वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २१९
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् २१९ न्यायकन्दली स्वप्रकाशः प्रदीपोऽस्ति दृष्टान्त इति चेत्, नैवम्, सोऽपि हि पुरुषेण ज्ञायते ज्ञाप्यते चक्षुषा । ज्ञानञ्च तस्य क्रिया, न च स्वयं करणं कर्ता कर्म्म क्रिया च भवति । यथात्म- वादिनां स्वप्रतीतावात्मना युगपत्कर्म्मकर्तृभावः, तथा ज्ञानस्यापि करणादिभाव इति चेत्, न, अविरोधात्, ज्ञानक्रियाविषयत्वं कर्म्मत्वमात्मनस्तस्यामेव च स्वातन्त्र्यात् कर्तृत्वम्, न स्वातन्त्र्यविषयत्वयोरस्ति विरोधः । करणत्वं क्रियात्वन्तु सिद्धसाध्यत्वाभ्यामेकस्य परस्पर- विरुद्धम्, कारणकरणयोरेकत्वाभावात् । एवं परप्रयोज्यता करणत्वमितराप्रयोज्यत्वं कर्तृत्वमित्यनयोरपि विरोधः, विधिप्रतिषेधस्वभावत्वादित्यतो नैषामेकत्र सम्भवो युक्तः । अथ मतम्-न ज्ञानस्य करणाद्यभावः स्वसंवेदनार्थः; किन्तु स्वप्रकाशस्वभावस्य तस्योत्प- त्तिरेव स्वसंवेदनमिति । अत्रापि निरूप्यते किं तदर्थस्य प्रकाशः ? स्वस्य वा ? यद्यर्थस्य प्रकाशः, तदुत्पत्तेरर्थस्य संवेदनं स्यान्न तु स्वस्येति तस्यासंवेद्यतादोषः । में करण भी हो एवं कर्मादि अन्य कारक भी हो । (प्र.) स्वतः प्रकाश प्रदीप हो इस विषय में दृष्टान्त हैं ? (उ.) नहीं, प्रदीप का ज्ञान पुरुष को होता है (अतः वह उसका कर्त्ता है) । वह चक्षु से उत्पन्न होता है, अतः चक्षु उसका करण है (वह ज्ञान प्रदीपविषयक होने के कारण प्रदीप कर्म है), वह क्रिया (धात्वर्थ) प्रदीप- विषयक ज्ञान रूप है । अतः एक ही वस्तु एक ही समय में क्रिया, कर्त्ता, कर्म और करण नहीं हो सकती है । (प्र.) आत्मवादियों (ज्ञानादि भिन्न स्थिर नित्य आत्मा माननेवालों) के मत में एक ही आत्मतत्त्वज्ञान (क्रिया) का कर्तृत्व और कर्मत्व दोनों एक ही समय में एक ही आत्मा में हैं ही, अतः कर्तृत्व और कर्मत्व दोनों में कोई विरोध नहीं है, उसी प्रकार विज्ञानवादियों के मत में उपपत्ति हो सकती है । (उ.) सविषयक (ज्ञानादि रूप) एक ही क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व ये दोनों विरुद्ध नहीं हैं; क्योंकि सविषयक ज्ञान क्रिया का विषयत्व ही उसका कर्मत्व है एवं उसी क्रिया में स्वतन्त्रता है कर्तृत्व, ये दोनों ही आत्मा में रह सकते हैं; किन्तु क्रियात्व एवं करणत्व ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं; क्योंकि करण सिद्ध रहता है एवं क्रिया साध्य होती है, अतः एक ही व्यक्ति में क्रियात्व एवं करणत्व दोनों नहीं रह सकते । करणत्व एवं कर्तृत्व ये दोनों भी परस्पर विरुद्ध हैं; क्योंकि करण दूसरे के द्वारा प्रयुक्त होता है एवं कर्त्ता दूसरे कारकों से बिलकुल ही अप्रयोज्य होता है, अर्थात् स्वतन्त्र होता है । अतः ये दोनों भी एक समय में एक नहीं रह सकते । (प्र.) ज्ञान के प्रकाश के लिए करणादि का अभाव कभी हो ही नहीं सकता; क्योंकि ज्ञान की उत्पत्ति ही उसका प्रकाश है । (उ.) इस विषय में यह पूछना है कि ज्ञान अपने विषयों का प्रकाश रूप है ? या 'स्वसंवेदन', 'स्व' अर्थात् अपना ही प्रकाश रूप है ? अगर अर्थ प्रकाश रूप है तो फिर उससे अर्थ का ही 'संवेदन' अर्थात् प्रकाश होगा,
२२० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः- न्यायकन्दली अथेदं स्वस्य प्रकाशः, तदेव प्रकाश्यं प्रकाशश्चेति क्रियाकरणयोरेकत्वं तदवस्थम् । न च स्योत्पत्तिरेव स्वात्मनि क्रियेत्यपि निदर्शनमस्ति । यदपि स्वसंवेदनासिद्धौ प्रमाणमुक्तं यद्यदायत्तप्रकाशं तत्तस्मिन् प्रकाशमाने प्रकाशते, यथा प्रदीपायत्तप्रकाशो घटः, ज्ञानायत्त- प्रकाशश्च रूपादय इति । तत्रापि यदि ज्ञानमेवार्थप्रकाशोऽभिमतः, तदा तदायत्तप्रकाशा रूपादय इत्यसिद्धमनैकान्तिकञ्चेन्द्रियेण । अथ च ज्ञानजन्योऽर्थप्रकाशो न तु ज्ञानमेवार्थप्रकाशस्तदा दृष्टान्ताभावः, ज्ञानजन- कस्य प्रदीपस्यार्थप्रकाशकत्वाभावात् । एतेनैतदपि प्रत्युक्तम्-"अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थ- दृष्टिः प्रसिद्धयति" इति । न हि ज्ञानस्य प्रत्यक्षतार्थस्य दर्शनम्; किन्तु विज्ञान- स्योत्पत्तिः, तत्रासंविदितेऽपि ज्ञाने तदुत्पत्तिमात्रेणैवार्थस्य संवेदनं सिद्धयति । कथमन्य- स्योत्पत्तिरन्यस्य संवेदनमिति चेत् ? किं कुर्मो वस्तुस्वभावत्वात् । न चैवं सति सर्वस्य संवेदनम् ? तस्य स्वकारणसामग्रीनियमात् प्रतिनियतार्थसंवित्तिस्वभावस्य प्रतिनियतप्रति- पत्तृसंवेद्यतयैव चोत्पादात् । 'स्व' अर्थात् ज्ञान का नहीं, अतः ज्ञान को अर्थप्रकाश रूप मानने से बौद्ध मत में ज्ञान 'असंवेद्य' अर्थात् अतीन्द्रिय हो जायगा । अगर ज्ञान को 'स्व' का ही प्रकाशक मानें तो फिर एक ही वस्तु प्रकाश्य और प्रकाशक दोनों ही होगी, अतः इस पक्ष में भी करणत्व और क्रियात्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का समावेश रूप असामञ्जस्य है ही । 'स्व' की उत्पत्ति ही 'स्व'रूपा क्रिया है, इसमें कोई दृष्टान्त नहीं है । 'स्वसंवेदन' अर्थात् ज्ञान के स्वप्रकाशत्व में जो यह युक्ति दी जाती है । (प्र.) जिसका प्रकाश जिसके अधीन रहता है, उस प्रकाशक के प्रकाशित होने पर वह (प्रकाश्य) भी प्रकाशित हो जाता है, जैसे कि प्रदीप से प्रकाशित होने वाले घटादि एवं ज्ञान से प्रकाशित होने वाले रूपादि । (उ.) इस विषय में यह पूछना है कि 'प्रकाश' शब्द से अगर रूपादि विषय का ज्ञान ही इष्ट है, तो फिर यह सिद्ध नहीं होता कि रूपादि का प्रकाश ज्ञान के अधीन है । अतः उक्त हेतु इन्द्रियों में व्यभिचरित है । अगर यह कहें कि (प्र.) ज्ञान अर्थ-प्रकाश रूप नहीं है; किन्तु ज्ञान से अर्थ का प्रकाश होता है, (उ.) तो फिर इस विषय में कोई दृष्टान्त नहीं मिलेगा; क्योंकि प्रदीप में अर्थ को प्रकाशित करने का सामर्थ्य नहीं है । चूँकि ज्ञान को ही अर्थ का प्रकाशक माना है । (प्र.) अप्रत्यक्ष ज्ञान से अर्थ प्रकाशित नहीं होता है । (उ.) ज्ञान का प्रत्यक्षत्व और अर्थ का प्रकाशन दोनों एक नहीं हैं, अतः ज्ञान का प्रत्यक्ष न होने पर भी उसकी उत्पत्ति से ही अर्थ प्रकाशित हो जाता है, (फलतः ज्ञान की उत्पत्ति ही अर्थ का प्रकाश है) । (प्र.) एक वस्तु की उत्पत्ति दूसरे की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? (उ.) इसके लिए हम क्या करें ? यह तो वस्तुओं के स्वभाव के अधीन है । (प्र.) इस प्रकार से तो सभी अर्थों का प्रकाशन होना चाहिए ? (उ.) वह तो अपने विलक्षण कारणसमूह रूप सामग्री के अधीन है, जिससे कि कुछ नियमित विषयों का ज्ञान कुछ नियमित ज्ञाताओं को ही होता है ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २२१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २२१ प्रशस्तपादभाष्यम् तस्य गुणाः संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वसंस्काराः । प्रयत्नज्ञानायौगपद्यवचनात् प्रतिशरीरमेकत्वं