भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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१९४ अभिज्ञानशाकुन्तलम्

[ आताम्रहरितपाण्डुर जीवितसर्वस्व वसन्तमासस्य । दृष्टोऽसि चूतकोरक ऋतुमङ्गल त्वां प्रसादयामि ॥ ]

**द्वितीया—**परहुदिए किं एआइणी मंतेसि ? । [ परभृतिके किमेकाकिनी मन्त्रयसे ? । ]

**प्रथमा—**महुअरिए चूदकलिअं देखिअ उम्मत्तिआ परिहुदिआ होदि । [ मधुकरिके ! चूतकलिकां दृष्ट्वोन्मत्ता परभृतिका भवति । ]

नवोद्गतताम्रकोरकमवलोक्य प्रथमा चेटी = तयोरेका दृष्टमना चेटी तमवलोकयन्ती वदति—आताम्रेति । ईषत्ताम्रः आताम्रः आताम्रश्च हरितश्च पाण्डुरश्चेति आताम्रहरितपाण्डुरः तत्सम्बुद्धौ हे आताम्रहरितपाण्डुर ! ताम्र श्यामल-शुभ्रेति-वर्णत्रयमिश्रित ! वसन्तमासस्य = मधुमासस्य चैत्रस्य जीवितसर्वस्व = जीवनसारतमः ! ऋतुमङ्गल ! = ऋतोः वसन्तस्य मङ्गल ! प्रशंसा ! वसन्तश्रेयस्कर । चूतकोरक ! = आम्रमुकुल ! दृष्टोऽसि त्वमद्य दैवात् अवलोकितोऽस्ति त्वां भवन्तं प्रसादयामि = स्वागतं व्याहरामि त्वं तथा प्रसन्नो भव यथाऽस्मिन् वसन्तेऽहं सुखं वसेयमित्यर्थः ।

अत्र स्वभावोक्तिरलङ्कार आर्याच्छन्दश्च ॥ २ ॥

**द्वितीया—**हे परभृतिके ! एकाकिनी = स्वयमेव, केवला किमेतन् मन्त्रयसे = किमदमालपसि ? उन्मत्तेव एकाकिनी किमिति जल्पसीत्यर्थः ।

**प्रथमा—**अथ सा परभृतिकानाम्नी प्रथमाचेटी मधुकरिका नामधेयां द्वितीयां चेटीं श्लेषवक्रोक्त्या प्रतिवदति—**मधुकरिके ! चूतकलिकां=**आम्रकोरकं, रसालमञ्जरीं **दृष्ट्वा=**विलोक्य **उन्मत्ता=**वातुला **परभृतिकां=**कोकिला भवति । अहम् परभृतिका नाम चेटी च यथा कोकिला चूताङ्कुरं दृष्ट्वा हृष्यति तथाहमपि परभृतिका नाम चेटी नामसाम्यात्

सच्चे जीवन स्वरूप वसन्त ऋतु के मङ्गलमय आगमन की सूचना देने वाले हे आम्रकोरक = आम्रमञ्जरी ? आपका दर्शन कर आपका अभिनन्दन करती हूँ ॥ २ ॥

**विशेष—**आकाशं याति अनेनेति आकाशयानं तेन आकाशयानेन इसका अर्थ वायुयान भी हो सकता है, या आकाशमार्ग से भी हो सकता है । इन्द्रलोक की अप्सराओं में आकाशमार्ग से आने जाने की अद्भुत शक्ति होती है । अप्सरातीर्थ में दिव्य अप्सराओं की बारी-बारी से यह देखने की ड्यूटी होती थी कि स्नान के समय कहीं कोई दुर्घटना न हो जाय ।

तिरस्करिणी विद्या के द्वारा दैवी शक्ति प्राप्त व्यक्ति मन्त्र पढ़कर अदृश्य हो जाता है । दूसरे लोग उसे नहीं देख सकते हैं, किन्तु वह दूसरों को भली-भाँति देख सकता है । देवयोनि में तिरस्करिणी विद्या का प्रभाव रहता है । अतः सानुमती अप्सरा ने तिरस्करिणी विद्या के प्रभाव से छिपकर दोनों उद्यानपालिकाओं के अगल-बगल रहकर राजा दुष्यन्त का कृत्य देखने का प्रयास किया था ।

**दूसरी दासी—**अरी परभृतिके ! तू अकेली, अकेली क्या बड़बड़ा रही है ?

**पहली दासी—**मधुकरिके ! चूतकलिका = आम्रमञ्जरी को देखकर परभृतिका उन्मत्त-सी हो रही है ( परभृतिका कोयल को कहते हैं तथा पहली चेटी का भी यही नाम हैं ) अर्थात् मैं आम की कली को देखकर कोयल की तरह मस्त होकर स्वयं ही चहचहा रही हूँ ।

**विशेष—**दूसरी दासी का नाम मधुकरिका है जिसका अर्थ नन्हीं भ्रमरी है, परभृतिका का अर्थ कोयल होने से पहली चेटी अपने नाम का कौशल पूर्ण प्रयोग कर रही है ।