१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
चतुर्वर्ण \hfill [परिशिष्ट] \hfill ४४७
ब्रह्मा का एक दिन और इतनी ही बड़ी एक रात होती है। एक मान्यता यह भी है कि कलियुग १२०० वर्ष, द्वापरयुग
२४०० वर्ष, त्रेतायुग ३६०० वर्ष और सत्युग ४८०० वर्षों का होता है। एक चतुर्युगी १२००० वर्षों की होती है। ७१
चतुर्युगी का एक मन्वन्तर तथा १४ मन्वन्तरों का एक कल्प होता है। सत्युग में धर्म का प्रायः पूर्णांश, त्रेतायुग में
त्रिगुण चतुर्थांश, द्वापर युग में अर्धांश तथा कलियुग में चतुर्थांश ही रह जाता है। सत्युग में सत्त्वगुण की प्रधानता
तथा कलियुग में तमोगुण की प्रधानता होती है। महाभारत के अनुसार कृतयुग में नारायण का वर्ण श्वेत होता है, त्रेता
में पीत वर्ण, द्वापर में रक्तवर्ण तथा कलियुग में कृष्णवर्ण होता है।
७०. चतुर्वर्ण— मनुष्य मात्र को कर्म के अनुसार चार विभागों में बाँटा गया- १. समाज में ज्ञान बाँटने वाले- ब्राह्मण,
२. समाज की रक्षा करने वाले-क्षत्रिय, ३. समाज में द्रव्य साधन की पूर्ति करने वाले-वैश्य, ४. समाज में अपनी
शारीरिक सेवा देने वाले-शूद्र। इस विभाजन को वर्ण व्यवस्था कहा गया। शतपथ ब्राह्मण में भी इस तथ्य की पुष्टि
होती है- चत्वारो वै वर्णाः। ब्राह्मणो राजन्यो वैश्यः शूद्रः (शत०ब्रा० ५.५.४.९)। महाभारत के शान्तिपर्व में
वर्णन है कि वर्णों में कोई ऊँच-नीच का भेद नहीं है, क्योंकि यह सारा संसार ब्रह्ममय है। ब्रह्मा ने सम्पूर्ण सृष्टि को
रचना की और फिर कर्मों के अनुसार वर्ण बनते गये- न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्व ब्राह्ममिदं जगत्। ब्रह्मणा
पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् (१८८.१०)। गीता में भगवान् ने कहा है कि गुण-कर्म के विभाग के अनुसार
मैंने चार वर्ण बनाये हैं- चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः (गी०४.१३)।
७१. चतुर्व्यूह—चार पदार्थों या मनुष्यों का समूह चतुर्व्यूह कहलाता है। जैसे- १. राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न एवं
२. कृष्ण, बलदेव, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध । पुराणों में वर्णन है कि ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य हेतु वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न
और अनिरुद्ध, इन चार रूपों में अवतार लिया था; अतः उन्हें चतुर्व्यूह कहते हैं। मुद्गलोपनिषद् में तीन मन्त्रों द्वारा
चतुर्व्यूह भगवान् के स्वरूप का वर्णन है- एतेनैव च मन्त्रेण चतुर्व्यूहो विभाषिताः (मुद्ग०१.४)।
७२. चमस—चमस सोमपान करने या सोम वितरण करने का एक यज्ञपात्र होता था, जो चम्मच के आकार का तथा
पलाश, उदुम्बर, खदिर आदि लकड़ी का बनता था। यह घृताहुति देने में भी प्रयुक्त होता था। वाचस्पत्यम् में चमस
को सोमपान पात्र के रूप में स्वीकार किया गया है- पलाशादिकाष्ठ जाते यज्ञीयपात्रभेदे तलक्षणभेदादिकं
यज्ञपात्रे। सोमपानपात्रभेदे च (वाच०)। अच्छावाक्, उद्गाता तथा अध्वर्यु द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले चमस
क्रमशः अच्छावाक् चमस, उद्गातृ चमस तथा चमसाध्वर्यु कहलाते हैं।
७३. चातुर्मास्य-आग्रयण— चार मासों में पूरा किया जाने वाला एक विशेष श्रौत याग चातुर्मास्य कहलाता था।
वसन्त और शरद् ऋतुओं में नवीन अन्न की इष्टि की जाती है, यह आग्रयण यज्ञ कहलाता है। वैदिक कल्प के
अनुसार चार मास के प्रमुख तीन मौसमों के आरम्भ में चातुर्मास्य यज्ञ किया जाता था। प्रथम वैश्वदेव फाल्गुनी
पूर्णिमा को, द्वितीय वरुण प्रघास आषाढ़ी पूर्णिमा को तथा तृतीय साकमेध कार्त्तिकी पूर्णिमा को होता था। वर्ष भर
सभी संधियों में यज्ञ द्वारा संधिकाल को ठीक किया जाता था। रात-दिन की संधियों में अग्निहोत्र, पूर्णमासी तथा
अमावस्या की संधियों में दर्श-पूर्णमास और ऋतु के आरंभ की संधियों में चातुर्मास्य यज्ञ किया जाता था
(शत०ब्रा०१.६.३.३६)। जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है, उसका पुण्य कभी नाश नहीं होता- अक्षय्यं ह वै सुकृतं
चातुर्मास्ययाजिनो भवति (शत० ब्रा०२.६.३.१)। जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है, वह परमधाम और परमगति को
प्राप्त होता है- स परममेव स्थानं परमां गतिं गच्छति चातुर्मास्ययाजी (शत०ब्रा०२.६.४.९)।
७४. चित्त— अन्तःकरण की चार वृत्तियों- मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार में से एक वृत्ति, जो अनुसंधानात्मक कही गयी
है, चित्त कहलाती है। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार मन, बुद्धि और अहंकार तीनों से मिलकर चित्त बनता है। योग
दर्शन के अनुसार चित्त की पाँच वृत्तियाँ होती हैं- प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। चित्त की पाँच प्रकार
की भूमियाँ मानी गयी हैं- क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, निरुद्ध एवं एकाग्र। योग के लिए निरुद्ध एवं एकाग्रचित्त होना
चाहिए। चित्त वृत्तियों के निरोध को योग कहते हैं। मैत्रेय्युपनिषद् में चित्त की महत्ता वर्णित है कि चित्त ही संसार
है, अतः उसे प्रयत्नपूर्वक शुद्ध करना चाहिए। जिसका जैसा चित्त होता है, वह वैसा ही बन जाता है, यह सनातन
रहस्य है। चित्त के शांत होने पर शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं। चित्त जितना इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है,
उतना यदि परमेश्वर में हो जाय, तो बन्धन से कौन मुक्त न हो जाय (मैत्रा०४.३-५)। चित्त वृत्तियों के विनष्ट होने
४४८ [परिशिष्ट] जरा
पर चित्त अपने उत्पत्ति स्थान में स्वयमेव ही शान्त हो जाता है (मैत्रा०४.१)। बुद्धि विषय ग्रहण करने से, चित्त
चेतना से, अहन्ता अहंकार से अद्भुत (विशिष्ट) है- बुद्ध्या बुद्ध्यति। चित्तेन चेतयति। अहंकारेणाहंकरोति
(ना०प०६.३)। उपनिषद् में चित्तशुद्धि के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि राग-द्वेष आदि से युक्त
चित्त ही संसाररूप है, उसके दोषों से मुक्त हो जाने पर मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है- चित्तमेव ही संसारो
रागादिक्लेशदूषितम्। तदेव तैर्विनिर्मुक्तं भवान्त इति कथ्यते (महो० ४. ६६)।
७५. छन्द - अक्षरों की गणना के अनुसार वैदिक वाक्यों का जो भेद किया गया है, वह छन्द कहलाता है। ऋषियों
के अन्तःकरण में प्रस्फुटित मन्त्रों को मूर्त रूप देने का कार्य जिन वर्ण समूहों द्वारा सम्पन्न हुआ, वह छन्द कहलाया।
वर्ण समूहों का यह निश्चित परिमाण ही छन्द है। इसके मुख्य सात भेद हैं- गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति,
त्रिष्टुप् और जगती। इनमें प्रत्येक के आठ-आठ भेद नियत किये गये हैं-आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी,
साम्नी, आर्ची और ब्राह्मी। यजुर्वेद को कण्डिकाओं में सात मुख्य छन्द के अतिरिक्त भी कुछ छन्दो को परिगणना
की गयी है- अतिजगती, शक्करी, अतिशक्करी, अष्टि, अत्यष्टि, धृति, अतिधृति, कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति,
संकृति, अभिकृति और उत्कृति। इन वैदिक छन्दों का निर्धारण वर्ण गणना के आधार पर ही हुआ है, इसमें मात्रा
अर्थात् लघु-गुरु का विचार नहीं किया गया है। आगे चलकर काव्य में प्रत्येक पाद में मात्राओं के आधार पर छन्दों
की व्युत्पत्ति भी हुई है। इन भेदों के आधार पर संस्कृत और हिन्दी भाषा के अनेक छन्दों के अनेक भेदों का वर्णन
मिलता है। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार एक समय देवताओं ने मृत्यु के भय से तीनों वेदों में प्रवेश किया और
भिन्न-भिन्न छन्दों से अपने को आच्छादित किया। अतः जो आच्छादन करे, वही छन्द है, यही 'छन्दस्' शब्द की
व्युत्पत्ति है- देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्रविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्द्येभिराच्छादयंस्तच्छन्दसां
छन्दस्त्वम् (छान्दो० १.४.२)।
७६. जगत् - परमात्मा की बनायी यह दुनिया अथवा यह संसार जगत् कहलाता है। यह दृश्य जगत् है, इससे परे
अदृश्य जगत् उससे अनन्त गुना व्यापक है। परमात्मा को जगत् ईश, जगत् पति या जगत् पिता भी कहते हैं। जगत्
का कारण भी वह ब्रह्म ही है। सूर्य की इस जगत् की आत्मा कहकर निरूपित किया गया है- सूर्य आत्मा
जगतस्तस्थुषश्च (साम०६२९)। यह सब (जड़-चेतन) की आत्मा (शरीर) जगत् है- सर्वं वा इदमात्मा जगत्
(शत०ब्रा०४.५.९.८)। आचार्य शंकर के अनुसार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। यह जगत् मिथ्या और मायावी है-
ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या। जब तक मनुष्य संसार में लिप्त है, तब तक संसार की सत्ता है। जब मोह नष्ट हो जाता है,
तब संसार भी नष्ट हो जाता है। आचार्य रामानुज के अनुसार ब्रह्म का शरीर यह जगत् ही है। ब्रह्म ही जगत् रूप में
परिणत हुआ है। जगत् सत्य है, मिथ्या नहीं है। दर्शन ग्रन्थ के अनुसार यह जगत् तीन गुणों (सत्, रज, तम) के
संयोग का परिणाम है। इस जगत् को अग्निषोमात्मक (अग्नि तथा सोम के संयोग से उत्पन्न) माना गया है-
अग्नीषोमात्मकं जगत् (बृ०जा०२.७)। यह सम्पूर्ण जगत् ही ब्रह्म है, इनसे भिन्न कुछ भी नहीं है- सर्वं खल्विदं
ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन (निरा० ९)।
७७. जड़-चेतन - जगत् में हलचल और वृद्धि करने वाले प्राणियों, जीवों आदि को चेतन कहा गया है। निर्जीव
तथा निश्चेष्ट पड़े रहने वाले पदार्थों को अचेतन या जड़ कहा गया है। पञ्च भौतिक तत्त्वों से बनी इस सृष्टि को जड़
जगत् कहते हैं। जड़ पदार्थ चेतना विहीन होते हैं। वह परम पुरुष-परमात्मा चेतन है, उसके अंश आत्मा या
जीवात्मा भी चेतन हैं। चैतन्यता इसका गुण है। भोजनादि को चेष्टा करने वाले चेतन प्राणियों को 'साशन' और जड़
को 'अनशन' कहा गया है। इन्हें ही जङ्गम और स्थावर कहा जाता है। अचल तथा अपने स्थान पर स्थित रहने वाले
पदार्थ स्थावर कहे जाते हैं। इसका विपरीतार्थक जङ्गम है। जड़-चेतन की ही अचर और चर कहा जाता है। जड़
या अचर पदार्थों का एक गुण जड़त्व है, जिसके कारण वे जहाँ के तहाँ पड़े रहते हैं, हिल-डुल नहीं पाते।
७८. जरा - मनुष्य के जन्म के बाद शैशव अवस्था और यौवन अवस्था प्राप्त होती है। यौवन बीतने पर जरा (जीर्णता-
शिथिलता) आने लगती है। तत्पश्चात् अन्त में मृत्यु के रूप में शरीर समाप्त होता है- देहिनोऽस्मिन् यथा देहे
कौमारं यौवनं जरा (गी०२.१३)। गीता में भगवान् कहते हैं कि जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि ये जीव के चार दुःख हैं,
इनका तथा अपने दोषों का अनुदर्शन मनुष्य की करना चाहिए- जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् (गी०१३.८)।
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति [परिशिष्ट] ४४९
जब मनुष्य के बाल सफेद होने लगते हैं, तो उसे जराबोध होने लगता है, परन्तु पुण्य कर्मों (यज्ञादिकों) के परिणाम
स्वरूप प्राप्त स्वर्गलोक में किञ्चित् मात्र भी भय नहीं है, वहाँ मृत्यु या जरा का भय नहीं रहता - स्वर्गे लोके न भयं
किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति (कठ०१.१.१२)।
७९. जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति — व्यक्ति का जीवन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति- इन तीन अवस्थाओं में होता हुआ व्यतीत
होता है। व्यक्ति का अधिकांश समय जाग्रत् अवस्था में विविधविध कार्यों की सम्पन्न करते हुए व्यतीत होता है। वह
जब जागरूक स्थिति में ज्ञानेन्द्रियों (आँख, कान आदि), कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर आदि) से कार्य करता हुआ, सुख-
दुःख, कर्त्ता-भोक्ता की अनुभूति करता है, तो यही जाग्रत् अवस्था कहलाती है।
जाग्रत् अवस्था में कार्य करते हुए जब व्यक्ति थककर सो जाता है, उस स्थिति में बाह्य जगत् से उसका
कोई सम्बन्ध नहीं रहता; किन्तु अचेतन मन की सक्रियता से वह 'स्वप्न' लोक में विचरण करता है, तरह-तरह के
स्वप्न देखता है- यह 'स्वप्नावस्था' है। स्वप्नावस्था में देखे गये दृश्य आदि की स्थिति जगने के बाद समास हो जाती
है। इस स्थिति में स्थूल शरीर सक्रिय नहीं होती; किन्तु सूक्ष्म शरीर सक्रिय रहता है, वही स्वप्नावस्था के भय-शोक-
आनन्द आदि की अनुभूति करता है।
तीसरी अवस्था दोनों से भिन्न होती है। स्थूल शरीर की सक्रियता तो होती ही नहीं, सूक्ष्म शरीर भी सक्रिय
नहीं होता-स्वप्न का अभाव होता है, उस स्थिति में प्रगाढ़ निद्रा रहती है, जिसमें स्वप्न आदि भी नहीं आते, परन्तु
उठने के बाद तृप्ति की अनुभूति होती है, व्यक्ति की सहज अभिव्यक्ति होती है-आज खूब सोया, खूब आनन्द आया,
कुछ भी ज्ञात न हुआ। कुछ न ज्ञात होने के बावजूद जो तृप्ति-आनन्द की अनुभूति होती है, यही 'सुषुप्ति' अवस्था
है। इस समय कारण शरीर की आनन्द की अनुभूति होती है। इस प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की
सक्रियता की स्थिति ही जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्था है।
८०. जातवेदा — यह अग्नि का ही पर्याय है। कहीं-कहीं सूर्य के पर्याय में भी जातवेदा शब्द का प्रयोग हुआ है।
अरणियों में जातवेदा अग्नि सन्निहित है- अरण्योर्निहितो जातवेदाः (कठ०२.१.८)। केनोपनिषद् में अग्निदेव की
ही जातवेदा सम्बोधन प्रदान किया गया है-
तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति (केन०३.३)।
८१. जीवन्मुक्त — भारतीय दर्शन जगत् में 'मोक्ष' की मानव-जीवन का चरम पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) माना
गया है। वेदान्त दर्शन 'मोक्ष' की ज्ञान साध्य मानता है। ज्ञान (आत्मज्ञान-ब्रह्मज्ञान) के अभाव में मोक्ष की प्राप्ति
नहीं होती- ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः । जीव द्वारा यथार्थरूप से अपने स्वरूप की जान लेना ही मोक्ष है। जब तक जीव
माया-अविद्या की (आवरण-विक्षेप) शक्तियों से बँधकर अपने की संसारी समझता रहता है, तब तक इस
भवसागर-संसार में इधर-उधर भटकता रहता है। जब श्रवण-मनन-निदिध्यासन द्वारा अपने आत्म स्वरूप-
ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार कर लेता है, तब वह मुक्त हो जाता है। ज्ञान के उदय और अज्ञान के विनाश का ही दूसरा
नाम मोक्ष है।
वस्तुतः जीव (आत्मा) स्वभाव से ही शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वरूप वाला होता है। मुक्ति की न उत्पत्ति होती है,
न प्राप्ति। जब कोई सद्गुरु मिल जाता है और ज्ञान का उपदेश करता है, तो साधक का भ्रमात्मक अज्ञान दूर हो जाता
है और विवेक-ज्ञान का उदय हो जाता है, यही मुक्ति की अवस्था है। वेदान्त ग्रन्थ में इसे 'ग्रीवेयकन्याय' द्वारा
समझाया गया है। गले में पड़ी सुवर्ण-जंजीर की भ्रमवश बाहर ढूँढ़-ढूँढ़कर परेशान हुए व्यक्ति की जब कोई
बुद्धिमान् गले में होने का संकेत करता है, तो उसे ध्यान आता है और सुवर्ण-जंजीर पाकर बड़ा प्रसन्न होता है।
इस प्रकार 'मुक्ति' के आनन्द में डूबा हुआ साधक सांसारिक हर्ष-विषाद से ऊपर उठकर प्रसन्नतापूर्वक
जीवन -यापन करता है, यही 'जीवन्मुक्त' की स्थिति है। दूसरों के देखने में वह सामान्य व्यक्तियों जैसा आचरण
करता दिखता है; परन्तु वस्तुस्थिति उससे भिन्न होती है। वह कर्त्ता-भोक्ता के भाव से ऊपर उठ जाता है, उसके
कर्म का पाप-पुण्य के रूप में कोई प्रतिफल नहीं होता, जो प्रारब्ध कर्म हैं, उन्हीं के अनुसार जीवनक्रम चलता
रहता है। दग्ध बीज की तरह उनसे नये कर्म का अंकुरण नहीं होता। कुलाल चक्र (कुम्हार के चक्र) की तरह
जीवन क्रम, पहले की गतिशीलता के क्रम में गतिशील रहता है। प्रारब्ध कर्मों के क्षीण हो जाने पर उसका हाड़-
४५० [परिशिष्ट] तद्वन
मांस का शरीर अपने पंचतत्त्वों में विलीन हो जाता है और फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि पुनर्जन्म में जिस
कर्म बीज की अनिवार्यता होती है, वह ज्ञानाग्नि से दग्ध हो गया होता है।
इस प्रकार वह पूर्ण मुक्त होकर परब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है- यह अवस्था 'विदेह-मुक्त' कहलाती
है। इस प्रकार मोक्ष (मुक्ति) के दो रूप होते हैं-१. जीवन-मुक्त तथा २. विदेह मुक्त।
८२. ज्ञान, भक्ति और कर्मयोग- गीता में प्रमुखतः योग को तीन भागों में विभक्त किया है- १. ज्ञानयोग, २.
