अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
अयोध्याकाण्ड
श्रीसीतारामाभ्यां नमः
अध्यात्मरामायण
अयोध्याकाण्ड
श्रुत्वैव यो भूपतिमात्तवाचं वनं गतस्तेन न नोदितोऽपि ।
तं लीलयाऽऽह्लादविषादशून्यं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥
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श्रीसीताराम
कथं मामिच्छसे त्यक्तुं धर्मपत्नीं पतिव्रताम् ॥ ( अ० रा० अयो० ४ । ७१ )
अयोध्याकाण्ड - सर्ग १: भगवान् रामके पास नारदजीका आना
ॐ
अध्यात्मरामायण
अयोध्याकाण्ड
प्रथम सर्ग
भगवान् रामके पास नारदजीका आना ।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले- |
|---|---|
| एकदा सुखमासीनं रामं स्वान्तःपुराजिरे ।<br>सर्वाभरणसंपन्नं रत्नसिंहासने स्थितम् ॥ १ ॥ | हे पार्वति ! एक दिन जब सर्वाङ्कारविभूषित श्रीरामचन्द्रजी अपने अन्तःपुरके आँगनमें एक रत्नसिंहासनपर सुखपूर्वक बैठे हुए थे ॥ १ ॥ |
| नीलोत्पलदलश्यामं कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ।<br>सीतया रत्नदण्डेन चामरेणाथ वीजितम् ॥ २ ॥ | तथा जिस समय नीलोत्पलदलश्याम कौस्तुभ-मणिमण्डित उन रघुनाथजीपर श्रीसीताजी रत्नदण्ड-युक्त चँवर डुला रही थीं ॥ २ ॥ |
| विनोदयन्तं ताम्बूलचर्वणादिभिरादरात् ।<br>नारदोऽवतरद्द्रष्टुमम्बराद्यत्र राघवः ॥ ३ ॥ | और वे आदरपूर्वक दिये हुए ताम्बूल-चर्वणादिसे आनन्दित हो रहे थे उसी समय उन्हें देखनेके लिये देवर्षि नारदजी आकाशसे उतरे ॥ ३ ॥ |
| शुद्धस्फटिकसङ्काशः शरच्चन्द्र इवामलः ।<br>अतर्कितमुपायातो नारदो दिव्यदर्शनः ॥ ४ ॥<br>तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय रामः प्रीत्या कृताञ्जलिः।<br>ननाम शिरसा भूमौ सीतया सह भक्तिमान् ॥ ५ ॥ | शुद्ध स्फटिक मणिके समान स्वच्छ और शरच्चन्द्रके समान निर्मल दिव्यमूर्ति श्रीनारदजीको इस प्रकार अचानक आते देख शक्तिशाली भगवान् राम सहसा उठ खड़े हुए और सीताजीके सहित प्रेम और भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर पृथिवीपर शिर रखकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ४-५ ॥ |
| उवाच नारदं रामः प्रीत्या परमया युतः ।<br>संसारिणां मुनिश्रेष्ठ दुर्लभं तव दर्शनम् ।<br>अस्माकं विषयासक्तचेतसां नितरां मुने ॥ ६ ॥<br>अवाप्तं मे पूर्वजन्मकृतपुण्यमहोदयैः ।<br>संसारिणापि हि मुने लभ्यते सत्समागमः ॥ ७ ॥ | फिर भगवान् रामने परम प्रीतिपूर्वक नारदजीसे कहा—“हे मुनिश्रेष्ठ ! हम-जैसे विषयासक्त संसारी मनुष्योंके लिये आपका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है । हे मुने ! आज अपने पूर्वजन्म-कृत पुण्य-पुञ्जके उदय होनेसे ही मुझे आपका दर्शन हुआ है, क्योंकि हे मुने ! पुण्योदय होनेपर संसारी पुरुषको भी सत्संग प्राप्त हो जाता है ॥ ६-७ ॥ |
