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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सग १ ] हिन्दीटीकासहित ( १६१)

रामायणमिदं श्रुत्वा न मातुर्जठरे विशेत् ॥ वेदाश्चत्वार एकत्र तुलया चेदमेकतः ॥ १७ ॥ विधात्रा तुलितं शास्त्रं सर्वदेवाग्रतो द्विज ॥ इदं तु सर्ववेदेभ्यो गौरवादतिरिच्यते ॥ १८ ॥

इस रामायणको सुनकर फिर माताके उदरमें प्रवेश करना नहीं पड़ता, चार वेद एक ओर और रामायण एक ओर रखकर ॥ १७ ॥ विधाताने देवताओंके सामने इसको तोला तो यह गौरवमें वेदोंसे अधिक पाई गई ॥ १८ ॥

शक्राय स्वर्णदीतीरे पुरा पृष्टोऽहमब्रुवम् ॥ तदेव तव चाख्यात- मद्भुतोत्तरकाण्डकम् ॥ १९ ॥ रामायणं महारत्नं ब्राह्महृत्क्षीरधाव- भूत् ॥ नारदान्तः समासाद्य क्रमान्मम हृदि स्थितम् ॥ २० ॥

स्वर्णके किनारे पहले मैंने इन्द्रके पूंछनेपर यह कथा कही थी वही अद्भुतोत्तर काण्ड तुमसे वर्णन किया है ॥ १९ ॥ यह रामायणरूपी महारत्न ब्रह्माजीके हृदय रूपी क्षीर समुद्रमें स्थित था, फिर वह नारदके अन्तरमें प्राप्त हो क्रमसे मेरे हृदयमें प्राप्त हुआ है ॥ २० ॥

तत्सर्वं ब्रह्मणो लोके निःशेषमवतिष्ठते ॥ किंचिदुर्व्यां च पाताले त्रिदिवे शक्रसन्निधौ ॥ २१ ॥ विरिंचिनारदोऽहं च त्रय एवास्य पारगाः ॥ चतुर्थो नोपपद्येत बुद्ध्वेदं सुस्थिरो भव ॥ २२ ॥ यदुक्तमद्भुते काण्डे पुनस्ते कथयाम्यहम् ॥ श्रीरामजन्मवृत्तान्तः श्रीमतीचरितं महत् ॥ २३ ॥ दण्डकारण्यकस्थानां शोणितेन महा त्मनाम् ॥ नारदस्य च शापेन लक्ष्म्याश्चैवापराधतः ॥ २४ ॥

यह सब चरित्र तो ब्रह्मलोकमें स्थित है, कुछ पृथ्वी पातालमें और स्वर्गमें इन्द्रके समीप स्थित है ॥ २१ ॥ ब्रह्मा नारद और मैं यह तीनही इसके परगामी हैं चौथा नहीं है ऐसा जानकर स्थिर हो ॥ २२ ॥ जो कुछ इस अद्भुतोत्तर काण्डमें कहा है उसकी सूची तुमसे कहता हूं, रामजन्मका वृत्तान्त, श्रीमतीका चरित्र ॥ २३ ॥ दण्डकारण्यमें रहनेवाले महात्मा ऋषियोंका रुधिर लेना, नारदके शापसे और लक्ष्मीके अपराधसे ॥ २४ ॥

मंदोदरीगर्भनिष्ठा वैदेही जन्म चोक्तवान् ॥ रामस्य विश्वरूपं च भार्गवेण च वीक्षितम् ॥ २५ ॥ ऋष्यमूके हनुमता चतुर्बाहूरघू- त्तमः ॥ दृष्टो भिक्षुस्वरूपेण सुग्रीवसख्यमुक्तवान् ॥ २६ ॥ ११

(१६२) अद्भुतरामायण [ सप्तविंशति

मन्दोदरीके गर्भसे जानकीका जन्म, रामचन्द्रका भार्गवको विश्वरूप दिखाना ॥ २५ ॥ ऋष्यमूकमें हनुमानजीको चतुर्बाहुरूप दर्शन देना और भिक्षुरूपसे महाराजसे मिलकर सुग्रीवकी मित्रता करानी ॥ २६ ॥

लक्ष्मणांगजतापेन शोषणं वारिधेः पुनः ॥ प्राप्तराज्यस्य रामस्य मुनीना सन्निधौ तथा ॥ २७ ॥ सीतायाः कथनं श्रुत्वा सहस्रास्यस्य रक्षसः ॥ मानसोत्तरशैलेदे स्थितिं ज्ञात्वा रघूद्वहः ॥ २८ ॥

