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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ४ ८९

अध्याय १ खण्ड ४ मन्त्र ४ ८९ यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ॥ ९ ॥ वह साम जिस ऋचा में हो, उस ऋचा का, उसके ऋषि का तथा उसके देवता का चिन्तन भी उद्गाता को करना चाहिए ॥ ९ ॥ येन च्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तꣳस्तोममु- पधावेत् ॥ १० ॥ वह उद्गाता जिस छन्द के द्वारा स्तुति करता हो, उस छन्द का चिन्तन करे। जिन स्तोत्रों से स्तुति करता हो, उन स्तोत्रों का चिन्तन करे ॥ १० ॥ यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ॥ ११ ॥ वह जिस दिशा की स्तुति करता हो, उस दिशा का चिन्तन करे ॥ ११ ॥ आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृद्ध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥ अन्त में अपने आत्मस्वरूप का और अपनी कामना का चिन्तन करके, वह प्रमादरहित स्तुति करे। जिस कामना की पूर्ति के लिए वह परमात्मा की स्तुति करता है, वह शीघ्र ही अभीष्ट फल प्राप्त करता है ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥ ॐ यह अक्षर ही उद्गीथ है- यह जानकर उपासना करनी चाहिए। उद्गाता यज्ञ में ॐ का उच्चारण करके उद्गान करता है। उस उद्गीथ की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥ देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशꣳस्ते छन्दोभिरच्छादयन्यदेभिर- च्छादयꣳस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥ २ ॥ मृत्यु से डरते हुए देवों ने त्रयी विद्या में प्रवेश लिया और अपने को छन्दों से आच्छादित कर लिया। आच्छादित करने वाले होने के कारण वे छन्द कहे गये ॥ २ ॥ [ देवता तो अमर कहे गये हैं, फिर उन्हें मृत्यु का भय कैसे ? यहाँ देवों का तात्पर्य शरीरस्थ देव शक्तियों से है। श्वेताश्वतर उपनिषद् में उल्लेख है कि विराट् पुरुष के अंगों से उत्पन्न देवों ने मनुष्य के अंग-अवयवों में प्रवेश किया। मनुष्य मर्त्य है, उसके अंगों में स्थित देवों को ही मृत्युभय होता है।] तानु तत्र मृत्युर्रथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि । ते नु वित्त्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३ ॥ जिस प्रकार मछली पकड़ने वाला धीवर जल के भीतर मछली को देख लेता है, उसी प्रकार ऋक् , साम और यजुष् सम्बन्धी कर्मों में संलग्न देवों को मृत्यु ने देख लिया। देवों को यह बात ज्ञात होने पर वे उन ऋक्, साम और यजुष् सम्बन्धी कर्मों को त्यागकर उस ॐकार अक्षर में ही प्रविष्ट हो गये ॥ ३ ॥ यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येवꣳ सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षरमे- तदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥ ४ ॥ जब कोई उपासक ऋचा-पाठ करता है, तो वह बड़े आदर के साथ ॐ का उच्चारण करता है। उसी प्रकार साम एवं यजुष् पाठ करने वाले भी ॐ अक्षर का उच्चारण करते हैं। यद्यपि ॐएक स्वर है, तथापि

१० छांदोग्योपनिषद् यह अक्षर, अमृत और अभय रूप ब्रह्म का ही प्रतीक है। देवगण इस अक्षर ब्रह्म ॐकार में प्रविष्ट होकर अमरत्व और अभय को प्राप्त होते हैं ॥ ४ ॥ [ देवगण जब तक नश्वर इन्द्रियादि के रसों में अपना अस्तित्व देखते हैं, तब तक वेदोक्त अनुशासन का पालन करने पर भी मृत्यु भय से मुक्त नहीं होते। जब ॐकार रूप ब्रह्म के सर्वोत्तम रस के आनन्द में प्रवेश करते हैं, तो अमर हो जाते हैं। ] स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरꣳ स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ ५ ॥ जो ज्ञानी इस अक्षर ब्रह्म ॐ को इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह अमृत और अभयरूप स्वर ब्रह्म ॐ में ही प्रविष्ट करता है। जिस प्रकार इसमें प्रविष्ट होकर देवगण अमरत्व भाव को प्राप्त हुए, उसी प्रकार वह भी अमरत्व को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥ यथार्थ में यह जो उद्गीथ है, वही प्रणव ॐ है और जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। यह जो सूर्य है, वही उद्गीथ है, वही प्रणव है, क्योंकि यह गमन करते हुए ॐ का ही उच्चारण करता रहता है ॥ १ ॥ [ अपने पूरे सौर मण्डल को लिए सूर्य भी गतिशील है, यह तथ्य वर्तमान विज्ञान स्वीकार करता है। सूर्य के द्वारा प्राणों के संचार को उद्गीथ (छान्दो.१.३.१ में) पहले ही कहा जा चुका है।] एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मीꣳस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा- मैंने विशेषतः इसी आदित्य को लक्ष्य कर ॐकार का गान किया था, इसी से तू मेरा एक पुत्र है। अब तू यदि सूर्य से विकेन्द्रित होती सूर्य की रश्मियों का ध्यान कर, तो निश्चय ही तुम्हें बहुत से पुत्रों की प्राप्ति होगी। यह आधिदैविक उपासना का वर्णन है ॥ २ ॥ [ साधक के संकल्प के अनुरूप प्राण शक्ति का नियोजन होता है। उसी के अनुसार एक या बहुत से पुत्र प्राप्त होने की बात कही गयी है।] अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥ अब आध्यात्मिक उपासना का वर्णन है। यह जो मुख्य प्राण है, उसी के रूप में उद्गीथ की उपासना करनी चाहिए, क्योंकि यह गमन करते हुए सर्वदा ॐकार स्वर का ही उच्चारण करता रहता है ॥ ३ ॥ एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणाꣳस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥ कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा- मैंने विशेषतः इसी मुख्य प्राण को लक्ष्यकर ॐकार का गान किया था; अतः तू मेरा एक पुत्र हुआ। अब तू मुख्य प्राण के गुणभेद से विशिष्ट प्राणों का चिन्तन कर, तो निश्चय ही तुम्हारे बहुत से पुत्र होंगे ॥ ४ ॥ अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनु समाहरतीति ॥ ५ ॥

अध्याय १ खण्ड ६ मन्त्र ५ ९१

अध्याय १ खण्ड ६ मन्त्र ५ ९१ यथार्थ में जो उद्गीथ है, वही प्रणव (ॐ) है। जो प्रणव है, वही उद्गीथ है। इस रहस्य को जानने वाला होता के आसन से उद्गाता से हुए दोष युक्त उद्गान को ॐ उच्चारण करके संशोधन कर लेता है ॥५॥ [ यदि उद्गाता के गान में यज्ञ के उद्देश्य के अनुरूप भावों का स्पंदन न होने पाये, तो होता ॐकार के उद्गान से - मुख्य प्राण को तरंगित करके उस कमी की पूर्ति कर सकता है।] ॥ षष्ठः खण्डः ॥ इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयत इयमेव साग्निरमस्तत्साम ॥ १ ॥ यह पृथ्वी ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह अग्नि रूप साम, पृथिवी रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है। अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का गायन किया जाता है। पृथिवी को 'सा' और अग्नि को 'अम' मानकर दोनों को मिलाने से साम बनता है ॥ १ ॥ [ साम अर्थात् उद्गीथ को प्राण का संचरण कहा गया है। पृथ्वी तत्त्व (काष्ठ आदि ) जब प्राण संचरित करते हैं, तो अग्नि का स्वरूप बनता है। इसी प्रकार आगे अन्तरिक्ष का प्राण संचरण वायु तथा आकाश द्वारा प्राण संचरण से आदित्य का स्वरूप बनना मान्य है।] अन्तरिक्षमेवर्गवायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम। तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत्साम ॥ २ ॥ अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है। वह वायु रूप साम अन्तरिक्ष रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है। अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का गायन किया जाता है। अन्तरिक्ष को 'सा' और वायु को 'अम' मानकर दोनों को मिलाने से 'साम' बनता है ॥ २ ॥ द्यौरेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम। तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते द्यौरेव सादित्योऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥ आकाश ही ऋक् है और आदित्य साम है। वह आदित्य रूप साम द्यौ रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है, अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। आकाश को 'सा' और आदित्य को 'अम' मानकर दोनों को मिलाने से साम बनता है ॥ ३ ॥ नक्षत्राण्येवर्ग चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम। तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते। नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥ ४ ॥ नक्षत्र ही ऋक् है और चन्द्रमा साम है। वह चन्द्रमा रूप साम नक्षत्र रूप ऋक् में प्रतिष्ठित है, अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। नक्षत्र को 'सा' और चन्द्रमा को 'अम' मानकर दोनों को मिलाने से साम बनता है ॥ ४ ॥ अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्या- मृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते ॥ ५ ॥ यह जो आदित्य का श्वेत प्रकाश है, वही ऋक् है और जो नीलवर्ण मिश्रित कृष्ण प्रकाश है, वह साम है। वह नीलवर्ण रूप साम इस श्वेत ज्योति रूप ऋक् में अधिष्ठित है, अतः ऋचा में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है ॥ ५ ॥