सिद्धम् । पृथक्त्व- मन के संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व और संस्कार ये आठ गुण हैं । चूँकि सूत्रकार ने कहा है (३/२/३) कि प्रयत्न और ज्ञान एक क्षण में (एक आत्मा में) नहीं होते, अतः सिद्ध होता है कि प्रति शरीर में एक-एक मन है । एकत्व संख्या के रहने से ही उसमें पृथक्त्व गुण की भी सिद्धि न्यायकन्दली अपरे पुनरेवमाहुः-ज्ञानसंसर्गाद्विषये प्रकाश्यमाने प्रकाशस्वभावत्वात् प्रदीपवद्विज्ञानं प्रकाशते, प्रकाशाश्रयत्वात् प्रदीपवर्तिवदात्माऽपि प्रकाशत इति त्रिपुटीप्रत्यक्षतेति । तदप्य- सत्, घटोऽयमित्येतस्मिन् प्रतीयमाने ज्ञातृज्ञानयोरप्रतिभासनात् । यत्र त्वनयोः प्रतिभासो घटमहं जानामीति, तत्रोत्पन्ने ज्ञाने ज्ञातृज्ञानविशिष्टस्यार्थस्य मानसप्रत्यक्षता । न तु ज्ञातृज्ञानयोश्चाक्षुषज्ञाने प्रतिभासः, तयोरपि चाक्षुषत्वप्रसङ्गात् । तदेवं सिद्धे मनसि तस्य गुणान् प्रतिपादयति-तस्य गुणा इत्यादिना । सङ्ख्याद्यष्टगुणयोगोऽपि मनसो वैधर्म्यम् । सङ्ख्यासद्भावं कथयति-प्रयत्नेत्यादिना । प्रतिशरीरमेकं मन आहोस्विद्वनेकमिति संशये सति सूत्रकृतोक्तम्-"प्रयत्ना- कोई कहते हैं कि (प्र.) जब ज्ञान के सम्बन्ध से विषय प्रकाशित होता है, उसी समय 'प्रकाशस्वभाव' के कारण ज्ञान भी प्रदीप की तरह प्रकाशित हो जाता है एवं प्रकाश का आश्रय होने के कारण जैसे प्रदीप भी प्रकाशित होता है, वैसे ही प्रकाश रूप ज्ञान के प्रकाशित होने पर आत्मा भी प्रकाशित होता है । इस प्रकार ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय इन तीनों 'पुटों' से युक्त होने के कारण प्रत्यक्षता 'त्रिपुटी' है । (उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि 'यह घट है' इस प्रकार का प्रत्यक्ष होने पर भी उसमें ज्ञान और ज्ञाता प्रतिभासित नहीं होते । 'घट को मैं जानता हूँ' इत्यादि जिन ज्ञानों से वे प्रकाशित होते हैं, वे घटप्रत्यक्ष के बाद ज्ञान और ज्ञाता विशिष्ट घटादिविषयक और ही मानस प्रत्यक्षात्मक ज्ञान हैं; किन्तु पहले के घटादिविषयक चाक्षुष प्रत्यक्ष में ही ज्ञान और ज्ञाता ये दोनों भी विषय नहीं होते; क्योंकि तब ज्ञाता और ज्ञान इन दोनों को भी चाक्षुष प्रत्यक्ष का विषय मानना पड़ेगा । इस प्रकार मन के सिद्ध हो जाने से पर 'तस्य गुणाः' इत्यादि से मन का गुण कहते हैं । संख्यादि आठ गुणों का सम्बन्ध मन का 'वैधर्म्य' अर्थात् असाधारण धर्म है । 'प्रयत्न' इत्यादि से 'मन में संख्यादि आठ गुणों का सम्बन्ध है' इसमें प्रमाण देते हैं । 'प्रति शरीर में मन एक है या अनेक ?' इस संशय में सूत्रकार ने कहा है कि
२२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः- न्यायकन्दली यौगपद्याज्ज्ञानायौगपद्याच्च प्रतिशरीरमेकं मनः" इति । तेन प्रतिशरीरमेकत्वं सिद्धमिति । मनोबहुत्वे ह्यात्ममनःसंयोगानां बहुत्वायुगपज्ज्ञानानि प्रयत्नाश्च भवेयुः, दृश्यते च क्रमो ज्ञानानामेकोपलब्धव्यासक्तेन विषयान्तरानुपलम्भाद् निवृत्तव्यासङ्गेन चोपलम्भादित्युक्तम् । एवं प्रयत्नानामपि क्रमोत्पाद एव, एकत्र प्रयतमानस्यान्यत्र व्यापाराभावात्, समाप्तक्रियस्य च भावात्, तस्मादेकं मनः । तस्यैकत्वे कल्प्येक एवैकदा संयोग इत्येकमेव ज्ञानमेकः प्रयत्न इत्युपपद्यते । यस्तु क्वचिद्युगपदभिमानस्तदलातचक्रवदाशुभावात्, न तु तात्त्विकं यौगपद्यमेकत्र दृष्टेन कार्यक्रमेणान्यत्रापि करणस्य तस्यैव सामर्थ्यानुमानात् । नन्वेवं तर्हि द्वाविमावर्थौ पुष्पितास्तरव इत्यनेकार्थप्रतिभासः कुतः ? कुतश्च स्वशरीरस्य सह प्रेरणधारणे, न; अर्थसमूहालम्बनस्यैकज्ञानस्याप्रतिषेधाद् बुद्धिभेद एव, न तु तथा प्रतिभासः, सर्वासा मेकैकार्यनियतत्वात् । एवं शरीरस्य चूँकि एक काल में (एक आत्मा में) दो ज्ञानों और दो प्रयत्नों की उत्पत्ति नहीं होती है, अतः 'एक शरीर में एक ही मन है' इस कथन से (एकशरीरस्थ) मन में एकत्व संख्या की सिद्धि होती है । अभिप्राय यह है कि (एक ही शरीर में) अगर अनेक मन माने जायें तो मन और आत्मा के संयोग भी उतने ही होंगे, फिर उन संयोगों से (एक ही आत्मा में एक साथ) अनेक ज्ञान एवं अनेक प्रयत्नों की उत्पत्ति होनी चाहिए; किन्तु ज्ञानादि की उत्पत्ति क्रमशः ही देखी जाती है; क्योंकि एक प्रयत्न के समय अन्य विषयों के व्यापार नहीं देखे जाते । उस प्रयत्न जनित व्यापार के समाप्त होने पर फिर अन्य विषयक व्यापार भी होते हैं, अतः (एक शरीर में) एक ही मन है । उसे एक मान लेने पर आत्मा और मन का संयोग भी एक ही होगा, अतः एक क्षण में एक ही ज्ञान और प्रयत्नादि की उत्पत्ति होगी । कभी-कभी एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों और अनेक प्रयत्नों की जो उत्पत्ति दीख पड़ती है, वह भी एक ही क्षण में नहीं होती है; किन्तु अलातचक्र भ्रमण की तरह क्रमशः ही होती है । यह और बात है कि अतिशीघ्रता के कारण वह क्रम समझ में नहीं आता है । एक स्थान पर देखे हुए कार्य के क्रम से दूसरी जगह भी उन्हीं सामर्थ्य से युक्त कारणों का अनुमान होता है । (प्र.) तो फिर 'ये दो वस्तुएँ हैं, ये वृक्ष फूले हैं' इत्यादि अनेक विषयों का ज्ञान एवं एक समय अपने शरीर में धारण और प्रेरण आदि क्रियायें कैसे होती हैं ? (उ.) अनेक विषयक एक समूहालम्बन ज्ञान का खण्डन करना उक्त कथन का अभिप्राय नहीं है, किन्तु एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति का खण्डन करना ही उसका अभिप्राय है; चाहे वे एक ही विषयक क्यों न हों ? अगर उक्त (समूहालम्बन) ज्ञान विभिन्न विषयक अनेक ज्ञान ही होते तो फिर उनके आकार भी परस्पर विलक्षण ही होते; क्योंकि वे सभी परस्पर विभिन्न व्यक्तियों में नियत होते हैं । इसी प्रकार विशेष प्रकार के एक ही प्रयत्न से शरीर
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२३ प्रशस्तपादभाष्यम् मप्यत एव । तदभाववचनादणुपरिमाणम् । अपसर्पणोपसर्पणवचनात्संयोग- होती है। "तदभाववचनादणु मनः" (७/१/२२) सूत्रकार की इस उक्ति से मन में अणु परिमाण की सिद्धि होती है। अपसर्पणोपसर्पण 'वचन से अर्थात् 'अपसर्पण- मुपसर्पणमाशितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्टकारितानि' (५/२/१७) न्यायकन्दली प्रेरणधारणे च प्रयत्नविशेषादेकस्मादेव भवतः, यधानेकविषयमेकं ज्ञानं तथा तत्कारणा- विच्छाप्रयत्नावपीति न किञ्चिद् दुरुपपादम् । पृथक्त्वमप्यत एवेति । सङ्ख्यानुविधानादेव पृथक्त्वमपि सिद्धमित्यर्थः । तदभाववचनादणुपरिमाणम् । विभववान्महानाकाशस्तथा चात्मेत्यभिधाय तदभावादणु मन इत्युक्तम् । तस्मादणुपरिमाणं मन इति सिद्धम् । नित्यद्रव्यगतस्य विभवाभावस्य अणुपरिमाणत्वाव्यभिचारात् । विभवाभावश्चास्य युगपज्ज्ञानानुपपत्तैव समधिगतः । मनसो विभुत्वे युगपत्समस्तेन्द्रियसम्बन्धाच्चक्षु- रादिसन्निकृष्टेषु रूपादिषु ज्ञानयौगपद्यं स्यात् । अथ कथमेकेन्द्रियग्राह्येषु घटादिषु मनोधिष्ठितेन चक्षुषा युगपत्सन्निकृष्टेषु ज्ञानानि युगपन्न भवन्ति ? आत्मैन्द्रियार्थ- सन्निकर्षाणां यौगपद्यान्न भवन्ति । तावदनेनात्ममनः संयोगस्यैकस्य युगपदनेकस्य ज्ञानस्यो- त्पादनसामर्थ्याभावः कल्प्यत इति चेत् ? समानमेतद्विभुत्वेऽपि मानसः, तस्माद्विभुत्वेऽपि का धारण और प्रेरण दोनों ही होंगे । जैसे कि एक ही सामग्री से अनेक विषयक एक ज्ञान की उत्पत्ति होती है, वैसे ही एक ही इच्छा और प्रयत्नवाली सामग्री से धारण और प्रेरण दोनों की उत्पत्ति होगी, इसमें कुछ भी असङ्गति नहीं है । 