भारतकोश
संग्रह पर लौटें

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

४७६ [परिशिष्ट] वैश्वानर २०३. वेद-वेदान्त -- वेद का अर्थ- 'वास्तविक ज्ञान' से लगाया जाता है; किसी तथ्य को जानने के अर्थ में भी वेद शब्द प्रयुक्त होता है। भारतीय आर्य संस्कृति के चार धार्मिक ग्रन्थ जो सर्वप्रधान और सर्वमान्य हैं, 'वेद' कहलाते हैं। ये ब्रह्मा के चारों मुखों से निःसृत माने गये हैं। वेदों के भी चार भाग माने गये हैं- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्। प्रत्येक वेद की कई- कई शाखाएँ भी प्रचलित हुई हैं। प्रत्येक वेद के स्वतंत्र उपवेद भी व्यवहार में विकसित हुए। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद ये छः वेदों के अंग या वेदाङ्ग कहलाते हैं। ऐसी मान्यता है कि वेदों का वर्तमान रूप में संग्रह और संकलन महर्षि व्यास ने किया है, इसलिए वे वेदव्यास कहे जाते हैं। विष्णु और वायु पुराण में वर्णित है कि स्वयं विष्णु भगवान् ने वेदव्यास का रूप धारण करके वेद के चार भाग किये और ऋक्, यजुः, साम और अथर्व को क्रमशः पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमंत इन चार शिष्यों- ऋषियों को दिया। वेद का अन्तिम ध्येय ब्रह्म और आत्म तत्त्व का प्रतिपादन करना है- वेदाः ब्रह्मात्मविषयाः (भा०पु० ११.२१.३५)। वेदों का अन्तिम भाग वेदान्त के रूप में प्रसिद्ध हुआ- वेदानाम्न्तः इति वेदान्तः। वेदान्त सार के अनुसार प्रामाणिक उपनिषदें ही वेदान्त हैं- वेदान्तो नामोपनिषत् प्रमाणम् (वे०सा०खण्ड ३)। उपनिषद् के अनुसार पूर्वकल्प में परम गुह्यज्ञान वेदान्त (उपनिषद्) में वर्णित हुआ है- वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम् (श्वेता० ६.२२)। गीता में भगवान् ने कहा है- वेदान्तकर्ता और वेदविद् मैं ही हूँ और वेदों में मैं ही जानने योग्य हूँ- वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् (गी० १५.१५)। २०४. वेदाङ्ग ---द्र.-वेद-वेदान्त । २०५. वेदान्त - द्र.- वेद-वेदान्त । २०६. वैकुण्ठ - भगवान् विष्णु का धाम या स्थान वैकुण्ठ कहलाता है। पुराणानुसार यह धाम सत्यलोक के ऊपर सर्वश्रेष्ठ लोक है। भगवान् विष्णु जिन्हें मोक्ष देते हैं, वे इसी धाम में निवास करते हैं। यहाँ के निवासी अजर-अमर रहते हैं। भगवान् अवतार रूप में स्वर्गवासियों को और सारे वैकुण्ठधाम को भूतल पर उतार लेते हैं- भूमावुत्तारितं सर्वं वैकुण्ठं स्वर्गवासिनाम् (कृष्णी० २५)। उपनिषद् के अनुसार जो साधक 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्र की उपासना करता है, वह वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करता है। यह वैकुण्ठधाम विज्ञानघन पुण्डरीक (कमल) है। इसका स्वरूप विद्युत् के समान परम प्रकाशमय है- ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रोपासको वैकुण्ठभुवनं गमिष्यति। तदिदं पुण्डरीकं विज्ञानघनं तस्मात्तडिदाभमात्रम् (नारा० ४)। २०७. वैराग्य - वह मानसिक वृत्ति जिसमें सम्पूर्ण सांसारिक विषय- भोग तुच्छ प्रतीत होते हैं और मनुष्य सांसारिक प्रपञ्चों से निकलकर एकान्त में आत्म उत्थान तथा प्रभु भक्ति में लगता है, वैराग्य कहलाता है। प्राचीन काल में लोग किसी भी आश्रम अवस्था में वैराग्य होने पर संसार से विरक्त होकर वन में विचरण करते हुए आत्म साधना में संलग्न हो जाते थे। वैराग्य (संसार से विराग)की स्थिति में ही संन्यास ग्रहण किया जाता था। ईश्वर या गुरु या इष्ट देव के प्रति अति विशिष्ट राग (स्नेह संबंध) हो जाने की स्थिति को भी वैराग्य कहा जाता है। उपनिषद् के अनुसार जब भोगने लायक पदार्थों के ऊपर कोई वासना न जाग्रत् हो, तब वह वैराग्य की अवधि (स्थिति) जाननी चाहिए- वासनाऽनुदयो भोग्ये वैराग्यस्य तदावधिः (अध्या० ४१)। वैराग्य का फल बोध है, बोध का फल उपरति-चित्तवृत्तियों की विश्रांति या विषय भोग से विरक्ति है। उपरति का फल आत्मानन्द के अनुभव से उत्पन्न होने वाली शान्ति है- वैराग्यस्य फलं बोधो बोधस्योपरतिः फलम्। स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम् (अध्या० २८)। गीता में भगवान् का कथन है कि मन अत्यन्त चञ्चल और कठिनाई से वश में आने वाला है; किन्तु अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आ जाता है-असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते (गी० ६.३५)। २०८. वैश्वानर - वैश्वानर शब्द का सामान्य अर्थ 'अग्नि' है। यजन कार्यों में प्रयुक्त अग्नि को 'वैश्वानर' कहते हैं- वैश्वानरो विसर्गे तु ........ (गोभिलपुत्रकृत संग्रह)। आध्यात्मिक दृष्टि से शरीर के अन्दर परमात्म चेतना का वह अंश वैश्वानर कहलाता है, जो भोजन आदि के पाचन में योगदान देता है-अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् (गी० १५.१४)। वेदान्तदर्शन की मान्यतानुसार 'वैश्वानर' वह चैतन्यांश

व्यष्टि-समष्टि [परिशिष्ट] ४७७ है, जो चतुर्विध शरीरधारी (जरायुज, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज) प्राणियों का समष्टिगत अधिष्ठाता है। वहाँ इसके लिए सुन्दर उदाहरण दिया गया है-जलाशय तथा वन का। जलाशय 'जलबिन्दुओं' का तथा 'वन' वृक्षों का समष्टिगत रूप है। इस तरह चतुर्विध स्थूल शरीरों का समष्टि उपहित चैतन्य- सर्वनराभिमानित्वात्-वैश्वानर कहलाता है। विविध रूपों में विराजमान होने के कारण-विविधं राजमानत्वात्- यह 'विराट्' भी कहलाता है। 'वैश्वानर' के रूप में स्थूल शरीर की इस समष्टि को 'अन्नमयकोश' तथा जाग्रत् भी कहा जाता है। स्थूल शरीरों के इस समष्टि रूप के विपरीत जो व्यष्टि उपहित चैतन्य है, उसे 'वेदान्त' के अनुसार 'विश्व' संज्ञा प्रदान की गई है। जैसे जलाशय का व्यष्टि रूप जल विन्दु और वन का व्यष्टि रूप वृक्ष होता है, उसी तरह वैश्वानर का व्यष्टि रूप विश्व है। रामतीर्थ ने इसका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ किया है-सर्वथा विश्वशरीरवर्तित्वाद् विश्व इत्युक्तं भवति (वे०सा० टीका खण्ड १७) 'यह समस्त शरीरों में प्रवेश करने में समर्थ है'। यह सूक्ष्म शरीर (५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ प्राण, मन और बुद्धि) का परित्याग किए बिना ही अर्थात् सूक्ष्म शरीर के साथ स्थूल शरीर में प्रवेश करता है। यही अन्नमय कोश कहलाता है और कर्तृत्व-भोक्तृत्व आदि उपाधि से युक्त होने के कारण इसे जाग्रत् भी कहा जाता है। २०९. व्यष्टि-समष्टि - समूह या समाज में से अलग किया हुआ प्रत्येक पदार्थ या मनुष्य व्यष्टि कहा जाता है। समूह से छिन्न व्यक्ति या जिसमें सामूहिकता का अभाव हो, वह व्यष्टि रूप में मान्य है। वह सिद्धान्त जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्र सत्ता तथा उसके अधिकार को प्रमुखतया मान्यता मिलती है, व्यष्टिवाद कहलाता है। इसका विपरीतार्थक शब्द समष्टि है। सबके समूह को समष्टि कहते हैं। इसका अन्य पर्याय 'संयुक्त अधिकार' भी है। उपनिषद् में कहीं- कहीं व्यष्टि का अर्थ सर्वव्यापकता भी लिया गया है- तां (ब्रह्मणः) व्यष्टिं व्यश्नुते य एवं वेद (कौ० ब्रा० १.७) अर्थात् वह उस ब्रह्म की सर्वव्यापकता को प्राप्त कर लेता है, जो इस प्रकार जानता है। वायु को व्यष्टि और समष्टि रूप दोनों माना गया है, चूँकि वायु शब्द एक का बोधक भी है और कई गैसों का समूह भी है- तस्माद् वायुरेव व्यष्टिर्वायुः समष्टिः (बृह०३.३.२)। वृक्ष-व्यष्टि है, वन-समष्टि है। जल बिन्दु-व्यष्टि है, जलाशय-समष्टि है। २१०. व्याहृति - व्याहृति का अर्थ है- कथन, उक्ति, वचन या उच्चारण। इनकी संख्या सात मानी गई है- भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्। इनमें प्रारंभिक तीन महाव्याहृति कही गयी हैं। पौराणिक स्तर पर ये सविता और पृश्रि की कन्या मानी जाती हैं। उपनिषद् ग्रन्थों में व्याहृतियों का उल्लेख इस प्रकार हुआ है- भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्त्रो व्याहृतयः (तैत्ति० १.५.१), ता एता व्याहृतयः । प्रेत्येति वाग् इति भूर्भुवःस्वरिति (उदिति) (जैमि० २.९.३)। त्रयी विद्या (तीनों वेदों) के निचोड़ से सारभूत रस अभिस्रवित हुआ। यही सार तीन व्याहृतियाँ भूः, भुवः, स्वः हुईं-स त्रयीं विद्यामभ्यपीड़यत्। तस्या अभिपीडितायै रसः प्राणेदत्। ता एवैता व्याहृतयोऽभवन् भूर्भुवः स्वरिति (जैमि० १.२३.६)। तीनों व्याहृतियों के निचोड़ से ॐ अक्षर अभिस्रवित हुआ। २११. व्योम - व्योम आकाश, अन्तरिक्ष या आसमान का सूचक है। मेघ या जल के पर्याय में भी व्योम शब्द प्रयुक्त हुआ है। भगवान् विष्णु को भी व्योम कहा गया है। भगवान् शिव का एक नाम व्योमकेश है। व्योम को लोक भी कहा गया है- इमे वै लोकाः परमं व्योम (शत० ब्रा० ७.५.२.१८)। ब्राह्मण ग्रन्थ में अन्न को भी व्योम कहा गया है-अन्नं वै व्योम (तैत्ति०सं० ५.३.३.२)। ब्रह्मविद् की तुलना ब्रह्म से उसी प्रकार की गयी है, जैसे घट के नष्ट होने पर घटाकाश ही महाकाश बन जाता है-घटे नष्टे यथा व्योम व्योमैव भवति स्वयम्। तथैवोपाधिविलये ब्रह्मैव ब्रह्मवित् स्वयम् (आत्मो० २२-२३)। २१२. व्रात्य - व्रात्य का साधारण अर्थ 'व्रत सम्बन्धी' है। व्रात्य शब्द परमेश्वर का भी बोधक है। अथर्ववेद में व्रात्य की महिमा बहुत अधिक गायी गयी है। परवर्ती काल में यह शब्द व्रतों से च्युत, संस्कारभ्रष्ट, पतित और निकृष्ट व्यक्ति का बोधक हो गया है। जिसके दस संस्कार या उपनयन संस्कार न हुआ हो, उसे भी व्रात्य माना जाने लगा। जैमिनीय ब्राह्मण में व्रात्य शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो सम्भवतः व्रात्य के पर्याय तथा व्रतों के नियम, उपनियम अर्थ में प्रयुक्त हुआ है- मुह्यन्तीव वा एते ये व्रात्यां धावयन्ति (जै०ब्रा० २.२२१)। ब्रह्मणो वा एते व्यृद्धयन्ते ये व्रात्यां धावयन्ति (जै०ब्रा० २.२२३)। प्रश्नोपनिषद् में 'व्रात्य' शब्द प्राण के लिए प्रयुक्त हुआ है। यहाँ व्रात्य शब्द 'शुद्ध या पवित्र' भाव से प्रयुक्त हुआ है। प्राण ही व्रात्य है, का तात्पर्य प्राण में संस्कार का प्रयोग नहीं है, वह स्वभावगत शुद्ध और पवित्र है। सबसे पहले शुद्ध रूप में उत्पन्न हुआ है।

