भारतकोश
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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

नारायण से ही समष्टिगत प्राण उत्पन्न हुआ है, मन और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भी उन्हीं से प्रकट हुई। आकाश, वायु, तेज, जल तथा सम्पूर्ण विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी की उत्पत्ति भी उन्हीं से हुई। ब्रह्मा और रुद्र भी नारायण से ही उत्पन्न होते हैं- नारायणात्प्राणो जायते। मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी। नारायणाद्ब्रह्मा जायते। नारायणाद्रुद्रो जायते (नारा० १)। नारायण देव ही एकमात्र निष्कलङ्क, निरञ्जन, निर्विकल्प, अनिर्वचनीय एवं विशुद्ध हैं, उनके सिवा दूसरा कोई नहीं है- निष्कलङ्को निरञ्जनो निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित् (नारा०२)। महोपनिषद् में भी इसी तथ्य की पुष्टि होती है कि आदि में एकमात्र नारायण ही थे, न ब्रह्मा, न रुद्र-एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानो (महो०१.१)। आदि पुरुष भगवान् नारायण के नामोच्चारण मात्र से मनुष्य कलि के सब दोषों का नाश करता है- भगवत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलिर्भवतीति (कलिसं० १)। १०६: निःश्रेयस -द्र०- अभ्युदय। १०७. निःस्पृह—स्पृहा का तात्पर्य है - इच्छा, कामना, लालसा, अभिलाषा। जो कोई भी लौकिक इच्छा, कामना न रखता हो, उसे निःस्पृह कहते हैं। निःस्पृह व्यक्ति ही एकमात्र आध्यात्मिक उत्कर्ष की महत्त्वाकांक्षा की रखते और महिमावान् बनते हैं। ऐसे महामना अपने कर्त्तव्य पथ पर अविचल खड़े रहते हैं और प्रतिष्ठा एवं देव कृपा के सुयोग को पाते हैं। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि रजोगुण के बढ़ने पर लोभ प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा (विषय भोगों को इच्छा)- ये सब बढ़ते हैं- लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ (गी० १४.१२)। बन्धु-बान्धवों आदि की बढ़ाने की स्पृहा से दीनता के दोष की वृद्धि होती है- दैन्यदोषमयी दीर्घा वर्धते वार्धके स्पृहा (महो० ३.३६)। सब कामनाओं से निःस्पृह चित्त ही युक्त (नियंत्रित) कहा जाता है- निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा (गी० ६.१८)। १०८ ध्रुवा — कोश ग्रन्थों में ध्रुवा-नित्या का पर्याय पार्वती, मनसा देवी, एक शक्ति बताया गया है। नित्या का एक अर्थ ध्रुवा अर्थात् स्थिर है। ब्राह्मणग्रन्थों में पृथ्वी, आत्मा आदि की ध्रुवा कहकर उपन्यस्त किया गया है- पृथिवी ध्रुवा (तै० ब्रा० ३.३.१.२), आत्मा ध्रुवा (तै०ब्रा० ३.३.१.५)। ब्रह्माण्ड पुराण (४.१९.५९) में अविनाशी देवियों के एक समूह को नित्या कहा गया है। उपनिषद् में वर्णित है कि आहारशुद्धि होने पर अन्तःकरण की शुद्धि होती है और अन्तःकरण की शुद्धि होने पर निश्चल (स्थिर) स्मृति प्राप्त होती है- आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः (छान्दो० ७.२६.२)। १०९. निर्गुण-सगुण— परब्रह्म के दो रूप माने गये हैं। निर्गुण और सगुण। उसके सगुण रूप से दृश्य जगत् की उत्पत्ति हुई है। अनन्त सृष्टि की रचना करने वाला वह परमेश्वर वास्तव में अनन्त और निर्गुण ही है। निर्गुण का तात्पर्य है- गुण रहित। परमात्मा की बनायी सृष्टि सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से युक्त है, लेकिन परमात्मा स्वयं इन तीनों गुणों से परे होने से निर्गुण कहा जाता है। निर्गुण ब्रह्म अव्यक्त और केवल ज्ञान गम्य हैं। सगुण व्यक्त तथा गुणों से संयुक्त है। गीता के कथनानुसार निर्गुण की उपासना क्लिष्ट है और सगुणोपासना सरल है। आदि शंकराचार्य ने ब्रह्म को निराकार, निर्गुण, समस्त भेदों से रहित, सर्वोपाधि विनिर्मुक्त और नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्त स्वभाव वाला स्वीकार किया है। उपनिषद् में भी इसी तथ्य की पुष्टि होती है। उस ब्रह्म को शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध से रहित नित्य तथा अविनाशी स्वरूप वाला वर्णित किया गया है- अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् (कठ० १.३.१५)। ब्रह्म के निराकार, निर्गुण स्वरूप की मुण्डकोपनिषद् में उपन्यस्त किया गया है। वह ब्रह्म अदृश्य, अग्राह्य, अगोत्र, अवर्ण तथा चक्षुः, श्रोत्र और हाथ-पैरों से रहित हैं- यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तदपाणिपादम् (मुण्ड०१.१.६)। ब्रह्म का निर्गुण स्वरूप अनिर्वचनीय है, अतः उपनिषदों में उसका निरूपण करते हुए 'नेति-नेति' (बृह० २.३.६) कहा गया है। सगुण ब्रह्म को माया की उपाधि से युक्त माना गया है। सगुण उपासना में अवतारों की प्रधानता है। ईश्वर ही जब मायोपहित देह के द्वारा आविर्भूत होते हैं, तो उसे अवतार कहते हैं। यह दृश्यमान जगत् भी सगुण ब्रह्म का रूप माना जाता है। ११०. निर्विकल्पक - द्र०-समाधि। १११. निष्काम कर्म — शास्त्रों में निष्काम कर्म की महत्ता विशेष रूप से प्रतिपादित हुई है। निष्काम कर्म का तात्पर्य

है- कामना रहित कर्म। श्रीमद्भगवद्गीता में निष्काम कर्म का आदेश है। इसमें फल की इच्छा के बिना कर्म किया जाता है। अपने कर्म को अपने उपास्य के चरणों में अर्पित कर दिया जाता है। निष्काम कर्म करने वाले के हृदय में परमात्मा प्रवेश करता है तथा उसे भक्ति एवं मोक्ष प्रदान करता है। सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के द्वारा होता है, पुरुष के ऊपर कर्म का आरोप मिथ्या है। जब यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब मनुष्य बन्धन में नहीं पड़ता। मनुस्मृति के अनुसार संसार में कहीं भी कामना के बिना कोई क्रिया नहीं दिखाई देती। मनुष्य कामनाओं की प्रेरणा से ही कर्म करता है (मनु०स्मृ०२.४); परन्तु कामनाओं के पथ पर भटकते मनुष्य भगवत्प्राप्ति जैसे दिव्य उद्देश्य को प्राप्ति नहीं कर पाते, उसके लिए तो निष्काम कर्म ही प्रतिपादित किया गया है। ११२. पञ्चकोश — वेदान्त में मनुष्य शरीर के पाँच कोशों का वर्णन किया गया है- अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोश। स्थूल शरीर में अन्नमय कोश, सूक्ष्म शरीर में प्राणमय कोश, मनोमय एवं विज्ञानमय तथा कारण शरीर में आनन्दमयकोश अवस्थित है। मन के साथ पंच ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से मनोमय कोश तथा बुद्धि के साथ पंच ज्ञानेन्द्रियों के संयोग से विज्ञानमय कोश बनता है। पाँच प्राणों तथा कर्मेन्द्रियों के मेल से प्राणमयकोश बनता है। प्राणमय कोश क्रियाशक्ति से सम्पन्न तथा कर्मरूप है। मनोमय कोश इच्छाशक्ति से सम्पन्न और कारण रूप है। विज्ञानमय कोश ज्ञानशक्ति से सम्पन्न और कर्तृरूप है। आनन्दमयकोश में मनुष्य समाधि का अभ्यास करके अपने मूल स्वरूप में आ जाता है। सर्वसारोपनिषद् के अनुसार अन्न से बनने वाले कोशों के समूहरूपी शरीर को अन्नमय कोश कहते हैं। प्राण आदि चौदह प्रकार को वायु इस अन्नमय कोश में संचार करते हैं, तब उसे प्राणमय कोश कहते हैं। इन दो कोशों के भीतर मन आदि चौदह इन्द्रियों द्वारा जब आत्मा शब्दादि विषयों का विचार करता है, तब उसे मनोमय कोश कहते हैं। आत्मा इन तीनों कोशों के साथ संयुक्त होकर बुद्धि द्वारा जो कुछ जानता है, उसका बुद्धियुक्त स्वरूप विज्ञानमय कोश है। इन चारों कोशों के साथ आत्मा बरगद के बीज के वृक्ष की भाँति अपने कारण स्वरूप अज्ञान में रहता है, उसे आनन्दमय कोश कहते हैं। अन्नमय कोश को विकसित करने के उपाय १. उपवास, २. आसन, ३. तत्त्व शुद्धि और ४. तपश्चर्या मुख्य हैं। प्राणमय कोश के लिए १. बन्ध, २. मुद्रा तथा ३. प्राणायाम किया जाता है। मनोमय कोश को साधना हेतु १. ध्यान, २. त्राटक, ३. जप और ४. तन्मात्रा को साधना करते हैं। विज्ञानमय कोश की पुष्टि के लिए १. सोऽहम् साधना २. आत्मानुभूति, ३. स्वर-संयम और ४. ग्रन्थि भेदन करने हैं। आनन्दमय कोश के विकास के लिए १. सहज समाधि, २. नाद साधना, ३. बिन्दु साधना तथा ४. किरण या कला साधना का प्रयोग करते हैं। ११३. पञ्चप्राण — द्र० - प्राण। ११४. पञ्चविध मुक्ति — जीवात्मा जब इष्ट देव या ब्रह्म के लोक, रूप, योग, निकटता या एकत्व को प्राप्त करता है, तो यह मुक्ति की अवस्था कही जाती है। यह मुक्ति पञ्चविध मान्य है- सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य, सायुज्य और कैवल्य। मुक्त जीव जब इष्टदेव के साथ एक लोक में वास करता है, इसे सालोक्य मुक्ति कहा गया है। उपासक जब अपने उपास्य के रूप में रहते हुए उसी के रूप को प्राप्त कर लेता है, इस समान रूप होने के भाव या सरूपता को सारूप्य मुक्ति कहते हैं। मुक्त जीव जब भगवान् के पास वास करता है, तो उस मुक्ति को सामीप्य कहा गया है और जिसमें जीव परमात्मा में लीन हो जाता है या योग को प्राप्त करता है, तो यह मुक्ति सायुज्य कही जाती है। अविद्या, त्रिविध दुःखों तथा अहंकार आदि से निवृत्ति की विशुद्ध स्थिति को कैवल्य मुक्ति कहा गया है। मुक्तिकोपनिषद् में भगवान् श्रीराम का कथन है कि दुराचार में लगा हुआ व्यक्ति भी मेरा नाम स्मरण करते से सालोक्य मुक्ति को प्राप्त होता है, वहाँ से वह अन्य लोकों में नहीं जाता- दुराचारस्तो वापि मन्नामभजनात्कपे। सालोक्य मुक्तिमाप्नोति न तु लोकान्तरादिकम् (मुक्ति० १.१८-१९)। पाप समूह के नष्ट होने पर वह मेरे सारूप्य-समान रूप को प्राप्त होता है-निर्धूताशेषपापौघो मत्सारूप्यं भजत्ययम् (मुक्ति० १.२१)। जो द्विज सदाचार में रत रहकर नित्य अनन्य भाव से मेरा ध्यान करता है और सर्वात्म भाव से मेरा भजन करता है, वह मेरे सामीप्य को प्राप्त होता है- सदाचाररतो भूत्वा द्विजो नित्यमनन्य धीः। मयि सर्वात्मके भावो मत्सामीप्यं भजत्ययम् (मुक्ति०१.२२-२३)। वह द्विज जब भ्रमरकीट के समान सम्यक् रूप से मेरे सायुज्य को प्राप्त होता है, तब वह कल्याणकारी और ब्रह्मानंद को प्रदान करने वाली सायुज्य मुक्ति को प्राप्त होता है- मत्सायुज्यं द्विजः सम्यग्भजेद्भ्रमरकीटवत्। सैव सायुज्यमुक्तिः

४५८ [परिशिष्ट] परमात्मा

स्याद् ब्रह्मानन्दकरी शिवा। (मुक्ति० १.२४-२५)। कैवल्य मुक्ति पारमार्थिक रूप वाली है- कैवल्य मुक्तिरेकैव पारमार्थिकरूपिणी (मुक्ति० १.१८)। ११५. पञ्चाग्नि — अन्वाहार्यपचन, गार्हपत्य, आहवनीय, आवसथ्य और सभ्य संज्ञक ये अग्नयाँ पञ्चाग्नि कहलाती हैं। इनसे सम्बन्धित तत्त्वज्ञान की पञ्चाग्नि विद्या कहते हैं। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार सूर्य, बादल, पृथ्वी, पुरुष और स्त्री संबन्धी तात्त्विक ज्ञान पञ्चाग्नि विद्या है। वायु पुराण (१०६.४१-४२) के अनुसार दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य, आहवनीय, सभ्य और आवसथ्य-ये पाँच अग्नियाँ हैं। मत्स्य पुराण (३५.१६) के अनुसार महाराजा ययाति ने पंच अग्नियों के बीच एक वर्ष तक तपस्या की थी। कठोपनिषद् (१.३.१) में पञ्चाग्नि सम्पन्न पुरुषों की 'पञ्चाग्नयः' कहकर सम्बोधित किया गया है। वह प्रसिद्ध तत्पुरुष वायुमंडल से संवृत, पञ्च अग्नियों से वेष्टित तथा मन्त्रशक्ति का नियामक है- पञ्चाग्निना समायुक्तं मन्त्रशक्तिनियामकम् (पं० ब्र० १०)। ११६. परब्रह्म —द्र०-ब्रह्म। ११७. परमगति— जब साधक आत्म तत्त्व या आत्मा में अवस्थित परमात्म तत्त्व की अनुभूति कर उसी में स्थिर हो जाता है, तो साधक की वह अवस्था परम गति कहलाती है। इसे मोक्ष या मुक्ति की अवस्था भी कहते हैं। कठोपनिषद् के अनुसार जब मन के साथ पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी कोई चेष्टा नहीं करती, उस अवस्था को परमगति कहते हैं- यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् (कठ० २.३.१०)। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- जो पुरुष ॐ इस एक अक्षररूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा चिन्तन करता हुआ शरीर की त्यागकर जाता है, वह परमगति की प्राप्त होता है- ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् (गी० ८.१३)। ११८. परमपद— परम पद का शाब्दिक अर्थ है- सबसे श्रेष्ठ पद या सर्वोत्कृष्ट स्थान। इसे मोक्ष या मुक्ति के अर्थ में भी लिया जाता है। महाभारत के शान्तिपर्व (४७.३७) में श्री कृष्ण भगवान् की ही 'परमपद' कहकर निरूपित किया गया है। परब्रह्म का निवास जहाँ माना गया, उसे 'परमपद' कहा गया है। मनुष्यों के अन्दर हृदयाकाश में परमात्मा का निवास है, अतः वह भी परमपद है- लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे (कठ० १.३.१)। परम पद वह पद है, जहाँ से जीवात्मा पुनः लौटकर जन्म नहीं लेता। विवेकशील संयत मन वाला पवित्र साधक ही उस पद की प्राप्त करता है- यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः। स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते (कठ० १.३.८)। गीता में भगवान् उपदेश करते हैं कि जिसे वेदविद् अक्षर कहते हैं, जिसमें रागमुक्त यति प्रवेश करते हैं, जिसको चाहने वाले ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, मैं उस परमपद का वर्णन करूँगा-यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये (गी० ८.११)। निरालम्ब उपनिषद् के अनुसार प्राण, इन्द्रिय, अन्तःकरण आदि से भिन्न सच्चिदानन्दस्वरूप और नित्य मुक्त ब्रह्म का स्थान 'परमपद' कहलाता है- प्राणेन्द्रियाद्यन्तः करणगुणादेः परतरे सच्चिदानन्दमयं नित्यमुक्तब्रह्मस्थानं परमं पदम् (निरा० ३६)। ११९. परमात्मा—वैशेषिक दर्शन के अनुसार परमात्मा जीवात्मा से भिन्न है। वह नित्य ज्ञान, नित्य इच्छा और नित्य संकल्प वाला है। वह सम्पूर्ण सृष्टि की चलाने वाला परमात्मा एक है, जबकि जीवात्मा अगणित हैं। सर्वोपरि या विशुद्ध आत्माओं के समूह की परमात्मा स्वीकार किया गया है। न्याय दर्शन के अनुसार जो सबका द्रष्टा, भोक्ता, सबको जानने वाला और सबके सुख-दुःख विषयादि का अनुभव करने वाला है, वह परमात्मा है- सर्वस्य द्रष्टा सर्वस्य भोक्ता सर्वज्ञः सर्वानुभावी परमात्मा। महाभारत में वर्णन मिलता है कि जब आत्मा प्रकृति (शरीर) में बद्ध रहता है, तब उसे जीवात्मा कहते हैं और वही प्राकृत गुणों या शारीरिक गुणों से मुक्त होने पर परमात्मा कहलाता है- आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः। तैरेव तु विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः (महा०)। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, उत्तम पुरुष तो अन्य है, जो परमात्मा कहलाता है, वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में संव्यास होकर (लोकों का) भरण-पोषण करता है- उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः (गी०१५.१७)।