'अत एव मन में पृथक्त्व भी है', अर्थात् चूँकि मन में संख्या है, अतः उसमें पृथक्त्व भी है । उसके 'अभाव' के कहने से मन में अणु परिमाण भी है, अर्थात् महर्षि कणाद ने विभवसूत्र के बाद कहा है कि 'तदभावादणु मनः', इसमें मन में अणु परिमाण की सिद्धि होती है । 'जो नित्य द्रव्य विभु न हो वह अवश्य ही अणु परिमाण का हो' इस नियम में कोई व्यभिचार नहीं है । एक क्षण में एक आत्मा में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं होती है, इसी से समझते हैं कि मन विभु नहीं है । अगर मन विभु हो तो फिर एक ही क्षण में अनेक इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध होने के कारण चक्षुरादि इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध रूपादिविषयक अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति हो जायगी । (प्र.) (हर एक शरीर में एक-एक ही मन मान लेने पर भी) एक ही इन्द्रिय से सम्बद्ध घटादिविषयक अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति क्यों नहीं होती है ? क्योंकि आत्ममनःसंयोग इन्द्रिय का मन के साथ संयोग, एवं अनेक विषयों के साथ इन्द्रिय का संयोग ये सभी तो एक ही क्षण में हैं ही । अगर यह कल्पना करें कि 'उस सामग्री को एक क्षण में एक ही ज्ञान को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है, अनेक ज्ञानों को उत्पन्न करने का नहीं, तो फिर ज्ञान-यौगपद्य
२२४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः न्यायकन्दली युक्त्यन्तरं वाच्यम् । तदुच्यते-विभुत्वादात्ममनसोः परस्परसंयोगाभावे सत्यात्मगुणानां ज्ञानसुखादीनामनुत्पत्तिरसमवायिकारणाभावात् । आत्मार्थसंयोगस्य ह्यसमवायिकारण- त्वेऽर्थदेशे ज्ञानोत्पत्तिः स्यादसमवायिकारणाव्यवधानेन प्रदेशवृत्तीनां गुणानामुत्पादात् । आत्मेन्द्रियसंयोगस्यासमवायिकारणत्वे शब्दज्ञानानुत्पत्तिः, आकाशात्मकेन श्रोत्रेणात्मनः संयोगाभावात् । न च बहिर्देशे प्रत्ययो नापि शब्दज्ञानानुत्पादः, तस्मादात्मार्थसंयोगस्या- त्मेन्द्रियसंयोगस्य चासमवायिकारणत्वे प्रतिषिद्धे परिशेषादात्ममनःसंयोगस्यासमवायि- कारणत्वं व्यवतिष्ठते, तच्च मनसो व्यापकत्वे न सम्भवतीत्यनुत्पत्तिरेव ज्ञानसुखादीनाम्, अस्ति च तेषामुत्पादः स एव मनसो विभुत्वं निवर्तयतीति । अपसर्पणोपसर्पणवचनात् संयोगविभागाविति । "अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्ट- का वारण मन को विभु मान लेने पर भी हो सकता है, इसके लिए मन को अणु मानना व्यर्थ ही होगा, अतः 'मन विभु नहीं है' इसके लिए दूसरी युक्ति कहनी चाहिए । (उ.) कहते हैं, आत्मा और मन ये दोनों ही अगर विभु हों तो फिर इन दोनों का संयोग ही नहीं होगा और उन दोनों के संयोग न होने पर आत्मा के विशेष गुण ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति ही नहीं होगी; क्योंकि उसका कोई असमवायिकारण नहीं होगा । आत्मा और विषय इन दोनों के संयोग को अगर ज्ञानसुखादि का असमवायिकारण मानें तो फिर उस विषय के देश में ही ज्ञानादि की उत्पत्ति माननी पड़ेगी; क्योंकि प्रादेशिक (अव्याप्यवृत्ति) गुणों का यह स्वभाव है कि वे असमवायिकारण के अव्यवहित प्रदेश में ही उत्पन्न हों । आत्मा एवं (श्रोत्रादि) इन्द्रियों के संयोग को ही अगर आत्मा के उन ज्ञानादि गुणों का असमवायिकारण मानें तो शब्दज्ञान की ही अनुत्पत्ति माननी पड़ेगी; क्योंकि आकाशात्मक (विभु) श्रोत्र के साथ (विभु) आत्मा का संयोग ही असम्भव है, तस्मात् भूतलादि प्रदेशों में ज्ञानादि गुणों की उत्पत्ति नहीं होती है एवं शब्दादि गुणों की उत्पत्ति होती है । इन (अनुत्पत्ति और उत्पत्ति) दोनों से यह सिद्ध होता है कि आत्मा के साथ विषयों के संयोग एवं इन्द्रियों के साथ आत्मा का संयोग, ये दोनों आत्मा के विशेष गुणों के असमवायिकारण नहीं हैं । अतः आत्मा और मन का संयोग ही उनका असमवायिकारण है । यह (असमवायिकारण) संयोग मन को विभु मानने पर असम्भव होगा, फलतः ज्ञान की उत्पत्ति अनुपपन्न हो जायगी; किन्तु ज्ञान की उत्पत्ति होती है, अतः ज्ञानसुखादि की उत्पत्ति से ही मन से विभुत्व हट जाता है । "अपसर्पण और उपसर्पण के कहने से मन में संयोग और विभाग भी हैं", अर्थात् सूत्रकार ने लिखा है कि "अपसर्पणमुपसर्पणमशितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्टकारितानि"। अभिप्राय यह है कि मन का एक शरीर से 'अपसर्पण' अर्थात् हटना एवं 'उपसर्पण' अर्थात् दूसरे शरीर
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२५ प्रशस्तपादभाष्यम् विभागौ । मूर्त्तत्वात्परत्वापरत्वे संस्कारश्च । अस्पर्शवत्त्वाद् द्रव्यानारम्भ- कत्वम् । क्रियावत्त्वान्मूर्त्तत्वम् । साधारणविग्रहवत्त्वप्रसङ्गादज्ञत्वम् । सूत्रकार की इस उक्ति से मन में संयोग और विभाग भी सिद्ध हैं । यतः इसमें मूर्तत्व है, अतः परत्व, अपरत्व और (वेगाख्य) संस्कार भी हैं । यतः इसमें स्पर्श नहीं है, अतः यह किसी द्रव्य का समवायिकारण भी नहीं है । यतः इसमें क्रिया है, अतः इसमें मूर्त्तत्व भी है । मन चेतन नहीं है; क्योंकि मन को चेतन मान लेने पर न्यायकन्दली कारितानि" इति सूत्रेण मनसः पूर्वशरीरादपसर्पणं शरीरान्तरे चोपसर्पणञ्चादृष्ट- कारितमित्युक्तम्, तस्मादस्य संयोगविभागौ सिद्धौ । मूर्त्तत्वात्परत्वापरत्वे संस्कारश्च । विभवाभावान्मूर्त्तत्वं सिद्धं तस्माद् घटादिवत् परत्वापरत्ववेगाः सिद्धाः । अस्पर्शवत्त्वाद् द्रव्यानारम्भकत्वम् । अस्पर्शवत्त्वं मनसः शरीरान्यत्वे सति सर्वविषयज्ञानोत्पादकत्वादा- त्मवत् सिद्धम्, तस्माच्चात्मवदेव सजातीयद्रव्यानारम्भकत्वम् । क्रियावत्त्वान्मूर्त्तत्वमिति । अणुत्वप्रतिपादनान्मूर्त्तत्वे सिद्धेऽपि विस्पष्टार्थमेतदुक्तम् । साधारणविग्रहवत्त्वप्रसङ्गाद- ज्ञत्वम् । यदि ज्ञातृ मनो भवेच्छरीरमिदं साधारणमुपभोगायतनं स्यात् । न चैवम्, एकाभि- प्रायानुरोधेन तस्य सर्वदा प्रवृत्तिनिवृत्तिदर्शनात्, तस्मादज्ञं मनः । चैतन्ये निषिद्धेऽपि प्रक्रमात् में जाना ये दोनों ही अदृष्ट से होते हैं, अतः मन में संयोग और विभाग की सिद्धि होती है । चूँकि मन में मूर्त्तत्व है, अतः परत्व, अपरत्व और (वेगाख्य) संस्कार भी हैं । विभुत्व के न रहने पर ही मन में मूर्त्तव्य सिद्ध है । मूर्त्तत्व हेतु से घटादि की तरह मन में परत्व, अपरत्व और वेग (संस्कार) ये तीनों भी सिद्ध होते हैं । चूँकि मन में स्पर्श नहीं है, अतः वह किसी द्रव्य का समवायिकारण भी नहीं है । मन में स्पर्श इसलिए नहीं है कि शरीर से भिन्न होने पर भी आत्मा की तरह ज्ञान का कारण है एवं आत्मा की तरह ही अपने सजातीय द्रव्य का अनारम्भक है । चूँकि मन में क्रिया है, अतः मूर्त्तत्व भी है । यद्यपि उसमें अणु परिमाण के कह देने से ही मूर्त्तत्व भी सिद्ध हो जाता है, फिर भी और स्पष्ट करने के लिए क्रिया रूप हेतु का भी उपादान किया है । 'वह अज्ञ (अचेतन) इस- लिए है कि (उसको चेतन मानने पर) 'साधारणविग्रहवत्त्व' प्रसङ्ग होगा' । अभिप्राय यह है कि मन में अगर ज्ञान (चैतन्य) मान लिया जाय तो शरीर जो केवल आत्मा के ही भोग का 'आयतन' है, उसे आत्मा और मन दोनों के ही भोग का 'आयतन' मानना पड़ेगा; किन्तु शरीर की प्रवृत्ति और निवृत्ति ये दोनों ही एक ही व्यक्ति के अनुरोध से देखी जाती हैं, अतः मन 'अज्ञ' (चेतन नहीं) है । यद्यपि मन के
