१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
मन्त्रानुक्रमणिका | ४१७
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| मयैव चेतनेनेमे | संन्या० २.३८ | मौनं योगासनम् | ना०परि० ४.२३ |
| मयैवैताः | संन्या० २.३९ | यं यं वापि | ना०परि० ५.२३ |
| मय्येव सकलं जातम् | कैव० १९ | य इदमथर्वशिरो | अथ० ७ |
| मरुदभ्यसनम् | शाण्डि० १.७.३७ | य एको देवः | शाण्डि० २.५ |
| मलं संवेद्यमुत्सृज्य | संन्या० २.६४ | य एतदथर्वशिरो | म० वा० १२ |
| महामुद्रा महाबन्धो | यो०त० २६ | य एतदुपनिषदम् | पैङ्ग० ४.२९ |
| मासपाञ्चालिकायास्तु | याज्ञ० १४ | य एवं निर्बीजम् | सुबा० ९.१५ |
| मांसासृक्पूयविण्मूत्र | ना०परि० ४.२७ | य एवं विदित्वा | ना०परि० ९.१४ |
| मांसासृक्पूयविण्मूत्रस्नायु | ना०परि० ३.४८ | यजुर्वेदोऽन्तरिक्षम् | ब्र०वि० ५ |
| माता पिता भ्राता | सुबा० ६.४ | यज्ञेन यज्ञमयजन्त | म०वा० १० |
| मातापित्रोर्मलोद्भूतम् | अध्या० ६ | यज्ञोपवीतम् | ब्रह्म० ५ |
| मातृसूतक संबन्धम् | मैत्रे० २.७ | यतीनां तदुपादेयम् | याज्ञ० ३३ |
| माद्यति प्रमदाम् | ना०परि० ६.३५ | यतेः संव्यवहाराय | संन्या० २.१०० |
| माधूकराम् .... | संन्या० २.८३ | यतो निर्विषयस्यास्य | ब्र०बि० ३ |
| मानापमानहीनोऽस्मि | मैत्रे० ३.४ | यतो वाचो निवर्तन्ते....बुधः | ब्रह्म० २२ |
| मा भव ग्राह्य भावात्मा | मैत्रे० २.२८ | यतो वाचो निवर्तन्ते... भावतः | कं०रु० ३६ |
| मायया मोहिताः | पं०ब्र० २४ | यतो वाचो निवर्तन्ते .. यत्केवलं | शाण्डि० २.४ |
| मायामात्रविकास ... | आ०बो० २.२० | यत्किंचिदपि हीनोऽस्मि | मैत्रे० ३.१७ |
| मायाविद्ये विहायैव | अध्या० ३२ | यत्तत् तत्पुरुषम् | पं०ब्र० १५ |
| मायोपाधिर्जगद्योनिः | अध्या० ३० | यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा | कैव० १६ |
| मायोपाधिविनिर्मुक्तम् | कं०रु० ४३ | यत्र ज्योतिरजस्रम् | आ०बो० १.८ |
| मारुतं मरुतां स्थाने | यो०त० ९६ | यत्र यत्र मृतो ज्ञानी | पैङ्ग० ४.१९ |
| मारुते मध्यसंचारे | शाण्डि० १.७.१० | यत्र लोका न लोका | ब्रह्म० २ |
| मा शोचीरात्मविज्ञानी | शाण्डि० २.६ | यत्र सुप्ता जनाः | याज्ञ० ३१ |
| माषमात्रम् | कुण्डि० १९ | यत्रास्तमितशायी | ना०परि० ५.४१ |
| माषापूपादि | संन्या० २.९४ | यत्रैष जगदाभासो | अध्या० १० |
| मासमात्रम् | जा०द० ६.२९ | यत्सत्यं विज्ञानम् | शाण्डि० ३.१.४ |
| मासमेकम् | शाण्डि० १.७.५० | यथा जले जलम् | पैङ्ग० ४.१५ |
| मिताहारो | शाण्डि० १.१.१३ | यथा जातरूपधरा | याज्ञ० ८ |
| मित्रादिषु समो | ना०परि० ६.२९ | यथा जातरूपधरो | जाबा० ६.३ |
| मुदितामुदिताख्योऽस्मि | मैत्रे० ३.१६ | यथोनिरिन्धनो | मैत्रे० १.७ |
| मुनिः कौपीनवासाः | ना०परि० ४.३१ | यथा निर्वाणकाले | क्षुरि० २३ |
| मुमुक्षुः परहंसाख्याः | ना०परि० ६.२५ | यथाऽपकृष्टम् | अध्या० १५ |
| मूलाधारादारभ्य | मं०ब्रा० १.२.६ | यथा मूढो यथा | यो०त० ७७ |
| मृता मोहमयी | मैत्रे० २.१३ | यथा रज्जौ निष्क्रियायाम् | आत्म० २७ |
| मृद्वार्बलाबूफलीपर्णपात्रम् | शाट्या० २१ | यथा रविः सर्वरसान् | अव० ९ |