भक्तियोग और ३. कर्मयोग। इस व्यापक, प्रकाशक, प्रेरक परमात्मा को पा लेना ही योग है। ज्ञान, भक्ति और कर्म
ये योग के विविध साधन हैं। परमात्मा को न्यायकारी और सर्वव्यापी अनुभव करना ज्ञानयोग है। परमात्मा के प्रति
श्रद्धा-विश्वास तथा प्रेम-आत्मीयता के सूत्रों से जुड़ना भक्तियोग है। फलाकांक्षा को त्यागकर परमात्मा की प्रसन्नता
के निमित्त प्रत्येक कर्म को करते रहना कर्मयोग है। कर्मयोग को महत्ता गीता में इस प्रकार दो गई है कि संन्यास
और कर्मयोग दोनों निःश्रेयस प्रदान करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में कर्म-संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है- संन्यासः
कर्मयोगश्च निःश्रेयस्करावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ (गी०५.२)
कुछ विद्वान् कर्म को बन्धन का कारण मानते हैं, परन्तु जो कर्म ज्ञानपूर्वक, भक्तिभाव पूर्वक तथा आसक्ति
से रहित होकर किया जाता है, उसे बन्धन रूप नहीं माना गया है, वह तो मुक्ति का आधार स्वरूप है। श्रुति कहती
है- कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत १४ समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे । (यजु०४०.२)
८३. ज्ञान-विज्ञान - मनुष्य में अनेक अपूर्णताएँ होती हैं, इन्द्रिय लिप्सा-लालसा, विषय-विकार आदि होते हैं,
ज्ञान से विकारों, लालसाओं से निवृत्ति और पूर्णता को प्राप्ति होती है। ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती । ( ऋते
ज्ञानान्नमुक्तिः)। गुरु के प्रति श्रद्धा भाव और सेवा से तथा स्वयं के अध्यवसाय से ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान के
सदृश पवित्र वस्तु कोई नहीं है, यह गीता का निर्देश है- न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते (गी० ४.३८)।
सांसारिक वस्तुओं से सम्पन्न होने वाले यज्ञ से ज्ञानरूप यज्ञ सब प्रकार से श्रेष्ठ है- श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः
परंतप (गी०४.३३)। ज्ञान की नौका द्वारा सारे पापों को पार किया जा सकता है- सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं
संतरिष्यसि (गी०४.३६)। ज्ञानरूप अग्नि समस्त कर्मों को भस्म कर देती है- ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते
तथा (गी०४.३७)। तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष श्रद्धावान् होकर ज्ञान को प्राप्त करता है-श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः
संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति (गी० ४.३९)।
विज्ञान से तात्पर्य विशिष्ट ज्ञान से है। किसी विशिष्ट विषय के तत्त्वों या सिद्धान्तों का क्रमबद्ध संगृहीत ज्ञान,
विज्ञान कहलाता है। विषय ग्रहण के कारण को विज्ञान कहा गया है-गृह्णन्ति विषयान् येन विज्ञानं हि तदुच्यते।
आज जिसे हम 'विज्ञान' के नाम से जानते हैं, वह हमें विविध विषयों का क्रमबद्ध कार्य- कारणता से युक्त ज्ञान
कराता है, इसलिए 'विज्ञान' कहा जाता है। तर्क, तथ्य, प्रमाण को कसौटी पर खरा उतरने वाला ज्ञान 'विज्ञान' है।
८४. तद्वन - वेदान्त दर्शन का यह शब्द 'ब्रह्म और उसके प्रति कर्त्तव्य भाव' को प्रकट करता है। केनोपनिषद् खण्ड
चार के छठें मन्त्र में यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। आचार्य शंकर ने इस शब्द का भाष्य करते हुए लिखा है- तद् ब्रह्म
ह किल तद्वनं नाम तस्य वनं तद्वनं तस्य प्राणिजातस्य प्रत्यगात्मभूतत्वाद्धनं वननीयं संभजनीयम्। अर्थात् वह
'ब्रह्म' निश्चय ही 'तद्वन' नाम वाला है। उसका वन-तद्वन, यह उस प्राणि-समूह का प्रत्यगात्मस्वरूप होने के
कारण वन- वननीय- है, भजनीय है। वस्तुतः जहाँ यह शब्द प्रयुक्त हुआ है, उसके पूर्व यह बतलाया गया है कि
साधारण लोग जिस ब्रह्म को उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है, इससे लोग यह न समझें कि ब्रह्म की उपासना
हो ही नहीं सकती; इस कारण ऋषि इस स्थल पर यह दिखलाते हैं कि उस परमब्रह्म परमात्मा को 'वन' रूप में
समझा जाए अर्थात् वह ब्रह्म ऐसा है कि जिसका सम्यक् रूप से अच्छी तरह से भजन (अनुभव) किया जा सकता
है। परमशान्ति देने वाला अर्थात् वननीय वही है।
'वन' का एक अर्थ जल भी है। जो गर्मी को - ताप को शान्त करता है, हृदय को शान्ति देता है- वह
जल है, रस है- 'रसोऽहमप्सु कौन्तेय' (गी०७.८) अर्थात् जल में जो रस है, वह मैं हूँ। तैत्तिरीय उपनिषद् में भी
ब्रह्म को रस रूप कहा गया है- रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति (तैत्ति० २.७)। अतः ऐसा प्रतीत
होता है कि उसी (दिव्य) रस को -आनन्द को -'वन' अर्थात् प्राप्त होने योग्य वस्तु रूप में कहा गया है।
तप (परिशिष्ट) ४५१
८५. तप—विषयों से, राग से शरीर और मन को दृढ़ता पूर्वक मुक्तकर योग की स्थिति के लिए तैयार करना ही तप
है। शरीर तथा मन की विविध विषयों में प्रयुक्त होने वाली शक्ति की संयमित करना और उनकी शक्ति की उड्डीस
करना भी तप कहलाता है। तप के द्वारा मनुष्य असाधारण तेज सम्पन्न होता है। साधन की दृष्टि से तप की तीन प्रकार
का माना गया है-१. शारीरिक, २. वाचिक, ३. मानसिक। महापुरुषों, देवगणों आदि की पूजा आराधना, ब्रह्मचर्य,
अहिंसा की शारीरिक तप माना गया है। वेद पठन, सत्य, प्रिय और हितकर वचन बोलना वाचिक तप है। मनो-
निग्रह, वासनाओं का निरोध, मौन और भावशुद्धि की मानसिक तप कहा गया है।
फलाकांक्षा से रहित होकर श्रद्धापूर्वक किये गये ये तीनों तप सात्त्विक तप कहे गये हैं। भावों की दृष्टि से
इस प्रकार भी तप के तीन भेद किये गये हैं- १. सात्त्विक, २. राजस और ३. तामस। तप से विद्या, योग, मन्त्र आदि
की इष्ट सिद्धि मिलती है। उपनिषद् में तप और स्वाध्याय तथा उपदेश की मनुष्य के कर्त्तव्यों में अभिहित किया गया
है- तपश्च स्वाध्याय प्रवचने च (तैत्ति० १.९)। तप से ही ब्रह्म वृद्धि-विस्तार की प्राप्त होता है- तपसा चीयते
ब्रह्म (मुण्ड० १.१.८)। तप से ही ब्रह्म की जानने की तीव्र इच्छा करें, तप ही ब्रह्म है- तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व।
तपो ब्रह्मेति (तैत्ति०३.२)। तप के द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है, ज्ञान होने से 'मन' वश में आता है। मन वश में आने
से आत्मा की प्राप्ति होती है और आत्मा की प्राप्ति होने पर संसार से मुक्ति मिल जाती है-तपसा प्राप्यते सत्त्वं
सत्त्वात्संप्राप्यते मनः। मनसा प्राप्यते त्वात्मा ह्यात्मापत्त्या निवर्तत इति (मैत्रा० ४.३)। तप के प्रति एकनिष्ठ रहने
वाले को तपोनिष्ठ तथा तप की विपुल पूँजी संचय करने वाले की तपोनिधि कहा गया है।
८६. तुरीय-तुरीयातीत- वेदान्त में प्राणियों की चार अवस्थाएँ वर्णित हैं- जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। तुरीय
(चतुर्थ अवस्था) की मोक्ष की अवस्था भी कहा गया है। उक्त तीनों अवस्थाओं की उत्पत्ति और लय की जानने
वाला और स्वयं उत्पत्ति-लय से परे रहने वाला जो नित्य साक्षी चैतन्य है- वह तुरीय चैतन्य है और यह अवस्था
तुरीय है- अवस्थात्रयभावाभावसाक्षी स्वयंभूभावरहितं नैरन्तर्यं चैतन्यं यदा-तदा तुरीयं चैतन्यमित्युच्यते (स०
सा०४)। जाग्रत् अवस्था मे वैश्वानर संज्ञक आत्मा नेत्र में रहता है, स्वप्नावस्था में तैजस आत्मा कण्ठ में रहता है,
सुषुप्ति अवस्था में प्राज्ञ संज्ञक आत्मा हृदय में रहता है और तुरीय (चतुर्थ- तीन अवस्थाओं से परे की) अवस्था
का आत्मा ब्रह्मरन्ध्र में रहता है-नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समाविशत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि
संस्थितम् (ना०प० ५.१)। तुरीय अवस्था की विजित करने वाले संन्यासियों की एक श्रेणी तुरीयातीत कहलाती
है। उस जन्म-मरण, धर्म और मोक्ष की तुरीय अवस्था से परे उस विशुद्ध परमात्मा या परब्रह्म को भी तुरीयातीत
कहा गया है।
उपनिषद् में सूर्य की भी तुरीय या दर्शात पद कहा गया है। जो (आदित्य) तपता है, जो चतुर्थ होता है, वही
तुरीय या दर्शात पद है- य (आदित्य) एष तपति यद्वै चतुर्थं तत्तुरियं दर्शातं पदमिति (बृह० ५.१४.३)। यह
तुरीय दर्शात पद या परोरजा (सभी लोकों से परे) किसी के द्वारा प्राप्य नहीं है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कोई कैसे कर
सकता है- एतदेव तुरीयं दर्शातं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् (बृह०
५.१४.६) यह निर्गुण ब्रह्म ही तुरीयातीत तत्त्व है, इसमें अवस्था-भेद नहीं है- अवस्थाः न त्वेवं तुरीयातीतस्य
निर्गुणस्य (ना०प० ६.१)।
८७. तैंतीस देवता-निरुक्तकार यास्कमुनि के अनुसार देव शब्द की व्युत्पत्ति दान, दीपन, द्योतन आदि अर्थों में की
गयी है। वास्तव में देव शब्द विश्व की प्रकाशक और कल्याणकारी शक्तियों का प्रतीक है। इन्हें तैंतीस कोटि
(करोड़) या श्रेणियों का माना गया है। तैंतीस संख्यक देवों में अष्टवसु, एकादशरुद्र, द्वादश आदित्य, पृथ्वी और द्यौ
को परिगणित किया गया है। इसकी पुष्टि शतपथ ब्राह्मण में होती है- अष्टौ वसवः। एकादश रुद्रा द्वादशादित्या
इमेऽएव द्यावापृथिवी त्रयस्त्रिंश्यौ त्रयस्त्रिंशद्वै देवाः (शत० ब्रा० ४.५.७.२)। निरुक्त (३.७.४) के अनुसार
ये सब देवता एक ही अद्वय आत्मा के प्रत्यंगरूप हैं- एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति।
८८. तैजस- यह वेदान्तदर्शन का पारिभाषिक शब्द है। सृष्टि विकास क्रम मे कारण रूप ईश्वर से उनकी इच्छानुसार
सृष्टि सृजन के संकल्प के साथ ही सृष्टि-प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इसी क्रम में सूक्ष्म तन्मात्राएँ, पंचभूत,
पंचज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चप्राणादिकों के प्रादुर्भाव का क्रम सम्पन्न होता है। पंचीकरण एवं त्रिवृत्करण सिद्धान्तों के आधार
४५२ [परिशिष्ट] दक्षिणा
पर सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है। सूक्ष्म शरीर सत्रह अवयवों वाला है-पंचज्ञानेन्द्रियाँ, पंच कर्मेन्द्रियाँ, पंच प्राण
तथा मन और बुद्धि। दूसरे शब्दों में इसे विज्ञानमय कोश (पंचज्ञानेन्द्रियाँ तथा बुद्धि), मनोमय कोश (पंच ज्ञानेन्द्रियाँ
तथा मन) तथा प्राणमय कोश (पंचकर्मेन्द्रियाँ तथा पंच प्राण) का समुच्चय कहा जा सकता है।
सूक्ष्म शरीर की दो स्थितियाँ होती हैं- एक समष्टिगत, दूसरी व्यष्टिगत। सूक्ष्म शरीर की समष्टि से उपहित
चैतन्य को 'हिरण्यगर्भ' तथा व्यष्टि से उपहित चैतन्य को 'तैजस' कहा गया है। समष्टिभूत 'चैतन्य' हिरण्यगर्भ के
अतिरिक्त सूत्रात्मा प्राण, प्रजापति तथा ब्रह्मा आदि संज्ञाओं से भी अभिहित किया गया है। व्यष्टिभूत चैतन्य 'तैजस'
है। दोनों में प्रमुख अन्तर यह है कि समष्टिभूत चैतन्य अपरिच्छिन्न (अनावृत-असीम) होता है और व्यष्टिभूत
चैतन्य 'परिच्छिन्न' (आवृत-ससीम) होता है। यह सूक्ष्म देहाभिमानी 'तैजस' सूक्ष्मतर विषयों का ही आहार ग्रहण
करने वाला होता है। यह स्थिति 'स्वप्नावस्था' में आती है। वेदान्त की मान्यतानुसार वन और वृक्ष की तरह
हिरण्यगर्भ (वन) और तैजस (वृक्ष) में अभेद है।
८९. त्रयताप-त्रिविध दुःख - 'दर्शन' जगत् में यह शब्द अति प्रसिद्ध है। दर्शन का एक प्रयोजन तीनों तापों-तीनों
दुःखों से मुक्ति दिलाना माना गया है। सांख्य दर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल ने मानव जीवन का परम पुरुषार्थ त्रिविध
दुःखों का अत्यन्ताभाव माना है-अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्त पुरुषार्थः (सां० १.१)। सभी प्राणी जिन
अनेकानेक दुःखों-कष्टों से विनिवृत्ति चाहते हैं, उन्हें तीन वर्गों में बाँटा गया है- १. आध्यात्मिक २. आधिभौतिक
३. आधिदैविक। जो दुःख शरीर-मन से जुड़े होते हैं, उन्हें आध्यात्मिक दुःख कहा जाता है, जैसे- रोग, शोक,
लोभ- मोह, ईर्ष्या-द्वेष, आदि। जो दुःख अन्यान्य प्राणियों के संसर्ग से उत्पन्न होते हैं, उन्हें आधिभौतिक-दुःख
कहा जाता है, जैसे-सर्प-बिच्छू, सिंह आदि हिंस्र जन्तुओं तथा मनुष्यों के लड़ाई-झगड़े से उत्पन्न दुःख। जो दुःख
दैवी आपदाओं के रूप में प्राप्त होते हैं, उन्हें आधिदैविक दुःख कहा जाता है। जैसे- अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प,
विद्युत्पात आदि। दर्शन का प्रयोजन मुख्यतः इन्हीं त्रय तापों से मुक्ति प्रदान करने का है। इसी उद्देश्य से इनके
अध्ययन, चिन्तन, मनन, की आवश्यकता होती है। त्रयतापों की निवृत्ति के बाद ही परमानन्द प्राप्ति का पथ-प्रशस्त
होता है।
९०. त्रय-शरीर - शास्त्रों में मनुष्य शरीर के तीन भेद किये गये हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण। दृश्यमान अंग-
अवयवों या पञ्चभूतों से निर्मित शरीर स्थूल शरीर कहलाता है। स्थूल का शब्दार्थ भौतिक, मूर्त, अन्न तथा भोग्य