२२६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये मनः- प्रशस्तपादभाष्यम् करणाभावात्परार्थम् । गुणवत्त्वाद् द्रव्यम् । प्रयत्नादृष्टपरिग्रहवशादाशुसञ्चारि चेति । ॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये द्रव्यपदार्थः ॥ आत्मा की तरह मन को भी शरीर का अधिष्ठाता मानना पड़ेगा । चूँकि यह करण है, अतः दूसरों के उपभोग का ही साधन (पदार्थ) है । चूँकि इसमें गुण हैं, अतः यह द्रव्य है । प्रयत्न और अदृष्ट के कारण यह तीव्र गतिवाला है । न्यायकन्दली पुनरेतदुक्तम् । अज्ञत्वे सिद्धे सत्याह-करणाभावात् परार्थमिति । परस्योपभोगसाधन- मित्यर्थः । गुणवत्त्वाद् द्रव्यं पृथिव्यादिवत् । प्रयत्नादृष्टपरिग्रहवशादाशुसञ्चारि चेति द्रष्टव्यम् । इच्छाद्वेषपूर्वकेण जीवनपूर्वकेण च प्रयत्नेन परिगृहीतं स्थानात् स्थानान्तरमाशु सञ्चरति, तथा अदृष्टेन परिगृहीतं मरणाच्छरीरान्तरमाशु सञ्चरतीति द्रष्टव्यम् । इतिशब्दः परिसमाप्तौ । विशुद्धविविधन्यायमौक्तिकप्रकराकरः । सेव्यतां द्रव्यजलधिः स्फुटसिद्धान्तविद्रुमः ॥ ॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतौ पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां द्रव्यपदार्थः समाप्तः ॥
चैतन्य का निषेध कर चुके हैं (देखिये आत्मनिरूपण), तथापि प्रसङ्ग आने के कारण उसे फिर से दुहराया है । अज्ञत्व के सिद्ध हो जाने के बाद कहते हैं कि यतः वह करण है, अतः 'परार्थ' है, अर्थात् दूसरों के उपभोग का साधन मात्र है । चूँकि उसमें गुण है, अतः पृथिवी की तरह वह द्रव्य है । "आत्मा के प्रयत्न और अदृष्ट से शीघ्र चलना उसका स्वभाव है" अर्थात् जिस प्रकार से इच्छा, द्वेष और जीवन- योनि यत्न इन तीनों के साथ सम्बद्ध होने के कारण मन क्षिप्रगति से एक स्थान से दूसरे स्थान को जाता है, वैसे ही यह अदृष्ट से प्रेरित होकर मरण के बाद दूसरे शरीर में भी शीघ्र चला जाता है । यह 'इति' शब्द समाप्ति का बोधक है । अनेक प्रकार के न्यायरूपी विशुद्ध मोतियों की खान निश्चित सिद्धान्तरूपी मूँगों से युक्त 'द्रव्य समुद्र' (द्रव्य-निरूपण) का (विद्वान् लोग) सेवन करें । ॥ भट्ट श्रीश्रीधर द्वारा रचित पदार्थों की बोधिका न्यायकन्दली नाम का टीका में द्रव्य का निरूपण समाप्त हुआ ॥
॥ अथ गुणपदार्थनिरूपणम् ॥ प्रशस्तपादभाष्यम् रूपादीनां गुणानां सर्वेषां गुणत्वाभिसम्बन्धो द्रव्याश्रितत्वं निर्गुणत्वं निष्क्रि- यत्वम् । गुणपदार्थों का निरूपण गुणत्व जाति का सम्बन्ध, द्रव्यों में ही रहना, गुणों का राहित्य एवं क्रियाओं का राहित्य (ये चार) रूपादि सभी गुणों के साधर्म्य हैं । ॐ न्यायकन्दली नमो जलदनीलाय शेषपर्यङ्कशायिने । लक्ष्मीकण्ठग्रहानन्दनिष्यन्दायासुरद्विषे ॥ द्रव्यपदार्थं व्याख्याय गुणानां निरूपणार्थमाह-रूपादीनां गुणानामिति । गुणत्वं नाम सामान्यं तेनाभिसम्बन्धो गुणानामिति परस्परसाधर्म्यकथनम् । इतरपदार्थवैधर्म्यकथनमध्ये- तत् । गुणत्वं रूपादिषु रत्नत्वमिवोपदेशसहकारिणा प्रत्यक्षैणैव गृह्यते । यत्तु प्रथममस्य कर्मादिविलक्षणतया न ग्रहणं तदाश्रयपारतन्त्र्यस्यात्यन्तिकसादृश्यस्य सम्भवात् । रूपादीनां गुणानामिति स्वरूपमात्रकथनम् । सर्वेषामित्यभिव्याप्तिप्रदर्शनार्थम् । द्रव्याश्रितत्वं द्रव्योप- सर्जनत्वम् । एतच्च धर्ममात्रकथनं न तु वैधर्म्याभिधानं द्रव्यकर्मादिष्वपि सम्भवात् । शेषनाग रूपी पलँग पर सोनेवाले, लक्ष्मी के कण्ठालिङ्गन से उत्पन्न आनन्द में विभोर, प्रणवस्वरूप मेघ के समान नीलवर्णवाले एवं असुरों के विनाशक (श्री विष्णु) को मैं प्रणाम करता हूँ । द्रव्य की व्याख्या करने के बाद (क्रमप्राप्त) गुणों का निरूपण करने के लिए 'रूपादीनां गुणानाम्' इत्यादि पङ्क्ति लिखते हैं । 'गुणत्व नाम की जाति के साथ सभी गुणों का सम्बन्ध है' इस उक्ति से सभी गुणों का परस्पर साधर्म्य कथित होता है । गुणों के इस साधर्म्य के कथन से ही 'गुणत्वादि जातियों का सम्बन्ध ही गुण से भिन्न पदार्थों का वैधर्म्य है' यह भी कथित हो जाता है । उपदेश के सहारे जिस प्रकार प्रत्यक्ष से ही रत्नों का रत्नत्व गृहीत होता है, उसी प्रकार उक्त प्रकार के प्रत्यक्ष से ही गुणत्व भी गृहीत होता है । (उपदेश से) पहले कर्मादि से भिन्न रूप में जो गुणों का ग्रहण नहीं होता है, कर्मादि पदार्थों के साथ गुणों का 'आश्रय पारतन्त्र्य' रूप अत्यन्त सादृश्य ही इसका कारण है । 'रूपादीनां गुणानाम्' इस वाक्य से गुणों का केवल स्वरूप ही कहा गया है । 'सर्वेषाम्' इस पद से इन साधर्म्यों का सभी गुणों में रहना अभिव्यक्त होता है । 'द्रव्याश्रितत्व' शब्द का अर्थ है द्रव्योपसर्जनत्व, अर्थात् द्रव्य रूप मुख्य का अप्रधान होना ।
२२८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली एवं निर्गुणत्वं गुणरहितत्वं गुणानां स्वरूपं तेषां स्वात्मनि गुणान्तरानारम्भकत्वात्, तदनारम्भकत्वञ्च रूपादिषु रूपाद्यन्तरानुपलब्धेरनवस्थानाच्च । एवं सत्येकं रूपमणुः शब्द इत्यादिब्यवहार उपचारात् । सङ्ख्यादिकं रूपाद्याश्रयं न भवति गुणत्वाद् रूपादिवत् । स्वरूपान्तरं कथयति-निष्क्रियत्वमिति । द्रव्ये गच्छति रूपादिकमपि गच्छतीति चेत् ? न, वेगवद्वायुसंयोगेन व्योमादिषु क्रियाया अभावाच्छाखादिषु च भावाद् अन्वयव्यतिरेकाभ्यां मूर्त्तत्वक्रियावत्त्वयोर्व्याप्यव्यापकभावसिद्धौ मूर्त्तभावेन रूपादिषु क्रियानिवृत्तिसिद्धेः कथं तर्हि तेषु गमनप्रतीतिः ? आश्रयक्रियया, यथैव सत्तायां नहि सत्ता स्वाश्रयेण सह गच्छति, एकस्य गमने विश्वस्य गमनप्रसङ्गादिति । यह द्रव्याश्रितत्व गुणों के केवल साधर्म्य समझाने के लिए ही कहा गया है, कर्मादि पदार्थों का वैधर्म्य समझाने के लिए नहीं; क्योंकि द्रव्य एवं कर्म प्रभृति पदार्थों में भी 'द्रव्याश्रितत्व' तो है ही । इसी प्रकार गुणरहितत्व रूप निर्गुणत्व भी गुणों का साधर्म्य ही है (गुण से भिन्न पदार्थों का वैधर्म्य नहीं); क्योंकि एक गुण में दूसरे गुण की उत्पत्ति नहीं होती है । एक रूप दूसरे रूपों का उत्पादक इसलिए नहीं है कि एक रूप में दूसरे रूपों की उपलब्धि नहीं होती है । एवं एक रूप में दूसरे रूप की सत्ता मानने में अनवस्था भी होगी । इस प्रकार (गुण में गुण की असत्ता सिद्ध हो जाने पर यही कहना पड़ेगा कि) 'एकं रूपम्', 'अणुः शब्दः' इत्यादि प्रयोग लक्षणामूलक हैं । इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि रूपादि गुणों में संख्यादि गुण नहीं हैं; क्योंकि वे भी गुण हैं, जैसे कि रूप । 