४७८ [परिशिष्ट] श्रद्धा २१३. शस्त्र—द्र०- याज्या। २१४. शान्ति— वह स्थिति जिसमें किसी प्रकार की क्रिया, वेग, क्षोभ, उद्विग्नता आदि न हो। चित्त की चंचलता, वासना, तृष्णा आदि का क्षय हो। इसके अन्य पर्याय हैं- स्तब्धता, चैन, आराम, रागादि से निवृत्ति, मृत्यु, अमंगल या अनिष्ट का निवारण। गीता में भगवान् ने कहा है कि जितेन्द्रिय तत्पर श्रद्धावान् पुरुष ज्ञान को प्राप्त करता है। ज्ञान को पाकर वह परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है-श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति (गी० ४.३९)। आत्मिक (आन्तरिक) आनन्द की अनुभूति से जो शान्ति मिलती है, यह उपरति (विषयभोग से निवृत्ति) का फल है- स्वानन्दानुभवाच्छान्तिरेषैवोपरतेः फलम् (अध्या०२८)। भावना रहित को शान्ति नहीं मिलती और शान्ति के बिना सुख कहाँ- न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् (गी० २.६६)। २१५. शास्त्र — प्राचीन ऋषियों और मुनियों द्वारा विरचित वे ग्रन्थ, जिसमें उन्होंने जन सामान्य के लिए कर्त्तव्य अकर्त्तव्य, मर्यादा, व्रत, अनुशासन एवं हितकारी शिक्षण दिया है, शास्त्र कहलाते हैं। इनकी संख्या १८ मानी गयी है- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, छंद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद, और अर्थशास्त्र। आगे सभी धार्मिक ग्रन्थों को शास्त्र की श्रेणी में रखा जाने लगा। गीता में भगवान् का निर्देश है कि जो शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से व्यवहार करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न सुख और परमगति को-यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् (गी० १६.२३)। आगे उन्होंने अर्जुन को आदेश दिया है कि कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में तुम्हारे लिए शास्त्र प्रमाण है। अतः शास्त्र विधान को समझकर ही कर्म करना उचित है-तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि (गी० १६.२४)। शास्त्रों की निधि जिस ताले में है, उसकी कुञ्जियाँ दो हैं- स्वाध्याय और सत्संग। मनुष्य तथा समाज के नीति, सदाचार, व्यवहार सम्बन्धी प्रामाणिक नियम धर्मशास्त्रों में उल्लिखित हैं। स्मृति ग्रन्थों को भी धर्मशास्त्र माना गया है। उपनिषद् में इस महत्त्वपूर्ण तथ्य से सचेत भी किया गया है कि निकृष्ट शास्त्रों के जाल में फँसकर ज्ञानियों की बुद्धि मोहित हो जाती है-पतिताः शास्त्रजालेषु प्रज्ञया तेन मोहिताः (यो०त० ६)। २१६. शुद्धि-शुचि-पवित्रता— उपनिषद् में शारीरिक पवित्रता को नहीं, चित्त वृत्तियों की पवित्रता को तथा वासनादि के क्षय को विशेष महत्त्व दिया गया है- चित्तशुद्धिकरं शौचं वासनात्रयनाशकम्। ज्ञानवैराग्यमृत्तोयैः क्षालनात् शौचमुच्यते (मैत्रे० २.१०)। अर्थात् ज्ञानरूपी मिट्टी और वैराग्य रूपी जल से धोने के द्वारा जो पवित्रता होती है, वही वास्तविक पवित्रता है। मल, मूत्रादि, दुर्गन्ध युक्त शरीर की शुद्धि तो मिट्टी एवं जल से होती है, लेकिन वह सब तो लौकिक शुद्धि है। वास्तविक शुद्धि तो मैं और मेरा के अहंभाव का परित्याग करना ही है- अहम्ममेति विण्मूत्रलेपगन्धादिमोचनम्। शुद्ध शौचमिति प्रोक्तं मृज्जलाभ्यां तु लौकिकम् (मैत्रे० २.९)। इन्द्रियनिग्रह ही शुचिता है- शौचम् इन्द्रियनिग्रहः (मैत्रे०२.३)। २१७. शोक —द्र०-हर्षशोक। २१८. श्रद्धा— श्रद्धा का व्युत्पत्तिपरक अर्थ है-श्रत्+धा-सत्य की धारणा। सामान्यतया श्रद्धा का अर्थ - प्रेम और भक्तिपूर्ण पूज्य भाव अथवा भावनात्मक (भावना से परिपूर्ण) विश्वास लिया जाता है। पितरों के प्रति श्रद्धा-भाव पूर्वक अर्पित जल अथवा भोज्य पदार्थ को श्राद्ध कहा जाता है। उपनिषद् में श्रद्धा को हृदय की वृत्ति के रूप में स्वीकार किया गया है-कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति (बृह०३.९.२१)। गीता में श्रद्धा को तीन प्रकार की कहा गया है-सात्त्विकी, राजसी और तामसी-त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु (गी० १७.२)। बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान, तपा हुआ तप और किया हुआ कर्म असत् है-अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह (गी०१७.२८)। मनुस्मृति के अनुसार धर्म तभी निश्चय फल देता है, जब वह श्रद्धापूर्वक किया गया हो-श्रद्धाकृते ह्यक्षये ते भवतः स्वागत्तैर्धनैः (म०स्मृ०४.२२६)। तुलसीदास ने पार्वती और शंकर को श्रद्धा और विश्वास का स्वरूप माना है, जिसके बिना सिद्धजन भी अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते -भवानी शंकरौ

श्राद्ध [ परिशिष्ट ] ४७९

वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम् (रा०मा० बालकाण्ड श्लोक २)। गीता में भगवान् ने कहा है कि सबकी श्रद्धा अपने अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय ही है। जो जैसी श्रद्धा वाला होता है, वह वैसा ही होता है- सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः (गी०१७.३)। जो-जो भक्त जिस-जिस स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, भगवान् उस-उस भक्त की उस रूप के प्रति श्रद्धा को स्थिर करता है- यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् (गी०७.२१)। देवगण भी श्रद्धा की उपासना करते हैं, श्रद्धा से परम ऐश्वर्य मिलता है-श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते। श्रद्धां.... श्रद्धया विन्दते वसु (ऋ०१०.१५१.४)। २१९.श्राद्ध— पितरों की तृष्टि तथा शान्ति के लिए श्रद्धापूर्वक अन्न, जल, भोग पदार्थों आदि का दान करना श्राद्ध कहलाता है। शास्त्र विहित पितृ कर्म या लोकविधि के अनुसार पितरों के क्रिया कर्म को भी श्राद्ध कहते हैं। दूसरे शब्दों में- पितरों की तृप्ति के लिए शास्त्रविधि से श्रद्धापूर्वक किया गया धार्मिक कृत्य श्राद्ध कहलाता है। मनु के अनुसार श्राद्ध पाँच प्रकार का है-नित्यं नैमित्तिकं काम्यं वृद्धिश्राद्धं तथैव च। पार्वणञ्चेति मनुना श्राद्धं पञ्चविधं स्मृतम्॥ भविष्य पुराण में बारह प्रकार के श्राद्ध वर्णित हैं। श्राद्ध प्रक्रिया प्रारम्भ करने का श्रेय इक्ष्वाकुपुत्र निमि को दिया जाता है। इन्होंने अपने पुत्र श्रीमत की असामयिक मृत्यु के एक वर्ष बाद श्राद्ध किया था। आश्विन कृष्णपक्ष में पितरों के निमित्त विशेष रूप से तर्पण, पिण्डदान आदि किया जाता है, यह श्राद्धकाल या श्राद्धपक्ष कहलाता है। २२०. श्रेय-प्रेय मार्ग— श्रेय और प्रेय मार्ग की चर्चा अध्यात्म शास्त्र में प्रायः होती रहती है, परन्तु कठोपनिषद् में इसका विशेष रूप से वर्णन पाया जाता है। यम-नचिकेता के प्रसिद्ध संवाद में जब यमराज से 'आत्मविद्या' के तृतीयवर की याचना नचिकेता ने की, तो यमराज ने उसे दीर्घ आयु, स्वर्गिक आनन्द, हाथी, घोड़ा, रथ तथा अन्यान्य वैभव व एक छत्र राज्य माँग लेने को कहा तथा 'आत्मविद्या' का वर माँगने का हठ न करने को कहा, परन्तु नचिकेता की दृढ़ प्रतिज्ञ स्थिति और उसके अधिकारी स्वरूप की परीक्षा कर लेने के बाद यमराज स्वयमेव उन दोनों मार्गों को स्पष्ट करते हैं। प्रथम श्रेय मार्ग, जो आनन्द स्वरूप परब्रह्म की प्राप्ति का साधन है तथा दूसरा प्रेय मार्ग, जो इस लोक एवं स्वर्गलोक के सुख-भोग की सामग्रियों की प्राप्ति का साधन है। यमराज इसी प्रकरण में यह भी कहते हैं कि धीर पुरुष प्रेय की अपेक्षा श्रेय मार्ग का ही वरण करते हैं, जबकि मन्दबुद्धि व्यक्ति सांसारिक सुखों वाले प्रेय मार्ग का वरण करते हैं-श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः। श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते (कठ०१.२.२)। इसी तथ्य को गीता (१८.३७-३८) में सात्त्विक एवं राजस सुख के रूप में प्रतिपादित किया गया है। प्रारम्भ में दुःखद एवं बाद में अमृतोपम लगने वाले सुख को सात्त्विक तथा प्रारम्भ में सुखद एवं परिणाम में दुःखद लगने वाले सुख को राजस कहा गया है। यही स्थिति श्रेय और प्रेय की है। श्रेय मार्ग प्रारम्भ में सुखद नहीं लगता, परन्तु परिणाम में कल्याणकारी होता है, जबकि प्रेय मार्ग प्रारम्भ में बड़ा ही आकर्षक-आनन्ददायी लगता है, परिणाम में भले ही दुःखदायी हो। २२१. श्रोत्रिय— जो वेद-वेदाङ्गों में पारंगत हो, वह वेदज्ञ-वेदविद् श्रोत्रिय कहलाता है। इसका अन्य पर्याय सभ्य, सुसंस्कृत, ब्राह्मण विशेष है। वेद का एक पर्याय श्रुति है, अतः श्रुति (ज्ञान) से सुसम्पन्न पुरुष को श्रोत्रिय कहा जाता था। उपनिषद् में वर्णन है कि अन्न के प्राण को जानने वाले श्रोत्रिय भोजन करने से पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजनोपरान्त आचमन करते हैं- तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वाचामन्ति (बृह०६.१.१४)। काल सम्पूर्ण प्राणियों और महात्माओं को भी समाहित कर लेता है और जो काल को भी नियंत्रण में करना जानता है, वह वेदविद् (श्रोत्रिय) है- कालः पचति भूतानि सर्वाण्येव महात्मनि। यस्मिंस्तु पच्यते कालो यस्तं वेद स वेदवित् (मैत्रा०६.१५)। जो देवों के सौ आनन्द हैं, वह इन्द्रदेव का एक आनन्द है और ऐसा श्रोत्रिय जो इन्द्र के (वैभव के) भोगों की कामना से रहित है, उसे वह सहज प्राप्त है-ते ये शतं देवानामानन्दाः। स एक इन्द्रस्यानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य (तैत्ति०२.८)। २२२. षड्रिपु-षड्वर्ग— काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर इन्हें षड्रिपु कहा गया है। इन्हें मुद्गलोपनिषद् में षड्वर्ग भी कहा गया है-कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यमित्यरिखड्गवर्गः (मुद्ग०४.४)। इस उपनिषद् का नित्य अध्ययन करने वाला काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों से अबाधित रहता है। गीता में भगवान् ने भी इन्हें वैरी

४८० {परिशिष्ट} सङ्कल्प

और अधिक खाने वाला महापापी कहा है, ये रजोगुण से उत्पन्न होने वाले हैं-काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् (गी०३.३७)। काम का आशय कामना या इच्छा है। रजोगुण से उत्पन्न विषय-वासना और तृष्णा ही काम है। गीता के अनुसार विषयों का चिन्तन करने वाले मनुष्यों की उसमें आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से काम, काम से क्रोध और क्रोध से मोह उत्पन्न होता है। काम, क्रोध, लोभ ये तीनों आत्मा का नाश करने वाले हैं, अतः इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए-त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् (गी०१६.२१)। जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर निःस्पृह, निर्मम और निरहंकार (लोभ, मोह, मद रहित) होकर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है-विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति (गी०२.७१)। अहंकार, अज्ञान, उन्माद आदि के पर्याय रूप में 'मद' शब्द प्रयुक्त होता है। मत्सर का आशय किसी के वैभव-विलास को देखकर जलन या डाह करना है। कृष्णोपनिषद् में द्वेष और मत्सर की संगति राक्षसों से बिठायी गयी है- द्वेषश्चाणूरमल्लोऽयं मत्सरो मुष्टिको जयः (कृष्णो०१४)। २२३. षोडशकला — चन्द्रमा के सोलह भाग जो एक-एक क्रम से शुक्ल पक्ष में बढ़ते और कृष्ण पक्ष में क्षीण होते हैं। मनुष्य के सोलह विशिष्ट गुणों या शक्तियों को भी षोडशकला कहते हैं। इस तथ्य की पुष्टि ब्राह्मण ग्रन्थों से होती है- षोडशकलो वै चन्द्रमाः (ष०ब्रा० ४.६), षोडशकलो वै पुरुषः (शत०ब्रा० ११.१.६.३६)। उस पूर्ण ब्रह्म को भी षोडशकला कहकर वर्णित किया गया है- षोडशकलं वै ब्रह्म (जै०उ०३.३८ .८)। इस सम्पूर्ण जगत् को भी षोडशकलाओं से युक्त माना गया है- षोडशकलं वा इदं सर्वम् (शत०ब्रा० १३.२.२.१३)। यहाँ षोडश संख्या पूर्णता का बोधक है और षोडश कला पूर्ण शक्तियों से भरी रचना। कला शब्द का अर्थ शास्त्रों में इस प्रकार भी दिया गया है- कं ब्रह्म लीयते आच्छाद्यते यया, सा कला। अर्थात् जिसके द्वारा क (ब्रह्म) लीन-आच्छादित होता है, उसे कला कहते हैं। ब्रह्म की सोलह कलाएँ निम्न हैं- प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक और नाम। वस्तुतः परात्पर ब्रह्म की ६४ कलाएँ मानी जाती हैं। चूँकि ब्रह्म के ३ चरण ऊर्ध्व में विद्यमान हैं और एक चरण ही इस विश्व ब्रह्माण्ड के रूप में है। इसका संकेत पुरुष सूक्त में प्राप्त है- त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाऽभवत्पुनः (यजु० ३१.२), इसलिए ६४ का चतुर्थांश १६ ही हुआ। २२४. संवत्सर — संवत्सर शब्द प्रायः वर्ष या साल के लिए प्रयुक्त होता है। प्रत्येक साठ वर्षों को ५-५ वर्ष के १२ युगों में विभक्त किया गया है। प्रत्येक युग का प्रथम वर्ष संवत्सर कहलाता है। ये संवत्सर साठ माने गये हैं। संवत्सर का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। जिस दिन मत्स्यावतार हुआ और सृष्टि का पुनः आरम्भ हुआ, उसी दिन से संवत्सर का आरंभ माना जाता है। आदित्य को संवत् और चन्द्रमा को सर कहकर निरूपित किया गया है- आदित्य एव संवच्चन्द्रमाः सरः (जै० ब्रा० २.६०)। एक संवत्सर में बारह मास या चौबीस अर्धमास होते हैं- द्वादश मासाः संवत्सरः (मैत्रा०ब्रा० १.१०.५) चतुर्विंशत्यर्धमासो वै संवत्सरः (ऐत० ब्रा० ८.४)। अग्नि तथा प्रजापति को भी संवत्सर से सम्बद्ध किया गया है- अग्निः संवत्सरः (तां०म० १७.१३.१७)। स वै संवत्सर एव प्रजापतिः (शत०ब्रा० १.६.३.३५)! २२५. संस्कार — संस्कार का आशय है-सुधार, परिष्कार अथवा मनोवृत्ति या स्वभाव का परिशोधन। शिक्षा, उपदेश या संगति से मनुष्य के अचेतन मन पर एक गहरा प्रभाव पड़ता है, जिसके प्रभाव में उसके क्रियाकलाप सहज ही प्रेरित होते हैं, संस्कार कहलाता है। ऋषियों ने जन्म से पूर्व तथा मृत्युपर्यन्त तक के जीवन क्रम में यज्ञीय कर्मकाण्ड परक षोडश संस्कारों की परम्परा प्रचलित की, जिससे मनुष्य का विचारात्मक तथा भावनात्मक परिशोधन होते रहने का क्रम जीवन भर सम्पादित होता रहे। संस्कार योग्यता वृद्धि की विशिष्ट प्रक्रिया है, जिसके सम्पन्न होने से व्यक्ति या पदार्थ किसी विशेष प्रयोजन के योग्य बन जाते हैं-संस्कारो नाम स भवति यस्मिन् जाते पदार्थो भवति योग्यः कस्यचिदर्थस्य (जैमि०सूत्र० ३.१.३ शबर भाष्य), योग्यतां चादधानाः क्रियाः संस्कारा इत्युच्यन्ते (तंत्रवार्तिक)। २२६. सङ्कल्प — सङ्कल्प शब्द सामान्यतः दृढ़ निश्चय, पक्का इरादा या विचार, तीव्र इच्छा अथवा उद्देश्य के अर्थ में लिया जाता है। हमारा मन ही सभी संकल्पों का अयन (आश्रय) है-सर्वेषां संकल्पानां मन एकायनम्

