वह दोनों के साथ देखा जाता है, अतः वह हेतु नहीं है । धर्मी (हेतु) में धर्म (साध्य) की अन्वयव्याप्ति एवं व्यतिरेकव्याप्ति इन दोनों के रहने पर भी बोद्धा पुरुष को यदि 'यह हेतु इस साध्य से व्याप्त है' इस प्रकार
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१९ प्रशस्तपादभाष्यम् विधिस्तु यत्र धूमस्तत्राग्निरग्न्यभावे धूमोऽपि न भवतीत्येवं प्रसिद्धसमयस्या- सन्दिग्धधूमदर्शनात् साहचर्यानुस्मरणात् तदनन्तरमग्न्यध्यवसायो भवतीति । (अनुमिति की उत्पत्ति की यह) रीति है कि 'जहाँ-जहाँ धूम है, उन सभी स्थानों में वह्नि भी अवश्य ही है, एवं जहाँ-जहाँ अग्नि नहीं है, उन सभी स्थानों में धूम भी नहीं है' इस प्रकार से 'समय' अर्थात् व्याप्ति का निश्चय जिस पुरुष को है, उसी पुरुष को धूम के असन्दिग्ध दर्शन अर्थात् निश्चय, और उसके बाद उत्पन्न धूम और वह्नि के सामानाधिकरण्य (एक अधिकरण में रहने) के स्मरण के बाद अग्नि का (अनुमिति रूप) निश्चयात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है । न्यायकन्दली इदमनेनाविनाभूतमिति ज्ञानं यस्य नास्ति तं प्रति धर्मिणि धर्मस्यान्यव्यतिरेक- वतोऽपि लिङ्गत्वं न विद्यते, तदर्थमविनाभावस्मरणमनुमेयप्रतीतावङ्गमिति दर्शयति- विधिस्त्विति । विधिस्तु अनुमेयप्रतीतिप्रकारस्तु, यत्र धूमस्तत्राग्निरग्न्यभावे धूमो न भवतीति । एवं प्रसिद्धसमयस्य प्रसिद्धाविनाभावस्य पुरुषस्यासन्दिग्धधूमदर्शनाद् धूम एवायम्, न बाष्पादिकमिति ज्ञानात् साहचर्यानुस्मरणाद् यत्र धूमस्तत्राग्निरित्येवमनुस्मरणात्, तदनन्तरमग्न्यनुमानं भवति । नन्वेवं द्वितीयो लिङ्गपरामर्शो न लभ्यते ? मा लब्धि, नहि नस्तेन प्रयोजनम्, लिङ्गदर्शनव्याप्तिस्मरणाभ्यामेवानुमेयप्रतीत्युपपत्तेः । न च स्मृत्यनन्तर- भावित्वादनुमेयप्रतीतेरनियतदिग्देशा स्यात् ? लिङ्गदर्शनस्य नियामकत्वात् । नाप्युपनय- से 'अविनाभाव' रूप व्याप्ति का भान नहीं रहता है, तो फिर उस हेतु में उस साध्य का हेतुत्व (अर्थात् ज्ञापकत्व) नहीं रहता है । अतः अविनाभाव (व्याप्ति) का स्मरण भी अनुमेय की प्रतीति (अनुमिति) का सहकारिकारण है । यही बात 'विधिस्तु' इत्यादि सन्दर्भ से दिखलायी गयी है । 'विधि' अर्थात् अनुमिति की उत्पत्ति की रीति यह है कि जहाँ धूम है, वहाँ अग्नि है, एवं जहाँ अग्नि नहीं है, वहाँ धूम भी नहीं है' इस प्रकार से 'समय' अर्थात् अविनाभाव (व्याप्ति) की प्रतीति जिस पुरुष को है, उसे जब धूम का 'असन्दिग्ध' ज्ञान अर्थात् 'यह धूम ही है, बाष्पादि नहीं' इस आकार का ज्ञान होता है, तब 'साहचर्य के अनुस्मरण से' अर्थात् 'जहाँ धूम है वहाँ वह्नि है' इस प्रकार के स्मरण के बाद अग्नि की अनुमिति होती है । (प्र.) यदि अनुमिति का यही क्रम निर्धारित हो जाता है तो फिर 'द्वितीय लिङ्गपरामर्श' में (अर्थात् 'साध्यव्याप्ति- विशिष्टहेतुमान् पक्षः' इस आकार के परामर्श में) अनुमिति की कारणता का लाभ न होगा ? (उ.) न हो, क्योंकि व्याप्ति का स्मरण और पक्षधर्मता का ज्ञान, इन दोनों से ही अनुमिति की उत्पत्ति हो जाएगी । (प्र.) अनुमिति यदि (व्याप्ति) स्मरण के अव्यवहित उत्तर काल में ही उत्पन्न हो, तो फिर वह कब किस देश (पक्ष) में उत्पन्न होगी, इसका कोई नियामक नहीं होगा ? (उ.) 'लिङ्गदर्शन' ही उसका नियामक होगा
४९२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली वैयर्थ्यम्, अवयवान्तरैरप्रतिपादितस्य पक्षधर्मत्वस्य प्रतिपादनार्थं परार्थानुमानम्, तस्यो- पन्यासात् । अपि भोः । कोऽयमविनाभावो नाम ? अव्यभिचारः । स कस्माद्भवति ? तादात्म्य- तदुत्पत्तिभ्यामिति सौगताः । यादृच्छिकः सम्बन्धो यथैव भवति, न भवत्यपि, तथा च नियम- हेतोरभावः । तत्र यदि नाम सपक्षे दर्शनमदर्शनं च विपक्षे, तथाप्यव्यभिचारो न शक्यते ज्ञातुम्, विपक्षवृत्तिशङ्काया अनिवारणात् । तदुत्पत्तिविनिश्चये तु शङ्का निवार्यते, कारणेन विना कार्यस्यात्मलाभासंभवात् । तदुत्पत्तिविनिश्चयोऽपि कार्यहेतुः पञ्चप्रत्यक्षोपलम्भानु- पलम्भसाधनः । कार्यस्योत्पत्तेः प्रागनुपलम्भः, कारणोपलम्भे सत्युपलम्भः, उपलब्धस्य (अर्थात् अनुमिति का पक्षधर्मताज्ञान रूप लिङ्गदर्शन) जिस पक्ष में होगा, अनुमिति भी नियमतः उसी पक्ष में होगी । एवं उपनय रूप अवयव वाक्य के वैयर्थ्य की आपत्ति भी नहीं होगी, क्योंकि पक्षधर्मता का प्रतिपादन अन्य अवयव वाक्यों से सम्भव नहीं है, अतः पक्षधर्मता का प्रतिपादन करने के लिए ही उपनय वाक्य का परार्थानुमान में प्रयोग होता है । (प्र.) यह 'अविनाभाव' क्या वस्तु है ? यदि यह कहें कि (उ.) अव्यभिचार ही अविनाभाव है । (प्र.) तो फिर यह पूछना है कि यह अव्यभिचार किससे (ज्ञात) होता है ? इस प्रसङ्ग में बौद्धों का कहना है कि (१) तादात्म्य और (२) कार्य की उत्पत्ति इन दोनों से ही अव्यभिचार (व्याप्ति) गृहीत होती है । (१) (तदुत्पत्ति- मूलक व्याप्ति के मानने में यह युक्ति है कि) दो वस्तुओं का आकस्मिक (यादृच्छिक) सम्बन्ध जिस प्रकार कभी होता है, उसी प्रकार कभी नहीं भी होता है । अतः यह सम्बन्ध व्याप्ति का नियामक नहीं हो सकता । (२) यदि उसी हेतु में साध्य की व्याप्ति मानें, जिसकी प्रतीति सपक्ष (दृष्टान्त) में हो और विपक्ष में उसकी प्रतीति न हो, तो यह भी सम्भव नहीं होगा, क्योंकि इस (सपक्षदर्शन और विपक्षादर्शन) के बाद भी हेतु के विपक्ष में होने की सम्भावना का निराकरण नहीं हो सकता । किन्तु जब यह निश्चय हो जाता है कि 'इस हेतु की उत्पत्ति उस साध्य से हुई है' तो फिर उक्त शङ्का, (सम्भावना) का निराकरण हो जाता है, क्योंकि कारण के बिना कार्य की स्वरूपस्थिति ही नहीं हो सकती । 