| अतस्त्वद्दर्शनादेव कृतार्थोऽस्मि मुनीश्वर ।<br>किं कार्यं ते मया कार्यं ब्रूहि तत्करवाणि भोः॥ ८ ॥ | अतः हे मुनीश्वर ! आज आपके दर्शनसे ही मैं कृतार्थ हो गया, अब मुझे आपका क्या कार्य करना होगा सो कहिये, उसे मैं (इस समय) पूर्ण करूँ” ॥ ८ ॥ |
६
४२ अध्यात्मरामायण [सर्ग १]
| मूल संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथ तं नारदोऽप्याह राघवं भक्तवत्सलम् ।<br>किं मोहयसि मां राम वाक्यैर्लोकानुसारिभिः ॥९॥<br>संसार्यहमिति प्रोक्तं सत्यमेतत्वया विभो ।<br>जगतामादिभूता या सा माया गृहिणी तव ॥१०॥<br>त्वत्सन्निकर्षाज्जायन्ते तस्यां ब्रह्मादयः प्रजाः ।<br>त्वदाज्ञया सदा भाति माया या त्रिगुणात्मिका ॥११॥<br>सूतेऽजस्रं शुक्लकृष्णलोहिताः सर्वदा प्रजाः ।<br>लोकत्रयमहागेहे गृहस्थस्त्वमुदाहृतः ॥१२॥<br>त्वं विष्णुर्जानकी लक्ष्मीः शिवस्त्वं जानकी शिवा ।<br>ब्रह्मा त्वं जानकी वाणी सूर्यस्त्वं जानकी प्रभा ॥१३॥<br>भवान् शशाङ्कः सीता तु रोहिणी शुभलक्षणा ।<br>शक्रस्त्वमेव पौलोमी सीता स्वाहाऽनलो भवान् ॥<br>यमस्त्वं कालरूपश्च सीता संयमिनी प्रभो ।<br>निर्ऋतिस्त्वं जगन्नाथ तामसी जानकी शुभा ॥१५॥<br>राम त्वमेव वरुणो भार्गवी जानकी शुभा ।<br>वायुस्त्वं राम सीता तु सदागतिरितीरिता ॥१६॥<br>कुबेरस्त्वं राम सीता सर्वसंपत्प्रकीर्तिता ।<br>रुद्राणी जानकी प्रोक्ता रुद्रस्त्वं लोकनाशकृत् ॥१७॥<br>लोके स्त्रीवाचकं यावत्तत्सर्वं जानकी शुभा ।<br>पुन्नामवाचकं यावत्तत्सर्वं त्वं हि राघव ॥१८॥<br>तस्माल्लोकत्रये देव युवाभ्यां नास्ति किञ्चन ॥१९॥<br>त्वदाभासोदिताज्ञानमव्याकृतमितीर्यते ।<br>तस्मान्महांस्ततः सूत्रं लिङ्गं सर्वात्मकं ततः ॥२०॥<br>अहङ्कारश्च बुद्धिश्च पञ्चप्राणेन्द्रियाणि च ।<br>लिङ्गमित्युच्यते प्राज्ञैर्जन्ममृत्युसुखादिमत् ॥२१॥<br>स एव जीवसंज्ञश्च लोके भाति जगन्मयः ।<br>अवाच्यानाद्यविद्यैव कारणोपाधिरुच्यते ॥२२॥ | तब नारदजीने भक्तवत्सल भगवान् रामसे कहा—"हे राम ! आप सामान्य मनुष्योंके-से इन वाक्योंसे मुझे क्यों मोहित कर रहे हैं ॥९॥ हे विभो ! आपने जो यह कहा कि 'मैं संसारी हूँ' सो ठीक ही है, क्योंकि सम्पूर्ण संसारकी जो आदि-कारण है वह माया आपकी गृहिणी है ॥१०॥ हे प्रभो ! आपकी सन्निधिमात्रसे ही उस मायासे ब्रह्मा आदि सब प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं, वह सत्त्व-रज-तमोमयी त्रिगुणात्मिका माया सदा आपके आश्रित होकर ही भानमान होती है तथा स्वगुणानुरूप शुक्ल, लोहित और कृष्णवर्ण प्रजा उत्पन्न करती है। इस त्रिलोकी-रूप महागृहके आप गृहस्थ कहे गये हैं ॥