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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

• प्रकाशक युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि, मथुरा (उ. प्र.) • लेखक वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य • सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन • मुद्रक युग निर्माण योजना प्रेस, गायत्री तपोभूमि, मथुरा

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ (त्रि० ता० १.१; त्रि० म०; महाना०)


उस प्राण स्वरूप, दुःख नाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप, परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे। *

मैं उपनिषदों को पढ़ता हूँ, तो मेरे आँसू बहने लगते हैं। यह कितना महान् ज्ञान है ? हमारे लिए यह आवश्यक है कि उपनिषदों में सन्निहित तेजस्विता को अपने जीवन में विशेष रूप से धारण करें। -स्वामी विवेकानन्द मेरे जीवन में गीता ने माँ का स्थान लिया है। वह स्थान तो उसी का है; लेकिन मैं जानता हूँ कि उपनिषद् मेरी माँ की माँ है। उसी श्रद्धा से मेरा उपनिषदों का मनन, निदिध्यासन पिछले बत्तीस वर्षों से चल रहा है।

  • आचार्य विनोबा भावे मनुष्य की आत्मिक, मानसिक और सामाजिक गुत्थियाँ किस प्रकार सुलझ सकती हैं, इसका ज्ञान उपनिषदों से ही मिल सकता है। यह शिक्षा इतनी सत्य, शिव और सुन्दर है कि अन्तरात्मा की गहराई तक उसका प्रवेश होता है। जब मनुष्य सांसारिक दुःखों और चिन्ताओं से घिरा हो, तो उसे शान्ति और सहारा देने के अमोघ साधन के रूप में उपनिषद् ही सहायक हो सकती है।
  • प्रो० जी० आर्क सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि कितने दार्शनिकों के ग्रन्थ मैंने ध्यान पूर्वक पढ़े हैं, पर जैसी शान्तिमयी आत्मविद्या मैंने उपनिषदों में पायी, वैसी और कहीं देखने को नहीं मिली।
  • प्रो०ह्यूम मैंने कुरान, तौरेत, इञ्जील, जबुर आदि ग्रन्थ पढ़े, उनमें ईश्वर सम्बन्धी जो वर्णन है, उनसे मन की प्यास न बुझी। तब हिन्दुओं की ईश्वरीय पुस्तकें पढ़ीं। इनमें से उपनिषदों का ज्ञान ऐसा है, जिससे आत्मा को शाश्वत शान्ति तथा सच्चे आनन्द की प्राप्ति होती है। हजरत नवी ने भी एक आयत में इन्हीं प्राचीन रहस्यमय पुस्तकों के सम्बन्ध में संकेत किया है। -दाराशिकोह

विषयानुक्रमणिका क्र० विषय पृष्ठ संख्या से-तक क. संकेत विवरण ६ ख. भूमिका ७-२६ १. अमृतनादोपनिषद् २७-३३ २. ईशावास्योपनिषद् ३४-३७ ३. एकाक्षरोपनिषद् ३८-४० ४. ऐतरेयोपनिषद् ४१-४९ ५. कठोपनिषद् ५०-६९ ६. केनोपनिषद् ७०-७४ ७. गायत्र्युपनिषद् ७५-८२ ८. छान्दोग्योपनिषद् ८३-१९६ ९. तैत्तिरीयोपनिषद् १९७-२१३ १०. नादबिन्दूपनिषद् २१४-२२१ ११. निरालम्बोपनिषद् २२२ २२६ १२. प्रणवोपनिषद् २२७-२२८ १३. प्रश्नोपनिषद् २२९-२४० १४. बृहदारण्यकोपनिषद् २४१-३५७ १५. मन्त्रिकोपनिषद् ३५८-३६० १६. माण्डूक्योपनिषद् ३६१-३६३ १७. मुण्डकोपनिषद् ३६४-३७४ १८. मुद्गलोपनिषद् ३७५-३८१ १९. मैत्रायण्युपनिषद् ३८२-३९७ २०. शिवसंकल्पोपनिषद् ३९८-३९८ २१. शुकरहस्योपनिषद् ३९९-४०६ २२. श्वेताश्वतरोपनिषद् ४०७-४२४ २३. सर्वसारोपनिषद् ४२५-४२८ २४. स्कन्दोपनिषद् ४२९-४३० ग. परिशिष्ट १. परिभाषा कोश ४३१-४८८ २. मन्त्रानुक्रमणिका ४८९-५१२

संकेत विवरण


अक्षि० - अक्ष्युपनिषद्तै०ब्रा० - तैत्तिरीय ब्राह्मणमुक्ति० - मुक्तिकोपनिषद्
अथर्व० - अथर्ववेदतै० सं० - तैत्तिरीय संहितामुण्ड० - मुण्डकोपनिषद्
अध्या० - अध्यात्मोपनिषद्त्रि०म० - त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद्मुद्र० - मुद्रलोपनिषद्
अ०पू० - अन्नपूर्णोपनिषद्त्रि०ता० - त्रिपुरा तापिन्युपनिषद्मैत्रा० - मैत्रायण्युपनिषद्
अमृ० - अमृतनादोपनिषद्दे०भा० - देवी भागवतमैत्रे० - मैत्रेय्युपनिषद्
अव्य० - अव्यक्तोपनिषद्द्र० - द्रष्टव्यमै०ब्रा० - मैत्रायणी ब्राह्मण
अ०शिर० - अथर्वशिरोपनिषद्ध्या० बि० - ध्यानबिन्दूपनिषद्यजु० - यजुर्वेद
अष्टा० - अष्टाध्यायीना०प० - नारदपरिव्राजकोपनिषद्या० स्मृ० - याज्ञवल्क्य स्मृति
आत्मो० - आत्मोपनिषद्ना०पु० - नारदीय पुराणयो०कु० - योगकुण्डल्युपनिषद्
आ०बो० - आत्मबोधोपनिषद्ना०बि० - नादबिन्दूपनिषद्यो० चू० - योगचूडामण्युपनिषद्
आरु० - आरुणिकोपनिषद्नारा० - नारायणोपनिषद्यो० त० - योगतत्त्वोपनिषद्
आश्र० - आश्रमोपनिषद्निरा० - निरालम्बोपनिषद्यो०द० - योगदर्शन
आ०श्रौ० - आश्वलायन श्रौतसूत्रनिरु० - निरुक्तयो०शि० - योगशिखोपनिषद्
ईश० - ईशावास्योपनिषद्नृ०उ० - नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद्रा०उ० - रामोत्तरतापिन्युपनिषद्
ऋ० - ऋग्वेदन्या०द० - न्याय दर्शनरा०मा० - रामचरित मानस
एका० - एकाक्षरोपनिषद्पंच० - पंचदशीरा०र० - राम रहस्योपनिषद्
ऐत० - ऐतरेयोपनिषद्पं० ब्र० - पंच ब्रह्मोपनिषद्वाच० - वाचस्पत्यम्
ऐ०ब्रा० - ऐतरेय ब्राह्मणप०प० - परमहंस-परिव्राजकोपनिषद्वा०रा० - वाल्मीकि रामायण
कठ० - कठोपनिषद्प०पु० - पद्मपुराणवि०चू० - विवेक चूडामणि
क०रु० - कठनरुद्रोपनिषद्पैंग० - पैंगलोपनिषद्वे०परि० - वेदान्त परिभाषा
कलिसं० - कलिसंतरणोपनिषद्प्रण० - प्रणवोपनिषद्वे०सा० - वेदान्त सार
काठ०सं० - काठक संहिताप्रश्न० - प्रश्नोपनिषद्वै०द० - वैशेषिक दर्शन
का०श्रौ० - कात्यायन श्रौतसूत्रबहु० - बह्वृचोपनिषद्शत०ब्रा० - शतपथ ब्राह्मण
कु०सं० - कुमार संभवबृह० - बृहदारण्यकोपनिषद्शब्द० - शब्दकल्पद्रुम
कृष्ण० - कृष्णोपनिषद्ब्र०बि० - ब्रह्मबिन्दूपनिषद्शां० प० - शांतिपर्व
केन० - केनोपनिषद्ब्र०वै०पु० - ब्रह्मवैवर्तपुराणशि०सं० - शिवसंकल्पोपनिषद्
कौ०ब्रा० - कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्ब्र०सू० - ब्रह्मसूत्रशु०र० - शुकरहस्योपनिषद्
गाय० - गायत्र्युपनिषद्ब्रह्म० - ब्रह्मोपनिषद्श्वेता० - श्वेताश्वतरोपनिषद्
गी० - श्रीमद्भगवद्गीताब्रह्मा०पु० - ब्रह्माण्ड पुराणषड्०ब्रा० - षड्विंश ब्राह्मण
गो०उ० - गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद्भा० पु० - भागवत पुराणसंन्या० - संन्यासोपनिषद्
गो० ब्रा० - गोपथ ब्राह्मणमन्त्रि० - मन्त्रिकोपनिषद्संहि० - संहितोपनिषद्
चा०नी० - चाणक्य नीतिम०स्मृ० - मनु स्मृतिस०सा० - सर्वसारोपनिषद्
छान्दो० - छान्दोग्योपनिषद्महा० - महाभारतसां०द० - सांख्यदर्शन
जाबा० - जाबालोपनिषद्महाना० - महानारायणोपनिषद्सुं० कां० - सुंदरकांड
जैमि० - जैमिनीGeneralमहो० - महोपनिषद्सूर्यो० - सूर्योपनिषद्
जै० ब्रा० - जैमिनीय ब्राह्मणमाण्डू० - माण्डूक्योपनिषद्स्कं० - स्कंदोपनिषद्
ते०बि० - तेजोबिन्दूपनिषद्मी० द० - मीमांसा दर्शनस्कं० पु० - स्कन्दपुराण
तै०आ० - तैत्तिरीय आरण्यकह०को० - हलायुध कोश
तैत्ति० - तैत्तिरीयोपनिषद्ह० प्र० - हठयोग प्रदीपिका