'हेतुरूप कार्य साध्यरूप कारण से उत्पन्न होता है' इस प्रकार का निर्णय रूप 'तदुत्पत्ति विनिश्चय' प्रत्यक्ष रूप उपलम्भ और अनुपलम्भ को मिला कर पाँच कारणों से उत्पन्न होता है । (इनमें तीन कार्य सम्बन्धी हैं) । (१) उत्पत्ति से पहिले कार्य की अनुपलब्धि, (२) कारण के उपलब्ध होने पर कार्य की उपलब्धि, एवं (३) उपलब्ध
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३ न्यायकन्दली पश्चात् कारणानुपलम्भादनुपलम्भ इति कार्यस्य द्वावनुपलम्भावेक उपलम्भः, कारणस्य चोपलम्भानुपलम्भाविति । एवमुपलम्भानुपलम्भैः पञ्चभिः सत्येवाग्नौ धूमस्य भावोऽसत्य- भाव इति निश्चीयते । कार्यस्यैतदेव कार्यत्वं यत् तस्मिन् सत्येव भावोऽसत्यभाव इति तादात्म्यप्रतीत्याप्यविनाभावो निश्चीयते । भावस्य न स्वभावव्यभिचारः, निःस्वभावत्वप्रसङ्गात् । तादात्म्यनिश्चयो विपक्षे बाधकस्य प्रमाणप्रवृत्त्या सिद्ध्यति । अप्रवृत्ते तु बाधके शतशः सहभावदर्शनेऽपि कदाचिदेतद्विपक्षे स्यादिति शङ्कायाः को निवारयिता प्रभवति ? तदुक्तम्- कार्यकारणभावाद् वा स्वभावाद् वा नियामकात् । अविनाभावनियमोऽदर्शनान्न तु दर्शनात् ॥ इति । कार्यकारणभावाभ्यामकात् स्वभावाद् वा नियामकादविनाभावनियमः, न सपक्षे दर्शनाद् विपक्षे चादर्शनादिति । होने के बाद भी कारण की अनुपलब्धि से कार्य की (पुनः) अनुपलब्धि, इस प्रकार कार्य का एक उपलम्भ और दो अनुपलम्भ ये तीन होते हैं । एवं कारण का (१) उपलम्भ और (२) कारण का अनुपलम्भ ये दो हैं । इन उपलम्भों और अनुपलम्भों को मिलाकर इन्हीं पाँच कारणों के रहने पर यह निश्चय होता है कि वह्नि के रहने से ही धूम की सत्ता है, और वह्नि के न रहने से धूम की सत्ता नहीं रहती है । कोई भी वस्तु 'कार्य' नाम से इसीलिए अभिहित होती है कि कारण के रहने से ही उसकी सत्ता होती है, और कारण के न रहने से उसकी सत्ता नहीं रहती है (अर्थात् 'कार्य' वही है जिसकी सत्ता कारण की सत्ता के अधीन हो, और कारण की सत्ता न रहने पर जो सत्ता का लाभ न कर सके) हेतु में साध्य की तादात्म्य प्रतीति से भी अविनाभाव (या व्याप्ति) का निश्चय होता है । यह नहीं हो सकता कि वस्तुओं का स्वभाव उनमें कभी रहे और कभी नहीं, ऐसा मानने पर तो वस्तुओं का कोई स्वभाव ही नहीं रह जाएगा । जिस धर्म के बिना भी धर्मी रह सके, वह धर्म उस धर्मी का 'स्वभाव' कैसे होगा ? विपक्ष में बाधकप्रमाण की प्रवृत्ति से ही हेतु में साध्य का तादात्म्य निश्चित होता है । यदि विपक्ष में बाधक प्रमाण की प्रवृत्ति न हो, तो फिर सैकड़ों स्थानों में साध्य और हेतु दोनों को साथ देखने पर भी 'जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ भी यह हेतु कभी रह सकता है' इस शङ्का का निवारण कौन करेगा ? यही बात 'कार्यकारणभावाद्वा' इत्यादि श्लोक के द्वारा इस प्रकार कही गयी है कि कार्यकारणभावरूप नियामक और स्वभाव (तादात्म्य) रूप नियामक इन दोनों से ही अविनाभाव का निश्चय होता है, हेतु का सपक्ष में दर्शन और विपक्ष में अदर्शन से (अविनाभाव का निश्चय नहीं होता है ) ।
४१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली अत्रोच्यते-किं यत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती तत्राव्यभिचारः ? किं वा यत्राव्यभिचारस्तत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती ? न तावदाद्यः कल्पः, सत्यपि तदुत्पादे धूमधर्मस्य पार्थिवत्वादेरग्निब्यभि- चारात् । सत्यपि तादात्म्ये वृक्षत्वस्य विशेषाद् व्यभिचारात् । अथ यत्राव्यभिचारस्तत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती, तर्ह्यव्यभिचारस्तत्त्वे तयोर्गमकत्वम् । एवं चेत्, अव्यभिचार एवास्तु गमकः, किं तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्याम् ? कार्यमपि हि न कार्यमित्येव गमयतीति, नापि स्वभावः स्वभाव इति, किं तर्हि ? तदव्यभिचारीति, अव्यभिचार एव गमकत्वे कारणं न तादात्म्यतदुत्पत्ती, व्यभिचारात् । न चैवमुपपत्तिमारोहति धूमो वह्निना क्रियते न पार्थिवत्वादयस्तद्धर्मा इति, वस्तुनो निर्भागत्वात् । नान्ये तदुपलब्धं शिंशपा वृक्षात्मिका न वृक्षः शिंशपात्मकः, धवखदिरादिसाधारणत्वादिति, तयोर्भेदात् । इस प्रसङ्ग में हम (वैशेषिक) लोग पूछते हैं कि (१) क्या जिस साध्य का तादात्म्य जिस हेतु में रहता है, उसी हेतु में उस साध्य का अव्यभिचार (व्याप्ति) रहता है ? एवं जिस साध्य से जिस हेतु की उत्पत्ति होती है, उसी हेतु में उस साध्य का अव्यभिचार (व्याप्ति) रहता है ? (२) अथवा जिस हेतु में साध्य की व्याप्ति रहती है, उसी हेतु में उस साध्य का तादात्म्य या जन्यत्व रहता है ? इन दोनों में प्रथम कल्प इसलिए ठीक नहीं है कि वह्नि से धूम की उत्पत्ति होने पर भी धूम के पार्थिवत्वादि