१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
मन्त्र २७ ३१ पश्चाद्ध्यायीत पूर्वोक्तक्रमशो मन्त्रविद्बुधः । स्थूलादिस्थूलसूक्ष्मं च नाभेरूर्ध्वमुपक्रमः ॥ २२॥ इस प्रकार प्राणायाम के द्वारा सभी दोषों का शमन करते हुए पूर्व निर्दिष्ट क्रम (अकार, उकार, मकार) के अनुसार 'ओंकार' का ध्यान करते हुए प्राणायाम करे। इस तरह का 'प्रणव गर्भ' प्राणायाम नाभि के ऊर्ध्व भाग अर्थात् हृदय में (विराट् आदि का) ध्यान करते हुए स्थूलातिस्थूल मात्रा में सम्पन्न करे ॥ २२ ॥ [ प्राणायाम की अस्सी आवृत्ति-स्थूल मात्रा तथा एक श्वास में अस्सी प्रणव मन्त्र का जप-अति स्थूल मात्रा कहलाती है।] तिर्यगूर्ध्वमधोदृष्टिं विहाय च महामतिः । स्थिरस्थायी विनिष्कंपः सदा योगं समभ्यसेत् ॥ २३ ॥ अपनी दृष्टि को ऊपर अथवा नीचे की ओर तिरछा घुमाकर केन्द्रित करते हुए बुद्धिमान् साधक स्थिरता पूर्वक निष्कम्प भाव से स्थित होकर योग का अभ्यास करे ॥ २३ ॥ तालमात्राविनिष्कम्पो धारणायाजनं तथा। द्वादशमात्रो योगस्तु कालतो नियमः स्मृतः ॥ २४ ॥ योगाभ्यास की यह क्रिया तालवृक्ष की भाँति कुछ ही काल में फल प्रदान करने वाली है। इसका अभ्यास पहले से सुनिश्चित योजनानुसार ही करने योग्य है अर्थात् बीच में उसे घटाना, बढ़ाना या रोकना नहीं चाहिए। द्वादश मात्राओं की आवृत्ति भी समान समय में ही पूर्ण करनी चाहिए ॥ २४ ॥ अघोषमव्यञ्जनमस्वरं च अतालुकण्ठोष्ठमनासिकं च यत् । अरेफजातमूभयोष्ववर्जितं यदक्षरं न क्षरते कथंचित् ॥ २५ ॥ इस प्रणव नाम से प्रसिद्ध घोष का उच्चारण बाह्य प्रयत्नों से नहीं होता है। यह व्यञ्जन एवं स्वर भी नहीं है। इसका उच्चारण कण्ठ, तालु, ओष्ठ एवं नासिका आदि (सानुनासिक) से भी नहीं होता। इसका दोनों ओष्ठों के अन्तः में स्थित दन्त नामक क्षेत्र से भी उच्चारण नहीं होता। 'प्रणव' वह श्रेष्ठ अक्षर है, जो कभी भी च्युत नहीं होता। ओंकार का प्राणायाम के रूप में अभ्यास करना चाहिए तथा मन गुञ्जायमान घोष में सदैव लगाए रहना चाहिए ॥ २५ ॥ [ ॐकार को 'उद्गीथ' कहा गया है। इसे उद्-प्राणों के माध्यम से ही झंकृत किया जाता है।] येनासौ गच्छते मार्गं प्राणस्तेनाभिगच्छति । अतस्तमभ्यसेन्नित्यं यन्मार्गगमनाय वै ॥ २६ ॥ योगी पुरुष जिस मार्ग का अवलोकन करता है अर्थात् मन के माध्यम से जिस स्थान को प्रवेश करने योग्य मानता है, उसी मार्ग (द्वार) से प्राण और मन के साथ गमन कर जाता है। प्राण श्रेष्ठ मार्ग (द्वार) से गमन करे, इस हेतु साधक को नित्य- नियमित अभ्यास करते रहना चाहिए ॥ २६ ॥ हृद्द्वारं वायुद्वारं च मूर्धद्वारमथापरम् । मोक्षद्वारं बिलं चैव सुषिरं मण्डलं विदुः ॥ २७॥ वायु के प्रवेश का मार्ग हृदय ही है। इससे ही प्राण सुषुम्णा के मार्ग में प्रवेश करता है। इससे ऊपर ऊर्ध्वगमन करने पर सबसे ऊपर मोक्ष का द्वार ब्रह्मरन्ध्र है। योगी लोग इसे सूर्यमण्डल के रूप में जानते हैं। इसी सूर्यमण्डल अथवा ब्रह्मरन्ध्र का भेधन करके प्राण का परित्याग करने से मुक्ति प्राप्त होती है ॥ २७ ॥
३२ अमृतनादोपनिषद्
भयं क्रोधमथालस्यमतिस्वप्नातिजागरम्। अत्याहारमनाहारं नित्यं योगी विवर्जयेत् ॥ २८ ॥ भय, क्रोध, आलस्य, अधिक शयन, अत्यधिक जागरण करना, अधिक भोजन करना या फिर बिल्कुल निराहार रहना आदि समस्त दुर्गुणों को योगी सदैव के लिए परित्याग कर दे॥ २८ ॥ [ गीता (६.१७) में यही भाव 'युक्ताहार विहारस्य....................' आदि शब्दों द्वारा व्यक्त किया गया है।] अनेन विधिना सम्यङ् नित्यमभ्यस्यते क्रमात्। स्वयमुत्पद्यते ज्ञानं त्रिभिर्मासैर्न संशयः ॥ २९ ॥ इस प्रकार नियम पूर्वक जो भी साधक क्रमशः उत्तरोत्तर प्रगति करता हुआ नियमित अभ्यास करता है, उसे तीन मास में ही स्वयमेव ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥ २९ ॥ चतुर्भिः पश्यते देवान्पञ्चभिर्विततःक्रमः। इच्छयाप्नोति कैवल्यं षष्ठे मासि न संशयः ॥ ३० ॥ वह योगी-साधक नित्य-नियमित अभ्यास करता हुआ चार मास में ही देव दर्शन की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। पाँच माह में देव-गणों के समान शक्ति-सामर्थ्य से युक्त हो जाता है तथा छः मास में अपनी इच्छानुसार निःसन्देह कैवल्य (मोक्ष) को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है॥ ३० ॥ पार्थिवः पञ्चमात्रस्तु चतुर्मात्रस्तु वारुणः। आग्नेयस्तु त्रिमात्रोऽसौ वायव्यस्तु द्विमात्रकः ॥ ३१ ॥ पृथिवी तत्त्व की धारणा के समय में ओंकार रूप प्रणव की पाँच मात्राओं का, वरुण अर्थात् (जल तत्त्व) की धारणा के समय में (प्रणव की) चार मात्राओं का, अग्नि तत्त्व की धारणा के समय में (प्रणव की) तीन मात्राओं का तथा वायु तत्त्व की धारणा के समय में (प्रणव की) दो मात्राओं के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए॥ ३१ ॥ एकमात्रस्तथाकाशो ह्यर्थमात्रं तु चिन्तयेत्। संधिं कृत्वा तु मनसा चिन्तयेदात्मनात्मनि ॥ ३२ ॥ (इसके पश्चात्) आकाश तत्त्व की धारणा करते समय प्रणव की एक मात्रा का तथा स्वयं ओंकार रूप प्रणव की धारणा करते समय उसकी अर्द्धमात्रा का चिन्तन करे। अपने शरीर में ही मानसिक धारणा के माध्यम से पंचभूतों (पृथिवी आदि तत्त्व) की सिद्धि प्राप्त करे और उनका ध्यान करे। इस तरह के कृत्य से प्रणव की धारणा द्वारा पञ्चभूतों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त होता है॥ ३२॥ त्रिंशत्सार्धाङ्गुलः प्राणो यत्र प्राणैः प्रतिष्ठितः। एष प्राण इति ख्यातो बाह्यप्राणस्य गोचरः ॥ ३३ ॥ साढ़े तीस अङ्गुल लम्बा प्राण श्वास के रूप में जिसमें प्रतिष्ठित है, वही इस प्राण वायु का वास्तविक आश्रय है। यही कारण है कि इसे प्राण के रूप में जाना जाता है। जो बाह्य प्राण है, उसे इन्द्रियों के द्वारा देखा जाता है॥ ३३॥ अशीतिश्च शतं चैव सहस्राणि त्रयोदश। लक्षश्चैको विनिश्वास अहोरात्रप्रमाणतः ॥ ३४ ॥
मंत्र ३९ ३३
इस बाह्य प्राण में एक लाख तेरह सहस्र छः सौ अस्सी निःश्वासों (श्वास-प्रश्वास) का आवागमन एक दिन एवं रात्रि में होता है॥ ३४॥ [ प्रायः दिन-रात्रि में श्वासों की संख्या इक्कीस हजार छः सौ मानी जाती है। जो प्रति मिनट पन्द्रह निःश्वास के हिसाब से ठीक बैठती है, यहाँ इतनी संख्या का उल्लेख शोध का विषय है।] प्राण आद्यो हृदि स्थाने अपानस्तु पुनर्गुदे। समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमाश्रितः ॥ ३५ ॥ आदि प्राण का निवास हृदय क्षेत्र में, अपान का निवास गुदा स्थान में, समान का नाभि प्रदेश में एवं उदान का निवास कण्ठ प्रदेश में है॥ ३५॥ व्यानः सर्वेषु चाङ्गेषु व्याप्य तिष्ठति सर्वदा। अथ वर्णांस्तु पञ्चानां प्राणादीनामनुक्रमात् ॥ ३६ ॥ व्यान समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गों में व्यापक होकर सदैव प्रतिष्ठित रहता है। अब इसके पश्चात् समस्त प्राण आदि पाँचों वायुओं के रंग का क्रमानुसार वर्णन किया जाता है॥ ३६॥ रक्तवर्णो मणिप्रख्यः प्राणवायुः प्रकीर्तितः । अपानस्तस्य मध्ये तु इन्द्रगोपसमप्रभः ॥ ३७ ॥ इस प्राण वायु को लाल रंग की मणि के सदृश लोहित वर्ण की संज्ञा प्रदान की गई है। अपान वायु को गुदा के बीचो-बीच इन्द्रगोप-बीर बहूटी नामक गहरे लाल (रंग वाले एक बरसाती कीड़े के) रंग का माना गया है॥ ३७॥ समानस्तु द्वयोर्मध्ये गोक्षीरधवलप्रभः । आपाण्डुर उदानश्च व्यानो ह्यर्चिःसमप्रभः ॥ ३८ ॥ नाभि के मध्य क्षेत्र में समान वायु स्थिर है। यह गो-दुग्ध या स्फटिक मणि की भाँति शुभ्र कान्तियुक्त है। उदान वायु का रंग धूसर अर्थात् मटमैला है और व्यान वायु का रंग अग्निशिखा की भाँति तेजस्वी है॥ ३८॥ यस्येदं मण्डलं भित्त्वा मारुतो याति मूर्धनि । यत्र कुत्र म्रियेद्वापि न स भूयोऽभिजायते न स भूयोऽभिजायत इत्युपनिषत् ॥ ३९ ॥ जिस श्रेष्ठ योगी अथवा साधक का प्राण इस मण्डल (पञ्चतत्त्वात्मक शरीर-क्षेत्र, वायु स्थान एवं हृदय प्रदेश) का बेधन कर मस्तिष्क के क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाता है, वह अपने शरीर का जहाँ कहीं भी परित्याग करे, पुनः जन्म नहीं लेता अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है, यही उपनिषद् (रहस्य) है॥ ३९॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु..... इति शान्तिः ॥ ॥ इति अमृतनादोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ ईशावास्यापानषद् ॥ यजुर्वेद के ४० वें अध्याय को ईशावास्योपनिषद् कहा गया है। इसे उपनिषद् श्रृंखला में प्रथम स्थान प्राप्त है। इसमें इस विराट् सृष्टि के अन्तर्गत दृश्य जगत् और जीवन को 'ईश्वर का आवास' कह कर ईश्वर के सर्वव्यापी सर्वसमर्थ स्वरूप का बोध कराते हुए, जीवन को उसी के अनुशासन में गरिमामय ढंग से सुख-सन्तोषपूर्वक जीते हुए उसी के साथ एकरूप हो जाने का निर्देश दिया गया है। इसके १८ मन्त्र गीता के १८ अध्यायों की तरह महत्त्वपूर्ण कहे गये हैं। प्रथम मंत्र में जीवन और जगत् को ईश्वर का आवास कहकर जीवन सम्पदा का उपभोग मर्यादापूर्वक करने का निर्देश है। ' यह धन किसका है?' प्रश्न करके ऋषि ने मनुष्य को विभूतियों और सम्पदाओं के अभिमान से मुक्त होने का अमोघ सूत्र दे दिया है। दूसरे मन्त्र में लम्बी आयु और बन्धन मुक्त रहकर कर्मरत रहने के सूत्र हैं, तो तीसरे मन्त्र में अनुशासन उल्लंघन के दुष्परिणामों का संकेत है। मन्त्र क्रमांक ४,५ एवं ८ में परब्रह्म के स्वरूप का बोध है, तो ६,७ में उसकी अनुभूति करने वालों के लक्षण दर्शाये गये हैं। क्रमांक ९ से १४ में विद्या-अविद्या तथा सृजन एवं विनाश के बीच सन्तुलन स्थापित करने का रहस्य दिया गया है। क्रमांक १५ एवं १६ में परमात्मा से अपने स्वरूप का बोध कराने की प्रार्थना तथा बोध होने की मनःस्थिति का वर्णन है। क्रमांक १७,१८ में शरीर की नश्वरता का बोध कराते हुए अग्निदेव से श्रेष्ठ मार्ग द्वारा जीवन लक्ष्य तक ले चलने की प्रार्थना की गयी है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 'ॐ' रूप में जिसे अभिव्यक्त किया जाता है, वह परब्रह्म स्वयं में सब प्रकार से पूर्ण है और यह सृष्टि भी स्वयं में पूर्ण है। उस पूर्ण तत्त्व में से इस पूर्ण विश्व की उत्पत्ति हुई है। उस पूर्ण में से यह पूर्ण निकाल लेने पर भी वह शेष भी पूर्ण ही रहता है । आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक ताप-सन्ताप शान्त हों। [ पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर पूर्ण ही शेष रहने की ऋषि की अनुभूति अनोखी है । वर्तमान विज्ञान भी इस अवधारणा का साक्षात्कार नहीं कर सका है ।] ॐ ईशावास्यमिदग्ं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥ १ ॥ इस सृष्टि में जो कुछ भी (जड़ अथवा चेतन) है, वह सब ईश द्वारा आवृत-आच्छादित है (उसी के अधिकार में है)। केवल उसके द्वारा (उपयोगार्थ) छोड़े गये (सौंपे गये) का ही उपभोग करो। (अधिक का) लालच मत करो, (क्योंकि यह ) धन किसका है ? (अर्थात् किसी व्यक्ति का नहीं-केवल 'ईश' का ही है ) ॥ १ ॥
मन्त्र ७ ३५ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतः समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ यहाँ (ईश्वर से अनुशासित इस जगत् में) कर्म करते हुए सौ वर्ष (पूर्णायु) तक जीने की कामना करें। (इस प्रकार अनुशासित रहने से ) कर्म मनुष्य को लिप्त (विकारग्रस्त) नहीं करते । (विकार मुक्त जीवन के निमित्त) यह (मार्गदर्शन) तुम्हारे लिए है , इसके अतिरिक्त परम कल्याण का और कोई अन्य मार्ग नहीं है ॥ २ ॥ [ ऋषियों ने जीवन के ऐसे अनुशासन बतलाये हैं, जिनका अनुपालन करके मनुष्य लम्बी आयु भी पा सकता है और कर्मबन्धनों से मुक्त भी हो सकता है।] असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः । ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥ वे (इस अनुशासन का उल्लंघन करने वाले) लोग 'असुर्य' (केवल शरीर एवं इन्द्रियों की शक्ति पर निर्भर-सद्विवेक की उपेक्षा करने वाले) नाम से जाने जाते हैं। वे (जीवन भर) गहन अन्धकार (अज्ञान) से घिरे रहते हैं। वे आत्मा (आत्म चेतना के निर्देशों) का हनन करने वाले लोग, प्रेत रूप में (शरीर छूटने पर ) भी वैसे ही (अन्धकार युक्त) लोकों में जाते हैं ॥ ३ ॥ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत्। तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ अविचल वह ईश एक ही है, जो मन से भी अधिक वेगवान् है। वह सबसे पुरातन एवं स्फूर्तिवान् है, उसे देवगण (देवता अथवा इन्द्रिय समूह) प्राप्त नहीं कर पाते । वह स्थिर रहते हुए भी दौड़कर अन्य (गतिशीलों) से आगे निकल जाता है । उसके अन्तर्गत (अनुशासन में रहकर) गतिशील वायु- अप् (सृष्टि के मूल घटक) को धारण किये रहता है ॥ ४ ॥ [ वर्तमान विज्ञान अभी प्रकाश से अधिक गतिशील तत्त्वों को खोज ही रहा है, मन की गति का तो मापन ही नहीं किया जा सका है। ऋषियों ने अविचल, किन्तु मन से भी अधिक गतिमान् का साक्षात्कार किया था।] तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ वह (परमात्मतत्त्व) गतिशील भी है और स्थिर (भी) है। वह दूर से दूर भी है और निकट से निकट भी है। वह इन सब (जड़-चेतन जगत्) के अंदर भी है तथा सबके बाहर (उसे आवृत किये हुए) भी है ॥ ५ ॥ यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ व्यक्ति (जब) सभी भूतों (जड़-चेतन सृष्टि) को (इस) आत्म तत्त्व में ही स्थित अनुभव करता है तथा सभी भूतों के अन्दर इस आत्म तत्त्व को समाहित अनुभव करता है, तब वह किसी प्रकार भ्रमित नहीं होता ॥ ६ ॥ [ केवल पढ़े हुए ज्ञान से भ्रमों का निवारण संभव नहीं है, उसके लिए अनुभूति परक ज्ञान अनिवार्य है।] यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥
३६ ईशावास्योपनिषद् जिस स्थिति में (व्यक्ति) यह (मर्म) जान लेता है कि यह आत्म तत्त्व ही समस्त भूतों के रूप में प्रकट हुआ है, (तो) उस एकत्व की अनुभूति की स्थिति में मोह अथवा शोक कहाँ टिक सकते हैं ? अर्थात् ऐसी स्थिति में व्यक्ति मोह एवं शोक से परे हो जाता है ॥ ७॥ स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्त्राविरः शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ वह (परमात्मा) सर्वव्यापी है, तेजस्वी है । वह देहरहित, स्नायुरहित एवं छिद्र (वर्ण) रहित है । वह शुद्ध और निष्पाप है । वह कवि (क्रान्तदर्शी), मनीषी (मन पर शासन करने वाला), सर्वजयी और स्वयं ही उत्पन्न होने वाला है । उसने अनादि काल से ही सबके लिए यथायोग्य अर्थों (साधनों) की व्यवस्था बनायी है ॥ ८ ॥ अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाग्ँ रताः ॥ ९ ॥ जो केवल अविद्या (पदार्थपरक विद्या) की उपासना करते हैं, वे घोर अन्धकार में घिर जाते हैं और जो केवल विद्या (चेतनापरक विद्या) की ही उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार के अन्धकार में फँस जाते हैं ॥ ९ ॥ अन्यदेवाहुर्विद्यायान्यदाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १० ॥ जिन देवपुरुषों ने हमारे लिए (इन विषयों को) विशेष रूप से कहा है, हमने उन धीर पुरुषों से सुना है कि विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) का प्रभाव भिन्न है तथा अविद्या (भौतिक ज्ञान) का प्रभाव उससे भिन्न है ॥ १० ॥ विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयग्ँ सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥ (अतएव) विद्या और अविद्या- इन दोनों को एक साथ जानो। (इनमें से) अविद्या द्वारा मृत्यु को पार करके विद्या द्वारा अमरत्व की प्राप्ति की जा सकती है ॥ ११ ॥ अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्याग्ँरताः ॥ १२ ॥ जो लोग केवल 'असम्भूति' (बिखराव-विनाश) की उपासना करते हैं (उन्हीं प्रवृत्तियों में रमे रहते हैं), वे घोर अन्धकार (अज्ञान) में घिर जाते हैं और जो केवल सम्भूति (संगठन-सृजन) की ही उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार के अंधकार में फँस जाते हैं ॥ १२ ॥ अन्यदेवाहुः संभवादन्यदाहुरसंभवात्। इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥ जिन देवपुरुषों ने हमारे लिए (इन विषयों को) विशेष रूप से कहा है, हमने उन धीर पुरुषों से सुना है कि सम्भूति योग का प्रभाव भिन्न है तथा असम्भूति योग का प्रभाव उससे भिन्न है ॥ १३ ॥ संभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयग्ँ सह । विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा संभूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४॥
(इसलिए) सम्भूति (समय के अनुरूप नया सृजन) तथा असम्भूति-विनाश (अवाञ्छनीय को समाप्त करना) - इन दोनों कलाओं को एक साथ जानो। विनाश की कला से मृत्यु को पार करके (अनिष्टकारी को नष्ट करके मृत्यु भय से मुक्ति पाकर) तथा सम्भूति (उपयुक्त निर्माण) की कला से अमृतत्व की प्राप्ति की जाती है ॥ १४॥ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ सोने के (चमकदार-लुभावने) पात्र से सत्य (आदित्यमण्डलस्थ ब्रह्म) का मुख ढँका हुआ है। हे पूषन्! मुझ सत्यान्वेषण करने वाले के लिए (आत्मावलोकन के इच्छुक के लिए) उसे (उस आवरण को) अपावृत करें- हटा दें ॥ १५॥ पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह। तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥ हे पूषन् (जगत्पोषक)! हे एकाकी गमन करने वाले!, हे यम (नियन्त्रण करने वाले)!, हे सूर्य (सर्वप्रेरक)!, हे प्राजापत्य (सृजनशील)! आप अपनी किरणों (चकाचौंध) को हटा लें, आपका जो अतिशय कल्याणकारी स्वरूप है, उसे मैं देख रहा हूँ (उसका ध्यान कर रहा हूँ)। यह जो पुरुष (आदित्य मण्डलस्थ ब्रह्म) है, वही मैं हूँ॥ १६॥ वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तः शरीरम् । ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥ १७॥ यह जीवन (अस्तित्व) वायु-अग्नि आदि (पंचभूतों) तथा अमृत (सनातन आत्मचेतना) के संयोग से बना है। शरीर तो अन्ततः भस्म हो जाने वाला है। (इसलिए) हे संकल्प कर्ता ! तुम परमात्मा का स्मरण करो, अपनी सामर्थ्य का स्मरण करो और जो कर्म कर चुके हो, उसका पुनः-पुनः स्मरण करो ॥ १७॥ अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ १८ ॥ हे अग्ने (यज्ञ प्रभु) ! आप हमें श्रेष्ठ मार्ग से ऐश्वर्य की ओर ले चलें। हे विश्व के अधिष्ठातादेव ! आप कर्म मार्गों के श्रेष्ठ ज्ञाता हैं। हमें कुटिल पाप कर्मों से बचाएँ। हम पुनः-पुनः (भूयिष्ठ) नमन करते हुए आप से विनय करते हैं ॥ १८ ॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं ......... इति शान्तिः ॥ इति ईशावास्योपनिषत्समाप्ता ॥
॥ एकाक्षरोपनिषद् ॥ कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध इस उपनिषद् में ऋषि एक ही अक्षर (अविनाशी) परमात्मा को अन्तरिक्ष में प्रवाहित सोम, सुषुम्ना में संचरित प्राण तथा पूरे विश्व में संचरित जीवन तत्त्व के रूप में अनुभव करते हैं। उन्हें ही विघ्ननाशक अरिष्टनेमि से लेकर कुमार कार्तिकेय के रूप में सक्रिय देखते हैं। उसी परमात्म तत्त्व को इन्द्र, रुद्र, सूर्य आदि की विशेषताओं के रूप में तीनों गुणों, चारों वेदों तथा चराचर जगत् में संव्याप्त देखते हुए, साधकों को उसी एक मात्र अविनाशी की उपासना द्वारा अविद्याजन्य भ्रमों का उच्छेदन करके जीवन मुक्त-ज्योति स्वरूप हो जाने का उपदेश दिया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु .......... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- अमृतनादोपनिषद) एकाक्षरं त्वक्षरेऽत्रास्ति सोमे सुषुम्नायां चेह दृढी स एकः । त्वं विश्वभूर्भूतपतिः पुराणः पर्जन्य एको भुवनस्य गोप्ता ॥ १ ॥ हे भगवन् ! आप अक्षर (अर्थात् शाश्वत), सोम, परब्रह्म के रूप में तथा सुषुम्ना (मार्ग से सहस्त्रार चक्र) में अपनी सत्ता सहित प्रतिष्ठित एक ही अविनाशी तत्त्व एकाक्षर में स्थित रहते हैं। आप ही विश्व के कारणरूप, प्राणिमात्र के स्वामी, पुराण पुरुष एवं सभी रूपों में विद्यमान हैं। (आप ही) पर्जन्य (वर्षा आदि) के द्वारा सभी लोकों की रक्षा करने वाले हैं ॥ १ ॥ विश्वे निमग्नपदवीः कवीनां त्वं जातवेदो भुवनस्य नाथः । अजातमग्रे स हिरण्यरेता यज्ञस्त्वमेवैकविभुः पुराणः ॥ २ ॥ (हे सर्वशक्तिमान् !) आप ही समस्त विश्व-वसुधा के कण-कण में जीवनी शक्ति के रूप में विद्यमान हैं। आप कवियों (मन्त्रद्रष्टा ऋषियों) के आश्रयभूत हैं, समस्त लोकों की रक्षा करने वाले हैं। आप ही हिरण्यरेता (अग्नि) रूप और यज्ञ रूप भी हैं। आप ही एक मात्र विराट् एवं पूर्ण पुरुष हैं ॥ २ ॥ [सृष्टि के संकल्प का बीज जब ब्रह्म के तेजस् में पकता है, तब उसे हिरण्यगर्भ कहते हैं तथा जब परब्रह्म संकल्प-बीज का आधान करता है, तो उसे हिरण्यरेता कहते हैं।] प्राणः प्रसूतिर्भुवनस्य योनिर्व्याप्तं त्वया एकपदेन विश्वम् । त्वं विश्वभूर्योनिपारः स्वगर्भे कुमार एको विशिखः सुधन्वा ॥ ३ ॥ जिस प्रकार माला के प्रत्येक दाने (मनके) में सूत्र (धागा) रहता है, उसी प्रकार आप ही प्रमुख (सूत्र) रूप से समस्त विश्व में प्राण रूप में संव्याप्त एवं उसके उत्पत्ति के कारण स्वरूप हैं। आपने ही समस्त विश्व को एक पग से माप लिया है, अतः आप ही इस विश्व संरचना के उत्पत्ति स्थल भी हैं। आप ही प्राण रूप में सर्वत्र व्याप्त (विष्णु की तरह) संसार के रक्षक रूप तथा श्रेष्ठ धनुष को धारण करने वाले कुमार (कार्तिकेय) स्वरूप हैं ॥ ३ ॥