९२ छान्दोग्योपनिषद अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्सामाथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥ यह आदित्य का श्वेत प्रकाश 'सा' है, नीलवर्ण मिश्रित कृष्ण प्रकाश 'अम' है। इन दोनों को मिलाने से साम बनता है। इस आदित्य के मध्य में एक स्वर्णिम पुरुष दिखाई देते हैं, जो स्वर्ण सदृश दाढ़ी-मूँछ वाले तथा स्वर्णिम केशों वाले हैं, जो नख से लेकर शिखा पर्यन्त सम्पूर्ण रूप से स्वर्णमय हैं ॥ ६ ॥ तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७॥ उस स्वर्णिम पुरुष के दोनों नेत्र बन्दर के बैठने के स्थान के सदृश अथवा कमल पुष्प के सदृश अरुणिम हैं। उनका नाम 'उत्' है, क्योंकि वह पापों से ऊपर उठे हैं। जो इस प्रकार जानते हैं, वह निश्चय ही पापों से ऊपर उठ जाते हैं ॥ ७ ॥ तस्यर्क् च साम च गेष्णौ तस्मादुद्गीथस्तस्मात्त्वेवोद्गातैतस्य हि गाता स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां चेत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ ऋग्वेद और सामवेद उसी पुरुष का वर्णन करते हैं। इसीलिए वह परमात्मा उद्गीथ है और उस 'उत्' का गान करने वाला उद्गाता कहलाता है। वह परम पुरुष 'उत्' आदित्य से ऊँचे लोकों और देवों का भी नियामक है और देवों की कामनाओं का पूरक है। यह उद्गीथ की आधिदैविक उपासना का स्वरूप हैं ॥ ८ ॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ अथाध्यात्मं वागेवर्क् प्राणः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत्साम ॥ १ ॥ अब आध्यात्मिक उपासना का वर्णन किया जाता है। वाणी ही ऋक् है और प्राण साम है। इस प्रकार वाणी रूप ऋक् में प्राण रूप साम अधिष्ठित है। अतः ऋक् में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। वाणी को 'सा' और प्राण को 'अम' मानकर इन्हें मिलाने से साम बनता है ॥ १ ॥ चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते चक्षुरेव सात्माऽमस्तत्साम ॥ २ ॥ चक्षु ही ऋक् है और आत्मा साम है। इस प्रकार चक्षुरूप ऋक् में आत्मारूप साम अधिष्ठित है। अतः ऋक् में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। चक्षु को 'सा' और आत्मा को 'अम' मानकर इन्हें मिलाने से साम बनता है ॥ २ ॥ श्रोत्रमेवर्ङ्मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥ श्रोत्र ही ऋक् है और मन साम है। इस प्रकार श्रोत्र रूप ऋक् में मनरूप साम अधिष्ठित है। अतः ऋक् में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। श्रोत्र को 'सा' और मन को 'अम' मानकर उन्हें मिलाने से साम बनता है ॥ ३ ॥

अध्याय १ खण्ड ८ मन्त्र १ ९३

अध्याय १ खण्ड ८ मन्त्र १ ९३ अथ यदेतदक्षणः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत्साम तदेतदेतस्या- मृच्यध्यूढः साम तस्मादृच्यध्यूढः साम गीयते। अथ यदेवैतदक्षणः शुक्लं भाः सैव साथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत्साम ॥ ४ ॥ यह जो नेत्रों में श्वेत आभा है, वह ऋक् है और जो नील वर्ण युक्त श्याम आभा है, वह साम है। इस प्रकार (श्वेत आभारूप) ऋक् में (नीलयुक्त श्याम आभारूप) साम अधिष्ठित है, अतः ऋक् में अधिष्ठित साम का ही गायन किया जाता है। नेत्रों की श्वेत आभा को 'सा' और श्याम आभा को 'अम' मानकर इन्हें मिलाने से साम बनता है ॥ ४ ॥ अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्क्तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥ ५ ॥ यह नेत्रों के मध्य जो पुरुष दिखाई देता है, वही ऋक् है, वही साम है, वही उक्थ है, वही यजुष् और वही ब्रह्म है। उस पुरुष का वही रूप है, जो आदित्य के मध्य स्थित पुरुष है। उसके जो गुण हैं, वही इसके गुण हैं। उसका जो नाम 'उत्त' है, वही इसका भी नाम है ॥ ५ ॥ स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात्ते धनसनयः ॥ ६ ॥ वही परम पुरुष पृथिवी से नीचे सभी लोकों पर आधिपत्य रखता है, वही मनुष्य की कामनाओं को भी अपने अधीन रखता है। जो लोग वीणा पर गायन करते हैं, वे उसी पुरुष का गायन करते हैं। इसी से वे धन-सम्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥ अथ य एतदेवं विद्वान्साम गायत्युभौ स गायति सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात्पराञ्चो लोकास्ताःश्चाप्नोति देवकामास्ताःश्च ॥ ७ ॥ जो विद्वान् इस रहस्य को जानकर सामगान करता है, वह चक्षु के अन्तर्गत और आदित्य के अन्तर्गत अवस्थित दोनों पुरुषों का गायन करता है। इसके द्वारा वह आदित्य के ऊपर के लोकों और देवों के भोगों को प्राप्त करता है ॥ ७ ॥ अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्ताःश्चाप्नोति मनुष्यकामाःश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥ इसी के द्वारा वह उद्गाता इस लोक से नीचे के लोकों तथा मनुष्य के समस्त भोगों को प्राप्त करता है। अतः इस प्रकार जानने वाला उद्गाता यजमान से कहता है ॥ ८ ॥ कं ते काममागायानीत्येष ह्येव कामगानस्येष्टे य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति ॥ 'मैं आपके लिए किन अभीष्ट कामनाओं का गान के द्वारा आवाहन करूँ।' जो इस रहस्य को इस प्रकार जानकर सामगान करता है, वह अभीष्ट भोगों का गान के द्वारा आवाहन करने में समर्थ हो जाता है ॥ ९ ॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैविलिरिति ते होचुरूद्गीथे वै कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥

ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति ॥ २ ॥

९४ | छान्दोग्योपनिषद् तीन ऋषि उद्गीथ सम्बन्धी विद्या में पारङ्गत थे। एक शालावान् के पुत्र शिलक, द्वितीय चिकितायन के पुत्र दाल्भ्य और तृतीय जीवल के पुत्र प्रवाहण। उन्होंने एक दिन परस्पर कहा- हम लोग उद्गीथ विद्या में पारङ्गत हैं, अतः क्यों न इस विषय पर वार्तालाप करें ॥ १ ॥ तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रवाहणो जैवलिरुवाच भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति ॥ २ ॥ 'हाँ, ऐसा ही करें, कहकर तीनों उत्तम स्थान पर बैठ गये। तब प्रवाहण जैवलि ऋषि ने कहा-पहले आप दोनों चर्चा करें, मैं आप ब्राह्मणों की कही बातों का श्रवण करूँगा ॥ २ ॥ स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति पृच्छेति होवाच ॥ ३ ॥ तब शिलक शालावत्य ने दाल्भ्य चैकितायन से कहा-यदि आज्ञा हो, तो मैं प्रश्न करूँ। दाल्भ्य ने कहा- करो॥ का साम्नो गतिरिति स्वर इति होवाच स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच ॥ ४ ॥ 'साम की गति (आश्रय) क्या है?' शिलक ने पूछा। दाल्भ्य ने उत्तर दिया 'स्वर'। फिर प्रश्न पूछा- स्वर की गति क्या है? दाल्भ्य ने कहा 'प्राण'। फिर प्रश्न पूछा- प्राण की गति क्या है? उन्होंने उत्तर दिया- 'अन्न'। फिर प्रश्न पूछा- अन्न की गति क्या है? उन्होंने उत्तर दिया -जल ॥ ४ ॥ अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोकं सामांभिसंस्थापयामः स्वर्गसंस्तावं हि सामेति ॥ ५ ॥ जल की गति क्या है? ऐसा प्रश्न पूछने पर उत्तर दिया- वह लोक (स्वर्ग)। इस पर शिलक ने पूछा- उस लोक की गति क्या है? इस पर दाल्भ्य ने कहा- स्वर्ग लोक का अतिक्रमण करके साम को दूसरे आश्रय में नहीं रख सकते। हम साम को पूर्णतया स्वर्ग में स्थित मानते हैं और उसकी स्वर्ग रूप में ही स्तुति की गयी है ॥ ५ ॥ तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥ ६ ॥ तब दाल्भ्य चैकितायन से शिलंक शालावत्य ने कहा- यह साम निश्चय ही अप्रतिष्ठित है; परन्तु यदि कोई उद्गाता यह कह दे कि तुम्हारा मस्तक पृथ्वी पर गिर जाये, तो निश्चय ही मस्तक पृथ्वी पर गिर जायेगा ॥ ६ ॥ हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक इति होवाचास्य लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ॥ ७ ॥ दाल्भ्य ने कहा- श्रीमन्! मैं साम की स्थिति आपसे जानना चाहता हूँ। शिलक ने कहा- अच्छा, जानो। दाल्भ्य ने प्रश्न पूछा- स्वर्ग लोक का आश्रय क्या है? उनने कहा-यह लोक। फिर प्रश्न पूछा- इस लोक की गति क्या है? शिलक ने कहा- सबके आश्रयभूत इस लोक का अतिक्रमण करके साम को अन्य आश्रय में नहीं ले जाना चाहिए। हम इस लोक में साम को प्रतिष्ठित करके ही उसकी स्तुति करते हैं ॥ ७ ॥

अध्याय १ खण्ड १० मन्त्र २ ९५

अध्याय १ खण्ड १० मन्त्र २ ९५ तः ह प्रवाहणो जैवलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच ॥ ८ ॥ तंब प्रवाहण जैवलि ने कहा- हे शालावत्य ! आपके द्वारा वर्णित यह साम तर्क द्वारा समाप्त हो जाने वाला है। यदि कोई उद्गाता यह कहे कि आपका मस्तक गिर जाये, तो यह मस्तक गिर जाएगा। फिर शिलक ने कहा- श्रीमन् ! मैं साम की स्थिति आपसे जानना चाहता हूँ। इस पर प्रवाहण ने कहा- अच्छा, जानो ॥ ८ ॥ ॥ नवमः खण्डः ॥ अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ॥ १ ॥ शिलक ने पूछा- इस लोक का आश्रय क्या है ? प्रवाहण ने उत्तर दिया- आकाश, क्योंकि सम्पूर्ण प्राणी तथा तत्त्व इसी आकाश से उत्पन्न होते हैं और इसी में प्रलय को प्राप्त होते हैं, आकाश ही सबसे बड़ा है, अतः आकाश ही इस लोक का भी आश्रय है ॥ १ ॥ स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्रपरोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते ॥ २ ॥ वही श्रेष्ठ से अतिश्रेष्ठ उद्गीथ है, वह अनन्त रूप है। जो विद्वान् उसे इस प्रकार जानता है, इससे वह परम उत्कृष्ट उद्गीथ की उपासना करता है। इससे वह परम उत्कृष्ट जीवन को प्राप्त होता है और क्रमशः उच्चतर लोकों को प्राप्त होता जाता है ॥ २ ॥ तँ हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रजायामुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिँल्लोके जीवनं भविष्यति ॥ ३ ॥ अतिधन्वा शौनक ने इस उद्गीथ उपासना के तत्त्व को उदरशाण्डिल्य से व्यक्त किया। जब तक आपकी प्रजा इस उद्गीथ ( प्राणों को ऊपर श्रेष्ठता की ओर तरंगित करने की विधा) की जानती रहेगी, तब तक उसका जीवन इस लोक में उत्कृष्ट से उत्कृष्टतर होता जायेगा ॥ ३ ॥ तथामुष्मिँल्लोके लोक इति स य एतमेवं विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिँल्लोके जीवनं भवति तथामुष्मिँल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ ४ ॥ परलोक में भी वह श्रेष्ठतर होता जायेगा। इस प्रकार जो विद्वान् उद्गीथ के इस रहस्य को समझकर उपासना करता है, उसका जीवन इस लोक में श्रेष्ठतर होता जाता है तथा परलोक में भी उसे श्रेष्ठतर स्थान प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास ॥ १ ॥ एक समय ओलों की वृष्टि के कारण कुरुदेश की खेती विनष्ट हो गयी। उस समय इभ्य ग्राम में चक्र ऋषि के पुत्र उषस्ति अपनी अल्पवयस्का पत्नी के साथ बड़ी दीन अवस्था में रहने लगे थे ॥ १ ॥ स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तँहोवाच । नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति ॥ २ ॥ एक दिन उषस्ति ऋषि ने अत्यन्त घुने उड़द खाने वाले एक महावत से भिक्षा माँगी। तब उसने कहा-

९६ छान्दोग्योपनिषद् इन जूठे उड़द के सिवाय मेरे पास और कोई अन्न नहीं है, बस इसी पात्र में उड़द रखे हैं ॥ २ ॥ एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतःस्यादिति होवाच ॥ ३ ॥ उषस्ति ऋषि ने कहा- इन्हीं में से मुझे दे दो। तब महावत ने उड़द देते हुए कहा- इन्हें खाकर आप जल भी पी लें। उषस्ति ऋषि ने कहा- इस जल को पीने से मुझे जूठा जल पीने का दोष लग जाएगा ॥ ३ ॥ न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमिमा न खादन्निति होवाच कामो म उदपानमिति ॥ ४ ॥ महावत ने पूछा- क्या ये उड़द जूठे नहीं हैं? उषस्ति ऋषि ने उत्तर दिया-इन्हें खाये बिना मैं जीवित नहीं रह सकता था, परन्तु जल तो मुझे कहीं भी मिल सकता है ॥ ४ ॥ स ह खादित्वातिशेषाञ्जायाया आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ ॥ ५ ॥ उषस्ति ऋषि ने उनमें से एक भाग खाकर दूसरा भाग ले जाकर अपनी पत्नी को दिया, वह पहले ही बहुत सी भिक्षा प्राप्त कर चुकी थी, सो उसने उस उड़द को लेकर रख दिया ॥ ५ ॥ स ह प्रातः संजिहान उवाच यद् बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्राः राजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरात्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् प्रातःकाल शय्या त्यागने के बाद उषस्ति ऋषि ने अपनी पत्नी से कहा- मुझे कहीं से थोड़ा अन्न प्राप्त हो जाता, तो उसे खाकर मैं निर्वाह के लिए धन प्राप्त कर लेता। यहाँ समीपस्थ राजा यज्ञ करने वाले हैं, वे मुझे सम्पूर्ण ऋत्विक् कर्मों के लिए वरण कर लेंगे॥ ६ ॥ तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय ॥ ७ ॥ उषस्ति ऋषि की पत्नी ने उनसे कहा- हे स्वामिन्! ये आपके दिये हुए उड़द रखे हैं, इन्हें आप खा लें। उषस्ति ऋषि उन्हें खाकर उस विशाल यज्ञ में गये ॥ ७ ॥ तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच ॥ ८ ॥ वहाँ वे स्तोताओं के स्थान पर जाकर उनके समीप बैठ गये और प्रस्तोता से बोले- ॥ ८ ॥ प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ ९ ॥ हे प्रस्तोतः ! जिस देवता के प्रति स्तुति करते हो, यदि उसे बिना जाने आप स्तुति करेंगे, तो आपका मस्तक गिर जाएगा ॥ ९ ॥ एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ॥ १० ॥ इसी प्रकार वे उद्गाता के पास जाकर बोले- हे उद्गातः ! जिस देवता के प्रति उद्गीथ गान करते हैं, उसे बिना जाने यदि उद्गान करेंगे, तो आपका मस्तक गिर जायेगा ॥ १० ॥ एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रति- हरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासांचक्रिरे ॥ ११ ॥ इसी प्रकार उन्होंने प्रतिहर्ता के पास जाकर कहा हे प्रतिहर्त्तः ! जिस देवता के प्रति आप प्रतिहरण करते हैं, उसे बिना जाने यदि प्रतिहरण करेंगे, तो आपका मस्तक गिर जाएगा। यह