धर्मों के साथ वह्नि का व्यभिचार है (अतः पार्थिवत्वादि धर्म से अभिन्न धूम के साथ वह्नि का व्यभिचार भी है ही, क्योंकि धर्म और धर्मी आपके मत से एक हैं) । एवं ('वृक्षः शिंशपायाः' इत्यादि स्थलों में) शिंशपा में यद्यपि वृक्ष का तादात्म्य है, फिर भी वृक्षत्व में 'विशेष' का अर्थात् शिंशपा का व्यभिचार है (क्योंकि विल्वादि वृक्ष होने पर भी शिंशपा नहीं है ।) यदि उसका यह अर्थ करें कि जिस हेतु में साध्य का अव्यभिचार है, वहाँ साध्य निरूपित उत्पत्ति (साध्य रूप कारण जन्यत्व) या साध्य का तादात्म्य अवश्य है । तो फिर इसका अभिप्राय यह हुआ कि हेतु में साध्य के अव्यभिचार के रहने के कारण ही उस हेतु में रहनेवाले साध्य के तादात्म्य या साध्यरूप कारणजन्यत्व दोनों में साध्य की ज्ञापकता है । यदि यह स्थिति है तो फिर अव्यभिचार को ही साध्य का ज्ञापक मानिए ? साध्य के तादात्म्य या उत्पत्ति को इन सबों के बीच लाने का क्या प्रयोजन है ? क्योंकि हेतु साध्य से उत्पन्न होता है या साध्य से अभिन्न है, इन दोनों में से किसी भी कारण से हेतु में साध्य की ज्ञापकता नहीं है, किन्तु हेतु इसलिए साध्य का ज्ञापक है कि उसमें साध्य का अव्यभिचार है । (प्र.) धूम की उत्पत्ति तो वह्नि से होती है; किन्तु धूम के पार्थिवत्वादि धर्म तो वह्नि से उत्पन्न नहीं होते । (उ.) यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि वस्तु का एक ही स्वरूप होता है (अतः धूम को यदि
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४९५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४९५ न्यायकन्दली यदि धवादिसाधारणी वृक्षता न शिंशपात्वम्, तदा नानयोरेकत्वं स्वभावभेदस्य भेदसाधारणत्वात् । अभेदे तु यथा वृक्षत्वं सर्ववृक्षसाधारणं तथा शिंशपात्वमपि स्यात् । न च तादात्म्ये गम्यगमकभावे व्यवस्था युक्ता, तस्याभेदाश्रयत्वात् । यदि शिंशपात्वे गृह्यमाणे वृक्षत्वमगृहीतम्, क्व तादात्म्यम् ? गृहीतं चेत् ? (तत्) क्वानुमानम् ? अथोच्यते-यथावस्थितो धर्मी, शिंशपात्वं वृक्षत्वं च त्रयमेकात्मकमेव, तत्र धर्मिणि गृह्यमाणे शिंशपात्वं वृक्षत्वमपि गृहीतमेव । यथोक्तम्- तस्माद् दृष्टस्य भावस्य दृष्ट एवाखिलो गुणः । भागः कोऽन्यो न दृष्टः स्याद्यः प्रमाणैः परीक्ष्यते ॥ इति । वह्नि जन्य मानना है, तो उसमें रहनेवाले वस्तुतः तदभिन्न पार्थिवत्वादि को भी वह्नि जन्य मानना ही होगा) अतः कथित व्यभिचार है ही । यह भी निश्चय नहीं है कि शिंशपा तो वृक्ष रूप है, किन्तु (वृक्षत्व के आश्रय धवखदिरादि अन्यवृक्षों में भी) साधारण रूप से रहने के कारण वृक्षत्व शिंशपा- स्वरूप नहीं है; क्योंकि वृक्ष और शिंशपा दोनों अभिन्न हैं । यदि (प्र.) यह कहें कि वृक्षत्व (शिंशपा की तरह उससे भिन्न) धवादि में भी है; किन्तु शिंशपात्व तो केवल शिंशपा में ही है, धवादि में नहीं । (उ.) तो फिर वृक्षत्व और शिंशपात्व दोनों एक नहीं हो सकते, क्योंकि स्वभावों की विभिन्नता ही वस्तुओं की विभिन्नता है¹ । यदि शिंशपात्व और वृक्षत्व को अभिन्न मानें तो फिर जिस प्रकार वृक्षत्व सभी वृक्षों में रहता है,उसी प्रकार (वृक्षत्व से अभिन्न) शिंशपात्व की सत्ता भी सभी वृक्षों में माननी ही पड़ेगी । दूसरी बात यह है कि यदि वृक्षत्व और शिंशपात्व में अभेद मानें तो यह निर्धारण नहीं हो सकता कि शिंशपात्व ही वृक्षत्व का ज्ञापक है, वृक्षत्व शिंशपात्व का ज्ञापक नहीं । क्योंकि ज्ञाप्यज्ञापकभाव भेदों के अधीन है (अर्थात् ज्ञाप्य और ज्ञापक को परस्पर भिन्न ही होना चाहिए) । शिंशपात्व का ज्ञान हो जाने पर भी यदि वृक्षत्व अज्ञात ही रहता है, तो फिर शिंशपात्व और वृक्षत्व में तादात्म्य कहाँ ? यदि शिंशपात्व के गृहीत होने पर उसी ज्ञान से वृक्षत्व भी गृहीत हो जाता है, तो फिर वृक्षत्व के अनुमान की ही कौन-सी सम्भावना है ? यदि यह कहें कि (प्र.) अपने स्वरूप में अवस्थित शिंशपावृक्ष रूप धर्मी एवं वृक्षत्व और शिंशपात्व रूप दोनों धर्म, ये तीनों वस्तुतः एक ही हैं । अतः धर्मी के गृहीत होने पर वृक्षत्व और शिंशपात्व रूप उसके धर्म भी उसी ज्ञान से गृहीत हो जाते हैं । जैसा कहा गया है कि "तस्मात् किसी भी धर्मी के प्रत्यक्ष होने पर
- अर्थात् वृक्ष और शिंशपा इन दोनों में अगर अभेद है एवं इस कारण शिंशपा वृक्षात्मक है, तो फिर यह कैसे कह सकते हैं- वृक्ष शिंशपात्मक नहीं है ।
४१६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली यदेवं शिंशपाधिकल्पो जातो न वृक्षविकल्पः, स वृक्षशब्दस्मृत्यभावापराधात् शिंशपाशब्दसंस्कारप्रबोधजन्मना शिंशपाविकल्पेन चाशिंशपाव्यावृत्तिपर्यवसितेन नावृक्षव्यावृत्तिरूपनीयते, सर्वविकल्पानां पर्यायत्वप्रसङ्गात् । गम्यगमकभावश्च व्यावृत्त्योरेव नानयोर्न वस्तुनः, तस्यान्यथाभावात् । अवृक्षव्यावृत्तिशिंशपाव्यावृत्ती च परस्परं भिन्ने, व्यावत्र्त्यभेदात् ? अतो यथोक्तदोषानुपपत्तिरिति । अहो पूर्वापरानु- सन्धाने परं कौशलं पण्डितानाम् ? तादात्म्यमनुमानबीजम्, साध्यसाधनभूत- योर्व्यावृत्त्योः परस्परं भेद इति किमिदमिन्द्रजालम् ? वृक्षशिंशपयोस्तादात्म्यं उसी प्रत्यक्ष के द्वारा उसके सभी धर्मों का भी प्रत्यक्ष हो जाता है । अतः उसका कौन-सा अंश देखने से बच जाता है, जिसकी परीक्षा अन्य प्रमाणों से की जाय ।" तब यह बात रही कि (उस ज्ञान में शिंशपात्व की तरह वृक्षत्व भी यदि भासित होता है तो फिर) उस विकल्प (विशिष्ट ज्ञान) का अभिलाप 'यह शिंशपा है' इस शब्द के द्वारा क्यों होता है ? 