११-१२॥ आप भगवान् विष्णु हैं और जानकीजी लक्ष्मी हैं; आप शिव हैं और जानकीजी पार्वती हैं; आप ब्रह्मा हैं और जानकीजी सरस्वती हैं तथा आप सूर्यदेव हैं और जानकीजी प्रभा हैं ॥१३॥ आप चन्द्रमा हैं, शुभलक्षणा सीताजी रोहिणी हैं; आप इन्द्र हैं और सीता पुलोम-कन्या शची हैं तथा आप अग्नि हैं और सीताजी स्वाहा हैं ॥१४॥ हे प्रभो ! आप सबके कालरूप यम हैं और सीता संयमिनी हैं, हे जगन्नाथ ! आप निरृति हैं और जानकीजी तामसी हैं ॥१५॥ हे राम ! आप वरुण हैं और शुभलक्षणा जानकी भृगु-कन्या वारुणी हैं, आप वायु हैं तथा सीताजी सदागति हैं ॥१६॥ हे राम ! आप कुबेर हैं और सीताजी उनकी सब सम्पत्ति हैं तथा आप लोकसंहारकारी रुद्र हैं और सीताजी रुद्राणी कहलाती हैं ॥१७॥ हे राघव ! निःसन्देह संसारमें जो कुछ पुरुषवाचक है वह सब आप हैं और स्त्रीवाचक सब श्रीजानकीजी हैं; अतः हे देव ! त्रिलोकीमें आप दोनोंसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥१८-१९॥ आपहीके आभाससे प्रकट हुआ अज्ञान अव्याकृत कहलाता है, उससे महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे सूत्रात्मा (हिरण्यगर्भ) और सूत्रात्मासे सर्वात्मक लिंगदेह उत्पन्न होता है ॥२०॥ अहंकार बुद्धि, पञ्चप्राण और दश इन्द्रियाँ—इनके समूहको ही प्राज्ञजन जन्म, मृत्यु और सुख-दुःखादि धर्मों-वाला लिङ्गदेह बताते हैं ॥२१॥ वह (लिंग-देहाभिमानी चेतनाभास) ही जगत्में तन्मय हुआ जीव नामसे विख्यात है। अनिर्वचनीय और अनादि |
सर्ग १ ] अयोध्याकाण्ड ४३
स्थूलं सूक्ष्मं कारणाख्यमुपाधित्रितयं चितेः ।
एतैर्विशिष्टो जीवः स्याद्वियुक्तः परमेश्वरः ॥ २३॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्या संसृतिर्या प्रवर्तते ।
तस्या विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रस्त्वं रघूत्तम ॥ २४॥
त्वत्त एव जगज्जातं त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
त्वय्येव लीयते कृत्स्नं तस्मात्त्वं सर्वकारणम् ॥ २५॥
रज्जावहिमिवात्मानं जीवं ज्ञात्वा भयं भवेत् ।
परात्माहमिति ज्ञात्वा भयदुःखैर्विमुच्यते ॥ २६॥
चिन्मात्रज्योतिषा सर्वाः सर्वदेहेषु बुद्धयः ।
त्वया यस्मात्प्रकाशन्ते सर्वस्यात्मा ततो भवान् ॥
अज्ञानानन्यस्यते सर्वं त्वयि रज्जौ भुजङ्गवत् ।
त्वज्ज्ञानाल्लीयंते सर्वं तस्माज्ज्ञानं सदाम्यसेत् ॥ २८॥
त्वत्पादभक्तियुक्तानां विज्ञानं भवति क्रमात् ।
तस्मात्त्वद्भक्तियुक्ता ये मुक्तिभाजस्त एव हि ॥ २९॥