से लिया जाता है। सूक्ष्म से तात्पर्य अभौतिक, अमूर्त, अग्नि, भोक्ता तथा अदृश्य से लिया जाता है। पञ्च तन्मात्राओं,
पञ्च ज्ञानेन्द्रियों, पञ्चकर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि-इन सत्रह के समूह को सूक्ष्म या लिङ्ग शरीर कहते हैं। भावनाओं,
इच्छाओं, आकांक्षाओं से सम्बद्ध आन्तरिक शरीर को कारण शरीर कहा जाता है। ऐसा भी वर्णन आता है कि स्थूल
शरीर स्वयं से विराट् सूक्ष्म शरीर में तथा सूक्ष्म शरीर स्वयं से विराट् कारण शरीर में समाया हुआ है। इन तीनों शरीरों
को प्रेरित करने वाला वह परम पुरुष अर्थात् आत्मा इनसे भिन्न है। स्थूल शरीर को अन्नमय कोश, सूक्ष्म शरीर को
प्राणमय, मनोमय एवं विज्ञानमय कोश तथा कारण शरीर को आनन्दमय कोश से सम्बद्ध माना जाता है। स्थूल, सूक्ष्म
एवं कारणरूप जो विश्व, तैजस एवं प्राज्ञ ईश्वर है, उनके साथ सब अवस्थाओं में एक ही साक्षी (ब्रह्म) स्थित है-
स्थूल सूक्ष्मकारणरूपैर्विश्वतैजसप्राज्ञेश्वरैः सर्वावस्थासु साक्षी त्वेक एवावतिष्ठते (ना०प० ६.१)।
९१. दक्षिणा - यज्ञ करने वाले पुरोहितों को दिये गये दान को दक्षिणा कहते हैं। ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति पर शिष्य
अपने आचार्य को गुरु दक्षिणा देता था। गृह्यसूत्रों में इसका विधान वर्णित है। प्रत्येक धार्मिक या माङ्गलिक कार्य की
समाप्ति पर पुरोहितों, ऋत्विजों को दक्षिणा देना आवश्यक समझा जाता था। इसके बिना शुभ कार्य का सुफल नहीं
मिल पाता। श्रुति के अनुसार दक्षिणादाता स्वर्ग में उच्चस्थ पदों पर प्रतिष्ठित होते हैं- उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो
अस्थुर्ये (ऋ० १०.१०७.२)। छान्दोग्य० के अनुसार जो तप, दान, आर्जव (सरलता), अहिंसा और सत्यवचन हैं-
ये आत्मयज्ञ की दक्षिणारूप हैं-यत्तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः (छान्दो०३.१७.४)।
याज्ञवल्क्य और शाकल्य संवाद में वर्णित है कि यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है ? दक्षिणा में। दक्षिणा किसमें प्रतिष्ठित है ?
श्रद्धा में; क्योंकि पुरुष में जब श्रद्धा होती है, तभी दक्षिणा देता है- कस्मिन्नु यज्ञः प्रतिष्ठित इति दक्षिणायामिति
कस्मिन्नु दक्षिणा प्रतिष्ठित इति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धद्धेऽथ दक्षिणां ददाति (बृह०३.९.२१)।
दमन [परिशिष्ट] ४५३
९२. दमन — इन्द्रियों को वश में रखना और चित्त को दुष्प्रवृत्तियों से बचाना-यह दमन कहलाता है। दबाने अथवा
रोकने की क्रिया को भी दमन कहा गया है। उपनिषद् के अनुसार प्रजापति के अनुशासन को दैवी वाणी मेघगर्जना
के सदृश गूँजती रहती है- द,द,द। देवों के लिए दमन करो, मनुष्यों के लिए दान करो, असुरों के लिए दया करो।
अतः दम, दान और दया इन तीनों को सीखें-तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त
दयध्वमिति। तदेतत्त्रयँशिक्षेद् दमं दानं दयामिति (बृह० ५.२.३)। उपनिषद् में शास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन
के साथ दमन को भी कर्त्तव्य निरूपित किया गया है- दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च (तैत्ति० १.९.१)।
९३. दर्श-पूर्णमास — अमावस्या-पूर्णिमा के दिन यज्ञ आदि द्वारा देवों का विशिष्ट पूजन किया जाता है। शास्त्रों में
इसका माहात्म्य मिलता है कि जो विद्वान् दर्शपूर्णमास (अमावस्या-पूर्णिमा) में यजन करता है, वह परम गति को
प्राप्त होता है- य एवं विद्वान् दर्शपूर्णमासौ यजते परमामेव काष्ठां गच्छति (तैत्ति०सं० १.६.९.३)। इसकी तुलना
देवयान मार्ग से की गई है। जो विद्वान् इसका पूजन करता है, वह देवयान मार्ग पर आरोहण करता है-
एष वै देवयानः पन्था यद् दर्शपूर्णमासौ य एवं विद्वान् दर्शपूर्णमासौ यजते य एव देवयानः पन्थास्तँ
समारोहति (तैत्ति०सं०२.५.६.२)।
९४. दुःख-सुख — अप्रिय अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में जो मन में वेदना होती है, उसे दुःख कहा जाता है।
इसके विपरीत अनुकूल परिस्थितियों में मन में उत्पन्न आह्लाद की अवस्था को सुख कहते हैं। इसके दो भेद माने
गये हैं। स्वकीय और परकीय। सांख्य दर्शन में तीन प्रकार के दुःखों का वर्णन किया गया है-आध्यात्मिक,
आधिभौतिक एवं आधिदैविक। इन्हें ही त्रयताप कहा गया है। इन्द्रियभोग ही दुःख-सुख के हेतु कहे गये हैं-
सुखदुःखबुद्धया श्रेयोऽन्तः कर्त्ता यदा तदा इष्टविषये बुद्धिः सुख बुद्धिरनिष्ट विषये बुद्धिर्दुःखबुद्धिः ।
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः सुखदुःखहेतवः (स०सा०६)। इन्द्रियों के संयम में सुख तथा असंयम में दुःख भरा है।
उपनिषदों में कहा गया है, जो अनित्य और नश्वर है, वह सब दुःख ही है, केवल नित्य और शाश्वत ही सुख स्वरूप
है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान भाव से ग्रहण
करना चाहिए- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ (गी० २.३८)। सच्चिदानन्द परमात्मा के स्वरूप
बोध से जो आनन्द युक्त स्थिति होती है, उसे उपनिषद् में सुख कहा गया है और अनात्म रूप विषयों के सङ्कल्प
की स्थिति को दुःख कहा गया है- सुखमिति च सच्चिदानन्दस्वरूपं ज्ञात्वानन्दरूपा या स्थितिः सैव सुखम्।
दुःखमिति अनात्मरूप विषय सङ्कल्प एव दुःखम् (निरा० १५)।
९५. देवता—'देवता' शब्द देव का ही वाचक स्त्रीलिङ्ग है, हिन्दी में पुंल्लिङ्ग में प्रयुक्त होता है। तीन देवता प्रधान माने
गये हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ये क्रमशः सृष्टि, स्थिति और संहार के नियामक देव हैं। मूलतः ३३ देवता माने
गये हैं- १२ आदित्य, ८ वसु, ११ रुद्र, द्यावा और पृथिवी। इन देवों को परिवार क्रम से तीन भागों में विभाजित किया
गया- १. द्वादश आदित्य, २. एकादश रुद्र, ३. अष्टवसु। आगे देवमण्डल का विस्तार ३३ करोड़ भी माना गया है।
इन्हें स्थानक्रम से तीन भागों में विभाजित किया गया है- द्युस्थानीय, अन्तरिक्ष स्थानीय और पृथ्वी स्थानीय। यास्क
प्रणीत निरुक्त में देव शब्द को व्युत्पत्ति दान, दीपन अथवा द्योतन आदि अर्थों में की गयी है। देव शब्द जगत् की
प्रकाशमान और कल्याणकारी शक्तियों का प्रतीक है। निरुक्त (७.१.४) के अनुसार सभी देवताओं को उत्पत्ति
आत्मा से ही मानी गयी है- एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति अर्थात् एक आत्मा के ही सब देवता
प्रत्यङ्ग रूप हैं। एक ही परम देव सभी प्राणियों में व्याप्त हैं, सभी प्राणियों के अन्तरात्मा रूप हैं-एको देवः
सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा (श्वेता०६.११)।
९६. देवयान-पितृयान मार्ग— जीवात्मा के शरीर से उत्क्रमण के बाद परलोक गमन के दो मार्गों में से एक मार्ग,
जिससे वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है, वह देवयान मार्ग और जिससे वह चन्द्रमा को प्राप्त होता है, वह पितृयान मार्ग
कहलाता है। अन्य मतानुसार वह मार्ग जिससे जीवात्मा ब्रह्म को प्राप्त होता है, देवयान मार्ग और वह मार्ग जिससे
जाकर जीवात्मा स्वर्गादि सुख भोगकर पुनः संसार में लौटता है, पितृयान मार्ग कहलाता है। देवयान का सम्बन्ध
उत्तरायण से और पितृयान का सम्बन्ध दक्षिणायन से है, इसीलिए उत्तरायण में मरना मोक्षदायक समझा जाता है।
देवयान मार्ग में जाने वाले सर्वप्रथम अर्चि को पाते हैं। अर्चि से अह, अह से शुक्ल पक्ष, शुक्ल पक्ष से उत्तरायण
के षण्मास, उत्तरायण से संवत्सर, संवत्सर से आदित्य, आदित्य से विद्युत् को प्राप्त होते हैं। पितृयान मार्ग से जाने
वाले मनुष्य इसी प्रकार धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के षण्मास, फिर पितृलोक और वहाँ से चन्द्रमा को प्राप्त
होते हैं। स्वर्ग सुख भोगने के अनन्तर किसी योनि में पुनः जन्म ग्रहण करते हैं। उपनिषद् के अनुसार जो पितृयान
मार्ग है, वही यह रयि है- एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः (प्र०१.९)। देवयान मार्ग सत्य से परिपूर्ण है, जिससे
आप्तकाम ऋषिगण गमन करते हैं, जहाँ उस सत्यस्वरूप परमेश्वर का परमधाम है- सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन
पन्थाविततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् (मुण्ड०३.१.६)।
९७. धर्म-अधर्म - धर्म शब्द 'धृ' धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है- धारण करना। दर्शन शास्त्र के अनुसार
जिससे जीवन में अभ्युदय और निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति होती है, वह धर्म है-यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः
स धर्मः (वै०द०१.१.२)। मीमांसा दर्शन के रचयिता महर्षि जैमिनि के अनुसार 'वेदों द्वारा निर्दिष्ट कर्म ही व्यक्ति
का धर्म है'- (मी०द०१.१.२)। न्यायदर्शन में २४ गुणों में से एक गुण धर्म भी वर्णित है। गीता में चारों वर्णों के
लिए भिन्न-भिन्न धर्म निर्धारित है। धर्म के चार वर्गीकरण इस प्रकार भी प्रतिपादित हैं- नित्य, नैमित्तिक, काम्य और
आपद् धर्म। स्मृति ग्रन्थ में धर्म के दस अङ्गों का वर्णन मिलता है- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह,
धी, विद्या, सत्य और अक्रोध। उपनिषद् में धर्म का आचरण करने और उसमें प्रमाद न करने का निर्देश दिया गया
है- धर्मं चर। धर्मान्न प्रमदितव्यम् (तैत्ति०१.११.१)। गीता में कहा गया है कि धर्म का थोड़ा आचरण भी महान्
भय से मुक्त कर देता है- स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् (गी०२.४०)। धर्म ही प्रजा को धारण करता
है-'धारणाद् धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः' (महा०कर्ण० ६९.५८)। इस प्रकार धर्म का जो प्रतिपादन हुआ,
उससे विपरीत अधर्म है। व्यास जी ने संक्षेप में धर्म (पुण्य) और अधर्म (पाप) को परिभाषा बताते हुए लिखा है-
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। परोपकार ही धर्म है, परपीडा
(दूसरों को कष्ट देना) अधर्म है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है-
परहित सरिस धर्म नहिं भाई। परपीड़ा सम नहिं अधमाई॥
९८. धर्मसूत्र - वेदाङ्ग में 'कल्प' के अन्तर्गत सूत्र ग्रन्थ चार प्रकार के हैं- श्रौत, गृह्य, धर्म और ऐन्द्रजालिक (रचना
सम्बन्धी)। ये मनुष्य के व्यावहारिक तथा धार्मिक जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्व के हैं। धर्मसूत्र वे ग्रन्थ हैं, जिनमें
चारों वर्णों तथा चारों आश्रमों के कर्त्तव्यों, मर्यादाओं तथा आचरण, व्यवहार आदि का निर्देश है। ये धर्मसूत्र प्रमुख
रूप से पाँच हैं- १.आपस्तम्ब, २. हिरण्यकेशी, ३.बौधायन, ४. गौतम और ५. वसिष्ठ। इनमें अपराध आदि के दण्डों
के विधान तथा प्रायश्चित्त भी वर्णित हैं।
९९. धाता - द्र० - विधाता।
१००. धारणा - चित्तवृत्तियों को चारों ओर से हटाकर किसी एक स्थान या विषय में लगाना धारणा है। मन के
विचारों-संकल्पों को आत्मा में लय करते रहना और आत्मा या परमात्मा के चिन्तन में स्थित रहना धारणा कहलाता
हैं। मन की वह स्थिति जिसमें ब्रह्म चिन्तन के अतिरिक्त अन्य कोई भाव या विचार नहीं ठहरता, धारणा कहलाती
है। इसमें मन में वासना नहीं रह जाती। उपनिषद् के अनुसार मन को संकल्पात्मक मानकर उसे आत्मा में लय करते
हुए उसे परमात्म चिन्तन में धारण करना 'धारणा' को स्थिति है- मनः संकल्पकं ध्यात्वा संक्षिप्यात्मनि
बुद्धिमान्। धारयित्वा तथात्मानं धारणा परिकीर्तिता (अमृ०१६)। योगसूत्र के अनुसार चित्त को एक स्थान पर
दृढ़ करना धारणा है- देशबन्धः चित्तस्य धारणा (यो०द०३.१)। प्राणायाम के द्वारा इन्द्रियों के दोषों को तथा
धारणा के द्वारा पापों को जलाते हैं-प्राणायामैर्दहेद् दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषम्। किल्बिषं हि क्षयं नीत्वा
रुचिरं चैव चिन्तयेत् (अमृ०८)।
१०१. ध्यान - चित्त को चारों ओर से हटाकर किसी एक विषय पर सतत स्थिर करना ध्यान कहलाता है। बाह्य इन्द्रियों
के बिना केवल मन में किसी विषय या व्यक्ति को लाना या बिठाना भी ध्यान है। ध्यान में ध्याता अपने चित्त को
ध्येय में स्थिर या एकाग्र करता रहता है। यही ध्यान जब चरमावस्था को पहुँचता है, तब समाधि कहलाता है। सांख्य
दर्शन के अनुसार चित्त का राग से विमुक्त होना ही ध्यान है- रागोपहितिर्ध्यानम् (सां०द०३.३०)। इसी तथ्य को
उपनिषद् कहता है कि मन का विषयों से मुक्त होना ही ध्यान है- ध्यानं निर्विषयं मनः (मैत्रे०२.३)। गीता में कहा
ध्रुव (परिशिष्ट) ४५५
गया है कि कितने ही पुरुष ध्यान के द्वारा शुद्ध अन्तःकरण से अपने में ही परमात्मा को देखते हैं- ध्यानेनात्मनि
पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना (गी०१३.२४)। ज्ञान से ध्यान की महत्ता अधिक मानी जाती है- श्रेयो हि
ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते (गी० १२.१२)।
१०२. ध्रुव— ध्रुव शब्द के पर्याय इस प्रकार हैं- स्थिर, अचल, निश्चित, अटल, नित्य, शाश्वत। अनश्वर पदार्थों के लिए
ध्रुव शब्द प्रयुक्त होता है। कहीं-कहीं परमात्मा के पर्याय रूप में भी दृष्टिगोचर होता है। स्थिरता का प्रतीक होने के
कारण हिन्दू विवाह के अवसर पर दाम्पत्य जीवन की स्थिरता के लिए वधू को ध्रुव (तारे) का दर्शन कराया जाता
है। कठोपनिषद् का प्रतिपादन है कि कर्मफल रूपनिधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य पदार्थों से ध्रुव (नित्य-
परमात्मा) तत्त्व की प्राप्ति नहीं हो सकती- जानाम्यहं ꣳ शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत्
(कठ०१.२.१०)। ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार जो स्थिर है, जो प्रतिष्ठित (आकाश में) है, वही ध्रुव है- यद्वै स्थिरं
यत्प्रतिष्ठितं तद् ध्रुवम् (शत०ब्रा०८.२.१.४)।
१०३. नाचिकेताग्नि — कठोपनिषद् की यम-नचिकेता की कथा विख्यात है। उस कथा में 'नचिकेता' ने यमराज से
द्वितीय वर के रूप में उस अग्निविद्या को माँगा है, जो समस्त दुःखों को दूर करके स्वर्ग (परमसुख) प्रदान करने
वाली है- स त्वमग्निंꣳ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वंꣳ श्रद्दधानाय मह्यम्- हे मृत्यो! आप स्वर्ग के साधनभूत
अग्नि को जानते हैं, सो मुझ श्रद्धालु के प्रति उसका वर्णन कीजिए (कठ०१.१.१३)।
यमराज ने विस्तारपूर्वक अग्निविद्या का रहस्य नचिकेता को बताया, तदुपरान्त नचिकेता ने यमराज द्वारा
बताई गई अग्निविद्या को-उसकी इष्टिकाओं, उसके चयन की प्रक्रिया आदि को- यथावत् सुना दिया। उससे प्रसन्न
होकर यमराज ने उस अग्निविद्या का नामकरण नचिकेता के नाम पर ही कर दिया-तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं
तवेहाद्य ददामि भूयः। तवैव नाम्ना भवितायमग्निः ....(कठ० १.१.१६)। इस प्रकार वह अग्निविद्या 'नाचिकेताग्नि'
के नाम से प्रसिद्ध हो गई। यमराज ने इस नाचिकेताग्नि के चयन की फलश्रुति बताते हुए आगे कहा-
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू। ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमाꣳ
शान्तिमत्यन्तमेति (कठ० १.१.१७)। अर्थात्- त्रिणाचिकेत अग्नि (तीन बार नाचिकेत अग्नि का चयन करने वाला
अथवा ज्ञान, अध्ययन और अनुष्ठान करने वाला) का तीन बार चयन करने वाला मनुष्य (माता-पिता और आचार्य-
इन) तीनों से सम्बन्ध को प्राप्त करके जन्म और मृत्यु को पार कर लेता है तथा ब्रह्म से उत्पन्न हुए ज्ञानवान् और
स्तुति योग्य देवों को जानकर-साक्षात्कार करके परमशान्ति प्राप्त करता है।
१०४. नाद — नाद का सामान्य अर्थ है- शब्द या ध्वनि। संगीत शास्त्र के अनुसार आकाशस्थ अग्नि और मरुत् (वायु)
के संयोग से नाद उत्पन्न होता है। सम्पूर्ण जगत् नाद से भरा हुआ है। इसे 'नाद ब्रह्म' कहा गया है। नाद दो प्रकार
का माना गया है- आहत और अनाहत। योगी योग साधना से ब्रह्म में अनवरत गुञ्जायमान अनाहत नाद का श्रवण
करते और उसकी मस्ती में लीन रहते हैं। प्राणाग्नि के आघात से शरीर के अन्दर ध्यान स्थिर करने पर एक नाद सुनाई
देता है। इसमें विविध ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। अभ्यास के प्रारम्भ में नाद बहुत जोर से और नानाविध सुनाई पड़ता
है। अभ्यास के बढ़ जाने पर वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर रूप में सुनायी पड़ता है- श्रूयते प्रथमाभ्यासे नादो नानाविधो
महान्। वर्धमाने तथाभ्यासे श्रूयते सूक्ष्मसूक्ष्मतः (ना०बि० ३३)। जिस प्रकार पुष्परस का पान करता हुआ भ्रमर
पुष्पगन्ध की अपेक्षा नहीं करता, उसी प्रकार नाद में सदा आसक्त रहने वाला चित्त विषयों की आकांक्षा नहीं करता
मकरन्दं पिबन्भृङ्गो गन्धान्नापेक्षते यथा। नादासक्तं सदा चित्तं विषयं न हि कांक्षति (ना०बि० ४२)। नाद
मनरूपी मृग के बाँधने में जाल का कार्य करता है तथा मनरूपी तरङ्ग को रोकने में तट का काम करता है-नियमन
समर्थोऽयं निनादो निशिताङ्कुशः। नादोऽन्तरङ्गसारङ्गबन्धने वागुरायते (ना० बि०४५)।
१०५. नारायण — अनंत सृष्टि की स्थिति, स्थापक तथा पोषण कर्त्ता के रूप में नारायण भगवान् का स्मरण किया जाता
है। पुरुष सूक्त में उसी विराट् नारायण पुरुष की महिमा का प्रतिपादन है। मुद्गलोपनिषद् में भी उनकी महिमा
अभिव्यक्त हुई है। नारायण पुरुष तीनों कालों में अवस्थित रहते हैं। वे सभी महिमावानों से श्रेष्ठ हैं, उनसे बढ़कर
कोई नहीं है। वे इन सब प्राणियों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाले हैं- पुरुषो नारायणो भूतं भव्यं भविष्यच्चासीत्।
स एष सर्वेषां मोक्षदश्चासीत्। स च सर्वस्मान् महिम्नो ज्यायान्। तस्मान्न कोऽपि ज्यायान् (मुद्ग० २.३)।
नारायण से ही समष्टिगत प्राण उत्पन्न हुआ है, मन और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भी उन्हीं से प्रकट हुई। आकाश, वायु, तेज,
जल तथा सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी की उत्पत्ति भी उन्हीं से हुई। ब्रह्मा और रुद्र भी नारायण से ही
उत्पन्न होते हैं- नारायणात्प्राणो जायते। मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी।
नारायणाद्ब्रह्मा जायते। नारायणाद्रुद्रो जायते (नारा० १)। नारायण देव ही एकमात्र निष्कलङ्क, निरञ्जन,
निर्विकल्प, अनिर्वचनीय एवं विशुद्ध हैं, उनके सिवा दूसरा कोई नहीं है- निष्कलङ्को निरञ्जनो निर्विकल्पो
निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित् (नारा०२)। महोपनिषद् में भी इसी तथ्य की पुष्टि
होती है कि आदि में एकमात्र नारायण ही थे, न ब्रह्मा, न रुद्र-एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो
(महो०१.१)। आदि पुरुष भगवान् नारायण के नामोच्चारण मात्र से मनुष्य कलि के सब दोषों का नाश करता है-
भगवत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलिर्भवतीति (कलिसं० १)।
१०६: निःश्रेयस -द्र०- अभ्युदय।
१०७. निःस्पृह—स्पृहा का तात्पर्य है - इच्छा, कामना, लालसा, अभिलाषा। जो कोई भी लौकिक इच्छा, कामना न
रखता हो, उसे निःस्पृह कहते हैं। निःस्पृह व्यक्ति ही एकमात्र आध्यात्मिक उत्कर्ष की महत्त्वाकांक्षा की रखते और
महिमावान् बनते हैं। ऐसे महामना अपने कर्त्तव्य पथ पर अविचल खड़े रहते हैं और प्रतिष्ठा एवं देव कृपा के सुयोग
को पाते हैं। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि रजोगुण के बढ़ने पर लोभ प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति
और स्पृहा (विषय भोगों को इच्छा)- ये सब बढ़ते हैं- लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि
जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ (गी० १४.१२)। बन्धु-बान्धवों आदि की बढ़ाने की स्पृहा से दीनता के दोष की वृद्धि
होती है- दैन्यदोषमयी दीर्घा वर्धते वार्धके स्पृहा (महो० ३.३६)। सब कामनाओं से निःस्पृह चित्त ही युक्त
(नियंत्रित) कहा जाता है- निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा (गी० ६.१८)।
१०८ ध्रुवा — कोश ग्रन्थों में ध्रुवा-नित्या का पर्याय पार्वती, मनसा देवी, एक शक्ति बताया गया है। नित्या का एक अर्थ
ध्रुवा अर्थात् स्थिर है। ब्राह्मणग्रन्थों में पृथ्वी, आत्मा आदि की ध्रुवा कहकर उपन्यस्त किया गया है- पृथिवी ध्रुवा
(तै० ब्रा० ३.३.१.२), आत्मा ध्रुवा (तै०ब्रा० ३.३.१.५)। ब्रह्माण्ड पुराण (४.१९.५९) में अविनाशी देवियों के
एक समूह को नित्या कहा गया है। उपनिषद् में वर्णित है कि आहारशुद्धि होने पर अन्तःकरण की शुद्धि होती है
और अन्तःकरण की शुद्धि होने पर निश्चल (स्थिर) स्मृति प्राप्त होती है- आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ
ध्रुवा स्मृतिः (छान्दो० ७.२६.२)।
१०९. निर्गुण-सगुण— परब्रह्म के दो रूप माने गये हैं। निर्गुण और सगुण। उसके सगुण रूप से दृश्य जगत् की
उत्पत्ति हुई है। अनन्त सृष्टि की रचना करने वाला वह परमेश्वर वास्तव में अनन्त और निर्गुण ही है। निर्गुण का
तात्पर्य है- गुण रहित। परमात्मा की बनायी सृष्टि सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से युक्त है, लेकिन परमात्मा स्वयं
इन तीनों गुणों से परे होने से निर्गुण कहा जाता है। निर्गुण ब्रह्म अव्यक्त और केवल ज्ञान गम्य हैं। सगुण व्यक्त तथा
गुणों से संयुक्त है। गीता के कथनानुसार निर्गुण की उपासना क्लिष्ट है और सगुणोपासना सरल है। आदि शंकराचार्य
ने ब्रह्म को निराकार, निर्गुण, समस्त भेदों से रहित, सर्वोपाधि विनिर्मुक्त और नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव वाला
स्वीकार किया है। उपनिषद् में भी इसी तथ्य की पुष्टि होती है। उस ब्रह्म को शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध से
रहित नित्य तथा अविनाशी स्वरूप वाला वर्णित किया गया है- अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च
यत् (कठ० १.३.१५)। ब्रह्म के निराकार, निर्गुण स्वरूप की मुण्डकोपनिषद् में उपन्यस्त किया गया है। वह ब्रह्म
अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण तथा चक्षुः, श्रोत्र और हाथ-पैरों से रहित हैं- यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः
श्रोत्रं तदपाणिपादम् (मुण्ड०१.१.६)। ब्रह्म का निर्गुण स्वरूप अनिर्वचनीय है, अतः उपनिषदों में उसका निरूपण
करते हुए 'नेति-नेति' (बृह० २.३.६) कहा गया है। सगुण ब्रह्म को माया की उपाधि से युक्त माना गया है। सगुण
उपासना में अवतारों की प्रधानता है। ईश्वर ही जब मायोपहित देह के द्वारा आविर्भूत होते हैं, तो उसे अवतार कहते
हैं। यह दृश्यमान जगत् भी सगुण ब्रह्म का रूप माना जाता है।
११०. निर्विकल्पक - द्र०-समाधि।
१११. निष्काम कर्म — शास्त्रों में निष्काम कर्म की महत्ता विशेष रूप से प्रतिपादित हुई है। निष्काम कर्म का तात्पर्य
है- कामना रहित कर्म। श्रीमद्भगवद्गीता में निष्काम कर्म का आदेश है। इसमें फल की इच्छा के बिना कर्म किया
जाता है। अपने कर्म को अपने उपास्य के चरणों में अर्पित कर दिया जाता है। निष्काम कर्म करने वाले के हृदय
में परमात्मा प्रवेश करता है तथा उसे भक्ति एवं मोक्ष प्रदान करता है। सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण कर्म प्रकृति
के द्वारा होता है, पुरुष के ऊपर कर्म का आरोप मिथ्या है। जब यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब मनुष्य बन्धन में नहीं
पड़ता। मनुस्मृति के अनुसार संसार में कहीं भी कामना के बिना कोई क्रिया नहीं दिखाई देती। मनुष्य कामनाओं
की प्रेरणा से ही कर्म करता है (मनु०स्मृ०२.४); परन्तु कामनाओं के पथ पर भटकते मनुष्य भगवत्प्राप्ति जैसे दिव्य
उद्देश्य को प्राप्ति नहीं कर पाते, उसके लिए तो निष्काम कर्म ही प्रतिपादित किया गया है।
११२. पञ्चकोश — वेदान्त में मनुष्य शरीर के पाँच कोशों का वर्णन किया गया है- अन्नमय, प्राणमय, मनोमय,
विज्ञानमय और आनन्दमय कोश। स्थूल शरीर में अन्नमय कोश, सूक्ष्म शरीर में प्राणमय कोश, मनोमय एवं
विज्ञानमय तथा कारण शरीर में आनन्दमयकोश अवस्थित है। मन के साथ पंच ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से मनोमय
कोश तथा बुद्धि के साथ पंच ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से विज्ञानमय कोश बनता है। पाँच प्राणों तथा कर्मेन्द्रियों के मेल
से प्राणमयकोश बनता है। प्राणमय कोश क्रियाशक्ति से सम्पन्न तथा कर्मरूप है। मनोमय कोश इच्छाशक्ति से सम्पन्न
और कारण रूप है। विज्ञानमय कोश ज्ञानशक्ति से सम्पन्न और कर्तृरूप है। आनन्दमयकोश में मनुष्य समाधि का
अभ्यास करके अपने मूल स्वरूप में आ जाता है। सर्वसारोपनिषद् के अनुसार अन्न से बनने वाले कोशों के
समूहरूपी शरीर को अन्नमय कोश कहते हैं। प्राण आदि चौदह प्रकार को वायु इस अन्नमय कोश में संचार करते
हैं, तब उसे प्राणमय कोश कहते हैं। इन दो कोशों के भीतर मन आदि चौदह इन्द्रियों द्वारा जब आत्मा शब्दादि
विषयों का विचार करता है, तब उसे मनोमय कोश कहते हैं। आत्मा इन तीनों कोशों के साथ संयुक्त होकर बुद्धि
द्वारा जो कुछ जानता है, उसका बुद्धियुक्त स्वरूप विज्ञानमय कोश है। इन चारों कोशों के साथ आत्मा बरगद के बीज
के वृक्ष की भाँति अपने कारण स्वरूप अज्ञान में रहता है, उसे आनन्दमय कोश कहते हैं। अन्नमय कोश को
विकसित करने के उपाय १. उपवास, २. आसन, ३. तत्त्व शुद्धि और ४. तपश्चर्या मुख्य हैं। प्राणमय कोश के लिए
१. बन्ध, २. मुद्रा तथा ३. प्राणायाम किया जाता है। मनोमय कोश को साधना हेतु १. ध्यान, २. त्राटक, ३. जप
और ४. तन्मात्रा को साधना करते हैं। विज्ञानमय कोश की पुष्टि के लिए १. सोऽहम् साधना २. आत्मानुभूति, ३.