| मेढ्रादुपरि निक्षिप्य | जा०द० ३.९ | यथावद्वायुचेष्टाम् | जा०द० ४.१२ |
| मेरुशृङ्गतटोल्लासिगंगा | याज्ञ० १६ | यथा वा चित्त ... | यो०त० ७३ |
| मोक्षदस्तु परम् | ब्र०वि० ५३ | यथा सिंहो | शाण्डि० १.७.६ |
४१८ मन्त्रानुक्रमणिका
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| यथेष्टधारणात् | शाण्डि० १.७.८ | यस्मिन्विलीयते | ब्रह्मवि० १३ |
| यथेष्टधारणाद्वायोः | यो०त० ५० | यस्मिन्शान्तिः | ना०परि० ३.२१ |
| यथेष्टमेव | यो०त० १११ | यस्य देवे परा भक्तिः | शाट्य० ४० |
| यथैवायमन्वन्तो | ना०परि० ६.८ | यस्य नाहंकृतो | संख्या० २.५५ |
| यद् तु विदितम् | ना०परि० ३.१७ | यस्य वर्णाश्रमाचारो | ना०परि० ६.१६ |
| यदा न कुरुते | ना०परि० ३.२२ | यस्य वाङ्मनसी शुद्धे | ना०परि० ३.३१ |
| यदा पश्यति | जा०द० १०.१२ | यस्य श्रवण | पं०ब्र० ३४ |
| यदा पिङ्गलया | जा०द० ४.४७ | यस्य संकल्पनाशः | मं०ब्रा० २.३.६ |
| यदा मनसि चैतन्यं | जा०द० १०.९ | यस्य स्त्री तस्य | याज्ञ० २३ |
| यदा मनसि वैराग्यम् | मैत्रे० २.११ | यस्यैतानि सुगुप्तानि | ना०परि० ३.१४ |
| यदा भवसि संजातं | ना०परि० ३.१२ | यास्येवम् | जा०द० १०.८ |
| यदा यात्युन्मनोभावः | पैङ्ग० ४.२७ | यस्सकृदुच्चारणः | द्वयो० ७ |
| यदा सर्वाणि....स्माद्भिस्यो | जा०द० १०.११ | याज्ञवल्क्यो महाद्युतिः | मं०ब्रा० ३.१.१ |
| यदा सर्वाणि .....स्वात्मन्येव | जा०द० १०.१० | याज्ञवल्क्यो ह वै | मं०ब्रा० १.१.१ |
| यदिदं ब्रह्मपुच्छाख्यम् | कंठ० २७ | यात्रमात्रं तु यो | यो०त० १२६ |
| यदि वा कुरुते | ना०परि० ३.२९ | यावच्चोपाधि | पैङ्ग० ४.११ |
| यदॄच्छालाभतो | जा०द० २.५ | यावद्वा शक्यते | जा०द० ६.५ |
| यदच्छोपगतं | यो०त० ७० | याऽस्य प्रथमा रेखा | जापालि० २१ |
| यद्युत्तरोत्तरभावे | अध्या० २९ | युक्ते युक्तम् | शाण्डि० १.७.७ |
| यत्र सन्तं न चासन्तम् | ना०परि० ४.३३ | युञ्जन्न परदायादि | यज्ञा० २६ |
| यन्मनसित्रजगत् | मं०ब्रा० ५.१.५ | ये च संतानजा | संन्या० २.११ |
| यन्मायया मोहित० | मैत्रे० २.२५ | येऽत्राधिकारिणो | अव० १६ |
| यः पिता स पुनः | यो०त० १३३ | येन केन प्रकारेण | जा०द० ३.१२ |
| यमनियमयुतः | शाण्डि० १.५.१ | येन केन चात्मनेन | शाण्डि० १.३.१३ |
| यमनियमासनाभ्यास ... | शाण्डि० १.३.१५ | येन प्रकाशते | पं०ब्र० २५ |
| यमाद्यष्टाङ्गसंयुक्तः | जा०द० ५.३ | येन भूधरसिद्धि | यो०त० ५९ |
| यमेवैष विद्यात्तुचिम् .. | शाट्य० ३७ | येन मार्गेण | शाण्डि० १.७.३६-ग |
| यः शास्त्रद्रियधर्षेत | कैव० २५ | येन सम्यक्परिज्ञाय | सांख्या० २.५७ |
| यः शरीरेन्द्रियादिभ्यो | ना०परि० ६.१३ | येन सर्वमिदम् | पं०ब्र०९, ब्रह्म० ८ |
| यशस्विन्या | जा०द० ४.३७ | येन सर्वमिदम् | ना०परि० ३.८३ |
| यशस्विन्याः कुहोर्मध्ये | जा०द० ४.१६ | येन सर्वमिदं प्रोतम् | ब्रह्म० ८ |
| यः शृणोति सकृदपि | मैत्रे० ३.२५ | येनार्थवानि तं किम् | आत्म० १० |
| यस्तु द्वादशसाहस्रम् | संन्या० २.१२३ | येनानृतं सर्वमिदम् | ना०परि० ९.२० |
| यस्माज्जातो | यो०त० १३२ | येनासनं विजितम् | शाण्डि० १.३.१४ |