मन्त्र ९ ३९ वितत्य बाणं तरुणार्कवर्णं व्योमान्तरे भासि हिरण्यगर्भः । भासा त्वया व्योम्नि कृतः सुतार्थ्यस्त्वं वै कुमारस्त्वमरिष्टनेमिः ॥ ४॥ हे परमात्मन् ! आप ही मध्याह्नकालीन सूर्य के तेज की भाँति बाण को अपनी ओर आकृष्ट करके, माया द्वारा रचित इन समस्त प्राणियों के हृदयरूप आकाश में प्रकाशमान हिरण्यगर्भ रूप हैं। आपके ही दिव्य प्रकाश से भगवान् भास्कर आकाश में प्रकाशित होते हैं। आप ही देवताओं के सेनापति 'कार्तिकेय' के रूप में प्रतिष्ठित हैं और गरुड़ की तरह सभी अरिष्टों (विघ्नों) का भली- भाँति नियमन करने वाले हैं ॥ ४॥ त्वं वज्रभृद्भूतपतिस्त्वमेव कामः प्रजानां निहितोऽसि सोमे। स्वाहा स्वधा यच्च वषट् करोति रुद्रः पशूनां गुहया निमग्नः ॥ ५॥ (हे परमात्मन् !) आप ही वज्र को धारण करने वाले इन्द्र के रूप में तथा (भवरोग नाशक) रुद्र रूप में समस्त प्रजाओं के स्वामी हैं। आप ही अभीष्ट फलदायी पितरों के रूप में चन्द्रलोक में स्थित हैं तथा देवों एवं पितरों की तृप्ति हेतु सम्पन्न होने वाले यज्ञ और श्राद्ध अर्थात् स्वाहा, स्वधा एवं वषट्कार रूप हैं। आप ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हैं ॥ ५ ॥ धाता विधाता पवनः सुपर्णो विष्णुर्वराहो रजनी रहश्च । भूतं भविष्यत्प्रभवः क्रियाश्च कालः क्रमस्त्वं परमाक्षरं च ॥ ६ ॥ (हे भगवन् !) आप ही (प्राण रूप में) धाता (धारण करने वाले) तथा (सृष्टि-संरचना के रूप में) विधाता, पवन, गरुड़, विष्णु, वाराह, रात एवं दिन हैं। आप ही भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान भी हैं। सभी क्रियाएँ, कालगति और परमाक्षर (अर्थात् परम अविनाशी तत्त्व ॐकार) रूप में आप ही विद्यमान हैं ॥ ६ ॥ ऋचो यजूंषि प्रसवन्ति वक्त्रात्सामानि सम्राड्वसुरन्तरिक्षम् । त्वं यज्ञनेता हुतभुग्विभुश्च रुद्रास्तथा दैत्यगणा वसुश्च ॥ ७॥ जिसके मुख से ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद आदि उत्पन्न (प्रकट) होते हैं, वे आप ही हैं। आप ही सम्राट् (राजा अथवा सर्वत्र प्रकाशित) वसु, अन्तरिक्ष, यज्ञीय प्रक्रिया सम्पन्न करने वाले, यज्ञीय भाग ग्रहण करने वाले एवं सर्वशक्तिमान् हैं। आप ही एकादश रुद्र, (दिति की सन्तान) दैत्यरूप एवं सर्वत्र व्याप्त होने वाले (वसुरूप) हैं॥ ७॥ स एष देवोऽम्बरगश्च चक्रे अन्येऽभ्यधिष्ठेत तमो निरुन्ध्यः । हिरण्मयं यस्य विभाति सर्वं व्योमान्तरे रश्मिमिमंसुनाभिः ॥ ८ ॥ (हे परमात्मन्!) विभिन्न रूपों वाले आप ही सूर्य मण्डल में विद्यमान तथा अन्यत्र (अन्य स्थान एवं जीव के हृदय में स्थित) अज्ञानान्धकार को विनष्ट करते हुए प्रतिष्ठित हैं। जिस विराट् स्वरूप के हृदयरूपी आकाश में 'ब्रह्माण्ड गर्भिणी' (ब्रह्माण्ड को अपने गर्भ में धारण करने वाली) 'सुनाभि' (श्रेष्ठ नाभि-केन्द्र या माया) स्थित है, वह भी आप ही हैं। सूर्यादि (ग्रह-नक्षत्रों) में जो प्रकाशमान रश्मियाँ हैं, वे आपकी ही प्रकाश किरणें हैं ॥ ८ ॥ स सर्ववेत्ता भुवनस्य गोप्ता नाभिः प्रजानां निहिता जनानाम् । प्रोता त्वमोता विचितिः क्रमाणां प्रजापतिश्छन्दमयो विगर्भः ॥ ९ ॥
४० एकाक्षरोपनिषद् वही (विराट्-ब्रह्म) सब कुछ जानने वाला, समस्त भुवनों का रक्षक एवं समस्त प्राणि-समुदाय का आधार स्वरूप नाभि (केन्द्र) है। अन्तर्यामी रूप में आप ही सर्वत्र ओत-प्रोत हैं। आप ही विविध प्रकार की गतियों के विश्रान्ति रूप हैं। आप की विष्णु के गर्भ (कमलनाल) में प्रजापति के रूप में स्थित हैं एवं वेद (छन्द) भी आप ही हैं॥ ९॥ सामैश्चिदन्तो विरजश्च बाहुं हिरण्मयं वेदविदां वरिष्ठम्। यमध्वरे ब्रह्मविदः स्तुवन्ति सामैर्यजुर्भिः ऋतुभिस्त्वमेव ॥ १०॥ वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ ज्ञानीजन रजोगुण से परे, स्वर्ण कान्ति वाले (विराट् पुरुष) के अन्त को साम आदि वेदों से भी नहीं जान पाते। ब्रह्मवेत्ताजन यज्ञों में यजुर्वेद के मन्त्रों से तथा सामवेदी जन साम मन्त्रों से जिसकी स्तुति करते हैं, वे आप ही हैं॥ १०॥ त्वं स्त्री पुमांस्त्वं च कुमार एकस्त्वं वै कुमारी ह्यथ भूस्त्वमेव। त्वमेव धाता वरुणश्च राजा त्वं वत्सरोऽग्न्यर्यम एव सर्वम् ॥ ११॥ (हे परमात्मन्!) आप अकेले ही स्त्री, पुरुष, कुमार एवं कुमारी हैं। आप ही पृथिवी हैं। आप ही धाता, वरुण, सम्राट्, संवत्सर, अग्नि और अर्यमा (सूर्य) हैं। आप ही सब कुछ हैं॥ ११॥ मित्रः सुपर्णश्चन्द्र इन्द्रो वरुणो रुद्रस्त्वष्टा विष्णुः सविता गोपतिस्त्वम्। त्वं विष्णुर्भूतानि तु त्रासि दैत्यांस्त्वयावृतं जगदुद्भवगर्भः ॥ १२॥ (हे परम पुरुष!) सूर्य, गरुड़, चन्द्र, वरुण, रुद्र, प्रजापति, विष्णु, सविता, गोपति (इन्द्रियों या गौओं के स्वामी) जो कि वागादि इन्द्रियों के स्वामी कहे जाते हैं, वे आप ही हैं। आप ही विष्णु बन कर समस्त मानव जाति को दैत्यों के भय से त्राण दिलाने वाले हैं। आप ही जगत् के जनक भूगर्भरूप हैं। आपके द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आवृत है॥ १२॥ त्वं भूर्भुवः स्वस्त्वं हि स्वयंभूरथ विश्वतोमुखः। य एवं नित्यं वेदयते गुहाशयं प्रभुं पुराणं सर्वभूतं हिरण्मयम्। हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं स बुद्धिमान्बुद्धिमतीत्य तिष्ठतीत्युपनिषत् ॥ १३॥ आप ही स्वयम्भू (स्वयं प्रकट होने वाले) एवं विश्वतोमुख (सर्वत्र मुख वाले) हैं। आप ही भूः, भुवः, स्वः आदि (लोकों) में प्रतिष्ठित हैं। जो भी मनुष्य अपने गुहारूप हृदय क्षेत्र में स्थित पुराण पुरुषोत्तम आदिपुरुष को 'प्राणस्वरूप' एवं 'प्रकाश स्वरूप' जानता है। वह (पुरुष) ब्रह्मज्ञानियों की परमगति को, अज्ञानग्रस्त भ्रम बुद्धि का अतिक्रमण करके प्राप्त कर लेता है। यही उपनिषद् (रहस्यात्मक ज्ञान) है॥ १३॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु ........इति शान्तिः ॥ ॥ इति एकाक्षरोपनिषत्समाप्ता ॥
अध्यायों में एक-एक खण्ड ही हैं।
॥ ऐतरेयोपनिषद्✪ ॥ ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यक के दूसरे आरण्यक के चौथे, पाँचवें एवं छठवें अध्याय ब्रह्मविद्या प्रधान हैं, अस्तु, इन्हें ऐतरेयोपनिषद् की मान्यता दी गयी है। प्रथम अध्याय में तीन खण्ड हैं तथा शेष (दूसरे, तीसरे) अध्यायों में एक-एक खण्ड ही हैं। प्रथम अध्याय के प्रथम खण्ड में परमात्मा द्वारा सृष्टि रचना का संकल्प तथा लोकों-लोकपालों की रचना का प्रसंग है। हिरण्यगर्भ से विराट् पुरुष एवं उसकी इन्द्रियों से देवताओं की उत्पत्ति दर्शायी गयी है। दूसरे खण्ड में देवताओं के लिए आवास रूप मनुष्य शरीर तथा क्षुधा-पिपासा की शान्ति हेतु अन्नादि की रचना का प्रसंग है। तीसरे खण्ड में प्राणों द्वारा अन्न को ग्रहण करने के उपाख्यान के साथ स्वयं परमात्मा द्वारा मूर्धा मार्ग से प्रवेश करने का प्रकरण दिया गया है। व्यक्ति रूप में उत्पन्न पुरुष की जिज्ञासा और परमात्म तत्त्व के साक्षात्कार से उसके कृतकृत्य होने का भी उल्लेख है। दूसरे अध्याय में ऋषि वामदेव द्वारा जीवन चक्र का अनुभव प्राप्त करने का वर्णन है। माता के