स्वर-संयम और ४. ग्रन्थि भेदन करने हैं। आनन्दमय कोश के विकास के लिए १. सहज समाधि, २. नाद साधना,
३. बिन्दु साधना तथा ४. किरण या कला साधना का प्रयोग करते हैं।
११३. पञ्चप्राण — द्र० - प्राण।
११४. पञ्चविध मुक्ति — जीवात्मा जब इष्ट देव या ब्रह्म के लोक, रूप, योग, निकटता या एकत्व को प्राप्त करता है,
तो यह मुक्ति की अवस्था कही जाती है। यह मुक्ति पञ्चविध मान्य है- सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य और
कैवल्य। मुक्त जीव जब इष्टदेव के साथ एक लोक में वास करता है, इसे सालोक्य मुक्ति कहा गया है। उपासक जब
अपने उपास्य के रूप में रहते हुए उसी के रूप को प्राप्त कर लेता है, इस समान रूप होने के भाव या सरूपता को
सारूप्य मुक्ति कहते हैं। मुक्त जीव जब भगवान् के पास वास करता है, तो उस मुक्ति को सामीप्य कहा गया है और
जिसमें जीव परमात्मा में लीन हो जाता है या योग को प्राप्त करता है, तो यह मुक्ति सायुज्य कही जाती है। अविद्या,
त्रिविध दुःखों तथा अहंकार आदि से निवृत्ति की विशुद्ध स्थिति को कैवल्य मुक्ति कहा गया है। मुक्तिकोपनिषद् में
भगवान् श्रीराम का कथन है कि दुराचार में लगा हुआ व्यक्ति भी मेरा नाम स्मरण करते से सालोक्य मुक्ति को प्राप्त
होता है, वहाँ से वह अन्य लोकों में नहीं जाता- दुराचारस्तो वापि मन्नामभजनात्कपे। सालोक्य मुक्तिमाप्नोति
न तु लोकान्तरादिकम् (मुक्ति० १.१८-१९)। पाप समूह के नष्ट होने पर वह मेरे सारूप्य-समान रूप को प्राप्त
होता है-निर्धूताशेषपापौघो मत्सारूप्यं भजत्ययम् (मुक्ति० १.२१)। जो द्विज सदाचार में रत रहकर नित्य अनन्य
भाव से मेरा ध्यान करता है और सर्वात्म भाव से मेरा भजन करता है, वह मेरे सामीप्य को प्राप्त होता है-
सदाचाररतो भूत्वा द्विजो नित्यमनन्य धीः। मयि सर्वात्मके भावो मत्सामीप्यं भजत्ययम् (मुक्ति०१.२२-२३)।
वह द्विज जब भ्रमरकीट के समान सम्यक् रूप से मेरे सायुज्य को प्राप्त होता है, तब वह कल्याणकारी और ब्रह्मानंद
को प्रदान करने वाली सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होता है- मत्सायुज्यं द्विजः सम्यग्भजेद्भ्रमरकीटवत्। सैव सायुज्यमुक्तिः
४५८ [परिशिष्ट] परमात्मा
स्याद् ब्रह्मानन्दकरी शिवा। (मुक्ति० १.२४-२५)। कैवल्य मुक्ति पारमार्थिक रूप वाली है- कैवल्य मुक्तिरेकैव
पारमार्थिकरूपिणी (मुक्ति० १.१८)।
११५. पञ्चाग्नि — अन्वाहार्यपचन, गार्हपत्य, आहवनीय, आवसथ्य और सभ्य संज्ञक ये अग्नयाँ पञ्चाग्नि कहलाती हैं।
इनसे सम्बन्धित तत्त्वज्ञान की पञ्चाग्नि विद्या कहते हैं। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार सूर्य, बादल, पृथ्वी, पुरुष और
स्त्री संबन्धी तात्त्विक ज्ञान पञ्चाग्नि विद्या है। वायु पुराण (१०६.४१-४२) के अनुसार दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य,
आहवनीय, सभ्य और आवसथ्य-ये पाँच अग्नियाँ हैं। मत्स्य पुराण (३५.१६) के अनुसार महाराजा ययाति ने पंच
अग्नियों के बीच एक वर्ष तक तपस्या की थी। कठोपनिषद् (१.३.१) में पञ्चाग्नि सम्पन्न पुरुषों की 'पञ्चाग्नयः'
कहकर सम्बोधित किया गया है। वह प्रसिद्ध तत्पुरुष वायुमंडल से संवृत, पञ्च अग्नियों से वेष्टित तथा मन्त्रशक्ति
का नियामक है- पञ्चाग्निना समायुक्तं मन्त्रशक्तिनियामकम् (पं० ब्र० १०)।
११६. परब्रह्म —द्र०-ब्रह्म।
११७. परमगति— जब साधक आत्म तत्त्व या आत्मा में अवस्थित परमात्म तत्त्व की अनुभूति कर उसी में स्थिर हो
जाता है, तो साधक की वह अवस्था परम गति कहलाती है। इसे मोक्ष या मुक्ति की अवस्था भी कहते हैं।
कठोपनिषद् के अनुसार जब मन के साथ पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी कोई चेष्टा नहीं करती,
उस अवस्था को परमगति कहते हैं- यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः
परमां गतिम् (कठ० २.३.१०)।
गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- जो पुरुष ॐ इस एक अक्षररूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा
चिन्तन करता हुआ शरीर की त्यागकर जाता है, वह परमगति की प्राप्त होता है- ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म
व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् (गी० ८.१३)।
११८. परमपद— परम पद का शाब्दिक अर्थ है- सबसे श्रेष्ठ पद या सर्वोत्कृष्ट स्थान। इसे मोक्ष या मुक्ति के अर्थ में
भी लिया जाता है। महाभारत के शान्तिपर्व (४७.३७) में श्री कृष्ण भगवान् की ही 'परमपद' कहकर निरूपित किया
गया है। परब्रह्म का निवास जहाँ माना गया, उसे 'परमपद' कहा गया है। मनुष्यों के अन्दर हृदयाकाश में परमात्मा
का निवास है, अतः वह भी परमपद है- लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे (कठ० १.३.१)। परम पद वह पद है,
जहाँ से जीवात्मा पुनः लौटकर जन्म नहीं लेता। विवेकशील संयत मन वाला पवित्र साधक ही उस पद की प्राप्त
करता है- यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः। स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते (कठ०
१.३.८)। गीता में भगवान् उपदेश करते हैं कि जिसे वेदविद् अक्षर कहते हैं, जिसमें रागमुक्त यति प्रवेश करते हैं,
जिसको चाहने वाले ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, मैं उस परमपद का वर्णन करूँगा-यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये (गी० ८.११)।
निरालम्ब उपनिषद् के अनुसार प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरण आदि से भिन्न सच्चिदानन्दस्वरूप और नित्य मुक्त
ब्रह्म का स्थान 'परमपद' कहलाता है- प्राणेन्द्रियाद्यन्तः करणगुणादेः परतरे सच्चिदानन्दमयं नित्यमुक्तब्रह्मस्थानं
परमं पदम् (निरा० ३६)।
११९. परमात्मा—वैशेषिक दर्शन के अनुसार परमात्मा जीवात्मा से भिन्न है। वह नित्य ज्ञान, नित्य इच्छा और नित्य
संकल्प वाला है। वह सम्पूर्ण सृष्टि की चलाने वाला परमात्मा एक है, जबकि जीवात्मा अगणित हैं। सर्वोपरि या
विशुद्ध आत्माओं के समूह की परमात्मा स्वीकार किया गया है। न्याय दर्शन के अनुसार जो सबका द्रष्टा, भोक्ता,
सबको जानने वाला और सबके सुख-दुःख विषयादि का अनुभव करने वाला है, वह परमात्मा है- सर्वस्य द्रष्टा
सर्वस्य भोक्ता सर्वज्ञः सर्वानुभावी परमात्मा।
महाभारत में वर्णन मिलता है कि जब आत्मा प्रकृति (शरीर) में बद्ध रहता है, तब उसे जीवात्मा कहते हैं
और वही प्राकृत गुणों या शारीरिक गुणों से मुक्त होने पर परमात्मा कहलाता है- आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः
प्राकृतैर्गुणैः। तैरेव तु विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः (महा०)। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, उत्तम पुरुष तो
अन्य है, जो परमात्मा कहलाता है, वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में संव्यास होकर (लोकों का) भरण-पोषण
करता है- उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः (गी०१५.१७)।
परा-अपरा विद्या [परिशिष्ट] ४५९
वह श्रेष्ठ पुरुष इस शरीर में उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा भी है- उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता
भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः (गी०१३.२२)।
१२०. परा-अपरा विद्या— परा का सामान्य अर्थ है- जो सबसे परे हो या श्रेष्ठ, उत्तम। परा विद्या- वह विद्या है जो
अव्यक्त अगोचर का ज्ञान कराती है। उपनिषद् विद्या को भी परा विद्या कहा गया है। ब्रह्मवेत्ता कहते आये हैं कि
दो विद्याएँ जानने योग्य हैं- परा विद्या और अपरा विद्या-द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा
चैवापरा च (मुण्ड० १.१.४)। ऋक्, यजु, साम, अथर्व, शिक्षा, कल्प आदि अपरा विद्या है और अविनाशी ब्रह्म
से सम्बन्धित विद्या परा विद्या है- तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः ... परा यया तदक्षरमधिगम्यते (मुण्ड० १.१.५)।
१२१. परिभू — द्र०- स्वयम्भू।
१२२. परिव्रज्या-परिव्राजक— धर्म प्रचार, विद्या विस्तार तथा जन-जागरण के विराट् उद्देश्य से परिभ्रमण करना
परिव्रज्या कहलाता है। परिव्रज्या करने वाला वानप्रस्थी या संन्यासी या त्यागी पुरुष परिव्राजक या परिव्राट् कहलाता
है। यह अपना समय ध्यान, चिन्तन, तप-तितिक्षा एवं लोक कल्याण में ही लगाता है। सादा जीवन और उच्च विचार
इनका प्रमुख सिद्धांत रहा है। नारद को सब परिव्राजकों में श्रेष्ठ माना गया है, जो सब लोकों में भ्रमण करते थे- अथ
कदाचित्परिव्राजकाभरणो नारदः सर्वलोकसंचारं कुर्वन् (ना०प० १.१)। परिव्रज्या का एक अर्थ संन्यास भी
लिया जाता है। उपनिषद् में निर्देश है कि ब्रह्मचर्य समाप्त कर गृहस्थी होना चाहिए; गृहस्थी होकर वानप्रस्थी होना
चाहिए। वानप्रस्थी होकर परिव्राजक (संन्यासी) होना चाहिए; परन्तु अन्य प्रकार से (वैराग्य होने पर) ब्रह्मचर्य,
गृहस्थ या वानप्रस्थ किसी से भी परिव्राजक होना चाहिए- ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्।
वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद्वा (जाबा०४.१)। परिव्राजक चार प्रकार के
होते हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस-परिव्राजका अपि चतुर्विधा भवन्ति-कुटीचका बहूदका हंसाः
परमहंसाश्चेति (आश्र०४)।
१२३. पर्जन्य— सामान्यतया पर्जन्य का अर्थ मेघ, बादल या वर्षा से लिया जाता है। कहीं-कहीं इन्द्रदेव, सूर्यदेव या
विष्णुदेव के लिए भी यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। पर्जन्य देव को वैदिक देवताओं में परिगणित किया गया है। ये एक
अन्तरिक्ष स्थानीय देवता हैं। पर्जन्य वर्षण की सभी लोग कामना करते हैं- निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु
(तै०सं०७.५.१८.१)। पर्जन्य को अग्नि भी कहा गया है- पर्जन्यो वा अग्निः (शत०ब्रा०१४.९.१.१३)। प्रजापति ही
पर्जन्य होकर प्रजाओं के पिता (पोषक) बने- पर्जन्यो भूत्वा (प्रजापतिः) प्रजानां जनित्रमभवत् (जै०ब्रा०१.३१४)।
१२४. पवमान— पवमान शब्द 'पवित्रकारक' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। सोम 'पवित्रकारक' होने से 'पवमान' विशेषण
से प्रायः निरूपित किया गया है। स्तोत्रादि का भी विशिष्ट अंश 'पवमान स्तोत्र' कहलाता है। प्रवाहित होने या
प्रवहमान अर्थ में भी यह प्रयुक्त हुआ है, क्योंकि प्रवहमान वायु को भी पवमान कहा गया है- अयं वाव यः
(वायुः) पवते स पवमानः (काठ० सं०२२.१०), अयं वायुः पवमानः (शत०ब्रा०२.५.१.५)। अग्नि, वायु,
आदित्य, सोम, प्राण और यज्ञ ये सब पवित्रकारक होने से पवमान कहे गये हैं- त्रयो ह वा एते समुदायात्
पवमानाः अग्निर्वाद्वयुरसावादित्यः (जैमि०ब्रा०१.२७४), सोमो वै पवमानः (शत०ब्रा०२.२.३.२२), प्राणो वै
पवमानः (शत०ब्रा०२.२.१.६), पवमानो वाव यज्ञः (जै०ब्रा०१.११९)।
१२५. पाप-पुण्य— किसी कर्म में अनिष्ट साधनों या भावनाओं का प्रयोग करना पाप कहलाता है। दूसरे शब्दों में बुरा
या अशुभ कृत्य, जिससे मनुष्य बुरी गति को प्राप्त होता है, पाप कहलाता है। इसका विपर्याय पुण्य है। झूठ, पाप,
तमस् और उन्माद- ये जीव को अमृत से दूर मृत्यु की ओर ले जाते हैं- पुण्य से स्वर्ग की प्राप्ति और पाप से नरक
की प्राप्ति की मान्यता है। उपनिषद् के अनुसार सत्पुरुषों का संसर्ग स्वर्ग (पुण्यदायी) और असत् सांसारिक विषयों
एवं संसारी जनों का संसर्ग ही नरक (पापदायी) है- स्वर्ग इति च सत्संसर्गः स्वर्गः। नरक इति च
असत्संसारविषयजनसंसर्ग एव नरकः (निरा०१६-१७)। सतोगुणी कर्मों से पुण्य तथा तमोगुणी कर्मों से पाप की
प्राप्ति होती है अथवा धर्म से पुण्य तथा अधर्म से पाप की प्राप्ति होती है। पाप-पुण्य की सरल परिभाषा निम्नांकित
श्लोक में है, जिसमें कहा गया है कि परोपकार करना, दूसरों की भलाई करना, पुण्य है और दूसरों को पीड़ा
पहुँचाना-दुःखी करना पाप है- अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥
४६० [परिशिष्ट] पुरुषसूक्त
१२६. पितर — द्र०- पूर्वज।
१२७. पुत्रैषणा — द्र०- एषणा त्रय।
१२८. पुनर्जन्म — मृत्यु के बाद पुनः शरीर धारण करने को पुनर्जन्म कहा जाता है। गीता में कहा गया है कि जन्मने
वाले की मृत्यु सुनिश्चित है और मरने वाले का जन्म भी निश्चित है- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च
(गी०२.२७)। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देहधारी
(आत्मा) पुराने शरीर को छोड़कर दूसरे नये शरीरों को पाता है- वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति
नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही (गी०२.२२)। कर्मफल एवं आसक्ति
के अनुसार जीवात्मा को विविध योनियों में बार-बार जन्म-मरण चक्र में फँसना पड़ता है। विविध लोकों में
कर्मफल को भोगकर फिर उसे इसी लोक में पुनर्जन्म ग्रहण करना पड़ता है। गीता में भगवान् ने कहा है-हे अर्जुन !