| यस्मात्सर्वमभूतोति | शाण्डि० ३.२.४ | योगतत्त्वं प्रवक्ष्यामि | यो०त० १ |
| यस्मात् सुदुर्धरम् | शाण्डि० ३.२.८ | योगध्यानं सदा | ब्र०वि० ५१ |
| योगयज्ञाः सर्वेऽताः | मं०ब्रा० | ||
| यस्मिन् गृहे विशेषेण | ना०परि० ६.१२ | योगे कुम्भकनाम्न्याथ | यो०त० ६१ |
| यस्मिन्निदमोतम् | शाण्डि० २.३ | योगी हि ज्ञानहीनस्तु | यो०त० १५ |
मन्त्रानुक्रमणिका ४९९
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| योगो हि बहुधा | यो०त० १९ | वर्णं रक्तम् | पं०ब्र० १७ |
| योऽग्रौ रुद्रो | अथ० ६ | वर्णाश्रमं सावयवं | मैत्रे० १.१८ |
| योऽतीत्य स्वाश्रमान् | ना०परि० ६.१७ | वर्णाश्रमाचारयुता | मैत्रे० १.१७ |
| योनिं वामेन | शाण्डि० १.३.७ | वर्षाभ्योऽन्यत्र | संन्या० २.९९ |
| योऽन्तः शीतलया | संन्या० २.५६ | वह्निस्त्रिकोणम् | यो०त० ९५ |
| यो भवेत्पूर्वसंन्यासी | याज्ञ० १० | वाक्पाणिपाद... | शारी० ३ |
| योऽयमन्त्रमयः | कं०रु० २४ | वाक्यमप्रतिबद्धं | अध्या० ४० |
| यो विलङ्घ्याश्रामान्वर्णान् | अव० ३ | वाक्सिद्धिः कामरूपत्व | यो०त० ७४ |
| यो वै रुद्रः स भगवान् | अथ० २ | वागध्यात्मम् | सुबा० ५.१० |
| रथ्यायां बहुवस्त्राणि | संन्या० २.११८ | वागेवास्या | कौ०ब्रा० ३.५ |
| रसनाद्वायुमाकृष्य | शाण्डि० १.७.४५ | वाग्दण्डः कर्मदण्डश्च | ना०परि० ६.९ |
| रसना पीड्यमानेयम् | ब्र०वि० ७३ | वाग्दण्डे मौनम् | संन्या० २.११६ |
| रागं द्वेषं मदम् | ना०परि० ३.७० | वाचमेवाप्येति | सुबा० ९.६ |
| राग द्वेष वियुक्तात्मा | ना०परि० ३.३४ | वाचिकोपांशुरुच्चैश्च | जा०द० २.१४ |
| रागाद्यपेतम् | जा०द० २.८ | वातजाः पित्तजा | जा०द० ६.३० |
| रागाद्यसंभवे | जा०द० ६.५१ | वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां | ना०परि० ५.४६ |
| राजवार्तादि | ना०परि० ३.५८ | वानप्रस्था अपि | आश्रमो० ३ |
| रिपौ बद्धे स्वदेहे | याज्ञ० २८ | वामदेवम् | पं०ब्र० १० |
| रुद्रग्रन्थिर्भ्रुवोर्मध्ये | ब्र०वि० ७१ | वामपादपाष्णिं | शाण्डि० १.७.४२-घ |
| रेचयेत्पिङ्गलानाड्या | यो०त०४२ | वामपादमूलेन | शाण्डि० १.७.४२-ग |
| लक्ष्यालक्ष्य विहीनो | मैत्रे० ३.१३ | वामाङ्गेन | यो०त० ११४ |
| लक्ष्येऽन्तर्बाह्यायां | मं०ब्रा० १.३.५ | वामांसदक्षकट्यन्तम् | प०ब्र० १५ |
| लब्धात्मा जिह्वया | संन्या० २.३३ | वायुना गतिमावृत्य | यो०त० ११६ |
| लभते योगयुक्तात्मा | यो०त० १४० | वायुनां सह चित्तम् | यो०त०८३ |
| लभ्यते यदि | यो०त० १२७ | वायुपरिचितो | यो०त०८२ |
| लययोगश्चित्तलयः | यो०त० २३ | वायुभक्षोऽम्बुभक्षो | कुण्डि० ४ |
| लवणं सर्षपम् | यो०त०४७ | वारिवत्स्फुरितं | यो०त० १० |
| लिङ्गदेहगता | आ०बो० २.२४ | वायुस्तेजस्तथा | ब्र०वि० १४ |
| लिङ्गे सत्यपि | ना०परि० ४.३२ | वारुणे वायुमारोप्य | यो०त० ८९ |
| लीनवृत्तेरनु० | अध्या० ४२ | वासनानुदयो भोग्ये | अध्या० ४१ |
| लोकत्रयेऽपि कर्तव्यम् | जा०द० १.२४ | विक्षेपो नास्ति | अव० २३ |
| लोकवद्धार्ययाऽऽसक्तो | कुण्डि० ७ | विचार्य सर्वधर्मेषु | हंस० २ |
| लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा | अध्या० ३ | विचित्रा शक्तयः | संन्या० २.४२ |
| वक्रेण सीत्कार | शाण्डि० १.७.१३-३ | विजानाति तदा तस्य | कं०रु० ३३ |
| वज्र सूचीं प्रवक्ष्यामि | व०सू० १ | विज्ञात ब्रह्मतत्त्वस्य | अध्या० ४८ |
| वत्सराद्ब्रह्मविद्वान्स्यात् | जा०द० ६.११ | विज्ञानोऽस्मि | मैत्रे० ३.३ |
| वमनाहारवद्यस्य | मैत्रे० २.१८ | विज्ञेयोऽक्षर तन्मात्रो | पैङ्ग० ४.२३ |
| वर्जयित्वा | यो०त० ६२ | विदित्वा स्वात्मरूपेण | कं०रु० ३९ |
| वर्णत्रयात्मकाः | जा०द० ६.२ | विद्याभ्यासे प्रमादो | संन्या० २.१०३ |
६२० मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण विद्वान्स्वदेश .. मैत्रे० २.११ वेदतत्त्वार्थं विहितम् क्षुरि० २ विधिवत्प्राण.... शाण्डि० १.७.९ वेदलौकिक मार्गेषु जा०द० २.१० विधूमे च प्रशान्ताग्नौ ना०परि० ६.१० वेदशास्त्राणि ब्र०वि० ३० विधूमे सन्नमूसले संन्या० २.९१ वेदादेव विनिर्मोक्षः जा०द० १.१८ विध्युक्तकर्मसंक्षेपात्संन्यास ... ना०परि० ३.९ वेदान्त विज्ञान ... कैव० ४ विना प्रमाणं सुष्ठुत्वम् आत्मो० ६ वेदान्ताभ्यास निरतः ना०परि० ६.२७ विनायकं जा०द० ६.४० वेदैरनेकैरहमेव वेद्यो कैव० २२ विनियोगान्नप्रवक्ष्यामि जा०द० ६.२१ वेदोक्तेन ...कृच्छ्र .... जा०द० २.३ विपरीतं ब्रह्मचर्यम् कं०रु० ११ वेदोक्तेन ..विना जा०द० १.७ विपर्यस्तो निदिध्यासे अव० १९ वेद्योऽहमागमान्तैरा० आ०बो० २.८ विभक्तो ह्ययमादेशो ना०परि० ८.२१ वैराग्य संन्यासी संन्या० २.१८ विभेदजनके जा०द० ४.६३ वैराग्यस्य फलम् अध्या० २८ विमुक्तोऽहम् ब्र०वि० १०३ व्यवहारो लौकिको अव० २५ विरक्तः प्रव्रजेद्धीमान्सरक्तस्तु ना०परि० ३.१३ व्याघ्र बुद्ध्या अध्या० ५४ विरक्तस्य तु जा०द० ६.४७ व्यात्तवक्त्रो शाण्डि० १.३.६ विरज्य सर्वभूतेभ्यः ना०परि० ६.२० व्यानः श्रोत्राक्षिमध्ये जा०द० ४.२८ विरलत्वं व्यवहृतेरिष्टम् अव० २२ व्यावृत्तानि परम् कं०रु० ३८ विराट् प्रणवः ना०परि० ८.३ व्रतं नाम शाण्डि० १.२.११ विविक्तदेशे च कैव० ५ व्रतयज्ञतप ... संन्या० २.७ विविदिषासंन्यासी ना०परि० ४.३९ शक्तिमध्ये मनः शाण्डि० १.७.१८ विवेकयुक्तबुद्ध्याऽहम् आ०बो० २.११ शङ्खिनी नाम जा०द० ४.२२ विशीर्णान्यमलान्येव ना०परि० ३.३० शतं कुलानां प्रथमम् शाट्या० ३३ विश्वजित्प्रथमः पादः ना०परि० ८.१२ शनैः पिङ्गलया जा०द० ६.६ विश्वाधिकोऽहम् ब्र० वि० १०४ शब्दकाललयेन मं०ब्रा० २.२.४ विश्वाय कुण्डि० १४ शब्दमायावृतो यावत् ब्र०बि० १५ विश्वोदराभिधा जा०द० ४.२३ शब्दस्पर्शरूप .... शारी० ६ विश्वोदराभिधायास्तु जा०द० ४.३९ शब्दस्पर्शश्च शारी० १९ विषं चैवायुधम् संन्या० २.१०७ शब्दस्पर्शादयो मैत्रे० १.५ विषयव्यावर्तन ... मं०ब्रा० १.१.८ शब्दाक्षरं परम् ब्र०बि० १६ विषयानन्दवाञ्छा आ०बो० १६ शरीरं तावदेव जा०द० ४.१ विषयी विषयासक्तो ब्र०वि० ५० शरीरस्थं प्राणम् शाण्डि० १.४.३ विषयेभ्य इन्द्रियार्थेभ्यो मं०ब्रा० १.१.७ शरीरान्तर्गताः शाण्डि० १.३.१२ विषुवायन कालेषु जा०द० ४.५५ शरीर्यप्यशरीरेषु आत्म० १४ विष्ठितो मूत्रितो ना०परि० ५.५५ शाटीद्वयम् ना०परि० ७.६ विष्णुं ध्यायतु अव० २८ शाण्डिल्यो ह वा शाण्डि० १.१.१ विष्णुर्नाम महायोगी यो०त० २ शास्त्रज्ञानात्पापपुण्य . संन्या० २.२० विष्णुलिङ्गं द्विधा शाट्या० ९ शास्त्रज्ञानात्पापपुण्यलोक ना०परि० ५.४ वीराध्वाने वानाशके जाबा० ५.२ शिखाज्ञानमयी ब्रह्म० १४ वृत्तयस्तु तदानीन्यमप्यज्ञाता अध्या० ३६ शिखा ज्ञानमयी ना०परि० ३.८९