'यह वृक्ष है' इस प्रकार के शब्दों के द्वारा क्यों नहीं ? इस प्रश्न का यह उत्तर है कि उस समय वृक्ष शब्द की स्मृति नहीं रहती है । इसी स्मृति के न रहने के 'अपराध' से ही वृक्ष शब्द से उसका अभिलाप नहीं हो पाता । शिंशपा शब्द की स्मृति से जिस शिंशपा विषयक विकल्प ज्ञान की उत्पत्ति होता है, उसका पर्यवसान 'अशिंशपाव्यावृत्ति' रूप 'अपोह' में ही होता है, उससे 'अवृक्षव्यावृत्ति' रूप 'अपोह' का ज्ञान नहीं होता । यदि ऐसा हो, तो सभी विशिष्ट ज्ञानों के बोधक शब्द एकार्थक हो जाएँगे (अर्थात् सभी ज्ञान एक विषयक हो जाएँगे) । एक ही व्यावृत्ति (अपोह) ही दूसरी व्यावृत्ति की ज्ञापिका हो सकती है (फलतः ज्ञाप्यज्ञापकभावसम्बन्ध दो अपोहों में ही हो सकता है) किन्तु व्यावृत्ति के आश्रयों में ज्ञाप्यज्ञापकभाव नहीं हो सकता, क्योंकि (क्षणिक होने के कारण उनमें परस्पर सामानाधिकरण्यरूप) अन्वय ही सम्भव नहीं है । (वृक्ष और शिंशपा इन दोनों के अभिन्न होने पर भी) अवृक्षव्यावृत्ति और अशिंशपाव्यावृत्ति ये दोनों अपोह तो भिन्न हैं, क्योंकि दोनों अपोहों के व्यवच्छेद्य भिन्न हैं ।¹ अतः कथित (सभी ज्ञानों में एक विषयत्व की) आपत्ति नहीं है । (उ.) यह तो आप जैसे पण्डितों का आगे और पीछे अनुसन्धान करने की अपूर्व ही चतुरता है, जिससे यह इन्द्रजाल सम्भव होता है कि तादात्म्य (अभेद) को तो अनुमान का प्रयोजक मानते हैं, और कहते हैं कि साध्य और साध्य से अभिन्न हेतु इन दोनों की व्यावृत्तियाँ (अपोह) भिन्न
- उक्त विवरण के अनुसार शिंशपात्व का यह स्वभाव निष्पन्न होता है कि वह केवल शिंशपा में ही रहे, और वृक्षत्व का यह स्वभाव निष्पन्न होता है कि वह शिंशपा में रहे और उससे भिन्न धवखदिरादि सभी वृक्षों में भी रहे, तो फिर विभिन्न स्वभाव की ये दोनों वस्तुएँ एक कैसे हो सकतीं हैं ?
प्रकरणम् ] भाषाानुवादसहितम् ४१७
प्रकरणम् ] भाषाानुवादसहितम् ४१७ न्यायकदली तदात्मतया च व्यवस्थितयोर्वृक्षव्यावृत्त्यशिशंपाव्यावृत्त्योः सत्यपि भेदे यथाध्यवसायं तादात्म्यमिति चेत् ? सिद्धे तादात्म्ये सत्यशिशंपाव्यावृत्त्या धर्मिण्यवृक्षव्यावृत्तिरध्यवसेया, तत्राध्यवसितायामवृक्षव्यावृत्तौ यथाध्यवसायं तादात्म्यसिद्धिरित्यन्योन्याश्रयदोषः । व्याप्तिग्रहणवेलायामेकात्मतयाध्यवसितयोर्व्यावृत्त्योस्तादात्म्यसिद्धिरिति चेत् ? तथाध्यव- सितयोर्भेदः काल्पनिकः । यद्यनुमानं कल्पनासमारोपेणापि प्रवर्तेत, न कश्चिद्धेतुर्नाम । प्रमेयत्वानित्यत्वयोरेकात्मतयाध्यवसितयोर्यथाध्यवसायं हैं । (प्र.) वृक्ष और शिंशपा इन दोनों में यद्यपि तादात्म्य है, किन्तु वृक्ष और शिंशपा इन दोनों से क्रमशः अभिन्नरूप से निश्चित अवृक्षव्यावृत्ति (वृक्षभिन्न- भिन्नत्व) और अशिशंपाव्यावृत्ति (शिंशपाभिन्नभिन्नत्व) ये दोनों व्यावृत्तियाँ परस्पर भिन्न हैं । अतः दोनों व्यावृत्तियों में वास्तविक भेद रहते हुए भी ज्ञानीय अभेद (अर्थात् 'दोनों अभिन्न हैं' इस आकार के भ्रमात्मक ज्ञान के द्वारा गृहीत अभेद) हैं, औप इसी अभेद के कारण अशिशंपाव्यावृत्ति रूप हेतु के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति का अनुमान होता है¹ । (उ.) यह कहना भी सम्भव नहीं है (क्योंकि इससे अन्योन्याश्रय दोष होगा) चूँकि तादात्म्य के रहने पर अशिशंपाव्यावृत्ति के द्वारा वृक्ष रूप धर्मी में अवृक्षव्यावृत्ति का अनुमान होगा, कथित साध्य साधनभूत दोनों व्यावृत्तियों में तादात्म्य तब होगा, जब कि पक्ष रूप शिंशपा में अनुमान के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति की प्रतीति हो जाएगी, अतः अन्योन्याश्रयदोष होगा । (प्र.) व्याप्ति ज्ञान के समय में ही जो दोनों व्यावृत्तियों का अभेद गृहीत होता है, उसी से तादा- त्म्य की सिद्धि होती है, अतः (अनुमितिमूलक उक्त अन्योन्याश्रय दोष नहीं है) । (उ.) तो फिर यह कहिए कि अभिन्नरूप से ज्ञायमान दोनों व्यावृत्तियों का अभेद काल्पनिक है, वास्तविक नहीं । यदि हेतु प्रभृति के काल्पनिक ज्ञान से भी अनुमान की प्रवृत्ति मानें, तो हेत्वाभास नाम की कोई वस्तु ही नहीं रह जाएगी । इस प्रकार तो प्रमेयत्व एवं अनित्यत्व इन दोनों में भी एकात्मता (अभेद) का विपर्यय हो ही सकता है, और इस विपर्यय रूप अध्यवसाय के द्वारा प्रमेयत्व और अनित्यत्व में भी काल्पनिक अभेद रहेगा ही । (प्र.) (जहाँ अनित्यत्व नहीं है, वहाँ भी प्रमेयत्व है, इस प्रकार) विपक्षव्यावृत्ति के न रहने के कारण प्रमेयत्व
- अवृक्षव्यावृत्त हैं वृक्ष से भिन्न सभी पदार्थों के भेदों का समूह एवं अशिशंपाव्यावृत्त है, शिंशपावृक्षमात्र को छोड़ और सभी पदार्थों के भेदों का समूह, इन दोनों भेदों के समूह भिन्न हैं, क्योंकि दोनों भेदों के प्रतियोगी समूह अलग-अलग हैं, पहले प्रतियोगीसमूह में शिंशपा नहीं है, क्योंकि शिंशपा भी वृक्ष ही है । दूसरे समूह में शिंशपा को छोड़कर और सभी वृक्ष भी हैं; क्योंकि सभी वृक्ष शिंशपा नहीं है ।