अहं त्वद्भक्तभक्तानां तद्भक्तानां च किङ्करः ।
अतो मामनुगृह्णीष्व मोहयस्व न मां प्रभो ॥ ३०॥
त्वन्नाभिकमलोत्पन्नो ब्रह्मा मे जनकः प्रभो ।
अतस्तवाहं पौत्रोऽस्मि भक्तं मां पाहि राघव ॥ ३१॥
इत्युक्त्वा बहुशो नत्वा स्वानन्दाश्रुपरिप्लुतः ।
उवाच वचनं राम ब्रह्मणा नोदितोऽस्म्यहम् ॥ ३२॥
रावणस्य वधार्थाय जातोऽसि रघूसत्तम ।
इदानीं राज्यरक्षार्थं पिता त्वामभिषेक्ष्यति ॥ ३३।
यदि राज्याभिसंसक्तो रावणं न हनिष्यसि ।
प्रतिज्ञा ते कृता राम भूभारहरणाय वै ॥ ३४॥
तत्सत्यं कुरु राजेन्द्र सत्यसंधस्त्वमेव हि ।
|
अविद्या ही (इस जीवकी) कारणउपाधि कही जाती है ॥ २२ ॥ शुद्ध चेतनकी स्थूल, सूक्ष्म और कारण—ये तीन उपाधियाँ हैं । इन उपाधियोंसे युक्त होनेसे वह जीव कहलाता है और इससे रहित होनेसे परमेश्वर कहा जाता है ॥ २३ ॥ हे रघूश्रेष्ठ ! जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति-ऐसी जो तीन प्रकारकी सृष्टि है उससे आप विलक्षण हैं और उसके चेतनमात्र साक्षी हैं ॥ २४॥ यह सम्पूर्ण जगत् आपहीसे उत्पन्न हुआ है, आपहीमें स्थित है और आपहीमें लीन होता है । इसलिये आप ही सबके कारण हैं ॥ २५ ॥ रज्जुमें सर्प-भ्रमके समान अपनेको जीव माननेसे मनुष्यको भय होता है पर वही जब यह समझ लेता है कि 'मैं परमात्मा हूँ' तो सम्पूर्ण भय और दुःखोंसे छूट जाता है ॥ २६ ॥ क्योंकि चिन्मात्र ज्योतिस्वरूप आप ही सबके शरीरोंमें स्थित होकर उनकी बुद्धियोंको प्रकाशित कर रहे हैं इसलिये आप ही सबके आत्मा हैं ॥२७॥ रज्जुमें सर्प-भ्रमके समान अज्ञानसे ही आपमें सम्पूर्ण जगत्की कल्पना की जाती है सो आपका ज्ञान होनेसे वह सब लीन हो जाती है । सुतरां मनुष्यको सदा ज्ञानका अभ्यास करना चाहिये ॥२८॥ आपके चरणकमलोंकी भक्तिसे युक्त पुरुषोंको ही क्रमशः ज्ञानकी प्राप्ति होती है, अतः जो पुरुष आपकी भक्तिसे युक्त हैं वे ही वास्तवमें मुक्तिके पात्र हैं ॥ २९॥ हे प्रभो ! मैं आपके भक्तोंके भक्त और उनके भी भक्तोंका दास हूँ; अतः आप मुझे मोहित न कर मुझपर अनुग्रह कीजिये ॥३०॥ हे प्रभो ! आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए ब्रह्माजी मेरे पिता हैं, अतः मैं आपका पौत्र हूँ ! हे राघव ! आप मुझ भक्तकी रक्षा कीजिये' ॥३१॥
इस प्रकार कहकर और बारम्बार प्रणाम कर श्रीनारदजीने नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भरकर कहा—"हे रघूश्रेष्ठ ! मुझे ब्रह्माजीने आपके पास भेजा है; आपका अवतार रावणका वध करनेके लिये हुआ है, किन्तु अब पिता दशरथ आपको राज्यशासनके लिये अभिषिक्त करनेवाले हैं ॥ ३२-३३॥ हे राम ! यदि राज्याभिषिक्त हो जानेपर आप रावणको न मारेंगे तो पृथिवीका भार उतारनेके लिये जो आपने प्रतिज्ञा की थी उसका क्या होगा ? ॥३४॥ अतः हे राजेन्द्र ! आप उसे सत्य कीजिये क्योंकि आप सत्य-प्रतिज्ञ ही हैं।"