परा-अपरा विद्या [परिशिष्ट] ४५९

वह श्रेष्ठ पुरुष इस शरीर में उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा भी है- उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः (गी०१३.२२)। १२०. परा-अपरा विद्या— परा का सामान्य अर्थ है- जो सबसे परे हो या श्रेष्ठ, उत्तम। परा विद्या- वह विद्या है जो अव्यक्त अगोचर का ज्ञान कराती है। उपनिषद् विद्या को भी परा विद्या कहा गया है। ब्रह्मवेत्ता कहते आये हैं कि दो विद्याएँ जानने योग्य हैं- परा विद्या और अपरा विद्या-द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च (मुण्ड० १.१.४)। ऋक्, यजु, साम, अथर्व, शिक्षा, कल्प आदि अपरा विद्या है और अविनाशी ब्रह्म से सम्बन्धित विद्या परा विद्या है- तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः ... परा यया तदक्षरमधिगम्यते (मुण्ड० १.१.५)। १२१. परिभू — द्र०- स्वयम्भू। १२२. परिव्रज्या-परिव्राजक— धर्म प्रचार, विद्या विस्तार तथा जन-जागरण के विराट् उद्देश्य से परिभ्रमण करना परिव्रज्या कहलाता है। परिव्रज्या करने वाला वानप्रस्थी या संन्यासी या त्यागी पुरुष परिव्राजक या परिव्राट् कहलाता है। यह अपना समय ध्यान, चिन्तन, तप-तितिक्षा एवं लोक कल्याण में ही लगाता है। सादा जीवन और उच्च विचार इनका प्रमुख सिद्धांत रहा है। नारद को सब परिव्राजकों में श्रेष्ठ माना गया है, जो सब लोकों में भ्रमण करते थे- अथ कदाचित्परिव्राजकाभरणो नारदः सर्वलोकसंचारं कुर्वन् (ना०प० १.१)। परिव्रज्या का एक अर्थ संन्यास भी लिया जाता है। उपनिषद् में निर्देश है कि ब्रह्मचर्य समाप्त कर गृहस्थी होना चाहिए; गृहस्थी होकर वानप्रस्थी होना चाहिए। वानप्रस्थी होकर परिव्राजक (संन्यासी) होना चाहिए; परन्तु अन्य प्रकार से (वैराग्य होने पर) ब्रह्मचर्य, गृहस्थ या वानप्रस्थ किसी से भी परिव्राजक होना चाहिए- ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत्। वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद्वा (जाबा०४.१)। परिव्राजक चार प्रकार के होते हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस-परिव्राजका अपि चतुर्विधा भवन्ति-कुटीचका बहूदका हंसाः परमहंसाश्चेति (आश्र०४)। १२३. पर्जन्य— सामान्यतया पर्जन्य का अर्थ मेघ, बादल या वर्षा से लिया जाता है। कहीं-कहीं इन्द्रदेव, सूर्यदेव या विष्णुदेव के लिए भी यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। पर्जन्य देव को वैदिक देवताओं में परिगणित किया गया है। ये एक अन्तरिक्ष स्थानीय देवता हैं। पर्जन्य वर्षण की सभी लोग कामना करते हैं- निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु (तै०सं०७.५.१८.१)। पर्जन्य को अग्नि भी कहा गया है- पर्जन्यो वा अग्निः (शत०ब्रा०१४.९.१.१३)। प्रजापति ही पर्जन्य होकर प्रजाओं के पिता (पोषक) बने- पर्जन्यो भूत्वा (प्रजापतिः) प्रजानां जनित्रमभवत् (जै०ब्रा०१.३१४)। १२४. पवमान— पवमान शब्द 'पवित्रकारक' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। सोम 'पवित्रकारक' होने से 'पवमान' विशेषण से प्रायः निरूपित किया गया है। स्तोत्रादि का भी विशिष्ट अंश 'पवमान स्तोत्र' कहलाता है। प्रवाहित होने या प्रवहमान अर्थ में भी यह प्रयुक्त हुआ है, क्योंकि प्रवहमान वायु को भी पवमान कहा गया है- अयं वाव यः (वायुः) पवते स पवमानः (काठ० सं०२२.१०), अयं वायुः पवमानः (शत०ब्रा०२.५.१.५)। अग्नि, वायु, आदित्य, सोम, प्राण और यज्ञ ये सब पवित्रकारक होने से पवमान कहे गये हैं- त्रयो ह वा एते समुदायात् पवमानाः अग्निर्वाद्वयुरसावादित्यः (जैमि०ब्रा०१.२७४), सोमो वै पवमानः (शत०ब्रा०२.२.३.२२), प्राणो वै पवमानः (शत०ब्रा०२.२.१.६), पवमानो वाव यज्ञः (जै०ब्रा०१.११९)। १२५. पाप-पुण्य— किसी कर्म में अनिष्ट साधनों या भावनाओं का प्रयोग करना पाप कहलाता है। दूसरे शब्दों में बुरा या अशुभ कृत्य, जिससे मनुष्य बुरी गति को प्राप्त होता है, पाप कहलाता है। इसका विपर्याय पुण्य है। झूठ, पाप, तमस् और उन्माद- ये जीव को अमृत से दूर मृत्यु की ओर ले जाते हैं- पुण्य से स्वर्ग की प्राप्ति और पाप से नरक की प्राप्ति की मान्यता है। उपनिषद् के अनुसार सत्पुरुषों का संसर्ग स्वर्ग (पुण्यदायी) और असत् सांसारिक विषयों एवं संसारी जनों का संसर्ग ही नरक (पापदायी) है- स्वर्ग इति च सत्संसर्गः स्वर्गः। नरक इति च असत्संसारविषयजनसंसर्ग एव नरकः (निरा०१६-१७)। सतोगुणी कर्मों से पुण्य तथा तमोगुणी कर्मों से पाप की प्राप्ति होती है अथवा धर्म से पुण्य तथा अधर्म से पाप की प्राप्ति होती है। पाप-पुण्य की सरल परिभाषा निम्नांकित श्लोक में है, जिसमें कहा गया है कि परोपकार करना, दूसरों की भलाई करना, पुण्य है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाना-दुःखी करना पाप है- अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥

४६० [परिशिष्ट] पुरुषसूक्त

१२६. पितर — द्र०- पूर्वज। १२७. पुत्रैषणा — द्र०- एषणा त्रय। १२८. पुनर्जन्म — मृत्यु के बाद पुनः शरीर धारण करने को पुनर्जन्म कहा जाता है। गीता में कहा गया है कि जन्मने वाले की मृत्यु सुनिश्चित है और मरने वाले का जन्म भी निश्चित है- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च (गी०२.२७)। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, वैसे ही देहधारी (आत्मा) पुराने शरीर को छोड़कर दूसरे नये शरीरों को पाता है- वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही (गी०२.२२)। कर्मफल एवं आसक्ति के अनुसार जीवात्मा को विविध योनियों में बार-बार जन्म-मरण चक्र में फँसना पड़ता है। विविध लोकों में कर्मफल को भोगकर फिर उसे इसी लोक में पुनर्जन्म ग्रहण करना पड़ता है। गीता में भगवान् ने कहा है-हे अर्जुन ! ब्रह्मलोक तक सारे लोक पुनरावृत्ति वाले हैं, परंतु मुझको पाकर पुनर्जन्म नहीं होता- आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते (गी०८.१६)। १२९. पुराण — पुराण शब्द का सामान्य अर्थ है- पुरातन या प्राचीन। पुराणकालीन महात्माओं, राजाओं, देवों, पुरुषों के वृत्तान्त जो परम्परागत रूप में चले आते हों; उन्हें भी पुराण कहते हैं। पुराण अट्ठारह हैं। पुराणों के नामों का संक्षिप्त उल्लेख इस प्रकार है- मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्। अनापलिंगकूस्कानि पुराणानि पृथक्-पृथक् (दे०भा०१.३.२)। अर्थात् मद्वय (मत्स्य, मार्कण्डेय), भद्वय (भागवत, भविष्य), ब्रत्रय (ब्रह्म, ब्रह्मवैवर्त, ब्रह्माण्ड), वचतुष्टय (वाराह, विष्णु, वामन, वायु), अनापलिंगकूस्क (अग्नि, नारद, पद्म, लिङ्ग, गरुड़, कूर्म और स्कन्द) अट्ठारह पुराण कहे गये हैं। अट्ठारह उपपुराण भी प्रसिद्ध हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं - सनत्कुमार, नृसिंह, बृहन्नारदीय, शिव, दुर्वासा, कापिल, मानव, औशनस, वारुण, कालिका, साम्ब, नन्दिकेश्वर, सौर, पाराशर, आदित्य, ब्रह्माण्ड, माहेश्वर, देवीभागवत। पुराणों के पाँच लक्षण माने गये है- सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वंतराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम् (ब्र० वै० पु० श्री कृष्ण जन्म० ४.१.३.७)। शिवपुराण के रेवा माहात्म्य में वर्णन है कि अट्ठारह पुराणों के वक्ता सत्यवती व्यासदेव हैं। पुराण और स्मृति ग्रन्थ दोनों ही अठारह प्रसिद्ध हैं- वायुपुत्र महाबाहो किं तत्त्वं ब्रह्मवादिनाम्। पुराणेष्वष्टादशसु स्मृतिष्वष्टादशस्वपि (रा०२० १.२)। परमात्मा को सबसे प्राचीन होने के कारण पुराण पुरुष कहा गया है, वह सबकी हृदय गुहा में संव्यास होकर छिपा हुआ है- तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गहरेष्ठं पुराणम् (कठ० १.२.१२)। १३०. पुरुष-परम पुरुष — 'पुरुष' शब्द की व्युत्पत्ति 'पुरि शेते इति' (पुर अर्थात् शरीर में शयन करता है) की गयी है। इस अर्थ में प्रत्येक व्यक्ति पुरुष है, वह चाहे स्त्री हो अथवा पुरुष। वह दिव्य पुरुष-परम पुरुष प्राणियों की देह के मध्य भाग में अवस्थित रहता है। वह अङ्गुष्ठमात्र परिमाण का पुरुष धूम्ररहित ज्योतिरूप में स्थित रहता है- अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति। अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः (कठ०२.१.१२-१३)। अव्यक्त शक्ति (प्रकृति) से श्रेष्ठ वह परम पुरुष अत्यन्त व्यापक और आकाररहित है, जिसे जानकर जीव बन्धनमुक्त होकर अमरत्व को प्राप्त करता है- अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति (कठ०२.३.८)। वही परम पुरुष तीन रूपों में प्रकट हुआ-आत्मा, अन्तरात्मा (जीवात्मा) और परमात्मा कहलाता है- त्रिविधः पुरुषोऽजायत ऽऽत्माऽन्तरात्मा परमात्मा चेति (आत्मो०१)। वह विराट् स्वरूप आदित्य के सदृश प्रकाशस्वरूप है- वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् (श्वेता०३.८)। वह पुरुष सोलह कलाओं से युक्त है- षोडशकलः सोम्य पुरुषः (छान्दो०६.७.१)। वह दिव्य पुरुष यज्ञरूप है, संकल्परूप है- पुरुषो वाव यज्ञः (छान्दो०३.१६.१), अथ खलु क्रतुमयः पुरुषः (छान्दो०३.१४.१)। वह पुरुष अविनाशी और अमृतस्वरूप आत्मारूप है- यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा (मुण्ड०१.२.११)। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (१०.९०) में आदि पुरुष की कल्पना विराट् पुरुष अथवा विश्वपुरुष के रूप में की गयी है। १३१. पुरुषसूक्त — ऋग्वेद के दसवें मण्डल के नब्बेवें सूक्त को अथवा यजुर्वेद के ३१ वें अध्याय के १६ मन्त्रों के समूह को जिसका प्रारम्भ 'सहस्रशीर्षा' से होता है, पुरुष सूक्त कहते हैं। इसमें विराट् नारायण पुरुष की स्तुति की