संन्यास [परिशिष्ट] ४८१ (बृह०२.४.११)। शिवसङ्कल्पोपनिषद् के प्रत्येक श्लोक में मन के शिव अथवा कल्याणकारी संकल्प से युक्त होने की कामना की गई है। जो हमारा मन प्रकृष्ट ज्ञान का साधनभूत है, जो स्मरण और धारण शक्ति से युक्त है, जो ज्योति की भाँति अन्तः को प्रकाशित करता है, जो सभी कर्मों का सम्पादक है, वह हमारा मन शिव संकल्प से युक्त हो- यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्न ऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु (१ शि०सं० ३)। कामनाएँ संकल्प से उत्पन्न होती हैं। गीता (६.२४) में संकल्प से उत्पन्न सब कामनाओं को छोड़ने की बात कही गयी है। उपनिषद् में कहा गया है कि संकल्प ही मन का स्वरूप है, अतः सङ्कल्प को ही मन समझना चाहिए। आज तक कोई भी संकल्प और मन को पृथक् न कर सका। सभी संकल्पों के विनष्ट होने पर आत्मस्वरूप ही शेष रहता है-सङ्कल्पमनसी भिन्ने न कदाचन केनचित्। सङ्कल्पजाते गलिते स्वरूपमवशिष्यते (महो० ४.५३)। २२७. संन्यास - द्र० चतुर्थाश्रम। २२८. संन्यासी-यति - जो अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुका हो और संसार के सभी आकर्षणों से वैराग्य लेकर मोक्ष प्राप्ति का प्रयास कर रहा हो। इन्हें परिव्राजक, यति, अवधूत, हंस, योगी आदि कहते हैं। संन्यासी को सभी प्रकार की आसक्ति का त्याग करना चाहिए। एक जगह पर अधिक समय नहीं रहना चाहिए। उसके अन्दर आत्मज्ञान का प्रकाश होना चाहिए। सर्वत्र समबुद्धि रखने वाला, हिंसा तथा माया से रहित, क्रोध एवं अहंभाव से विमुक्त संन्यासी कहलाता है। उपनिषद् के अनुसार सब कर्मों को छोड़कर अहन्ता और ममता को त्यागकर ब्रह्म की शरण में जाना और तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि, सर्वं खल्विदं ब्रह्म आदि महावाक्यों द्वारा 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा निश्चय करके निर्विकल्प समाधि में रहना और स्वतंत्र यति के रूप में व्यवहार करना, ऐसा पुरुष संन्यासी है, मुक्त है, वही पूज्य योगी, परमहंस, अवधूत और वही ब्राह्मण है (निरा०३९)। संसार से विरक्त होकर केवल ब्रह्म प्राप्ति का यत्न करते हुए स्वतंत्र विचरण करने वाले यति कहलाते हैं। संन्यासियों के छः भेद प्रमुख रूप से वर्णित हैं- कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत और अवधूत। कर्मों को छोड़ देना या मैं संन्यासी हूँ, ऐसा कह देने से कोई संन्यासी नहीं हो जाता। समाधि अवस्था में जीव और ब्रह्म की एकता का अनुभव होना ही संन्यास है। (मैत्रा० २.१७)। २२९. सकाम-निष्काम कर्म - फल प्राप्ति की कामना से किया गया कर्म सकाम कर्म कहलाता है। इसके विपरीत कर्म में फल की इच्छा न करना निष्काम कर्म कहलाता है। निष्काम कर्म करने से पुरुष कर्म के बन्धन में बँधता नहीं है। गीता में कर्मफल की इच्छा न करने का निर्देश है, क्योंकि मनुष्य का अधिकार कर्म करने तक है, फल में नहीं-कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफल हेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (गी०२.४७)। जो कर्मफल की आसक्ति (सकाम कर्म) को छोड़कर नित्य तृप्त और आश्रय रहित है, वह कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता अर्थात् कर्म बन्धन में नहीं पड़ता- त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः (गी०४.२०)। योगी पुरुष कर्मफल को त्यागकर (निष्काम कर्म द्वारा) निष्ठा से भरी शान्ति को प्राप्त होता है-युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् (गी०५.१२)। ध्यान से कर्मफल का त्याग (निष्कामकर्म) श्रेष्ठ है, त्याग से शीघ्र शान्ति प्राप्त होती है-ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (गी०१२.१२)। २३०. सच्चिदानन्द - आत्मा अथवा परमात्मा को सच्चिदानन्द कहा गया है, क्योंकि यह सत्, चित् और आनन्द स्वरूप है। शंकराचार्यजी ने तत्वबोध में लिखा है, जो तीनों कालों में विद्यमान रहता है, वह सत् है-कालत्रयेऽपि तिष्ठतीति सत्। आत्मा का सद्रूप होने का तात्पर्य उसका अमर, नित्य, शाश्वत, अजन्मा आदि होना है- अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे (कठ०१.२.१८)। जिसकी सत्ता सदैव स्थापित रही है, वही सत् है। वह आत्मा चिद्रूप है। चित् का तात्पर्य है-चैतन्यता (ज्ञानयुक्त होना)। वह ज्ञानस्वरूप होने से प्रकाशस्वरूप भी है। उसी का प्रकाश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है- तस्य भासा सर्वमिदं विभाति (कठ०२.२.१५)। यह आनन्द रूप है-निरतिशय अथवा सम्यक् सुखस्वरूप है। शंकराचार्य ने लिखा है- आनन्दमय आत्मा ही ब्रह्म है-आनन्दमय आत्मा ब्रह्मेति गम्यते (ब्र०सू०-शाङ्कर भा०१.१.१२)। २३१. सत्-असत् - सत् शब्द के पर्याय कोश ग्रन्थों में इस प्रकार हैं- ब्रह्म, अस्तित्व, सत्ता, सत्य, साधन, सद्गुणी व्यक्ति, सज्जन, नित्य, स्थायी, श्रेष्ठ, पवित्र, अच्छा, सत्य धर्म। इसके विपरीत मिथ्या, अस्तित्वविहीन, सतारहित,

बुरा, असाधु, असत्य आदि असत् के पर्यायवाची शब्द हैं। सत्य की ही सदैव जय होती है- सत्येनैव जयति (मै०ब्रा०४.३.८)। सत्य में प्रमाद नहीं करना चाहिए-सत्यान्न प्रमदितव्यम् (तैत्ति०१.११.१)। इस लोक में सत् ही परमेश्वर है। सत् के आधार पर ही सृष्टि और धर्म का अस्तित्व है। गीता में कहा है कि असत् का कोई अस्तित्व नहीं है और सत् का अभाव नहीं है- नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः (गी०२.१६)। यज्ञ, तप और दान की स्थिति सत् है- यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते (गी०१७.२७)। सद्भाव और सज्जनता में 'सत्' शब्द प्रयुक्त होता है-सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते (गी०१७.२६)। मुण्डकोपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य, जो सत्य के विजयी होने और असत्य के पराभूत होने का संकेत करता है, को भारत सरकार ने अपने राजचिह्न में स्वीकार किया है- सत्यमेव जयते नानृतम्। सत्येन पन्था विततो देवयानः (मुण्ड०३.१.६)। २३२. सत्त्व-रज-तम- सांख्य दर्शन के अनुसार समूची सृष्टि त्रिगुणात्मक है। ये तीन गुण हैं- सत्त्व, रज और तम। सत्त्व सबसे उत्तम है, इसके लक्षण हैं-ज्ञान, शान्ति, विवेक, सत्प्रवृत्ति आदि। यह आत्म तत्त्व, मूल तत्त्व तथा चेतन तत्त्व का भी बोधक है। वह परम पुरुष परमात्मा इन तीनों गुणों से परे है, अतः उसे त्रिगुणातीत भी कहा गया है। सत्त्व, रज और तम ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं, ये अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं-सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् (गी०१४.५)। जब तक तीनों गुण समान रूप से विद्यमान रहते हैं, तब तक प्रकृति में हलचल-परिवर्तन नहीं होता। प्रकृति मूलरूप में विद्यमान रहती है-साम्यावस्था प्रकृतिः (सां०सू० १.६१)। गीता में ही आगे भगवान् ने वर्णन किया है कि सत्त्वगुण सुख में, रजोगुण कर्म में और तमोगुण ज्ञान की ढँककर प्रमाद में लगाता है-सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत (गी०१४.९)। सत्त्व से ज्ञान, रज से लोभ तथा तम से प्रमाद, मोह, अज्ञान उत्पन्न होता है-सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च (गी०१४.१७)। २३३. सप्तचक्र- योग साधना ग्रन्थों में 'षट्चक्र वेधन' प्रक्रिया का प्रायः उल्लेख पाया जाता है। मान्यता है कि षट्चक्र वेधन प्रक्रिया द्वारा कुण्डलिनी जागरण की क्रिया सम्पन्न होती है और वह जाग्रत् कुण्डलिनी ऊर्ध्वगमन करती हुई सहस्रार स्थित शिवतत्त्व से जब मिल जाती है, तो योग (शिव-शक्तियोग) सिद्ध हो जाता है। साधक में अनेकानेक चमत्कारिक शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं और अन्त में वह मुक्ति का अधिकारी भी हो जाता है- षट्चक्राणि परिज्ञात्वा प्रविशेत् सुखमण्डलम् (यो०शि०६.७४, यो०कु०३.९,१२), षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योम पञ्चकम्। स्व देहे यो न जानाति तस्य सिद्धिः कथं भवेत् (यो०चू०३)। योग साधना ग्रन्थों में जिन षट्चक्रों की प्रसिद्धि है, वे इस प्रकार हैं-१. मूलाधार, २.स्वाधिष्ठान, ३.मणिपूर, ४.अनाहत, ५.विशुद्धाख्य, ६.आज्ञाचक्र। इन षट्चक्रों के वेधन की प्रक्रिया सम्पन्न होने के बाद इससे परे सातवें चक्र तक कुण्डलिनी शक्ति का ऊर्ध्वगमन होता है, तो साधक पूर्णता की स्थिति में पहुँच जाता है। वह सातवाँ चक्र 'सहस्रार चक्र' है, जिसमें सहस्र दल कमल होने को बात कही जाती है। इन सप्तचक्रों का विशद वर्णन तन्त्रसार, हठयोग प्रदीपिका जैसे योग साधना के ग्रन्थों में मिलता है। २३४. सप्त जिह्वाएँ- यज्ञीय विधि-विधान के अन्तर्गत जहाँ अग्नि, समिधा, आज्य आदि का वर्णन पाया जाता है, वहीं 'अग्नि' का मानवीकरण (आधिदैविक) रूप भी प्राप्त होता है। 'अग्नि' जो उष्णता, ऊर्जा एवं प्रकाश आदि गुण विशिष्ट पदार्थ के रूप में देखा जाता है, वहीं 'अग्निदेव' के रूप में भी प्रतिष्ठित है। सामान्य प्राणी जिस प्रकार मुख- जिह्वा आदि अंगावयवों से युक्त हो भोजन आदि क्रियाएँ सम्पन्न करता है, उसी प्रकार अग्निदेव अपनी जिह्वाओं से आज्य आदि हव्य सामग्रियों को ग्रहण करते हैं- ऐसी प्रसिद्धि है। यह अग्नि का आधिदैविक-आलंकारिक स्वरूप है। 'अग्नि' की लपटें ही उसकी जिह्वाएँ हैं। पौराणिक ग्रन्थों के साथ ही उपनिषदों में भी अग्नि की सात जिह्वाओं (ज्वालाओं) का वर्णन मिलता है। मुण्डकोपनिषद् (१.२.४) में कहा गया है- काली कराली च मनोजवा च, सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिंगिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ अर्थात् काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुची-ये उस (अग्नि) की लपलपाती हुई सात जिह्वाएँ हैं। वस्तुतः ये जिह्वाएँ ही अग्नि की लपटें-ज्वालाएँ है। इनके नामों से लगता है कि ये लाल, धुएँ युक्त, चिनगारी युक्त आदि गुण विशिष्ट अग्नि की लपटें हैं। इन्हें अग्निदेव की सात जिह्वाएँ कहा गया है। इसी को आगे सात दीप्तियाँ भी कहा गया है- सप्तार्चिषः (मुण्ड०२.१.८)।