मन्त्रानुक्रमणिका ४२१ मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण शिखा ज्ञानमयी यस्य शाट्या० १८ संधिंश्च विग्रहो संन्या० २.१०६ शिखा तु दीप .... ब्र०वि० ९ संन्यस्तमिति शाट्या० ३५ शिरोमध्यगते जा०द० ६.३७ संन्यस्याग्निम् कं०रु० ४ शिरोरोगा जा०द० ६.३२ संन्यासभेदैराचारभेदः ना०परि० ५.२ शिव एव स्वयं आत्मो० २० संन्यासं पातयेद्यस्तु संन्या० २.३ शिवमात्मनि जा०द० ४.५९ संन्यासः षड्विधो...कुटीचको ना०परि० ५.१२ शिष्याणाम् संन्या० २.१०२ संन्यासिनम् संन्या० २.९ शिष्याश्च यो०त० ७८ संन्यासे निश्चयम् संन्या० २.२ शीतोष्णाहार ... मं०ब्रा० १.१.३ संपीड्य सीविनीम् शाण्डि० १.३.९ शीर्षोपरि मं०ब्रा० १.२.१० सम्पूर्णकुम्भवद्वायोर्धारणम् जा०द० ६.१३ शुचौ देशे सदा ना०परि० ४.१८ संप्रत्यवसितानाम् संन्या० २.६ शुद्धज्ञानामृतम् ब्र०वि० ४६ संभाषणं सह ना०परि० ६.३६ शुद्धमानसः पैङ्ग० ४.१२ संभूतैर्वायु कुण्डि० २१ शुद्ध स्फटिकसंकाश धृत.. यो०त० १०० संमाननं परां हानिं ना०परि० ५.५६ शुद्धस्फटिक संकाशम् यो०त० ९० संमानाद्ब्राह्मणो ना०परि० ३.४० शुद्धोऽहमद्वयोऽहम् आ०बो० २.९ संयुक्तमेकताम् आत्म० २४ शुद्धोऽहमान्तरोऽहम् आ०बो० २.१० संयुक्तमेतत्क्षरम् ना०परि० ९.८ शून्येष्वाववकाशेषु ना०परि० ६.६ संविभज्य कुण्डि० ३ शृण्वन्त्वज्ञाततत्त्वास्ते अव० १८ संशान्तसर्वसंकल्पा मैत्रे० २.३० शोकमोह विनिर्मुक्तम् आ०बो० १.५ संसारदोषदृष्ट्यैव ना०परि० ६.२८ श्मशानेषु दिगन्तेषु याज्ञ० १७ संसारमेव निःसारम् ना०परि० ३.१५ श्रद्धालर्मुक्तिमार्गेषु ना०परि० ६.२१ स आगच्छतीत्यम् कौ०ब्रा० १.५ श्री पर्वतं शिरः स्थाने जा०द० ४.४८ स एतं देवयानं कौ०ब्रा० १.३ श्रुत्या यदुक्तम् ब्र०वि० ३२ स एतेन प्रज्ञेनात्मना आ०बो० १.७ श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च ना०परि० ३.३८ स एव माया कैव० १२ श्रोत्रमध्यात्मम् सुबा० ५.२ स एव लययोगः यो०त० २४ श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी शारी० १८ स एव संसारतारणाय मं०ब्रा० २.४.४ श्रोत्रमेवाप्येति सुबा० ९.२ स एव सर्वम् कैव० ९ श्रोत्रादीनि शारी० २ स एष जगतः कं०रु० १२ श्रोत्रियान्नम् संन्या० २.८२ सकले सकलो ब्र०वि० ३९ षट्संख्यया अहोरात्र हंस० ११ सकारं च हकारम् ब्र०वि० १६ षड्विकारविहीनोऽस्मि मैत्रे० ३.१८ स खल्वेवं यो आरु० ५ षण्ढोऽथ विकलोऽप्यन्धो ना०परि० ३.३ सखा मा गोपायेति संन्या० २.१२ षष्टिं कुलान्यतीतानि संन्या० २.१० सगुणं ध्यानमेतत् यो०त० १०५ संकल्पपादपम् संन्या० २.७० सच्चिदानन्दमात्रोऽहम् ब्र०वि० १०९ संकल्पादिकं मं०ब्रा० २.४.५ स तं होवाच साधु जाबालि० ३ संकल्पोऽध्यवसायश्च कं०रु० १० स तज्ज्ञो बालोन्मत्त .... मं०ब्रा० ५.१.७ संत्यजेत्सर्वकर्माणि ना०परि० ६.३९ स तमुवाच यथा जाबालि० १५ संदिग्धः सर्वभूतानां ना०परि० ४.३५ स तेन पृष्टः सर्वम् जाबालि० ११