ब्रह्मलोक तक सारे लोक पुनरावृत्ति वाले हैं, परंतु मुझको पाकर पुनर्जन्म नहीं होता- आब्रह्मभुवनाल्लोकाः
पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते (गी०८.१६)।
१२९. पुराण — पुराण शब्द का सामान्य अर्थ है- पुरातन या प्राचीन। पुराणकालीन महात्माओं, राजाओं, देवों, पुरुषों के
वृत्तान्त जो परम्परागत रूप में चले आते हों; उन्हें भी पुराण कहते हैं। पुराण अट्ठारह हैं। पुराणों के नामों का संक्षिप्त
उल्लेख इस प्रकार है- मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्। अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्-पृथक्
(दे०भा०१.३.२)। अर्थात् मद्वय (मत्स्य, मार्कण्डेय), भद्वय (भागवत, भविष्य), ब्रत्रय (ब्रह्म, ब्रह्मवैवर्त, ब्रह्माण्ड),
वचतुष्टय (वाराह, विष्णु, वामन, वायु), अनापलिंगकूस्क (अग्नि, नारद, पद्म, लिङ्ग, गरुड़, कूर्म और स्कन्द)
अट्ठारह पुराण कहे गये हैं। अट्ठारह उपपुराण भी प्रसिद्ध हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं - सनत्कुमार, नृसिंह,
बृहन्नारदीय, शिव, दुर्वासा, कापिल, मानव, औशनस, वारुण, कालिका, साम्ब, नन्दिकेश्वर, सौर, पाराशर, आदित्य,
ब्रह्माण्ड, माहेश्वर, देवीभागवत। पुराणों के पाँच लक्षण माने गये है- सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वंतराणि च।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम् (ब्र० वै० पु० श्री कृष्ण जन्म० ४.१.३.७)। शिवपुराण के रेवा माहात्म्य में
वर्णन है कि अट्ठारह पुराणों के वक्ता सत्यवती व्यासदेव हैं। पुराण और स्मृति ग्रन्थ दोनों ही अठारह प्रसिद्ध हैं-
वायुपुत्र महाबाहो किं तत्त्वं ब्रह्मवादिनाम्। पुराणेष्वष्टादशसु स्मृतिष्वष्टादशस्वपि (रा०२० १.२)। परमात्मा
को सबसे प्राचीन होने के कारण पुराण पुरुष कहा गया है, वह सबकी हृदय गुहा में संव्यास होकर छिपा हुआ है-
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गहरेष्ठं पुराणम् (कठ० १.२.१२)।
१३०. पुरुष-परम पुरुष — 'पुरुष' शब्द की व्युत्पत्ति 'पुरि शेते इति' (पुर अर्थात् शरीर में शयन करता है) की गयी
है। इस अर्थ में प्रत्येक व्यक्ति पुरुष है, वह चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष। वह दिव्य पुरुष-परम पुरुष प्राणियों की देह
के मध्य भाग में अवस्थित रहता है। वह अङ्गुष्ठमात्र परिमाण का पुरुष धूम्ररहित ज्योतिरूप में स्थित रहता है-
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति। अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः (कठ०२.१.१२-१३)। अव्यक्त
शक्ति (प्रकृति) से श्रेष्ठ वह परम पुरुष अत्यन्त व्यापक और आकाररहित है, जिसे जानकर जीव बन्धनमुक्त होकर
अमरत्व को प्राप्त करता है- अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च
गच्छति (कठ०२.३.८)। वही परम पुरुष तीन रूपों में प्रकट हुआ-आत्मा, अन्तरात्मा (जीवात्मा) और परमात्मा
कहलाता है- त्रिविधः पुरुषोऽजायत ऽऽत्माऽन्तरात्मा परमात्मा चेति (आत्मो०१)। वह विराट् स्वरूप आदित्य
के सदृश प्रकाशस्वरूप है- वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् (श्वेता०३.८)। वह पुरुष सोलह
कलाओं से युक्त है- षोडशकलः सोम्य पुरुषः (छान्दो०६.७.१)। वह दिव्य पुरुष यज्ञरूप है, संकल्परूप है-
पुरुषो वाव यज्ञः (छान्दो०३.१६.१), अथ खलु क्रतुमयः पुरुषः (छान्दो०३.१४.१)। वह पुरुष अविनाशी और
अमृतस्वरूप आत्मारूप है- यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा (मुण्ड०१.२.११)। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (१०.९०)
में आदि पुरुष की कल्पना विराट् पुरुष अथवा विश्वपुरुष के रूप में की गयी है।
१३१. पुरुषसूक्त — ऋग्वेद के दसवें मण्डल के नब्बेवें सूक्त को अथवा यजुर्वेद के ३१ वें अध्याय के १६ मन्त्रों के
समूह को जिसका प्रारम्भ 'सहस्रशीर्षा' से होता है, पुरुष सूक्त कहते हैं। इसमें विराट् नारायण पुरुष की स्तुति की
पुरोनुवाक्या [परिशिष्ट] ४६१
गयी है। मुद्गलोपनिषद् के प्रथम खण्ड में पुरुषसूक्त द्वारा प्रतिपादित अर्थ निर्णय का विवेचन किया गया है-
पुरुषसूक्तार्थ निर्णयं व्याख्यास्यामः (मुद्ग०१.१)। व्याख्या के अन्त में निरूपण है कि पुरुषसूक्त का ज्ञाता मुक्ति
अवश्य प्राप्त करता है- य एवमेतज्जानाति स हि मुक्तो भवेदिति। (मुद्ग० १.९)
१३२. पुरोनुवाक्या - यज्ञों में तीन प्रकार की आहुतियों में से एक पुरोनुवाक्या आहुति दी जाती है। यह आहुति जिस
ऋचा को पढ़कर दी जाती है, उस ऋचा को भी पुरोनुवाक्या कहकर स्वीकार किया गया है। इन ऋचाओं को पृथ्वी,
प्राण और भ्रातृव्य देवता से सम्बद्ध किया गया है- पृथिवीलोकमेव पुरोऽनुवाक्यया (शत० ब्रा० १४.६.१.९),
प्राण एव पुरोऽनुवाक्या (बृह० ३.१.१०), भ्रातृव्यदेवतया वै पुरोनुवाक्या (तै०सं० १.६.१०.४)।
१३३. पूर्वज-गोत्रज - पूर्वकाल में उत्पन्न पुरुषों को पूर्वज कहा जाता है। बाप, दादा, परदादा आदि ऊपर की पीढ़ियों
में उत्पन्न पुरुषों को पूर्वज या पितर कहते हैं। अपने ही गोत्र या वंश में उत्पन्न पुरुषों को गोत्रज या वंशज कहा
गया है। सभी मनुष्य मान्य ऋषियों की संतान-परम्परा के हैं। अपने कुल या वंश के आदिपुरुष-ऋषि के नाम से
वंशसंज्ञा को गोत्र कहा गया है। सभी के गोत्र प्रवर्तक कोई न कोई ऋषि ही हैं। कभी-कभी शिष्य अपने गुरु के गोत्र
को ही अपना गोत्र स्वीकार करता है। पूर्वजों या पितरों के नाम पर श्राद्ध (स्वधा) या जलदान तर्पण किया जाता
है- स्वधां पितृभ्यः (छान्दो० २.२२.२)। उपनिषद् का कथन है कि जो मनुष्यों के सौ आनन्द हैं, वे पितृलोक को
जीतने वाले पितृगणों का एक आनन्द है- अथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः। स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दः
(बृह० ४.३.३३)।
१३४. प्रकृति-पुरुष - सांख्य दर्शन में प्रमुख रूप से पुरुष और प्रकृति ये दो तत्त्व माने गये हैं। प्रकृति अव्यक्त है,
वही व्यक्त होने पर जगत् का रूप ले लेती है। प्रकृति से जगत् की उत्पत्ति का क्रम निम्न प्रकार प्रतिपादित है- प्रकृति
से महत्तत्त्व (बुद्धि), महत्तत्त्व से अहंकार, अहंकार से पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्रा से एकादश इन्द्रिय और उनसे
फिर पञ्चमहाभूत। इन चौबीसों तत्त्वों से जगत् की उत्पत्ति हुई। इसी क्रम से सारा जगत् फिर नष्ट होकर अपने मूल
प्रकृति रूप में आ जाता है। प्रकृति की उत्पत्ति उस अविनाशी पुरुष से ही होती है। उपनिषद् के अनुसार जैसे
मकड़ी तन्तु-जाल को उत्पन्न करती है और अपने में ही समेट लेती है, जैसे पुरुष से केश और लोम उत्पन्न होते
हैं, वैसे ही अक्षर पुरुष से यह विश्व उत्पन्न होता है- यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः
सम्भवन्ति। यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वम् (मुण्ड० १.१.७)।
प्रकृति जड़ है और पुरुष चेतन। प्रकृति और पुरुष पृथक्-पृथक् होकर कर्म नहीं कर सकते। पुरुष प्रकृति
में स्थित होकर ही प्रकृतिजन्य गुणों का उपभोग करता है-पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् (गी०
१३.२१)। गीता में भगवान् ने कहा है कि पुरुष और प्रकृति दोनों ही अनादि हैं और प्रकृति से ही समस्त गुण और
विकार उत्पन्न हुए हैं- प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्॥
(गी० १३.१९) प्रकृति सत्, रज और तम तीनों गुणों की साम्यावस्था है- साम्यावस्था प्रकृतिः (सां०द० १.६१)।
प्रकृति को पुरुष की ही महाशक्ति माना गया है। मूल सूक्ष्म प्रकृति ही घनीभूत होकर स्थूल हो जाती है और सृष्टि
के सम्पूर्ण पदार्थों की रचना करती है। गीता के अनुसार भगवान् की प्रकृति आठ भेदों में विभाजित है-
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा (गी० ७.४)। प्रकृति
क्रियाशील और पुरुष निष्क्रिय द्रष्टा है। इस सम्पर्क से पुरुष में जो भ्रम उत्पन्न होता है, उसके कारण पुरुष प्रकृति
के कार्यों का अपने ऊपर आरोपण कर लेता है और इससे उनके परिणामों से उत्पन्न सुख-दुःख भोगता है।
१३५. प्रज्ञा-प्रज्ञान - प्रज्ञा का सामान्य अर्थ है- प्रकृष्ट ज्ञान या श्रेष्ठ बुद्धि। विवेकवान्, विद्वान् या चैतन्य पुरुष को
प्रज्ञान कहा गया है। अन्तर्दृष्टि या अनुभूति के द्वारा आत्मा या परमात्मा के सम्बन्ध में जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे
भी प्रज्ञा या प्रज्ञान कहते हैं। बुद्धि का परिष्कृत रूप जिसमें दूरदर्शिता तथा विवेकशीलता भी समाविष्ट है, 'प्रज्ञा' रूप
में मान्य है। उपनिषद् के अनुसार जिसमे बौद्धिक वृत्तियों की, ज्ञातव्य विषयों को, कामनाओं को ग्रहण करते हैं,
उसे प्रज्ञा कहते हैं- केन धियो विज्ञातव्यं कामानिति। प्रज्ञयेति ब्रूयात् (कौ० ब्रा० १.७)। प्रज्ञा को निर्विकल्प
और चिन्मात्रा वृत्ति से सम्बद्ध किया गया है-निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते (अध्या० ४४)। प्राण
को भी प्रज्ञा से सम्बद्ध किया गया है। यो वै प्राणः सा प्रज्ञा (कौ० ब्रा० ३.३)। कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में
४६२ परिशिष्ट प्रमाद
'प्रज्ञा' के कार्य व्यवहार को विस्तारपूर्वक समझाया गया है। प्रज्ञा से मनुष्य सत्य और संकल्प शक्ति को धारण करता
है- प्रज्ञया सत्यं संकल्पम् (कौ० ब्रा० ३.२)। प्रकृष्ट ज्ञान को प्रज्ञान कहते हैं। प्रकृष्ट ज्ञान ही ब्रह्मज्ञान है, क्योंकि
ब्रह्म की ही त्रैकालिकी सत्ता है और वही ज्ञान का परमलक्ष्य है। उपनिषद् ग्रन्थों में इसीलिए प्रज्ञान को ब्रह्म का
पर्याय माना गया है- प्रज्ञानं ब्रह्म (शु०२० २.१, आ०बो० १.१)।
१३६. प्रतिष्ठा - प्रतिष्ठा शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं- स्थापना, स्थान, गौरव, कीर्ति, आदर, निवास, आधार आदि।
उपनिषद् में वर्णित है कि जो कोई प्रतिष्ठा को जानता है, वह इस लोक और परलोक में प्रतिष्ठित होता है। चक्षु
ही प्रतिष्ठा है- यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च। चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा (छान्दो०
५.१.३)। जब साधक उस परमात्मा की अदृश्य, अशरीर, अवर्णनीय, अनाश्रित, अभय, प्रतिष्ठा (स्थिति) को प्राप्त
करता है, तब वह सर्वदा निर्भय पद को प्राप्त होता है- यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं
प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति (तैत्ति० २.७.१)। चारों दिशाओं के सदृश प्रतिष्ठा भी चार प्रकार की
मानी गयी है- अथ याश्चतस्रः प्रतिष्ठा इमा एव ताश्चतस्रो दिशः (जै० उ० १.२१.२)।
१३७. प्रत्यगात्मा - प्रत्यगात्मा शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- प्रत्यक् + आत्मा। वह पुरुष जिसकी चित्तवृत्ति निर्मल
हो चुकी हो, जो अपना स्वरूप समझने लगा हो, जिसे आत्मज्ञान की प्राप्ति हो गयी हो, उसे प्रत्यगात्मा कहा गया
है। यह शब्द विशुद्ध अन्तरात्मा या परमेश्वर के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। उपनिषद् का कथन है कि कोई विरला धीर
पुरुष ही अमरत्व प्राप्ति की इच्छा करके चक्षु आदि इन्द्रियों को बाह्य विषयों से लौटाकर अन्तरात्मा (प्रत्यगात्मा)
को देख पाया है- कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् (कठ० २.१.१)। सर्वसारोपनिषद् में
प्रश्न है- प्रत्यगात्मा, परमात्मा और माया ये तत्त्व क्या हैं? प्रत्यगात्मा को जीवात्मा के आशय से त्वं पद से निरूपित
किया गया है। प्रत्यगात्मा अज्ञान, माया और शक्ति का साक्षीरूप है। मैं ही एक ब्रह्मरूप हूँ, इस प्रकार का भाव
चिन्तन करते हुए वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है- प्रत्यगात्मानमज्ञानमायाशक्तेश्च साक्षिणम्। एकं ब्रह्माहमस्मीति