पुरोनुवाक्या [परिशिष्ट] ४६१ गयी है। मुद्गलोपनिषद् के प्रथम खण्ड में पुरुषसूक्त द्वारा प्रतिपादित अर्थ निर्णय का विवेचन किया गया है- पुरुषसूक्तार्थ निर्णयं व्याख्यास्यामः (मुद्ग०१.१)। व्याख्या के अन्त में निरूपण है कि पुरुषसूक्त का ज्ञाता मुक्ति अवश्य प्राप्त करता है- य एवमेतज्जानाति स हि मुक्तो भवेदिति। (मुद्ग० १.९) १३२. पुरोनुवाक्या - यज्ञों में तीन प्रकार की आहुतियों में से एक पुरोनुवाक्या आहुति दी जाती है। यह आहुति जिस ऋचा को पढ़कर दी जाती है, उस ऋचा को भी पुरोनुवाक्या कहकर स्वीकार किया गया है। इन ऋचाओं को पृथ्वी, प्राण और भ्रातृव्य देवता से सम्बद्ध किया गया है- पृथिवीलोकमेव पुरोऽनुवाक्यया (शत० ब्रा० १४.६.१.९), प्राण एव पुरोऽनुवाक्या (बृह० ३.१.१०), भ्रातृव्यदेवतया वै पुरोनुवाक्या (तै०सं० १.६.१०.४)। १३३. पूर्वज-गोत्रज - पूर्वकाल में उत्पन्न पुरुषों को पूर्वज कहा जाता है। बाप, दादा, परदादा आदि ऊपर की पीढ़ियों में उत्पन्न पुरुषों को पूर्वज या पितर कहते हैं। अपने ही गोत्र या वंश में उत्पन्न पुरुषों को गोत्रज या वंशज कहा गया है। सभी मनुष्य मान्य ऋषियों की संतान-परम्परा के हैं। अपने कुल या वंश के आदिपुरुष-ऋषि के नाम से वंशसंज्ञा को गोत्र कहा गया है। सभी के गोत्र प्रवर्तक कोई न कोई ऋषि ही हैं। कभी-कभी शिष्य अपने गुरु के गोत्र को ही अपना गोत्र स्वीकार करता है। पूर्वजों या पितरों के नाम पर श्राद्ध (स्वधा) या जलदान तर्पण किया जाता है- स्वधां पितृभ्यः (छान्दो० २.२२.२)। उपनिषद् का कथन है कि जो मनुष्यों के सौ आनन्द हैं, वे पितृलोक को जीतने वाले पितृगणों का एक आनन्द है- अथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः। स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दः (बृह० ४.३.३३)। १३४. प्रकृति-पुरुष - सांख्य दर्शन में प्रमुख रूप से पुरुष और प्रकृति ये दो तत्त्व माने गये हैं। प्रकृति अव्यक्त है, वही व्यक्त होने पर जगत् का रूप ले लेती है। प्रकृति से जगत् की उत्पत्ति का क्रम निम्न प्रकार प्रतिपादित है- प्रकृति से महत्तत्त्व (बुद्धि), महत्तत्त्व से अहंकार, अहंकार से पञ्चतन्मात्रा, पञ्चतन्मात्रा से एकादश इन्द्रिय और उनसे फिर पञ्चमहाभूत। इन चौबीसों तत्त्वों से जगत् की उत्पत्ति हुई। इसी क्रम से सारा जगत् फिर नष्ट होकर अपने मूल प्रकृति रूप में आ जाता है। प्रकृति की उत्पत्ति उस अविनाशी पुरुष से ही होती है। उपनिषद् के अनुसार जैसे मकड़ी तन्तु-जाल को उत्पन्न करती है और अपने में ही समेट लेती है, जैसे पुरुष से केश और लोम उत्पन्न होते हैं, वैसे ही अक्षर पुरुष से यह विश्व उत्पन्न होता है- यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाक्षरात् सम्भवतीह विश्वम् (मुण्ड० १.१.७)। प्रकृति जड़ है और पुरुष चेतन। प्रकृति और पुरुष पृथक्-पृथक् होकर कर्म नहीं कर सकते। पुरुष प्रकृति में स्थित होकर ही प्रकृतिजन्य गुणों का उपभोग करता है-पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् (गी० १३.२१)। गीता में भगवान् ने कहा है कि पुरुष और प्रकृति दोनों ही अनादि हैं और प्रकृति से ही समस्त गुण और विकार उत्पन्न हुए हैं- प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्॥ (गी० १३.१९) प्रकृति सत्, रज और तम तीनों गुणों की साम्यावस्था है- साम्यावस्था प्रकृतिः (सां०द० १.६१)। प्रकृति को पुरुष की ही महाशक्ति माना गया है। मूल सूक्ष्म प्रकृति ही घनीभूत होकर स्थूल हो जाती है और सृष्टि के सम्पूर्ण पदार्थों की रचना करती है। गीता के अनुसार भगवान् की प्रकृति आठ भेदों में विभाजित है- भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा (गी० ७.४)। प्रकृति क्रियाशील और पुरुष निष्क्रिय द्रष्टा है। इस सम्पर्क से पुरुष में जो भ्रम उत्पन्न होता है, उसके कारण पुरुष प्रकृति के कार्यों का अपने ऊपर आरोपण कर लेता है और इससे उनके परिणामों से उत्पन्न सुख-दुःख भोगता है। १३५. प्रज्ञा-प्रज्ञान - प्रज्ञा का सामान्य अर्थ है- प्रकृष्ट ज्ञान या श्रेष्ठ बुद्धि। विवेकवान्, विद्वान् या चैतन्य पुरुष को प्रज्ञान कहा गया है। अन्तर्दृष्टि या अनुभूति के द्वारा आत्मा या परमात्मा के सम्बन्ध में जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे भी प्रज्ञा या प्रज्ञान कहते हैं। बुद्धि का परिष्कृत रूप जिसमें दूरदर्शिता तथा विवेकशीलता भी समाविष्ट है, 'प्रज्ञा' रूप में मान्य है। उपनिषद् के अनुसार जिसमे बौद्धिक वृत्तियों की, ज्ञातव्य विषयों को, कामनाओं को ग्रहण करते हैं, उसे प्रज्ञा कहते हैं- केन धियो विज्ञातव्यं कामानिति। प्रज्ञयेति ब्रूयात् (कौ० ब्रा० १.७)। प्रज्ञा को निर्विकल्प और चिन्मात्रा वृत्ति से सम्बद्ध किया गया है-निर्विकल्पा च चिन्मात्रा वृत्तिः प्रज्ञेति कथ्यते (अध्या० ४४)। प्राण को भी प्रज्ञा से सम्बद्ध किया गया है। यो वै प्राणः सा प्रज्ञा (कौ० ब्रा० ३.३)। कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में

४६२ परिशिष्ट प्रमाद 'प्रज्ञा' के कार्य व्यवहार को विस्तारपूर्वक समझाया गया है। प्रज्ञा से मनुष्य सत्य और संकल्प शक्ति को धारण करता है- प्रज्ञया सत्यं संकल्पम् (कौ० ब्रा० ३.२)। प्रकृष्ट ज्ञान को प्रज्ञान कहते हैं। प्रकृष्ट ज्ञान ही ब्रह्मज्ञान है, क्योंकि ब्रह्म की ही त्रैकालिकी सत्ता है और वही ज्ञान का परमलक्ष्य है। उपनिषद् ग्रन्थों में इसीलिए प्रज्ञान को ब्रह्म का पर्याय माना गया है- प्रज्ञानं ब्रह्म (शु०२० २.१, आ०बो० १.१)। १३६. प्रतिष्ठा - प्रतिष्ठा शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं- स्थापना, स्थान, गौरव, कीर्ति, आदर, निवास, आधार आदि। उपनिषद् में वर्णित है कि जो कोई प्रतिष्ठा को जानता है, वह इस लोक और परलोक में प्रतिष्ठित होता है। चक्षु ही प्रतिष्ठा है- यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च। चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा (छान्दो० ५.१.३)। जब साधक उस परमात्मा की अदृश्य, अशरीर, अवर्णनीय, अनाश्रित, अभय, प्रतिष्ठा (स्थिति) को प्राप्त करता है, तब वह सर्वदा निर्भय पद को प्राप्त होता है- यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते। अथ सोऽभयं गतो भवति (तैत्ति० २.७.१)। चारों दिशाओं के सदृश प्रतिष्ठा भी चार प्रकार की मानी गयी है- अथ याश्चतस्रः प्रतिष्ठा इमा एव ताश्चतस्रो दिशः (जै० उ० १.२१.२)। १३७. प्रत्यगात्मा - प्रत्यगात्मा शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- प्रत्यक् + आत्मा। वह पुरुष जिसकी चित्तवृत्ति निर्मल हो चुकी हो, जो अपना स्वरूप समझने लगा हो, जिसे आत्मज्ञान की प्राप्ति हो गयी हो, उसे प्रत्यगात्मा कहा गया है। यह शब्द विशुद्ध अन्तरात्मा या परमेश्वर के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। उपनिषद् का कथन है कि कोई विरला धीर पुरुष ही अमरत्व प्राप्ति की इच्छा करके चक्षु आदि इन्द्रियों को बाह्य विषयों से लौटाकर अन्तरात्मा (प्रत्यगात्मा) को देख पाया है- कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् (कठ० २.१.१)। सर्वसारोपनिषद् में प्रश्न है- प्रत्यगात्मा, परमात्मा और माया ये तत्त्व क्या हैं? प्रत्यगात्मा को जीवात्मा के आशय से त्वं पद से निरूपित किया गया है। प्रत्यगात्मा अज्ञान, माया और शक्ति का साक्षीरूप है। मैं ही एक ब्रह्मरूप हूँ, इस प्रकार का भाव चिन्तन करते हुए वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है- प्रत्यगात्मानमज्ञानमायाशक्तेश्च साक्षिणम्। एकं ब्रह्माहमस्मीति ब्रह्मैव भवति स्वयम् (कठ०रु० १६)। १३८. प्रत्याहार - योग के अन्तर्गत योग के आठ अङ्गों का निरूपण शास्त्रों में दृष्टिगोचर होता है- यमनियमासन- प्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि (यो०द० २.२९)। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। प्रत्याहार में चित्तवृत्तियों को या इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर चित्त को हर स्थिति में शान्त रखा जाता है। अपने चिन्तन को अनात्म पदार्थों से हटाकर आत्मा में लगाये रहना प्रत्याहार है। इसी तथ्य की पुष्टि अमृतनादोपनिषद् में होती है- शब्दादि विषयान् पञ्च मनश्चैवातिचञ्चलम्। चिन्तयेदात्मनो रश्मीन् प्रत्याहारः स उच्यते (अमृ० ५)। योगी कुम्भक में स्थित होकर (प्राणायाम द्वारा प्राण को भीतर धारण किये रहना) इन्द्रियों को उनके विषयों से खींचकर लाए, यह प्रत्याहार कहा जाता है। उस समय नेत्रों से जो कुछ देखे, उसे आत्मभावना से ग्रहण करे- इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो यत्प्रत्याहरणं स्फुटम्। योगी कुम्भकमास्थाय प्रत्याहारः स उच्यते। यद्यत्पश्यति चक्षुर्भ्यां तत्तदात्मेति भावयेत् (यो०त० ६८-६९)। इस प्रकार के अभ्यास से योगी को चित्त शक्ति बढ़ती जाएगी। प्रत्याहार से इन्द्रियों के सांसर्गिक दोषों को तथा ध्यान से अनीश्वरीय गुणों को नष्ट किया जाता है- प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरानुणान् (अमृ० ८)। १३९. प्रमाद - प्रमाद का सामान्य अर्थ मानसिक आलस्य, शिथिलता या अक्रियता के रूप में लिया जाता है। कहीं इसे उन्माद, लापरवाही या आन्तरिक दुर्बलता कहकर निरूपित किया गया है। ब्रह्मनिष्ठों के लिए प्रमाद करना अनुचित है और ब्रह्मवादिन् के लिए विद्या में प्रमाद मृत्यु के सदृश कहा जाता है- प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन। प्रमादो मृत्युरित्याहुर्विद्यायां ब्रह्मवादिनः (अध्या० १४)। गीता में भगवान् ने प्रमाद को तमस् का रूप बताया है, जो जीवात्मा को बाँधता है- तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत (गी०१४.८)। मनुष्य का तमोगुण ही उसके ज्ञान को ढककर उसे प्रमाद में लगाता है- ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत (गी० १४.९)। रामानुजाचार्य ने कहा है- "कर्त्तव्य कर्म से भिन्न कर्म में प्रवृत्त करने वाली असावधानी का नाम प्रमाद है।" अर्थात् प्रमाद से कर्त्तव्यशीलता नष्ट हो जाती है, जो व्यक्ति को कल्याण मार्ग से च्युत कर देती है।

प्राज्ञ परिशिष्ट ४६३ १४०. प्राज्ञ — वेदान्त दर्शन की मान्यतानुसार 'प्राज्ञ' जीव की एक संज्ञा है। शंकराचार्य के अनुसार 'परब्रह्म' ही देहेन्द्रिय, मन एवं बुद्धि आदि की उपाधियों से परिच्छिन्न होकर शरीरधारी जीव कहा जाता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि परब्रह्म (शुद्ध चैतन्य) ही अविद्या की उपाधि से युक्त होकर शरीरेन्द्रिय से परिच्छिन्न होकर 'जीव' कहलाता है। कुछ विद्वान् घटावच्छिन्न आकाश की तरह शरीरचित्तावच्छिन्न चैतन्य को जीव कहते हैं। 'जीव' का सम्बन्ध तीनों शरीरों १. स्थूल २. सूक्ष्म ३. कारण से होता है। अन्नादि से परिपोषित चर्मचक्षुओं से दृष्टिगोचर होने वाला शरीर 'स्थूल-शरीर' कहलाता है। इस स्थूल के अन्दर ज्ञानेन्द्रियों-कर्मेन्द्रियों-प्राण, मन एवं बुद्धि का एक तन्त्र कार्य करता हुआ अनुभव में आता है-यह सूक्ष्म-शरीर है। सूक्ष्म शरीर को भी सक्रिय-गतिमान् करने वाला अज्ञानोपहित चैतन्य जो अहंकार आदि का कारण है, 'कारण शरीर' कहलाता है। उक्त तीनों शरीरों से सम्बद्ध चैतन्य को तीन संज्ञाएँ प्रदान की गई हैं। स्थूल शरीर की व्यष्टि उपहित चैतन्य की 'विश्व', सूक्ष्म शरीर की व्यष्टि उपहित चैतन्य की 'तैजस' तथा कारण शरीर की व्यष्टि उपहित चैतन्य की 'प्राज्ञ' संज्ञा है। 'प्राज्ञ' संज्ञक अज्ञानोपहित चैतन्य मलिन सत्त्व प्रधान होने से अधिक प्रकाशक नहीं होता। यह आनन्दमय कोश से समन्वित है। सभी प्रपञ्चों (सक्रियता) का इसमें उपराम होने से इसकी सुषुप्ति अवस्था होती है। आनन्द की अनुभूति करने वाला चैतन्य यही 'प्राज्ञ' है। १४१. प्राण-पञ्चप्राण — सूक्ष्म जीवनवायु के पाँच प्रकारों- प्राण, अपान, व्यान, उदान तथा समान में से एक प्राण है। व्यापक रूप में प्राण शब्द ज्ञानेन्द्रिय या चेतना को प्रकट करता है। कभी-कभी यह शब्द केवल श्वास का साधारण अर्थ बोध कराता है। जिस आन्तरिक सूक्ष्म शक्ति द्वारा जीवात्मा का दृश्य जगत् में देह से सम्बन्ध होता है, उसे प्राणशक्ति कहते हैं। यह प्राणशक्ति ही स्थूल प्राण (ऊर्ध्वगमनशील), अपान (अधोगमनशील), व्यान (सम्पूर्ण शरीर में गमनशील), उदान (उद्‌गिरनशील-उगलने की प्रवृत्ति) एवं समान (समान वितरणशील-रस, रक्त आदि का समान वितरण) की सञ्चालिका है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और स्थिति के मूल में इस प्राणशक्ति का ही साम्राज्य है। प्राण को साक्षात् ब्रह्म के रूप में स्वीकार किया गया हैं- प्राणो वै ब्रह्म (जै०उ०३.३८.२)। प्राण ही प्राणियों की आयु है-प्राणो हि भूतानामायुः (तैत्ति०२.३.१)। प्राणा वै यशो वीर्यम् (बृह०१.२.६), यो वै प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणः (कौ०ब्रा०३.३)। आदित्य प्राणरूप ही है, क्योंकि वे ही प्राण बरसाते हैं- आदित्यो ह वै प्राणः (प्रश्न०१.५)। रथ के पहिए की नाभि में लगे अरों की भाँति प्राण में ही सब प्रतिष्ठित हैं- अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् (प्रश्न०२.६)। प्राण को ही इन्द्र तथा रुद्र रूप में परिरक्षक कहा गया है- इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता (प्रश्न०२.९)। नाग (डकार आना), कूर्म (पलक झपकना), कृकल (भूख लगना), धनञ्जय (समस्त शरीर का पोषण करना), देवदत्त (जँभाई आना)-ये पाँच उपप्राण कहलाते हैं। १४२. प्रारब्ध — मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, परन्तु फल भोगने में नहीं। मनुष्य के सभी कर्म सञ्चित होते रहते हैं, जिसका फल उसे भविष्य में अवश्य भोगना पड़ता है। दूसरे कर्म वे हैं, जिसका फल वह वर्तमान में भोग रहा है, उसे प्रारब्ध कर्म कहते हैं। जन्मभेद से कर्म के चार विभाग किये जाते हैं- सञ्चित, प्रारब्ध, क्रियमाण और भावी। प्रारब्ध कर्मों के फलभोग प्रारम्भ हो चुके होते हैं। इसे भाग्य या किस्मत भी कहते हैं। नादबिन्दूपनिषद् में वर्णन मिलता है कि जन्म-जन्मान्तरों के जो कर्म हैं, वे ही प्रारब्ध कहे गये हैं- कर्म जन्मान्तरीयं यत्प्रारब्धमिति कीर्तितम् (ना०बि०२३)। उपनिषद् का कथन है कि समस्त प्रारब्ध कर्मों को भोगते हुए तुम्हें उद्विग्न नहीं होना चाहिए- प्रारब्धमखिलं भुञ्जन्नोद्वेगं कर्तुमर्हसि (ना०बि०२१)। तत्त्वज्ञान हो जाने पर भी प्रारब्ध नहीं छोड़ता, किन्तु तत्त्वज्ञान हो जाने से प्रारब्ध (ज्ञानी की दृष्टि में) नहीं रहता- उत्पन्ने तत्त्वविज्ञाने प्रारब्धं नैव मुञ्चति। तत्त्वज्ञानोदयादूर्ध्वं प्रारब्धं नैव विद्यते (ना०बि०२२)। १४३. बन्धन — मोक्ष की प्राप्ति मनुष्य का परम लक्ष्य है। इसके विपरीत मोक्ष प्राप्ति में बाधक सभी घटकों को बन्धन कहा गया है। सांसारिक विषयों, पदार्थों अथवा व्यक्तियों से अत्यधिक ममता या आसक्ति का होना बन्धन है। कामना से युक्त कर्मों को भी बन्धन रूप कहा गया है। विषय-विकारों तथा अहम्भाव को बंधन माना गया है। निरालम्ब उपनिषद् में बन्धन रूप सभी तथ्यों को विस्तारपूर्वक उपन्यस्त किया गया है। अनादि अविद्या की वासना (संस्कार) द्वारा उत्पन्न इस प्रकार का विचार कि मैं हूँ (मैं ही जन्मता-मरता हूँ), यही बन्धन है। माता-पिता, भ्राता,