४१८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली तादात्म्यासम्भवात् । विपक्षव्यावृत्त्यभावात् प्रमेयत्वस्यानित्यत्वेन सह तादात्म्याभाव इत चेत् ? सत्यम्, वास्तवं तादात्म्यं नास्ति, कल्पनासमारोपितं तावदस्त्येव, तदेवानुमानो- दयबान्धवं समर्थितवन्तो यूयमिति विपक्षव्यावृत्तिरतस्तथा । अपि च तादात्म्ये तदुत्पादे च यस्य प्रतीतिर्विपक्षे हेत्वभावप्रतीत्या, तदभावप्रतीतिरपि दृश्यानुपलब्धेः, अनुपलब्धि- श्चानुमानभूतत्यात् स्वसाध्येन विपक्षे हेत्वभावेन सह तादात्म्यप्रतीत्या तदुत्पादप्रतीत्या वा प्रवर्त्तते, तस्या अपि स्वसाध्येन तादात्म्यतदुत्पादनिश्चयो विपक्षे वृत्त्यभावप्रतीत्या, तदभाव- प्रतीतिश्चानुपलब्ध्यन्तरसापेक्षा, यावान् प्रतिषेधः स सर्वोऽप्यनुपलब्धिविषय इत्यभ्युपग- मात् । ततश्चानवस्थापाताद् व्यतिरेकासिद्धौ तादात्म्यतदुत्पादासिद्धेर्न स्वभावः कार्यं वा हेतुः । किञ्च तादात्म्यतदुत्पत्त्योरभावेऽपि कृत्तिकोदयरोहिण्यस्तङ्गमनयोर्गम्यगमकभावः प्रतीयते । तस्मात् कार्यकारणभावाद् वा नियमः स्वभावाद् वेत्यनालोचिताभिधानम् । के साथ अनित्यत्व का तादात्म्य नहीं है । (उ.) यह सत्य है कि उन दोनों में प्रामाणिक तादात्म्य नहीं है, किन्तु काल्पनिक तादात्म्य तो है, तुम लोगों ने काल्पनिक तादात्म्य को ही तो अनुमानोदय के परम सहायक रूप में समर्थन किया है ? अतः प्रकृत में विपक्षव्यावृत्ति का रहना और न रहना दोनों ही बराबर हैं । और भी बात है कि व्याप्ति के प्रयोजक तादात्म्य और उत्पत्ति के रहने पर विपक्ष में हेतु के जिस अभेद की प्रतीति से जिसकी प्रतीति होगी, उस हेत्वभाव की प्रतीति के लिए भी दृश्यानुपलब्धि की आवश्यकता होगी, क्योंकि अभाव विषयक सभी प्रतीतियों के लिए दृश्यानुपलब्धि को कारण माना गया है । दृश्यानुपलब्धि रूप अनुमान प्रमाण के लिए भी विपक्ष में हेत्वभाव के साथ-साथ हेतु में साध्य के तादात्म्य या उत्पत्ति की प्रतीति आवश्यक होगी । इस तादात्म्य और उत्पत्ति की प्रतीति के लिए भी विपक्ष में हेत्वभाव की प्रतीति आवश्यक होगी । एवं इस हेत्वभाव की प्रतीति के लिए फिर दूसरी दृश्यानुपलब्धि आवश्यक होगी, क्योंकि जितने भी प्रतिषेध हैं, सभी को अनुपलब्धि प्रमाण का विषय माना गया है । इस अनवस्था दोष के कारण विपक्ष में हेतुव्यतिरेक (हेत्वभाव) की सिद्धि सम्भव न होने के कारण कथित तादात्म्य एवं उत्पत्ति की सिद्धि ही सम्भव नहीं है, अतः हेतु में साध्य का तादात्म्य या हेतु का साध्य से उत्पन्न होना ही हेतु में साध्य की व्याप्ति का कारण नहीं हो सकता । दूसरी बात यह है कि कृत्तिका नक्षत्र का उदय एवं रोहिणी नक्षत्र का अस्त इन दोनों में ज्ञाप्यज्ञापकभाव की प्रतीति होती है, किन्तु इन दोनों में से न किसी का किसी में तादात्म्य है और न किसी की उत्पत्ति ही किसी से होती है । तस्मात् बिना पूर्ण आलोचन के ही यह कह दिया गया है कि 'नियम' अर्थात् व्याप्ति की प्रतीति हेतु में साध्य की जन्यता या तादात्म्य की प्रतीति से ही होती है ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४९९
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४९९ न्यायकन्दली स्वभावेन हि कस्यचित् सह सम्बन्धो नियतो निरूपाधिकत्वात्, उपाधिकृतो हि सम्बन्धः तदपगमार्थं निवर्तते, न स्वाभाविकः । यदि धूमस्योपाधिकृतो वह्निसम्बन्धः ? उपाधय उपलब्धाः स्युः, शिष्याचार्ययोरिव प्रत्यासत्तावध्ययनम् । नहि वह्निधूमयोर- सकृदुपलभ्यमानयोस्तदुपाधीनामनुपलम्भे किञ्चिद् बीजमस्ति । न चोपलभ्यमानस्य नियमेनानुपलब्ध्या भवन्त्युपाधयः, ते हि यदि स्वरूपमात्रानुबन्धिनस्तथाप्यव्य- भिचारसिद्धिः, तत्कृतस्यापि सम्बन्धस्य यावद्द्रव्यभावित्वात् । अथागन्तवः ? तत्कारणान्यपि प्रतीयेरन् । उपाधयस्तत्कारणानि च सर्वाण्यतीन्द्रियाणीति गुर्वीयं कल्पना । यस्य चोपाधयो न सन्ति, स धूमः कदाचित् स्वतन्त्रोऽप्युपलभ्येत, यथेन्धनोपाधिकृतधूमसम्बन्धो वह्नेः शुष्केन्धनकृताधिपत्यो विधूमः प्रत्यवमृश्यते । न च तथा संविद्यन्तरे धूमः कदाचिन्निरग्निराभाति । तस्मादुपलब्धिलक्षणप्राप्ताना- अभिप्राय यह है कि स्वभाव के द्वारा ही किसी भी वस्तु का किसी वस्तु के साथ जो सम्बन्ध स्थापित होता है, वही उपाधि से शून्य होने के कारण 'नियम' कहलाता है । उपाधिमूलक सम्बन्ध ही उपाधि के हटने पर टूटता है, स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं । यदि धूम में वह्नि का सम्बन्ध भी उपाधिमूलक ही हो, तो फिर उन उपाधियों की उपलब्धि उसी प्रकार होनी उचित है, जिस प्रकार कि शिष्य और आचार्य की उपलब्धि के बाद अध्ययन रूप उपाधि की उपलब्धि होती है । इसका कोई हेतु नहीं मालूम होता कि बार-बार उपलब्ध होनेवाले वह्नि और धूम के सम्बन्ध की उपलब्धि तो हो, किन्तु उसकी प्रयोजिका उपाधि की उपलब्धि न हो । इसमें भी कोई हेतु नहीं है कि उपलब्ध होनेवाली वस्तुओं के सम्बन्ध की उपाधियाँ नियमतः अनुपलब्ध ही हों । ये (उपाधियाँ) यदि अपनी स्वरूपसत्ता के कारण ही अपने उपधेयों (साध्य और हेतुओं) के सम्बन्ध के कारण हैं, फलतः नित्य हैं, तो भी व्याप्ति