ब्रह्मैव भवति स्वयम् (कठ०रु० १६)।
१३८. प्रत्याहार - योग के अन्तर्गत योग के आठ अङ्गों का निरूपण शास्त्रों में दृष्टिगोचर होता है- यमनियमासन-
प्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि (यो०द० २.२९)। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
धारणा, ध्यान, समाधि। प्रत्याहार में चित्तवृत्तियों को या इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर चित्त को हर स्थिति में
शान्त रखा जाता है। अपने चिन्तन को अनात्म पदार्थों से हटाकर आत्मा में लगाये रहना प्रत्याहार है। इसी तथ्य की
पुष्टि अमृतनादोपनिषद् में होती है- शब्दादि विषयान् पञ्च मनश्चैवातिचञ्चलम्। चिन्तयेदात्मनो रश्मीन्
प्रत्याहारः स उच्यते (अमृ० ५)। योगी कुम्भक में स्थित होकर (प्राणायाम द्वारा प्राण को भीतर धारण किये रहना)
इन्द्रियों को उनके विषयों से खींचकर लाए, यह प्रत्याहार कहा जाता है। उस समय नेत्रों से जो कुछ देखे, उसे
आत्मभावना से ग्रहण करे- इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो यत्प्रत्याहरणं स्फुटम्। योगी कुम्भकमास्थाय प्रत्याहारः स
उच्यते। यद्यत्पश्यति चक्षुर्भ्यां तत्तदात्मेति भावयेत् (यो०त० ६८-६९)। इस प्रकार के अभ्यास से योगी को चित्त
शक्ति बढ़ती जाएगी। प्रत्याहार से इन्द्रियों के सांसर्गिक दोषों को तथा ध्यान से अनीश्वरीय गुणों को नष्ट किया जाता
है- प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरानुणान् (अमृ० ८)।
१३९. प्रमाद - प्रमाद का सामान्य अर्थ मानसिक आलस्य, शिथिलता या अक्रियता के रूप में लिया जाता है। कहीं इसे
उन्माद, लापरवाही या आन्तरिक दुर्बलता कहकर निरूपित किया गया है। ब्रह्मनिष्ठों के लिए प्रमाद करना अनुचित
है और ब्रह्मवादिन् के लिए विद्या में प्रमाद मृत्यु के सदृश कहा जाता है- प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः
कदाचन। प्रमादो मृत्युरित्याहुर्विद्यायां ब्रह्मवादिनः (अध्या० १४)। गीता में भगवान् ने प्रमाद को तमस् का रूप
बताया है, जो जीवात्मा को बाँधता है- तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति
भारत (गी०१४.८)। मनुष्य का तमोगुण ही उसके ज्ञान को ढककर उसे प्रमाद में लगाता है- ज्ञानमावृत्य तु तमः
प्रमादे संजयत्युत (गी० १४.९)। रामानुजाचार्य ने कहा है- "कर्त्तव्य कर्म से भिन्न कर्म में प्रवृत्त करने वाली
असावधानी का नाम प्रमाद है।" अर्थात् प्रमाद से कर्त्तव्यशीलता नष्ट हो जाती है, जो व्यक्ति को कल्याण मार्ग से
च्युत कर देती है।
प्राज्ञ परिशिष्ट ४६३
१४०. प्राज्ञ — वेदान्त दर्शन की मान्यतानुसार 'प्राज्ञ' जीव की एक संज्ञा है। शंकराचार्य के अनुसार 'परब्रह्म' ही
देहेन्द्रिय, मन एवं बुद्धि आदि की उपाधियों से परिच्छिन्न होकर शरीरधारी जीव कहा जाता है। दूसरे शब्दों में हम
कह सकते हैं कि परब्रह्म (शुद्ध चैतन्य) ही अविद्या की उपाधि से युक्त होकर शरीरेन्द्रिय से परिच्छिन्न होकर 'जीव'
कहलाता है। कुछ विद्वान् घटावच्छिन्न आकाश की तरह शरीरचित्तावच्छिन्न चैतन्य को जीव कहते हैं। 'जीव' का
सम्बन्ध तीनों शरीरों १. स्थूल २. सूक्ष्म ३. कारण से होता है। अन्नादि से परिपोषित चर्मचक्षुओं से दृष्टिगोचर होने
वाला शरीर 'स्थूल-शरीर' कहलाता है। इस स्थूल के अन्दर ज्ञानेन्द्रियों-कर्मेन्द्रियों-प्राण, मन एवं बुद्धि का एक
तन्त्र कार्य करता हुआ अनुभव में आता है-यह सूक्ष्म-शरीर है। सूक्ष्म शरीर को भी सक्रिय-गतिमान् करने वाला
अज्ञानोपहित चैतन्य जो अहंकार आदि का कारण है, 'कारण शरीर' कहलाता है।
उक्त तीनों शरीरों से सम्बद्ध चैतन्य को तीन संज्ञाएँ प्रदान की गई हैं। स्थूल शरीर की व्यष्टि उपहित चैतन्य
की 'विश्व', सूक्ष्म शरीर की व्यष्टि उपहित चैतन्य की 'तैजस' तथा कारण शरीर की व्यष्टि उपहित चैतन्य की 'प्राज्ञ'
संज्ञा है। 'प्राज्ञ' संज्ञक अज्ञानोपहित चैतन्य मलिन सत्त्व प्रधान होने से अधिक प्रकाशक नहीं होता। यह आनन्दमय
कोश से समन्वित है। सभी प्रपञ्चों (सक्रियता) का इसमें उपराम होने से इसकी सुषुप्ति अवस्था होती है। आनन्द
की अनुभूति करने वाला चैतन्य यही 'प्राज्ञ' है।
१४१. प्राण-पञ्चप्राण — सूक्ष्म जीवनवायु के पाँच प्रकारों- प्राण, अपान, व्यान, उदान तथा समान में से एक प्राण है।
व्यापक रूप में प्राण शब्द ज्ञानेन्द्रिय या चेतना को प्रकट करता है। कभी-कभी यह शब्द केवल श्वास का साधारण
अर्थ बोध कराता है। जिस आन्तरिक सूक्ष्म शक्ति द्वारा जीवात्मा का दृश्य जगत् में देह से सम्बन्ध होता है, उसे
प्राणशक्ति कहते हैं। यह प्राणशक्ति ही स्थूल प्राण (ऊर्ध्वगमनशील), अपान (अधोगमनशील), व्यान (सम्पूर्ण
शरीर में गमनशील), उदान (उद्गिरनशील-उगलने की प्रवृत्ति) एवं समान (समान वितरणशील-रस, रक्त आदि
का समान वितरण) की सञ्चालिका है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और स्थिति के मूल में इस प्राणशक्ति का ही
साम्राज्य है। प्राण को साक्षात् ब्रह्म के रूप में स्वीकार किया गया हैं- प्राणो वै ब्रह्म (जै०उ०३.३८.२)। प्राण ही
प्राणियों की आयु है-प्राणो हि भूतानामायुः (तैत्ति०२.३.१)। प्राणा वै यशो वीर्यम् (बृह०१.२.६), यो वै
प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः (कौ०ब्रा०३.३)। आदित्य प्राणरूप ही है, क्योंकि वे ही प्राण बरसाते हैं-
आदित्यो ह वै प्राणः (प्रश्न०१.५)। रथ के पहिए की नाभि में लगे अरों की भाँति प्राण में ही सब प्रतिष्ठित हैं-
अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् (प्रश्न०२.६)। प्राण को ही इन्द्र तथा रुद्र रूप में परिरक्षक कहा गया है-
इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता (प्रश्न०२.९)। नाग (डकार आना), कूर्म (पलक झपकना), कृकल
(भूख लगना), धनञ्जय (समस्त शरीर का पोषण करना), देवदत्त (जँभाई आना)-ये पाँच उपप्राण कहलाते हैं।
१४२. प्रारब्ध — मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, परन्तु फल भोगने में नहीं। मनुष्य के सभी कर्म सञ्चित होते रहते हैं,
जिसका फल उसे भविष्य में अवश्य भोगना पड़ता है। दूसरे कर्म वे हैं, जिसका फल वह वर्तमान में भोग रहा है,
उसे प्रारब्ध कर्म कहते हैं। जन्मभेद से कर्म के चार विभाग किये जाते हैं- सञ्चित, प्रारब्ध, क्रियमाण और भावी।
प्रारब्ध कर्मों के फलभोग प्रारम्भ हो चुके होते हैं। इसे भाग्य या किस्मत भी कहते हैं। नादबिन्दूपनिषद् में वर्णन
मिलता है कि जन्म-जन्मान्तरों के जो कर्म हैं, वे ही प्रारब्ध कहे गये हैं- कर्म जन्मान्तरीयं यत्प्रारब्धमिति
कीर्तितम् (ना०बि०२३)। उपनिषद् का कथन है कि समस्त प्रारब्ध कर्मों को भोगते हुए तुम्हें उद्विग्न नहीं होना
चाहिए- प्रारब्धमखिलं भुञ्जन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि (ना०बि०२१)। तत्त्वज्ञान हो जाने पर भी प्रारब्ध नहीं छोड़ता,
किन्तु तत्त्वज्ञान हो जाने से प्रारब्ध (ज्ञानी की दृष्टि में) नहीं रहता- उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने प्रारब्धं नैव मुञ्चति।
तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते (ना०बि०२२)।
१४३. बन्धन — मोक्ष की प्राप्ति मनुष्य का परम लक्ष्य है। इसके विपरीत मोक्ष प्राप्ति में बाधक सभी घटकों को बन्धन
कहा गया है। सांसारिक विषयों, पदार्थों अथवा व्यक्तियों से अत्यधिक ममता या आसक्ति का होना बन्धन है।
कामना से युक्त कर्मों को भी बन्धन रूप कहा गया है। विषय-विकारों तथा अहम्भाव को बंधन माना गया है।
निरालम्ब उपनिषद् में बन्धन रूप सभी तथ्यों को विस्तारपूर्वक उपन्यस्त किया गया है। अनादि अविद्या की वासना
(संस्कार) द्वारा उत्पन्न इस प्रकार का विचार कि मैं हूँ (मैं ही जन्मता-मरता हूँ), यही बन्धन है। माता-पिता, भ्राता,
४६४ [परिशिष्ट] ब्रह्म-परब्रह्म
पुत्र, गृह, उद्यान तथा खेत आदि मेरे अपने हैं, इस प्रकार के सांसारिक आवरण स्वरूप विचार भी बन्धन रूप है।
कर्तापन के अहंकार का संकल्प भी बन्धनरूप है। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्यों को प्राप्त करने का सङ्कल्प भी बन्धन
है। कामनापूर्ति के लिए सङ्कल्पपूर्वक को गयी उपासना भी बन्धन रूप है। यमादि अष्टाङ्ग योग का सङ्कल्प भी
बन्धन ही है। वर्ण और आश्रम धर्म-कर्म के सङ्कल्प भी बन्धन स्वरूप है। आशा, भय, संशय आदि के सङ्कल्प भी
बन्धन हैं। यज्ञ, व्रत, तप और दान के विधि-विधान तथा ज्ञान के सङ्कल्प भी बन्धन हैं। मोक्ष प्राप्ति का विचार करना
भी बन्धन है। सङ्कल्प मात्र से जो कुछ सम्भव है, वह सभी बन्धनस्वरूप है (निरा० १८-२८)। गीता ३.९ में
यज्ञार्थाय कर्म के अतिरिक्त अन्य सभी कर्मों को बन्धनस्वरूप माना गया है। उपनिषद् के अनुसार मन ही मनुष्यों
के बन्धन और मोक्ष का कारण है। विषयों में आसक्त मन ही बन्धन का कारण है और विषय रहित मन मोक्ष का
कारण है- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतमिति
(मैत्रा०४.११)।
१४४. बलि— भूमि को उपज का वह अंश जो भूपति (कृषक) प्रतिवर्ष राजा को देता है, उसे बलि कहते हैं। उपहार
या भेंट या देवता को दिया गया भोज्य पदार्थ भी बलि कहलाता है। पञ्च महायज्ञों में चौथा भूतयज्ञ भी बलि कहा
जाता है। भूतबलि के अन्तर्गत पिपीलिका बलि, श्वानबलि, गो-बलि, काकबलि, देवबलि आदि है। श्राद्ध या पितरों
को बलि देना पितृयज्ञ होता है। सम्पूर्ण प्रजा और सम्पूर्ण देवगण प्राणरूप ब्रह्म को बलि (भेंट) समर्पित करते हैं-
तुभ्यं प्राणः प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि (प्र०२.७), तथो एवास्मै (प्राणाय ब्रह्मणे)
सर्वाणि भूतान्ययाचमानायैव बलिं हरन्ति (कौ०ब्रा०२.१), तस्मै वा एतस्मै प्राणाय ब्रह्मण एताः सर्वा देवता
अयाचमानाय बलिं हरन्ति (कौ०ब्रा०२.१)। पके हुए अन्न में से एक अंश अग्नि आदि देवों को अर्पित करना
बलिवैश्व कहलाता है। भूतयज्ञ को बलिवैश्व देव भी कहते हैं।
१४५. बुद्धि-धी— मनुष्य की वह शक्ति, जिसके द्वारा वह उपस्थित विषय के सम्बन्ध में ठीक-ठीक निर्णय या निश्चय
करता है। इसी को धीष्णा, धी, मति आदि भी कहते हैं। इसी के परिष्कृत स्वरूप को मनीषा कहते हैं। इसी के
उत्तरोत्तर विकास क्रम में प्रज्ञा, मेधा, भूमा और ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है। बुद्धि को चैतन्य आत्मा का गुण माना
जाता है। मनस्, इन्द्रियाँ और अहंकार बुद्धि के लिए कार्य करते हैं। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र में सवितादेव मे यह प्रार्थना
को गयी है कि हम उस सविता के वरेण्य भर्ग (पापनाशक तेजस्) को धारण करते हैं, वह देव हमारी बुद्धि को
सन्मार्ग में प्रेरित करे (ऋ० ३.६२.१०)। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने बुद्धि के सात्त्विकी, राजसी और तामसी- ये
तीन भेद बताये हैं । अन्तःकरण चतुष्टय के अन्तर्गत मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार हैं। बुद्धि से मनुष्य समझता है।
चित्त मे चैतन्य होता है। अहंकार मे अहंता का अनुभव करता है- बुद्ध्या बुध्यति। चित्तेन चेतयति।
अहंकारेणाहंकरोति (ना०प०६.३)।
१४६. बोध-प्रतिबोध— ज्ञान, समझ या जानकारी के अर्थ में बोध शब्द प्रयुक्त होता है। सामान्यतया विशिष्ट
अनुभूतिजन्य ज्ञान के अर्थ में भी बोध शब्द का प्रयोग होता है। आत्मबोध मनुष्य का परम लक्ष्य है। उपनिषद् ज्ञान
के अनुसार अहम्भाव (सत्त्वभाव) और दयाभाव-यह ज्ञान को पराकाष्ठा है- अहंभावो दयाभावो बोधस्य परमावधिः
(अध्या०४१)। वैराग्य का फल बोध होता है और बोध का फल चित्तशान्ति है-वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः
फलम् (अध्या०२८)।
प्रतिबोध शब्द के पर्याय जागरण, ज्ञान, स्मरण आदि हैं। अन्तःप्रेरणा से प्राप्त बोध या अन्तःस्फुरणा से