४६४ [परिशिष्ट] ब्रह्म-परब्रह्म पुत्र, गृह, उद्यान तथा खेत आदि मेरे अपने हैं, इस प्रकार के सांसारिक आवरण स्वरूप विचार भी बन्धन रूप है। कर्तापन के अहंकार का संकल्प भी बन्धनरूप है। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्यों को प्राप्त करने का सङ्कल्प भी बन्धन है। कामनापूर्ति के लिए सङ्कल्पपूर्वक को गयी उपासना भी बन्धन रूप है। यमादि अष्टाङ्ग योग का सङ्कल्प भी बन्धन ही है। वर्ण और आश्रम धर्म-कर्म के सङ्कल्प भी बन्धन स्वरूप है। आशा, भय, संशय आदि के सङ्कल्प भी बन्धन हैं। यज्ञ, व्रत, तप और दान के विधि-विधान तथा ज्ञान के सङ्कल्प भी बन्धन हैं। मोक्ष प्राप्ति का विचार करना भी बन्धन है। सङ्कल्प मात्र से जो कुछ सम्भव है, वह सभी बन्धनस्वरूप है (निरा० १८-२८)। गीता ३.९ में यज्ञार्थाय कर्म के अतिरिक्त अन्य सभी कर्मों को बन्धनस्वरूप माना गया है। उपनिषद् के अनुसार मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। विषयों में आसक्त मन ही बन्धन का कारण है और विषय रहित मन मोक्ष का कारण है- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतमिति (मैत्रा०४.११)। १४४. बलि— भूमि को उपज का वह अंश जो भूपति (कृषक) प्रतिवर्ष राजा को देता है, उसे बलि कहते हैं। उपहार या भेंट या देवता को दिया गया भोज्य पदार्थ भी बलि कहलाता है। पञ्च महायज्ञों में चौथा भूतयज्ञ भी बलि कहा जाता है। भूतबलि के अन्तर्गत पिपीलिका बलि, श्वानबलि, गो-बलि, काकबलि, देवबलि आदि है। श्राद्ध या पितरों को बलि देना पितृयज्ञ होता है। सम्पूर्ण प्रजा और सम्पूर्ण देवगण प्राणरूप ब्रह्म को बलि (भेंट) समर्पित करते हैं- तुभ्यं प्राणः प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि (प्र०२.७), तथो एवास्मै (प्राणाय ब्रह्मणे) सर्वाणि भूतान्ययाचमानायैव बलिं हरन्ति (कौ०ब्रा०२.१), तस्मै वा एतस्मै प्राणाय ब्रह्मण एताः सर्वा देवता अयाचमानाय बलिं हरन्ति (कौ०ब्रा०२.१)। पके हुए अन्न में से एक अंश अग्नि आदि देवों को अर्पित करना बलिवैश्व कहलाता है। भूतयज्ञ को बलिवैश्व देव भी कहते हैं। १४५. बुद्धि-धी— मनुष्य की वह शक्ति, जिसके द्वारा वह उपस्थित विषय के सम्बन्ध में ठीक-ठीक निर्णय या निश्चय करता है। इसी को धीष्णा, धी, मति आदि भी कहते हैं। इसी के परिष्कृत स्वरूप को मनीषा कहते हैं। इसी के उत्तरोत्तर विकास क्रम में प्रज्ञा, मेधा, भूमा और ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होती है। बुद्धि को चैतन्य आत्मा का गुण माना जाता है। मनस्, इन्द्रियाँ और अहंकार बुद्धि के लिए कार्य करते हैं। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र में सवितादेव मे यह प्रार्थना को गयी है कि हम उस सविता के वरेण्य भर्ग (पापनाशक तेजस्) को धारण करते हैं, वह देव हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे (ऋ० ३.६२.१०)। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने बुद्धि के सात्त्विकी, राजसी और तामसी- ये तीन भेद बताये हैं । अन्तःकरण चतुष्टय के अन्तर्गत मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार हैं। बुद्धि से मनुष्य समझता है। चित्त मे चैतन्य होता है। अहंकार मे अहंता का अनुभव करता है- बुद्ध्या बुध्यति। चित्तेन चेतयति। अहंकारेणाहंकरोति (ना०प०६.३)। १४६. बोध-प्रतिबोध— ज्ञान, समझ या जानकारी के अर्थ में बोध शब्द प्रयुक्त होता है। सामान्यतया विशिष्ट अनुभूतिजन्य ज्ञान के अर्थ में भी बोध शब्द का प्रयोग होता है। आत्मबोध मनुष्य का परम लक्ष्य है। उपनिषद् ज्ञान के अनुसार अहम्भाव (सत्त्वभाव) और दयाभाव-यह ज्ञान को पराकाष्ठा है- अहंभावो दयाभावो बोधस्य परमावधिः (अध्या०४१)। वैराग्य का फल बोध होता है और बोध का फल चित्तशान्ति है-वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम् (अध्या०२८)। प्रतिबोध शब्द के पर्याय जागरण, ज्ञान, स्मरण आदि हैं। अन्तःप्रेरणा से प्राप्त बोध या अन्तःस्फुरणा से उत्पन्न ज्ञान के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग कहीं-कहीं हुआ है। केनोपनिषद् में वर्णित है कि प्रतिबोध मे उत्पन्न ज्ञान ही यथार्थ है, इसी से अमृतस्वरूप परमात्मा को प्राप्ति होती है- प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते (केन०२.४)। १४७. ब्रह्म-परब्रह्म— वेदान्त दर्शन का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय 'ब्रह्म' है। 'ब्रह्म' शब्द की व्युत्पत्ति ही अपने स्वरूप को प्रकट कर देती है- बृंहति वर्द्धते निरतिशयमहत्त्वलक्षणवृद्धिमन् भवतीत्यर्थः (शब्द०)। बृंह् धातु वर्धमान- वृद्धिमन् अर्थ में प्रयुक्त होती है, जो निरतिशय महत्त्व को दृष्टि से वृद्धिमान् है, वह ब्रह्म है, अर्थात् जो सत्ता सर्वत्र विद्यमान है-शाश्वत है-नित्य है-अपरिवर्तनशील है, वह 'ब्रह्म' है, इससे अतिरिक्त अन्य सभी नश्वर हैं- ब्रह्मैव नित्यं वस्तु तदन्यदखिलमनित्यम्।

ब्रह्मचर्य [परिशिष्ट] ४६५ ब्रह्म का स्वरूप प्रकट करने के क्रम में आचार्यों ने दो प्रकार के लक्षणों का उल्लेख किया है- १. स्वरूप लक्षण, २. तटस्थ लक्षण। जो लक्षण वस्तु के स्वरूप के अन्तर्गत आ जाता हो और अन्यों से भेद करने वाला हो, वह स्वरूप लक्षण कहलाता है, जैसे- 'सच्चिदानन्दं ब्रह्म, सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म, विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि श्रुति वचनों में 'ब्रह्म' को सत्, चित्, आनन्द, सत्य, ज्ञानवान्, अनन्त तथा विज्ञानवान् (विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न) और आनन्दमय कहा गया है। ये विशेषताएँ ब्रह्म के अन्तर्गत हैं, अन्यत्र नहीं। अतः यह 'ब्रह्म' का स्वरूप लक्षण हुआ। जो लक्षण स्वरूप के अन्तर्गत न होने पर भी अन्य से भेद करने वाला हो, वह 'तटस्थ-लक्षण' कहलाता है, जैसे- 'जन्माद्यस्य यतः। (ब्र० सू० १.१.२), यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभि संविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म' (तैत्ति० ३.१) इत्यादि श्रुति वचनों में 'ब्रह्म' को जन्म, स्थिति, प्रलय का निमित्त कारण कहा गया है, किन्तु वह स्वयं जन्म आदि से परे है और उसकी उक्त विशेषताएँ अन्यत्र कहीं हैं भी नहीं, अतएव यह (जन्मादि का निमित्त कारण होना) ब्रह्म का तटस्थ लक्षण हैं। इस प्रकार लक्षण के दोनों भेदों के आधार पर 'ब्रह्म' सत्य, ज्ञानस्वरूप, अनन्त, सत्, चित्, आनन्द, जन्म, स्थिति, प्रलय का निमित्त कारण आदि विशिष्टताओं से मण्डित सिद्ध होता है। इस तथ्य का प्रतिपादन श्रुतिवचनों में प्रायः मिलता है, जैसे- कठोपनिषद् में कहा गया है कि वह (ब्रह्म) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध रहित है, अनादि हैं, अनन्त है, उसका साक्षात्कार करने वाला मृत्यु के मुख से मुक्त हो जाता है अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर लेता है- अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते (कठो०१.३.१५)। उस नित्य, शुद्ध, मुक्त, अजन्मा परमतत्त्व, ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार हो जाने से हृदय की ग्रन्थियाँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, सभी संशय नष्ट हो जाते हैं और उसके समस्त प्रारब्ध कर्म क्षीण हो जाते हैं, परिणामतः वह मुक्त हो जाता है-भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे (मुण्ड०२.२.८, महो०४.८२)। छान्दोग्य उपनिषद में उस ब्रह्म तत्त्व को उपासना करने का निर्देश इस तथ्य के साथ दिया गया है कि वही सब जगह हैं, उसी से सभी जन्म पाते हैं, उसी में स्थित रहते हैं और अन्त में उसी में विलीन हो जाते हैं - सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत (छान्दो०३.१४.१)। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार ब्रह्म के दो रूप हैं- १. कार्य ब्रह्म, २. कारण ब्रह्म। कारण ब्रह्म को ही परब्रह्म कहा गया है। पुरुष सूक्त के अनुसार- 'त्रिपादूर्ध्वऽउदैत्पुरुषः पादोस्येहाभवत्पुनः'। ब्रह्म का तीन चौथाई अंश जो अनन्त अन्तरिक्ष में व्याप्त रहता है, जिसका इस सृष्टि से विश्व ब्रह्माण्ड से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं, वह परब्रह्म कहलाता है। उसी का एक चौथाई अंश जो प्रत्यक्ष विश्व ब्रह्माण्ड में सक्रिय हैं, उसे ब्रह्म के रूप में जाना जाता है। १४८. ब्रह्मचर्य- चारों आश्रमों में से प्रथम ब्रह्मचर्य आश्रम कहलाता है। उपनयन के अनन्तर बालक के वेदाध्ययन तक के समय को ब्रह्मचर्य कहते हैं। ब्रह्मचारी को यह व्युत्पत्ति-ब्रह्मणि चरति इति ब्रह्मचारी-दोनों भावों को प्रकट कर देती हैं, जो ब्रह्म (वेद-परब्रह्म) के चिन्तन-मनन में तल्लीन होता हैं, वह ब्रह्मचारी होता है। वीर्यरक्षा या अष्टविध मैथुन से बचने का व्रत भी ब्रह्मचर्य है। अथर्ववेद के एक सूक्त ११.५ में ब्रह्मचारी के लिए प्रशंसापरक प्रतिपादन है। इसके प्रथम मन्त्र में वर्णन है कि ब्रह्मचारी भूमि तथा आकाश दोनों को हिलाता हुआ चलता है। देवता उसके अनुकूल होते हैं। वह पृथ्वी तथा द्युलोक को थामे हुए हैं। वह अपने तप से आचार्य को पुष्ट करता है। उपनिषद् का कथन है कि उस ब्रह्म को चाहने वाले साधक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं- यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति (कठ० १.२.१५)। छान्दोग्य उपनिषद् (८.५.१) में ब्रह्मचर्य के विषय में प्रतिपादन है कि जिसे यज्ञ कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जो ज्ञाता है, वह ब्रह्मचर्य के द्वारा ही उसे (आत्मतत्त्व को) प्राप्त होता है। जिसे इष्ट कहते हैं, वह भी ब्रह्मचर्य ही हैं, क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा पूजन करके पुरुष आत्मा को प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य और तप के द्वारा ही देवों ने मृत्यु को जीत लिया है-ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत (अथर्व० ११.७.१९)। १४९. ब्रह्मजज्ञ - ब्रह्मजज्ञ का भावार्थ ब्रह्म से उत्पन्न सृष्टि या रचना को जानने वाला है। अग्निदेव सम्पूर्ण जगत् में संव्याप्त हैं और वही इस सृष्टि के ज्ञाता हैं। कठोपनिषद् का कथन है कि साधक सृष्टि को जानने वाले स्तुत्य अग्निदेव को जानकर उसका निष्काम भाव से चयन करके अनन्त शान्ति को प्राप्त होते हैं- ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमाःशान्तिमत्यन्तमेति (कठ०१.१.१७)।