'निष्क्रियत्वम्' इत्यादि से गुणों का दूसरा साधर्म्य कहते हैं । (प्र.) द्रव्य के चलने पर उसी के साथ रूपादि भी तो चलते हैं ? (उ.) आकाश में वेग से युक्त वायु का संयोग रहने पर भी क्रिया होती है; किन्तु वेग से युक्त वायु का संयोग रहने पर शाखादि में क्रिया होती है । इस अन्वय और व्यतिरेक के बल से क्रिया और मूर्त्त द्रव्य में इस प्रकार व्याप्यव्यापकभाव निश्चित होता है कि क्रिया मूर्त्त द्रव्य में ही रहती है । ऐसा सिद्ध हो जाने पर रूपादि में व्यापकीभूत मूर्त्तत्व के अभाव से व्याप्यभूत क्रिया का अभाव सिद्ध होता है । (प्र.) फिर रूपादि में गमन की उक्त प्रतीतियाँ कैसे होती हैं ? (उ.) जिस प्रकार सत्ता में आश्रय की क्रिया से क्रिया की प्रतीति उसके स्वयं न चलने पर भी होती है, उसी प्रकार रूपादि में भी आश्रय की क्रिया से ही क्रिया की प्रतीति होती है । इस प्रकार अगर क्रिया की प्रतीति से ही क्रिया की सत्ता मानी जाय तो फिर समस्त संसार का ही चलना स्वीकार करना पड़ेगा ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२९ प्रशस्तपादभाष्यम् रूपरसगन्धस्पर्शपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहवेगा मूर्त्तगुणाः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दा अमूर्त्तगुणाः । सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागा उभयगुणाः । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह और वेग ये दश 'मूर्त्तगुण' (अर्थात् मूर्त्त द्रव्यों में ही रहनेवाले गुण) हैं । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द ये दश 'अमूर्त्तगुण' (अर्थात् अमूर्त्त द्रव्यों में ही रहनेवाले गुण) हैं । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये पाँच 'उभयगुण' (अर्थात् मूर्त्तद्रव्य और अमूर्त्तद्रव्य दोनों में ही रहनेवाले गुण) हैं । न्यायकन्दली सम्प्रति परस्परमेव तेषां साधर्म्यं वैधर्म्यञ्च प्रतिपादयन्नाह—रूपेत्यादि । एते मूर्त्ताना- मेव गुणा नामूर्त्तानाम् । तथा हि रूपस्पर्शपरत्वापरत्ववेगाः पृथिव्यादिषु त्रिषु, वायौ रूपवर्जम्, रूपस्पर्शवर्जं मनसि, रसगुरुत्वे पृथिव्युदकयोः, द्रवत्वं पृथिव्युदकतेजस्सु, स्नेहोऽम्भसि, गन्धः पृथिव्याम् । अमूर्त्तगुणान् कथयति—बुद्धिसुखेत्यादि । बुद्ध्यादयो भावनान्ता आत्मगुणाः । आकाशगुणः शब्दः । संख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागा उभयगुणा मूर्त्तामूर्त्तगुणाः । अब गुणों में ही परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्य का निरूपण करते हुए 'रूप रस' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । ये मूर्त्त (द्रव्यों) के ही गुण हैं, अमूर्त्त (आकाशादि) के नहीं । अभिप्राय यह है कि रूप, स्पर्श, परत्व, अपरत्व और वेग ये पाँच गुण (मिलकर) पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहते हैं । इनमें से रूप को छोड़कर शेष चार गुण वायु में रहते हैं । कथित पाँच गुणों में से रूप और स्पर्श को छोड़कर शेष तीन गुण मन में रहते हैं । पृथिवी और जल इन दोनों में (इन पाँच में से) रस और गुरुत्व ये दो ही गुण हैं । द्रवत्व पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में ही रहता है । स्नेह केवल जल में और गन्ध केवल पृथिवी में रहता है । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द ये दश अमूर्त्त गुण (अर्थात् मूर्त्त द्रव्य से भिन्न द्रव्यों में ही रहते) हैं । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये पाँच 'उभय गुण' अर्थात् मूर्त्त द्रव्य और अमूर्त्त द्रव्य दोनों में रहनेवाले गुण हैं ।
२३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगविभागद्वित्वद्विपृथक्त्वादयोऽनेकाश्रिताः । शेषास्त्वेकैकवृत्तयः । रूपरसगन्धस्पर्शस्नेहसांसिद्धिकद्रवत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्म- भावनाशब्दा वैशेषिकगुणाः । संयोग, विभाग, द्वित्व और द्विपृथक्त्वादि गुण 'अनेकाश्रित' (अर्थात् इनमें से प्रत्येक अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाले) हैं । शेष सभी गुण 'एकद्रव्यवृत्ति' अर्थात् एक-एक द्रव्य में ही रहते हैं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, स्नेह, सांसिद्धिक द्रवत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना (संस्कार) और शब्द ये (सोलह) विशेष गुण हैं । न्यायकन्दली संयोगविभागद्वित्वद्विपृथक्त्वादयोऽनेकाश्रिताः, एका संयोगव्यतिरेका च विभाग- व्यक्तिरुभयोर्द्रव्योर्वर्त्तत इत्यनेकाश्रितत्वम् । एवं द्वित्वद्विपृथक्त्वव्यक्त्योरपि । आदिशब्द- गृहीतास्तु त्रित्वत्रिपृथक्त्वादि- व्यक्तयो यथासम्भवं बहुष्वाश्रिताः । अनेकशब्दश्च 'एको न भवति' इति व्युत्पत्त्या द्वयोर्बहुष्वपि साधारणः । शेषास्त्वेकैकवृत्तयः 'शेषा' रूपादिव्यक्तयः, एकस्यामेव व्यक्तौ वर्तन्ते, न पुनरेका रूपव्यक्तिः संयोगवदुभयत्र व्यासज्य वर्त्तत इत्यर्थः । विशेषगुणान् निरूपयति-रूपरसगन्धेत्यादि । विशेषो व्यवच्छेदः, तस्मै प्रभवन्ति ये गुणास्ते वैशेषिका गुणा रूपादयः । ते हि स्वाश्रयमितरस्मा- एक ही संयोग और एक ही विभाग (अपने प्रतियोगी और अनुयोगी) दोनों द्रव्यों में रहता है, अतः ये दोनों 'अनेकाश्रित' गुण हैं । इसी प्रकार द्वित्व और द्विपृथक्त्व ये दोनों भी 'अनेकाश्रित' गुण हैं । 'आदि' शब्द के द्वारा बहुत से द्रव्यों में रहनेवाले त्रित्व एवं त्रिपृथक्त्वादि गुण भी अनेकाश्रित कहे गये हैं । 'एको न भवति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'दो' एवं इससे अधिक 'बहुत' सभी 'अनेक' शब्द के अर्थ हैं । 'शेष' अवशिष्ट रूपादि गुणों की इकाइयाँ एक-एक द्रव्य में ही रहती हैं । अभिप्राय यह है कि एक ही रूपादि इकाई संयोग की तरह दो व्यक्तियों को व्याप्त कर नहीं रहतीं । 'रूप-रस' इत्यादि वाक्य के द्वारा विशेष गुणों का वर्णन करते हैं । 'विशेष' शब्द का अर्थ है 'व्यवच्छेद' अर्थात् भेदबुद्धि । इतने गुण भेदबुद्धि के उत्पादन में समर्थ हैं ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३१ प्रशस्तपादभाष्यम् सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वनैमित्तिकद्रवत्ववेगाः सामान्यगुणाः । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये (दश) सामान्य गुण हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच में से प्रत्येक एक ही इन्द्रिय से गृहीत होता है एवं बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होता है । न्यायकन्दली व्यवच्छिन्दन्ति न संख्यादयः, तेषां स्वतो विशेषाभावात् । यस्तु तेषां विशेषः स आश्रयविशेषकृत एवेति बोद्धव्यम् । संख्यादयः सामान्यगुणाः । सामान्याय स्वाश्रयसाधर्म्याय गुणाः, न स्वाश्रयविशेषा- येत्यर्थः । नन्वणुपरिमाणं परमाणूनां व्यवस्थापकम् ? न, जात्यन्तरपरमाणुसाधारणत्वात् । सांसिद्धिकद्रवत्वमपां विशेषगुण एव तेन नैमित्तिकग्रहणम् । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः । बाह्यानीन्द्रियाणि चक्षुरादीनि बाह्यार्थ- प्रकाशकत्वात् । तैः प्रत्येकं रूपादयो गृह्यन्ते । वे ही 'वैशेषिक गुण' हैं, जैसे कि रूपादि । ये अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप में समझाते हैं । संख्यादि सामान्य गुण अपने आश्रयों को औरों से भिन्न रूप में नहीं समझा सकते; क्योंकि (एक द्रव्य की एक संख्या से दूसरे द्रव्य की उसी संख्या में) स्वतः कोई अन्तर अर्थात् विशेष नहीं है । उन दोनों संख्याओं में जो कुछ अन्तर है उसे आश्रय के विशेषों से ही समझना चाहिए । ऊपर कहे हुए संख्यादि सामान्य गुण हैं । अर्थात् 'सामान्याय गुणाः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार कथित संख्यादि 'सामान्य' अर्थात् अपने आश्रयों में परस्पर साधर्म्य प्रतीति के ही कारणीभूत गुण हैं, इनसे इनके आश्रयों में परस्पर विभिन्नता की प्रतीति नहीं होती है । (प्र.) अणु परिमाण तो परमाणुओं का व्यवस्थापक है, अर्थात् और परिमाणवालों से विभिन्नत्व बुद्धि का कारण है ? (उ.) नहीं, अणु परिमाण भी विभिन्न जातीय परमाणुओं में समान रूप से रहने के कारण परस्पर (परमाणुत्व रूप) साधर्म्यबुद्धि का ही कारण है । सांसिद्धिक (स्वाभाविक) द्रवत्व जल का विशेष गुण है, अतः नैमित्तिक द्रवत्व को ही सामान्य गुणों में गिनाया है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँच गुण 'बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्य' हैं, अर्थात् बाह्य विषयों के ही प्रकाशक होने के कारण चक्षुरादि 'बाह्येन्द्रिय' हैं । शब्दादि में से प्रत्येक
२३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वद्रवत्वस्नेहवेगा द्वीन्द्रिय- ग्राह्याः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नास्त्वन्तःकरणग्राह्याः । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, नैमित्तिक द्रवत्व और वेग ये नौ गुण दो इन्द्रियों से (भी) गृहीत हो सकते हैं । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न ये छः गुण 'अन्तःकरण' अर्थात् मन से ज्ञात होते हैं । न्यायकन्दली संख्यादयो वेगान्ता द्वीन्द्रियग्राह्याः चक्षुःस्पर्शनग्राह्याः । यथा चक्षुषा 'स्निग्धोऽयम्' इति प्रतीतिरेवं त्वगिन्द्रियेणापि भवति, संख्यादिवत् स्नेहोऽपि तदुभयग्राह्यः । बुद्ध्यादयः प्रयत्नान्ता अन्तःकरणग्राह्याः, मनसा प्रतीयन्त इत्यर्थः । बुद्धिरनुमेया नान्तःकरणेन गृह्यत इति केचित्, तदयुक्तम्, लिङ्गाभावात् । न तावदर्थमात्रं लिङ्गम्, तस्य व्यभिचारात् । ज्ञातोऽर्थो लिङ्गं चेत् ? ज्ञान- सम्बन्धो ज्ञातता, याऽसौ ज्ञानकर्मता सा प्रतीयमाने ज्ञाने न प्रतीयते, सम्बन्धिप्रतीत्यधीनत्वात् सम्बन्धप्रतीतेरिति कथं तद्विशेषणार्थो लिङ्गं स्यात् ? चक्षुरादि बाह्य इन्द्रियों में से ही किसी एक इन्द्रिय से गृहीत होता है । संख्या से लेकर वेगपर्यन्त कथित ये दश गुण 'द्वीन्द्रियग्राह्य' हैं, अर्थात् चक्षु और त्वचा दोनों इन्द्रियों से गृहीत होते हैं । 'यह स्निग्ध है' यह प्रतीति जैसे चक्षु से होती है, वैसे ही त्वचा से भी होती है, अतः संख्यादि की तरह स्नेह भी 'द्वीन्द्रियग्राह्य' है । बुद्धि से लेकर प्रयत्न पर्यन्त कहे हुये ये छः गुण 'अन्तःकरणग्राह्य' हैं, अर्थात् इनका प्रत्यक्ष मन रूप अन्तरिन्द्रिय से ही होता है । कोई कहते हैं कि (प्र.) बुद्धि का अनुमान ही होता है, अतः अन्तरिन्द्रिय से भी उसका प्रत्यक्ष नहीं होता । (उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि बुद्धि की अनुमिति का कोई उपयुक्त हेतु नहीं है । केवल (ज्ञेय) अर्थ के ज्ञान अनुमिति के हेतु नहीं हो सकते; क्योंकि यह व्यभिचरित है । ज्ञात अर्थ के ज्ञानों को अनुमिति का हेतु मानें (तो भी नहीं हो सकता, क्योंकि) अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध ही उसकी 'ज्ञातता' है । अर्थ में ज्ञान का सम्बन्ध (ज्ञानक्रिया का) कर्मत्व रूप ही है । अतः ज्ञान के प्रतीत हुये बिना ज्ञानकर्मत्व रूप ज्ञातता की प्रतीति नहीं हो सकती; किन्तु अनुमिति में लिङ्ग की तरह उसका विशेषण
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २११
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २११ न्यायकन्दली लिङ्गवल्लिङ्गविशेषणस्यापि ज्ञायमानस्यैवानुमानहेतुत्वम् । अथ मन्यसे 'ज्ञानेन स्वोत्पत्त्य- न्तरमर्थे ज्ञातता नाम काचिदवस्था जन्यते पाकेनेव तण्डुलेषु पक्वता, सा चार्थ- धर्मत्वादर्थेन सह प्रतीयते' इति । तदप्यसारम्, अननुभवात् । यथा हि तण्डुला- नामैवौदनीभावः पक्वताऽनुभूयते नैवमर्थस्य ज्ञातता । या चेयमपरोक्षरूपता हानादिव्य- वहारयोग्यता च तस्य, साऽपि हि ज्ञानसम्बन्धो न धर्मान्तरम् । यथा चार्थे ज्ञायमाने ज्ञातता, तथा ज्ञाततायामपि ज्ञायमानायां ज्ञाततान्तरमित्यनवस्था । अथेयं स्वप्रकाशा ? ज्ञाने कः प्रद्वेषः ? वस्तुतस्त्रिकालविशिष्टोऽप्यर्थो ज्ञानेन प्रतीयमानो वर्त्तमानकालावच्छिन्नः प्रतीयते । या च त्रिकालस्य वर्त्तमानकालावच्छिन्नावस्था सा ज्ञातता, ज्ञानकृतत्वात्तस्य लिङ्गमिति कश्चित् । तदपि न किञ्चित्, वर्त्तमानावच्छिन्नता भी कारण है, वह लिङ्ग की तरह ज्ञात होकर ही । अगर यह मानें कि (प्र.) ज्ञान की उत्पत्ति के बाद इस ज्ञान से ही अर्थ की एक विशेष प्रकार की अवस्था होती है, जिसे ज्ञाततावस्था कहते हैं । जिस प्रकार कि चावल में पाक से पक्वता नाम की एक अवस्था उत्पन्न होती है । (उ.) इस कथन में भी कुछ विशेष सार नहीं हैं; क्योंकि पाक से चावल में जिस प्रकार ओदनावस्था रूप पक्वता का अनुभव होता है, वैसे ही अर्थ में ज्ञातता का कोई अनुभव नहीं होता । (विषयों के ज्ञान के बाद जो) उसमें अपरोक्षरूपता, त्याग या ग्रहण करने की जो योग्यता भासित होती है, वह भी ज्ञान सम्बन्ध को छोड़कर और कुछ नहीं है । एवं इस पक्ष में अनवस्था दोष भी है; क्योंकि जिस प्रकार ज्ञात होने पर अर्थों में ज्ञातता मानते हैं, उसी प्रकार ज्ञातता के ज्ञात होने पर उसमें भी कोई दूसरी ज्ञातता माननी पड़ेगी । जिसका पर्यवसान अनवस्था में होगा । अगर ज्ञातता को स्वप्रकाश मान लें तो फिर ज्ञान को ही स्वप्रकाश मान लेने में क्यों द्वेष है ? कोई कहते हैं कि (प्र.) तीनों कालों में से वर्त्तमानकाल ही ऐसा है जिससे युक्त अर्थ का प्रत्यक्ष होता है, अर्थात् वर्त्तमानकालिक वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष होता है । अतः वस्तुओं की जो वर्त्तमानावस्था, भूतावस्था और भविष्यदवस्था है, इनमें से वस्तुओं के प्रत्यक्षमूलक होने के कारण केवल वर्त्तमानावस्था ही उसकी ज्ञातता है । यह ज्ञातता ही ज्ञानानुमिति का हेतु है । (उ.) किन्तु इस कथन में भी कुछ सार नहीं है; क्योंकि वस्तुओं का वर्त्तमानकाल के साथ सम्बन्ध (या उसमें रहना) ही उनकी