अध्याय १ खण्ड ११ मन्त्र ६ ९७

अध्याय १ खण्ड ११ मन्त्र ६ ९७

सुनकर प्रस्तोता, उद्गाता आदि अपने-अपने कर्मों से विरत होकर बैठ गये ॥ ११ ॥ [ यदि कोई व्यक्ति केवल रटे हुए ज्ञान के आधार पर श्रेय पाने का प्रयास करते थे, तो तत्त्वज्ञ ऋषि इस प्रकार की 'आन' ( शर्त ) रखकर उनकी गहराई की परीक्षा लेते थे। वे भी तत्त्वज्ञ के आगे अपनी सीमा स्वीकार कर लेते थे। ] ॥ एकादशः खण्डः ॥ अथ हैनँ यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच ॥ १ ॥ तब उषस्ति ऋषि से यजमान राजा ने कहा- मैं आप पूज्य को जानना चाहता हूँ। इस पर उषस्ति ऋषि कहने लगे- मैं चक्र का पुत्र उषस्ति हूँ ॥ १ ॥ स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरात्र्त्विज्यैः पर्येषिषं भगवतो वा अहमवित्त्वा-न्यानवृषि ॥ तब राजा ने कहा- मैंने इन सब ऋत्विक् कर्मों के लिए आपको खोजा था, परन्तु आपके न मिलने पर ही मैं इन ऋत्विजों का वरण कर चुका हूँ ॥ २ ॥ भगवाँस्त्वेव मे सर्वैरात्र्त्विज्यैरिति तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टाः स्तुवतां यावत्त्वेभ्यो धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ ३ ॥ अब आप ही हमारे सम्पूर्ण यज्ञ कर्मों को सम्पन्न कराएँ। उषस्ति ऋषि ने कहा- ऐसा ही हो। अब मैं इन्हीं प्रस्तोता, उद्गाता आदि को प्रसन्नता पूर्वक स्तुति करने की आज्ञा देता हूँ और आप जितना धन इन्हें दें, उतना ही मुझे दे देना। तब राजा ने कहा वैसा ही हो ॥ ३ ॥ अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ४ ॥ तब प्रस्तोता उषस्ति ऋषि के समीप आकर कहने लगे- हे भगवन् ! आपने मुझसे कहा था कि हे प्रस्तोतः ! आप जिस देवता की स्तुति करते हैं, उसे बिना जाने यदि स्तुति करेंगे, तो आपका मस्तक गिर जाएगा। अब आप बताएँ कि वह देवता कौन सा है ? ॥ ४ ॥ प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ५ ॥ तब उषस्ति ऋषि कहने लगे कि वह देवता प्राण है। प्रलय काल में सभी प्राणी प्राण में ही प्रवेश कर जाते हैं और उत्पत्ति के समय ये प्राण से ही उत्पन्न हो जाते हैं। यह प्राण ही स्तुत्य देव है। यदि आप उसे बिना जाने स्तुति करते, तो मेरे वचन के अनुसार आपका सिर निश्चय ही गिर जाता ॥ ५ ॥ अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ६ ॥ तदनन्तर उनके पास उद्गाता आकर कहने लगे- हे भगवन् ! आपने मुझसे कहा था कि हे उद्गातः ! आप जिस देवता की स्तुति करते हैं, उसे बिना जाने यदि स्तुति करेंगे, तो आपका मस्तक गिर जाएगा। अब आप बताएँ कि वह देवता कौन सा है ? ॥ ६ ॥

९८ छान्दोग्योपनिषद् आदित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति ॥ ७ ॥ तब उषस्ति ऋषि ने उत्तर दिया- वह देवता आदित्य है; क्योंकि ये सम्पूर्ण प्राणी उदीयमान सूर्य का ही गान करते हैं। यही देव उद्गीथ से सम्बन्धित है। यदि आप उसे बिना जाने स्तुति करते, तो मेरे वचन के अनुसार आपका सिर निश्चय ही गिर जाता ॥ ७ ॥ अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रति- हरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत्कतमा सा देवतेति ॥ ८ ॥ उसके बाद प्रतिहर्ता उनके पास आये और कहने लगे- हे भगवन् ! आपने मुझसे कहा था कि हे प्रतिहर्तः ! आप जिस देवता का प्रतिहरण करते हैं, उसे बिना जाने यदि प्रतिहरण करेंगे, तो आपका सिर गिर जायेगा। अब आप बताएँ कि वह देवता कौन सा है ? ॥ ८ ॥ अन्नमिति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रत्यहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत्तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ९ ॥ इस पर उन्होंने कहा- वह देवता अन्न है, क्योंकि सम्पूर्ण प्राणी अन्न को ग्रहण करते हुए ही जीते हैं। अन्न देवता ही इस प्रतिहरण से सम्बंधित हैं। यदि उसे आप बिना जाने ही प्रतिहरण करते, तो मेरे वचन के अनुसार आपका मस्तक गिर जाता ॥ ९ ॥ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ इस खण्ड में शौव उद्गीथ का वर्णन है। कोश ग्रन्थों के अनुसार 'शौव' शब्द 'शौवन' का संक्षिप्त रूप है। शौवन का अर्थ होता है श्वान से सम्बंधित। यह आलंकारिक उपाख्यान है। 'श्वान' शब्द श्वन् धातु से बना है; शुन- गतौ के अनुसार श्वान का अर्थ गतिशील होता है। यहाँ 'शौव' का अर्थ प्राण से सम्बन्धित मानने से ही उपाख्यान का भाव स्पष्ट होता है। वर्णित कथानुसार ऋषि पुत्र स्वाध्याय के लिए प्राकृतिक स्थल पर गये हैं। वहाँ श्वेत (निर्मल-निर्दोष) श्वान (प्राण प्रवाह) का उन्हें साक्षात्कार होता है। अन्य श्वान (इन्द्रियादि के विकारों से ग्रस्त प्राण) अपनी भूख का हवाला देकर उनसे अन्न के लिए उद्गीथ का गान करने को कहते हैं। पूर्व खण्डों में कहा जा चुका है; शुद्ध प्राण को ही उद्गीथ साधना फलित होती है। वे प्रकृति में संव्याप्त प्राण समूह शुद्ध प्राण के नेतृत्व में उद्गीथ का गान करते हैं। इस प्रसंग में यहाँ वर्णित उपाख्यान का भाव सिद्ध होता है- अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज ॥ १ ॥ अब शौव (प्राणों से सम्बन्धित) उद्गीथ का वर्णन करते हैं। बक दाल्भ्य अथवा ग्लाव मैत्रेय स्वाध्याय के लिए जलाशय के समीप गये ॥ १ ॥ तस्मै श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ २ ॥ उनके समीप श्वेत (निर्मल-निर्विकार) श्वान (प्राण की इकाई) का प्राकट्य हुआ। उसके पास कुछ अन्य श्वान (विकारग्रस्त प्राण समूह) आकर कहने लगे; आप हमारे निमित्त अन्न प्राप्ति के लिए उद्गीथ का गान करें, हम सब भूखे हैं ॥ २ ॥