गर्भ में जीव प्रवेश उसका प्रथम जन्म, बालक रूप में बाहर आना द्वितीय जन्म तथा मरणोत्तर योनियों में जाना तीसरा जन्म कहा गया है। तीसरे अध्याय में उपास्य कौन है, यह प्रश्न खड़ा करके प्रज्ञान रूप परमात्मा को ही उपास्य सिद्ध किया गया है। उसे प्राप्त करके काया त्याग के बाद परमधाम अमरपद प्राप्ति का निरूपण किया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ हे परमात्मन्! मेरी वाणी मन में स्थित हो, मन वाणी में प्रतिष्ठित हो। (हे परमात्मन्!) आप मेरे समक्ष प्रकट हों। मेरे लिए वेद का ज्ञान लाएँ (प्रकट करें)। मैं पूर्वश्रुत ज्ञान को विस्मृत न करूँ। इस स्वाध्यायशील प्रवृत्ति से मैं दिन और रात्रियों को एक कर दूँ (मेरा स्वाध्याय सतत चलता रहे)। मैं सदैव ऋत और सत्य बोलूँगा। ब्रह्म मेरी रक्षा करे। वह (ब्रह्म) वक्ता (आचार्य) की रक्षा करे। त्रिविध ताप शान्त हों। ॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ इस उपनिषद् में ब्रह्म से लोकों, लोकपालों सहित मानवी सृष्टि, उसके विकास तथा मोक्ष सहित विराट् जीवन चक्र का उल्लेख है। ऋषि ने हर चरण को स्पष्ट एवं सरल ढंग से व्यक्त किया है। आवश्यकतानुसार अव्यक्त भावों को पाद टिप्पणियों द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है- आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥ १ ॥ सृष्टि के आरम्भ में एक मात्र आत्मा (परमात्म तत्त्व) ही था, उसके अतिरिक्त और कुछ भी सचेष्ट न था। (तब) उस (परमात्मा) ने विचार किया कि 'मैं लोकों का सृजन करूँ' ॥ १ ॥ ✪ अड़यार लाइब्रेरी से प्रकाशित दशोपनिषद् (१९३५) संग्रह के ऐतरेयोपनिषद् में प्रारम्भिक तीन अध्याय और प्रकाशित हैं, जिनका समावेश अन्य किसी उपनिषत्संग्रह में न होने से यहाँ भी नहीं ग्रहण किया गया है।
४२ ऐतरेयोपनिषद् [ मंत्र में 'नान्यत् किंचन मिषत्' वाक्य है, मिषत् शब्द पलक हिलाने के भाव में भी प्रयुक्त होता है, जो सबसे कम प्रयास में होने वाली दृश्य चेष्टा है। इसलिए पद का भाव यही लेना उचित है कि अन्य कुछ भी नहीं था तथा जो था वह किंचित् भी सचेष्ट नहीं था। पहली चेष्टा उस ब्रह्म के संकल्प के रूप में ही हुई।] स इमाँल्लोकानसृजत अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठाऽन्तरिक्षं मरीचयः। पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥ उस (परमात्मा) ने अम्भ, मरीचि, मर और आपः लोकों की रचना की। द्युलोक से परे और स्वर्ग की प्रतिष्ठा वाले लोकों को अम्भ अन्तरिक्ष (प्रकाश लोक) को मरीचि, पृथिवीलोक को मर्त्यलोक और पृथिवी के नीचे (परे) आपः लोक है॥ २॥ [ यहाँ लोकों के नाम और उनकी स्थितियाँ विचारणीय हैं। पृथ्वी को 'मर' मृत्युलोक कहा ही जाता है। अन्तरिक्ष मरीचि अर्थात् प्रकाश किरणों से युक्त लोक मान्य है। मरीचि का अर्थ शब्द कल्पद्रुम के अनुसार पापों, क्षुद्र जीवों या तमस् को मारने वाला कहा गया है। अन्तरिक्ष में ऐसे तेजस्वी मारक प्रवाह होने की पुष्टि वर्तमान विज्ञान भी करता है। अम्भ = अम् (प्राण) तथा भः (भरणकर्ता) से बना है। द्युलोक से परे यह अव्यक्त रूप से सूक्ष्म प्राण का भरण करने वाला लोक है, जिसकी प्रत्यक्ष प्रतिष्ठा के रूप में द्युलोक है। पृथ्वी के नीचे आपः लोक का भाव अनेक आचार्यों ने माना है। जो अधिक उचित प्रतीत नहीं होता। वस्तुतः ऋग्वेद ने आपः को सृष्टि के मूल क्रियाशील प्रवाह के रूप में व्यक्त किया है। आपः सृष्टि का आधारभूत द्रव्य है, इसलिए ऋषि ने उसे 'या अधस्तात् ता आपः' जो आधाररूप है वह आपः है, ऐसा कहा है। वही हिरण्यगर्भ रूप है, जिसे वेद ने 'स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां' (पृथ्वी और द्युलोक का आधार वही है) कहा है। आपः जल को भी कहते हैं; किन्तु वह अर्थ लेने से मंत्र का भाव सिद्ध नहीं होता। अस्तु, आपः को वेद की अवधारणा के आधार पर ही स्वीकार करना उचित है। इसे 'ताः' स्त्रीलिंग बहुवचन का संबोधन दिया गया है। इसी आपः तत्त्व के गर्भ में ब्रह्म का संकल्प बीज रूप में पककर विश्वरूप बनता है, यह गुण मातृसत्ता का होने से आपः को 'देवी आपः' या 'ताः आपः' कहना उचित है। इस उपनिषद् में भी अगले मंत्रों में आपः का उत्पादक प्रयोग बार-बार परिलक्षित होता है।] स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति। सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत्॥ (लोकों का निर्माण करने के बाद) उसने विचार किया कि लोकों का निर्माण तो हो गया, अब मुझे लोकपालों की भी रचना करनी चाहिए। ऐसा चिन्तन करके उसने आपः (तरल प्रवाह) में से ही एक पुरुष को समुद्धृत करके (निकालकर) उसे मूर्त्तिमान् बनाया ॥ ३ ॥ [ पुरुष संबोधन सृजनात्मक पुरुषार्थ करने में समर्थ के लिए प्रयुक्त होता है। ब्रह्म ने उस मूल प्रवाह में से विराद् पुरुष को मूर्तरूप दिया अर्थात् विराट् संरचना की सामर्थ्य को जाग्रत् किया। ऋषि ने उसे 'अद्भ्य एव समुद्धृत्य' कहा है। अद्भ्यः का सीधा अर्थ जल होता है; किन्तु यहाँ भी उसका प्रयोग (आपः) विश्व सृजनशील प्रवाह ही है।] तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वाग्वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः। प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष आदित्यः कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ् निरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिर्निरभिद्यत नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः ॥ ४॥ उस विराट् पुरुष को देखकर ईश्वर ने सङ्कल्पपूर्वक तप किया। उस तप के प्रभाव से (उस हिरण्यगर्भ स्वरूप) पुरुष के शरीर से सर्वप्रथम अण्डे की तरह एक मुख छिद्र प्रकट हुआ। मुख से वाक् इन्द्रिय और
अध्याय १ खण्ड २ मन्त्र ४ ४३
अध्याय १ खण्ड २ मन्त्र ४ ४३ वाक् से अग्नि प्रकट हुई। (तदुपरान्त) नाक के छिद्र प्रकट हुए। नाक के छिद्रों से प्राण और प्राण से वायु उत्पन्न हुआ। (फिर) नेत्र उत्पन्न हुए। नेत्रों से चक्षु (अर्थात् देखने की शक्ति) और चक्षु से आदित्य प्रकट हुआ। (तत्पश्चात्) कान प्रकट हुए, कानों से श्रोत्र (श्रवण की शक्ति) और श्रोत्रों से दिशाओं का प्रादुर्भाव हुआ। (फिर) त्वचा प्रकट हुई, त्वचा से रोम और रोमों से वनस्पति रूप ओषधियों का प्राकट्य हुआ। (इसके अनन्तर) हृदय, हृदय से मन, मन से चन्द्रमा उदित हुआ। तदुपरान्त नाभि, नाभि से अपान और अपान से मृत्यु प्रादुर्भूत हुई। (फिर) जननेन्द्रिय, जननेन्द्रिय से वीर्य और वीर्य से आपः (जल या सृजनशीलता) की उत्पत्ति हुई॥ ४॥ [ यहाँ वीर्य से पुनः 'आपः' की उत्पत्ति कही गयी है। यह बड़ा वैज्ञानिक-मार्मिक कथन है। आपः सृष्टि कर्त्ता आधारभूत प्रवाह है। वीर्य में ही पुनः सृष्टि करने में समर्थ 'बीज' तैयार होता है। वीर्य उस सूक्ष्म आपः प्रवाह के चक्र को पुनः प्रयुक्त करने में सक्षम है-ऐसा ऋषि का अनुभव है। उसी आपः तत्त्व में चेतना पुनः रूप ग्रहण करने लगती है।] ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत्। ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन्प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥ परमेश्वर द्वारा रचे गये वे (अग्नि आदि) देवता इस (पूर्व वर्णित विश्व नियामक) महासमर में आ गिरे। उन्हें उन परमात्मा ने क्षुधा-पिपासा से युक्त कर दिया, तब उन देवों ने परमेश्वर से याचना की कि हमारे लिए कोई आश्रय स्थल विनिर्मित कीजिए (शरीरों का निर्माण कीजिए), जिससे हम अपना-अपना आहार ग्रहण कर सकें॥ १॥ ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽ यमलमिति ॥ २ ॥ (देवताओं द्वारा ऐसा कहने पर) ईश्वर ने उनके लिए गो शरीर का निर्माण किया। उन्होंने कहा- यह हमारे लिए पर्याप्त (उपयुक्त) नहीं है, तब ईश्वर ने अश्व शरीर बनाया। उसे देखकर वे बोले- यह भी हमारे लिए पर्याप्त नहीं है॥ २॥ ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति पुरुषो वाव सुकृतम्। ता अब्रवीद्यथाऽऽयतनं प्रविशतेति ॥ ३ ॥ तब परमेश्वर ने उनके लिए मनुष्य शरीर की रचना करके उन्हें (देवताओं को) दिखाया, तब वे सभी देवगण बोले बस यह बहुत सुन्दर रचना है। सचमुच ही मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है। परमेश्वर ने उन देवताओं से कहा-(इस मानव शरीर में) आप लोग अपने-अपने आयतन अर्थात् आश्रय स्थलों में प्रवेश करें॥ ३॥ अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन्॥ ४॥
४४ ऐतरेयापानषद (परमात्मा की आज्ञा पाकर) अग्निदेव वाणी का रूप धारण कर मुख में प्रविष्ट हुए, वायुदेव प्राण बनकर नासिका के छिद्रों में प्रविष्ट हुए, सूर्यदेव चक्षु बनकर नेत्रों के गोलकों में प्रविष्ट हुए, दिशाएँ श्रोत्रेन्द्रिय बनकर कर्ण छिद्रों में प्रविष्ट हुईं, वनस्पतियाँ रोम बनकर त्वचा में प्रविष्ट हुईं, चन्द्रदेव मन बनकर हृदयक्षेत्र में प्रविष्ट हुए, मृत्युदेव अपान बनकर नाभि प्रदेश में प्रविष्ट हुए और आपः देवता वीर्य बनकर उपस्थ क्षेत्र में प्रविष्ट हुए ॥ ४ ॥ [यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि देवता विराट् पुरुष के जिन अंगों से जिस माध्यम से प्रकट हुए थे, उसी क्रम से उन्होंने मनुष्य के उन्हीं अंगों में स्थान बनाया।] तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति। तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५॥ (तब) क्षुधा और पिपासा ने परमेश्वर से कहा- (आपने सब देवताओं को तो स्थान दे दिया) हमारे लिए भी आश्रय स्थल की व्यवस्था करें। परमेश्वर ने कहा- मैं तुम दोनों को इन देवताओं में ही भाग प्रदान करता हूँ। जिस किसी देवता को कोई आहार (हवि) प्रदान किया जायेगा। उसमें तुम दोनों का भी हिस्सा होगा, (तभी से इन्द्रियों द्वारा आहार ग्रहण करने पर भूख और प्यास को भी परितृप्ति मिलती है।) ॥ ५ ॥ [ऋषि स्पष्ट करते हैं कि भूख-प्यास का कोई स्वतंत्र स्थान नहीं है, वे विभिन्न अंग-अवयवों में संव्यास देवशक्तियों के साथ संयुक्त हैं। शरीर विज्ञान के वर्तमान शोध-निष्कर्ष भी यही कहते हैं। भूख-प्यास शरीर के प्रत्येक कोश में होती है। जब तक पेट में अन्न-जल का भण्डार होता है, तब तक भूख-प्यास की अनुभूति नहीं होती। रोग की स्थिति में 'ड्रिप' द्वारा जल एवं पोषण पहुँचाने से भूख-प्यास शान्त हो जाती है। इससे स्पष्ट है कि भूख-प्यास प्रत्येक जीवित कोश के साथ संयुक्त है।] ॥ तृतीयः खण्डः ॥ स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥ इसके अनन्तर परमात्मा ने विचार किया कि समस्त लोकों और लोकपालों की सृष्टि तो सम्पन्न हो चुकी, अब इनके लिए अन्न की भी रचना करनी चाहिए ॥ १ ॥ सोऽपोऽभ्यतपत् ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥ फिर परमेश्वर ने अप् प्रवाह को अभितप्त किया। उस तपाये हुए (अमूर्त अप्) से जो मूर्त स्वरूप बना, वह मूर्त रूप ही वस्तुतः अन्न है ॥ २ ॥ [ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इस नयी सृष्टि में भी 'अप्' प्रवाह को ही तप्त अथवा परिपक्व किया गया।] तदेतत्सृष्टं पराङत्यजिघांसत् तद्वाचा जिघृक्षत्तन्नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुम्। स यद्धैनद्वाचाऽग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ३ ॥ उस सृष्ट (रचे हुए) अन्न ने उन (लोकपालों) की ओर से परे (पराङ्मुख होकर) भागने की चेष्टा की, तब उस पुरुष ने उसे (अन्न को) वाणी के द्वारा ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह उसे वाणी द्वारा ग्रहण करने में असमर्थ रहा। यदि वह. पूर्ण पुरुष अन्न को वाणी से ग्रहण कर लेता, तो अब (इस समय या इस युग में) भी मनुष्य वाणी से अन्न को बोलकर ही तृप्ति प्राप्त कर लिया करते ॥ ३ ॥
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र १० ४५
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र १० ४५ तद्घ्राणेनाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोद्घ्राणेन ग्रहीतुम्। स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राय हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ४ ॥ इसके पश्चात् उसने अन्न को घ्राण द्वारा पकड़ने की चेष्टा की, पर वह इसमें भी सफल न हो सका। यदि वह इसे घ्राण से ग्रहण कर लेता, तो इस युग में भी पुरुष प्राण-प्रक्रिया से ही सूँघकर अन्न ग्रहण करके परितृप्त हो जाया करते ॥ ४ ॥ तच्चक्षुषाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम्। स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५॥ फिर उस पुरुष ने नेत्रों द्वारा अन्न ग्रहण करने अर्थात् देखकर ही अन्न की शक्ति ग्रहण करने की चेष्टा की; किन्तु ऐसा भी सम्भव न हो सका। यदि वह (पूर्ण पुरुष) उसे नेत्रों से ग्रहण कर सकता, तो अब भी मनुष्य अन्न को देखने मात्र से ही तृप्त हो जाया करते ॥ ५ ॥ तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुम्। स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥ तदुपरान्त उस पुरुष ने उस अन्न को श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा ग्रहण करने का प्रयत्न किया; किन्तु वह उसमें भी सफल न हो सका। यदि वह (पूर्ण पुरुष) उसे कानों द्वारा ग्रहण कर सका होता, तो अब भी लोग इसे कानों द्वारा ग्रहण कर सकते (अर्थात् अन्न के विषय में सुनकर ही तृप्त हो जाते ) ॥ ६ ॥ तत्त्वचाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुम्। स यद्धैनत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ७॥ तब उस पुरुष ने इस (अन्न) को त्वचा द्वारा ग्रहण करने की चेष्टा की; किन्तु उसे इसमें भी सफलता न मिली। यदि वह उस समय त्वचा द्वारा अन्न को पकड़ने अर्थात् ग्रहण करने में सफल हो गया होता,तो अब भी लोग इसे छू लेने मात्र से ही परितृप्त हो जाते ॥ ७ ॥ तन्मनसाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुम्। स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ८॥ तदनन्तर उस पुरुष ने उसको मन द्वारा प्राप्त करने की चेष्टा की; लेकिन उसे इसमें भी सफलता नहीं मिली। यदि वह इसको मन द्वारा ग्रहण कर पाता, तो अब भी मनुष्य अन्न के चिन्तन मात्र से तृप्ति अनुभव करते ॥ ८ ॥ तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम्। स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ९॥ इसके बाद उस पुरुष ने अन्न को शिश्न द्वारा ग्रहण करने का प्रयत्न किया; किन्तु इसके द्वारा भी वह उसे ग्रहण करने में समर्थ न हो सका। यदि वह उस समय उसे शिश्न द्वारा ग्रहण कर पाया होता, तो आज भी मनुष्य अन्न का विसर्जन करके ही तृप्त हो जाया करते ॥ ९॥ तदपानेनाजिघृक्षत् तदावयत्। सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥ उसके बाद उस (पुरुष) ने अपान वायु के द्वारा (मुँह से होकर) इसे (अन्न को) ग्रहण करने की चेष्टा की, अपान वायु के द्वारा उसने अन्न को ग्रहण कर लिया। अपान वायु ही अन्न को ग्रहण करने में समर्थ है। जो अन्न के द्वारा जीवन की रक्षा करने में समर्थ है, वह यही वायु है ॥ १०॥