२३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली हि वर्त्तमानकालविशिष्टता सा चार्थस्य स्वाभाविकी, न ज्ञानेन क्रियते किन्तु प्रतीयते । योऽपि हि विषयसंवेदनानुमेयं ज्ञानमिच्छति, सोऽप्येवं पर्यनुयोज्यः-किं विषय- संवेदनमात्मनि समवैति ? विषये वा ? न तावद्विषये, तच्चैतन्यप्रतिषेधात् । अथात्मनि समवैति ? ततः किमन्यद्विज्ञानं यदस्यानुमेयम् । अस्य कारणं ज्ञातृव्यापारलक्षणं तदिति चेत् ? तत्किं नित्यम् ? अनित्यं वा ? यद्यनित्यं तदुत्पत्तावपि कारणं वाच्यम् । विषये- न्द्रियादिसहकारी ज्ञानमनःसंयोगोऽस्य कारणमिति चेत् ? सैव सामग्री विषयसंवेदनो- त्पत्तावस्तु किमन्तर्गडुनानेन ? अथ तन्नित्यम् ? कादाचित्कविषयेन्द्रियसन्निकर्षादिसहकारि कादाचित्कं विषयसंवेदनं करोतीत्यभ्युपगमः, तदस्याप्यागन्तुककारणकलापादेव विषय- संवेदनोत्पत्तिसिद्धौ तत्कल्पनावैयर्थ्यम् ? विषयसंवेदनादेवार्थावबोधस्य तत्पूर्वकस्य व्यवहा- रस्य च सिद्धेः । वर्तमानकालावच्छिन्नता है । यह उनका स्वाभाविक धर्म है, यह धर्म ज्ञान से उत्पन्न नहीं होता, ज्ञान के द्वारा प्रतीत भर होता है । जो कोई विषयसंवेदन ज्ञान का अनुमान मानते हैं, उन्हें इस प्रकार पराजित करना चाहिए कि यह 'विषयसंवेदन' समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है ? या विषयों में ? विषयों में तो रह नहीं सकता; क्योंकि विषयों में चैतन्य का खण्डन कर चुके हैं (देखिए-आत्मनिरूपण, पृ. १७१) । अगर यह समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है तो फिर ज्ञान उससे भिन्न कौन-सी वस्तु है ? जिसका विषयसंवेदन से अनुमान होता है । (प्र.) अनुमेयज्ञान एवं विषयसंवेदन ये दोनों भिन्न हैं; क्योंकि (अनुमेय) ज्ञान विषयसंवेदन का कारण और ज्ञाता का व्यापार है । (उ.) विषयसंवेदन का कारणीभूत ज्ञान नित्य है ? अथवा अनित्य ? अगर अनित्य है तो फिर उसकी उत्पत्ति के लिए भी अलग से कारण कहना पड़ेगा । विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों से युक्त ज्ञाता के मनःसंयोग को अगर उसका कारण मानें, तो फिर इन्हीं कारणों के समूह से विषयसंवेदन की भी उपपत्ति मानिये । विषयसंवेदन के उत्पादक कारणों की पंक्ति में उस ज्ञान को बिठाने की क्या आवश्यकता है ? अगर उस अनुमेय ज्ञान को नित्य मानते हैं और विषय एवं इन्द्रियादि सहकारियों के रहने और नहीं रहने से विषयसंवेदन के कादाचित्कत्व (कभी होना कभी नहीं) का निर्वाह करते हैं, तो फिर विषयसंवेदन के कादाचित्कत्व के प्रयोजक इन्द्रियादि रूप कारणों से ही विषयसंवेदन की उत्पत्ति मान लीजिए । इस तरह के ज्ञान की कल्पना ही व्यर्थ है जो विषयसंवेदन से अनुमेय हों
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २३५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २३५ न्यायकन्दली अथोच्यते विषयेन्द्रियादिजन्यं विज्ञानं कथमात्मन्येव समवैति ? यद्यात्मा सहज- ज्ञानमयो न स्यात् । तस्याचेतनत्वे हि कारणत्वाविशेषादिन्द्रियादिष्वपि ज्ञानसमवायो भवेदिति । तन्न स्वभावनियमादेव नियमोपपत्तेः । यथा तन्तूनामपटत्वेऽपि तन्तुत्व- जातिनियमात्तेषु समवायो न तुर्यादिषु, तद्वदचिदात्मकेऽप्यात्मन्यात्मत्वजातिनियमाद् ज्ञान- समवायस्य नियमो भविष्यति । एतेनैतदपि प्रत्युक्तं यदाहुरेके 'स्वसंवेदनमात्मनो निजं चैतन्यम्' इति संसारावस्थायामपि तस्यावभासप्रसङ्गात् । अविद्यया वा तस्य तिरोधानमिति चेत् ? किं ब्रह्मणोऽप्यविद्या ? कथं च नित्ये स्वप्रकाशे तिरोधानस्यायोयुक्तिः ? न च तिरोहिते तस्मिन्नन्यप्रतिभानमस्ति, 'तस्य भासा एवं विषयसंवेदन का कारण हों; क्योंकि उसी विषयसंवेदन से अर्थविषयक बोध एवं तज्जनित व्यवहार दोनों की उपपत्ति हो जायगी । अगर यह कहें कि (प्र.) विषय एवं इन्द्रियादि से उत्पन्न ज्ञान तब तक आत्मा में समवाय सम्बन्ध से कैसे रह सकता है, जब तक कि आत्मा को सहजज्ञानमय न माना जाय । आत्मा अगर स्वतः अचेतन हो किन्तु ज्ञान का कारण होने से ही (उसमें) ज्ञान की सत्ता हो तो फिर इन्द्रियादि (रूप ज्ञान के और कारणों) में भी ज्ञान का समवाय मानना पड़ेगा । (उ.) उक्त कथन भी असङ्गत ही है; क्योंकि स्वाभाविक नियम के अनुसार ही इस विषय का अवधारण हो जायगा कि ज्ञान अपने आत्मा रूप कारण में ही समवाय सम्बन्ध से है, इन्द्रियादि रूप कारणों में नहीं । जैसे कि तन्तु में पटरूपता न रहने पर भी (पट के कारणीभूत) तन्तु में ही समवाय सम्बन्ध से पट रहता है, तुरी, वेमा प्रभृति अपने अन्य कारणों में नहीं । इस नियम को मान लेने से ही आत्मा में ही ज्ञान का समवाय है, इस नियम की भी उपपत्ति हो जायगी । इसी से किसी का यह मत भी खण्डित हो जाता है कि (प्र.) स्वसंवेदन (स्वतःप्रकाश) ज्ञान आत्मा का स्वकीय चैतन्य ही है (वह ज्ञान अगर स्वतः प्रकाश और नित्य है तो फिर) संसारावस्था में भी उसका प्रत्यक्ष होना चाहिए । अगर यह कहें कि (प्र.) संसारावस्था में वह अविद्या से ढँका रहता है ? (उ) तो फिर इस विषय में यह पूछना है कि क्या ब्रह्म में भी अविद्या रहती है ? एवं नित्य एवं स्वप्रकाश रूप ज्ञान के तिरोधान में ही क्या युक्ति है ? एवं उसके तिरोहित हो जाने पर (संसारावस्था में) और विषयों का ज्ञान भी असम्भव होगा; क्योंकि 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इत्यादि श्रुतियों में कहा