की सिद्धि हो ही जाती है, क्योंकि यह औपाधिक सम्बन्ध अपने उपधेय रूप सम्बन्धियों की सत्ता तक विद्यमान ही रहता है । यदि ये आगन्तुक हैं ? अर्थात् कारणों से उत्पन्न होते हैं, तो फिर उनके कारणों की भी प्रतीति होनी चाहिए । यह कल्पना तो बहुत गौरवपूर्ण होगी कि उपाधियाँ और उनके कारण सभी अतीन्द्रिय ही हैं । जिन हेतुओं के उपाधि नहीं होते, वे कदाचित् स्वतन्त्र रूप से (साध्यसम्बन्ध के बिना) भी उपलब्ध होते हैं । किन्तु उपाधि से रहित धूम हेतु कभी भी स्वतन्त्र रूप से (वह्नि को छोड़कर) उपलब्ध नहीं होता है, जैसे कि उपाधिमूलक सम्बन्ध के योग्य वह्नि ही जब सूखी हुई लकड़ियों से उत्पन्न होती है, तो बिना धूम सम्बन्ध के भी देखी जाती है, यद्यपि वह्नि ही जब गीली लकड़ी से उत्पन्न होती है,
५०० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली मुपाधीनामनुपलम्भादभावप्रतीतौ (उपलब्धानामनुपलम्भादभावप्रतीतौ) उपलब्धानां शेषाका- लेन्धनावस्थाविशेषाणां पुनः पुनर्दर्शनेषु व्यभिचारादहेतुत्वनिश्चये सति निखिलदेश- कालादिविशेषाध्याहारेण न उपाध्यभावोपलब्धिदोषः । सहभावदर्शनजसंस्कारसहकारिणा निरस्तप्रतिपक्षशङ्केन चरमप्रत्यक्षेण धूमसामान्यस्याग्निसामान्येन स्वभावमात्राधीनं सहभावं निश्चित्य इदमनेन नियतमिति नियमं निश्चिनोति । यद्यपि प्रथमदर्शनेऽपि सहभावो गृहीतः, तथापि न नियमग्रहणम् । न हि सहभावमात्रान्नियमः, अपि तु निरुपाधिकसहभावात् । निरुपाधिकत्वं च तस्य भूयोदर्शनाभ्यासावशेषमित्यतो भूयः सहभावग्रहणबलभुवा सविकल्पकप्रत्यक्षेण सोऽध्यवसीयत इति । एतेन प्रत्यक्षे उपलभ्यीयमानविषयत्वाद- तीतानागतासु व्यक्तिषु कथं नियमग्रहणमिति प्रत्युक्तम् । न हि तब उसमें धूम के उपाधिमूलक सम्बन्ध की भी योग्यता है, किन्तु धूम की कोई भी प्रतीति वह्नि सम्बन्ध को छोड़कर नहीं होती है । तस्मात् जिन उपाधियों में उपलब्ध होने की योग्यता है (अर्थात् जिनकी उपलब्धि हो सकती है), उनकी अनुपलब्धि से ही उपाधियों के अभाव की सिद्धि होती है । इस प्रकार उपाधि के अभाव की प्रतीति हो जाने पर आर्द्वेन्धन संयोगरूप उपाधि से युक्त वह्नि हेतु में बार-बार धूम का व्यभिचार देखे जाने पर वह्नि हेतु में अहेतुत्व (हेत्वाभासत्व) का निश्चय हो जाता है । अतः 'सभी देशों में या सभी कालों में उपाधि के अभाव की उपलब्धि नहीं हो सकती' केवल इसी कारण सभी हेतुओं में उपाधि संशय की आपत्ति नहीं दी जा सकती । अतः धूम सामान्य में वह्नि सामान्य का जो स्वाभाविक सामानाधिकरण्य है, उसके निश्चय से ही 'यह (धूम) इससे (वह्नि से) नियत है' इस प्रकार से (व्याप्ति रूप) नियम का ज्ञान होता है । (व्याप्ति के कारणीभूत उक्त सामानाधिकरण्य का निश्चय) प्रतिपक्ष शङ्का से रहित उस अन्तिम प्रत्यक्ष से होता है, जिसमें उसे सहभाव विषयक प्रत्यक्ष से उत्पन्न संस्कार के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । यद्यपि प्रथमतः ही जब धूम और वह्नि साथ-साथ देखे जाते हैं, तब भी दोनों का सामानाधिकरण्य गृहीत ही रहता है, तथापि उससे नियम (व्याप्ति) का ग्रहण नहीं होता; किन्तु उपाधिरहित सहभाव से ही व्याप्ति का ग्रहण होता है । बार-बार साध्य और हेतु को साथ देखने से ही उपाधि के अभाव का निश्चय होता है । अतः बार-बार सामानाधिकरण्य के दर्शन के द्वारा बलप्राप्त (सामानाधिकरण्य विषयक) सविकल्पक प्रत्यक्ष से ही वह (नियम) गृहीत होता है । इससे नियम (व्याप्ति ग्रहण के प्रसङ्ग में इस आपत्ति का भी समाधान हो जाता है कि (प्र.) प्रत्यक्ष केवल वर्त्तमान काल की वस्तुओं का ही होता है, अतीत में बीते हुए एवं भविष्य काल में होनेवाले
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०१ न्यायकन्दली विशेषनिष्ठं व्याप्तिग्रहणमाचक्ष्महे । विशेषहान्या सामान्येन व्याप्तिग्रहणे तु सर्वत्रैव निर्वि- शङ्कः प्रत्ययः, तस्य सर्वत्रैकरूपत्वात् । किं व्यक्तयो व्याप्तावप्रविष्टा एव ? को वै ब्रूते न प्रविष्टा इति । किन्तु सामान्यरूपतया, न विशेषरूपेण । अत एव धूमसंविन्त्या वह्निमात्र- मेवानुसन्दधानस्तमनुधावति, न विशेषमाद्रियते । यदि तु सामान्येन सर्वत्र निश्चितेऽपि नियमे निष्प्रामाणिकैराशङ्का क्रियते, तदा त्वत्पक्षेऽपि प्रत्यक्षेण दृष्टासु वह्निधूमव्यक्तिषु गृही- तेऽपि कार्यकारणभावे देशकालव्यवहितात् तद्भावसन्देहादत्रानुमानाप्रवृत्तिं को निवारयति ? अथोच्यते-भूयोदर्शनेन कार्यकारणभावो निर्धार्यते सकृद्दर्शनेन तदुपाधिजत्य- शङ्काया अनिवर्तनात् । भूयोदर्शनं च सामान्यविषयम्, क्षणिकानां व्यक्तीनां पुनः पुनर्दर्शनाभावात् । तेनानग्निब्यावृत्तस्याधूमव्यावृत्तस्य च सामान्य- अनन्त हेतु (धूमादि) व्यक्तियों में (वह्नि आदि) साध्य के नियम (व्याप्ति) का (प्रत्यक्ष रूप) ग्रहण कैसे होगा ? (उ.) हम लोग विशेष व्यक्तियों में अलग-अलग व्याप्तिग्रहण नहीं मानते, किन्तु विशेष को छोड़कर केवल हेतुसामान्य में साध्यसामान्य की व्याप्ति का ग्रहण मानने से ही सभी हेतुओं में व्याप्ति का शङ्का से सर्वथा रहित निश्चय हो जाएगा । क्योंकि सामान्यमुखी व्याप्ति सभी व्यक्तियों में समान है । (प्र.) तो क्या व्याप्तिग्रहण में विशेष्य रूप से (हेतु) व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता ? (उ.) कौन कहता है कि व्याप्ति के ग्रहण में व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता है । 