ने संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद् इन चारों

भूमिका

'वेद' का अर्थ 'बोध' या 'ज्ञान' है। विद्वानों ने संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद् इन चारों के संयोग को समग्र वेद कहा है। उपनिषद् को वेद का शीर्ष भाग कहा गया है, वेदान्त कहा गया है; क्योंकि यह वेदों का अन्तिम (सर्वश्रेष्ठ) भाग है। भार- तीय दर्शन जगत् में प्रसिद्ध 'प्रस्थान-त्रयी' के उपनिषद् आदिम ग्रन्थ हैं तथा अन्य दोनों गीता और ब्रह्मसूत्र के उपजीव्य (आश्रयीभूत)। इसे आध्यात्मिक मानसरोवर कहा जा सकता है, जिससे विनिःसृत ज्ञान की सरिताएँ इस पुण्य भूमि में मानव मात्र के अभ्युदय (भौतिक उन्नति) एवं निःश्रेयस (आध्यात्मिक कल्याण) के लिए प्रवहमान हैं। 'उपनिषद्' का भाव- इसमें 'उप' और 'नि' उपसर्ग हैं। 'सद्' धातु 'गति' के अर्थ में प्रयुक्त होती है। 'गति' शब्द का उपयोग ज्ञान, गमन और प्राप्ति इन तीन संदर्भों में होता है। यहाँ प्राप्ति अर्थ अधिक उपयुक्त है। '"उप सामीप्येन, नि- नितरां, प्राप्नुवन्ति परं ब्रह्म यया विद्यया सा उपनिषद्।" अर्थात् जिस विद्या के द्वारा परब्रह्म का सामीप्य एवं तादात्म्य प्राप्त किया जाता है, वह 'उपनिषद्' है। दूसरे शब्दों में 'उप' + 'नि' इन दो उपसर्गों के साथ 'सद्' धातु से 'क्विप्' प्रत्यय के प्रयोग से 'उपनिषद्' शब्द बना है। 'सद्' धातु के तीन अर्थ मान्य हैं- (१) विशरण (विनाश) (२) गति (ज्ञान और प्राप्ति) (३) अवसादन (शिथिल करना), इस आधार पर 'उपनिषद्' का अर्थ हुआ-"जो पाप- ताप का नाश करे, सच्चा ज्ञान प्रदान करे, आत्मा की प्राप्ति कराये और अज्ञान- अविद्या को शिथिल करे, वह उपनिषद् है।" अष्टाध्यायी (१.४.७९) में जीविकोपनिषदा- वौपम्ये सूत्रानुसार उपनिषद् शब्द परोक्ष या रहस्य के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। कौटिल्य के अर्थ-शास्त्र में युद्ध काल के गुप्त प्रयोगों की चर्चा में औपनिषद प्रयोग शब्द व्यवहृत हुआ है। इससे यह प्रकट होता है कि उपनिषद् का तात्पर्य रहस्य भी है। अमरकोष (३. ९९) में भी आता है-"धर्मे रहस्युपनिषत् स्यात्" अर्थात् उपनिषद् शब्द गूढ़ धर्म एवं रहस्य के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इस आधार पर उपनिषद् को परोक्ष या रहस्यमय ज्ञान के स्रोत भी कह सकते हैं। विद्वानों ने 'उपनिषद्' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार भी मानी है-उप (सामीप्य अथवा व्यवधान रहित), नि (विशिष्ट या सम्पूर्ण), सद् (ज्ञान या बोध) अर्थात् 'सामीप्य द्वारा प्राप्त विशिष्ट बोध अथवा व्यवधान रहित सम्पूर्ण ज्ञान।' उपनिषदों में जिस ज्ञान की अभिव्यक्ति हुई है, उसे निश्चित रूप से उक्त विशेषणों से युक्त कहा जा सकता है। एक मत यह भी है-'उपनिषद्यते प्राप्यते ब्रह्मात्मभावोऽनया इति उपनिषद्।' जिससे ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सके, वह उपनिषद् है। तात्पर्य यह है कि उपनिषदों में ब्रह्मज्ञान का ही प्रधानता से विवेचन हुआ है, जिससे उपनिषदों को अध्यात्म विद्या भी कहा जाता हैं। ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान, तत्त्वज्ञान और ब्रह्मविद्या-ये सब पर्यायवाची शब्द हैं। भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने उपनिषदों की महत्ता मुक्त कंठ से स्वीकार की है।

८ भूमिका उपनिषदों की महत्ता

स्वामी विवेकानन्द ने अपने एक प्रवचन में कहा था -‘‘मैं उपनिषदों को पढ़ता हूँ, तो मेरे आँसू बहने लगते हैं। यह कितना महान् ज्ञान है? हमारे लिए यह आवश्यक है कि उपनिषदों में सन्निहित तेजस्विता को अपने जीवन में विशेष रूप से धारण करें। हमें शक्ति चाहिए। शक्ति के बिना काम न चलेगा। यह शक्ति कहाँ से प्राप्त हो? उपनिषदें ही शक्ति की खानें हैं, उनमें ऐसी शक्ति भरी पड़ी है, जो सम्पूर्ण विश्व को बल, शौर्य एवं नवजीवन प्रदान कर सकें। उपनिषदें किसी भी देश, जाति, मत, सम्प्रदाय का भेद किये बिना हर दीन, दुर्बल, दुःखी और दलित प्राणी को पुकार-पुकार कर कहती हैं- उठो, अपने पैरों खड़े हो जाओ और बन्धनों को काट डालो। शारीरिक स्वाधीनता, मानसिक स्वाधीनता, आध्यात्मिक स्वाधीनता, यही उपनिषदों का मूल मन्त्र है।'' स्वामी विवेकानन्द जी ने उपनिषद्-ज्ञान की आवश्यकता को न केवल ब्रह्म प्राप्ति के लिए ही, अपितु दैनिक जीवन के लिए भी उपयोगी बतलाया है। उनका कथन है कि उपनिषदें वह शक्ति प्रदान करती हैं, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन-संग्राम का धैर्य तथा साहस से मुकाबला करता है। जीवन का प्रत्येक क्षेत्र चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक दोनों में उपनिषदें अत्यन्त आवश्यक हैं। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ जी ने कहा है- ‘चक्षु सम्पन्न व्यक्ति देखेंगे कि भारत का ब्रह्मज्ञान समस्त पृथिवी का धर्म बनने लगा है। प्रातः कालीन सूर्य की अरुणिम किरणों से पूर्व-दिशा आलोकित होने लगी है; परन्तु जब वह सूर्य मध्याह्न गगन में प्रकाशित होगा, तब उस समय उसकी दीप्ति से समग्र भूमण्डल दीप्तिमय हो उठेगा।' डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन का कथन है- 'उपनिषदों को जो भी मूल संस्कृत में पढ़ता है, वह

मानव-आत्मा और परम सत्य के गुह्य और पवित्र सम्बन्धों को उजागर करने वाले उनके बहुत से उद्गारों के उत्कर्ष काव्य और प्रबल सम्मोहन से मुग्ध हो जाता है और उसमें बहने लगता है'। अपनी 'उपनिषद् एक अध्ययन' पुस्तक की प्रस्तावना में सन्त विनोबा ने लिखा है- ‘‘उपनिषदों की महिमा अनेकों ने गायी है। कवि ने कहा है कि 'हिमालय जैसा पर्वत नहीं और उपनिषदों जैसी कोई पुस्तक नहीं।' परन्तु मेरी दृष्टि में उपनिषद् पुस्तक है ही नहीं, वह तो एक दर्शन है। उस दर्शन को यद्यपि शब्दों में अंकित करने का प्रयत्न किया गया है, फिर भी शब्दों के कदम लड़खड़ा गये हैं; सिर्फ निष्ठा के चिह्न उभरे हैं। उस निष्ठा को शब्दों की सहायता से हृदय में भरकर शब्दों को दूर हटाकर अनुभव किया जाए, तभी उपनिषदों का बोध हो सकता है। मेरे जीवन में गीता ने माँ का स्थान लिया है। वह स्थान तो उसी का है; लेकिन मैं जानता हूँ कि उपनिषद् मेरी माँ की माँ है। उसी श्रद्धा से मेरा उपनिषदों का मनन, निदिध्यासन पिछले बत्तीस वर्षों से चल रहा है।'' इन मन्त्रों में प्रयुक्त हुए कठिन शब्दों को देखकर ऐसा लगता है कि यह ज्ञान केवल एकान्त सेवी सन्त-महात्माओं के लिए ही व्यवहार में आने योग्य है। साधारण स्थिति के गृहस्थ अपनी विषम परिस्थितियों के कारण इसे जीवन में उतार न सकेंगे, पर वस्तुतः ऐसी बात नहीं है। जितना यह ज्ञान कठिन है, उतना ही सरल भी है। जिस प्रकार पानी में तैरना कठिन दिखाई पड़ता है, उसमें दुर्घटना की आशंका भी प्रतीत होती है; किन्तु जब सच्ची लगन होती है और प्रयत्न पूर्वक अभ्यास किया जाता है, तो वह कठिन कार्य सरल बन जाता है। इसी प्रकार उपनिषदों में जिस ब्रह्मविद्या का उल्लेख हुआ है, वह भी सरल है, कठिन तो वह उन्हें ही दीखती है,

जो उससे दूर रहते हैं, दूर से देखते हैं। भीतर प्रवेश करने का साहस करने पर वह सरल ही है। जितनी सरल है, उतनी ही कल्याणकारक भी है। आचार्य बलदेव उपाध्याय के शब्दों में - 'भारतीय तत्त्वज्ञान तथा धर्म-सिद्धान्तों के मूल स्रोत होने का गौरव इन्हीं उपनिषदों को प्राप्त है। उपनिषद् वस्तुतः वह आध्यात्मिक मानसरोवर है, जिससे ज्ञान की भिन्न-भिन्न सरितायें निकलकर इस पुण्य भूमि में मानव मात्र के ऐहिक कल्याण तथा आमुष्मिक मंगल के लिए प्रवाहित होती हैं। वैदिक धर्म की मूल-तत्त्व-प्रतिपादिका प्रस्थानत्रयी में मुख्य उपनिषद् ही हैं। अन्य प्रस्थान-गीता तथा ब्रह्मसूत्र- उसी के ऊपर आश्रित हैं।' भारतवर्ष में उदय होने वाले समस्त दर्शनों का - सांख्य तथा वेदान्त आदि का ही यह मूल ग्रन्थ नहीं है, अपितु जैन तथा बौद्ध दर्शनों के भी मौलिक तथ्यों की आधारशिला यही है। उपनिषद् का इसीलिए भारतीय संस्कृति से अविच्छेद्य सम्बन्ध है। इनके अध्ययन से इस संस्कृति के आध्यात्मिक रूप का सच्चा परिचय हमें उपलब्ध होता है। इसीलिए जब से किसी विदेशी विद्वान् को इसके पढ़ने तथा मनन करने का अवसर मिला है, तब से वह इनकी समुन्नत विचारधारा, उदात्त चिंतन, धार्मिक अनुभूति तथा आध्यात्मिक जगत् की रहस्यमयी अभिव्यक्तियों की शतमुख से प्रशंसा करता आया है।'