अध्याय १ खण्ड १३ मन्त्र ४ ९९

अध्याय १ खण्ड १३ मन्त्र ४ ९९ तान्धोवाचेहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयांचकार ॥ ३ ॥ उस श्वेत श्वान ने उन सबसे कहा- 'तुम कल प्रातःकाल मेरे पास आना।' तब कौतूहल पूर्वक बक दाल्भ्य और ग्लाव मैत्रेय भी प्रातःकाल की प्रतीक्षा करते रहे ॥ ३॥ ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः सःरब्धाः सर्पन्तीत्येव माससृपुस्ते ह समुपविश्य हिंचक्रुः ॥ ४॥ प्रातःकाल वे सब श्वान (प्राण) मिलकर उसी प्रकार भ्रमण करने लगे, जैसे बहिष्पवमान स्तोत्र से स्तुति करने वाले उद्गाता परस्पर मिलकर भ्रमण करते हैं। तदनन्तर वे वहाँ बैठकर हिंकार करने लगे ॥४॥ [ बहिष्पवमान स्तोत्र का गान प्रातः सवन में वेदिका से हटकर, एक साथ गतिशील रहकर किया जाता है। उसका उद्देश्य श्रेष्ठ हव्यान्न की प्राप्ति होती है। यहाँ भी प्राण से सम्बद्ध प्रवृत्तियों द्वारा ( भूख, प्यास आदि) अपने निर्वाह के लिए अन्न प्राप्ति की प्रार्थना की जा रही है। अगले मन्त्र में वह प्रार्थना की गयी है। इस स्तोत्र को त्रित कहा गया है। यह प्रार्थना तीन देवों से की गयी है।] ओ३मदामों३पिबामों३देवो वरुणः प्रजापतिः सविताऽन्नमिहा२हरदन्नपते२ऽ- न्नमिहा हरा२हरो३मिति ॥ ५॥ वे हिंकार करते हुए कहने लगे- ॐ हम भक्षण करें। ॐ हम पान करें। ॐ देव वरुण, प्रजापति, सूर्यदेव यहाँ अन्न लाएँ। हे अन्नपते ! यहाँ अन्न लाएँ, यहाँ अन्न लाएँ ॥ ५॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ यहाँ साम से सम्बन्धित स्तोभ साधना का वर्णन है। इसमें शास्त्रीय संगीत की तरह स्वरों का गायन तो होता है, किन्तु अर्थवाचक शब्दों का उपयोग नहीं होता। उसी प्रक्रिया में प्रयुक्त स्वरों से सम्बद्ध भावों का विवेचन यहाँ किया गया है- अयं वाव लोको हाउकारो वायुर्हाइकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मैहकारोऽग्निरीकारः ॥ १ ॥ इसमें 'हाउ' शब्द यह लोक (पृथ्वी) है। 'हाइ' शब्द वायु है। 'अथ' शब्द चन्द्रमा है। 'इह' शब्द आत्मा है और 'ई' अग्नि है । यह मानकर उपासना करनी चाहिए ॥ १ ॥ आदित्य ऊकारो निह्नव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिंकारः प्राणः स्वरोऽन्नं या वाग्विराट् ॥ २ ॥ 'ऊ' आदित्य है, 'ए' निह्नव (निमंत्रण) का प्रतीक है 'औ होय' विश्वेदेवा है। 'हिं' प्रजापति है, 'स्वर' प्राण का रूप है। 'या' अन्न है और 'वाक्' विराट् है ॥ २ ॥ अनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः संचरो हुंकारः ॥ ३ ॥ जो अनिवर्चनीय है, परन्तु जो कार्य में संचरित होता है, वह तेरहवाँ स्तोभ 'हुं' है॥ ३॥ दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवः साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ ४॥ जो इस प्रकार साम सम्बन्धी (स्तोभाक्षर सम्बन्धिनी) उपनिषद् (रहस्य) का महत्त्व जानता है। उसके सम्मुख वाणी अपना रहस्य स्वयं ही उद्घाटित कर देती है। वह प्रचुर अन्न तथा प्रदीप्त पाचक अग्नि वाला होता है ॥ ४॥

॥ प्रथमः खण्डः ॥

१०० छान्दोग्योपनिषद् ॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ ॐ समस्तस्य खलु साम्न उपासन साधु यत्खलु साधु तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥ साम की सम्पूर्ण उपासना श्रेष्ठ (साधु) है। संसार में जो कुछ श्रेष्ठ है, वह साम है, ऐसा विद्वज्जन कहते हैं। जो असाधु है, उसे असाम कहते हैं ॥ १ ॥ [यहाँ सामगान का मूलभाव स्पष्ट हो जाता है। सामगान का अर्थ होता है 'सदुद्देश्य के लिए किया गया श्रेष्ठ गान।' केवल स्वर कौशल के आधार पर हीन-संकीर्ण (लोभादि) भावों से किया गया गान 'साम गान' नहीं कहला सकता। उसके लिए तो परमार्थ युक्त यज्ञीय भाव ही अभीष्ट होते हैं, इसी खण्ड के अन्तिम चौथे मंत्र में यह भाव ऋषि ने स्पष्ट किया भी है।] तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्य- साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २॥ अतः जब कोई यह कहता है कि मैं साम द्वारा राजा के पास गया, तो इसका तात्पर्य साधु भाव से जाने के रूप में है और जब कोई यह कहे कि मैं 'असाम' द्वारा गया, तो उसके कहने का तात्पर्य असाधुभाव से जाने का है ॥ २ ॥ अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥ इस प्रकार यदि 'हमें साम प्राप्त हुआ' ऐसा कहते हैं, तो उसका तात्पर्य अत्यन्त शुभ फल की प्राप्ति कहा जाता है और यदि 'हमें असाम प्राप्त हुआ' ऐसा कहते हैं, तो उसका तात्पर्य अत्यन्त अशुभ की प्राप्ति है ॥ ३ ॥ स य एतदेवं विद्वान्साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेन साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरूप च नमेयः ॥ ४॥ इस प्रकार साम को जो श्रेष्ठ जान कर उपासना करता है, उसे श्रेष्ठ धर्म की प्राप्ति शीघ्र ही होती है और धार्मिक सिद्धान्त उसके प्रति अवनत होते हैं अर्थात् उसके लिए वे (धर्म सिद्धान्त) शीघ्र ही धारण योग्य होते हैं ॥ ४ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ इसी उपनिषद् में पहले स्पष्ट किया जा चुका है कि 'उद्गीथ' ही 'साम' है तथा साम का भाव 'साधु' - श्रेष्ठ सदाशयता पूर्ण होता है। उद्गीथ में प्राणों को उद्देश्य विशेष के लिए तरंगित- प्रेरित किया जाता है। श्रेष्ठ संदर्भों में प्राणों को तरंगित करने का क्रम स्थूल-सूक्ष्म प्रकृति में विभिन्न रूपों में चल रहा है। यज्ञीय गान में साम के पाँच विभाग या भक्ति कहे गये हैं। ऋषि ने विराट् प्रकृति यज्ञ में साम के विभिन्न रूपों और उसके विभागों का वर्णन सप्तम खण्ड तक किया है। कहा गया है कि प्रकृति की विभिन्न क्रियाओं में होने वाले प्राणों के साम प्रयोगों से जो साधक तादात्म्य बिठा लेता है, उस साधक में उस चक्र को नियंत्रित करने की क्षमता आ जाती है- लोकेषु पञ्चविध सामोपासीत पृथिवी हिंकारोऽग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु ॥ १ ॥ ऊर्ध्व लोकों में पाँच प्रकार से साम की उपासना की जाती है। पृथ्वी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है। आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है ॥ १ ॥