'व्याप्ति सामान्य विषयक ही है, विशेष विषयक नहीं' इसका इतना ही अभिप्राय है कि व्याप्तिबुद्धि में विशेष भी सामान्य रूप से ही भासित होते हैं, अपने असाधारण तत्तद्व्यक्तित्वादि रूपों से नहीं । अत एव धूम के ज्ञान से वह्नि सामान्य की अनुमिति के द्वारा प्रमाता वह्नि सामान्य का ही अनुधावन करता है, किसी विशेष प्रकार के वह्नि का आदर वह नहीं करता । यदि हेतु सामान्य में साध्य सामान्य की व्याप्ति के निश्चित हो जाने पर भी अप्रामाणिक लोग यह शङ्का करें कि तुम्हारे मत में भी यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत धूम और प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत वह्नि इन दोनों में कार्यकारणभाव के गृहीत होने पर भी विभिन्न देशों के धूमों और वह्नियों में एवं विभिन्न काल के धूमों और वह्नियों में कार्यकारणभाव का सन्देह बना ही रहेगा तो फिर इस सन्देह के कारण सभी अनुमानों के उच्छेद का निवारण कौन कर सकेगा ? यदि यह कहें कि (प्र.) हेतु और साध्य को बार-बार एक स्थान में देखने (भूयो- दर्शन) से दोनों में कार्यकारणभाव का निश्चय होता है । कहीं एक बार हेतु और साध्य दोनों में सामानाधिकरण्य के देखने पर भी यह संशय रह ही जाता है कि इन दोनों का सम्बन्ध स्वाभाविक है, या औपाधिक ? बार-बार का यह देखना (भूयो- दर्शन) साध्य सामान्य का हेतु सामान्य के साथ ही हो सकता है, एक साध्य व्यक्ति
५०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- न्यायकन्दली विषयः कार्यकारणभाव एकत्र निश्चीयमानः सर्वत्र विनिश्चितो भवति, सामान्यस्यैक- त्यादिति चेत् ? अस्माभिरपीत्थमेव सर्वत्र निश्चीयमानो नियमः किं भवद्भ्यो न रोचते ? किञ्च, भवतां प्रत्यक्षागोचरः सामान्येन कार्यकारणभावः, अनुभवतोऽवस्तुत्वात्, व्यक्तय- स्तादृश्यः । तासु सर्वाणि प्रत्यक्षेण गृह्यन्ते । न चातीतानागतानां व्यक्तीनां मनसा संकलनमिति न्याय्यम्, मनसो बहिरर्थे स्वातन्त्र्येऽन्धबधिराद्यभावप्रसङ्गात् । दृष्टासु व्यक्तिषु कार्यकारणभावोऽध्यवसायश्चादृष्टासु नानुमानोदयस्तदन्वयत्वात् । नापि व्यक्तीनां साध्य- साधनभावो युक्तः, परस्परमनन्वितत्वात् । न च तासामेकेन सामान्येनोपग्रहः, वस्त्व- वस्तुनोः सम्बन्धाभावात्, असम्बद्धस्योपग्राहकत्वे चातिप्रसङ्गात् । तत्किंविषयः प्रत्यक्ष- साधनस्तदुत्पादविनिश्चयः, यस्मादनुमानप्रवृत्तिरिति न विद्मः । का एक हेतु व्यक्ति के साथ नहीं, क्योंकि व्यक्ति क्षणिक हैं । अतः उनको बार बार साथ देखना सम्भव नहीं है । तस्मात् अनग्निनाव्यावृत्त (अपोह या अग्नित्व जाति) अधूम व्यावृत्त (अपोह या धूमत्व जाति) इन दोनों का सामान्य विषयक कार्यकारणभाव ही गृहीत होता है । 'धूम सामान्य की उत्पत्ति वह्निसामान्य से होती है' यह निश्चित हो जाने पर सभी धूमों और सभी वह्नियों में कार्यकारणभाव गृहीत हो जाता है, क्योंकि सामान्य (अपोह) एक ही है । (उ.) इसी प्रकार जब हम हेतु सामान्य में साध्य सामान्य के नियम (व्याप्ति) का उपपादन करते हैं, तो आप लोगों को क्यों पसन्द नहीं आता ? आप लोगों का सामान्य (अपोह) चूँकि अभाव रूप है, अतः सामान्यों में आप लोग (बौद्धगण) कार्यकारणभाव का अनुभव नहीं कर सकते । व्यक्ति सभी प्रत्यक्ष के विषय हैं अतः उनमें कार्यकारणभाव का ग्रहण होता है । यह कहना भी उचित नहीं है कि (प्र.) भूत और भविष्य व्यक्तियों का (चक्षुरादि से ज्ञान सम्भव न होने पर भी) मन से ग्रहण हो सकता है (अतः अतीत और अनागत व्यक्तियों में भी कार्यकारणभाव का ग्रहण असम्भव नहीं है) । (उ.) (यह सम्भव इसलिए नहीं है कि) मन को यदि बाह्य अर्थों के ग्रहण में स्वतन्त्र (अर्थात् चक्षुरादि निरपेक्ष) मान लिया जाय तो जगत् में कोई गूँगा या बहरा न रह जाएगा । इस प्रकार भी बौद्धों के मत से उपपत्ति नहीं की जा सकती कि प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत व्यक्तियों में ही कार्यकारण भाव गृहीत हो सकता है, किन्तु (व्याप्ति) का निश्चय अदृष्ट व्यक्तियों में भी होता है, चूँकि व्यक्ति भिन्न भिन्न हैं । व्यक्तियों में परस्पर कार्यकारणभाव भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वे परस्पर असम्बद्ध हैं । उन सभी व्यक्तियों का एक सामान्य धर्म (अपोह) के द्वारा संग्रह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वस्तु (भाव) और अवस्तु (अभाव) इन दोनों में सम्बन्ध हो ही नहीं सकता, यदि सम्बन्ध के न रहने पर भी संग्रह मानें तो (अघटव्यावृत्ति रूप अपोह से पट व्यक्तियों का संग्रह रूप) अतिप्रसङ्ग होगा । अतः यह