अयोध्याकाण्ड - सर्ग २: राज्याभिषेककी तैयारी तथा वसिष्ठजी और रघुनाथजीका संवाद
४४ अध्यात्मरामायण [ सर्गः २
| श्रुत्वैतद्गदितं रामो नारदं प्राह सस्मितम् ॥३५॥<br>शृणु नारद मे किञ्चिद्विद्यतेऽविदितं क्वचित् ।<br>प्रतिज्ञातं च यत्पूर्वं करिष्ये तन्न संशयः ॥३६॥<br>किन्तु कालानुरोधेन तत्तत्प्रारब्धसंक्षयात् ।<br>हरिष्ये सर्वभूभारं क्रमेणासुरमण्डलम् ॥३७॥<br>रावणस्य विनाशार्थं श्वो गन्ता दण्डकाननम् ।<br>चतुर्दश समास्तत्र ह्युषित्वा मुनिवेषधृक् ॥३८॥<br>सीतामिषेण तं दुष्टं सकुलं नाशयाम्यहम् ।<br>एवं रामे प्रतिज्ञाते नारदः प्रमुमोद ह ॥३९॥<br>प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा दण्डवत्प्रणिपत्य तम् ।<br>अनुज्ञातश्च रामेण ययौ देवगतिं मुनिः ॥४०॥<br>संवादं पठति शृणोति संस्मरेद्वा<br>यो नित्यं मुनिवररामयोः स भक्त्या ।<br>सम्प्राप्नोत्यमरसुदुर्लभं विमोक्षं<br>कैवल्यं विरतिपुरःसरं क्रमेण ॥४१॥ | नारदजीके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसका-<br>कर कहा ॥३५॥ “नारदजी ! सुनिये, क्या कोई<br>ऐसी बात भी है जिसे मैं न जानता होऊँ ? मैंने<br>पहले जो कुछ प्रतिज्ञा की है वह मैं निस्सन्देह पूर्ण<br>करूँगा ॥३६॥ किन्तु कालक्रमसे जिन-जिनका प्रारब्ध<br>क्षीण होता जायगा उन-उन दैत्योंको ही मारकर मैं क्रमशः<br>पृथिवीका भार उतारूँगा ॥३७॥ रावणका वध करने<br>के लिये मैं कल दण्डकारण्यको जाऊँगा और वहाँ<br>चौदह वर्ष मुनिवेष धारण कर रहूँगा ॥ ३८ ॥ उस<br>दुष्टको सीता-हरणके मिषसे मैं कुटुम्बके सहित नष्ट<br>कर दूँगा।”<br>रामचन्द्रजीके इस प्रकार प्रतिज्ञा करनेपर नारदजी<br>अति प्रसन्न हुए ॥३९॥ तदनन्तर उन्होंने रामजीकी<br>तीन परिक्रमाएँ कीं और उन्हें दण्डवत्-प्रणाम कर उनकी<br>आज्ञा ले आकाश-मार्गसे देवलोकको चले गये ॥४०॥<br>जो मनुष्य नारद और रामचन्द्रजीके इस संवादको<br>नित्य भक्तिपूर्वक पढ़ता, सुनता या स्मरण करता है<br>वह वैराग्यपूर्वक क्रमशः देवताओंको दुर्लभ कैवल्य<br>मोक्षपद प्राप्त कर लेता है ॥४१॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
राज्याभिषेककी तैयारी तथा वसिष्ठजी और रघुनाथजीका संवाद।
| श्रीमद्महादेव उवाच | |
|---|---|