अध्याय २ खण्ड ५ मन्त्र १ १०१

अध्याय २ खण्ड ५ मन्त्र १ १०१ अथावृत्तेषु द्यौर्हिंकार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २॥ इसी प्रकार अधोमुख लोकों में भी पाँच प्रकार से साम की उपासना की जाती है। स्वर्ग हिंकार है, आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है और पृथिवी निधन है ॥ २ ॥ [ सामगान में 'हिंकार' प्रारंभ तथा 'निधन' समापन का द्योतक है। जब पृथ्वी से ऊर्ध्व लोकों को लक्ष्य करके प्राण तरंगित किया जाता है, तो मंत्र क्र. १ की स्थिति बनती है तथा जब ऊर्ध्व लोकों से पृथ्वी को लक्ष्य करके साम प्रयोग होता है, तो मंत्र क्र. २ की स्थिति बनती है।] कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वाँल्लोकेषु पञ्चविधँसामो-पास्ते ॥ इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष पंचविध साम की उपासना करता है, उसके लिए ऊर्ध्व और अधो लोकों के भोग सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं ॥ ३ ॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ वृष्टौ पञ्चविधँ सामोपासीत पुरो वातो हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥ अब वृष्टि में पाँच प्रकार के साम की उपासना का वर्णन करते हैं। पूर्वीय वायु हिंकार है, उत्पन्न होने वाला मेघ प्रस्ताव है। बरसने वाला जल उद्गीथ है। जो चमकता और गर्जन करता है, वह प्रतिहार है ॥ १ ॥ उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान्वृष्टौ पञ्चविधँसामोपास्ते ॥ २ ॥ जो जल को ग्रहण करता है, वह निधन है। इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष पंचविध साम की उपासना करता है, उसकी इच्छा के अनुरूप ही वर्षा होती है। उसे ही वर्षा कराने का श्रेय प्राप्त होता है ॥ ॥ चतुर्थः खण्डः ॥ सर्वास्वप्सु पञ्चविधँसामोपासीत मेघो यत्संप्लवते स हिंकारो यद्वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥ सब प्रकार के जल में पंचविध साम की उपासना करनी चाहिए। घनीभूत होने वाले मेघ हिंकार हैं, बरसने वाले मेघ प्रस्ताव हैं, पूर्व दिशा में प्रवहमान मेघ उद्गीथ हैं, पश्चिम दिशा में प्रवहमान मेघ प्रतिहार हैं, समुद्र निधन हैं ॥ १ ॥ न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्सर्वास्वप्सु पञ्चविधँसामोपास्ते ॥ २ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष सब प्रकार के जल में पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसकी कभी जल में मृत्यु नहीं होती और वह जल से सर्वदा सम्पन्न रहता है ॥ २ ॥ ॥ पञ्चमः खण्डः ॥ ऋतुषु पञ्चविधँसामोपासीत वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १ ॥ ऋतुओं में पंचविध साम की उपासना करनी चाहिए। वसन्त ऋतु हिंकार है। ग्रीष्म ऋतु प्रस्ताव है, वर्षा ऋतु उद्गीथ है, शरद् ऋतु प्रतिहार है और हेमन्त ऋतु निधन है ॥ १ ॥

॥ षष्ठः खण्डः ॥

१०२ छान्दोग्योपनिषद्

कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान्भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधꣳसामोपास्ते ॥ २ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसे ऋतुएँ अभीष्ट भोग प्रदान करती हैं तथा वह ऋतु के अनुसार सर्वदा भोगों से सम्पन्न रहता है ॥ २ ॥ ॥ षष्ठः खण्डः ॥ पशुषु पञ्चविधꣳसामोपासीताजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनम् ॥ १ ॥ पशुओं में पंचविध साम की उपासना करनी चाहिए। बकरे हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, अश्व प्रतिहार हैं और पुरुष निधन हैं ॥ १ ॥ भवन्ति हास्य पशवः पशुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्पशुषु पञ्चविधꣳ सामोपास्ते ॥ २ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष पशुओं में पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसे पशु सम्पदा प्राप्त होती है और वह पशुओं द्वारा प्रदत्त भोगों से सम्पन्न होता है ॥ २ ॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयाꣳसि वैतानि ॥ १ ॥ प्राणों (इन्द्रियों) में श्रेष्ठता के क्रम से साम की पंचविध उपासना करनी चाहिए। यह प्राण हिंकार है, वाणी प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है। ये उपासनाएँ क्रमशः श्रेष्ठतर हैं ॥ १ ॥ परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ २ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष प्राणों में पञ्चविध साम की उपासना करता है, वह श्रेष्ठतर जीवन को प्राप्त होता है तथा श्रेष्ठतर लोकों को प्राप्त करता है। यह पञ्चविध साम उपासना का स्वरूप है ॥ २ ॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ सामान्य क्रम में साम के पाँच विभाग किये जाते हैं। जब साधक की साधना परिपक्व हो जाती है, तो उसके सूक्ष्म विभाग बनाकर संख्या सात कर दी जाती है। अष्टम से दशम खण्ड तक सप्तविध साम की उपासना का मर्म प्रकट किया गया है- अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधꣳ सामोपासीत यत्किंच वाचो हुमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः ॥ १ ॥ अब सप्तविध साम की उपासना का वर्णन किया जाता है। वाणी में सप्तविध साम की उपासना करनी चाहिए। शब्द 'हुं' हिंकार रूप है। शब्द 'प्र' प्रस्ताव रूप है और शब्द 'आ' ही आदि रूप है ॥ १ ॥ यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपैति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनम् ॥ २ ॥ शब्द 'उत्' ही उद्गीथ रूप है, 'प्रति' ही प्रतिहार है। शब्द 'उप' उपद्रव रूप है और 'नि' निधन रूप है ॥ २ ॥ दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान्वाचि सप्तविधꣳ सामोपास्ते ॥ ३ ॥

अध्याय २ खण्ड ९ मन्त्र ६ १०३

अध्याय २ खण्ड ९ मन्त्र ६ १०३ इस प्रकार से जानने वाला जो पुरुष वाणी में सप्तविध साम की उपासना करता है, वह वाणी के सारतत्त्व को प्राप्त कर लेता है तथा प्रचुर अन्न एवं अन्न को पचाने की सामर्थ्य भी प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥ ॥ नवमः खण्डः ॥ अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधँ सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥ अब आदित्य के रूप में सप्तविध साम की उपासना का वर्णन किया जाता है। आदित्य सदा ही सम रहता है, अतः वह साम है। सभी को यही अनुभूत होता है कि वह हमारे प्रति सम है, अतः वह सभी के प्रति समान भाव वाला होने से भी साम है ॥ १ ॥ तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात्तस्य यत्पुरोदयात्स हिंकारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात्ते हिंकुर्वन्ति हिंकारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥ इस आदित्य के ये सम्पूर्ण प्राणी अनुगामी हैं। उसके उदय के पूर्व का रूप हिंकार है। सम्पूर्ण पशु आदि उसके हिंकार रूप के ही अनुगामी हैं। वे उस आदित्य रूप साम के हिंकार रूप के उपासक हैं। उसके उदय होने पर सभी हिंकार करने लगते हैं ॥ २ ॥ अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रस्तुतिकामाः प्रशँसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ३ ॥ उदीयमान सूर्य का जो प्रारंभिक रूप है, वह प्रस्ताव है। सभी मनुष्य उसी रूप के अनुगामी हैं। वे इस सामरूप प्रस्ताव के स्तोता हैं और उसी की प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप में स्तुति करने की अभिलाषा रखते हैं॥ ३ ॥ अथ यत्सङ्गववेलायाँ स आदिस्तदस्य वयाँस्यन्वायत्तानि तस्मात्तान्यन्तरिक्षेऽना- रम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनि ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥ जो सङ्गव वेला (सूर्योदय से तीन मुहूर्त अर्थात् लगभग ढाई घण्टे तक का समय) में आदित्य का रूप रहता है, वह आदि रूप है। समस्त पक्षीगण उसी रूप के आश्रय में रहते हैं। वे उसी आदि रूप साम का भजन करने वाले हैं, अतः वे अपने आश्रय को छोड़कर अन्तरिक्ष में स्वच्छन्द विचरण करते हैं ॥ ४ ॥ अथ यत्संप्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात्ते सत्तमाः प्राजापत्या- नामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥ तदनन्तर मध्य दिवस में आदित्य का जो रूप होता है, वह उद्गीथ रूप है। समस्त देवगण उसी उद्गीथ रूप के अनुगामी हैं। चूँकि वे उद्गीथ रूप साम के भागी (उपासक) हैं, अतः प्रजापति से उत्पन्न प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ हैं ॥ ५ ॥ अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात्प्रागपराह्नात्स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्तास्तस्मात्ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥ आदित्य का जो रूप मध्याह्न के बाद और अपराह्न से पूर्व का होता है, वह प्रतिहार है। सभी गर्भ उसी रूप के अनुगामी हैं। चूँकि वे प्रतिहाररूप साम के भागी हैं, अतः वे ऊपर की ओर आकृष्ट होने पर भी नीचे नहीं गिरते ॥ ६ ॥

