भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पृष्ठ 190
१०८अभिज्ञानशाकुन्तलम्

अध्याक्रान्ता वसतिरमुनाप्याश्रमे सर्वभोग्ये रक्षायोगादयमपि तपः प्रत्यहं संचिनोति। अस्यापि द्यां स्पृशति वशिनश्चारणद्वन्द्वगीतः पुण्यः शब्दो मुनिरिति मुहुः केवलं राजपूर्वः ॥ १४ ॥

तेजोविशेषो दीप्तिः तद्वतः दीप्तिमतोऽपि = तेजस्विनोऽपि अस्य = राज्ञो दुष्यन्तस्य वपुषः = शरीरस्य विश्वसनीयता — विश्रम्भभाजनता, विश्वासोत्पादकप्रसादगुणशालिता। अथवा = पक्षान्तरे नेदं विस्मयास्पदम् उपपन्नम् = उचितं युक्तमेव एतत् = इदं वस्तु विश्वासपात्रता ऋषिभ्यः = मुनिभ्यः नातिभिन्ने = अत्यन्तभेदरहिते प्रायः समाने राजनि = प्रजारञ्जन-शीले भूपतौ दुष्यन्ते। कृतः = यतः।

अन्वयः—अमुना अपि सर्वभोग्ये आश्रमे वसतिः अध्याक्रान्ता। अयमपि रक्षायोगात् प्रत्यहं तपः सञ्चिनोति वशिनः अस्यापि चारणद्वन्द्वगीतः केवलं राजपूर्वः मुनिः इति पुण्यः शब्दः मुहुः द्यां स्पृशति।

प्रथमो मुनिकुमारो राज्ञो दुष्यन्तस्य ऋषि समानतां समर्थयति—अध्याक्रान्तेति। अमुना = राज्ञा दुष्यन्तेन सर्वभोग्ये = सर्वै = ब्रह्मचारिप्रभृतिभिः भोग्ये आश्रयणीये गृहस्थाश्रमे यद्वा सर्वाणि = पृथवीधनरत्नवनितादीनि भोग्यानि यस्मिन् तथाविधे आश्रमे = राज्याश्रमे वसतिः = गृहं निवासो वा अध्याक्रान्ता = स्वीकृता। मुनिपक्षे सर्वैः अध्यय-नार्थमागतैः आश्रमवासिभिः शिष्यैः आश्रयणीये ब्रह्मचर्याश्रमे स्थानमङ्गीकृतम्। ऋषि-वदसावपि आश्रमवासीति भावः। अयमपि = एष राजापि रक्षायोगात् = रक्षेव = प्रजापालनमेव योगः = उपायः तस्मात् यद्वा रक्षाया योगः = उद्योगः तस्मात् प्रत्यहं =

दयालुता तथा सज्जनता झलक रही है। अथवा ऋषितुल्य इस राजा में यह साधु शीलता तो उचित ही है, क्योंकि—

यह राजा भी ऋषि-मुनियों की तरह सबके उपकार करने वाले आश्रम = गृहस्थाश्रम में निवास करता है। प्रजा की उचित रक्षा करके यह भी प्रतिदिन तप का संचय करता है = अपना पुण्य तथा तप बढ़ाता है। इन्द्रिय विजयी इस राजा का पुण्य, यश तथा राजपूर्वक मुनि शब्द चारणों द्वारा देवलोक में गाया जाता है। अर्थात् स्वर्ग लोक में देवता लोग इन्हें राजर्षि नाम से स्मरण करते हैं। अतः यह राजा तपस्वी मुनियों की तरह परोपकारपरायण होने से राजर्षि नाम से प्रसिद्ध हैं। इन दोनों में अन्तर इतना ही है कि इनके नाम में ऋषि के पहले राज शब्द सम्बद्ध है। अतः इन्हें राजर्षि कहते हैं ॥ २४ ॥

विशेष—यहाँ श्लेषालङ्कार की महिमा से राजा का चरित्र ऋषियों के चरित्र के समान दिखाया गया है। गृहस्थ तथा मुनि ये दोनों परोपकारी होते हैं। उपकार निरत मुनियों की तो बात ही अलग है, पर गृहस्थ भी अपनी अर्जित सम्पत्ति से सभी आश्रमों के लोगों का पालन करता है इसीलिए गृहस्थाश्रम को सर्वभोग्य बताया है। भगवान् मनु के अनुसार गृहस्थाश्रम सर्वश्रेष्ठ बताया गया है, क्योंकि वह इतर तीनों ब्रह्मचर्याश्रम, वानप्रस्थाश्रम तथा संन्यासाश्रम का पालन-पोषण करता है:—

‘सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः।
गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रीनेतान् बिभर्ति हि ॥
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम्।
तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥’ ६।८९, ९० ॥