पाश्चात्य विद्वानों पर प्रभाव

वेदान्त दर्शन की महिमा पर मुग्ध होने वाले विदेशी विद्वानों में सबसे पहले अरबदेशीय विद्वान् अलबेरूनी थे। वे ११वीं (ग्यारहवीं) शताब्दी में भारत आये थे। यहाँ आकर उन्होंने संस्कृत भाषा का अध्ययन किया और उपनिषदों की सारस्वरूपा गीता पर वे लट्टू हो गये। यह ज्ञात नहीं है कि इन्होंने उपनिषदों का अध्ययन किया था या नहीं, लेकिन गीता की जो प्रशंसा उन्होंने की है, उसे उपनिषदों की ही प्रशंसा समझनी चाहिए। वैदिक साहित्य के साथ पाश्चात्य विद्वानों का प्रथम परिचय उपनिषदों के माध्यम से ही हुआ। सम्राट् शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह अपनी धर्म सम्बन्धी उदारता के लिए भारत के इतिहास में प्रसिद्ध हैं। सन् १६४० ईस्वी में जब दारा कश्मीर में थे, तब उन्हें सर्वप्रथम उपनिषदों की महिमा का पता लगा। उन्होंने काशी से पण्डितों को बुलाया और उनकी सहायता से पचास उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया। १६५७ ईस्वी में यह अनुवाद पूरा हुआ। इसके प्रायः तीन वर्ष के बाद सन् १६५९ ईस्वी में औरंगजेब के द्वारा दाराशिकोह मारे गये। अकबर के समय में भी (१५५६-१५८५) कुछ उपनिषदों का अनुवाद हुआ था; परन्तु अकबर अथवा दारा द्वारा सम्पादित इन अनुवादों के प्रति सन् १७७५ ईस्वी से पहले तक किन्हीं भी पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि आकर्षित नहीं हुई। अयोध्या के नवाब सुजाउद्दौला की राजसभा के फारसी रेजीडेंट श्री एम० गेंटिल ने सन् १७७५ में प्रसिद्ध यात्री एंक्रेतिल डुपेरंन (Anquetil Duperron) को दाराशिकोह के द्वारा सम्पादित उक्त फारसी अनुवाद की एक पाण्डुलिपि भेजी। एंकेतिल डुपेरंन ने कहीं से एक दूसरी पाण्डुलिपि प्राप्त की और दोनों को मिलाकर फ्रेंच तथा लैटिन भाषा में उस फारसी अनुवाद का पुनः अनुवाद किया। लैटिन अनुवाद सन् १८०१-१८०२ में 'औपनेखत' (OUPNE KHAT) नाम से प्रकाशित हुआ। फ्रेंच अनुवाद नहीं छपा। उक्त लैटिन अनुवाद के प्रकाशित होने पर पाश्चात्य पण्डितों की दृष्टि इधर कुछ आकर्षित तो हुई, किन्तु अनुवाद का अनुवाद होने के कारण वह इतना अस्पष्ट और दुर्बोध हो गया था कि उसका मर्म समझकर रसास्वादन करना सहज नहीं था। जर्मनी के सुप्रसिद्ध दार्शनिक श्री अर्थर शोपेन हॉवर ने (सन् १७८८-१८६०) बहुत कठिन परिश्रम करके

१० [भूमिका] उक्त अनुवाद का अध्ययन किया और मुक्त कण्ठ से यह घोषणा की, कि 'मेरा अपना दार्शनिक मत उपनिषद् के मूल तत्त्वों के द्वारा विशेष रूप से प्रभावित है।' इस प्रसंग में मनीषी शोपेन हॉवर ने उपनिषद् के महत्त्व और प्रभाव के सम्बन्ध में जो कुछ कहा है, वह विशेष ध्यान देने योग्य है- 'मैं समझता हूँ कि उपनिषद् के द्वारा वैदिक साहित्य के साथ परिचय लाभ होना वर्तमान शताब्दी (१८१८) का सबसे अधिक परम लाभ है, जो इसके पहले किन्हीं भी शताब्दियों को नहीं मिला। मुझे आशा है, १४ वीं शताब्दी में ग्रीक साहित्य के पुनरभ्युदय से यूरोपीय साहित्य की जो उन्नति हुई थी, संस्कृत साहित्य का प्रभाव उसकी अपेक्षा कम फल उत्पन्न करने वाला नहीं होगा। यदि पाठक प्राचीन भारतीय विद्या में दीक्षित हो सके और गम्भीर उदारता के साथ उसे ग्रहण कर सके, तो मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसे वे अच्छी तरह समझ सकेंगे। उपनिषद् में सर्वत्र कितनी सुन्दरता के साथ वेदों के भाव प्रकाशित हैं, जो कोई भी उक्त फारसी- लैटिन अनुवाद का, ध्यान देकर अध्ययन करके उपनिषद् की अनुपम भावधारा से परिचित होगा, उसी की आत्मा के गम्भीरतम प्रदेश तक में एक हलचल मच जाएगी। एक-एक पंक्ति कितना दृढ़, सुनिर्दिष्ट और सुसमञ्जस अर्थ प्रकट कर रही है। प्रत्येक वाक्य से कितना गम्भीरता पूर्ण विचार समूह प्रकट हो रहा है, सम्पूर्ण ग्रन्थ कैसे उच्च, पवित्र और ऐकान्तिक भावों से ओतप्रोत है। सारे पृथ्वी मण्डल में मूल उपनिषद् के समान इतना फलोत्पादक और उच्च भावोद्दीपक ग्रन्थ कहीं भी नहीं है। इसने मुझको जीवन में शान्ति प्रदान की है और मरण में भी यह शान्ति देगा।' शोपेन हॉवर ने अन्यत्र कहा था- ''भारत में हमारे धर्म की जड़ें कभी नहीं गड़ेंगी। मानव जाति की 'पुरानी प्रज्ञा' गैलीलियो की घटनाओं से कभी निराकृत नहीं होगी। वरन् भारतीय प्रज्ञा की धारा यूरोप में प्रवाहित होगी एवं हमारे ज्ञान और विचार में आमूल परिवर्तन ला देगी।'' उनकी यह भविष्यवाणी सफल हुई। स्वामी विवेकानन्द की अमेरिकन शिष्या "साराबुल" ने अपने एक पत्र में लिखा था कि "जर्मनी का दार्शनिक सम्प्रदाय, इंग्लैण्ड के प्राच्य पण्डित और हमारे अपने देश के एमरसन आदि साक्षी दे रहे हैं कि पाश्चात्य विचार आजकल सचमुच ही वेदान्त के द्वारा अनुप्राणित हैं।" कहते हैं कि शोपेन हॉवर की मेज पर उपनिषदों की एक लैटिन प्रति हमेशा रहती थी और वे सोने से पहले उसमें से ही अपनी प्रार्थनाएँ किया करते थे। शोपेन हॉवर ने उपनिषदों के सम्बन्ध में लिखा है - "उपनिषदों के प्रत्येक वाक्य में से गहन, मौलिक और उदात्त विचार फूटते हैं और सभी कुछ एक उच्च, पवित्र और एकाग्र भावना से व्याप्त हो जाता है। समस्त संसार में उपनिषदों जैसा कल्याणकारी और आत्मा को उन्नत करने वाला कोई और ग्रन्थ नहीं है। ये सर्वोच्च प्रतिभा के प्रसून हैं। देर-सबेर ये लोगों की आस्था का आधार बनकर रहेंगे।" सन् १८४४ में बर्लिन में श्री शेलिंग महोदय की उपनिषद् सम्बन्धी व्याख्यान माला को सुनकर प्रसिद्ध पाश्चात्य पण्डित मैक्समूलर का ध्यान सबसे पहले संस्कृत साहित्य की ओर आकृष्ट हुआ। उपनिषदों के सम्बन्ध में विचार आरम्भ करते ही उन्होंने अनुभव किया कि उपनिषदों का यथार्थ मर्म समझने के लिए पहले उनसे पूर्व रचित वेद-मन्त्र और ब्राह्मण भाग पर विचार करना आवश्यक है। इस प्रकार उपनिषदों से उन्होंने वेद चर्चा के लिए प्रेरणा प्राप्त की। शोपेन हॉवर के बाद अनेकों पाश्चात्य विद्वानों ने उपनिषद् पर विचार करके विभिन्न प्रकार से उसकी महिमा गायी है। किसी-किसी ने तो उपनिषद् को 'मानव चेतना का सर्वोच्च फल' बतलाया है। स्वनामधन्य वेदज्ञ मैक्समूलर ने एक स्थान पर लिखा है कि 'यदि शोपेन हॉवर के इन (उपनिषद् सम्बन्धी)