१०४ छान्दाग्योपनिषद् अथ यदूर्ध्वमपराह्नात्प्रागस्तमयात्स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात्ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षः श्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७॥ अपराह्न के पश्चात् और सूर्यास्त के पहले आदित्य का जो रूप होता है, वह उपद्रव है। सभी वन्य प्राणी उस रूप के अनुगामी हैं, अतः वे पुरुष को देखकर भय से वन अथवा गुफा में चले जाते हैं ॥ ७ ॥ अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात्तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यः सप्तविधः सामोपास्ते ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् अस्त होते हुए सूर्य का जो रूप है, वह निधन है। पितृगण उसके उस रूप के अनुगामी हैं। चूँकि वे पितृगण निधन रूप साम के उपासक हैं, अतः उन्हें प्रजा (श्राद्धकाल में दर्भ पर) स्थापित करती है। इस प्रकार इस आदित्य रूप साम की सप्तविध उपासना की जाती है ॥ ८ ॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधःसामोपासीत हिंकार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥ तदनन्तर आत्मा तुल्य अतिमृत्यु रूप सप्तविध साम की उपासना का वर्णन किया जाता है। शब्द 'हिंकार' तीन अक्षरों वाला है तथा 'प्रस्ताव' भी तीन अक्षरों वाला है, अतः दोनों समान हैं ॥ १ ॥ आदिरिति द्वयक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥ शब्द 'आदि' दो अक्षरों से बना है और 'प्रतिहार' शब्द चार अक्षरों से बना है। इसमें से एक अक्षर निकालकर 'आदि' शब्द में जोड़ने से वे समान हो जाते हैं ॥ २ ॥ उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥ 'उद्गीथ' शब्द तीन अक्षरों वाला है और उपद्रव चार अक्षरों वाला है। ये तीन-तीन अक्षरों में समान हैं, एक अक्षर शेष रह जाता है। यह शेष रहने वाला 'अक्षर' कहा जाता है, इसमें भी तीन अक्षर हैं, अतः वह भी समान है ॥ निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥ 'निधन' शब्द तीन अक्षरों वाला है, यह उनके समान ही है। इस प्रकार कुल सात शब्दों में बाईस अक्षर हैं ॥ एकविंशत्यादित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्या- ज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥ इक्कीस अक्षरों से साधक आदित्य लोक को प्राप्त करता है। (बारह मास, पाँच ऋतुएँ और तीन लोक मिलकर बीस होते हैं) आदित्य ही इक्कीसवाँ अक्षर है। बाईसवें अक्षर से साधक आदित्य से परे सुख स्वरूप, शोक रहित (स्वर्ग) लोक को प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ आप्नोति हादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजयाज्जयो भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधः सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ इस प्रकार जो साधक परमात्म-तुल्य अति मृत्युरूप सप्तविध साम की उपासना करता है, वह इक्कीसवें अक्षर से आदित्य रूप साम की उपासना करता है और आदित्य लोक को जीत लेता है। बाईसवें अक्षर से वह आदित्य से परे लोक पर विजय प्राप्त करता है ॥ ६ ॥

अध्याय २ खण्ड १३ मन्त्र १ १०५

अध्याय २ खण्ड १३ मन्त्र १ १०५ ॥ एकादशः खण्डः ॥ मनो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्वायत्रं प्राणेषु प्रोतम्॥ १ ॥ अब गायत्र सम्बन्धी विशिष्ट उपासना का वर्णन किया जाता है। मन हिंकार है, वाणी प्रस्ताव है, नेत्र उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है, प्राण निधन है। यह गायत्र-साम प्राणों में प्रतिष्ठित है॥ १॥ स य एवमेतद्वायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या महामनाः स्यात्तद्व्रतम्॥ २॥ जो साधक इस प्रकार गायत्र-साम को प्राणों में अधिष्ठित हुआ जानता है (अनुभव करता है); वह प्राणवान् होता है, पूर्ण आयु को भोगता है और तेजस्वी जीवन जीता है। वह प्रजाओं तथा पशुओं से समृद्ध होता है, महान् यशस्वी होता है, वह महामना बने, ऐसा उसका व्रत होता है (अर्थात् गायत्र उपासक को महामना-उदारचित्त होना चाहिए) ॥ २॥ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ अभिमन्थति स हिंकारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनः सँशाम्यति तन्निधनमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतम्॥ १ ॥ अभिमन्थन से उत्पन्न अग्नि हिंकार है। धूम्रयुक्त अग्नि प्रस्ताव है, प्रज्वलित अग्नि उद्गीथ है, अङ्गारयुक्त अग्नि प्रतिहार है, अग्नि का उपशमन (बुझने लगना) निधन है। अग्नि का सर्वथा शमन होना भी निधन है। यह रथन्तर साम अग्नि में प्रतिष्ठित है॥ १॥ स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत्तद्व्रतम्॥ जो साधक इस प्रकार रथन्तर साम को अग्नि में प्रतिष्ठित जानता है, वह ब्रह्मतेज से सम्पन्न प्रदीप्त जठराग्नि से युक्त होता है। वह पूर्ण जीवन का उपभोग करता है, तेजोमय जीवन व्यतीत करता है। प्रजाओं तथा पशुओं से सम्पन्न होता है। वह महान् कीर्ति से सम्पन्न वृद्धि को प्राप्त होता है। अग्नि की ओर मुख करके साधक भक्षण न करे और न ही थूके-यही उसका व्रत होता है॥ २॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्॥ १ ॥ अब स्त्री-पुरुष के जोड़े के रूप में वामदेव्य साम की उपासना का वर्णन किया जाता है। पुरुष का संकेत देना हिंकार है। अपनी अभिव्यक्ति प्रस्ताव है। शयन उद्गीथ है। उस समय अनुकूल व्यवहार प्रतिहार है। स्नेह और सौहार्द्र पूर्वक साथ-साथ समय व्यतीत करना निधन है। यह वामदेव्य साम स्त्री- पुरुष के जोड़े में प्रतिष्ठित है॥ १॥ [ ऋषि ने दाम्पत्य और उनके माध्यम से चलने वाले प्रजनन चक्र को वामदेव्य साम के अन्तर्गत कहा है। कुछ लोग इस प्रसंग पर अश्लीलता का आरोप लगाते हैं; किन्तु ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऋषि प्रकृति-प्रवाह