| अथ राजा दशरथः कदाचिद्रहसि स्थितः ।<br>वसिष्ठं स्वकुलाचार्यमाहूयेदमभाषत ॥ १ ॥<br>भगवन् राममखिलाः प्रशंसन्ति मुहुर्मुहुः ।<br>पौराश्च निगमा वृद्धा मन्त्रिणश्च विशेषतः ॥ २ ॥<br>ततः सर्वगुणोपेतं रामं राजीवलोचनम् ।<br>ज्येष्ठं राज्येऽभिषेक्ष्यामि वृद्धोऽहं मुनिपुङ्गव ॥ ३ ॥<br>भरतो मातुलं द्रष्टुं गतः शत्रुघ्नसंयुतः ।<br>अभिषेक्ष्ये श्व एवाशु भवांस्तच्चानुमोदताम् ॥ ४ ॥<br>सम्भारः सम्भ्रियन्तां च गच्छ मन्त्रय राघवम् ।<br>उच्छ्रीयन्तां पताकाश्च नानावर्णाः समन्ततः ॥५॥ | श्रीमहादेवजी बोले-एक दिन एकान्तमें बैठे हुए<br>राजा दशरथने अपने कुल-पुरोहित वसिष्ठजीको<br>बुलाकर कहा ॥१॥ “भगवन् ! सभी पुरवासी; शास्त्रज्ञ,<br>बड़े-बूढ़े और मन्त्रिजन रामकी विशेषतया बारम्बार<br>प्रशंसा किया करते हैं ॥२॥ इसलिये हे मुनिश्रेष्ठ ! मेरा<br>विचार है कि मैं अपने सर्वगुणसम्पन्न ज्येष्ठ पुत्र कमल-<br>नयन रामको राज्यपदपर अभिषिक्त कर दूँ क्योंकि मैं<br>अब वृद्ध हो गया हूँ ॥३॥ इस समय भरत शत्रुघ्नके<br>साथ अपने मामाके यहाँ मिलने गया है, तथापि मैं<br>कल शीघ्र ही रामका राज्याभिषेक करना चाहता हूँ ।<br>इस विषयमें आप भी अपनी सम्मति दे दीजिये ॥४॥<br>हे मुनिश्रेष्ठ ! आप अभिषेककी सामग्री एकत्रित<br>कराइये और रघुनाथजीके पास जाकर उनको यथोचित<br>सम्मति दीजिये । इस समय नगरमें सब ओर रंग-बिरंगी |
सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४५
तोरणानि विचित्राणि स्वर्णमुक्तामयानि वै ।
आहूय मन्त्रिणं राजा सुमन्त्रं मन्त्रिसत्तमम् ॥ ६ ॥
आज्ञापयति यद्यत्त्वां मुनिस्तत्तत्समाजय ।
यौवराज्येऽभिषेक्ष्यामि श्वोभूते रघुनन्दनम् ॥ ७ ॥
तथेति हर्षात्स मुनिं किं करोमीत्यभाषत ।
तमुवाच महातेजा वसिष्ठो ज्ञानिनां वरः ॥ ८ ॥
श्वः प्रभाते मध्यकक्षे कन्यकाः स्वर्णभूषिताः ।
तिष्ठन्तु षोडश गजः स्वर्णरत्नादिभूषितः ॥ ९ ॥
चतुर्दन्तः समायातु ऐरावतकुलोद्भवः ।
नानातीर्थोदकैः पूर्णाः स्वर्णकुम्भाः सहस्रशः ॥ १० ॥
स्थाप्यन्तां नव चेयाघ्रचर्माणि त्रीणि चानय ।
श्वेतच्छत्रं रत्नदण्डं मुक्तामणिविराजितम् ॥ ११ ॥
दिव्यमाल्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च ।
मुनयः सत्कृतास्तत्र तिष्ठन्तु कुशपाणयः ॥ १२ ॥
नर्तक्यो वारमुख्याश्च गायका वेणुकास्तथा ।
नानावादित्रकुशला वादयन्तु नृपाङ्गणे ॥ १३ ॥
हस्त्यश्वरथपादाता वहिस्तिष्ठन्तु सायुधाः ।
नगरे यानि तिष्ठन्ति देवतायतनानि च ॥ १४ ॥
तेषु प्रवर्ततां पूजा नानाबलिभिरावृता ।
राजानः शीघ्रमायान्तु नानोपायनपाणयः ॥ १५ ॥
इत्यादिश्य मुनिः श्रीमान् सुमन्त्रं नृपमन्त्रिणम् ।
स्वयं जगाम भवनं राघवस्यातिशोभनम् ॥ १६ ॥
रथमारुह्य भगवान्वसिष्ठो मुनिसत्तमः ।
त्रीणि कक्ष्याण्यतिक्रम्य रथात्क्षितिमवातरत् ॥ १७ ॥
अन्तः प्रविश्य भवनं स्वाचार्यत्वादवारितः ।
गुरुमागतमाज्ञाय रामस्तूर्णं कृताञ्जलिः ॥ १८ ॥