सप्तयज्ञ | परिशिष्ट | ४८३ २३५. सप्तयज्ञ - भारतीय संस्कृति में यज्ञ का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। वेदों-स्मृतियों में इसका विशद वर्णन प्राप्त होता है। इसी आधार पर यज्ञ के प्रमुखतः दो विभाग हैं- १. श्रौत यज्ञ, २. स्मार्त यज्ञ। इन दोनों विभागों के अन्तर्गत अनेकानेक प्रकार के यज्ञ आते हैं। यहाँ जिन सात यज्ञों का उल्लेख है, वे प्रायः दार्शनिक स्तर के हैं। मुण्डकोपनिषद् (२.१.८) में यह प्रकरण व्याख्यायित है- सप्ताचिंषः समिधः सप्त होमाः । सप्तहोम (यज्ञ) का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए शंकराचार्यजी लिखते हैं- सप्त होमास्तदविषयविज्ञानानि 'यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति (महानारायण० २५.१) इति श्रुत्यन्तरात्' अर्थात् सात होम यानी अपने विषयों के विज्ञान, जैसा कि 'इसका जो विज्ञान है, उसी को हवन करता है', इस अन्य श्रुति से सिद्ध होता है। यहाँ 'विषयों के विज्ञान' का तात्पर्य 'सप्तप्राण' (शीर्षस्थ इन्द्रियवर्ग) के विषयों का विशिष्ट ज्ञान है। इस विशिष्ट ज्ञान को जब आत्मलाभ-आत्मदर्शन के उद्देश्य से साधक होम्यता है- समर्पण करता है-त्यागता है, तो इसे ही सप्तयज्ञ या सप्तहोम कहा जाता है। यह दार्शनिक पहलू हुआ। इसका व्यावहारिक पहलू सात स्थूल यज्ञ वाला है- २ प्रातः-सायं का यज्ञ, १ दर्श (अमावस्या), १ पौर्णमास, १ चातुर्मास्य, १ आग्रयण, १ सांवत्सरिक- इस प्रकार कुल सात यज्ञ हुए। २३६. सप्तलोक - द्र०-लोक। २३७. सप्त समिधाएँ - यज्ञ में अग्नि को प्रदीप्त करने के लिए समिधाओं की आवश्यकता पड़ती है। यज्ञीय प्रयोग शास्त्रों में विशिष्ट समिधाओं का उल्लेख मिलता है, यथा- आम्र, पलाश, खदिर, उदुम्बर (गूलर) आदि। उपनिषदों में ऐसे उल्लेख प्रायः दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में ही पाये जाते हैं। मुण्डकोपनिषद् (२.१.८) में 'इन्द्रियों के विषय' के लिए 'समिधा' शब्द का प्रयोग है और इस प्रयोग का कारण बताया गया है कि 'इन्द्रिय वर्ग' अपने विषयों से ही समिद्ध-प्रदीप्त हुआ करते है। वस्तुतः यह प्रकरण सृष्टि प्रक्रिया के अन्तर्गत आया है, जिसमें कहा गया है कि उस (विराट्) पुरुष (ब्रह्म) से ही सात प्राण (शीर्षस्थ सात इन्द्रियाँ- २ नेत्र, २ श्रवण, २ घ्राण और १ रसना) उत्पन्न हुए हैं। उसी से सात किरणें (दीप्तियाँ), सात समिधा, सात होम और जिनमें वे संचार करते हैं, वे सात स्थान प्रकट हुए हैं- सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्ताचिंषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ आचार्य शंकर ने 'सप्त समिधः' का भाष्य करते हुए लिखा है-सप्त समिधः सप्त विषयाः, विषयैर्हि समिध्यन्ते प्राणाः अर्थात् सप्त समिधा-सात शीर्षस्थ इन्द्रियों-प्राणों के विषय हैं, क्योंकि इन विषयों से ही प्राण-इन्द्रिय वर्ग समिद्ध-प्रदीप्त-सक्रिय होते हैं। इस प्रकार 'सप्त समिधा' यहाँ दार्शनिक परिप्रेक्ष्य (नेत्र, श्रोत्र, घ्राण एवं रसना के विषय रूप, शब्द, गन्ध एवं रस के अर्थ) में प्रयुक्त है। २३८. समाधि - सामान्यतः चित्त की एकाग्रता को समाधि कहते हैं। चित्तवृत्तियाँ जब विकारों से रहित विशुद्ध अवस्था को प्राप्त होती हैं, यह समाधि योग तभी लगता है। ऐसी अवस्था में चित्त विक्षेपरहित हो जाता है और लक्ष्य विशेष में समाहित और स्थिर हो जाता है। ध्यान की पराकाष्ठा को भी समाधि कहा गया है। योग के आठ अंगों में अन्तिम अंग समाधि है। इसे योग का चरम फल भी कहते है। इसमें साधक अपने चित्त को बाह्य जगत् से मोड़कर आत्मा में स्थित कर लेता है, ऐसी अवस्था में वह विविध शक्तियों को धारण करता है और अन्त मे कैवल्य पद को प्राप्त होता है। योग दर्शन में समाधि के चार भेद बताये गये है- १. सम्प्रज्ञात, २. सवितर्क, ३. सविचार और ४. सानंद समाधि। हठयोग प्रदीपिका के अनुसार जैसे नमक जल में मिलने पर जल के समान हो जाता है, उसी प्रकार चित्त आत्मा के साथ मिलकर आत्मरूप हो जाता है। यह समाधि की पराकाष्ठा है- सलिले सैन्धवं यद्वत् साम्यं भजति योगतः । तथात्ममनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते (ह०प्र०४.५)। समाधि के प्रायः दो भेदों का निरूपण किया जाता है- १. सविकल्पक और २.निर्विकल्पक। जब साधक की चित्तवृत्ति अद्वितीय ब्रह्म में स्थिर हो जाती है, तब उसे कुछ काल के लिए अपने विषय मे, ब्रह्म के विषय में तथा ज्ञान के विषय में बोध बना रहता है। जब तक ध्याता, ध्यान और ध्येय के विषय में पृथक् प्रतीति होती रहती है, उसे सविकल्पक समाधि कहते हैं और जब साधक समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध कर एकीभाव (अद्वैत भाव) से ध्येय में अवस्थित हो जाता है, उसे निर्विकल्पक समाधि कहते हैं। उपनिषद् के अनुसार जो 'अहं ब्रह्मास्मि' का निश्चय करके निर्विकल्प समाधि में लीन रहकर परम स्वतंत्र और यति स्वरूप होता है, वह पुरुष संन्यासी, वही मुक्त कहलाता है- ब्रह्मैवाहमस्मीति निश्चित्य निर्विकल्पसमाधिना स्वतन्त्रो यतिश्चरति स संन्यासी स मुक्तः (निरा०३९)।

४८४ | [परिशिष्ट] | साम २३९. सम्भूति - द्र०-असम्भूति । २४०. सर्ग-प्रतिसर्ग - सर्ग का सामान्य अर्थ सृष्टि या संसार से लिया जाता है। जगत् की उत्पत्ति या मूल-उद्गम को भी सर्ग कहा गया है। इसके विपरीतार्थक रूप में जगत् के प्रलय को प्रतिसर्ग कहते हैं। पुराणों में सृष्टि और प्रलय अर्थात् सर्ग-प्रतिसर्ग का उल्लेख अनेक स्थानों पर हुआ है। महाभारत में विष्णु और शिव भगवान् के सहस्रनाम में सर्ग नाम उल्लिखित है। श्रीमद्भागवत पुराण (३.१०.१४-२६) में सर्ग का विस्तृत विवरण मिलता है। सृष्टि या कल्प के अर्थ में मनुस्मृति में भी सर्ग शब्द उपन्यस्त है-हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते। यद्यस्य सोऽदधात् सर्गे तत्तस्य स्वयमाविशत् (मनु०स्मृ०१.२९)। पुराणों के पाँच लक्षण, विषय या प्रकरण माने गये हैं- १. सर्ग (सृष्टि), २. प्रतिसर्ग अर्थात् सृष्टि का विस्तार, प्रलय और पुनः सृष्टि, ३. सृष्टि की आदि वंशावली, ४. मन्वन्तर और ५. वंशानुचरित। जगत् रचना के अन्तर्गत सृष्टि और प्रलय को सतत चलते रहने वाली परम्परा सर्ग-प्रतिसर्ग के रूप में वर्णित हुई है। उस ब्रह्म के संकोच से प्रलय तथा विकास से सृष्टि को रचना होती है- यत्संकोच विकासाभ्यां जगत्प्रलय सृष्टयः (महो०२.१०)। २४१. सविता - सूर्य, आदित्य, दिवाकर को ही सविता कहा गया है। इन्हें जगत् के रचयिता, उत्पादक या स्रष्टा भी कहा गया है। वैदिक साहित्य में ये देवता रूप में प्रख्यात हैं। सूर्य के उदय होने वाले रूप को सविता कहते हैं। सविता सबके उत्पत्ति कर्त्ता होने के रूप में प्रख्यात हैं-सवितारमाह सर्वस्य प्रसवितारम् (निरु०८.३१)। अमरकोश में सविता के पर्याय इस प्रकार हैं-भानुर्हंसः सहस्त्रांशुस्तपनः सविता रविः (अ०को०१.३.३१)। सविता द्युलोक में स्थित हैं। आदित्य ही सविता और द्युलोक सावित्री है-आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री (सावि०६)। सविता को देवों के भी उत्पत्तिकर्त्ता के रूप में स्वीकार किया गया है-सविता वै देवानां प्रसविता (जैमि०३.१८.३)। यही प्रजा का भरण-पोषण करने से 'भर्ग' कहलाता है। शत्रुओं का नाश करने से 'सूर्य', सबको उत्पन्न करने से सविता, सबको प्रकाश देने से 'आदित्य', सबको पवित्र करने से 'पवमान'और सबका अयन (आश्रय स्थान) होने से आदित्य कहलाता है-इमाः प्रजास्तस्माद्भर्गत्वाद्भर्गः। शश्वत्सूर्यमानत्वात्सूर्यः सवनात्सविताऽऽदानादादित्यः पवनात्पावमानोऽथायनादादित्यः (मैत्रा० ५.७)। २४२. साक्षात्कार - साक्षात्कार शब्द के पर्याय ज्ञान, अनुभूति, मिलन, प्रत्यक्ष दर्शन आदि उल्लिखित है। आत्म साक्षात्कार अथवा ब्रह्म साक्षात्कार के दिव्य लक्ष्य को पाने के अभीप्सु साधक उपासना, यज्ञ, दान आदि कर्म में निरत रहते हैं। 'अयमात्मा ब्रह्म' 'तत्त्वमसि' आदि वेदान्त महावाक्यों का चिन्तन करते हुए अनुभूति की अवस्था से होकर साधक ब्रह्म तत्त्व का साक्षात्कार करता है। वह अनुभव करने लगता है कि मैं ही नित्यशुद्धबुद्धमुक्त स्वभाव अद्वयरूप ब्रह्म हूँ। २४३. साक्षी - द्र० अन्तर्यामी । २४४. सांख्य - छः दर्शनों में एक दर्शन सांख्य दर्शन है, जिसके रचयिता महर्षि कपिल हैं। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति का सिद्धान्त निरूपित है। यह सृष्टि त्रिगुणात्मक (सत्त्व, रज, तम के योग से) विनिर्मित है। जगत् की उत्पत्ति का मूल यह प्रकृति ही है। पाँचों तत्त्व और ग्यारह इन्द्रियाँ- ये प्रकृति है। सृष्टि के चार प्रमुख विधान हैं- प्रकृति-विकृति, विकृति-प्रकृति और अनुभव। आत्मा को पुरुष कहा गया है। इसमें ईश्वर की सत्ता न मानकर पुरुष और प्रकृति दो तत्त्वों को ही प्रधान माना गया है। पुरुष जगत् से अनासक्त होते हुए भी प्रकृति के कार्यों में बँधा हुआ प्रतीत होता है, जब वह ज्ञान से इस बन्धन को दूर करके यथार्थ अनुभव प्राप्त कर लेता है, तो यही मोक्ष कहलाता है। गीता में विवेचित है कि कितने ही पुरुष ध्यान योग के द्वारा परमात्मा को अपने अन्तःकरण में देखते हैं, दूसरे सांख्य योग द्वारा और कितने ही कर्मयोग के द्वारा देखते हैं- ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे (गी० १३.२४)। २४५. साम - चारों वेदों में से एक वेद जिसका सम्बन्ध गायन से है, सामवेद कहलाया। मान्यता यह है कि वेद के पद्यबद्ध मन्त्रों को जब गायन विद्या से अनुप्राणित किया गया तो "सामवेद" बन गया। इसमें पद्य मन्त्रों की गान विद्या से जोड़ने से ज्ञान और भावना का सर्वोत्कृष्ट संयोग हुआ है। सामवेद के मन्त्रों को भी साम कहा गया है। साम की महत्ता गीता में भी प्रतिपादित हुई है, जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है- वेदानां सामवेदोऽस्मि। वेद है ज्ञान,

सालोक्य [परिशिष्ट] ४८५ साम है गान। इसलिए ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है- गायन्ति हि साम (शत०ब्रा०४.४.५.६)। वाणी को साम की प्रतिष्ठा कहकर निरूपित किया गया है-वाग्वाव साम्नः प्रतिष्ठा (जैमि० १.३९.३)। छान्दोग्योपनिषद् में साम की पञ्चविध उपासना का निर्देश है। ये पाँच प्रकार हैं- १. हिंकार, २. प्रस्ताव, ३.उद्गीथ, ४. प्रतिहार और ५. निधन- लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत। पृथिवी हिंकारः। अग्निः प्रस्तावः। अन्तरिक्षमुद्गीथः। आदित्यः प्रतिहारः। द्यौर्निधनम् (छान्दो०२.२.१)। २४६. सालोक्य— द्र०-पञ्चविध मुक्ति। २४७. सावित्री— गायत्री की लौकिक शक्ति 'सावित्री' कहलाती है, जिसका सम्बन्ध स्थूल जगत् की शक्तियों से है। पारलौकिक शक्ति या ब्रह्मविद्या को गायत्री और वर्चस् या तेजस् को सावित्री माना गया है। आदित्य सविता है, तो प्रकाशमान द्यौ सावित्री है- आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री (सावि० ६)। अग्नि सविता है, तो पृथिवी सावित्री है-अग्निरेव सविता पृथिवी सावित्री (सावि० १)। वरुण सविता है, तो आपः सावित्री है-वरुण एव सविता ऽऽपः सावित्री (सावि० २)। सावित्री को जानने वाला मृत्यु बन्धन से तर जाता है और उसी लोक को प्राप्त होता है-यो वा एतां सावित्रीमेवं वेदाऽप पुनर्मृत्युं तरति सावित्र्या एव सलोकतां जयति (जैमि०४.२८.६)। ब्रह्म से वायु, वायु से ओंकार, ओंकार से सावित्री, सावित्री से गायत्री और गायत्री से लोकों की उत्पत्ति होती है-ब्रह्मणो वायुः वायोरोंकारः ॐकारात्सावित्री सावित्र्या गायत्री गायत्र्या लोका भवन्ति (अ०शि०६)। २४८. सिद्धि —द्र०-ऋद्धि। २४९. सुषुप्ति —द्र०-जाग्रत्। २५०. सुषुम्ना नाड़ी— उपनिषद् ज्ञान के अनुसार हृदयरूपी केन्द्र से सम्पूर्ण शरीर में नाड़ियों का जाल बिखरा हुआ है। हृदय देश में १०१ नाड़ियाँ है। हर नाड़ी की सौ-सौ शाखाएँ हैं और उनमें प्रत्येक की बहत्तर-बहत्तर हजार प्रतिशाखाएँ है। इन सब नाड़ियों में व्यान वायु संचार करता है। इसे ही विज्ञानी नाड़ी संस्थान कहते है। हठयोग के अनुसार शरीर को तीन प्रधान नाड़ियों (इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना) में से एक सुषुम्ना नाड़ी है, जो नाभि के मध्य में इड़ा, दक्षिण भाग में पिंगला और मध्य में सुषुम्ना नाड़ी स्थित है। इसे त्रिगुणमयी अर्थात् सूर्य, चन्द्र और अग्निरूपिणी माना गया है। वैद्यक के अनुसार चौदह प्रधान नाड़ियों में से एक सुषुम्ना नाड़ी है, जो नाभि के मध्य स्थित है, जिससे अन्य सब नाड़ियाँ सम्बन्धित हैं। क्षुरिकोपनिषद् में सुषुम्ना नाड़ी का वर्णन दृष्टिगोचर होता है। सुषुम्ना परम तत्त्व में लीन है और विरजा (विशुद्ध) ब्रह्मरूपिणी है। वाम नाड़ी इड़ा और दक्षिण नाड़ी पिंगला के बीच जो उत्तम स्थान है, उसे (सुषुम्ना को) जो जानता है, वह वेदविद् कहा जाता है-सुषुम्ना तु परे लीना विरजा ब्रह्मरूपिणी। इडा तिष्ठति वामेन पिङ्गला दक्षिणेन तु। तयोर्मध्ये परं स्थानं यस्तं वेद स वेदवित् (क्षुरि०१६- १७)। ध्यानयोग से सब नाड़ियाँ छेदी जाती हैं, परन्तु एक सुषुम्ना नहीं छेदी जाती-छिद्यन्ते ध्यानयोगेन सुषुम्नैका न छिद्यते (क्षुरि०१८)। योग दर्शन में इस ऊर्ध्वगामिनी नाड़ी को कुण्डलिनी नाड़ी भी कहते है। २५१. सूक्ष्मद्रष्टा— अत्यन्त छोटी-छोटी बातें समझ लेने वाला, विशिष्ट बुद्धिमान्, ऋषि, परमेश्वर, शिव आदि को सूक्ष्मद्रष्टा कहा गया है। तीव्र या बेधक दृष्टि रखने वाले, सूक्ष्म विषय को समझने वाले, कुशाग्र बुद्धि वाले सूक्ष्मद्रष्टा रूप में मान्य है। वह आत्मा समस्त प्राणियों में छिपा होने के कारण प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल सूक्ष्मदर्शियों के द्वारा अतिसूक्ष्म बेधक दृष्टि से देखा जाता है-एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः (कठ०१.३.१२)। वह परमात्मा सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म, हृदयगुहा के गुहास्थान में स्थित है और वही सम्पूर्ण विश्व की रचना करने वाला तथा अनेक रूप धारण करने वाला है-सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् (श्वेता०४.१४)। २५२. सृष्टि-अतिसृष्टि— जगत् का आविर्भाव या संसार की उत्पत्ति को सृष्टि कहा जाता है। इस शब्द के अन्य पर्यायवाची शब्द हैं-उत्पत्ति, निर्माण, प्रकृति, उदारता, त्याग आदि। सृष्टि के आरम्भ में एक ही चेतन तत्त्व था, उसने इच्छा को कि मैं बहुत हो जाऊँ और प्रजा उत्पन्न करूँ-तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय (छान्दो०६.२.३)। वह ब्रह्म (परमेश्वर) ही जगत् का कारण है। वह सर्वज्ञ और सर्वविद् ईश्वर जिसका तप ज्ञानमय है, उसी से हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, नाम, रूप और अन्न आदि उत्पन्न होते हैं- यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं

४८६ [परिशिष्ट] स्वयम्भू-परिभू च जायते (मुण्ड०१.१.९)। उपनिषद् का कथन है कि जिससे ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसके सहारे जीवित रहते हैं और अन्त में जिसमें विलीन हो जाते हैं, वह ब्रह्म है-यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति (तैत्ति०३.१.१)। वह ब्रह्म जगत् की रचना कर उसमें अनुप्रविष्ट हो गया-तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् (तैत्ति०२.६.१)। कुछ विद्वानों का मत है कि भगवान् ने अपनी योगमाया से सृष्टि की रचना को। कुछ इसे जड़-चेतन के संयोग या पुरुष-प्रकृति के संयोग से उद्भूत मानते हैं। उत्कृष्ट सृष्टि या उत्कृष्ट रचना की अतिसृष्टि कहा गया है। २५३. सोऽहं— जीव और ब्रह्म की एकता या अभेदता को प्रदर्शित करने वाले अनेक वाक्य वेदान्त शास्त्र में दृष्टिगोचर होते हैं। जीव अज्ञान भाव से ग्रसित होकर अपने को ब्रह्म से पृथक् समझने लगता है। सोऽहं, शिवोऽहं, तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि प्रभृति वाक्यों के उपदेश वेदान्त शिक्षा में मिलते हैं। ये भाव अनुभूति के स्तर पर आने से ही इनसे अज्ञान तिमिर का नाश होता है। सोऽहं साधना से साधक को 'जीवो ब्रह्मैव नापरः' तथ्य का बोध हो जाता है। वह चैतन्य ईश्वर 'सोऽहं' स्वरूप में एक होते पर भी शरीरों की भिन्नता के कारण वह 'जीव' बहुविध बन जाता है- सोऽहमेकोऽपि देहारम्भक भेदवशाद्बहुजीवः (निरा०५)। यह देह ही देवालय है, उसमें जीव केवल शिव ही है। जब मनुष्य का अज्ञानरूप निर्माल्य दूर हो जाता है, तब 'सोऽहं' भाव से उसको पूजना चाहिए- देहो देवालयः प्रोक्तः स जीवः केवलः शिवः। त्यजेदज्ञान निर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत् (स्क०१०)। २५४. स्तोम— स्तोम शब्द के पर्यायवाची शब्द हैं-स्तुति, गुणगान, यज्ञ, समूह, राशि। वैदिक संहिताओं में प्रायः देवों के प्रति स्तोम ही संगृहीत हैं। साम गान के अन्तर्गत स्तुतिपरक छन्दों को स्तोम कहा गया है। इस तथ्य की पुष्टि निम्न प्रतिपादन से होती है-यद्यूचि तद्गेथा३ इति स्तोमो वा एष तस्य साम्नो यद्गयं सामोपास्मह इति (जैमि०१.४३.६)। स्तोम को प्रतिहार और छन्द को निधनरूप माना गया है-ऋचः प्रस्तावं सामान्युद्गीथं स्तोमं प्रतिहारं छन्दो निधनम् (जैमि०१.१३.३)। २५५. स्थितता— अपने ही हृदय की दिव्य भावनाओं में सन्तुष्ट एवं शान्त बने रहने वाले साधक को स्थिति को 'स्थितता' कहा जा सकता है। ऐसा साधक किसी भी भौतिक लिप्सा-लालसा से दूर रहता है और किसी भी बाह्य सुख की अपेक्षा नहीं करता। उपनिषद् में जनक-याज्ञवल्क्य संवाद में राजा जनक पूछते हैं-हे याज्ञवल्क्य! स्थितता क्या है? हे सम्राट्! हृदय ही स्थितता है-ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा (बृह०४.१.७)। स्थिर प्रज्ञा या बुद्धि वाले साधकों को गीता में स्थितप्रज्ञ या स्थितधी कहकर निरूपित किया गया है। गीता के अनुसार जब साधक मन में स्थित कामनाओं को त्याग देता है, तब आत्मा से हो आत्मा में सन्तुष्ट हुआ वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है-प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञः तदोच्यते (गी०२.५५)। २५६. स्वधा— द्र०-स्वाहा। २५७. स्वप्न— निद्रावस्था में कुछ मूर्तियों, चित्रों, व्यक्तियों और विचारों आदि का सम्बद्ध या असम्बद्ध श्रृंखला का मन में आना या कोई घटना आदि दिखाई देना स्वप्न कहलाता है। ऋग्वेद तथा अन्य संहिताओं में स्वप्न का उल्लेख हुआ है। ऋ०२.५८.१० में दुःस्वप्न का वर्णन है। ब्रह्मवैवर्त पुराण (अ० ७७) में शुभाशुभ स्वप्नफल का विस्तृत वर्णन है। रात्रि में स्वप्नावस्था में पितृराज मनुष्यों में प्रविष्ट होते हैं-अश्मसु सोमो राजा निशायां पितृराजः स्वप्ने मनुष्यान् प्रविशसि पयसा पशून् (जैमि०४.५.२)। जाग्रत् अवस्था और उसके अधिष्ठाता की स्थिति नेत्र के भीतर है। स्वप्न और उसके अधिष्ठाता तैजस का कण्ठ में समावेश है। सुषुप्ति और उसके अधिष्ठाता प्राज्ञ हृदय में स्थित हैं और तुरीय परमात्मा मूर्धा (मस्तिष्क) में स्थित हैं- नेत्रस्थं जागरितं विद्यात् कण्ठे स्वप्नं समाविशेत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्नि संस्थितम् (ना०प०५.२५)। जैसे स्वच्छ दर्पण में वस्तु स्पष्ट दीखती है, वैसे शुद्ध अन्तःकरण में परमात्मा के दर्शन होते हैं। जैसे स्वप्न में वस्तु अस्पष्ट दीखती है, वैसे ही पितृलोक में परमात्मा - यथाऽऽदर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके (कठ०२.३.५)। २५८. स्वयम्भू-परिभू— स्वयम्भू का शाब्दिक अर्थ है, जो स्वयं उत्पन्न हुआ हो-ब्रह्मा,विष्णु,शिव,बुद्ध,कामदेव आदि देवों को स्वयम्भू कहा गया है। यह शब्द ईश्वर के विशेषण रूप में प्रयुक्त होता है। इसी रूप में 'परिभू' शब्द भी है, जिसका अर्थ है-जो चारों ओर से आच्छादित किये हो। प्रथम मनु को भी स्वयम्भू या स्वयम्भुव कहा गया है।

स्वर्ग्य अग्नि [परिशिष्ट] ४८७ २५९. स्वर्ग्य अग्नि— स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाली अग्निविद्या को कठोपनिषद् में स्वर्ग्य अग्नि कहा गया है। यह अग्नि- विद्या यमराज ने नचिकेता को प्रदान की। नचिकेता ने दूसरे वर के रूप में यही माँगा था-स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् (१.१.१३)। यमराज ने इस स्वर्ग्य अग्नि को नाचिकैताग्नि नाम प्रदान किया। इसका तीन बार अनुष्ठान करने वाला ऋक्, यजु, साम तीनों से सम्बन्ध जोड़कर यज्ञ, दान, तप रूप त्रिकर्म करने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु से तर जाता है-त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू (कठ०१.१.१७)। २६०. स्वस्ति— स्वस्ति शब्द के पर्याय कुशल-क्षेम, शुभकामना, कल्याण, आशीर्वाद आदि हैं। वैदिक संहिताओं में कई सूक्त माङ्गलिक पाठ या स्वस्ति पाठ के हैं, इन्हें स्वस्तिवाचन कहते हैं। सोम देवता से कल्याण करने की प्रार्थना की गई है-सोमः स्वस्त्या (तै०ब्रा०१.४.८.६)। ब्राह्मण से भी कल्याण की कामना की जाती है-नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मे (कठ०१.१.९)। उपनिषद् का निर्देश है कि परमात्मा का ओम् अक्षर के द्वारा स्मरण करो। अज्ञानमय अन्धकार से परे भवसागर के पार होने के लिए तुम्हारा कल्याण हो-ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् (मुण्ड०२.२.६)। संन्यासी सब जीवों का कल्याण हो, इस भाव से परमात्मा का अनन्य स्मरण करते हुए विचरण करे-स्वस्ति सर्वजीवेभ्य इत्युक्त्वाऽऽत्मानमनन्यं ध्यायन् (क०रु०४)। २६१. स्वाहा-स्वधा— स्वाहा का शाब्दिक अर्थ 'स्व+आ+हा' अपना सम्यक् रूप से त्याग या विसर्जन है। यज्ञ में याजक स्वाहा शब्द के उच्चारण के साथ आहुतियाँ देते हैं, हव्य पदार्थ विसर्जित करते हैं, इसे स्वाहाकार कहते हैं। पितरों को श्रद्धापूर्वक भोज्य पदार्थ पिंड या जल अर्पित करते समय स्वधा शब्द का उच्चारण करते हैं, इसे स्वधाकार कहते हैं। निरुक्तकार यास्क ने स्वाहा शब्द के व्युत्पत्तिपरक अर्थ इस प्रकार दिये हैं-स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा, स्वाहुतं हविर्जुहोति ('स्वाहा' इस शब्द का सु=सुन्दर, आह=कथन तथा स्व=स्वत्व=आ= भली प्रकार, हा = समर्पण अर्थात् आहुति के रूप में सम्यक् समर्पण) (नि०८.२०)। पितर स्वधारूपी अन्न से ही आयु (जीवन) पाते हैं- स्वधो वै पितॄणामन्नम् (शत०ब्रा० १३.८.१.४), पितर आयुष्यन्तस्ते स्वधयायुष्मन्तः (तै०सं०२.३.१०.४), स्वधां पितृभ्यः (आगायानि) (छान्दो० २.२२.२)। उपनिषद् में वाणी को धेनुरूप मानकर उसके चार स्तन स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार उपन्यस्त हैं- वाचं धेनुमुपासीत। तस्याश्चत्वारः स्तनाः-स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारः। तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति, स्वाहाकारं च वषट्कारञ्च। हन्तकारं मनुष्याः। स्वधाकारं पितरः (बृह० ५.८.१)। पुराणों में स्वाहा और स्वधा को अग्निदेव को दो पत्नियां माना गया है। देवों तक आहुति पहुँचाने का कार्य 'स्वाहा' तथा पितरों तक 'स्वधा' करती हैं- ऐसी प्रसिद्धि है। २६२. हंस-परमहंस— हंस झीलों में रहने वाला एक जल पक्षी है। मान्यता है कि यह दूध में से पानी अलग कर देता है। ब्रह्म, आत्मा तथा प्रकाश स्वरूप जीवात्मा को भी हंस कहकर निरूपित किया गया है। अपने परम आराध्य या इष्ट, महात्मा, गुरु को भी आदर भाव से परमहंस कहा जाता है। इसे अध्यात्म तथा साहित्य क्षेत्र में नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक माना गया है। सबके जीवन आधार और सबके आश्रयरूप विस्तृत ब्रह्मचक्र (व्यवस्था) में हंस रूप जीवात्मा भ्रमण करता रहता है-सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे (श्वेता० १.६)। वह हंस रूप परमात्मा ज्योतिर्मय परमधाम में रहने वाला है-हंसः शुचिषद (कठ० २.२.२)। उपनिषद् में परमात्मतत्त्व ही हंस के रूप में वर्णित है-जो इस हृदय में स्थित अनाहत ध्वनियुक्त प्रकाशयुक्त चिदानन्द हंस को जानता है, वह हंस ही कहा जाता है-अनाहतध्वनियुतं हंसं यो वेद हृद्गतम्। स्वप्रकाशचिदानन्दं स हंस इति गीयते (ब्र०बि० २०-२१)। आदित्य को भी हंस कहा गया है-एष (आदित्यः) वै हंसः शुचिषद् (ऐत० ब्रा०४.२०)। संन्यासियों की चार श्रेणियाँ मानी गई हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस। हंस शब्द का आशय है-सद् और असद् के विवेक को शक्ति से परिपूर्ण आत्मा। जिस आत्मा का परम विकास हो गया हो, उसे परमहंस कहा गया है। २६३. हन्तकार — द्र०- वषट्कार । २६४. हय — द्र०-अश्व। २६५. हर्ष-शोक - प्रिय या इष्ट वस्तु या व्यक्ति से उत्पन्न होने वाला सुखात्मक भाव हर्ष कहलाता है। इसका पर्याय आनंद, प्रसन्नता, रोमांच, कामोत्तेजना आदि है। इसके विपरीत अर्थ में 'शोक' शब्द का प्रयोग होता है। साधक साधना पथ से परमात्मा के निकट बढ़ने पर हर्ष को और उससे दूर होने पर शोक को प्राप्त होता है। उस परमात्मा को विवेकवान् पुरुष अध्यात्म योग के द्वारा समझकर हर्षशोक को त्याग देता है - अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं

४८८ (परिशिष्ट) होता मत्वाधीरो हर्षशोकौ जहाति (कठ० १.२.१२)। किसी इष्ट वस्तु अथवा प्रिय व्यक्ति के वियोग अथवा मृत्यु से उत्पन्न भारी मानसिक व्यथा अथवा विषादजन्य स्थिति को शोक कहा जाता है। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, जीवात्मा बार-बार जन्मने और मरने वाला है, सो उसका शोक करना उचित नहीं-अथ चैनं नित्यजातं, नित्यं वा मन्यसे मृतम्। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि (गी० २.२६)। २६६. हिरण्यगर्भ— ऐसी मान्यता है कि इस सृष्टि में सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ (स्वर्णिम या ज्योतिर्मय अण्ड या गर्भ) रूप प्रजापति ब्रह्मा उत्पन्न हुए, उन्हीं से समस्त सृष्टि का विस्तार हुआ। कहीं-कहीं हिरण्यगर्भ शब्द भगवान् विष्णु और आत्मा के लिए भी प्रयुक्त हुआ है। सृष्टि संरचना की परिकल्पना करते हुए परमात्मा की एक शक्ति की कल्पना की गयी। सृजन करने वाली इस शक्ति को पुरुष, विश्वकर्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति और ब्रह्मा आदि की संज्ञाएँ दी गयीं। भागवत पुराण में वर्णन मिलता है कि सृष्टि के आदि में भगवान् नारायण की प्रेरणा से ब्रह्माण्ड स्वर्ण जैसा प्रकाशमान गोलाकार अण्ड रूप में प्रकट हुआ था। उसके ऊर्ध्व और अधः दो भाग हो गये। उसी के बीच से ब्रह्मा जी प्रकट हुए। सम्पूर्ण विश्व की सृष्टि करने वाले, प्राणियों के ईश्वर रूप में यह मान्यता है-एष हि खल्वात्मेशानः शम्भुर्भुवो रुद्रः प्रजापतिर्विश्वसृग्धिरण्यगर्भः (मैत्रा० ५.८)। उस विराट् परमेश्वर ने सबसे पहले हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया था-हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु (श्वेता० ३.४)। २६७. हुत-प्रहुत— हवनीय द्रव्य को हवि, हविष्य या हुत कहते हैं। हवनादि कृत्य के लिए प्रयुक्त खाद्यान्न तिल, चावल, जौ आदि तथा घृत ये हुत के पर्याय हैं। यह यज्ञीय पदार्थ देवों का अन्न या देवात्र कहलाता है। देवों के लिए ही भोज्य पदार्थ या बलि अर्पित करना प्रहुत कहलाता है। उपनिषद् का कथन है कि परमात्मा ने दो अन्न देवों को बाँटे-वे हुत और प्रहुत हैं, इसलिए लोग देवों के लिए आहुति और बलि अर्पित करते हैं- द्वे (अन्ने) देवानभाजयदिति। हुतं च प्रहुतं च। तस्माद् देवेभ्यो जुह्वति च प्र च जुह्वति (बृह० १.५.२)। २६८. हृदय गुहा— प्रत्येक जीव या मनुष्य की हृदय गुहा में परम पुरुष परमात्मा का निवास है, ऐसी प्रसिद्धि है। प्रजापति आदि सम्पूर्ण देवताओं का निवास हृदय में माना गया है- एष प्रजापतिर्यद्धृदयम्। एतद्ब्रह्म (बृह० ५.३.१), हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिताः (अ०शि०४३)। देवी अदिति प्राणों के सहित हृदय गुहा में प्रवेश करके वहीं रहती है- या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत (कठ० २.१.७)। वह परमात्मा अन्नमय स्थूल शरीर में हृदयगुहा के आश्रय में प्रतिष्ठित है- प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय (मुण्ड०२.२.७), एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा (श्वेता० ६.११)। वास्तविक धर्म का-ज्ञान का तत्त्व हृदय गुहा में स्थित माना जाता है- धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् (महा०वनपर्व ३१३.११७)। २६९. हृदय ग्रन्थि— हृदय ग्रन्थि का सामान्य अर्थ है- हृदय की गाँठ। द्वेष, कपट, कुटिलता के अर्थ में यह लिया जाता है। सम्मोह या अविद्या से उत्पन्न होने वाले आन्तरिक विकार जो गाँठों की तरह न सुलझने वाले होते हैं और अन्तर् में पीड़ा देते रहते हैं, ये हृदय ग्रन्थियाँ कहे जाते हैं। विषय-विकारों, वासनाओं, इच्छाओं, तृष्णाओं को बन्धनरूप माना गया है, सो इन्हें भी हृदय ग्रन्थियों के रूप में माना जाता है। कठोपनिषद् का कथन है कि जब हृदय की सब ग्रन्थियाँ भली-भाँति खुल जाती हैं, तब मनुष्य अमरत्व को प्राप्त करता है-यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम् (कठ० २.३.१५)। मुण्डकोपनिषद् में कहा गया है कि जब परम तत्त्व (परब्रह्म) का साक्षात्कार हो जाता है, तो हृदयग्रन्थि खुल जाती है और सारे भ्रम-सन्देह दूर हो जाते हैं। समस्त प्रारब्ध कर्म क्षीण हो जाते हैं और अन्ततः वह (जीवात्मा) मुक्त हो जाता है-भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे (मुण्ड० २.२.८)। २७०. होता— यज्ञ कर्त्ता या यज्ञ कराने वाले पुरोहित को होता कहा गया है। यज्ञ में मन्त्रोच्चारण करने वाला ऋत्विक् 'होता' रूप में मान्य है। यज्ञ में प्रमुख चार ऋत्विकों में एक 'होता' है- ब्रह्मा, अध्वर्यु, होता और उद्गाता-इन चारों ऋत्विकों के तीन-तीन सहयोगी मिलाने से कुल सोलह ऋत्विक् बड़े यज्ञों में होते थे। होता के तीन सहयोगी मैत्रावरुण, अच्छावाक् और ग्रावस्तुत् कहलाते हैं। अग्निदेव यज्ञ सम्पन्न करते हैं, सो उन्हें भी होता कहकर निरूपित किया गया है- अग्निर्वेव होताऽऽसीत् (जै०ब्रा० ३.३७४)। अमरकोश (२.७.१७) के अनुसार ऋग्वेदवेत्ता 'होता' कहा जाता है। यज्ञ में यह ऋग्वेद के मंत्रों का पाठ करता है तथा देवों की स्तुति और आवाहन करता हैं।

मन्त्रानुक्रमणिका-ज्ञान खण्ड

{|l l|l l|} \hline मन्त्र-प्रतीक & उपनिषद् विवरण & मन्त्र प्रतीक & उपनिषद् विवरण

\hline ॐअस्य श्री महावाक्य० & शु०२० २० & अत्र यजमानः ..... वसवः & छान्दो० २.२४.६

ॐ अकारो दक्षिणः & ना०बि० १ & अत्रैते श्लोका & मैत्रा० ४ (क)

अकर्मेति च .....यत्तदकर्म & निरा० १२ & अत्रैष देवःस्वप्ने & प्रश्न० ४.५

अग्नये स्वाहेत्यग्रौ हुत्वा & बृह० ६.३.३ & अत्यस्यंतं ..... पादौ & छान्दो० ५.१७.२

अग्निरेव सविता & गाय० ३.२ & अत्यस्यंतं ..... प्राणस्त्वेष & छान्दो० ५.१४.२

अग्निर्मूर्धा चक्षुषी & मुण्ड० २.१.४ & अत्यस्यंतं ..... बस्तिस्त्वेष & छान्दो० ५.१६.२

अग्नियंत्राभिमथ्यते & श्वेता० २.६ & अत्यस्यंतं ..... मूर्धा त्वेष & छान्दो० ५.१२.२

अग्निर्यथैको & कठ० २.२.९ & अत्यस्यंतं ..... संदेहस्त्वेष & छान्दो० ५.१५.२

अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं & ऐत० १.२.४ & अथ कबन्धी कात्यायन & प्रश्न० १.३

अग्निर्हिङ्कारो वायुः & छान्दो० २.२०.१ & अथ कर्मणामात्मेत्येतेदषा... & बृह० १.६.३

अग्निष्टे पादं वक्तेति & छान्दो० ४.६.१ & अथ किमेतैर्वा .... गन्धर्वा... & मैत्रा० १.६

अग्ने नय सुपथा & ईश० १८ & अथ किमेतैर्वा .... महाधनुर्धरा.. & मैत्रा० १.५

अग्राह्यमिति.... ग्राह्यात् & निरा० ३८ & अथ किमेतैर्वा शोषणम् & मैत्रा० १.७

अघोषमव्यञ्जनमस्वरम् & अमृ० २५ & अथ खलु..... असौ & छान्दो० १.५.१

अङ्गहीनानि वाक्यानि & शु०२० १६ & अथ खलु व्यानमेवोद्गीथम् & छान्दो० १.३.३

अङ्गुष्ठमात्रः & श्वेता० ३.१३ & अथ खलु.... होतृ.... & छान्दो० १.५.५

अङ्गुष्ठमात्रः.... ज्योतिः & कठ० २.१.१३ & अथ खलूद्गीथाक्षराणि & छान्दो० १.३.६

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो & कठ० २.३.१७ & अथ खल्वमुमादित्यः & छान्दो० २.९.१

अङ्गुष्ठमात्रः...... मध्य & कठ० २.१.१२ & अथ खल्वात्मसंमितम् & छान्दो० २.१०.१

अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः & श्वेता० ५.८ & अथ खल्वाशीः & छान्दो० १.३.८

अच्युतोऽस्मि महादेव & स्कन्द० १ & अथ खल्वियम् & मैत्रा० २.३

अजात इत्येवम् & श्वेता० ४.२१ & अथ खल्वेतयर्चा पच्छ & छान्दो० ५.२.७

अजामेकां लोहित..... & श्वेता० ४.५ & अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा & बृह० १.३.१४

अजा हिङ्कारोऽवयः & छान्दो० २.१८.१ & अथ जुहोति नमः & छान्दो० २.२४.१४

अजीर्यताममृतानामुपेत्य & कठ० १.१.२८ & अथ जुहोति नमोऽग्नये & छान्दो० २.२४.५

अज्ञानजन बोधार्थं & ना०बि० २९ & अथ जुहोति नमो वायवे & छान्दो० २.२४.९

अज्ञानं चेति & ना०बि० २६ & अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य & छान्दो० ३.११.१

अज्ञानमिति .... ज्ञानमज्ञानम् & निरा० १४ & अथ तथा मुद्गलोपनिषदि & मुद्ग० २.१

अणिमाद्यष्टैश्च .... बन्धः & निरा० २१ & अथ त्रयो वाव लोकाः & बृह० १.५.१६

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा & श्वेता०३.२० & अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ & छान्दो० ५.२.६

अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य & कठ०१.२.२० & अथ भगवाञ्छाकायन्यः & मैत्रा० २.१

अतः समुद्रा गिरयश्च & मुण्ड० २.१.९ & अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा & बृह० १.३.१६

अतीन्द्रियं गुणातीतं & ना०बि० १८ & अथ महावाक्यानि & शु०२० २२

अतो यान्यन्यानि & छान्दो० १.३.५ & अथ य आत्मा स सेतु & छान्दो० ८.४.१

अत्र पिताऽपिता भवति & बृह० ४.३.२२ & अथ य इच्छेत्पुत्रो मे कपिलः & बृह० ६.४.१५

अत्र यजमानः .... रुद्रा & छान्दो० २.२४.१० & अथ य इच्छेत्पुत्रो मे पण्डितो & बृह० ६.४.१८

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मन्त्रानुक्रमणिका ४९० मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण अथ य इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो बृह० ६.४.१६ अथ यदि सखिलोक छान्दो० ८.२.५ अथ य इच्छेद्दुहिता मे बृह० ६.४.१७ अथ यदि सामतो छान्दो० ४.१७.६ अथ य इमे ग्रामे छान्दो० ५.१०.३ अथ यदि स्त्रीलोक कामो छान्दो० ८.२.९ अथ य एतदेवम् छान्दो० ५.२४.२ अथ यदि स्वसृलोक कामो छान्दो० ८.२.४ अथ य एतदेवं विद्वान् छान्दो० १.७. ७ अथ यदु चैवास्मिञ्छ्रव्यं छान्दो० ४.१५.५ अथ य एष सम्प्रसादो० छान्दो० ८.३.४ अथ यदूर्ध्वं मध्यम् छान्दो० २.९.६ अथ य एषोऽन्तरक्षिणि छान्दो० १.७.५ अथ यदूर्ध्वमपराह्नात् छान्दो०२.९.७ अथ य एषो बाह्या मैत्रा० २.२ अथ यदेतदक्षणः शुक्लम् छान्दो० १.७.४ अथ य एषोऽन्तरे मैत्रा० ५.२ अथ यदेतदादित्यस्य छान्दो० १.६.५ अथ यच्चतुर्थममृतम् छान्दो० ३.९.१ अथ यदेवैतदादित्यस्य छान्दो० १.६.६ अथ यत्तदजायत छान्दो० ३.१९.३ अथ यद्द्वितीयममृतं छान्दो० ३.७.१ अथ यत्तपो दानम् छान्दो० ३.१७.४ अथ यद्धसति छान्दो० ३.१७.३ अथ यत्तृतीयममृतम् छान्दो० ३.८.१ अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते छान्दो० ८.५.१ अथ यत्पञ्चमममृतम् छान्दो० ३.१०.१ अथ यद्यन्नपानलोक कामो छान्दो० ८.२.७ अथ यत्प्रथमास्तमिते छान्दो० २.९.८ अथ यद्यप्येनानुक्रान्त० छान्दो० ७.१५.३ अथ यत्प्रथमोदिते छान्दो० २.९.३ अथ यद्युदक आत्मानम् बृह० ६.४.६ अथ यत्रैतत्पुरुषः छान्दो० ६.८.५ अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत छान्दो० २.२२.४ अथ यत्रैतदबलिमानम् छान्दो० ८.६.४ अथ यस्य जायामर्तवम् बृह० ६.४.१३ अथ यत्रैदस्माच्छरीराद् छान्दो० ८.६.५ अथ यस्य जायायै बृह० ६.४.१२ अथ यत्रैतदाकाशम् छान्दो० ८.१२.४ अथ य...... हृत्पुष्कर मैत्रा० ५.२ अथ यत्रोपाकृते छान्दो० ४.१६.४ अथ या एता हृदयस्य छान्दो० ८.६.१ अथ यत्सङ्गववेलाया छान्दो० २.९.४ अथ यां चतुर्थीम् छान्दो० ५.२२.१ अथ यत्सत्रायणमित्याचक्षते छान्दो० ८.५.२ अथ यां तृतीयाम् छान्दो० ५.२१.१ अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने छान्दो० २.९.५ अथ यां द्वितीयाम् छान्दो० ५.२०.१ अथ यथेयं कौत्सायनी मैत्रा० ४.४ (ठ) अथ यानि चतुश्चत्वारि छान्दो० ३.१६.३ अथ यदतः परो छान्दो० ३.१३.७ अथ यान्यष्टाचत्वारि छान्दो० ३.१६.५ अथ यदनाशकायनामित्या छान्दो० ८.५.३ अथ यां पञ्चमीम् छान्दो० ५.२३.१ अथ यदवोच ० छान्दो० ३.१५.७ अथ यामिच्छेद्दधीतेति बृह० ६.४.११ अथ यदवोचं भुवः छान्दो० ३.१५.६ अथ यामिच्छेत्र गर्भंदधीत बृह० ६.४.१० अथ यदवोचं भूः छान्दो० ३.१५.५ अथ ये चास्येह छान्दो० ८.३.२ अथ यदश्नाति छान्दो० ३.१७.२ अथ ये यज्ञेन दानेन बृह० ६.२.१६ अथ यदा सुषुप्तो भवति बृह० २.१.१९ अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मय छान्दो० ३.२.१ अथ यदास्य वाङ् छान्दो० ६.१५.२ अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो छान्दो० ३.३.१ अथ यदि गन्धमाल्य छान्दो० ८.२.६ अथ येऽस्योदञ्चो छान्दो० ३.४.१ अथ यदि गीतवादित्र छान्दो० ८.२.८ अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता छान्दो० ३.५.१ अथ यदि तस्याः कर्ता छान्दो० ६.१६.२ अथ योऽयमूर्ध्वा मैत्रा० २.७ अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे छान्दो० ८.१.१ यो वेदेदं मन्वानीति छान्दो० ८.१२.५ अथ यदि द्विमात्रेण प्रश्न० ५.४ अथ योऽस्य दक्षिणः छान्दो० ३.१३.२ अथ यदि महज्जिगमिषेद् छान्दो० ५.२.४ अथ योऽस्य प्रत्यङ् सुषिः छान्दो० ३.१३.३ अथ यदि भ्रातृलोक कामो छान्दो० ८.२.३ अथ योऽस्योदङ् सुषिः छान्दो० ३.१३.४ अथ यदि मातृलोक छान्दो० ८.२.२ अथ योऽस्योर्ध्वः छान्दो० ३.१३.५ अथ यदि यजुष्टो छान्दो० ४.१७.५ अथ रहस्योपनिषद्.... शु०र० ३०