४६ ऐतरेयोपनिषद [ शंकराचार्य जी ने अपान का अर्थ मुख छिद्र किया है। वाचस्पत्यम् में अपान को प्राण का धारक कहा गया है। आयुर्वेद में पाचन, मल उत्सर्जन आदि कर्म अपान द्वारा ही सम्पन्न होना माना गया है। अतः वही अन्न का धारक है। अन्न के माध्यम से आयुष्य बढ़ाने वाला यही वायु अन्नायु कहा जाता है। ] स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति। स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥ उस परमात्मा ने विचार किया कि यदि इस पुरुष ने वाणी से बोलने का प्रयोजन पूरा कर लिया, यदि प्राण (वायु) से सूँघ लिया, यदि नेत्रों से देख लिया, यदि कानों से सुन लिया, यदि त्वचा से स्पर्श कर लिया, यदि मन से सोच लिया, यदि अपान से आहार ग्रहण कर लिया और उपस्थ से विसर्जन कृत्य पूर्ण कर लिया, तो मैं (उसके लिए) कौन रहा ? (मेरे बिना ये कैसे रह पायेगा?) मैं किधर से प्रविष्ट होऊँ ? ॥ ११ ॥ [ समस्त व्यवस्था बन जाने पर भी आत्मा के रूप में परमात्मा के अंश की स्थापना के बगैर व्यक्ति का अस्तित्व नहीं बनता। 'कोऽहम्' (फिर मैं कौन हूँ?) का उत्तर 'सोऽहम् इति' (मैं वही आत्म तत्त्व हूँ) यह तथ्य इस प्रकरण से सिद्ध होता है।] स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्रुतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम्। तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्ना अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥ वह परमात्मा मानव शरीर की सीमा मूर्धा (ब्रह्मरन्ध्र) को विदीर्ण करके (चीरकर) उसमें प्रविष्ट हो गया। विदीर्ण करके जाने के कारण इस द्वार को 'विद्रुति' नाम से जाना जाता है। यह विद्रुति नामक द्वार आनन्दप्रद अर्थात् आनन्दस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति कराने वाला है। उस परमेश्वर के तीन आश्रयस्थल और तीन स्वप्न हैं। उसका यही आवास स्थल है। यही आवासस्थल है, यही आवासस्थल है ॥ १२ ॥ ['यही वह स्थल है', यह बात तीन बार कही गयी है। बात पर बल देने के लिए 'त्रिवाचा' कहने की परम्परा है, अर्थात् यह देह निश्चित रूप से उस परमात्मा का आवास है। अन्य भाव यह है कि शरीर में तीन स्वचालित तंत्र, तीन ग्रंथियों में आत्मा का सीधा नियंत्रण कहा जा सकता है, वे हैं-मस्तिष्क में सहस्रार (रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम), हृदय (पेस मेकर) तथा नाभि ग्रंथि (पाचन-प्रजनन चक्र) अथवा शरीर, ब्रह्माण्ड और परम व्योम इन तीन स्थानों को उसके स्थान तथा स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण स्वरूपों को अथवा सृजन, पालन, परिवर्तन को उसके तीन स्वप्न कहा जा सकता है।] स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यदिदमदर्शमिती३ ॥ १३ ॥ मानव शरीर में प्रकट उस पुरुष ने भूतों (सृष्टि) को चारों ओर से देखा और यह कहा कि मेरे अतिरिक्त यहाँ दूसरा कौन है ? मैंने इसे भली-भाँति देखकर यह बोध प्राप्त कर लिया है कि यह परम पुरुष परब्रह्म ही है ॥ १३ ॥ तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र । इत्याचक्षते परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥ मानुष-देह में उत्पन्न हुए उस पुरुष ने परब्रह्म परमेश्वर का पूर्व वर्णित रीति से साक्षात्कार कर लिया; इसलिए उसका मैंने दर्शन कर लिया, इस व्युत्पत्ति के आधार पर ही उस का नाम इदन्द्र है। परन्तु लोग उसे 'इन्द्र' कहकर ही सम्बोधित करते हैं, क्योंकि देवगण परोक्ष प्रिय होते हैं, देवगण परोक्ष प्रिय होते हैं ॥ १४ ॥
अध्याय २ खण्ड १ मन्त्र ५ ४७
अध्याय २ खण्ड १ मन्त्र ५ ४७ ॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति। यदेतद्रेतस्तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः संभूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥ सर्वप्रथम यह जीव पुरुष के शरीर में गर्भरूप से विराजमान रहता है। पुरुष के शरीर में स्थित जो वीर्य है, वह पुरुष के समस्त अङ्गों से समुत्पन्न तेज है। पहले पुरुष आत्मस्थ तेज को अपने ही अन्दर पोषित करता है, तदुपरान्त जब वह इस वीर्यरूप तेज का स्त्री में सिञ्चन करके गर्भरूप में स्थित रहता है, यह इसका (जीव का) प्रथम जन्म है॥ १ ॥ [ वर्तमान प्रजनन विज्ञान (जेनेटिक साइन्स) भी वीर्य में गुण-सूत्रों (क्रोमोजोम्स) तथा जीन्स (जीवाणुओं) में व्यक्तित्व की सभी विशेषताओं का समावेश मानता है। पुरुष के गर्भ में पुरुष का परिपाक यह उपनिषद् की अपनी दृष्टि है। पदार्थ विज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं, ऋषि उसमें चेतना का संकल्पयुक्त तंत्र देखते हैं।] तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा तस्मादेनां न हिनस्ति। सास्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति॥ २ ॥ जिस प्रकार स्त्री के अपने ही शरीर के अङ्ग होते हैं, उसी प्रकार पुरुष द्वारा सिञ्चित वह वीर्य भी स्त्री से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। अस्तु, वह स्त्री को किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुँचाता। वह स्त्री अपने उदर में स्थापित पति के (वीर्यरूप) आत्मा का पोषण करती है ॥ २ ॥ [ सृष्टि के आदि में विराट् पुरुष और प्रकृति संयोग जैसा ही यह संयोग होता है।] सा भावयित्री भावयितव्या भवति तं स्त्री गर्भं बिभर्ति सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रे ऽधिभावयति। स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां सन्तत्या एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥ वह पालनकर्त्री स्त्री पालनीया (अपने पति द्वारा पालन करने योग्य) होती है। गर्भवती स्त्री प्रसव से पूर्व गर्भस्थ जीव का पालन करती है और वह पुरुष (पिता) प्रसवोपरान्त सर्वप्रथम (जातकर्म आदि संस्कार से) उस शिशु को सुसंस्कृत करता है। वह जन्मोपरान्त शिशु को इस प्रकार संस्कारित करके, उसकी उन्नति करके वास्तव में अपनी ही उन्नति करता है; क्योंकि इसी प्रकार लोक (चौदहों भुवन) प्रवृद्ध होते हैं। यही इस (जीव) का द्वितीय जन्म है ॥ ३ ॥ सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥ इस आत्मा (पिता) का यह पुत्रस्वरूप आत्मा पुण्यों के लिए (पिता के) प्रतिनिधि रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। तदुपरान्त यह जीव (पितारूप) वयोवृद्ध होकर अपने लौकिक कर्त्तव्यों को पूरा करके इस लोक से प्रस्थान कर जाता है। इसके पश्चात् उसका पुनर्जन्म होता है। यह इस जीव का तृतीय जन्म है॥ ४॥ तदुक्तमृषिणा- गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा। शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥
४८ ऐतरेयोपनिषद् यही बात ऋषि (वामदेव) ने इन शब्दों में कही है- मैंने गर्भ की स्थिति में ही (अन्तःकरण, इन्द्रियादि) देवताओं के जन्मों का रहस्य भली-भाँति जान लिया है। मैं सैकड़ों लौहयुक्त (लोहे की तरह कठोर) पिंजरों में आबद्ध था। अब मुझे तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया है, अतः मैं बाज़ पक्षी के समान (उन पिंजरों को भेदकर) बाहर आ गया हूँ। इस प्रकार गर्भ में शयन करते हुए ऋषि वामदेव ने यह तथ्य प्रकट किया था॥ ५॥ [ पदार्थ विज्ञानी पदार्थों की प्रयोगशाला में प्रवेश करके प्रयोगों द्वारा अनुसंधान करते हैं। चेतना विज्ञान के विज्ञानी ऋषिगण चेतना की प्रयोगशालाओं में संकल्पपूर्वक प्रवेश करके अनुसंधान करते थे। वे परम व्योम तक अपनी चेतना ले जाकर वेद के रहस्य प्रकट कर सकते थे और प्रकृति के सूक्ष्म घटकों में प्रवेश करके उनकी विशेषताओं का साक्षात्कार कर लेते थे। ऋषि वामदेव ने अपनी आत्म चेतना को इसी अनुसंधान के लिए संकल्पपूर्वक गर्भरूप में स्थापित किया तथा पूर्ण जागरूक रहकर चेतना के रहस्यों का अध्ययन किया, यही बात यहाँ स्पष्ट की गयी है।] स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत्॥ ६॥ वे ऋषि वामदेव यह ज्ञान (तत्त्वज्ञान) प्राप्त करके इस शरीर के विनष्ट होने के पश्चात् (इस लोक से) उत्क्रमण कर (ऊर्ध्वगमन कर) स्वर्ग में समस्त सुखों का उपभोग करते हुए अमृतत्व को प्राप्त हो गये (अमर हो गये) ॥ ६॥ ॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे कतरः स आत्मा येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति॥ १॥ जिस आत्मा की हम उपासना-अर्चना करते हैं, वह कौन है? जिसके द्वारा प्राणी देखता है, जिसके द्वारा श्रवण करता है, जिसके द्वारा गन्धों को सूँघता है, जिसके माध्यम से वाक् शक्ति का विश्लेषण करता है और जिसके द्वारा स्वादु-अस्वादु का ज्ञान प्राप्त करता है, वह आत्मा कौन सा है? ॥ १॥ यदेतत् हृदयं मनश्चैतत्। संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २॥ जो यह हृदय है, वही मन भी है। संज्ञान (सम्यक् ज्ञान), आज्ञान (आदेश देने की शक्ति), विज्ञान (विविध रूपों से जानने की शक्ति), प्रज्ञान (तुरन्त जान लेने की शक्ति), मेधा (धारणाशक्ति), दृष्टि, धृति (धैर्य), बुद्धि, मनीषा (मनन करने की शक्ति), जूति (वेग), स्मृति, संकल्पशक्ति, मनोरथ शक्ति, भोगशक्ति, प्राणशक्ति ये सभी शक्तियाँ परमात्म सत्ता की ही बोधक हैं ॥ २॥
अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ४ ४९
अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ४ ४९ एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव। बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किंचेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ ३ ॥ यह (प्रज्ञान स्वरूप आत्मा ही) ब्रह्म, इन्द्र और प्रजा का अधिपति है। यही समस्त देवगण तथा पृथिवी, वायु, अग्नि, आकाश और जल - पञ्च महाभूत हैं। यही इतर प्राणी तथा उनके कारणरूप बीज और अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज प्राणी तथा गौ, अश्व, मनुष्य, पक्षी और हाथी सहित यह समस्त जड़-जङ्गम जगत् प्रज्ञानेत्र और प्रज्ञान में ही समाहित हैं। उस प्रज्ञान में ही समस्त लोक आश्रित हैं, प्रज्ञा ही उनका विलय स्थल है। अस्तु, प्रज्ञान को ही ब्रह्म कहा गया है॥ ३ ॥ स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत् ॥ इत्योम् ॥ ४ ॥ जो परमेश्वर को इस प्रकार जान लेता है, वह इहलोक से ऊर्ध्वगमन कर स्वर्ग में जाकर समस्त दिव्य भोगों को प्राप्त करता है और अन्ततः वह ज्ञानी अमरपद को प्राप्त करता है ॥ ४ ॥ ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता......इति शान्तिः ॥ ॥ इति ऐतरेयोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ कठोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा के अन्तर्गत है। इसमें दो अध्याय तथा प्रत्येक में तीन-तीन वल्लियाँ हैं, जिनमें वाजश्रवा के पुत्र नचिकेता और यम के बीच हुए संवाद का सुप्रसिद्ध उपाख्यान है। वाजश्रवा ने यज्ञ की दक्षिणा में निरर्थक वस्तुओं का दान करके दान की चिह्न-पूजा करनी चाही। उनके पुत्र नचिकेता ने पिता को यथार्थ बोध कराने के लिए बार-बार पूछा कि आप मुझे किसको प्रदान करेंगे ? पिता ने खीझकर उन्हें यम को दान करने की बात कही। नचिकेता यम से मिलते हैं, उन्हें प्रभावित कर लेते हैं। यम उनसे तीन वरदान माँगने को कहते हैं। वे पहले वरदान में पिता की प्रसन्नता तथा अनुकूलता तथा दूसरे वर में स्वर्ग प्रदायिनी अग्निविद्या माँगते हैं। यम उन्हें दोनों वर प्रदान करते हैं। तीसरे वर में नचिकेता आत्मविद्या जानना चाहते हैं। यम उन्हें प्रलोभन देकर विचलित करना चाहते हैं; किन्तु नचिकेता अविचलित बने रहते हैं। इतना प्रकरण प्रथम अध्याय की प्रथम वल्ली में है। द्वितीय, तृतीय वल्ली में यमदेव आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी विविध पक्ष समझाते हैं। दूसरे अध्याय में परमेश्वर की प्राप्ति में बाधाएँ, उनके निवारण, हृदय प्रदेश में उनकी स्थिति का वर्णन है। परमात्मा की सर्वव्यापकता संसाररूपी अश्वत्थ का विवेचन, योग साधना तथा ईश्वर विश्वास एवं मोक्षादि का वर्णन है। अन्त में ब्रह्मविद्या के प्रभाव से नचिकेता को ब्रह्म प्राप्ति होने का उल्लेख है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु .... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- अमृतनादोपनिषद्) ॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमा वल्ली ॥ ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥ (यह कथा प्रसिद्ध है कि) यज्ञफल की इच्छा रखने वाले वाजश्रवा ऋषि के पुत्र वाजश्रवस (उद्दालक) ने (विश्वजित् यज्ञ में) अपने सम्पूर्ण धनादि पदार्थों का दान कर दिया । उनका नचिकेता नाम का एक पुत्र था ॥ १ ॥ तꣳह कुमारꣳ सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽ मन्यत ॥ २ ॥ जिस समय (ऋत्विजों द्वारा) दक्षिणा में प्राप्त (जराजीर्ण) गौएँ ले जायी जा रही थीं, उन्हें देखकर अल्प वयस्क नचिकेता के हृदय में श्रद्धा का संचार हुआ। उसने विचार किया ॥ २ ॥ पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥ ३ ॥ जो गौएँ जल पी चुकीं, घास खा चुकीं, जिनका दूध दुहा जा चुका और जो इन्द्रियों के शिथिल हो जाने पर प्रजनन-सामर्थ्य से रहित हैं (जो वृद्धावस्था से जीर्ण और निरर्थक हो चुकी हैं), उन गौओं का दान करने से मेरे पिता (वाजश्रवस) निश्चित ही सुखों से रहित नरकादि लोकों को प्राप्त करेंगे ॥ ३ ॥