फिर लक्ष्मणके अंगसे उत्पन्न हुए तापसे सागरको सुखाना, फिर राज्य प्राप्त होकर मुनियोंके निकटमें ॥ २७ ॥ जानकीसे सहस्रमुखी रावणका वृत्तान्त सुनकर और उसकी स्थिति मानसके उत्तर भागमें जानकर ॥ २८ ॥

जगाम पुष्करद्वीपं भ्रातृभि सह वानरैः ॥ सीताया ऐश्वरं रूपं रावणस्य वधस्तथा ॥ २९ ॥ अयोध्यागमनं रामस्यैष वृत्तान्त संग्रहः ॥ वृत्तान्तसंग्रहं चापि पठित्वा रामभक्तिमान् ॥ जायते मुनिशार्दूल नात्र कार्या विचारणा ॥ ३० ॥

रामचन्द्र भाइयों सहित पुष्करद्वीपको गये, सीताका ईश्वर सम्बन्धी रूप और सहस्रमुख रावणका वध ॥ २९ ॥ फिर अयोध्यामें आगमन रामवृत्तांत-संग्रह है, राममें भक्ति करनेवाला इसही वृत्तान्तको पाठकर रघुनाथमें भक्ति-मान् होता है, हे मुनिराज ! इसमें सन्देह नहीं ॥ ३० ॥

पठेच्च यो रामचरित्र मेतत्पुनाति पापात्सुकृतं लभेत ॥ तीर्था-भिषेकं समरे जयं च स सर्वयज्ञस्य महत्फलं च ॥ ३१ ॥ भजेत यो राममर्चित्यरूपमेकेन भावेन च भूमिपुत्रीम् ॥ एतत्सुपुण्यं शृणुयात्प-ठेद्वा भूयो भवेन्नो जठरे जनन्याः ॥ ३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीसीता-रामयोरयोध्यागमनं नाम सप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २७ ॥

जो कोई इस रामचरित्रको पढता हैं, वह तरकर सुकृत को प्राप्त होता है; तीर्थका अभिषेक, समरमें जय और सब यज्ञका महाफल प्राप्त करता है ॥ ३१ ॥ जो अचिन्त्यरूप रामका भजन करता है वा एक भावसे जानकीका भजन करता है, इस पवित्र ग्रन्थको सुनता व पढता हैं वह फिर माताके गर्भमें स्थित नहीं होता, मुक्त हो जाता है ॥ ३२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डेमुरादाबादनिवासी पं. सुखानन्दमिश्रात्मज पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां श्रीसीता-रामयोरयोध्यागमनं नाम सप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २७ ॥

श्लोकसंख्या १३५३.

वाल्मीकी नारद ऋषी, महावीर शिर नाय ॥
बूझी कुलगुरु शिव शिवा, गणपति गिरा मनाय ॥ १ ॥
रामचरित भाषा कियो, द्विज ज्वालापरसाद ॥
पढहिं सुनहिं सुख लहहिं जन, ऋषियनको संवाद ॥ २ ॥
राम लषण सीता भरत, रिपुहन पवनकुमार ॥
प्रेम सहित वन्दहुँ चरण, हितकृत वारंवार ॥ ३ ॥
कृपादृष्टिकी वृष्टि जिमि, करत हमारी ओर ॥
तैंसिय कीजै नित्य प्रति, दयादृगनकी कोर ॥ ४ ॥
संवत गुणशरअंकविधु, भाद्रशुक्ल रविवार ॥
सुखदायक तिथि सप्तमी, पूरचो ग्रन्थविचार ॥ ५ ॥


पुस्तक मिलनेका ठिकाना-

| खेमराज श्रीकृष्णदास, <br> 'श्रीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, <br> खेतवाड़ी-बम्बई. | गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, <br> 'लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, <br> कल्याण-बम्बई. |

श्री १०८ अवधड़ पीर बाबा नारायण

का धर्म पूत बाबा भूतनाथ अवधड़

श्री गुरु स्थान- ग्राम मल्हापुर
डा० सिरसगंज
जि० मैनपुरी

जन्म तिथि पूर्णिमा अगहन १९६५
बुद्धवार

बुक-पोस्ट

शुभविवाह

तिलकोत्सव एवं प्रीतिभोज

दिनांक-11 मई 2013, शनिवार
(सायं 6 बजे से आपके आगमन तक)

सपरिवार
[श्री]राम पोरेवाल जी (कामरेड)
इटावा


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