४६६ | परिशिष्ट | ब्रह्माण्ड १५०. ब्रह्मनिष्ठ — द्र०-ब्रह्मविद्या। १५१. ब्रह्मरन्ध्र — मस्तक या मूर्धा भाग के मध्य एक गुप्त छिद्र जिससे होकर प्राण निकलने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। योगियों के प्राण इसी छिद्र (रन्ध्र) से निकलते हैं। इसे मोक्ष द्वार कहा गया है, क्योंकि इसे बेधकर प्राण त्यागने से मुक्ति प्राप्त होती है। इसे सुषिर (छिद्रयुक्त, पोला) मण्डल भी कहा जाता है- मोक्षद्वारं बिलं चैव सुषिरं मण्डलं विदुः (अमृ० २६)। जिस साधक का प्राण इस मण्डल को भेदकर मूर्धा में पहुँच जाता है, वह जहाँ कहीं भी मृत्यु को प्राप्त होता है, पुनः जन्म नहीं लेता, अर्थात् पुनर्जन्म के चक्र में नहीं फँसता- यस्येदं मण्डलं भित्त्वा मारुतो याति मूर्धनि। यत्र-यत्र म्रियेद्वापि न स भूयोऽभिजायते (अमृ० ३९)। १५२. ब्रह्मलोक — द्र०-देवयान। १५३. ब्रह्मविद्या — उपनिषदों में मुख्यतः जिस विद्या का उल्लेख है, उसे ब्रह्मविद्या कहा जाता है। जिसका तात्पर्य है- ब्रह्म का ज्ञान कराने वाली विद्या। ब्रह्म के जानने वाले को ब्रह्मविद् या ब्रह्मवेत्ता कहा जाता है। ब्रह्मविद्या के द्वारा 'हम सर्व हो जायेंगे', ऐसा मनुष्य मानते हैं- तदाहुर्यद् ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते (बृह०१.४.९)। ब्रह्मविद्या को सब विद्याओं की आधारभूता कहा गया है, जिसका उपदेश ब्रह्माजी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को दिया- स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह (मुण्ड० १.१.१)। ब्रह्मविद्या के प्रति एकनिष्ठ पुरुष को ब्रह्मनिष्ठ कहा जाता है अथवा ब्राह्मणवृत्ति या ब्रह्मज्ञान से सुसम्पन्न पुरुष को ब्रह्मनिष्ठ कहते हैं। अन्य विद्याओं का भली प्रकार प्राप्त हुआ ज्ञान भी नाशवान् है, किन्तु ब्रह्मविद्या का भली-भाँति ज्ञान स्थिर ब्रह्म को प्राप्त कराने में समर्थ है- अन्यविद्यापरिज्ञानमवश्यं नश्वरं भवेत्। ब्रह्मविद्यापरिज्ञानं ब्रह्मप्राप्तिकरं स्थितम् (शु०२०)। १५४. ब्रह्मवेत्ता — ब्रह्मवेत्ता का सामान्य अर्थ है- ब्रह्म को जानने या समझने वाला। ब्रह्म की सर्वत्र अनुभूति करने वाला। दूसरे अर्थ में वेदों के अर्थ के ज्ञाता को भी ब्रह्मवेत्ता कहा गया है। इन्हें ब्रह्मज्ञानी अथवा तत्त्वज्ञानी कहकर भी निरूपित किया जाता है, क्योंकि ये ब्रह्मतत्त्व के ज्ञाता होते हैं। गीता में भगवान् ने कहा है कि स्थिर बुद्धि और मोह रहित ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म में स्थित होते हैं- स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः (गी०५.२०)। जो कर्मयोगी आत्मा में ही क्रीड़ा करता है, उसी में रमण करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ कहा गया है- आत्मक्रीडा आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः (मुण्ड० ३.१.४)। १५५. ब्रह्मा — ब्रह्म के तीन सगुण रूप माने गये हैं- ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्म के सगुण रूपों में से एक रूप जो सृष्टि की रचना के लिए नियत है, उन्हें ब्रह्मा कहा गया है। पुराणों में वेदों के भी प्रकटकर्त्ता इन्हें ही माना गया है। यज्ञ के एक ऋत्विज् जिन्हें यज्ञ के प्रत्यक्ष संरक्षणकर्त्ता के रूप में नियत किया जाता है, उन्हें भी ब्रह्मा कहा जाता है। ब्रह्मा को ही विधाता, पितामह, प्रजापति तथा हिरण्यगर्भ आदि विशेषणों से भी निरूपित किया गया है। पुराणों के अनुसार विष्णुदेव की नाभि से ब्रह्मा स्वयं उत्पन्न हुए, इसलिए ये स्वयंभू कहलाये। सम्पूर्ण कलाएँ, विद्याएँ और ब्रह्माण्ड इन्हीं से प्रकट माना गया है। ब्रह्मा की पत्नी 'ब्रह्माणी' के रूप में मान्य हैं। मुण्डकोपनिषद् के अनुसार देव ब्रह्मा सम्पूर्ण जगत् की रचना करने वाले और लोकों के रक्षक हैं, वे देवों में सबसे पहले प्रकट हुए। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया- ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता। स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह (मुण्ड० १.१.१)। १५६. ब्रह्माण्ड — धार्मिक-दार्शनिक ग्रन्थों में प्रायः चौदह भुवनों का उल्लेख मिलता है। हम लोग जहाँ विद्यमान हैं, वह 'भू' लोक है। यह तथा इसके ऊपर सात लोक हैं तथा इसके नीचे सात लोक हैं। ये चौदह लोक मिलकर ब्रह्माण्ड कहलाते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक रामतीर्थ ने लिखा हैं कि ब्रह्माण्ड में जो चौदह लोक हैं, उन्हें लोकालोक नामक पर्वत आवृत किये हुए है। इस पर्वत के बाहर की ओर पृथिवी है और पृथिवी के चारों ओर उसे समुद्र घेरे हुए हैं। इस प्रकार लोकालोक पर्वत से घिरे चौदह भुवन जिनके अन्तर्गत पृथिवी और समुद्र हैं- ये सब मिलकर एक ब्रह्माण्ड बनता है- एत एव स्वावरण भूतलोकालोक पर्वतात्तद्बाह्या पृथिवी तद्बाह्या समुद्रैः सहिता ब्रह्माण्डमित्युच्यते (वे० १६ विद्वन्मनोरंजिनी)। 'ब्रह्माण्ड' का परिमाण अतिबृहद् है। बृहदारण्यक उपनिषद् में इसका वर्णन इस प्रकार है- यह लोक ३२ देवरथाह्न है। इस लोक की पृथिवी और पृथिवी को समुद्र घेरे हुए है। देवरथाह्न्य का तात्पर्य है एक दिन में सूर्य

ब्राह्मण [ परिशिष्ट ] ४६७

ब्राह्मण [ परिशिष्ट ] ४६७ रथ की गति। सूर्यरथ एक मुहूर्त (४८ मिनट) में चौंतीस लाख आठ सौ योजन (१ योजन=४ कोस, १ कोस=२ मील या तीन किलोमीटर) पार करता हैं। इस प्रकार ब्रह्माण्ड अत्यधिक बृहदाकार सिद्ध होता है। १५७. ब्राह्मण— ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण कहा गया है। ब्रह्म का एक अर्थ वेद भी है, अतः वेदाध्यायी को भी ब्राह्मण कहा जाता है। सामान्यतः चतुर्वर्णों में प्रथम वर्ण ब्राह्मण कहलाता है। ब्राह्मण को पृथ्वी का देवता (भूसुर) भी कहा गया है। मनुस्मृति में ब्राह्मण के छः कर्त्तव्य बताए गये हैं- अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् (मनु० १.८८)। याज्ञवल्क्य गार्गी से कहते हैं कि जो इस अक्षर (अविनाशी स्वरूप आत्मा) की जानकर इस लोक से प्रयाण करता है, वह ब्राह्मण है- अथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वास्माल्लोकात्प्रैति, स ब्राह्मणः (बृह०३.८.१०)। ब्राह्मण आत्मा को जानकर तीनों एषणाओं को त्यागकर भिक्षाचर्या से विचरते हैं- एतं वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाऽथ भिक्षाचर्यं चरन्ति (बृह०३.५.१)। चारों वर्णों को उत्पन्न करने वाले ब्रह्म (परमात्मा) देवों में अग्निरूप से ब्रह्मा हुए, मनुष्यों में ब्राह्मण हुए- तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माऽभवद् ब्राह्मणो मनुष्येषु (बृह०१.४.१५)। १५८. भर्ग— सूर्य के तेज, ज्योति, दीप्ति को भर्ग कहा गया है। यह भूनने के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। अतः पापों या विकारों को भूनने के उद्देश्य से साधक सूर्य के भर्गस्वरूप की उपासना करते हैं। भगवान् शिव, त्र्यंबक के लिए अमरकोश में 'भर्ग' शब्द प्रयुक्त हुआ है। मैत्रायण्युपनिषद् में 'भर्ग' शब्द की व्याख्या इस प्रकार वर्णित है-भर्ग वही है, जो सूर्य में स्थापित है। आँख की पुतली में भी भर्ग नाम से यही रहता है। इसकी कान्ति से मनुष्य गति कर सकता है, अतः यह भर्ग है अथवा यह सबको तपाता है, इसी से यह भर्ग है। यह रुलाने वाला रुद्र है अथवा प्राणियों का रञ्जन करता है, इसलिए भर्ग है अथवा यह प्राणियों में जाता है, अतः यह भर्ग है अथवा इस जगत् में यह आता और जाता है अथवा प्रजा का धारण-पोषण करने से यह भर्ग है (मैत्रा० ५.७)। १५९. भवबन्धन— द्र०- आवागमन -चक्र। १६०. भूत— उपनिषद् आदि में भूत शब्द प्राणी अथवा जीव के लिए प्रायः प्रयुक्त हुआ है। अतीत, विगत या बीते समय के लिए भी 'भूत' का प्रयोग होता है। स्थूल जगत् के निर्माण में अव्यक्त प्रकृति से घनीभूत हुए पञ्चतत्त्वों को भी पञ्चमहाभूत कहा जाता है। जो प्राणी मृत्यूपरान्त सूक्ष्म शरीरधारण कर प्रेतयोनि में जाते हैं, उन्हें भी भूत कहते हैं। गीता में भगवान् कहते हैं- हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पूर्व अव्यक्त हैं, बीच में व्यक्त होते हैं और मृत्यूपरान्त अव्यक्त हो जाते हैं- अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना (गी०२.२८) ईशोपनिषद् में कहा गया है- जिस साधक को सभी प्राणी आत्मरूप अनुभूत होते हैं, उस एकत्व को अनुभूति करने वाले साधक को मोह-शोक नहीं रहता- यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः (ईश० ७)। १६१. भोक्ता— भोक्ता का सामान्य अर्थ है- भोग करने वाला, भोगने वाला, भोजन करने वाला, शासन करने वाला, अनुभूत या सहन करने वाला। कहीं अनादि प्रकृति को भोग्या और जीव को भोक्ता कहकर निरूपित किया गया है। इन्द्रियों को घोड़ा और विषयों को घोड़े चरने के मार्ग एवं शरीर, इन्द्रिय और मन के साथ रहने वाले जीवात्मा को मनीषीगण भोक्ता कहते हैं-इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम् भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः (कठ० १.३.४)। गीता में भगवान् कहते हैं, सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ- अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च (गीता० ९.२४)। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में जो भोग, भोक्ता और भोग्य है, वह सदाशिव, चैतन्यस्वरूप और विलक्षण साक्षीरूप मैं ही हूँ-त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद्भवेत्। तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः (कै० १८)। भोक्ता, भोग्य और प्रेरक परमात्मा-इन तीनों का ज्ञान होने पर सब कुछ जान लिया जाता है। यह ब्रह्म इन तीन भेदों में वर्णित है- भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् (श्वेता० १.१२)। १६२. मनस् — पंच ज्ञानेन्द्रियों, पंच कर्मेन्द्रियों के साथ मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है; परन्तु यह शरीर के भीतर रहने वाली इन्द्रिय अन्तरिन्द्रिय है। मन अन्तःकरण की वह वृत्ति है, जिसके द्वारा सङ्कल्प और विकल्प किया जाता