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५०३ प्रशस्तपादभाष्यम् एवं सर्वत्र देशकालाविनाभूतमितरस्य लिङ्गम् । शास्त्रे च कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतं नाव- इसी प्रकार और सभी स्थानों में एक वस्तु में जिस किसी दूसरी वस्तु की दैशिक और कालिक व्याप्ति रहती है, वह एक वस्तु उस दूसरे की ज्ञापक हेतु होती है। वैशेषिक सूत्र में जो व्याप्ति के लिए कार्यादि सम्बन्धों का उल्लेख है, वह न्यायकन्दली एवं देशकालाविनाभूतमितरस्य लिङ्गम्, यथा धूमो वह्नेर्लिङ्गम् । एवं देशाविनाभूतं कालाविनाभूतं चेतरस्य साध्यधर्मस्य लिङ्गम् । यथा काश्मीरेषु सुवर्णभाण्डागारिकपुरुषैर्यव- वाटिकासंरक्षणं यवनालेषु हेमाङ्कुरोद्भेदस्य लिङ्गम् । कालाविनाभूतं यथा प्राग्ज्योतिषाधिपते- र्वेश्मनि प्रातर्गायन्यादीनि नृपतिप्रबोधस्य लिङ्गम् । यदि देशकालाविनाभावमात्रेण गमकत्वं ननु सूत्रविरोधः ? अस्येदं कार्यं कारणं संयोगि विरोधि समवायि चेति लैङ्गिकमिति, समझ में नहीं आता कि प्रत्यक्ष के द्वारा किसमें उत्पत्ति का निश्चय होगा ? जिससे कि अनुमान की प्रवृत्ति होगी । इसी प्रकार (साध्य की) दैशिक या कालिक व्याप्ति से युक्त एक पदार्थ (हेतु) दूसरे (साध्य) का ज्ञापक हो जाता है । जैसे कि धूम वह्नि का ज्ञापक हेतु है । (अभिप्राय यह है कि) दैशिक और कालिक व्याप्ति से युक्त 'एक' (हेतु) पदार्थ 'इतर' का अर्थात् साध्य रूप धर्म का ज्ञापक हेतु होता है । (दैशिक व्याप्ति से युक्त हेतु का उदाहरण यह है) जैसे कि काश्मीर देश में जब यह देखा जाता है कि यव की क्यारियों का संरक्षण सोने के खजाने के अधिकारी लोग कर रहे हैं, तब यह समझा जाता है कि यव की क्यारियों में केसर के अङ्कुर उग आये हैं, अतः काश्मीर देश की यव की क्यारियों का सोने के खजाने के अधिकारियों द्वारा संरक्षण (रूप क्रिया) यव की क्यारियों में केसर के अङ्कुर का ज्ञापक हेतु है । (एवं कालिक व्याप्ति से युक्त हेतु का उदाहरण यह है) जैसे कि प्राग्ज्योतिषपुर (आसाम) के राजगृह में प्रातःकालिक गाना-बजाना वहाँ के राजा के जागरण का ज्ञापक हेतु है । (प्र.) यदि दैशिक व्याप्ति और कालिक व्याप्ति केवल इन दोनों सम्बन्धों में से किसी के रहने से ही हेतु में साध्य को समझाने का सामर्थ्य माना जाय
५०४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान- प्रशस्तपादभाष्यम् धारणार्थम्, कस्मात् ? व्यतिरेकदर्शनात् । तद्यथा अध्वर्यु्रों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्गम्, चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेः कुमुदविकासस्य च केवल उदाहरण के लिए ही है, अवधारण के लिए नहीं। क्योंकि (कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से किसी के न रहने पर भी अनुमान होता है) जैसे कि ओंकार को सुनाते हुए अध्वर्यु समूह अपने से व्यवहित भी होता (हवन करने वाले) के अनुमापक होते हैं । अथवा चन्द्र का उदय समुद्र की वृद्धि और कुमुद के विकास का अनुमापक होता है । अथवा शरद् ऋतु में जल की न्यायकन्दली तत्राह-शास्त्रे च कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतं नावधारणार्थमिति । अस्येदमिति सूत्रे कार्यादीनामुपादानं लिङ्गनिदर्शनार्थं कृतम्, न त्वेतावन्त्येव लिङ्गानीत्यवधारणार्थम् । कथ- मेतदित्याह-कस्मादिति । उत्तरमाह-व्यतिरेकदर्शनादिति । कार्यादिव्यतिरेकेणाप्यनुमानदर्श- नाद् नावधारणार्थम् । (तत्र) यत्र कार्यादीनां व्यतिरेकस्तद्दर्शयति- यथाध्वर्यु्रों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्गमिवित । अध्वर्युर्होतारमोम् इत्येवं श्रावयति नान्यमित्येवं यस्य पूर्वमवगति- तो फिर 'अस्येदं कार्यम्' इस सूत्र का विरोध होगा (क्योंकि इस सूत्र के द्वारा कार्यत्व, कारणत्व, संयोग, विरोध एवं समवाय इतने सम्बन्धों को ही हेतु में साध्य के ज्ञापन के सामर्थ्य का प्रयोजक माना गया है, दैशिक और कालिक व्याप्ति को नहीं) । इसी प्रश्न का समाधान "शास्त्रे कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतम्, नावधारणार्थम्" इस वाक्य के द्वारा किया गया है । अर्थात् वैशेषिक सूत्र रूप शास्त्र में जो 'कार्यत्वादि' सम्बन्ध का उपादान किया गया है, उसका यह अवधारण रूप अर्थ अभिप्रेत नहीं है कि कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से ही किसी के रहने से हेतु साध्य का ज्ञापक होता है । किन्तु साध्य के 'व्याप्ति रूप सम्बन्ध से युक्त हेतु ही ज्ञापक होता है' इस नियम के उदाहरण रूप में ही कार्यत्वादि सम्बन्धों का उल्लेख किया गया है कि साध्य के इन कार्यत्वादि सम्बन्धों से युक्त हेतु में साध्य की व्याप्ति रहती है । 'कस्मात्' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न किया गया है कि कैसे समझते हैं कि उक्त सूत्र में 'कार्यादि' का उपादान अवधारण के लिए नहीं है ? 'व्यतिरेकदर्शनात्' इस वाक्य से उक्त प्रश्न का उत्तर दिया गया है । अर्थात् कथित कार्यत्वादि सम्बन्ध के न रहने पर भी हेतु से साध्य का बोध होते देखा जाता है, अतः समझते हैं कि कार्यत्वादि सम्बन्धों का उल्लेख 'अवधारणा' के लिए नहीं है । इन कार्यत्वादि सम्बन्धों के रहने पर भी जहाँ अनुमिति होती है, उसका प्रदर्शन 'यथाऽध्वर्यु्रों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्गम्' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । जिस पुरुष को यह नियम पहले से अवगत है कि होता को ही अध्वर्यु ओंकार सुनाते हैं किसी दूसरे को नहीं, वही पुरुष अध्वर्यु को ओंकार का उच्चारण करते हुए