भूमिका ११ शब्दों के लिए किसी समर्थन की आवश्यकता हो, तो मैं अपने जीवन भर के अध्ययन के आधार पर प्रसन्नता पूर्वक अपना समर्थन दूंगा। उन्होंने अपनी पुस्तक "India what can it teach us" में लिखा है- "मृत्यु के भय से बचने, मृत्यु के लिए पूरी शक्ति से तैयारी करने और सत्य को जानने के इच्छुक जिज्ञासु के लिए उपनिषदों के अतिरिक्त और कोई श्रेष्ठ मार्ग मेरी दृष्टि में नहीं है। उपनिषदों के ज्ञान से मुझे अपने जीवन के उत्कर्ष में भारी सहायता मिली है। मैं उनका ऋणी हूँ। ये उपनिषदें आत्मिक उन्नति के लिए विश्व के धार्मिक साहित्य में अत्यन्त सम्मानास्पद रही हैं और आगे सदा रहेंगी। यह ज्ञान, महान् मनीषियों की महान् प्रज्ञा का परिणाम है। एक न एक दिन भारत की यह श्रेष्ठ विद्या यूरोप में प्रकाशित होगी और तब हमारे ज्ञान एवं विचारों में महान् परिवर्तन उपस्थित होगा।" "Dogmas of Budhism" नामक ग्रन्थ के लेखक श्रीह्याम ने लिखा है- सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि कितने दार्शनिकों के ग्रन्थ मैंने ध्यान पूर्वक पढ़े हैं, पर जैसी शान्तिमयी आत्मविद्या मैंने उपनिषदों में पायी, वैसी और कहीं देखने को नहीं मिली। "Is God knowoble" नामक ग्रन्थ में उसके रचयिता प्रो० जी० आर्क ने लिखा है- "मनुष्य की आत्मिक, मानसिक और सामाजिक गुत्थियाँ किस प्रकार सुलझ सकती हैं, इसका ज्ञान उपनिषदों से ही मिल सकता है। यह शिक्षा इतनी सत्य, शिव और सुन्दर है कि अन्तरात्मा की गहराई तक उसका प्रवेश होता है। जब मनुष्य सांसारिक दुःखों और चिन्ताओं से घिरा हो, तो उसे शान्ति और सहारा देने के अमोघ साधन के रूप में उपनिषद् ही सहायक हो सकती है।" दाराशिकोह ने अपने फारसी उपनिषद् अनुवाद की भूमिका में लिखा है-" आत्मविद्या के मैंने बहुत ग्रन्थ पढ़े, पर परमात्मा के खोज की प्यास कहीं न बुझी। हृदय में ऐसी अनेकों शंकाएँ और समस्याएँ उठती थीं, जिनका समाधान ईश्वरीय ज्ञान के अतिरिक्त और किसी प्रकार सम्भव न था। मैंने कुरान, तौरेत, इज्जील, जबूर आदि ग्रन्थ पढ़े, उनमें ईश्वर सम्बन्धी जो वर्णन है, उनसे मन की प्यास न बुझी। तब हिन्दुओं की ईश्वरीय पुस्तकें पढ़ीं। इनमें से उपनिषदों का ज्ञान ऐसा है, जिससे आत्मा को शाश्वत शान्ति तथा सच्चे आनन्द की प्राप्ति होती है। हजरत नवी ने भी एक आयत में इन्हीं प्राचीन रहस्यमय पुस्तकों के सम्बन्ध में संकेत किया है।" उपनिषद्-दर्शन अथवा मौलिक वेदान्त के विख्यात व्याख्याता पॉल डायसन के अनुसार 'वेदान्त (अर्थात् उपनिषद्-दर्शन) अपने अविकृत रूप में शुद्ध नैतिकता का सशक्ततम आधार है, जीवन और मृत्यु की पीड़ाओं में सबसे बड़ी सान्त्वना है। भारतियो! इसमें निष्ठा रखो।' ' भारतीय आचार, विचार और साहित्य संस्कृति के प्रति अगाध निष्ठा रखने वाली विदुषी महिला डॉ० एनीबेसेंट ने उपनिषद् विद्या की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि 'भारत का ज्ञान मानव चेतना की सर्वोच्च देन है।' उपनिषद्-ज्ञान के प्रचार-प्रसार में संस्कृतज्ञ विद्वान् बेवर साहब का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने जर्मन भाषा में एक पुस्तक सत्रह भागों में लिखी है, जिसका नाम है 'इण्डिशे स्टूडियन'। उसका प्रथम भाग १८५० ईस्वी में बर्लिन से प्रकाशित हुआ था। इस भाग में बेवर महोदय ने 'सिर्र-ए- अकबर' (ले० दाराशिकोह) की चौदह उपनिषदों को शुद्धता से सम्पादित कर प्रकाशित किया है। इसका दूसरा भाग बर्लिन से ही १८५३ ई० में प्रकाशित हुआ। उसमें १४ से ३९ संख्या तक के उपनिषद् प्रकाशित किये गये हैं।

१२ [भूमिका] उपनिषदों के स्रोत एवं उनकी संख्या

उपनिषदों की प्राप्ति के स्रोत के बारे में कोई एक बात कही जा सकती है, तो वह यही है कि उनका उद्भव ऋषियों-द्रष्टाओं के अनुभूति जन्य ज्ञान से हुआ है। जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है कि उपनिषदों को 'वेद' के ब्राह्मण आरण्यक प्रभाग के अन्तर्गत माना जाता है। कुछ उपनिषदें संहिता (मन्त्र भाग), ब्राह्मण एवं आरण्यक की अंगभूता-अंशभूता हैं, जबकि अधिकांश वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल के ऋषियों के प्रातिभ चक्षु से दृष्ट हैं, जिनका स्वतन्त्र अस्तित्व है। 'ऐतरेयोपनिषद्' ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक का भाग (२.४.६) है तथा 'तैत्तिरीय उपनिषद्' कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक का भाग (प्रपाठक ७-८) है। इसी आरण्यक का अन्तिम प्रपाठक (क्र. १०) 'नारायणोपनिषद्' कहलाता है, जो अथर्ववेदीय 'महानारायणोपनिषद् से भिन्न है। शुक्ल यजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण के अन्तिम (१४वें) काण्ड के अन्तिम छः अध्याय को 'बृहदा- रण्यकोपनिषद्' कहा गया है। ब्राह्मण ग्रन्थ का यह भाग आरण्यक भी है और उपनिषद् भी है। इसी प्रकार 'ईशावास्योपनिषद्' भी यजुर्वेद की माध्यन्दिन और काण्व संहिताओं का ४० वाँ अध्याय है। सामवेद की कौथुमी शाखा के तलवकार ब्राह्मण ग्रन्थ के अन्तिम भागों (३३ से ४० अध्यायों) को छान्दोग्योपनिषद् कहा गया है। ऋग्वेदीय 'कौषीतकि' या 'शाङ्खायन आरण्यक' के अध्याय ३-६ को 'कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्' कहते हैं। मुक्तिकोपनिषद् (श्लोक क्र. ३० से ३९) में १०८ उपनिषदों की सूची प्राप्त है। इन १०८ में से ऋग्वेद की १०, शुक्ल यजुर्वेद की १९, कृष्ण यजुर्वेद की ३२, सामवेद की १६ तथा अथर्ववेद की ३१ उप- निषदें कही गयी हैं। मुक्तिकोपनिषद में चारों वेदों की शाखाओं की संख्या देते हुए प्रत्येक शाखा की एक-एक उपनिषद् होने की बात भी कही गयी है- ऋग्वेदादिविभागेन वेदाश्चत्वार ईरिताः। तेषां शाखा ह्यनेकाः स्युस्तासूपनिषदस्तथा ।। ऋग्वेदस्य तु शाखाः स्युरेकविंशति संख्यकाः। नवाधिकशतं शाखा यजुषो मारुतात्मज ।। सहस्त्रसंख्यया जाताः शाखाः साम्नः परन्तपं। अथर्वणस्य शाखाः स्युः पंचाशद्भेदतो हरे ।। एकैकस्यास्तु शाखाया एकैकोपनिषन्मता। -मुक्तिकोपनिषद् ११-१४ ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद भेद से वेद चार कहे गये हैं। उन चारों की अनेक शाखाएं हैं तथा उनकी उपनिषदें भी अनेक हैं। ऋग्वेद की इक्कीस शाखाएं, यजुर्वेद की एक सौ नौ शाखाएँ, सामवेद की एक हजार शाखाएं तथा अथर्ववेद की पचास शाखाएं मानी जाती हैं। एक-एक शाखा की एक-एक उपनिषद् मानी गयी है। इस उक्ति के अनुसार ११८० उपनिषदें होनी चाहिए; किन्तु आगे (श्लोक ३० से ३९ तक) जो नाम गिनाये गये हैं, वे केवल १०८ ही हैं। मुक्तिकोपनिषद् में जिन एक सौ आठ उपनिषदों के नाम आते हैं, वे सभी 'निर्णय सागर प्रेस' बम्बई से मूल गुटका के रूप में प्रकाशित हैं। इसके अतिरिक्त 'अड्यार लाइब्रेरी' मद्रास से भी उपनिषदों का संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिसमें लगभग १७९ उपनिषदों का प्रकाशन है। 'गुजराती प्रिंटिंग प्रेस' बम्बई से मुद्रित उपनिषद् वाक्य महाकोश में २२३ उपनिषदों की नामावली दी गई है। इनमें दो उपनिषद्- (१) उपनिषत्स्तुति तथा (२) देव्युपनिषद् नं० २ की चर्चा शिव रहस्य नामक ग्रन्थ में की गई है। ये दोनों अभी तक उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। शेष २२१ उपनिषदों के वाक्यांश इस महाकोश में संकलित हुए हैं। इनमें भी माण्डूक्यकारिका के चार प्रकरण चार जगह गिने गये हैं। इन सबकी