४२२ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण स तेषां सत्त्वांशम् पैङ्ग० १.९ सर्वदेवमयम् पं०ब्र० २० सत्कर्मपरिपाकतः पैङ्ग० २.१७ सर्वदेवस्य मध्यस्थो ब्र०वि० ६२ सत्त्वमथाहय प०ब्र० ३ सर्वपरिपूर्णं तुरीयातीत मं०ब्रा० २.५.१ सत्त्वसमष्टित पैङ्ग० १.१० सर्वपापविनिर्मुक्तः जा०द० ६.१९ सत्यं ज्ञानमनन्तम् जा०द० २.९ सर्वपापानि जा०द० ७.१० सत्यज्ञानं सात्त्विकम् शारी० १३ सर्वप्रकाशरूपोऽस्मि मैत्रे० ३.२१ सत्यमित्युपनिषत् जाबालि० २३ सर्व भावान्तरस्थाय संन्या० २.४१ सत्यसत्यादिहीनोऽस्मि मैत्रे० ३.२३ सर्वभूतस्थमात्मानम् कैव० १० सत्यमूर्द्धं स्यतः अध्या० ६४ सर्वभूतस्थमेकम् आ०चो० १.४ सदा समाधिं कुर्वीत ब्र०वि० ६५ सर्वभूतस्थितं देवम् ब्र०वि० ७७ सदा साक्षिस्वरूप ... जा०द० १०.५ सर्वभूतहितः ना०परि० ३.५५ सद्गुरुसमीपे प०प० २ सर्वभूताधिवासं च ब्र०वि० २२ सद्रूपं परमं ब्रह्म कं०रु० ३२ सर्वभूतान्तरात्म्य ब्र०वि० १०५ सन्ध्ययोर्ब्राह्मणः शाण्डि० १.७.४६ सर्व काण्वावसम् पं०ब्र० ३७ स एवम्भूतानाम् पैङ्ग० १.८ सर्वं पञ्चात्मकम् पं०ब्र० ३१ स पुनस्तम् जाबालि० १४ सर्वं सत्यं परम् जा०द० १.१० स बाह्याभ्यन्तरम् मं०ब्रा० ४.१.३ सर्वरोगनिवृत्तिः जा०द० ६.२४ स ब्रह्मा स शिवः कैव० ८ सर्वरोगविनिर्मुक्तो जा०द० ६.२३ समग्रीवशिरः कायः जा०द० ३.३ सर्वलोकस्तुतिपात्रः मं०ब्रा० २.५.२ समदुःखसुखः ना०परि० ५.६४ सर्वलोकात्मकः अव० १५ समस्तसाक्षी सर्वात्मा ब्र०वि० १०७ सर्वलोकेषु यो०त० १०९ समाधातुं बाह्यदृष्ट्या अध्या० ६० सर्वं विप्रहरे यो०त० ६४ समाधिः समतावस्था यो०त० १०७ सर्ववेदान्त सिद्धान्तसारम् कं०रु० ४७ समाधौ मृदिते ... मं०ब्रा० २.३.४ सर्वव्यापारमुत्सृज्य यो०त० ७९ समासक्तं यथा चित्तम् शाट्या०२; मैत्रे० १.११ सर्वव्यापिनमात्मानम् आत्म० २३ समुद्रे लीयते जा०द० १०.७ सर्वशरीरेषु मं०ब्रा० १.१.९ समुन्नतःशिरः पादो जा०द० ३.११ सर्वस्य धातारम् ना०परि० ९.१८ समुन्नतशिरः पादो शाण्डि० १.३.११ सर्वाक्षरमयः ना०परि० ८.५ सम्यक्क्षय मे जा०द० ५.१ सर्वाजीवे सूर्यसंस्थे ना०परि० ९.६ स यदा प्राणेन सुबा० ४.२ सर्वात्मकोऽहम् कुण्डि० २६ स यदाऽऽरुक्षकच्छरीरात् कौ०ब्रा० ३.४ सर्वाधारः परम् ना०परि० ८.४ सरस्वती जा०द० ४.२१ सर्वाधिष्ठानसन्मात्रः ब्र०वि० ११० सरस्वती कुहूश्चैव जा०द० ४.१४ सर्वान्कामान्परित्यज्य प०हं० ३ सर्वकारणमव्यक्तम् जा०द० ८.९ सर्वान्तरः स्वयंज्योतिः ब्र०वि० १०६ सर्वज्ञेशो पैङ्ग० १.१२ सर्वायुधैर्धृताकारम् यो०त० १०१ सर्वत्रपूर्वकरूपो मैत्रे० ३.१२ सर्वेन्द्रियविहीनोऽस्मि मैत्रे० ३.१५ सर्वदा समरूपोऽस्मि मैत्रे० ३.२४ सर्वेषां प्राणि० श्व० १-क सर्वदुष्टप्रशमनम् पं०ब्र० ९ सर्वेषामेव गन्धानाम् सुबा० १३ २
मन्त्रानुक्रमणिका ४२३
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| सर्वेषामेव पापानाम् | संन्या० २.११२ | स होवाच..स्तनयित्नौ | कौ०ब्रा० ४.५ |
| सर्वेषु कालेषु | प०प० ३-ग | स होवाच..स्थूल.. | पैङ्ग० २.२ |
| सर्वेषु देहेषु | हंस० ५ | स होवाचाकाशं | मं०ब्रा० ४.१.२ |