१०६ छाान्दोग्योपनिषद के अन्तर्गत चलने वाले प्राण-प्रवाह के विभिन्न चक्रों की व्याख्या विभिन्न साम साधनाओं के रूप में कर रहे हैं। पुरुष-नारी द्वारा संचालित प्रजनन विज्ञान (जेनेटिक साइन्स) को छोड़ा कैसे जा सकता था? वे (ऋषि) तो एक विशिष्ट साम (प्राणों से प्राणी के विकास की श्रेष्ठ साधना) देखते हैं। अस्तु, इस ज्ञान-विज्ञान के प्रसंग में कहीं अश्लीलता की गंध लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए।] स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न कां च न परिहरेत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक दाम्पत्य जीवन को वामदेव्य साम से ओत-प्रोत जानकर तदनुसार व्यवहार करता है, वह सुख से परिपूर्ण रहता है। वह सुसन्तति प्राप्त करता है, वह पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजोमय जीवन जीता है तथा प्रजाओं एवं पशुओं से समृद्ध होता है। वह महान् कीर्ति से वृद्धि को प्राप्त करता है। वह किसी का (अपनी पत्नी का) कभी परित्याग न करे। यही साधक का व्रत है॥ २॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ उद्यन्हिङ्कार उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्नः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेत- द्बृहदादित्ये प्रोतम् ॥ १ ॥ उदीयमान सूर्य हिंकार है, उदित हुआ सूर्य प्रस्ताव है, मध्याह्नकालिक सूर्य उद्गीथ है, अपराह्न कालिक सूर्य प्रतिहार है, अस्त होने वाला सूर्य निधन है। यह बृहत्साम सूर्य में अधिष्ठित है॥ १॥ स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्र्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या तपन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार बृहत्साम को सूर्य में स्थित जानता है, वह तेजस्वी और प्रदीप्त जठराग्नि से सम्पन्न होता है। वह पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजोमय जीवन व्यतीत करता है। वह सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है, वह महान् कीर्ति से वृद्धि को प्राप्त करता है। वह प्रखर सूर्य की कभी निन्दा न करे- यही साधक का व्रत है॥ २॥ ॥ पञ्चदशः खण्डः ॥ अभ्राणि संप्लवन्ते स हिंकारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतम् ॥ १ ॥ मेघों का एकत्र होना हिंकार है। मेघों का बनना प्रस्ताव है। मेघों का जल बरसाना उद्गीथ है। बिजली का चमकना और कड़कना प्रतिहार है, वर्षा का समाप्त होना निधन है। यह वैरूप साम पर्जन्य में प्रतिष्ठित है॥ १॥ स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपाँश्च सुरूपाँश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार वैरूप साम को पर्जन्य में अधिष्ठित जानता है, वह विरूप और सुरूप पशुओं का स्वामी होता है, पूर्ण आयु का उपभोग करता है, ज्योतिर्मय जीवन व्यतीत करता है। वह सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है। वह महान् कीर्ति से प्रतिष्ठित होता है। वह बरसते मेघों की निन्दा न करे- यह उसका व्रत होता है॥ २ ॥

अध्याय २ खण्ड १८ मन्त्र २ १०७

अध्याय २ खण्ड १८ मन्त्र २ १०७ ॥ षोडशः खण्डः ॥ वसन्तो हिंकारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत्प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतम्॥ १ ॥ वसन्त ऋतु हिंकार है, ग्रीष्म ऋतु प्रस्ताव है, वर्षा ऋतु उद्गीथ है, शरद् ऋतु प्रतिहार है, हेमंत ऋतु निधन है। यह वैराज साम ऋतुओं में अधिष्ठित है ॥ १ ॥ स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्यर्तूंन्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार वैराज साम को ऋतुओं में अधिष्ठित जानता है, वह सुसन्तति, पशु आदि सम्पदा एवं ब्रह्मतेज से सम्पन्न होता है। वह पूर्ण आयु का उपभोग करता है, ज्योतिर्मय जीवन व्यतीत करता है, सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है, कीर्ति से सम्पन्न होकर वृद्धि पाता है। साधक ऋतुओं की निन्दा न करे- यही उसका व्रत होता है ॥ २ ॥ ॥ सप्तदशः खण्डः ॥ पृथिवी हिंकारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्कर्यो लोकेषु प्रोताः ॥ १ ॥ पृथिवी हिंकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, द्युलोक उद्गीथ है, दिशाएँ प्रतिहार हैं और समुद्र निधन है। यह शक्करी साम लोकों में अधिष्ठित है ॥ १ ॥ स य एवमेताः शक्कर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या लोकान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार शक्करी साम को लोकों में अधिष्ठित जानता है, वह लोकों की विभूतियों से सम्पन्न होता है, वह सम्पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजस्वी जीवन जीता है। वह सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है, कीर्ति से वृद्धि को पाता है। वह साधक लोकों की निन्दा न करे- यही उसका व्रत है ॥ ॥ अष्टादशः खण्डः ॥ अजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः ॥ १ ॥ बकरी हिंकार है, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, घोड़े प्रतिहार हैं और पुरुष निधन है- यह रेवती साम पशुओं में अधिष्ठित है ॥ १ ॥ स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान्भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या पशून्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार रेवती साम को पशुओं में अधिष्ठित जानता है, वह पशुओं से समृद्ध होता है, वह पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजस्वी जीवन जीता है। वह सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है। वह कीर्ति के द्वारा महान होता है। वह साधक पशुओं की निन्दा - यही उसका है॥ २ ॥

॥ एकोनविंशः खण्डः ॥

१०८ छाान्दोग्योपनिषद् ॥ एकोनविंशः खण्डः ॥ लोम हिंकारस्त्वक्प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञा- यज्ञीयमङ्गेषु प्रोतम् ॥ १ ॥ लोम हिंकार है, त्वचा प्रस्ताव है, मांस उद्गीथ है, अस्थि प्रतिहार है और मज्जा निधन है। यह यज्ञा-यज्ञीय साम शारीरिक अङ्गों में सन्निहित है ॥ १ ॥ स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गी भवति नाङ्गेन विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात्तद्व्रतं मज्ज्ञो नाश्नीयादिति वा ॥ २ ॥ जो साधक इस यज्ञायज्ञीय साम को अङ्गों में सन्निहित जानता है, वह सम्पूर्ण अङ्गों से सम्पन्न होता है, किसी अङ्ग से हीन नहीं होता। वह सम्पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजस्वी जीवन जीता है। वह सुसन्तति और पशुओं से समृद्ध होता है। वह महान् यशस्वी होता है। वह साधक एक वर्ष तक अथवा सर्वदा ही मांस भक्षण न करे- यही उसका व्रत है ॥ २ ॥ ॥ विंशः खण्डः ॥ अग्निहिंकारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतम् ॥ १ ॥ अग्नि हिंकार है, वायु प्रस्ताव है, आदित्य उद्गीथ है, नक्षत्र प्रतिहार है, चन्द्रमा निधन है। यह राजन साम देवों में अधिष्ठित है ॥ १ ॥ स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानाꣳ सलोकताꣳ साष्टिताꣳ सायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत्तद्व्रतम् ॥ २ ॥ जो साधक इस प्रकार राजन साम को देवताओं में प्रतिष्ठित जानता है, वह उन्हीं देवों के लोकों, ऐश्वर्यों और एकरूपता को प्राप्त हो जाता है। वह पूर्ण आयु का उपभोग करता है, तेजस्वी जीवन जीता है, सुसन्तति और पशुओं द्वारा समृद्ध होता है, यशस्वी होकर महान् बनता है। वह साधक ब्राह्मणों को निन्दा न करे-यही उसका व्रत है ॥ २ ॥ ॥ एकविंशः खण्डः ॥ त्रयी विद्या हिंकारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्व्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयाꣳसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतम् ॥ १ ॥ त्रयी वेद विद्या हिंकार है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और द्युलोक - ये तीन लोक प्रस्ताव हैं। अग्नि, वायु और आदित्य ये उद्गीथ हैं। नक्षत्र, पक्षी और किरणें ये प्रतिहार हैं। सर्प, गन्धर्व और पितृगण- ये निधन हैं। यह साम सम्पूर्ण जगत् में प्रतिष्ठित है ॥ १ ॥ स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतं वेद सर्वꣳ ह भवति ॥ २ ॥ जो साधक इस साम को सम्पूर्ण जगत् में प्रतिष्ठित जानता है, वह सर्वरूप हो जाता है ॥ २ ॥