[भूमिका] १३ एक संख्या मानें, तो २१८ ही संख्या होती है। कई (२४) आयुर्वेदोपनिषद् उपनिषदें एक ही नाम की दो-तीन जगह आयी हैं; (२५) आरुणिकोपनिषद् (आरुणेय्युपनिषद्) पर वे स्वतन्त्र ग्रन्थ हैं। इस प्रकार सब पर दृष्टिपात (२६) आर्षेयोपनिषद् करने से यह निश्चित होता है कि अब तक लगभग (२७) आश्रमोपनिषद् २२० उपनिषदें प्रकाश में आ चुकी हैं। सम्भवतः (२८) इतिहासोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक) कहीं और भी कुछ उपनिषदें प्रकाशित हुई हों ? (२९) ईशावास्योपनिषद् कितनी ही अब भी अप्रकाशित रूप में उपलब्ध हो उपनिषत्स्तुति (शिवरहस्यान्तर्गत, अभी तक सकती हैं। भारतवर्ष की अथाह ज्ञान सम्पदा के गर्भ अनुपलब्ध है) में और कितने रत्न छिपे पड़े हैं, यह कहा नहीं जा (३०) ऊर्ध्वपुण्ड्रोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक) सकता। यहाँ उपर्युक्त २२० उपनिषदों की नामावली (३१) एकाक्षरोपनिषद् अकारादि क्रम से दी जा रही है- (३२) ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) (१) अक्षमालिकोपनिषद् (अक्षमालोपनिषद्) (३३) ऐतरेयोपनिषद् (खण्डात्मक) (२) अक्षि- उपनिषद् (३४) ऐतरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) (३) अथर्वशिखोपनिषद् (३५) कठरुद्रोपनिषद् (कण्ठरुद्रोपनिषद्) (४) अथर्वशिर उपनिषद् (३६) कठोपनिषद् (५) अद्वयतारकोपनिषद् (३७) कठश्रुत्युपनिषद् (६) अद्वैतभावनोपनिषद् (३८) कलिसंतरणोपनिषद् (हरिनामोपनिषद्) (७) अद्वैतोपनिषद् (३९) कात्यायनोपनिषद् (८) अध्यात्मोपनिषद् (४०) कामराजकीलितोद्धारोपनिषद् (९) अनुभवसारोपनिषद् (४१) कालाग्निरुद्रोपनिषद् (१०) अन्नपूर्णोपनिषद् (४२) कालिकोपनिषद् (११) अमनस्कोर्पनिषद् (४३) कालीमेधा दीक्षितोपनिषद् (१२) अमृतनादोपनिषद् (४४) कुण्डिकोपनिषद् (१३) अरुणोपनिषद् (४५) कृष्णोपनिषद् (१४) अल्लोपनिषद् (४६) केनोपनिषद् (१५) अवधूतोपनिषद् (वाक्यात्मक और पद्यात्मक) (४७) कैवल्योपनिषद् (१६) अवधूतोपनिषद् (पद्यात्मक) (४८) कौलोपनिषद् (१७) अव्यक्तोपनिषद् (४९) कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (१८) आचमनोपनिषद् (५०) क्षुरिकोपनिषद् (१९) आत्मपूजोपनिषद् (५१) गणपत्यथर्वशीर्षोपनिषद् (२०) आत्म प्रबोधोपनिषद् (आत्मबोधोपनिषद्) (५२) गणेशपूर्वतापिन्युपनिषद् (वरदपूर्वतापिन्युप०) (२१) आत्मोपनिषद् (वाक्यात्मक) (५३) गणेशोत्तरतापिन्युपनिषद् (वरदोत्तरतापिन्यु०) (२२) आत्मोपनिषद् (पद्यात्मक) (५४) गर्भोपनिषद् (२३) आथर्वण द्वितीयोपनिषद् (५५) गान्धर्वोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं मन्त्रात्मक) (५६) गायत्र्युपनिषद् (गोपथ ब्राह्मणान्तर्गत)

१४ | भूमिका | (गायत्र्युपनिषद्-शतपथ ब्राह्मणांतर्गत) \hspace{1.5cm} २. देव्युपनिषद् (शिवरहस्यांतर्गत-अनुपलब्ध) (५७) गायत्री रहस्योपनिषद् \hspace{2cm} (९०) द्वयोपनिषद् (५८) गरुडोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं मन्त्रात्मक) \hspace{0.5cm} (९१) ध्यानबिन्दूपनिषद् (५९) गुह्यकाल्युपनिषद् \hspace{2.5cm} (९२) नादबिन्दूपनिषद् (६०) गुह्यषोढान्यासोपनिषद् \hspace{1.8cm} (९३) नारदपरिव्राजकोपनिषद् (६१) गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् \hspace{1.7cm} (९४) नारदोपनिषद् (६२) गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद् \hspace{1.5cm} (९५) नारायणपूर्वतापिन्युपनिषद् (६३) गोपीचन्दनापनिषद् \hspace{2.3cm} (९६) नारायणोत्तरतापिन्युपनिषद् (६४) चतुर्वेदोपनिषद् \hspace{2.7cm} (९७) नारायणोपनिषद् (नारायणाथर्वशीर्ष) (६५) चाक्षुषोपनिषद् (चक्षुरुपनिषद्, \hspace{1.5cm} (९८) निरालम्बोपनिषद् \hspace{0.8cm} चक्षूरोगोपनिषद्, नेत्रोपनिषद्) \hspace{1.2cm} (९९) निरुक्तोपनिषद् (६६) चित्यूपनिषद् \hspace{3cm} (१००) निर्वाणोपनिषद् (६७) छागलेयोपनिषद् \hspace{2.4cm} (१०१) नीलरुद्रोपनिषद् (६८) छान्दोग्योपनिषद् \hspace{2.4cm} (१०२) नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद् (६९) जाबालदर्शनोपनिषद् \hspace{2cm} (१०३) नृसिंहषट्चक्रोपनिषद् (७०) जाबालोपनिषद् \hspace{2.6cm} (१०४) नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद् (७१) जाबाल्युपनिषद् \hspace{2.7cm} (१०५) पञ्चब्रह्मोपनिषद् (७२) तारसारोपनिषद् \hspace{2.6cm} (१०६) परब्रह्मोपनिषद् (७३) तारोपनिषद् \hspace{3.2cm} (१०७) परमहंस परिव्राजकोपनिषद् (७४) तुरीयातीतोपनिषद्(तीतावधूतोपनिषद्) \hspace{0.5cm} (१०८) परमहंसोपनिषद् (७५) तुरीयोपनिषद् \hspace{3cm} (१०९) परमात्मिकोपनिषद् (७६) तुलस्युपनिषद् \hspace{3cm} (११०) पारायणोपनिषद् (७७) तेजोबिन्दूपनिषद् \hspace{2.6cm} (१११) पाशुपतब्रह्मोपनिषद् (७८) तैत्तिरीयोपनिषद् \hspace{2.7cm} (११२) पिण्डोपनिषद् (७९) त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् \hspace{1.3cm} (११३) पीताम्बरोपनिषद् (८०) त्रिपुरातापिन्युपनिषद् \hspace{2.3cm} (११४) पुरुषसूक्तोपनिषद् (८१) त्रिपुरोपनिषद् \hspace{3cm} (११५) पैङ्गलोपनिषद् (८२) त्रिपुरामहोपनिषद् \hspace{2.4cm} (११६) प्रणवोपनिषद् (पद्यात्मक) (८३) त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् \hspace{1.8cm} (११७) प्रणवोपनिषद् (वाक्यात्मक) (८४) त्रिसुपर्णोपनिषद् \hspace{2.6cm} (११८) प्रश्नोपनिषद् (८५) दक्षिणामूर्त्युपनिषद् \hspace{2.3cm} (११९) प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् (८६) दत्तात्रेयोपनिषद् \hspace{2.7cm} (१२०) बटुकोपनिषद् (बटुकौपनिषद्) (८७) दत्तोपनिषद् \hspace{3.2cm} (१२१) बह्वृचोपनिषद् (८८) दुर्वासोपनिषद् \hspace{2.9cm} (१२२) बाष्कलमन्त्रोपनिषद् (८९) १. देव्युपनिषद् (पद्यात्मक एवं मंत्रात्मक) \hspace{0.5cm} (१२३) बिल्वोपनिषद् (पद्यात्मक)

[ भूमिका ] १५ (१२४) बिल्वोपनिषद् (वाक्यात्मक) (१५४) १. योगतत्त्वोपनिषद् (१२५) बृहज्जाबालोपनिषद् (१५५) २. योगतत्त्वोपनिषद् (१२६) बृहदारण्यकोपनिषद् (१५६) योगराजोपनिषद् (१२७) ब्रह्मविद्योपनिषद् (१५७) योगशिखोपनिषद् (१२८) ब्रह्मबिन्दूपनिषद् (अमृतबिन्दूपनिषद्) (१५८) योगोपनिषद् (१२९) ब्रह्मोपनिषद् (१५९) राजश्यामलारहस्योपनिषद् (१३०) भगवद्गीतोपनिषद् (१६०) राधिकोपनिषद् (वाक्यात्मक) (१३१) भवसंतरणोपनिषद् (१६१) राधेपनिषद् (प्रपाठात्मक) (१३२) भस्मजाबालोपनिषद् (१६२) रामपूर्वतापिन्युपनिषद् (१३३) भावनोपनिषद् (कापिलोपनिषद्) (१६३) रामरहस्योपनिषद् (१३४) भिक्षुकोपनिषद् (१६४) रामोत्तरतापिन्युपनिषद् (१३५) मठाम्नायोपनिषद् (१६५) रुद्रहृदयोपनिषद् (१३६) मण्डलब्राह्मणोपनिषद् (१६६) रुद्राक्षजाबालोपनिषद् (१३७) मन्त्रिकोपनिषद् (चूलिकोपनिषद्) (१६७) रुद्रोपनिषद् (१३८) महायुपनिषद् (१६८) लक्ष्म्युपनिषद् (१३९) महानारायणोपनिषद् (बृहन्नारायणोपनिषद्, (१६९) लाङ्गलोपनिषद् उत्तर नारायणोपनिषद्) (१७०) लिङ्गोपनिषद् (१४०) महावाक्योपनिषद् (१७१) वज्रपञ्जरोपनिषद् (१४१) महोपनिषद् (१७२) वज्रसूचिकोपनिषद् (१४२) माण्डूक्योपनिषद् (१७३) वनदुर्गोपनिषद् (१४३) माण्डूक्योपनिषत्कारिका (१७४) वराहोपनिषद् क. आगम (१७५) वासुदेवोपनिषद् ख. अलातशान्ति (१७६) विश्रामोपनिषद् ग. वैतथ्य (१७७) विष्णुहृदयोपनिषद् घ. अद्वैत (१७८) शरभोपनिषद् (१४४) मुक्तिकोपनिषद् (१७९) शाट्यायनीयोपनिषद् (१४५) मुण्डकोपनिषद् (१८०) शाण्डिल्योपनिषद् (१४६) मुद्गलोपनिषद् (१८१) शारीरकोपनिषद् (१४७) मृत्युलाङ्गलोपनिषद् (१८२) १. शिवसङ्कल्पोपनिषद् (१४८) मैत्रायण्युपनिषद् (१८३) २. शिवसङ्कल्पोपनिषद् (१४९) मैत्रेय्युपनिषद् (१८४) शिवोपनिषद् (१५०) यज्ञोपवीतोपनिषद् (१८५) शुकरहस्योपनिषद् (१५१) याज्ञवल्क्योपनिषद् (१८६) शौनकोपनिषद् (१५२) योगकुण्डल्युपनिषद् (१८७) श्यामोपनिषद् (१५३) योगचूडामण्युपनिषद् (१८८) श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषद्