४११ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण मन्त्र प्रतीक उपनिषद् विवरण अथ रूपाणां चक्षुः बृह० १.६.२ अथ हैनमुद्गातोपससाद छान्दो० १.११.६ अथर्वणे यां प्रवदेत मुण्ड० १.१.२ अथ हैनमुद्दालक आरुणिः बृह० ३.७.१ अथ वंशः । पौतिभाषी बृह० ६.५.१ अथ हैनमुषस्तश्चाक्रा० बृह० ३.४.१ अथ वंशः पौतिमाष्यात् बृह० ४.६.१ अथ हैनमुषभोऽभ्युवाद छान्दो० ४.५.१ अथ वंशः पौतिमाष्यो बृह० २.६.१ अथ हौनं यजमान उवाच छान्दो० १.११.१ अथ वायुमब्रुवन् केन० ३.७ अथ हौनं वागुवाच छान्दो० ५.१.१३ अथ श्रोत्रमन्ववहत्तद्यदा बृह० १.३.१५ अथ हौनं विदग्धः शाकल्यः बृह० ३.९.१ अथ सप्तविधस्य वाचि छान्दो० २.८.१ अथ हौनं शैब्यः प्रश्नो० ५.१ अथ ह चक्षुरुद्गीथम् छान्दो० १.२.४ अथ हौनं श्रोत्रमुवाच छान्दो० ५.१.१४ अथ ह चक्षुरूचुस्त्वम् बृह० १.३.४ अथ हौनं सुकेशा प्रश्नो० ६.१ अथ ह प्राण उच्चिक्रमिष छान्दो० ५.१.१२ अथ हौनं सौर्यायणी प्रश्नो० ४.१ अथ ह प्राणं उत्क्रमि- बृह० ६.१.१३ अथ होवाच जनः शार्क छान्दो० ५.१५.१ अथ ह प्राणमन्ववहत् बृह० १.३.१३ अथ होवाच बुडिलमाश्व छान्दो० ५.१६.१ अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न बृह० १.३.३ अथ होवाच ब्राह्मणाः बृह० ३.९.२७ अथ ह प्राणा अह१ श्रेयसि छान्दो० ५.१.६ अथ होवाच सत्ययज्ञम् छान्दो० ५.१३.१ अथ ह मन उद्गीथम् छान्दो० १.२.६ अथ होवाचेन्द्र द्युम्नम् छान्दो० ५.१४.१ अथ ह मन ऊचुस्त्वम् बृह० १.३.६ अथ होवाचोद्दालकम् छान्दो० ५.१७.१ अथ ह य एतानेवम् छान्दो० ५.१०.१० अथात आत्मादेश एवा छान्दो० ७.२५.२ अथ ह य एवायं मुख्यः छान्दो० १.२.६ अथातः पवमानानामे० बृह० १.३.२८ अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे बृह० ४.५.१ अथातः शौव उद्गीथः छान्दो० १.१२.१ अथ ह वाचक्रव्युवाच बृह० ३.८.१ अथातः सम्प्रत्तिर्यदा बृह० १.५.१७ अथ ह वाचमुद्गीथम् छान्दो० १.२.३ अथातो रहस्योपनिषदम् शु०२० १ अथ ह शौनकं च छान्दो० ४.३.५ अथातो व्रतमीमा १ सा बृह० १.५.२१ अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वम् बृह० १.३.५ अथात्मनेऽन्नाद्यमागा० बृह० १.३.१७ अथ ह श्रोत्रमुद्गीथम् छान्दो० १.२.५ अथादित्य उदयन् प्रश्नो० १.६ अथ ह हंसो निशायाम् छान्दो० ४.१.२ अथाधिदैवतं ज्वलिष्यामि बृह० १.५.२२ अथ हाग्नयः समूदिरे छान्दो० ४.१०.४ अथाधिदैवतं य एवासौ छान्दो० १.३.१ अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव छान्दो० ८.९.१ अथाध्यात्मं अधरा तैत्ति० १.३.४ अथ हेममासन्यम् बृह० १.३.७ अथाध्यात्मं प्राणो वाव छान्दो० ४.३.३ अथ हौनं कहोलः बृह० ३.५.१ अथाध्यात्ममिदमेव मूर्तम् बृह० २.३.४ अथ हौनं कौसल्यः प्रश्नो० ३.१ अथाध्यात्मं य एवायम् छान्दो० १.५.३ अथ हौनं गार्गी वाच० बृह० ३.६.१ अथाध्यात्मं यदेतद् केन० ४.५ अथ हौनं गार्हपत्यो० छान्दो० ४.११.१ अथाध्यात्मं वागेवर्वाणः छान्दो० १.७.१ अथ हौनं जारत्कारव बृह० ३.२.१ अथानु किमनुशिष्टः छान्दो० ५.३.४ अथ हौनं प्रतिहर्तोपससाद छान्दो० १.११.८ अथानेनैव ये चैतस्मात् छान्दो० १.७.८ अथ हौनं प्रस्तोतोपससाद छान्दो० १.११.४ अथान्यत्राप्युक्तं-अथखलु मैत्रा० ५.४ अथ हौनं भार्गवो प्रश्नो० २.१ अथान्यत्राप्युक्तं - महानदी- मैत्रा० ४.२ अथ हौनं भुज्युर्लाह्यायनिः बृह० ३.३.१ अथान्यत्राप्युक्तं - यः कर्ता मैत्रा० ३.३ अथ हौनं मनुष्या ऊचुः बृह० ५.२.२ अथान्यत्राप्युक्तं - शरीरमिदं मैत्रा० ३.४ अथ हौनमन्वाहार्यपचनो छान्दो० ४.१२.१ अथान्यत्राप्युक्तं - संमोहो मैत्रा० ३.५ अथ हौनमसुरा ऊचुः बृह० ५.२.३ अथान्यत्राप्युक्तं - स्वनवत्येषा० मैत्रा० ५.५ अथ हौनमाहवनीयः छान्दो० ४.१३.१ अथाभिप्रायरेव स्थाली बृह० ६.४.१९

मन्त्रानुक्रमणिका ४९८

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
अथामूर्तं प्राणश्च यश्चबृह० २.३.५अन्ते तु किंकिणी वंशना०बि० ३५
अथामूर्त वायुश्चान्तरिक्षम्बृह० २.३.३अन्तेवास्युत्तररूपम्तैत्ति० १.३.३
अथावृतेषु चोर्हिङ्कारःछान्दो० २.२.२अन्धं तमः प्रविशन्तिबृह० ४.४.१०
अथाव्यात्तम् वामैत्रा० ५.६अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्याम्ईश० ९
अथास्य दक्षिणं कर्णम०बृह० ६.४.२५अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये सम्भूतिम्ईश० १२
अथास्य नाम करोतिबृह० ६.४.२६अन्धवत्पश्य रूपाणिअमृ० १५
अथास्य मातरमभिम.बृह० ६.४.२८अन्नकार्याणां कोशानांसर्व० ५
अथास्या ऊरू विहापयतिबृह० ६.४.२१अन्नं न निन्द्यात्तैत्ति० ३.७.१
अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्चबृह० १.४.६अन्नं न परिचक्षीततैत्ति० ३.८.१
अथेन्द्रमब्रुवन्केन० ३.११अन्नं ब्रह्मेतितैत्ति० ३.२.१
अथैकयोर्ध्व उदानःप्रश्न० ३.७अन्नं ब्रह्मेत्येक आहु.बृह० ५.१२.१
अथैतद्वामेऽक्षणिबृह० ४.२.३अन्नं बहु कुर्वीततैत्ति० ३.९.१
अथैतयोः पथोर्न कतरेणछान्दो० ५.१०.८अन्नमय प्राणमय०मुद्र० ४.५
अथैतस्य प्राणस्यापःबृह० १.५.१३अन्नमयः हि सोम्यछान्दो० ६.५.४
अथैतस्य मनसो द्यौःबृह० १.५.१२अन्नमयः हि सोम्य मनःछान्दो० ६.६.५
अथैनमग्नयेबृह० ६.२.१४अन्नमशितं त्रेधा विधीयतेछान्दो० ६.५.१
अथैनमभिमृशतिबृह० ६.३.४अन्नमिति होवाचछान्दो० १.११.९
अथैनमाचामतिबृह० ६.३.६अन्नं वाव बलाद् भूयस्त-छान्दो० ७.९.१
अथैनं मात्रे प्रदायबृह० ६.४.२७अन्नं वै प्रजापतिःप्रश्न० १.१४
अथैनमुद्गच्छत्यामबृह० ६.३.५अन्नाद्वै प्रजाःतैत्ति० २.२.१
अथैनामभिपद्यतेबृह० ६.४.२०अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैवकठ० १.२.१
अथैनं वसतयोपमन्त्रया.बृह० ६.२.३अन्यतरामेव वर्तनीछान्दो० ४.१६.३
अथैष श्लोको भवतिबृह० १.५.२३अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्माद्कठ० १.२.१४
अथो अयं वा आत्माबृह० १.४.१६अन्येदेवाहुःईश० १३
अथोताप्याहुःछान्दो० २.१.३अन्यदेवाहुर्विद्ययाईश० १०
अथोपाँशुरन्तर्यामिमैत्रा० २.८अन्यविद्यापरिज्ञानमवश्यंशु०२० ४४
अथोत्तरेणप्रश्न० १.१०अपां का गतिरित्यसौछान्दो० १.८.५
अद्यभ्यश्चैनं चन्द्रमसश्चबृह० १.५.२०अपाणिपादो जवनोश्वेता० ३.१९
अधिष्ठाने तथाना०बि० २८अपाने तृप्यति वाक्तृप्यतिछान्दो० ५.२१.२
अधीहि भगव इतिछान्दो० ७.१.१अपामपोग्निःमैत्रा० ४.४(ञ)
अध्यस्तस्य कुतोना०बि० २५अपाꣳ सोम्य पीयमानानाम्छान्दो० ६.६.३
अनन्दानाम ते लोकाबृह० ४.४.११अप्राणो ह्यमनाःसर्व० १७
अनात्मदृष्टेरविवेक-शु०२० ३९अम्भमेव सवितागाय० ३.८
अनाद्यनन्तम्श्वेता० ५.१३अभिमन्थति स हिङ्काराछान्दो० २.१२.१
अनिरुक्तस्त्रयोदशःछान्दो० १.१३.३अभेददर्शनं ज्ञानम्स्कन्द० ११
अनुपश्य यथाकठ० १.१.६अभ्यस्यमानो नादोऽयम्ना०बि० ३२
अनुवजन्नाजुहावशु०२० ५१अभ्रं भूत्वा मेघो भवतिछान्दो० ५.१०.६
अनेजदेकं मनसोईश० ४अभ्राणि संप्लवन्तेछान्दो० २.१५.१
अनेन विधिनाअमृ० २९अमात्राश्चतुर्थोऽव्यवहार्यःमाण्डू० १२
अन्तरङ्गं समुद्रस्यना०बि० ४६अमृतत्वं देवेभ्यःछान्दो० २.२२.२
अन्तरिक्षमेवार्वायुःछान्दो० १.६.२अयं चन्द्रः सर्वेषाम्बृह० २.५.७
अन्तरिक्षोदरः कोशोछान्दो० ३.१५.१अयं धर्मः सर्वेषां भूतानाम्बृह० २.५.११

