भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

१०० अभिज्ञानशाकुन्तलम्

विदूषकः—तेण हि लहु परित्ताअदु णं भवं । मा कस्स वि तवस्सिणो इंगुदी-तेल्लमस्सचिक्कणसीसस्स हत्थे पडिस्सदि [ तेन हि लघु परित्रायतामेनां भवान् । मा कस्यापि तपस्विन इंगुदीतैलमिश्रचिक्कणशीर्षस्य हस्ते पतिष्यति ] ।

त्रोटिताशोकनवपल्लवमिव वेधादिदोषहीनं हीरकादिरत्नमिव, अभुक्तरसं मधु इव, अभुक्तपरिपाकं सुकृतफलमिव ब्रह्मदेवः कं भाग्यवन्तं पुमांसं तद्रूपभोक्तारं सृष्टवानिति न वेद्मि-यतो हि विधेर्विलसितानि दुर्ज्ञेयानि भवन्ति ।

अत्र परिकर-मालोपमा-शोभा-श्रुतिवृत्त्यनुप्रासा अलङ्काराः छन्दश्च शिखरिणी ॥१०॥

विदूषकः—राजोक्तिं श्रुत्वा विदूषक आह—तेन हि = यस्मात् सा स्त्रीललामभूता भवद्विवाहयोग्या च तस्मात् कारणात् निश्चयेन—लघु = द्रुतम्, इदानीमेव भवान् = त्वम् परित्रायतां = रक्ष एनां = शकुन्तलाम् परपरिग्रहरूपान् भयाद्रक्षतु स्वयमेनामङ्गीकुरुतामित्यर्थः। मां = इदं न स्यात् यत् इङ्गुद्याः तैलम् इङ्गुदीतैलं = तापसतैलं तेन मिश्रं = सम्पृक्तम् अतः चिक्कणं = स्निग्धं शीर्ष =मस्तकं यस्य स तस्येङ्गुदीतैलमिश्रशीर्षस्य कस्यापि = कस्यचित् तपस्विनः = तापसस्य हस्ते = पाणौ पतिष्यति = यास्यति । अतस्तपनात् पूर्वमेव भवान् तां स्वीकुरुतामिति भावः ।

फल बतलाया है जिसका तात्पर्य है कि अभीतक किसी पुरुष ने इस शकुन्तला के सौन्दर्य एवं सौकुमार्य का उपभोग नहीं किया है। यही तात्पर्य नखों से आलून पल्लव, अनाविद्धरत्न, अनास्वादित मधु तथा पुण्यों के अखण्ड फल से भी निकलता है। वन में उत्पन्न शकुन्तला के लिए जंगली फूल, पल्लव, रत्न तथा मधु की उपमा देकर कवि ने अपना नैसर्गिक प्रवृत्ति चित्रण की ओर किया है क्योंकि वन एवं पर्वतों के उपादानों का ग्रहण करना उनका स्वाभाविक गुण है। शकुन्तला ने लावण्य के लिए पुष्प की उपमा देने से कवि ने उसमें सुगन्धि होने से उसे पद्मिनी नायिका होने का संकेत किया है, नखों से अच्छिन्न पल्लव की उपमा से कोमलता, सुन्दर और नयापन व्यक्त किया गया है। सूँघने से फूल की सुगन्ध कम होती है तथा नाखून से तोड़ने पर पत्तों में खरोंच से चिह्न हो जाता है। अनास्वादित मधु की उपमा पुष्पों की ओर मधुपके समान पुरुषों के लिए शकुन्तला का सौन्दर्य अत्यन्त लुभावना प्रतीत होता है। मधु में नया अनास्वादित विशेषण महत्त्वपूर्ण है। पुराना और आस्वादित होने से मधु में विकृति आ जाती है और स्वाद में विरसता होती है। बींधे हुए रत्न को उत्तमता नहीं मानी गयी है, रत्न परीक्षा के प्रसंग में सारसमुच्चय में अनाविद्ध रत्न को उत्तम बताया गया है—

'वृत्तं स्निग्धसमुज्ज्वलं शुचिगुरु श्वेतं बृहत् कोमलम् ।
स्वच्छान्तं समसूक्ष्म वेधसुरभि त्रासादिभिर्वर्जितम् ॥'

यहाँ शकुन्तला के रूप को कवि ने अनघ कहा है, जो विश्वकोश के अनुसार निर्मल का पर्यायवाची है—'अनघो निर्मला पापमनोज्ञेषु च मेघवत् ।' और रूप का लक्षण इस प्रकार है—

'अङ्गान्यभूषितान्येव प्रक्षेपार्थैर्विभूषणैः ।
येन विभूषितवद् भान्ति तद्रूपमिति कथ्यते ॥'

विदूषक—तो मित्र ! आप शीघ्रता से शीघ्र वहाँ पहुँच जाइए। कहीं वह शकुन्तला इंगुदी के तेल से चिकने शिर वाले मैले-कुचैले किसी तपस्वी ब्राह्मण कुमार के हाथ में न पड़ जाय। अर्थात् किसी तपस्वी से उसका विवाह न हो जाय ।

विशेष—यहाँ हास्यप्रिय विदूषक का कहना भी हास्यमय ही है—वह राजा को उपदेश देता है कि जब उसका उपभोक्ता कौन होगा ? यह निश्चय नहीं, तो आप शीघ्र जाकर उससे विवाह कर लें । अन्यथा किसी अयोग्य से उसका विवाह न हो सके ।