१६ [भूमिका] (१८९) श्रीचक्रोपनिषद् (२०५) सिद्धान्तविन्दूपनिषद् (१९०) श्रीविद्यातारकोपनिषद् (२०६) सिद्धान्तशिखोपनिषद् (१९१) श्री सूक्तम् (२०७) सिद्धान्तसारोपनिषद् (१९२) श्वेताश्वतरोपनिषद् (२०८) सीतोपनिषद् (१९३) षोढोपनिषद् (२०९) सुदर्शनोपनिषद् (१९४) सङ्कर्षणोपनिषद् (२१०) सुबालोपनिषद् (१९५) सदानन्दोपनिषद् (२११) सुमुख्युपनिषद् (१९६) सन्ध्योपनिषद् (२१२) सूर्यतापिन्युपनिषद् (१९७) संन्यासोपनिषद् (अध्यायात्मक) (२१३) सूर्योपनिषद् (१९८) संन्यासोपनिषद् (वाक्यात्मक) (२१४) सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् (१९९) सरस्वतीलहस्योपनिषद् (२१५) स्कन्दोपनिषद् (२००) सर्वसारोपनिषद् (सर्वोपनिषद्) (२१६) स्वसंवेद्योपनिषद् (२०१) सहवै उपनिषद् (२१७) हयग्रीवोपनिषद् (२०२) संहितोपनिषद् (२१८) हंसषोडोपनिषद् (२०३) सामरहस्योपनिषद् (२१९) हंसोपनिषद् (२०४) सावित्र्युपनिषद् (२२०) हेरम्बोपनिषद् भाष्य एवं अनुवाद आचार्य शंकर ने ईश, केन, कठ, प्रश्न, जी० ए० नटसेन, मद्रास, सीतानाथ तत्त्वभूषण मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, (१९००), एस० सी० बसु (१९११), आर० हूम बृहदारण्यक एवं श्वेताश्वतर, इन ११ उपनिषदों के (१९२१), ई० बी० कोवेल, हिरियन्ना, द्विवेदी, भाष्य किये हैं। इसके पूर्व उपनिषदों के स्वतन्त्र गदाधर शास्त्री और श्री अरविन्द ने भी कुछ उपनि- भाष्य गिने-चुने ही किये गये हैं। षदों के अनुवाद प्रकाशित किये हैं। शाहजादा दाराशिकोह द्वारा किए गये मुख्य उपनिषदों पर शंकर के भाष्यों के फारसी अनुवाद संग्रह में लगभग ५० उपनिषदें अँग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध हैं। उनकी व्याख्याओं शामिल थीं। कोलब्रुक के संग्रह में उपनिषदों में अद्वैत का दृष्टिकोण है। रंगरामानुज ने उपनिषदों की संख्या ५२ थी। जर्मन विद्वान् मैक्समूलर ने के अपने भाष्यों में रामानुज का दृष्टिकोण अपनाया आचार्य शंकर द्वारा चुनी गयी ११ उपनिषदों के है। मध्व के भाष्यों में द्वैत दृष्टिकोण है। उनके साथ 'मैत्रायणीय' उपनिषद् सहित १२ उपनिषदों भाष्यों के उद्धरण पाणिनी आफिस इलाहाबाद से का अनुवाद किया था। प्रकाशित उपनिषदों के संस्करण में मिलते हैं। उपनिषदों के अँग्रेजी अनुवाद इस क्रम से उक्त उपनिषदों के अतिरिक्त अन्य उपनिषदों प्रकाशित हुए हैं- राजाराममोहनराय (१८३२), के भाष्य या भावार्थ छिट-पुट रूप से कहीं-कहीं रोअर (१८५३), मैक्समूलर (१८७९-१८८४- मिलते हैं। गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित सेक्रेट बुक्स ऑफ द ईस्ट), मीड और चट्टोपाध्याय 'कल्याण' के विशेषांक 'उपनिषद् अंक' (१९४९) (१८९६), लंदन थियोसोफिकल सोसाइटी, में एक ही स्थान पर ५४ उपनिषदों के भावार्थ प्राप्त सीताराम शास्त्री और गंगानाथ झा (१८९८-१९०१), होते हैं।

भूमिका १७ रचनाकाल उपनिषदों के रचना काल के सम्बन्ध में कोई एक मत स्वीकार नहीं किया जा सकता है। कुछ उपनिषदें वेद की मूल संहिताओं की अंश है, उन्हें सबसे प्राचीन माना जाता है। कुछ उपनिषदें ब्राह्मण, आरण्यक आदि के अंश हैं, उनका रचनाकाल निश्चित रूप से संहिता काल के बाद का ही सिद्ध होगा। कुछ उपनिषदें स्वतंत्र हैं, वे सब बाद में क्रमशः अस्तित्व में आयीं। काल निर्णय के सन्दर्भ में मंत्रों-श्लोकों में प्राप्त विभिन्न विवरणों का सहारा लिया जाता है। मंत्रों में जो संदर्भ मिलते हैं, उनमें (१) भौगोलिक परिस्थितियाँ (२) सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राजाओं राजाओं या ऋषियों के नाम (३) खगोलीय योगों के विवरण हैं। इनमें भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर गंगा, सरस्वती, सिन्धु आदि नदियों के नाम आदि के आधार पर केवल यही संकेत मिलते हैं कि इनका रचनाकाल संदर्भित नदी आदि के उद्भव के बाद का ही है। इसलिए कोई सुनिश्चित काल निर्धारण इस आधार पर नहीं हो पाता। राजाओं- ऋषियों के नामों को आधार बनाने में भी उक्त समस्या बनी रहती है। फिर एक ही नाम के अनेक राजा एवं ऋषि पाये जाते हैं जिनके बीच अनेक पीढ़ियों के अंतर होते हैं। ऐसी स्थिति में रचनाकाल का निर्णय भी ठीक प्रकार नहीं हो पाता। जहाँ खगोलीय योगों का वर्णन मिल जाता है, वहाँ ज्योतिष गणित के आधार पर बहुत कुछ सुनिश्चित गणना की जा सकती है। संहिताओं, ब्राह्मणों एवं स्वतंत्र उपनिषदों के काल निर्णय के संदर्भ में भी इसी विद्या का उपयोग अधिकांश विद्वानों ने किया है। इस विधि से किये गये काल निर्णयों को समझने में सहायक हो सकने वाली मोटी जानकारी यहाँ दी जा रही हैं।

अयनभोग सिद्धान्त मान्य तथ्य है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर लगातार घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करती रहती है। पृथ्वीवासियों को सूर्य ही चलायमान प्रतीत होता है। आकाश में सूर्य के भासित पथ (एपैरन्ट पाथ) को क्रान्ति वृत्त कहते हैं। क्रान्ति वृत्त पर चलता हुआ सूर्य कभी पृथ्वी के उत्तरगोल में कभी दक्षिण गोल में पहुँचा हुआ अनुभव होता है। इस क्रम में सूर्य जिस बिन्दु पर विषुवत् रेखा के दक्षिण भाग में प्रवेश करता है, उसे शरत् संपात् बिन्दु कहते हैं। तथा इससे ठीक १८० अंश पर दूसरा बिन्दु बनता है, जहाँ से सूर्य उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करता है, उसे वसन्त सम्पात कहते हैं। ये सम्पात बिन्दु स्थिर नहीं हैं। वे प्रति वर्ष पूर्व से पश्चिम की ओर ५० विकला खिसकते रहते हैं। कोणीय माप में एक अंश (डिग्री) में ६० कला (मिनट) तथा एक कला में ६० विकला (सेकेन्ड) होते हैं। इस प्रकार एक अंश में ६०×६०=३६०० विकला होती है। संपात बिन्दु एक वर्ष में ५० विकला खिसकतें हैं, तो एक अंश खिसकने में ३६००/५०=७२ वर्ष लगते हैं। इन बिन्दुओं के खिसकने की गति को अयन गति कहते हैं। इस अयन गति के आधार पर काल निर्णय किया जाता है। आकाश में २७ नक्षत्रों, १२ राशियों की मान्यता प्रसिद्ध है। किसी काल में यह सम्पात बिन्दु किस नक्षत्र पर थे, यह पता लगने पर वर्तमान समय में उनकी स्थिति के आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि इस बीच वे कितने अंश, कला, विकला खिसके हैं। इतना चलने में उन्हें कितना समय लगा, यह अयनगति के आधार पर आसानी से निकल आता है। ज्योतिष के उक्त सूत्रों के आधार पर विद्वानों ने विभिन्न आर्ष ग्रन्थों के रचनाकाल निकालने के प्रयास किये हैं। श्री रजनी कान्त शास्त्री ने अपने

१८ [भूमिका]