२३६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् गुरुत्वधर्माधर्मभावना ह्यतीन्द्रियाः । अपाकजरूपरसगन्धस्पर्शपरिमाणैकत्वैकपृथक्त्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहवेगाः कारणगुण- पूर्वकाः । गुरुत्व धर्म, अधर्म और भावना ये चार गुण किसी भी इन्द्रिय से गृहीत नहीं होते (अर्थात् अतीन्द्रिय हैं) । अपाकज रूप, अपाकज रस, अपाकज गन्ध, अपाकज स्पर्श, परिमाण, एकत्व, एकपृथक्त्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह और वेग ये ग्यारह गुण 'कारणगुणपूर्वक' हैं, अर्थात् अपने आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों में रहनेवाले अपने-अपने समानजातीय गुण से उत्पन्न होते हैं । न्यायकन्दली सर्वमिदं विभाति' इति श्रुतेः । भासते चेत् ? सर्वमुक्तिः, विद्याविर्भावे सत्य- विद्याविलयात् । अथेयं न विलीयते ? न तर्हि विद्याप्रकाशस्तस्याविलयहेतुरित्य- निर्मोक्षः । निर्भागस्यैकदेशेन प्रतिभानमनाशङ्कनीयम् । गुरुत्वधर्माधर्मभावना अतीन्द्रियाः, न केनचिदिन्द्रियेण गृह्यन्त इत्यर्थः । अपाकजरूपादयो वेगान्ताः कारणगुणपूर्वकाः स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तस्य ये गुणास्तत्पूर्वका रूपादयः, तन्तुरूपादिपूर्वकाः पटरूपादयः, गया है कि उसी के प्रकाश से और सभी प्रकाशित होते हैं । अगर संसारावस्था में भी आत्मा का वह सहज चैतन्य प्रकाशित होता है तो फिर सभी जीवों को मुक्ति मिल जायगी; क्योंकि विद्या रूप तत्त्वज्ञान से अविद्या का विनाश हो जाता है । अगर विद्या के प्रकाशित होने पर भी अविद्या का विनाश नहीं होता है तो फिर विद्या (तत्त्वज्ञान) अविद्या के विनाश का कारण ही नहीं है । तब फिर किसी को भी मोक्ष का मिलना असम्भव हो जायगा । अंशों से शून्य किसी अखण्ड वस्तु के किसी अंश के प्रकाशित होने एवं किसी अंश के अप्रकाशित होने की तो शङ्का ही नहीं करनी चाहिए । गुरुत्व, धर्म, अधर्म और भावना ये चार गुण 'अतीन्द्रिय' हैं, अर्थात् किसी भी इन्द्रिय से इनका ग्रहण नहीं होता । अपाकज रूप से लेकर वेगपर्यन्त कथित ग्यारह गुण 'कारणगुणपूर्वक' हैं । अर्थात् उक्त रूपादि गुण अपने आश्रय (द्रव्य) के समवायिकारण (अवयव) में रहनेवाले गुणों से उत्पन्न होते हैं । पट प्रभृति द्रव्यों में रहने- वाले रूपादि की उत्पत्ति तन्तु आदि में रहनेवाले रूपादि गुणों से ही होती है; क्योंकि जिस तरह के रूपादि तन्तुओं में देखे जाते हैं, उसी प्रकार के रूपादि पट में देखे जाते हैं । अगर ऐसी बात न हो तो फिर
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३७ न्यायकन्दली नियमेन तद्धर्मानुविधानात् । अतत्पूर्वकत्वे हि पटे यत्किञ्चिद् गुणान्तरं स्यान्नियम- हेतोरभावात् । एतेनैकमेव सर्वत्र शुक्लं रूपं प्रत्यभिज्ञानादिति प्रत्युक्तम् । तरतमादिभावानुप- पत्तिप्रसङ्गाच्च । तस्मात्सामान्यविषया प्रत्यभिज्ञा । पार्थिवपरमाणुरूपादयः पाकजाद्विसंयोगाज्जायन्ते न तु परमाणुसम- वायिकारणाश्रितरूपादिपूर्वकाः, अतस्तन्निवृत्यर्थमपाकजग्रहणम् । सिद्धायामुत्पत्तौ कारणगुणपूर्वकत्वमकारणगुणपूर्वकत्वं चेति निरूपणीयम् । जलादिपरमाणु- पट में ऐसे भी गुणों की उत्पत्ति हो जो तन्तुओं में न देखे जाते हों; क्योंकि 'अवयव के गुणों से ही अवयवी के गुण उत्पन्न होते हैं' इस नियम में कोई (अन्य) प्रमाण नहीं है । अगर यह नियम न हो तो फिर पट में तन्तुओं में न रहनेवाले किसी गुण की उत्पत्ति होने में भी कोई बाधा नहीं है; क्योंकि 'पट में इतने ही गुण उत्पन्न हों, इस विषय में (उक्त नियम को छोड़ कोई अन्य) कारण नहीं है । कथित युक्ति से ही किसी आचार्य का निम्नलिखित यह मत भी खण्डित हो जाता है कि (प्र.) शुक्ल रूप से युक्त जितने भी द्रव्य दीख पड़ते हैं, उन सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप है; क्योंकि (जिस शुक्ल रूप को मैंने घट में देखा था, उसी को पट में भी देख रहा हूँ यह) प्रत्यभिज्ञा होती है । (उ.) ('अवयवगत गुण ही अवयवी में गुण को उत्पन्न करते हैं' इस नियम की अनुपपत्ति रूप दोष के अतिरिक्त इस पक्ष में) यह दोष भी है कि अगर शुक्ल रूप से युक्त सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप हो तो फिर उनमें इस न्यूनाधिकभाव की प्रतीति नहीं होगी कि 'यह इससे अधिक शुक्ल है' या 'यह इससे कम शुक्ल है', अतः कथित प्रत्यभिज्ञा केवल सादृश्य के कारण होती है (दोनों द्रव्यों में प्रतीत होने वाले शुक्ल रूपों के एकत्व से नहीं) । पार्थिव परमाणु के रूपरसादि पाक से ही उत्पन्न होते हैं, अपने आश्रय के समवायिकारणों में रहनेवाले रूपरसादि से नहीं; क्योंकि उन रूपादि के आश्रयीभूत परमाणुओं का कोई समवायिकारण ही नहीं है । पार्थिव परमाणुओं के पाकजरूपादि में 'कारणगुणपूर्वकत्व' रूप साधर्म्य अव्याप्त न हो जाय, अतः (प्रकृत साधर्म्य के लक्ष्यबोधक वाक्य में) 'अपाकज' पद दिया है । उत्पत्ति की सिद्धि हो जाने पर फिर उस उत्पन्न वस्तु में ही जिज्ञासा होती है कि उसकी उत्पत्ति कारण के गुणों से होती है या और किसी से ? जलादि के परमाणुओं के रूपादि की तो उत्पत्ति ही नहीं होती (क्योंकि वे नित्य हैं), अतः उनमें कारणगुणपूर्वकत्व साधर्म्य के न होने से भी व्यभिचार दोष नहीं है । इन गुणों को 'कारणगुणपूर्वक' कहने का अभिप्राय केवल इनके स्वरूपों का कथन मात्र है ।
२३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दा अकारणगुणपूर्वकाः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाशब्दतूलपरिमाणोत्तरसंयोगनैमित्तिक- द्रव्यत्वपरत्वापरत्वपाकजाः संयोगजाः । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना और शब्द ये दश गुण 'अकारणगुणपूर्वक' हैं (अर्थात् ये अपने आश्रयों के अवयवों में रहनेवाले अपने समानजातीय गुण से नहीं उत्पन्न होते) । बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, भावना, शब्द, रूई प्रभृति के परिमाण, उत्तरदेश के साथ संयोग, नैमित्तिक द्रवत्व ये तेरह गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं । न्यायकन्दली रूपादीनां चोत्पत्तिरेव नास्तीति न व्यभिचारः । एषां कारणगुणपूर्वकत्वाभिधानं स्वरूप- कथनं न त्ववधारणार्थम्, नैमित्तिकद्रवत्ववेगयोरकारणगुणपूर्वकत्वस्यापि सम्भवात् । कारण- गुणपूर्वकत्वमनयोर्वेगवदारब्धजलावयविसमवेतयोर्द्रष्टव्यम् । बुद्ध्यादयः शब्दान्ता अकारणगुणपूर्वकाः स्वाश्रयस्य यत्समवायिकारणं तद्गुण- पूर्वका न भवन्ति, नित्यगुणत्वात् । बुद्ध्यादयः संयोगजाः । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावना आत्ममनःसंयोगजाः । शब्दो भेर्याकाशसंयोगजः । तूलपरिमाणं प्रचयसंयोगजम् । इस नियम का यह अभिप्राय नहीं है कि ये सभी गुण कारणगुणपूर्वक ही होते हैं; क्योंकि नैमित्तिक द्रवत्व और वेग अकारणगुणपूर्वक भी होते हैं । वेग एवं द्रवत्व से युक्त अवयवों के द्वारा उत्पन्न जल रूप अवयवी के वेग और द्रवत्व में कथित कारणगुणपूर्वकत्व समझना चाहिए । बुद्धि से लेकर शब्दपर्यन्त कथित ये नौ गुण 'अकारणगुणपूर्वक' हैं, अर्थात् अपने आश्रयरूप द्रव्य के समवायिकारण में रहनेवाले गुण से नहीं उत्पन्न होते; क्योंकि इनके आश्रय नित्य हैं । इन गुणों के समवायिकारणों का कोई कारण ही नहीं है । 'बुद्धि प्रभृति कथित गुण संयोग से उत्पन्न होते हैं', इनमें बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और भावना, ये नौ गुण आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होते हैं । शब्द की उत्पत्ति भेरी (नगाड़ा) और आकाश के संयोग से होती है । 'प्रचय' नाम के संयोग से रूई के परिमाण की उत्पत्ति होती है । संयोगज