| सर्वोपाधिविनिर्मुक्तम् | कं०रु० ४६ | स होवाचाथर्वा अथेद्ं | शाण्डि० १.४.२ |
| सविषयं मनो बन्धाय | मं०ब्रा० ५.१.१ | स होवाचाथर्वा यस्माच्च | शाण्डि० ३.२.२ |
| सव्यदक्षिणनाडीस्थो | शाण्डि० १.७.४० | स होवाचाथर्वा | शाण्डि० २.२ |
| सव्येतरेण | जा०द० ६.३९ | स होवाचाथर्वा सत्यम् | शाण्डि० ३.१.२ |
| सव्ये दक्षिणगुल्फम् | शाण्डि० १.३.२ | सांकृति..नाडी | जा०द० ५.२ |
| सशरीरं समारोप्य | ना०परि० ८.८ | सांकृते..योगम् | जा०द० १.४ |
| सशिखं वपनम् | ब्रह्म० ६,प०ब्र० ६, | सा कालपुत्रपदवी | ना०परि० ३.४९ |
| ना०परि० ३.८१ | साक्ष्यनपेक्षोऽहम् | आ०बो० २.३ | |
| सशिखान्केशान् | कं०रु० २ | सात्त्विकराज ... | शारी० ७ |
| स संन्यासः षड्विधो | संन्या० २.२३ | सा त्याज्या | ना०परि० ३.५० |
| स साध्वसाधुकर्मभ्याम् | कं०रु० ४० | साध्यन्वज्रकुम्भानि | ब्र०वि० ७५ |
| सह तेनैव | कुण्डि० ५ | साधुभिः पूज्यमाने० | अध्या० ४७ |
| सहस्रभानुमच्छुरिता | म०वा० ७ | सान्निध्ये विषयाणां | ना०परि० ३.६८ |
| सहस्रमेकम् | ब्र०वि० ७९ | सा पुनर्विकृतिम् | पैङ्ग० १.४ |
| सहस्रारे जलज्योति .... | मं०ब्रा० १.४.१ | सामवेदस्तथा | ब्र०वि० ६ |
| स होवाच..अमानित्वादि | पैङ्ग० ४.२ | सा शक्तिर्येन | शाण्डि० १.७.३६-घ |
| स होवाच ..आकाशे | कौ०ब्रा० ४.६ | सा सत्यता सा शिवता | संन्या० २.६२ |
| स होवाच..आदर्शे | कौ०ब्रा० ४.१० | सा हि वाचामगम्य | संन्या० २.४४ |
| स होवाच..आदित्ये | कौ०ब्रा० ४.२ | सिंहासनं भवेत् | जा०द०३.६-३ |
| स होवाच एवैषोऽग्नौ | कौ०ब्रा० ४.८ | सिंहो वा योगिना | यो०त० ६० |
| स होवाच एवैषोऽप्सु | कौ०ब्रा० ४.९ | सिद्धमन्त्रम् | संन्या० २.८८ |
| स होवाच ... चन्द्रमसि | कौ०ब्रा० ४.३ | सुखदुःखैः समायुकम् | यो०त० ११ |
| स होवाच...छाया .. | कौ०ब्रा० ४.१३ | सुखम् ह्यवमतः | ना०परि० ३.४१ |
| स होवाच..तत्त्वमसि | पैङ्ग० ३.२ | सुखाद्यनुभवो | अध्या० ४९ |
| स होवाच..दक्षिणेऽक्षन् | कौ०ब्रा० ४.१६ | सुखासनवृत्ति ... | मं०ब्रा० १.१.५ |
| स होवाच नारायणः | मं०ब्रा० १.१.२ | सुखासनसमारूख्यं | जा०द० ३.२ |
| स होवाच प्राणोस्मि | कौ०ब्रा०३.२ | सुखासनस्थो | शाण्डि० १.७.१३-१ |
| स होवाच..प्राज्ञ .. | कौ०ब्रा० ४.१५ | सुखी भवति सर्वत्र | कं०रु० २८ |
| स होवाच..प्रति.. | कौ०ब्रा० ४.११ | सुजीर्णोऽपि | संन्या० २.१०९ |
| स होवाच ये वै | कौ०ब्रा० १.२ | सुलभश्चायमत्यन्तम् | संन्या० २.५० |
| स होवाच ..वायौ | कौ०ब्रा० ४.७ | सुषिरो ज्ञानजनकः | शाण्डि० १.७.३९ |
| स होवाच..विद्युति | कौ०ब्रा० ४.४ | सुषुप्तिसमाध्योः | मं० ब्रा० २.३.३ |
| स होवाच...शब्दः | कौ०ब्रा० ४.१२ | सुषुम्ना तु परे | क्षुरि० १६ . |
| स होवाच ...शारीरः | कौ०ब्रा० ४.१४ | सुषुम्ना पिङ्गला | जा०द० ४.७ |
| स होवाच ...सदेव | पैङ्ग० १.२ | सुषुम्नायाः शिवो | जा०द० ४.३५ |
| स होवाच..सव्येऽक्षन् | कौ०ब्रा० ४.१७ | सुषुम्नायाः सव्यभागे | शाण्डि० १.४.११ |