४९३ मन्त्रानुक्रमणिका

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
अयमग्निवैश्वानरोबृह० ५.९.१अस्तीत्येवोपलब्ध-कठ० २.३.१३
अयमग्निः सर्वेषां भूतानाम्बृह० २.५.३अस्य यदेकाः शाखाम्छान्दो० ६.११.२
अयमाकाशः सर्वेषाम्बृह० २.५.१०अस्य लोकस्य काछान्दो० १.९.१
अयमात्मा सर्वेषां भूतानाम्बृह० २.५.१४अस्य विस्रंसमानस्यकठ० २.२.४
अयमादित्यः सर्वेषाम्बृह० २.५.५अस्य सोम्य महतोछान्दो० ६.११.१
अयं वाव खल्वस्यमैत्रा० ४.३अहमन्नमहमन्नमन्न-तैत्ति०३.१०.६
अयं वाव लोकोछान्दो० १.१३.१अहरेव सवितागाय० ३.६
अयं वाव स ......पुरुषछान्दो० ३.१२.८अहर्वा अश्वं पुरस्तात्बृह० १.१.२
अयं वाव स ......हृदयछान्दो० ३.१२.९अह्निकेति होवाचबृह० ३.९.२५
अयं वायुः सर्वेषाम्बृह० २.५.४अहं वृक्षस्य रेरिवातैत्ति०१.१०.१
अयं वै लोकोऽग्निर्गौतमबृह० ६.२.११अहोरात्रो वै प्रजापतिःप्रश्न० १.१३
अयः स्तनयित्नुः सर्वेषाम्बृह० २.५.९आकाश एव यस्यायबृह०३.९.१३
अरण्योर्निहितोकठ० २.१.८आकाशो वाव तेजसोछान्दो० ७.१२.१
अरा इव रथनाभौ कलाप्रश्न० ६.६आकाशो वै नामछान्दो० ८.१४.१
अरा इव रथनाभौ प्राणेप्रश्न० २.६आगमस्याविरोधेनअमृ० १७
अरा इव स्थनाभौ संहतामुण्ड० २.२.६आगाता ह वै कामानांछान्दो०१.२.१४
अरिष्टं कोशम्छान्दो० ३.१५.३आग्नि वेश्यादाग्निवेश्योबृह०४.६.२
अविद्यायां बहुधामुण्ड० १.२.९आग्निवेश्यादाग्निवेश्यःबृह० २.६.२
अविद्यायामन्तरेमुण्ड० १.२.८आज्ञाभय....बन्धःनिरा० २५
अविद्यायामन्तरेकठ० १.२.५आत्मन एष प्राणोप्रश्न० ३.३
अव्यक्तात्तुकठ० २.३.८आत्मानं चेद्विजानीयाद०बृह०४.४.१२
अविः संनिहितम्मुण्ड० २.२.१आत्मानमन्तत उपसृत्यछान्दो० १.३.१२
अशक्यः सोऽन्यथामन्त्रि० ३आत्मानं रथिनंकठ० १.३.३
अशनापिपासे मे सोम्यछान्दो० ६.८.३आत्मानं सततंना० बि० २१
अशनायापिपासा.मुद्ग० ४.७आत्मा वा इदमेकऐत० १.१.१
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययंकठ० १.३.१५आत्मेश्वर जीवःसर्व० २
अशरीर शरीरेषुकठ० १.२.२२आत्मैवेदमग्र आसीत्बृह० १.४.१
अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत्छान्दो० ८.१२.२आत्मैवेदमग्र आसीदेकबृह० १.४.१७
अशीतिश्च शतम्अमृ० ३४आत्रेयी पुत्रादात्रेयीपुत्रोबृह० ६.५.२
अष्टपादं शुचिम्मन्त्रि० १आदित्यवस्य रेतसःछान्दो० ३.१७.७
असद्वा इदमग्रतैत्ति० २.७.१आदित्य इति होवाचछान्दो० १.११.७
असन्नेव स भवतितैत्ति० २.६.१आदित्य ऊकारोछान्दो० १.१३.२
असिपद महामन्त्रस्यशु०२० २७आदित्य एव सवितागाय० ३.४
असूर्या नाम तेईश० ३आदित्यमथ वैश्वदेवम्छान्दो० २.२४.१३
असौ वा आदित्योछान्दो० ३.१.१आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशःछान्दो० ३.१९.१
असौ वाव लोकोछान्दो० ५.४.१आदित्यो ह वै प्राणःप्रश्न० १.५
असौ वै लोकोऽग्निर्गौतमबृह० ६.२.९आदित्यो ह वै बाह्यःप्रश्न० ३.८
अस्तमित आदित्ये.... चन्द्रःबृह० ४.३.४आदिरिति द्वयक्षरम्छान्दो० २.१०.२
अस्तमित आदित्ये याज्ञ-बृह० ४.३.३आदिः स संयोग-श्वेता० ६.५
अस्तमित आदित्ये.... शान्ते-बृह० ४.३.६आदौ जलधिजीमूतभेरीना० बि० ३४
अस्तमित आदित्ये.... शान्तेबृह० ४.३.५आनन्दो ब्रह्मेतितैत्ति० ३.६.१
अस्ति खल्वन्योऽपरोमैत्रा०३.२आप एव ... हृदयमबृह० ३.९.१६

मन्त्रानुक्रमणिका [४९४]

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
आप एवेदमग्र आसुस्ताबृह० ५.५.१ईश्वर उवाच एवमुक्त्वाशु०र० ४६
आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्तेछान्दो० ६.५.२ईश्वर उवाच– मयोपदिष्टेशुक० ६
आपयिता ह वै कामानाम्छान्दो० १.१.७उक्थं प्राणो वा उक्थम्बृह० ५.१३.१
आपो वा अर्कस्तद्यदपांबृह० १.२.२उत्क्षिप्य वायुमाकाशम्अमृत० १२
आपो वावान्नाद्भूयस्यःछान्दो० ७.१०.१उत्तिष्ठत जाग्रतकठ० १.३.१४
आप्रोतिहादित्यस्यछान्दो० २.१०.६उत्पत्तिमायतिं स्थानंप्रश्न० ३.१२
आ मा यन्तु ब्रह्मचारिणःतैत्ति० १.४.२उत्पन्ने तत्त्वविज्ञानेना० बिन्दु० २२
आरभ्य कर्माणिश्वेता० ६.४उदशराव आत्मानमवेक्ष्यछान्दो० ८.८.१
आराममस्य पश्यन्तिबृह० ४.३.१४उदाने तृप्यति त्वक्तृप्यतिछान्दो० ५.२३.२
आविः संनिहितंमुण्ड० २.२.१उदासीनस्ततोना० बिन्दु० ४०
आशा प्रतीक्षेकठ० १.१.८उद्गीतमैतत्परमम्श्वेता० १.७
आशा वाव स्मराद्भूयस्या०छान्दो० ७.१४.१उद्गीथ इति त्र्यक्षरम्छान्दो० २.१०.३
आसीनो दूरंकठ० १.२.२१उद्गृह्णाति तन्निधनंछान्दो० २.३.२
आसुरमिति.... आसुरम्निरा० ३४उद्दालको हाऽऽरुणिःछान्दो० ६.८.१
इति तु पञ्चम्यामाहुतावापःछान्दो० ५.९.१उद्यन्हिङ्कार उदितःछान्दो० २.१४.१
इदं निरालम्बोप.....इत्युपनिषत्निरा० ४०उपकोसलो ह वैछान्दो० ४.१०.१
इदं मानुषः सर्वेषाम्बृह० २.५.१३उपदिष्टं परम्ब्रह्मशु० र० १२
इदमिति ह प्रतिजज्ञेछान्दो० ४.१४.३उपदिष्टः शिवेनेतिशु० र० ४९
इदं वाव तज्ज्येष्ठायछान्दो० ३.११.५उपनिषदं भोकेन० ४.७
इदं वै तन्मधु... तद्वामबृह० २.५.१६उपमन्त्रयते स हिङ्कारोछान्दो० २.१३.१
इदं वै तन्मधु– दधीचे.बृह० २.५.१७उपास्य इति... गुरुरुपास्यःनिरा० ३०
इदं वै तन्मधु... द्रूपबृह० २.५.१९उशन् ह वैकठ० १.१.१
इदं वै तन्मधु.. पुरश्चक्रेबृह० २.५.१८उषा वा अश्वस्यमेध्यस्यबृह० १.१.१
इदं सत्यं सर्वेषामबृह० २.५.१२उष्णमेव सवितागाय० ३.७
इन्द्रस्त्वं प्राणप्रश्न० २.९ऊर्ध्वं प्राणमुन्न०कठ० २.२.३
इन्द्रियाणां पृथग्भाव०कठ० २.३.६ऊर्ध्वमूलोऽवाक् शाखकठ० २.३.१
इन्द्रियाणि हयानाहुःकठ० १.३.४ऋग्भिरेतं यजुर्भिःप्रश्न० ५.७
इन्द्रियेभ्यः परंकठ० २.३.७ऋग्वेदो गार्हपत्यम्प्रणव० ४
इन्द्रियेभ्यः पराःकठ० १.३.१०ऋचो अक्षरे परमेश्वेता० ४.८
इन्धो ह वै नामैषबृह० ४.२.२ऋचो यजूंषि प्रसवन्तिएका० ७
इमा आपः सर्वेषाम्बृह० २.५.२ऋचो यजूंषि सामा.बृह० ५.१४.२
इमा दिशः सर्वेषाम्बृह० २.५.६ऋतं च स्वाध्याय प्रवचनेतैत्ति० १.९.१
इमामेव गोतमभरद्वाजा.बृह० २.२.४ऋतं पिबन्तौकठ० १.३.१
इमाः सोम्य नद्यःछान्दो० ६.१०.१ऋतुषु पञ्चविधछान्दो०२.५.१
इयं पृथिवी सर्वेषाम्बृह० २.५.१एक धैवानुद्रष्टव्यमेतदप्र०बृह० ४.४.२०
इयमेवर्गाग्निःछान्दो० १.६.१एकमात्रस्तथाकाशोअमृ० ३२
इयं विद्युतत्सर्वेषां भूतानाम्बृह० २.५.८एकमेवाद्वितीयम्शुक०र० ३५
इष्टापूर्तं मन्यमानामुण्ड०१.२.१०एकविंशत्यादित्यम्छान्दो० १.१०.५
इह चेदवेदीदथकेन० २.५एकाक्षरं त्वक्षरेएका० १
इह चेदशकद्बोद्धुंकठ० २.३.४एकीभवति न पश्यती०बृह० ४.४.२
इहैव सन्तोऽथ विद्म.बृह० ४.४.१४एकैकं जालं बहुधाश्वेता० ५.३
ईशावास्यमिदम्ईश० १एको देवः सर्वभूतेषुश्वेता० ६.११

४९५ मन्त्रानुक्रमणिका

मन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरणमन्त्र प्रतीकउपनिषद् विवरण
एको देवो बहुधामुद्ग० ३.१एवमेषां लोकानामासाम्छान्दो० ४.१७.८
एको वशीकठ० २.२.१२एवं यथाश्मानमाखणमृत्वाछान्दो० १.२.८
एको वशी निष्क्रियाणाम्श्वेता० ६.१२एवं महावाक्याशु० २० ३०
एको ह ऽ सो भुवन.श्वेता० ६.१५एवः सोम्य ते षोडशानाम्छान्दो० ६.७.६
एको हि रुद्रोश्वेता० ३.२एष उ एव बृहस्पति.बृह० १.३.२०
एतच्छ्रुत्वाकठ० १.२.१३एष उ एव ब्रह्मणस्पति.बृह० १.३.२१
एतज्ज्ञेयम्श्वेता० १.१२एष उ एव भामनीरेष हिछान्दो० ४.१५.४
एतत्तुल्यंकठ० १.१.२४एष उ एव वामनीरेष हिछान्दो० ४.१५.३
एतदालम्बन ऽकठ० १.२.१७एष उ एव साम वाग्वैबृह० १.३.२२
एतद्ध वै तज्जनकोबृह० ५.१४.८एष उ वा उद्गीथःबृह० १.३.२३
एतद्धस्म वै तद्विद्वान्.बृह० ६.४.४एष तु वा अतिवदतिछान्दो० ७.१६.१
एतद्धस्म वै तद्विद्वानाहछान्दो० ३.१६.७एष तेऽग्निर्नचिकेतकठ० १.१.१९
एतद्धस्म वैतद्विद्वांसःछान्दो० ६.४.५एष देवो विश्वकर्माश्वेता० ४.१७
एतद्ध स्मैत.गाय० ३.१३एष प्रजापतिर्यङ्ग.बृह० ५.३.१
एतद्ध स्मैतद्गाय०१.१एष ब्रह्मैष इन्द्रऐत० ३.१.३
एतद्धयेवाक्षरंकठ० १.२.१६एष म आत्मान्तर्हृदयेछान्दो० ३.१४.३
एतद्योगेन परम पुरुषोमुद्ग० ४.९एष वै यजमानस्यछान्दो० २.२४.१५
एतद्वस्तुचतुष्टयंसर्व० १३एष सर्वेश्वर एषमाण्डू० ६
एतद्वै परमं तपोबृह० ५.११.१एष सर्वेषु भूतेषुकठ० १.३.१२
एतमु एवाहमभ्य... प्राणाछान्दो० १.५.४एष ह वा उदक्प्रवणोछान्दो० ४.१७.९
एतमु एवाहमभ्य...रश्मीछान्दो० १.५.२एष ह वै यज्ञो योऽयम्छान्दो० ४.१६.१
एतमु हैव चूलोबृह० ६.३.१०एष हि खल्वात्मेशानःमैत्रा० ५.८
एतमु हैव जानकिरायबृह० ६.३.११एष हि द्रष्टाप्रश्न० ४.९
एतमु हैव मधुकःबृह० ६.३.९एषां भूतानां पृथिवी रसःछान्दो० १.१.२
एतमु हैव वाजसनेयोबृह० ६.३.८एषां वै भूतानांबृह० ६.४.१
एतमु हैव सत्यकामोबृह० ६.३.१२एषामज्ञानजन्तूनांनिरा० २
एतम्मृग्वेदमम्यतपत् स्तस्याभि०छान्दो० ३.१.३एषोऽग्निस्तपत्येषप्रश्न० २.५
एतः संयद्वाम इत्याचक्षतछान्दो० ४.१५.२एषोऽणुरारत्मा चेतसामुण्ड० ३.१.९
एतस्माज्जायतेमुण्ड० २.१.३एषो ह देवः प्रदिशोश्वेता० २.१६
एतस्य वा अक्षरस्यबृह० ३.८.९एह्येहीति तमाहुतयमुण्ड० १.२.६
एतेन जीवात्मनोर्योगेनमुद्ग० २.६ओङ्काररथमारुह्यअमृ० २
एतेनैव च मन्त्रेणमुद्ग० १.४ओ३मदा३मोछान्दो० १.१२.५
एतेषां मे देहीतिछान्दो० १.१०.३ओमिति ब्रह्मतैत्तिरीय० १.८.१
एतेषु यश्चरतेमुण्ड० १.२.५ओमित्येकाक्षरम्प्रण० २
एवं बद्धस्तथा जीवःस्कन्द० ७ओमित्येकाक्षरम् ब्रह्मअमृ० २१
एवमेव खलु सोम्य.छान्दो० ६.६.२ओमित्येतदक्षरमिदंमाण्डू० १
एवमेव खलु सोम्येमाःछान्दो० ६.१०.२ओमित्येतदक्षरमुद्गीथम्छान्दो० १.१.१
'एवमेव प्रतिहर्तारमुवाचछान्दो० १.१०.११ओममित्येतदक्षर.....ह्युद्गायतिछान्दो० १.४.१
एवमेवैष मघवन्नितिछान्दो० ८.९.३औपमन्यव कं त्वमात्में.छान्दो० ५.१२.१
एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतंछान्दो० ८.११.३कं ते कामपागायानी नील्येषछान्दो० १.७.९
एवमेवैष सम्प्रसादो.छान्दो० ८.१२.३कतम आत्मेति योऽयम्बृह० ४.३.७
एवमेवोद्गातारमुवाच.छान्दो० १.१०.१०कतम आदित्या इतिबृह० ३.९.५