शोध ग्रन्थ 'वैदिक साहित्य- परिशीलन' में इसी गणना के आधार पर संहिताओं का रचनाकाल लगभग ४५३३ वर्ष ईसापूर्व निकाला है। अनेक अन्य विद्वानों की गणनाएँ भी इसी के आस-पास हैं। इस आधार पर संहिताओं से निकाले गये उपनिषदों (ईशावास्य, शिवसंकल्प उपनिषद् आदि) तथा शतपथ ब्राह्मण से लिए गये उपनिषद् (बृहदारण्यक, गायत्री आदि) का रचनाकाल भी उक्तानुसार ही माना जा सकता है। मैत्रेय्युपनिषद् (६.१४) में प्राप्त ऋतु परिवर्तन काल का जो उल्लेख मिलता है, उसके आधार पर लोकमान्य तिलक ने उक्त उपनिषद् का रचनाकाल ई०पू० १८८०-१६८० के बीच माना है। अन्य विद्वानों के गणितीय निष्कर्ष भी इसी के आसपास हैं। लेकिन यहाँ एक बात और ध्यान देने योग्य है। सम्पात बिन्दुओं को आकाश में एक चक्र ३६० अंश (डिग्री) पार करने में ३६० x ७२ = २५९२० वर्ष अर्थात् लगभग २६००० वर्ष का समय लगता है। इस हिसाब से संहिताओं के रचनाकाल में जो अयन स्थिति थी, वह २६००० वर्ष पूर्व भी रही होगी; किन्तु यह सुनिश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उस काल से अब तक २६००० वर्ष के कितने चक्र पूरे किये जा चुके हैं ? ईसाई मतावलम्बी लोग सृष्टि की उत्पत्ति का समय ईसा से मात्र ५००० या ७००० वर्ष पूर्व ही मानते रहे हैं। इस मान्यता के आधार पर उपनिषदों का रचनाकाल ४००० वर्ष ईसा पूर्व तक मैक्समूलर आदि पाश्चात्य विद्वानों ने माना है; किन्तु अब तो वैज्ञानिक ऐसे प्रमाण देने लगे हैं, जिनके आधार पर सृष्टि का उद्भव लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ माना जाने लगा है। भारतीय वैदिक धर्म वाले तो सृष्टि की उत्पत्ति करोड़ों वर्ष पूर्व की मानते हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि संपात बिन्दुओं की किसी भी स्थिति के लिए निर्धारित समय के साथ २६००० वर्ष के कितने चक्र और जोड़े जाएँ ? इसलिए उपनिषदों के रचनाकाल के बारे में तमाम अनुमानों और गणितीय प्रयोगों के बाद भी कोई साधिकार निर्णय दिया जाना संभव नहीं दिखता।

उपनिषदों के वर्ण्य विषय

उपनिषदों का मूल विषय 'ब्रह्मविद्या' को माना गया है। 'ब्रह्मविद्या' का क्षेत्र बड़ा व्यापक है। विद्वानों ने विभिन्न उपनिषदों में वर्णित विषयों के आधार पर 'ब्रह्मविद्या' के अन्तर्गत ३२ विद्याओं को समाविष्ट माना है। जो इस प्रकार हैं - (१) सद्विद्या (छान्दो०), (२) आनन्दविद्या (तैत्ति०), (३) अन्तरादित्यविद्या (छान्दो०), (४) आकाश विद्या (छान्दो०), (५) प्राण विद्या (छान्दो०), (६) गायत्री- ज्योतिर्विद्या (छान्दो०), (७) इन्द्रप्राणविद्या (छान्दो०, कौ०ब्रा०), (८) शाण्डिल्यविद्या (छान्दो०), (९) नाचिकेतसविद्या (कठ०), (१०) उपकोसलविद्या (छान्दो०), (११) अन्तर्यामिविद्या (बृह०), (१२) अक्षरविद्या (मुण्ड०), (१३) वैश्वानरविद्या (छान्दो०), (१४) भूमाविद्या (छान्दो०), (१५) गार्ग्यक्षरविद्या (बृह०), (१६) प्रणवोपास्य परमपुरुष विद्या (प्रश्न०), (१७) दहर विद्या (छान्दो०, बृह०, तैत्ति०), (१८) अंगुष्ठ प्रमितविद्या (कठ०, श्वेता०), (१९) देवोपास्यज्योतिर्विद्या (बृह०), (२०) मधुविद्या (छान्दो०), (२१) संवर्गविद्या (छान्दो०), (२२) अजाशरीरकविद्या (श्वेता०, तैत्ति०), (२३) बालाकिविद्या (कौ०ब्रा०, बृह०), (२४) मैत्रेयी विद्या (बृह०), (२५) द्रुहिणरुद्रादिशरीरक विद्या, (२६) पञ्चाग्निविद्या (छान्दो०, बृह०), (२७) आदित्यस्थानार्थक विद्या (बृह०), (२८) अक्षिस्थान्नामक विद्या (बृह०), (२९) पुरुषविद्या (छान्दो०, तैत्ति०), (३०) ईशावास्यविद्या (ईश०), (३१) उपस्ति कहोल विद्या (बृह०) और (३२) व्याहृति-शरीरक विद्या।

भूमिका ११

ये विद्याएँ क्रमशः स्पष्ट करती हैं कि- (१) परब्रह्म अपने सङ्कल्पानुसार सबके कारण हैं, (२) वे कल्याणगुणाकर वैभवसम्पन्न आनन्दमय हैं, (३) उनका रूप दिव्य है, (४) उपाधि रहित होकर वे सबके प्रकाशक हैं, (५) वे चराचर के प्राण हैं, (६) वे प्रकाशमान हैं, (७) वे इन्द्र, प्राण आदि चेतनाचेतनों के आत्मा हैं, (८) प्रत्येक पदार्थ की सत्ता, स्थिति एवं यत्न उनके अधीन हैं, (९) समस्त संसार को लीन कर लेने की सामर्थ्य उनमें है, (१०) उनकी नित्य स्थिति नेत्र में है, (११) जगत् उनका शरीर है, (१२) उनके विराट् रूप की कल्पना में अग्नि आदि अङ्ग बनकर रहते हैं, (१३) स्वर्लोक, आदित्य आदि के अङ्गी बने हुए वे वैश्वानर हैं, (१४) वे अनन्त ऐश्वर्य सम्पन्न हैं, (१५) वे नियन्ता हैं, (१६) वे मुक्त पुरुषों के भोग्य हैं, (१७) वे सबके आधार हैं, (१८) वे अन्तर्यामी रूप से सबके हृदय में विराजमान हैं, (१९) वे सभी देवताओं के उपास्य हैं, (२०) वे वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साध्यों के आत्मा के रूप में उपास्य हैं, (२१) अधिकारानुसार वे सभी के उपासनीय हैं, (२२) वे प्रकृतितत्त्व के नियन्ता हैं, (२३) समस्त जगत् उनका कार्य है, (२४) उनका साक्षात्कार कर लेना मोक्ष का साधन है, (२५) ब्रह्मा, रुद्र आदि-आदि देवताओं के अन्तर्यामी होने के कारण उन-उन देवताओं की उपासना के द्वारा वे प्राप्त होते हैं, (२६) संसार के बन्धन से मुक्ति उनके अधीन है, (२७) वे आदित्यमण्डलस्थ हैं, (२८) वे पुण्डरीकाक्ष हैं, (२९) वे परम पुरुष (पुरुषोत्तम) हैं, (३०) वे कर्म सहित उपासनात्मक ज्ञान के द्वारा प्राप्त होने वाले हैं, (३१) उनके प्राप्त करने में अनिवार्य होते हैं, अन्य भोजनादि विषयक नियम भी और (३२) व्याहृतियों की आत्मा बनकर वे मन्त्रमय हैं। यह विषय विभाजन का एक क्रम है। विद्वानों ने और भी विभिन्न दृष्टियों से उपनिषदों के विषयों की विवेचनाएँ की हैं। जीवन की अगणित विविधताओं एवं उनके रहस्यों का वर्णन उपनिषदों में मिलता है। इनमें विशुद्ध ज्ञान भी है तथा उसके अनुरूप साधना विज्ञान- योगविद्या की विभिन्न धाराएँ भी हैं। लौकिक और अलौकिक विभूतियों की प्राप्ति के उपायों के साथ उनके सुनियोजन-सदुपयोग के सूत्र भी हैं। ब्रह्म से प्रकृति एवं जीव की उत्पत्ति, जीव से जीव के विकास का क्रम तथा जीव का काया छोड़कर विभिन्न मार्गों से होकर पुनः ब्राह्मी चेतना में विलीन हो जाना, यह सभी पक्ष उपनिषदों में मिल जाते हैं। उक्त तथ्यों को विषयानुसार वर्गीकृत करें, तो सूची बहुत लम्बी हो सकती है। फिर भी चूँकि यह सब विश्व वैचित्र्य ब्राह्मी संकल्प से ही उभरा है और उसी में पुनः समाहित हो जाता है, इसलिए उपनिषदों का मूल विषय ब्रह्म विद्या को ही कहा जाये, तो यह उचित ही है।

अनोखी शैली

उपनिषद् की अपनी शैली अद्भुत है। गूढ़ रहस्यों को समझने की तीव्र उत्कण्ठा, अनुभूति की गहन क्षमता तथा अभिव्यक्ति की सहजता का दर्शन जगह-जगह होता ही रहता है। कठोपनिषद् में नचिकेता अपनी जिज्ञासा को लेकर यम के सामने इतने अविचल भाव से डटे रहते हैं कि यम को द्रवित होना ही पड़ता है। छान्दोग्योपनिषद् में ऋषि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु सहित जिज्ञासु भाव से क्षत्रिय राजा प्रवाहण से उपदेश प्राप्त करने में कोई संकोच नहीं करते। ऐतरेय उपनिषद् में ऋषि वामदेव प्रजनन चक्र समझने के लिए स्वयं अपनी चेतना को उस चक्र में घुमाकर अनुभव प्राप्त करते हैं। इस प्रकार प्राप्त अनुभूतिजन्य ज्ञान को जनहितार्थ बड़ी सहजता से व्यक्त किया जाता है। गूढ़ ज्ञान प्रकट करने वालों में जहाँ अपने

२० [भूमिका]

बायाँ स्तम्भ (Left Column):