४२४ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण || मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण सूक्ष्मातिसूक्ष्मम् | पो०त० ३३ || स्वरूपाभूत आनन्द. | कं०रु० ३५ सूक्ष्मभुक् चतुरस्रपाथ | ना०परि० ८.१३ || स्वरूपानुसंधान .. | संन्या० २.७५ सूचनात्सूत्रम् | ना०परि० ३.८२ || स्वरेण संन्धयेद्योगम् | ब्र०त्रि० ७ सूचनात्सूत्रमित्याहुः | ब्रह्म० ७ || स्वल्पोऽपि योगो | आ०बो० २.२९ सूत्रमन्तर्गतम् | ब्रह्म०१०, प०ब्र०११ || स्वव्यतिरिक्तम् | संन्या० २.७६ सूत्रमन्तर्गतं येषाम् | ना०परि० ३.८५ || स्वस्तिके गोमुखम् | जा०द० ३.१ सूर्यमण्डलमध्योऽथ | ब्र०वि० ७ || स्वस्तिक गोमुख ... | शाण्डि० १.३.१ सूर्यस्य ग्रहणम् | ब्र०वि० ५७ || स्वस्य क्रमेणैव | प०प० ३ १ मूर्यालोकपरिस्यन्द . | शाण्डि० १.७.२६ || स्वस्वरूपतः | ना०परि० ९.२३ 'मेर्वाधिः परिणोयैनम् | ना०परि० ६.२२ || स्वात्मनेव | आत्म० १२ सोऽग्रे भूतानाम् | सुबा० १.४ || स्वात्मन्यारोपित ... | अध्या० ११ सोऽन्ते वैश्वानरो | सुबा० २.४ || स्वात्मन्येव सदा | अध्य० ४ सोमसूर्यद्वयोर्मध्ये | शाण्डि० १.७.४२-क || स्वात्मवत्सर्वभूतेषु | जा०द० १.१५ सोऽविमुक्तः प्रतिष्ठित् | जाबा० २.२ || स्वानुभूत्या स्वयम् | अध्य० ६५ सोऽहमर्कः परम् | म० वा० ११ || स्वेनावृतं सर्वमिदं | ना०परि० ९.२० सोऽहं ब्रह्म | जा०द० १०.६ || स्वैरं स्वैरविहरणम् | अव० ७ सौनालबीज ... | सुबा० १६.१ || हंस एव परम् | ब्र०त्रि० ६१ स्त्रीणामबाञ्छतेशास्य | ना०परि० ४.२८ || हंस ज्योतिरनूपम्यम् | ब्र०वि० ६४ स्थानत्रयव्यतीतोऽहम् | ब्र०वि० १०८ || हंसविद्यामृते | ब्र०वि० २६ स्थानानि स्थानिभ्यो | सुबा० ५.१ || हंसः शुचिषद्सुः | ना०परि० ५.१० स्थावरं जङ्गमम् | संन्या० २.११० || हंसे हंसेति यो | ब्र०वि० ३४ स्थिराङ्गमद्रुतम् | क्षुरि० ६ || हंसो जटाधारी | ना०परि०५.१४,, संन्या० २.२६ स्थूलदेहगता | आ०बो० २.२३ || हयवरनकागरूढम् | ज०द० ८.३ स्नाने त्रिक्षपणं प्रोक्तम् | ना०परि० ४.२२ || हस्तमेवाप्येति | सुत्रा० १.७ स्नानं पानम् .. नदीपुलिशायो | कं०रु० ७ || हस्तावधाव्यत्वम् | सुबा० ५.१९ स्नानं पानम् .. स्तूयमानो | कुण्डि० १२ || हस्ती जामो | जा०द० ३.६-२ स्पष्टकामो जगद्योनि | पैङ्ग० १.७ || हितास्ति पशोरामम् | ना०परि० ३.६७ स्वचित्तनिर्जिता | संन्या० २.७१ || हिरण्यगर्भाधिक्षित .. | पैङ्ग० १.६ स्वदेहमनिनिर्मोचो | जा०द० १.२७ || हिरण्य ज्योतिः | सुबा० २.३ स्वदेशस्य | कुण्डि० २२ || हृत्पद्ममध्ये | आ०बो० १.६ स्वप्नेऽपि यो हि | ना०परि० ५.१२ || हृत्पुण्डरीकमध्ये | मैत्रे० १.१२ स्वप्ने स जीवः | कैव० १२ || हृत्पुण्डरीकं विरजं | कैव० ६ स्वप्रकाशचिदानन्दम् | ब्र०वि० २१ || हृदयं निर्मलम् | पैङ्ग० ४.१४ स्वप्रकाशमधिष्ठानम् | अध्या० ८ || हृदयस्य मध्ये | सुबा० ४.१ स्वप्रकाशे परानन्दे | आ०बो० २.२६ || हृदयादिकण्ठ ... | शाण्डि० १.७.१३-२ स्वमसङ्गमुदासीनम् | अध्या० ५१ || हृदाकाशेचिदादित्यः | मैत्रे० २.१४ स्वमुखेन | जा०द० ४.१३ || हृदिस्था देवता | ज्ञान० ४ स्वमेव सर्वतः | कुण्डि० २७ || हीनंधा ज्ञानविज्ञाने | ना०परि० ४.१२ स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः | अध्या० २० स्वयौनाबुपशान्तस्य | मैत्रे० १.८ ॥ इति मन्त्रानुक्रमणिका समाप्ता ॥