उत्पन्न ज्ञान के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग कहीं-कहीं हुआ है। केनोपनिषद् में वर्णित है कि प्रतिबोध मे उत्पन्न ज्ञान
ही यथार्थ है, इसी से अमृतस्वरूप परमात्मा को प्राप्ति होती है- प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते (केन०२.४)।
१४७. ब्रह्म-परब्रह्म— वेदान्त दर्शन का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय 'ब्रह्म' है। 'ब्रह्म' शब्द की व्युत्पत्ति ही अपने स्वरूप
को प्रकट कर देती है- बृंहति वर्द्धते निरतिशयमहत्त्वलक्षणवृद्धिमन् भवतीत्यर्थः (शब्द०)। बृंह् धातु वर्धमान-
वृद्धिमन् अर्थ में प्रयुक्त होती है, जो निरतिशय महत्त्व को दृष्टि से वृद्धिमान् है, वह ब्रह्म है, अर्थात् जो सत्ता सर्वत्र
विद्यमान है-शाश्वत है-नित्य है-अपरिवर्तनशील है, वह 'ब्रह्म' है, इससे अतिरिक्त अन्य सभी नश्वर हैं- ब्रह्मैव
नित्यं वस्तु तदन्यदखिलमनित्यम्।
ब्रह्मचर्य [परिशिष्ट] ४६५
ब्रह्म का स्वरूप प्रकट करने के क्रम में आचार्यों ने दो प्रकार के लक्षणों का उल्लेख किया है- १. स्वरूप
लक्षण, २. तटस्थ लक्षण। जो लक्षण वस्तु के स्वरूप के अन्तर्गत आ जाता हो और अन्यों से भेद करने वाला हो,
वह स्वरूप लक्षण कहलाता है, जैसे- 'सच्चिदानन्दं ब्रह्म, सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि
श्रुति वचनों में 'ब्रह्म' को सत्, चित्, आनन्द, सत्य, ज्ञानवान्, अनन्त तथा विज्ञानवान् (विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न) और
आनन्दमय कहा गया है। ये विशेषताएँ ब्रह्म के अन्तर्गत हैं, अन्यत्र नहीं। अतः यह 'ब्रह्म' का स्वरूप लक्षण हुआ।
जो लक्षण स्वरूप के अन्तर्गत न होने पर भी अन्य से भेद करने वाला हो, वह 'तटस्थ-लक्षण' कहलाता है, जैसे-
'जन्माद्यस्य यतः। (ब्र० सू० १.१.२), यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभि
संविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म' (तैत्ति० ३.१) इत्यादि श्रुति वचनों में 'ब्रह्म' को जन्म, स्थिति, प्रलय का
निमित्त कारण कहा गया है, किन्तु वह स्वयं जन्म आदि से परे है और उसकी उक्त विशेषताएँ अन्यत्र कहीं हैं भी
नहीं, अतएव यह (जन्मादि का निमित्त कारण होना) ब्रह्म का तटस्थ लक्षण हैं।
इस प्रकार लक्षण के दोनों भेदों के आधार पर 'ब्रह्म' सत्य, ज्ञानस्वरूप, अनन्त, सत्, चित्, आनन्द, जन्म,
स्थिति, प्रलय का निमित्त कारण आदि विशिष्टताओं से मण्डित सिद्ध होता है। इस तथ्य का प्रतिपादन श्रुतिवचनों
में प्रायः मिलता है, जैसे- कठोपनिषद् में कहा गया है कि वह (ब्रह्म) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध रहित है, अनादि
हैं, अनन्त है, उसका साक्षात्कार करने वाला मृत्यु के मुख से मुक्त हो जाता है अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर लेता है-
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्
प्रमुच्यते (कठो०१.३.१५)। उस नित्य, शुद्ध, मुक्त, अजन्मा परमतत्त्व, ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार हो जाने से हृदय
की ग्रन्थियाँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, सभी संशय नष्ट हो जाते हैं और उसके समस्त प्रारब्ध कर्म क्षीण हो जाते हैं,
परिणामतः वह मुक्त हो जाता है-भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे
परावरे (मुण्ड०२.२.८, महो०४.८२)। छान्दोग्य उपनिषद में उस ब्रह्म तत्त्व को उपासना करने का निर्देश इस तथ्य
के साथ दिया गया है कि वही सब जगह हैं, उसी से सभी जन्म पाते हैं, उसी में स्थित रहते हैं और अन्त में उसी
में विलीन हो जाते हैं - सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत (छान्दो०३.१४.१)।
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार ब्रह्म के दो रूप हैं- १. कार्य ब्रह्म, २. कारण ब्रह्म। कारण ब्रह्म को ही परब्रह्म
कहा गया है। पुरुष सूक्त के अनुसार- 'त्रिपादूर्ध्वऽउदैत्पुरुषः पादोस्येहाभवत्पुनः'। ब्रह्म का तीन चौथाई अंश
जो अनन्त अन्तरिक्ष में व्याप्त रहता है, जिसका इस सृष्टि से विश्व ब्रह्माण्ड से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं, वह परब्रह्म
कहलाता है। उसी का एक चौथाई अंश जो प्रत्यक्ष विश्व ब्रह्माण्ड में सक्रिय हैं, उसे ब्रह्म के रूप में जाना जाता है।
१४८. ब्रह्मचर्य- चारों आश्रमों में से प्रथम ब्रह्मचर्य आश्रम कहलाता है। उपनयन के अनन्तर बालक के वेदाध्ययन
तक के समय को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचारी को यह व्युत्पत्ति-ब्रह्मणि चरति इति ब्रह्मचारी-दोनों भावों को
प्रकट कर देती हैं, जो ब्रह्म (वेद-परब्रह्म) के चिन्तन-मनन में तल्लीन होता हैं, वह ब्रह्मचारी होता है। वीर्यरक्षा या
अष्टविध मैथुन से बचने का व्रत भी ब्रह्मचर्य है। अथर्ववेद के एक सूक्त ११.५ में ब्रह्मचारी के लिए प्रशंसापरक
प्रतिपादन है। इसके प्रथम मन्त्र में वर्णन है कि ब्रह्मचारी भूमि तथा आकाश दोनों को हिलाता हुआ चलता है। देवता
उसके अनुकूल होते हैं। वह पृथ्वी तथा द्युलोक को थामे हुए हैं। वह अपने तप से आचार्य को पुष्ट करता है।
उपनिषद् का कथन है कि उस ब्रह्म को चाहने वाले साधक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं- यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं
चरन्ति (कठ० १.२.१५)। छान्दोग्य उपनिषद् (८.५.१) में ब्रह्मचर्य के विषय में प्रतिपादन है कि जिसे यज्ञ कहते
हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है, वह ब्रह्मचर्य के द्वारा ही उसे (आत्मतत्त्व को) प्राप्त होता है। जिसे इष्ट
कहते हैं, वह भी ब्रह्मचर्य ही हैं, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा पूजन करके पुरुष आत्मा को प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य और
तप के द्वारा ही देवों ने मृत्यु को जीत लिया है-ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत (अथर्व० ११.७.१९)।
१४९. ब्रह्मजज्ञ - ब्रह्मजज्ञ का भावार्थ ब्रह्म से उत्पन्न सृष्टि या रचना को जानने वाला है। अग्निदेव सम्पूर्ण जगत् में
संव्याप्त हैं और वही इस सृष्टि के ज्ञाता हैं। कठोपनिषद् का कथन है कि साधक सृष्टि को जानने वाले स्तुत्य अग्निदेव
को जानकर उसका निष्काम भाव से चयन करके अनन्त शान्ति को प्राप्त होते हैं-
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमाःशान्तिमत्यन्तमेति (कठ०१.१.१७)।
४६६ | परिशिष्ट | ब्रह्माण्ड
१५०. ब्रह्मनिष्ठ — द्र०-ब्रह्मविद्या।
१५१. ब्रह्मरन्ध्र — मस्तक या मूर्धा भाग के मध्य एक गुप्त छिद्र जिससे होकर प्राण निकलने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती
है। योगियों के प्राण इसी छिद्र (रन्ध्र) से निकलते हैं। इसे मोक्ष द्वार कहा गया है, क्योंकि इसे बेधकर प्राण त्यागने
से मुक्ति प्राप्त होती है। इसे सुषिर (छिद्रयुक्त, पोला) मण्डल भी कहा जाता है- मोक्षद्वारं बिलं चैव सुषिरं मण्डलं
विदुः (अमृ० २६)। जिस साधक का प्राण इस मण्डल को भेदकर मूर्धा में पहुँच जाता है, वह जहाँ कहीं भी मृत्यु
को प्राप्त होता है, पुनः जन्म नहीं लेता, अर्थात् पुनर्जन्म के चक्र में नहीं फँसता- यस्येदं मण्डलं भित्त्वा मारुतो
याति मूर्धनि। यत्र-यत्र म्रियेद्वापि न स भूयोऽभिजायते (अमृ० ३९)।
१५२. ब्रह्मलोक — द्र०-देवयान।
१५३. ब्रह्मविद्या — उपनिषदों में मुख्यतः जिस विद्या का उल्लेख है, उसे ब्रह्मविद्या कहा जाता है। जिसका तात्पर्य है-
ब्रह्म का ज्ञान कराने वाली विद्या। ब्रह्म के जानने वाले को ब्रह्मविद् या ब्रह्मवेत्ता कहा जाता है। ब्रह्मविद्या के द्वारा
'हम सर्व हो जायेंगे', ऐसा मनुष्य मानते हैं- तदाहुर्यद् ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते (बृह०१.४.९)।
ब्रह्मविद्या को सब विद्याओं की आधारभूता कहा गया है, जिसका उपदेश ब्रह्माजी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को
दिया- स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह (मुण्ड० १.१.१)। ब्रह्मविद्या के प्रति एकनिष्ठ
पुरुष को ब्रह्मनिष्ठ कहा जाता है अथवा ब्राह्मणवृत्ति या ब्रह्मज्ञान से सुसम्पन्न पुरुष को ब्रह्मनिष्ठ कहते हैं। अन्य
विद्याओं का भली प्रकार प्राप्त हुआ ज्ञान भी नाशवान् है, किन्तु ब्रह्मविद्या का भली-भाँति ज्ञान स्थिर ब्रह्म को प्राप्त
कराने में समर्थ है- अन्यविद्यापरिज्ञानमवश्यं नश्वरं भवेत्। ब्रह्मविद्यापरिज्ञानं ब्रह्मप्राप्तिकरं स्थितम् (शु०२०)।
१५४. ब्रह्मवेत्ता — ब्रह्मवेत्ता का सामान्य अर्थ है- ब्रह्म को जानने या समझने वाला। ब्रह्म की सर्वत्र अनुभूति करने
वाला। दूसरे अर्थ में वेदों के अर्थ के ज्ञाता को भी ब्रह्मवेत्ता कहा गया है। इन्हें ब्रह्मज्ञानी अथवा तत्त्वज्ञानी कहकर
भी निरूपित किया जाता है, क्योंकि ये ब्रह्मतत्त्व के ज्ञाता होते हैं। गीता में भगवान् ने कहा है कि स्थिर बुद्धि और
मोह रहित ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म में स्थित होते हैं- स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः (गी०५.२०)। जो
कर्मयोगी आत्मा में ही क्रीड़ा करता है, उसी में रमण करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ कहा गया है- आत्मक्रीडा
आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः (मुण्ड० ३.१.४)।
१५५. ब्रह्मा — ब्रह्म के तीन सगुण रूप माने गये हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्म के सगुण रूपों में से एक रूप जो
सृष्टि की रचना के लिए नियत है, उन्हें ब्रह्मा कहा गया है। पुराणों में वेदों के भी प्रकटकर्त्ता इन्हें ही माना गया है।
यज्ञ के एक ऋत्विज् जिन्हें यज्ञ के प्रत्यक्ष संरक्षणकर्त्ता के रूप में नियत किया जाता है, उन्हें भी ब्रह्मा कहा जाता
है। ब्रह्मा को ही विधाता, पितामह, प्रजापति तथा हिरण्यगर्भ आदि विशेषणों से भी निरूपित किया गया है। पुराणों
के अनुसार विष्णुदेव की नाभि से ब्रह्मा स्वयं उत्पन्न हुए, इसलिए ये स्वयंभू कहलाये। सम्पूर्ण कलाएँ, विद्याएँ और
ब्रह्माण्ड इन्हीं से प्रकट माना गया है। ब्रह्मा की पत्नी 'ब्रह्माणी' के रूप में मान्य हैं। मुण्डकोपनिषद् के अनुसार देव
ब्रह्मा सम्पूर्ण जगत् की रचना करने वाले और लोकों के रक्षक हैं, वे देवों में सबसे पहले प्रकट हुए। उन्होंने अपने
ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया- ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य
गोप्ता। स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह (मुण्ड० १.१.१)।
१५६. ब्रह्माण्ड — धार्मिक-दार्शनिक ग्रन्थों में प्रायः चौदह भुवनों का उल्लेख मिलता है। हम लोग जहाँ विद्यमान हैं,
वह 'भू' लोक है। यह तथा इसके ऊपर सात लोक हैं तथा इसके नीचे सात लोक हैं। ये चौदह लोक मिलकर
ब्रह्माण्ड कहलाते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक रामतीर्थ ने लिखा हैं कि ब्रह्माण्ड में जो चौदह लोक हैं, उन्हें लोकालोक
नामक पर्वत आवृत किये हुए है। इस पर्वत के बाहर की ओर पृथिवी है और पृथिवी के चारों ओर उसे समुद्र घेरे
हुए हैं। इस प्रकार लोकालोक पर्वत से घिरे चौदह भुवन जिनके अन्तर्गत पृथिवी और समुद्र हैं- ये सब मिलकर
एक ब्रह्माण्ड बनता है- एत एव स्वावरण भूतलोकालोक पर्वतात्तद्बाह्या पृथिवी तद्बाह्या समुद्रैः सहिता
ब्रह्माण्डमित्युच्यते (वे० १६ विद्वन्मनोरंजिनी)।
'ब्रह्माण्ड' का परिमाण अतिबृहद् है। बृहदारण्यक उपनिषद् में इसका वर्णन इस प्रकार है- यह लोक ३२
देवरथाह्न है। इस लोक की पृथिवी और पृथिवी को समुद्र घेरे हुए है। देवरथाह्न्य का तात्पर्य है एक दिन में सूर्य