अनुभव के प्रति पूर्ण आत्मविश्वास मिलता है, वहीं ज्ञानी की निरहंकारिता भी स्पष्ट परिलक्षित होती है। बालक नचिकेता को यम के द्वार पर तीन दिन प्रतीक्षा करनी पड़ती है, तो यमदेव स्वयं उसके लिए पश्चात्ताप प्रकट करते हैं। जनक की सभा में याज्ञवल्क्य शिष्यों को गौएँ ले जाने की आज्ञा देते हैं, तो अन्य विद्वान् उनसे पूछते हैं कि क्या आप स्वयं को सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता मानते हैं? तब वे नम्रतापूर्वक कहते हैं - ‘‘ब्रह्मवेत्ताओं को मेरा नमस्कार है, मुझे तो गौओं की आवश्यकता थी, इसलिए उन्हें स्वीकार कर लिया’’। अपनी बात समझाने के लिए ऋषि विविध ढंग अपनाते हैं। केनोपनिषद् में पहले ब्रह्म के विषय में विवेचनात्मक शैली अपनायी गयी है। बाद में यक्ष प्रसंग द्वारा कथा शैली से उसे समझाया गया है। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को जन सामान्य के लिए सुलभ उपमाओं के माध्यम से व्यक्त करने का बड़ा सुन्दर प्रयास किया गया है। श्वेताश्वतर उपनिषद् के १.४ में विश्व व्यवस्था को एक विशिष्ट पहिये की उपमा से समझाने का प्रयास किया गया है, तो १.५ में विश्व के जीवन प्रवाह को एक नदी के प्रसंग से व्यक्त करने का कौशल दिखाया गया है। ब्राह्मी चेतना किस प्रकार विभिन्न चरणों को पूरा करती हुई ‘जीव’ रूप में व्यक्त होती है, यह तथ्य मात्र विवेचनात्मक ढंग से समझना-समझाना बड़ा दुष्कर है; किन्तु छान्दोग्योपनिषद् (५.४-८) में ऋषि उसे क्रमशः पाँच प्रकार की अग्नियों में पाँच आहुतियों के उदाहरण से बहुत सहज रूप से समझाते हैं। प्रत्येक अग्नि में एक हव्य की आहुति होती है, उससे नये चरण में पदार्थ की उत्पत्ति होती है। ऋषि समझाते हैं कि प्रथम चरण में द्युलोकरूपी अग्नि में श्रद्धा की आहुति से सोम, दूसरे में पर्जन्यरूपी अग्नि में सोम की आहुति से वर्षा, तीसरे चरण में पृथ्वीरूपी अग्नि में वर्षा की आहुति से अन्न, चतुर्थ चरण में पुरुष में अन्न की आहुति से शुक्राणु तथा पाँचवें चरण में नारीरूपी अग्नि में शुक्राणु की आहुति से व्यक्ति वाचक ‘जीव’


दायाँ स्तम्भ (Right Column):

का उद्भव होता है। आज का विज्ञान अपने समस्त संसाधनों के साथ भी चेतना और पदार्थ के इस सुसंगत संयोजन का अध्ययन नहीं कर पा रहा है। उपनिषद् में केवल बौद्धिक जानकारियों को अपर्याप्त माना है, ज्ञान की सभी धाराओं के मूल में स्थित आत्मतत्त्व का अनुभव करना अभीष्ट माना जाता है। छान्दोग्योपनिषद् में श्वेतकेतु स्वीकार करते हैं कि वे वेदादि का अध्ययन तो कर चुके हैं; लेकिन अभी उस अनुभूति को नहीं पा सके हैं, जिसके आधार पर अनसुना-अनजाना भी सुना और समझा जा सकता है। स्वयं देवर्षि नारद भी सनत्कुमार जी से कहते हैं कि उन्हें वेद विद्या से लेकर नागविद्या तक सभी तरह की विद्याएँ तो प्राप्त हैं; किन्तु अभी आत्मतत्त्व का ज्ञान नहीं हुआ है। उपनिषद् के ऋषि आत्मबोध को तो परमेश्वर के लिए भी आवश्यक मानते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् १.४.१० में कहा गया है कि ब्रह्म ने अपने को जाना तो वह ‘सर्व’ हो गया। देवता, ऋषि, मनुष्यों में से जिन्होंने भी उसे जाना, वे तद्रूप हो गये। महर्षि वामदेव उसी अनुभव के आधार पर कहते हैं, ‘मैं ही मनु और सूर्य हुआ हूँ....आदि। ईशोपनिषद् में भी ऋषि यही अनुभव करते हुए कहते हैं- ‘‘तेजो यत्ते रूपम् कल्याणतमं तत्ते पश्यामि, योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि।’’ सर्वत्र एक ही चेतना को सक्रिय देखने वाले ऋषि किसी जाति भेद, वर्गभेद में बँधना स्वीकार नहीं करते। सत्यकाम जाबाल अपने पिता का परिचय नहीं जानते; किन्तु उनकी प्रखर जिज्ञासा के आधार पर उन्हें अध्यात्म की उच्च कक्षा में प्रवेश दिया जाता है। बृहदारण्यकोपनिषद् १.४.११-१५ में ऋषि स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के चारों वर्ण ब्रह्म के ही रूप हैं। यह रूप उसके द्वारा विभिन्न विभूतियुक्त कर्म करने के लिए विकसित किये हैं। देवताओं में भी उनके कर्मविभाग के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र संज्ञकदेवों का उल्लेख किया जाता है। वर्णभेद के बहाने जातिभेद के विषयों के लिए उपनिषदों में कोई स्थान नहीं है। वे तो आत्मा की सर्वव्यापकता

उपनिषदों में कर्मकाण्ड का तथा उनकी

[भूमिका] २१

[खण्ड १] के आधार पर मनुष्य मात्र के लिए विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना चाहते हैं। उपनिषदों में कर्मकाण्ड का तथा उनकी फलश्रुतियों का उल्लेख भी जहाँ-तहाँ मिलता है; लेकिन वे वहीं तक सीमित नहीं रह जाते। कर्मकाण्ड के स्थूल स्वरूप को भेदकर उसके मर्म तक पहुँचते हैं, वे सामगान की व्याख्या करते हैं, तो उसे यज्ञीय कर्मकाण्ड में कुछ मन्त्रों के गायन तक ही सीमित नहीं रहने देते। छान्दोग्योपनिषद् प्रथम अध्याय के तेरहवें खण्ड में तथा अध्याय-२ के दूसरे खण्ड में प्रकृति चक्र में अनेक प्रकार के साम प्रवाह (सन्तुलित प्रवाहों) का स्वरूप समझाते हैं। उपनिषद् में पुरुषमेध-सर्वमेध आदि यज्ञ आत्म निग्रह के विधान बन जाते हैं। बृहदारण्यकोपनिषद् के अश्वमेध प्रकरण में अश्वमेध, व्यक्ति द्वारा सम्पूर्ण विश्व को समर्पित करने की समाधि जैसी प्रक्रिया के रूप में परिलक्षित होने लगता है।

भाव और भाषा

उपनिषद् में भाव और भाषा की सहजता का बड़ा सुन्दर तालमेल मिलता है। अनुभूति से उपजे सहज भावों को सहज भाषा में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। अपने भाषा ज्ञान को व्यक्त करने में आडम्बर पूर्ण, क्लिष्ट भाषा को थोपने का प्रयास नहीं किया गया है। इसके लिए तर्क, समीक्षा,कथोपकथन, उदाहरण, उपाख्यान आदि विभिन्न शैलियों का समयानुकूल उपयोग करते हुए भावों को सहज ग्राह्य बनाने का प्रयास किया गया है। यह सब होते हुए भी रहस्यात्मकता जगह- जगह परिलक्षित होती है। उसके कई कारण हैं। जैसे गूढ़ ज्ञान- विज्ञान को कितना भी सुगम बनाया जाये, उन्हें समझने के लिए अध्येता का अपना भी कुछ सार होना चाहिए। द्रष्टा ने जो देखा उसे पूरी तरह भाषा में बाँधना तो कभी सम्भव होता नहीं। भाषा में संकेतात्मक अभिव्यक्ति भर होती है। कोई संगीत विशेषज्ञ सुन्दर राग में मुधर भावों को गाकर व्यक्त करे, तो सुनने वाला उसके अन्दर के भाव प्रवाह की एक झलक भर ही पा सकता है। वह भी गायन स्वर संकेतों के साथ लिपिबद्ध किया जाए, तब तो उसके भावों को समझने के लिए और भी अधिक साधना चाहिए। आज पदार्थ विज्ञान को समझने के लिए केवल भाषा की समीक्षा करके तथ्य जानने की परिपाटी चल पड़ी है। पदार्थ विज्ञान के सन्दर्भ में यह पद्धति चल भी जाती है। लेकिन भाव विज्ञान के क्रम में तो केवल भाषा की समीक्षा से काम चल नहीं सकता। गूढ़ भावों को अनुभव करने के लिए सूक्ष्म संवेदनात्मक क्षमताएँ चाहिए। आज उनका बड़ा अभाव हो गया है। इसीलिए उपनिषदादि द्वारा सहज भाषा में प्रस्तुत भाव भी रहस्यात्मक प्रतीत होते हैं। ऋषि, देवता एवं छन्द को समझे बिना वेदमन्त्रों का भाव स्पष्ट नहीं होता। उसी प्रकार उपनिषदों के अध्ययन में भी द्रष्टा-उपदेष्टा के स्तर, उसके लक्ष्य और अभिव्यक्ति की शैली पर गहराई से ध्यान देने पर ही उनके भावों के कथन का ठीक-ठीक लाभ उठाया जा सकता है।

ऋषि का दृष्टिकोण

उपनिषद्कारों-ऋषियों ने जनकल्याण की दृष्टि से अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को बड़े सहज ढंग से व्यक्त करने का कौशल दिखाया है। उनकी मेधा का कमाल कहें या संस्कृत भाषा की विशेषता। आश्चर्य होता है कि कैसे इतने गूढ़ एवं विविधतापूर्ण तथ्यों को थोड़े शब्दों में एवं सहज भाषा में समाहित करके 'गागर में सागर' भरने की उक्ति चरितार्थ की गयी है। औपनिषदीय सूत्रों का भावार्थ करने में जहाँ भाषा को सहज बोधगम्य बनाना आवश्यक लगता