४६८ [परिशिष्ट] महात्मा

है। मनस्यति अनेन इति मनः अर्थात् जिससे मनन किया जाय, वह मन है। कुछ विद्वानों ने मन को एक ज्ञानेन्द्रिय माना है, जिसके द्वारा सुख-दुःख आदि का बोध होता है- सुखाद्युपलब्धिसाधनमिन्द्रियम् मनः (तर्क भाषा)। गीता में मन को छठी इन्द्रिय के रूप में स्वीकार किया गया है- मनः षष्ठानीन्द्रियाणि (गीता)। जो मन मनन करता है, वह वाणी व्यक्त करती है- तद्यद्वै मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति (जैमि० १.४०.५)। मन ही देखता है, मन ही सुनता है। काम, सङ्कल्प, श्रद्धा आदि सब में मन ही कारणभूत है- मनसा ह्येव पश्यति, मनसा शृणोति। कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्हीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव (बृह० १.५.३)। मन ही बन्धन और मोक्ष का भी कारण है- मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः (मैत्रा० ४.४-८) । शिवसङ्कल्पोपनिषद् के प्रत्येक मन्त्र में 'तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु' पद आया है, जिसका भाव है वह हमारा मन शिव-कल्याणकारी संकल्प से युक्त हो'। हमारा मन अनन्त सामर्थ्य से परिपूर्ण है- अनन्तं वै मनः (बृह०३.१.९)। सांख्य दर्शन के सिद्धान्तानुसार प्रकृति से महत् अथवा बुद्धि की उत्पत्ति होती है। इससे पुनः अहङ्कार की उत्पत्ति होती है। फिर अहङ्कार से मनस् की उत्पत्ति होती है। यह मनस् तत्त्व बुद्धि को बाह्यज्ञान की सूचना देता है, ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान को बुद्धि तक पहुँचाता है। १६३. मनीषी - द्र०- कवि। १६४. मन्थ - 'मन्थ' धातु मथने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। वैदिक साहित्य में एक पेय पदार्थ जिसमें कई पदार्थ मथ दिये जाते थे, मन्थ कहते थे। शाङ्खायन आरण्यक (१२.८) में सभी प्रकार के मन्थों का उल्लेख मिलता है। कोश ग्रन्थों में मन्थ शब्द 'मथना या बिलोना' अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। हिलाना, मलना, ध्वस्त करना, कम्पन आदि इसके पर्याय हैं। दूध मिला हुआ सत्तू का पेय प्रायः मन्थ के रूप में प्रयुक्त होता था। घर्षण द्वारा अग्नि उत्पन्न करने के यन्त्र मन्था को भी मन्थ कहा गया है। बृहदारण्यक उपनिषद् में अग्नि में आहुति डालकर संस्रव (स्रुवा से लगे हुए घृत) को मन्थ में डालने का निर्देश कई बार हुआ है- अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा मन्थे संस्रवमवनयति (बृह०६.३.३)। १६५. मन्यु-क्रोध- मन्यु शब्द के पर्याय हैं- स्तोत्र, कर्म, शोक, याग, क्रोध (अनीति के प्रति क्रोध), साहस, अहंकार आदि। शिव और अग्नि को भी मन्यु कहा गया है। इन्द्रदेवता ने मन्यु के द्वारा वृत्र का हनन किया- मन्युना वृत्रहा (तै०.सं० ४.४.८.१)। मन्यु के द्वारा संयुक्त होकर इन्द्र ने असुरों को मिटाया- मन्युना वै युजेन्द्रोऽसुरानवाबाधत (मै०ब्रा० ४.६.३)। मन्यु के द्वारा ही पराक्रम प्रेरित होता है, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है- मन्युना वै वीर्यं क्रियते, इन्द्रियेण जयति (मै०ब्रा०२.२.१२)। वराह के क्रोध को मन्यु कहकर निरूपित किया गया है- पशूनां वा एष मन्युर्यद्वराहः (तै० ब्रा० १.७.९.४)। क्रोध के विषय में महर्षि वाल्मीकि कहते हैं- वे श्रेष्ठ और महात्मा लोग धन्य हैं जो उठते हुए क्रोध को विवेक से वैसे ही दबा देते हैं, जैसे जलती आग को जल से (वा० सु०का० ५५.४)। क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है तथा पराये दोष देखने से भड़कता है। हे राजन् ! क्षमा द्वारा वह रुकता है तथा क्षमा से ही शान्त हो जाता है (महा० शा०प० १६३.७)। १६६. मर्त्य - मर्त्य का सामान्य अर्थ मरणधर्मा या मरणशील है। मरने वाला या नश्वर जगत् मर्त्य है। अनेक स्थानों पर मनुष्य के लिए मर्त्य शब्द प्रयुक्त हुआ है, अतः मनुष्य लोक या भूलोक को मर्त्यलोक भी कहा गया है। मनुष्य लोक का निवासी यह मनुष्य जीर्ण होने वाला और मरणशील (मर्त्य) है, इस तथ्य को जानने वाला अमर-अजर देवात्माओं (अथवा आत्मा) का सङ्ग पाकर वैसा ही होता है-अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधस्थः प्रजानन् (कठ० १. १.२८)। यह मरणधर्मा मनुष्य धान्य की तरह पकता है और धान्य की तरह फिर उत्पन्न होता है- सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाऽऽजायते पुनः (कठ० १. १.६)। जिस समय मनुष्य के हृदय में स्थित कामनाओं का नाश हो जाता है, उस समय मरणधर्मा मनुष्य अमरत्व को प्राप्त होता है और यहीं उसे ब्रह्म को प्राप्ति होती है-यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति (बृह०४.४.७)। १६७. महात्मा - जिसकी आत्मा बहुत उच्च हो, जिसका स्वभाव, आचरण और विचार आदि बहुत उच्च हो, ऐसे महानुभाव को महात्मा कहा गया है। महादेव शिव के पर्याय के रूप में महात्मा शब्द प्रयुक्त हुआ है। दर्शनशास्त्र में यह शब्द उच्च आत्मा, परमात्मा या विश्वात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है। किसी सन्त या महापुरुष के लिए आदरवाचक अर्थ में भी यह शब्द प्रयुक्त होता है। महात्मा यमराज ने नचिकेता की बुद्धि से प्रसन्न होकर वर दिया-

महावाक्य परिशिष्ट ४६९ तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः (कठ० १.१.१६)। महात्माजन दैवी प्रकृति के आश्रित होकर उस परमात्मा की भजते हैं- महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः (गी० ९.१३)। १६८. महावाक्य — वेदान्त शास्त्र में जीव और ब्रह्म में ऐक्य प्रतिपादित करने वाले वाक्य महावाक्य कहलाते हैं। प्रमुख रूप से चार महावाक्य शुक्तरहस्योपनिषद् में वर्णित हुए हैं- ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ १ ॥ ॐ अहं ब्रह्मास्मि ॥ २ ॥ ॐ तत्त्वमसि ॥ ३ ॥ ॐ अयमात्मा ब्रह्म ॥ ४ ॥ इसमें भगवान् शिव ने शुकदेव मुनि को षडङ्गन्यास पूर्वक महावाक्यों का उपदेश किया है। इसमें नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट्, फट्- इन छः बीजाक्षरों के साथ षट् करन्यास तथा षट् अङ्गन्यास सहित महावाक्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन दृष्टिगोचर होता है। तत्त्वमसि- यह महावाक्य अभेदवाचक है, जो इसका जप करते हैं, वे भगवान् शिव को सायुज्य मुक्ति के भाजक होते हैं- तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये जपन्ति ते शिवसायुज्यमुक्तिभाजो भवन्ति (शु०२०)। महावाक्य पदों का उपदेश- आत्मस्वरूप सूर्य प्रकाश के सदृश निरूपित हुआ है। उपनिषद् का कथन है कि अनात्म पदार्थों में आत्मबुद्धि के कारण मैं अज्ञान के अन्धेरे में पड़कर 'मैं' 'मेरे' की मोहात्मक स्थिति में पहुँच गया हूँ। गुरुदेव द्वारा महावाक्य पदों का उपदेश प्राप्त कर आत्मस्वरूप सूर्य के प्राकट्य से मेरी निद्रा भंग हो गई है-अनात्मदृष्टेरविवेकनिद्रामहं मम स्वप्नगतिं गतोऽहम्। स्वरूपसूर्येऽभ्युदिते स्फुटोक्तेर्गुरोर्महावाक्यपदैः प्रबुद्धः (शु०२०)। १६९. मातरिश्वा — अन्तरिक्ष में प्रवहमान वायु का एक नाम मातरिश्वा है। कहीं-कहीं अग्नि को भी मातरिश्वा संज्ञा प्रदान की गई है। इसे प्राणदाता पितारूप में स्वीकार किया गया है- व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः। वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्वनः (प्रश्न० २.११)। मातरिश्वा अप् (सृष्टि का मूल घटक) को धारण किये रहता है- तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति (ईश०४)। केनोपनिषद् में यक्ष को वायुदेव कहते हैं- मैं ही वायु हूँ और मैं ही मातरिश्वा के नाम से प्रसिद्ध हूँ-वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति (केन० ३.८)। १७०. माया — द्र०-अविद्या। १७१. मीमांसा — षड्दर्शनों में अन्तिम युग्म "मीमांसा" के दो भाग हैं- पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा। मीमांसा का शाब्दिक अर्थ है- किसी तत्त्व का विचार, निर्णय या विवेचन। पूर्व मीमांसा में यज्ञपरक वेद वचनों को व्याख्या है, इससे इसे 'यज्ञविद्या' भी कहते हैं। उत्तर मीमांसा उपनिषद् भाग से सम्बन्धित है, अतः इसे वेदान्त कहते हैं। पूर्व मीमांसा सूत्र के प्रणेता जैमिनि ऋषि हैं। इसकी व्याख्या के रूप में कुमारिल भट्ट ने तन्त्र वार्तिक और श्लोकवार्तिक की रचना की है। माधवाचार्य ने जैमिनीय न्यायमाला विस्तार नामक एक भाष्य की रचना की है। प्रभाकर भी इसी मत के प्रमुख प्रतिपादक थे। बौद्ध धर्म की प्रतिक्रिया रूप में इन वेदज्ञों ने अपने धर्म की सुव्यवस्थित किया। पूर्व मीमांसा को कर्म प्रधान और उत्तर मीमांसा को ज्ञान प्रधान माना गया है। १७२. मुक्ति-मोक्ष — मुक्ति शब्द की निष्पत्ति मुच् (मोचनार्थक) धातु से क्तिन् प्रत्यय लगाने से होती है, जिसका अर्थ है-छुटकारा पाना। संसार के जन्म-मरण-बन्धन से छुटकारा मिलने की अवस्था मुक्ति कहलाती है। वासना, तृष्णा और अहंता या लोभ, मोह, अहंकार के बन्धनों से छुटकारा पाने की अवस्था भी मुक्ति कहलाती है। इसका दूसरा अर्थ ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति या मोक्ष है। ज्ञान और विद्या से ही साधक को मुक्ति मिलती है। मीमांसक कर्म को और भक्तिमार्गीय उपासना को मुक्ति का कारण मानते हैं। श्रवण,मनन, निदिध्यासन और समाधि-ये चार मुक्ति के साधन के रूप में प्रतिपादित हुए हैं। उपनिषद् में वर्णन है कि ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है- ब्रह्मविदाप्नोतिपरम् (तै०३०२.१)। साधक उस ब्रह्म को जानकर ही मृत्यु का अतिक्रमण कर सकता है, दूसरा कोई मार्ग नहीं है- तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वेता०३.८)। कर्म को बन्धन का कारण और ज्ञान को मोक्ष का संसाधक माना गया है। गीता में कहा गया है कि ज्ञानरूपी अग्नि समस्त कर्मों को भस्मसात् कर देती है- ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा (गी०४.३७)। वस्तुतः मनुष्य के बन्धन और दुःख का कारण अविद्या है, उसी की निवृत्ति को मुक्ति कहा गया है। जीव ब्रह्म है-अयमात्मा ब्रह्म; परन्तु अविद्या के कारण जीव ब्रह्म के साथ अपने तादात्म्य की भुला देना है। उपनिषद् के अनुसार नित्य और अनित्य वस्तुओं के विचार द्वारा अनित्य संसार के दुःख-सुख देने वाले सम्पूर्ण विषयों पर से ममता रूप बन्धन को नष्ट कर देना मोक्ष है- मोक्ष इति च नित्यानित्यवस्तु विचारादनित्यसंसारसुखदुःखविषयसमस्त क्षेत्रममताबन्धक्षयो मोक्षः (निरा०२८-२९)।

४७० [ परिशिष्ट ] यक्ष १७३. मुहूर्त — दिन-रात का तीसवाँ भाग या १२ क्षण या १२० पल या दो दण्ड या दो घड़ी या ४८ मिनट के काल को मुहूर्त कहते हैं। फलित ज्योतिष के अनुसार गणना करके निकाला हुआ कोई समय, जिस पर शुभ कार्य प्रारम्भ किया जाता है, मुहूर्त कहलाता है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार प्रजापति ने दिन और रात्रि के १५-१५ भागों या मुहूर्तों की लोकम्यूणों के रूप में देखा। ये (देवों द्वारा) निरन्तर रक्षित होते हैं, इसलिए इनका नाम मुहूर्त (मुहु:+त्रायन्ते) है- स ( प्रजापतिः) पञ्चदशाह्नो रूपाण्यपश्यदात्मनस्तन्वो मुहूर्ताँल्लोकम्पृणाः पञ्चदशैव रात्रेस्तद्यन्मुहुस्त्रायन्ते तस्मान्मुहूर्ताः (शत०ब्रा०१०.४.२.१८)। एक दिन में ३० मुहूर्त होते हैं और एक संवत्सर या १२ मास में १०८०० मुहूर्त होते हैं। १७४. मूढ़— नासमझ, जड़बुद्धि, अज्ञानी, मूर्ख व्यक्ति को मूढ़ कहा गया है। ऐसे व्यक्ति अपने हित या अनहित को नहीं समझ सकते। लोक प्रचलन जिस दिशा में हो, उसी दिशा में बह जाते हैं। कठोपनिषद् में वर्णित है कि अविद्या के भीतर रहकर भी अपने आपको बुद्धिमान् और विद्वान् मानने वाले मूढ़ लोग वैसे ही चारों ओर भटकते और ठोकर खाते रहते हैं, जैसे अन्धे के द्वारा ले जाये जाने वाला अन्धा व्यक्ति-अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः। दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः (कठ०१.२.५)। कर्त्तापन आदि के अहंकार भाव पर आरूढ़ व्यक्ति मूढ़ है- कर्तृत्वाद्यहंकारभावारूढो मूढः (निरा०३३)। १७५. मृत्यु — द्र०-अमृत। १७६. मेधा— 'धीर्धारणावती मेधा' इस कोश वाक्य के अनुसार धारणा शक्ति से सम्पन्न बुद्धि का नाम मेधा है। स्मरण रखने की मानसिक शक्ति, प्रज्ञा या धारणा या उत्कृष्ट बुद्धि को भी मेधा कहा गया है। वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर मेधा प्राप्ति की प्रार्थनाएँ की गयी है। उपनिषद् में कहा गया है कि यह आत्मा न प्रवचन से, न मेधा से, न बहुत सुनने (शास्त्रादि) से प्राप्त होती है- नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन (कठ०१.२.२३)। इन्द्रदेव से मेधा बुद्धि से सम्पन्न करने की प्रार्थना उपनिषद् में है- स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु (तैत्ति०१.४.१)। ओङ्कार की मेधा से ढकी हुई ब्रह्म की निधि कहा गया है- ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः (तैत्ति० १.४.१)। उस प्रजापति पिता ने मेधा और तप के द्वारा सात प्रकार के अन्नों की उत्पन्न किया- यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाऽजनयत्पिता (बृह०१.५.२)। १७७. मोक्ष — द्र०-मुक्ति। १७८. मोह-ममता-आसक्ति— मोह-ममता और आसक्ति ये प्रवृत्तियाँ प्रायः एक ही भाव में ली जाती हैं। गीता में मोह को तामसिक प्रवृत्ति के रूप में स्वीकार किया गया है- अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन (गी०१४.१३)। भगवान् ने गीता में (गी०२.५२) मोह को कीचड़ रूप कहा है, इसमें बुद्धि फँस जाती है तो और अधिक फँसती जाती है। व्यक्तिपरक अथवा प्राणिपरक लगाव को ममता कहते हैं और पदार्थपरक आकर्षण या लगाव को आसक्ति कहते हैं। मोह प्राणी अथवा पदार्थपरक दोनों हो सकता है। गीता ३.१९ में भगवान् ने अर्जुन को अनासक्त होकर कर्म करने का निर्देश दिया है। जब साधक अपने आत्मतत्त्व को सब भूतों में प्रकट हुआ जान लेते हैं, तब मोह और शोक से मुक्ति पाते हैं- यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः (ईश०७)। ममता होने में जीव रहता है। ममता के छूट जाने पर वह कैवल्यस्वरूप हो जाता है- ममत्वेन भवेज्जीवो निर्ममत्वेन केवलः (यो०चू०८४)। यह कहा गया है कि शब्द, स्पर्श आदि विषय असार हैं, इनमें आसक्त हुआ भूतात्मा अपने यथार्थ स्वरूप को नहीं याद रखता- शब्दस्पर्शादयो येऽर्था अनर्था इव ते स्थिताः। येष्वासक्तस्तु भूतात्मा न स्मरेच्च परं पदम् (मैत्रा०४.२)। १७९. यक्ष — यक्ष एक प्रकार की अर्ध देवयोनि है। ये एक प्रकार के देवता हैं, जो कुबेर के सेवक और उनकी निधियों के रक्षक हैं। यक्षों के राजा कुबेर हैं। पुराणों के अनुसार ये प्रचेता की संतान हैं। बड़ के वृक्ष को यक्षतरु कहते हैं, क्योंकि यक्षों को वटवृक्ष बहुत प्रिय होता है। केनोपनिषद् में वर्णन मिलता है कि वह ब्रह्म देवताओं के अभिमान को नष्ट करने के लिए यक्ष रूप में उनके सामने प्रकट हुआ-तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानन्त किमेतद्यक्षमिति (केन०३.२)। यक्ष लोक अन्तरिक्ष में है, क्योंकि अन्तरिक्ष को यक्षों, गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा सेवित माना गया है-यक्षगन्धर्वाप्सरोगणसेवितमन्तरिक्षम् (नृ०पू०१.२)। गीता में भगवान् का कथन है कि

यज्ञ-अग्निहोत्र परिशिष्ट ४७१ सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजसी पुरुष यक्ष और राक्षसों की पूजते हैं- यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः (गी०१७.४)। १८०. यज्ञ-अग्निहोत्र — भारतीय संस्कृति का प्रमुख वैदिक कृत्य जिसमें अग्नि प्रज्वलित कर हव्य पदार्थों की आहुति देते और इष्ट देवों को प्रार्थनाएं किया करते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त संस्कारों को परम्परा के साथ हवन-यज्ञ किया करते हैं। इसके पर्यायवाची शब्दों में अध्वर, क्रतु, इष्टि, सवन, हवन, होम, अग्निहोत्र आदि हैं। यज्ञ की व्यवस्था करने वाले यजमान तथा यज्ञ कराने वाले ऋत्विज् कहलाते है। यजुर्वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों और श्रौत सूत्रों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख हुआ है- सोमयाग, अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ, ऋतुयाज, अग्निष्टोम, अतिरात्र, दशरात्र, दर्शपूर्णमास, पवित्रेष्टि, पुत्रकामेष्टि, चातुर्मास्य, सौत्रामणि, पुरुषमेध आदि। ये यज्ञ तीन प्रकार के माने जाते हैं- १. पाक यज्ञ- औपासन होम, वैश्वदेव, अष्टका आदि, २. हविर्यज्ञ- अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, आग्रायणेष्टि, चातुर्मास्य आदि, ३. सोमयज्ञ- अग्निष्टोम, वाजपेय, अतिरात्र आदि । निरुक्त के अनुसार यजन कर्म यज्ञ है- यज्ञः कस्मात् ? प्रख्यातं यजतिकर्मेति नैरूक्ताः । याज्यो भवतीति वा (निरु०३.१९)। निरुक्त के अनुसार यज्ञ के १५ नाम हैं- यज्ञ, वेन, अध्वर, मेध इत्यादि । सम्पूर्ण यज्ञ कर्म अग्निहोत्र में सम्पन्न होते हैं- अग्निहोत्रे वै सर्वे यज्ञक्रतवः (मै०ब्रा०१.८.६)। सम्पूर्ण लोक यज्ञ को धुरी या यज्ञ के आधार पर अवलम्बित है। अतः यज्ञ को इस लोक का केन्द्र कहा गया है- अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः (यजु०२३.६२)। यज्ञ को देवों को आत्मा कहकर स्वीकार किया गया है- यज्ञो वै देवानामात्मा (शत०ब्रा०९.३.२.७)। श्रेष्ठतम कर्म को यज्ञ की संज्ञा से निरूपित किया गया है- यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म (शत०ब्रा०१.७.१.५)। अग्निहोत्र को महत्ता छान्दोग्य में वर्णित है, जिस प्रकार क्षुधित बालक माता की यथायोग्य उपासना करते हैं, उसी प्रकार सभी प्राणी अग्निहोत्र की उपासना करते हैं- यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते। एवंसर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते (छान्दो० ५.२४.५)। गीता में कहा गया है कि वह सर्वव्यापी ब्रह्म यज्ञ में ही प्रतिष्ठित है- तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् (गी०३.१५)। १८१. यज्ञोपवीत-उपनयन — यज्ञोपवीत का सामान्य शब्दार्थ-यज्ञ का उपवीत (वस्त्र) है। यह यज्ञार्थक जीवन का एक प्रतीक है। यह एक संस्कार परम्परा द्वारा पहनाया जाता है। बालक को गुरुकुल में ले जाने के समय यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता था। ऐसी मान्यता है कि इससे बालक का दूसरा जन्म होता है, इसके बाद वह सूक्ष्म ज्ञान और संस्कार की ग्रहण करने में समर्थ हो जाता है। याज्ञ० स्मृति के अनुसार बालक के ज्ञान, शौच और आचार का विकास कराना-यह उपनयन का उद्देश्य है- उपनीय गुरुः शिष्यं महाव्याहृतिपूर्वकम्। वेदमध्यापयेदेनं शौचाचारांश्च शिक्षयेत् (या०स्मृ०१.१५) । आचार्य महाव्याहृतिपूर्वक गायत्री मंत्र के उच्चारण के द्वारा शिष्य का उपनयन करता है। गायत्री मंत्र में नौ शब्द हैं। यज्ञोपवीत की तीन लड़ों में तीन-तीन धागे होते हैं, इस प्रकार नौ सूत्रों से यज्ञोपवीत बनता है। इसे व्रतबन्ध भी कहते हैं। उपवीतधारी को नौ गुणों या व्रतों के बन्धन से बाँधते हैं। उपनयन न होने से व्यक्ति व्रात्य अर्थात् पतित और समाज से बहिष्कृत माना जाता था। यह सूत्र योगी, योग-वेत्ता और तत्त्वदर्शियों को धारण करना चाहिए-तत्सूत्रं धारयेद्योगी योगवित्तत्त्वदर्शिवान् (ब्रह्म० ८)। जो इस सूत्र को ब्रह्म भाव से धारण करता है, वही चैतन्य है- ब्रह्मभावमिदं सूत्रं धारयेद्यः स चेतनः (ब्रह्म० ८)। ज्ञानरूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले पुरुषों के हृदय में ब्रह्मरूप सूत्र रहता है- सूत्रमन्तर्गतं येषां ज्ञानयज्ञोपवीतिनाम् (ब्रह्म० १०)। १८२. यति — द्र०- संन्यासी। १८३. याज्या-शस्या-शस्त्र — यज्ञ संबंधी सूक्त ऋचा अथवा मंत्र को याज्या कहते हैं और वेद की ऋचा को शस्या कहते हैं। परवर्ती संहिताओं तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका उल्लेख मिलता है- इयं (पृथिवी) हि याज्या (शत० ब्रा० १.४.२.१९)। अन्नं वै याज्या (गो०ब्रा० २.३.२२)। होता जिन मंत्रों से स्तुति करता है, उसे शस्त्र कहते हैं। उद्गाता द्वारा उच्चारित मन्त्र स्तोत्र कहे गये हैं। साम को देवरूप और शस्त्र को प्रजारूप मानकर निरूपण किया गया है-साम वै देवाः प्रजाः शस्त्राणि (जै०ब्रा० १.२७७)। कहीं वाणी को ही शस्त्र स्वीकार किया गया है-वाग्वि शस्त्रम् (ऐ० ब्रा० ३.४४) १८४. योग — योग के पर्यायवाची शब्द हैं- जोड़ना, मिलाना, संयोग, संबंध, संगति, ध्यान, युक्ति, चित्तवृत्ति का निरोध आदि। योग के व्यवहारतः विविध भेद हैं; जैसे- मंत्रयोग, लययोग, हठयोग, राजयोग आदि- योगो हि बहुधा

ब्रह्मन्भिद्यते व्यवहारतः। मन्त्रयोगो लयश्चैव हठोऽसौ राजयोगतः (यो०त० १९)। योग के आठ अंग माने गये हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन्हें अष्टांग योग कहते हैं। महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन की रचना की। इन्होंने योग दर्शन की चार भागों या पादों- समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य में विभाजित किया। जो साधक योग का अभ्यास करते हैं, उन्हें अनेकों विलक्षण शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जिन्हें विभूति या सिद्धि कहते हैं। विज्ञान भिक्षु का 'योगसार संग्रह' योग का एक प्रामाणिक ग्रन्थ है। गीता में भगवान् ने योग को कर्म का कौशल कहकर निरूपित किया है- तस्माद् योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् (गी० २.५०)। योग को शरीर, मन और अन्तःकरण इन तीन साधनों के द्वारा क्रमशः कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग- इन तीन प्रकारों में विभक्त किया गया है। कठोपनिषद् का कथन है कि इन्द्रियों की स्थिर धारणा ही योग है- तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् (कठ० २.३.११)। गीता के अनुसार असंयत आत्मा (मन) वाले को योग प्राप्त करना कठिन है- असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः (गी० ६.३६)। जिस प्रकार वायु रहित स्थान में दीपक चलायमान नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा के योग में लगे हुए संयतचित्त योगी की स्थिति कही गयी है-यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमास्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः (गी० ६.१९)। योग युक्त आत्मा सबको समभाव से देखने वाला अपने को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को अपने में देखता है- सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः (गी० ६.२९)। १८५. योग-क्षेम— 'योग-क्षेम' शब्द दर्शन जगत् का बड़ा ही प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय शब्द है। सामान्य आध्यात्मिक जीवन की प्रवृत्ति वाला मनुष्य अपने जीवन में योग-क्षेम की ही आकांक्षा रखता है। योग-क्षेम का तात्पर्य है 'प्राप्त भोग पदार्थ सुरक्षित बने रहें तथा जो अप्राप्त है, वे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हों। योग-क्षेम की शास्त्रीय परिभाषा है- 'अप्राप्तस्य प्रापणं योगः,' 'प्राप्तस्य रक्षणं क्षेमः' अर्थात् अप्राप्त की प्राप्ति 'योग' है और प्राप्त की रक्षा क्षेम है। सामान्य जीवनचर्या के लिए यह आवश्यक है, परन्तु जो सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक जीवन के पथिक हैं, वे इस योग- क्षेम को तुलना में ब्रह्मज्ञान- आत्मज्ञान की प्राप्ति अभीष्ट मानते हैं; क्योंकि यही मुक्ति का आधार है। 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' - यह उक्ति इसी तथ्य को ओर संकेत करती है। ज्ञान (ब्रह्मज्ञान-आत्मज्ञान) के बिना मुक्ति सम्भव नहीं। कठोपनिषद् में यह तथ्य बड़े स्पष्ट शब्दों में व्याख्यायित हुआ है कि सामान्यजन (मन्द व्यक्ति) योग-क्षेम का आधार होने से 'प्रेय' मार्ग का वरण कर लेते हैं, जबकि यह नश्वर है। भौतिक सुख-सुविधा के साधन अनित्य ही हैं। इसलिए परमकल्याण (मोक्ष) पथ के पथिक इसकी चाह नहीं करते, वे श्रेय मार्ग- आत्मसाक्षात्कार- ब्रह्मसाक्षात्कार का मार्ग अपनाते हैं, भले ही कष्ट साध्य जीवन क्यों न जीना पड़े। इस प्रकार योग-क्षेम सामान्य जनों का आकांक्षणीय है। गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है कि जो अनन्य भाव से मेरा भजन करता है, उसका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ। उसे अपने योगक्षेम की चिन्ता नहीं करनी चाहिए-अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् (गी० ९.२२)। १८६. योनि— योनि शब्द सामान्यतय उद्गम या उत्पत्ति स्थान अथवा उत्पादक कारण के रूप में प्रयुक्त होता है। जीवात्मा के ८४ लाख योनियों में परिभ्रमण की मान्यता भी प्रसिद्ध है। प्राणियों के ये विभाग या वर्ग प्रधानतः चार हैं- अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज। कुछ विद्वानों के मत से ये चारों इक्कीस-इक्कीस लाख हैं। इन सबमें मनुष्य योनि को श्रेष्ठ-सर्वोत्तम और दुर्लभ कहा गया है। योनि और रेतस् की संगति गायत्री और रथन्तर से की गयी है- रेतो वै गायत्र्यै रथन्तरं, योनिर्वै रथन्तरस्य गायत्री (जै०ब्रा० ३.२९२)। पृथिवी को भी योनि कहकर निरूपित किया गया है-योनिर् वा इयं (पृथिवी) (शत०ब्रा० १२.४.१.७)। सभी प्राणी संवत्सर (काल) से उत्पन्न होते हैं, अतः संवत्सर को सम्पूर्ण प्राणियों को योनि कहा गया है- संवत्सरो हि सर्वेषां भूतानां योनिः (शत०ब्रा०८.४.१.१८)। उपनिषद् में वर्णन है कि प्रजापति ने मुख रूप योनि (केन्द्र) से दोनों हाथों द्वारा अग्नि की उत्पन्न किया- स (प्रजापतिः) मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत (बृह०१.४.६)। १८७. राग-द्वेष— किसी इष्ट वस्तु या सुख आदि को प्राप्त करने को अभिलाषा या उसके प्रति आकर्षण या अनुराग आसक्ति का भाव राग कहलाता है। पतंजलि ने पाँच प्रकार के क्लेशों में से एक क्लेश राग को माना है। उनके अनुसार जब कोई व्यक्ति सुख भोगता है, तो उसकी प्रवृत्ति और अधिक सुख पाने की होती है, इसी प्रवृत्ति को

रयि (परिशिष्ट) ४७३

उन्होंने राग कहा है। महर्षि पतंजलि ने राग का मूल अविद्या और परिणाम क्लेश बताया है। द्वेष इसका विपरीतार्थक शब्द है। चित्त की अप्रिय लगने वाली वस्तु, व्यक्ति या प्रवृत्ति की द्वेष कहते हैं। योग दर्शन के अनुसार सुख-भोग के अन्दर अन्तःकरण में रहने वाली जो अभिलाषा विशेष है, वह राग है-सुखानुशयीरागः (यो० द० २.७)। न्याय दर्शन में काम, मत्सर, स्पृहा, तृष्णा, लोभ इन सबको रागपक्ष या राग कहकर निरूपित किया गया है- रागपक्षः कामो मत्सरः, स्पृहा, तृष्णा, लोभ इति। प्रशस्तपाद भाष्य में द्वेष के पाँच भेद किये गये हैं- द्रोह, क्रोध, मन्यु, अक्षम, अमर्ष। योग दर्शन के अनुसार दुःख में बसने वाली अन्तःकरण की प्रवृत्ति द्वेष है- दुःखानुशयी द्वेषः (यो०द० २.८)। राग-द्वेष रजोगुण का विकार है। गीता में निर्देश है कि रजोगुण की रागात्मक तृष्णा तथा आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान-रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् (गी० १४.७)। उपनिषद् में इन विकारों की तुलना राक्षसों से की गयी है। द्वेष चाणूर मल्ल है। मत्सर दुर्जय मुष्टिक है-द्वेषश्चाणूरमल्लोऽयं मत्सरो मुष्टिको जयः। (कृष्णो० १४)। गीता में भी इन दोनों विकारों को जीव का शत्रु कहा गया है- इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ (गी० ३.३४)। १८८. रयि— रयि शब्द कोश ग्रन्थ में जल, सोम रूप अन्न भोजन या सम्पत्ति के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। आदित्य की प्राण स्वरूप और रयि की चन्द्रस्वरूप प्रतिपादित किया गया है। स्थूल और सूक्ष्म (मूर्त और अमूर्त) प्रकृति के सभी घटकों को रयि माना गया है- रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च (प्रश्न० १.५)। पितृयान मार्ग जो चन्द्रलोक होकर जाता है, उसे रयि कहा है- एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः (प्रश्न. १.९)। मनुष्यगण रयिरूपी लौकिक सम्पदा की अभिलाषा सदैव करते रहते हैं। उपनिषद् में वर्णित है कि उस विराट् पुरुष की सभी अपनी अभिलाषा के अनुरूप समझते हैं। देवता उसे अमृतरूप में अपनाते हैं। मनुष्यगण उसे रयि (लौकिक सम्पदा) के रूप में मानते हैं- उर्गिति देवाः । रयिरिति मनुष्याः (मुद्ग० ३.२)। पितृयान मार्ग का सम्बन्ध दक्षिणायन तथा कृष्णपक्ष से है, अतः दक्षिणायन या कृष्णपक्ष की भी रयि कहा गया है। १८९. लिङ्ग— लिङ्ग का सामान्य अर्थ है- लक्षण, प्रतीक, चिह्न, निशान, जिससे किसी का बोध हो। जैसे पुल्लिंग से पुरुष का बोध होता हैं और शिवलिंग से शिव का बोध होता है; अतः लिङ्ग 'बोधक' अर्थ में प्रयुक्त होता है। धूम्र अग्नि का लिङ्ग है। उस परम पुरुष का बोध अन्य किसी भी तत्त्व से नहीं हो सकता, अतः उसे अलिङ्ग भी कहा गया है। लिङ्ग पुराण में शिव के दो रूप वर्णित हैं- १. निर्गुण शिव, उन्हें अलिङ्ग कहा गया है, २. जगत्कारण रूप शिव, जिनका बोधक शिवलिङ्ग है। कहीं लिङ्ग की अव्यक्त अथवा अमूर्त सत्ता का स्थूल प्रतीक कहा गया है। कहीं इसे प्रकृति बोधक भी माना गया है। उपनिषद् में उस विराट् परम पुरुष की निराकार रूप होने के कारण अलिङ्ग कहा गया है-अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च (कठ० २.३.८)। १९०. लोक, परलोक,सप्तलोक— हमारे पुराशास्त्रों में सात लोकों का प्रायः उल्लेख मिलता है। वस्तुतः धरती और इसके ऊपर सात लोक हैं तथा धरती से नीचे भी सात लोक है। इस प्रकार कुल चौदह लोक हो जाते हैं। चूँकि ऊपर-नीचे सात-सात लोक हैं, इसलिए उपलक्षण में सात लोक ही कहे जाते हैं। ऊर्ध्व सप्तलोक हैं- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, और सत्यम् तथा अधः लोक हैं- अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल (पद्मपु०)। यहाँ उपनिषदों के परिप्रेक्ष्य में इनका दार्शनिक स्वरूप प्रतिपादित किया गया है। दार्शनिक मान्यता के अनुसार शीर्षस्थ इन्द्रियों के जो स्थान हैं (२ आँख, २ कान, २ नाक एवं १ जिह्वा), वे ही सप्त लोक हैं, क्योंकि प्राण इन्हीं स्थानों में विशेष रूप से संचरित होते हैं। इस प्रकार ये इन्द्रिय गोलक 'लोक' कहे जा सकते हैं, चूँकि इनकी संख्या सात है, इसलिए ये सप्तलोक कहे जाते हैं। उपनिषदों में प्रायः दो लोकों का उल्लेख मिलता है- इह लोक और परलोक। दूसरे शब्दों में इसे ही 'अयं लोक' और 'असौ लोक' कहा गया है। निरुक्त में तीन लोकों का उल्लेख मिलता है- पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक। सुश्रुत में दो लोक हैं- स्थावर और जङ्गम। १९१. वरदान — किसी देवी-देवता या महापुरुषों से माँगा हुआ मनोरथ वरदान कहलाता है। वह कथन जिसके लिए देवों से प्रार्थना की जाय या उनसे प्राप्त हुआ फल भी वरदान कहलाता है। वर का एक अर्थ-श्रेष्ठ या सर्वोत्तम भी है। कठोपनिषद् का कथन है कि उठो! जागो! और श्रेष्ठ महापुरुषों के पास जाकर उस आत्म तत्त्व को जान लो-

४७४ [परिशिष्ट] विद्वान् उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत (कठ० १.३.१४)। आत्मा को वर कहा गया है- आत्मा हि वरः (काठ० सं० २८.५)। परमात्मा की सम्पूर्ण रचना श्रेष्ठतम है- सर्वं वै वरः (शत०ब्रा०२.२.१.४)। नचिकेता ने महात्मा यमराज से तीन वरदान प्राप्त किये थे- तस्मात्प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व (कठ० १.१.९)। वस्तुतः देवशक्तियाँ 'वरदान' (वर=श्रेष्ठ, दान) देती हैं, जबकि मनुष्य अपनी इच्छानुसार माँगता है। इसलिए दोनों का क्रम ठीक न बैठने से बात बनती नहीं। १९२. वषट्कार-हन्तकार- देवों के निमित्त किया हुआ यज्ञ विशेष वषट्कार कहलाता है। कहीं-कहीं यह स्वाहाकार के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसे यज्ञ की प्रतिष्ठा कहकर निरूपित किया गया है-वषद्वारो वै यज्ञस्य प्रतिष्ठा (तैत्ति० सं० ७.५.५.३)। इसे वैश्वानर (अग्नि) और सूर्य से भी सम्बद्ध किया गया है- वैश्वानरो वषट्कारः (मै०ब्रा०४.६.७)। एष एव वषट्कारो य एष (सूर्यः) तपति (शत०ब्रा०१.७.२.११)। अतिथि या संन्यासी आदि के लिए गृहस्थ भोजन का अल्प अंश निकाला करते थे, यह अंश पुष्कल का चौगुना या मोर के सोलह अण्डों के बराबर होता था, इसे हन्तकार कहा जाता था। मनुष्यों (अतिथियों) के लिए जो भेंट निकाली जाती है, वह हन्तकार है- निर्वीती हन्तकारेण मनुष्यांस्तर्पयेदथ। १९३. वाजी - द्र०-अश्व । १९४. वानप्रस्थ - द्र०-चतुराश्रम। १९५. विकार - किसी वस्तु, व्यक्ति या क्षेत्र की मूल वृत्तियों में बदलाव आ जाना विकार कहलाता है। विकृति, खराबी, अवगुण या दोष को भी विकार कहते हैं। व्यक्ति में प्रायः काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, निराशा, चिन्ता, ईर्ष्या, द्वेष आदि मानसिक विकार पाये जाते हैं। गीता में कहा गया है कि विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) का ध्यान-चिन्तन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है, कामना से क्रोध उत्पन्न होता है- ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते (गी०२.६२)। काम, क्रोध, लोभ इम तीन विकारों को नरक का द्वार कहा गया है, ये आत्मा का नाश करने वाले हैं, इन तीनों का त्याग करना चाहिए- त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् (गी०१६.२१)। धीर प्रकृति वाले पुरुषों का स्वभाव बताते हुए कहा गया है कि विकार (काम, क्रोध आदि) की स्थिति आने पर भी जिनके चित्त में विकार नहीं उत्पन्न होता, वे वास्तव में धीर (धैर्यवान्) हैं- विकार हेतौ सति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीराः (कु०सं० १.५९)। १९६. विद्या, ज्ञान - विद्यते अनया सा विद्या अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है, वह विद्या है। नित्यानित्य वस्तु का विवेक प्रदान करने वाली शक्तिधारा 'विद्या' कही जाती है। परमात्मसत्ता नित्य है। सदैव विद्यमान रहती है, जबकि उससे भिन्न जो कुछ भी है, वह अनित्य है, नश्वर है, परिवर्तनशील है- इस तथ्य का बोध (स्वानुभूति) होते ही व्यक्ति भवबन्धनों से मुक्त हो जाता है। जैसा कि आचार्य शंकर ने लिखा है- सा विद्या या विमुक्तये (जो सांसारिक बन्धनों से जीवात्मा को मुक्त कर दे, वही विद्या है।) इसी को अमृतत्व की प्राप्ति कहा जाता है- विद्ययाऽमृतमश्नुते (ईश०११; मैत्रा०७.९), विद्यया विन्दतेऽमृतम् (केन० २.४)। 'अविद्या' अन्धकार की स्थिति है, चैतन्यस्वरूप आत्मा पर आवरण डाल देती है, जबकि विद्या प्रकाश की स्थिति है, चैतन्य स्वरूप पर पड़े आवरण को दूर करके उसका बोध-साक्षात्कार करा देती है- विद्या दिवा प्रकाशत्वादविद्या रात्रिरुच्यते (१ संन्या०२.८३)। संन्यासोपनिषद् में इसीलिए कहा गया है कि जो विद्या के अभ्यास (साधना) में प्रमाद (आलस्य) करता है, वह दिन में सोये रहने के समान है, अर्थात् दिन के बहुमूल्य समय को सोने में व्यर्थ गँवा देने के समान है- विद्याभ्यासे प्रमादो यः स दिवा स्वाप उच्यते (१ संन्या० २.८४)। अतएव समय रहते 'विद्या' की प्राप्ति का परमपुरुषार्थ करके आत्मकल्याण का पथ प्रशस्त कर लेना चाहिए- विद्यया साधयेत (संहि० ३.४)। १९७. विद्वान् - विद्वान् का शाब्दिक अर्थ है- ज्ञाता, जानकार, बुद्धिमान्, विद्यायुक्त। यह शब्द वेद-उपनिषद् में अनेक स्थानों पर प्रयुक्त हुआ है। अग्निदेव हमारे सम्पूर्ण कर्मों को जानने वाले हैं, अतः उन्हें विद्वान् कहा गया है- विश्वा॑नि देव वयुनानि विद्वान् (ईश० १८)। उपनिषद् के अनुसार विद्वान् नाम-रूप से मुक्त होकर उत्तमोत्तम दिव्य पुरुष को

विधाता-धाता [परिशिष्ट] ४७५

प्राप्त होता है-तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् (मुण्ड०३.२.८)। सबके भीतर रहने वाले आत्मा के स्वरूप का बोध करने वाला विद्वान् है-सर्वान्तरस्थ स्व संविद्रूपविद्विद्वान् (निरा०३२)। १९८. विधाता-धाता — विधान करने वाला, रचने वाला, बनाने वाला, उत्पन्न करने वाला, सृष्टिकर्त्ता, ब्रह्मा या ईश्वर को विधाता कहा गया है। इसे धाता भी कहा गया है; जिसका अर्थ है, पालन करने वाला, धारण करने वाला या रक्षा करने वाला। ऋग्वेद में आदित्य देव को विश्वकर्मा, धाता और विधाता कहा गया है- विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक् (ऋ० ८.३.१७)। निरुक्त की दुर्गवृत्ति में सब भूतों को उत्पन्न करने वाले को धाता तथा आजीविका आदि कर्मों में प्रवृत्त करने वाले को विधाता कहा गया है- धाता उत्पादयिता सर्वभूतानाम्.....विधाता जीवनस्य जीवतां च साध्वसाधुषु कर्मसु प्रवर्तमानानां (निरू० दुर्गवृत्ति १०.२६)। आगे निरुक्त में वर्णित है कि धाता ही सबका विधाता है-धाता सर्वस्य विधाता (निरु० ११.१०)। वह परमेश्वर ही विष्णु,नारायण,अर्क, सविता,धाता,विधाता और इन्द्र है- विष्णुनारायणोऽर्कः सविता धाता विधाता सम्राडिन्द्र इति (मैत्रा० ५.८)। १९९. विराट् पुरुष — सार्वभौम शक्ति सम्पन्न परम पुरुष को विराट् पुरुष कहा गया है। दृश्य-अदृश्य अनन्त सृष्टि की रचना करने वाले उस विराट् पुरुष को सहस्रों नामों से पुकारा जाता है-सहस्राक्षरा वै परमा विराट् (तां० म० २५. ९.४)। यह स्थूल जगत् उसी विराट् पुरुष का शरीर है। वह सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त होने पर भी उससे दस अंगुल ऊपर अवस्थित है। सम्पूर्ण विश्व जो व्यक्त हुआ है, वह तो उसका एक पाद ही है, शेष तीन पाद तो अभी अव्यक्त हैं (पुरुषसूक्त)। भगवद्गीता के अनुसार भगवान् ने जो अपना विराट् रूप दिखाया था, उसमें सभी लोक, पर्वत, समुद्र,नदी, देवता आदि दिखाई पड़े थे। २००. विवस्वान्-वैवस्वत — बारह आदित्यों में से एक विवस्वान् है। भागवत पुराण के अनुसार ये आदित्य विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, शुक्र तथा उरुक्रम हैं। इनकी पत्नी का नाम संज्ञा है। विवस्वान् के पुत्र का नाम श्राद्धदेव मनु था। संज्ञा पत्नी से इन्हें यम, यमी आदि संतति हुई (भा०पु० ६.६- ४१)। वर्तमान काल के मनु वैवस्वत इन्हीं के पुत्र हैं। ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार मनु वैवस्वत के दस पुत्र थे- इक्ष्वाकु, तृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूषक, नरिष्यन्त, पृषध्र, नाभाग और कवि (ब्रह्मा० पु० २.३८)। इनकी विदुषी पुत्री इला मैत्रावरुण याग से उत्पन्न हुई थी। (भा०पु०९.१.१५)। २०१. विषय-भोग — इन्द्रियजन्य सुख को विषय कहा गया है। ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जो पदार्थ ग्रहण किये जाते हैं (रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द), इन्द्रियों के विषय कहलाते हैं। विषयों से जिस सुख-दुःख की अनुभूति होती है, उसे भोग कहते हैं। गीता में कहा गया है कि विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की आसक्ति विषयों में हो जाती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है। कामना की पूर्ति न होने से क्रोध उत्पन्न होता है-ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते (गी० २.६२)। मनुष्य के चारों ओर विषयों की अनन्त लहरें उठती रहती हैं, उनमें घिरा हुआ मनुष्य अपना लक्ष्य नहीं देख पाता। जो इन्द्रिय निग्रह नहीं कर पाते, उनकी इन्द्रियाँ, आत्मा, परमात्मा और परमार्थ तत्त्व को छोड़कर विषयों की ओर दौड़ती हैं, उन्हें विषयों में रमण का अभ्यास पड़ जाता है। गीता में भगवान् कृष्ण कुन्तीपुत्र अर्जुन से कहते हैं- जो इन्द्रियों तथा विषयों के संसर्ग से उत्पन्न होने वाले भोग हैं, वे निःसन्देह दुःख की योनियाँ हैं, वे आदि और अन्त वाले (नश्वर) हैं, उनमें बुद्धिमान् नहीं रमते - ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः (गी० ५.२२) विषयों में अनासक्त रहने वाला पुरुष अन्तःकरण का सुख पाता है- बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् (गी० ५.२१)। २०२. वीर्यम् — वीर्य के पर्याय शुक्र, तेज, रेतस्, बीज, पराक्रम, पुंसत्व, कांति, साहस आदि हैं। शरीर के सप्तधातुओं में से एक धातु वीर्य है, जिसका निर्माण अन्त में होता है। जिसके कारण शरीर में बल और कांति आती है। आत्मन् (प्रकृति या सूर्य या अग्नि) से वीर्य की प्राप्ति होती है- आत्मना विन्दते वीर्यं (केन० २.४)। बृहस्पति रूप के द्वारा उद्गीथ रूप, पितर स्वधा के द्वारा प्रतिहाररूप और इन्द्र वीर्य (पराक्रम) के द्वारा निधनरूप है- रूपेण बृहस्पतिरुद्गीथं स्वधया पितरः प्रतिहारं वीर्येणेन्द्र निधनम् (जैमि० १.२१.७)। वीर्य का एक अर्थ पराक्रम है। यक्ष ने अग्नि से पूछा- तुझमें क्या सामर्थ्य है- तस्मिन्स्त्वयि किं वीर्यमिति (केन० ३.५)।