प्रत्युद्गम्य नमस्कृत्य दण्डवद्भक्तिसंयुतः ।
स्वर्णपात्रेण पानीयमानिनायाशु जानकी ॥ १९ ॥
झण्डियाँ लगायी जानी चाहिये ॥ ५ ॥ तथा चित्र-विचित्र सुवर्ण और मोतियोंके तोरण (झालर) बाँधे जाने चाहिये।" उसी समय राजाने मन्त्रिश्रेष्ठ सुमन्त्रको बुलाकर आज्ञा दी कि मैं कल रघुनाथजीको युवराज-पदपर अभिषिक्त करूँगा, उसके लिये मुनिवर वसिष्ठजी जो-जो सामग्री बताएँ वह सब एकत्रित करो ॥ ६-७ ॥
राजा दशरथसे 'बहुत अच्छा' कह सुमन्त्रने हर्ष-पूर्वक मुनिवरसे कहा कि 'मैं क्या करूँ?' तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी वसिष्ठजीने उससे कहा—॥ ८ ॥ "कल प्रातःकाल मध्यद्वारपर सुवर्ण-भूषण-भूषित सोलहँ कन्याएँ खड़ी रहनी चाहिये; तथा सुवर्ण और रत्न आदिसे विभूषित ऐरावतके कुलमें उत्पन्न एक चार दाँतोंवाला हाथी रहना चाहिये, नाना तीर्थोंके जलसे पूर्ण हजारों सुवर्ण-कलश मँगवाये जायें ॥ ९-१० ॥ तीन नवीन व्याघ्र-चर्म लाकर रक्खो और मुक्ता-मणि-सुशोभित रत्नदण्डयुक्त एक श्वेत छत्र लाओ ॥ ११ ॥ अनेकों दिव्य मालाएँ, दिव्य वस्त्र और दिव्य आभूषण लाकर रखे जाने चाहिये तथा अभिषेक-स्थानपर भली प्रकार सम्मान किये हुए अनेकों मुनिजन हाथमें कुशा लिये हुए उपस्थित रहें ॥ १२ ॥ अनेकों नर्तकियाँ, मुख्य-मुख्य वारांगनाएँ, गायक, वेणुवादक तथा कुशल बाजे बजानेवाले महाराज दशरथके आँगनमें गाना-बजाना करें ॥ १३ ॥ अभिषेक-स्थानके बाहर हाथी, घोड़े, रथ और पदाति यह चतुरंगिणी सेना अस्त्र-शस्त्र-से सुसज्जित होकर खड़ी रहे। नगरमें जितने देवालय हैं उन सबमें नाना प्रकारकी बलि-सामग्रीसे देवोंकी पूजा की जाय तथा राजालोग शीघ्र ही नाना प्रकारकी भेंटें लेकर आवें" ॥ १४-१५ ॥
राजमन्त्री सुमन्त्रको इस प्रकार आज्ञा दे श्रीमान् वसिष्ठजी स्वयं श्रीरघुनाथजीके परम सुन्दर महलमें गये ॥ १६ ॥ मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजीने रथपर चढ़कर रघुनाथजीके महलकी तीन पौरियाँ पार कीं और फिर पृथिवीपर उतर पड़े ॥ १७ ॥ तदनन्तर आचार्य होनेके कारण बिना रोक-टोकके वे भीतर चले गये। उस समय गुरुजीको आये देख रामचन्द्रजी तुरन्त हाथ जोड़कर खड़े हो गये और भक्तिपूर्वक दण्डवत्-प्रणाम किया। उसी समय सीताजी सुवर्णके पात्रमें जल ले आयीं ॥ १८-१९ ॥
| ४६ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
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| रत्नासने समावेश्य पादौ प्रक्षाल्य भक्तितः । | तब रघुनाथजीने गुरुजीको रत्नसिंहासनपर बैठा- | | तदपः शिरसा धृत्वा सीतया सह राघवः ॥२०॥ | कर उनके चरण धोये और सीताजीके सहित उस | | धन्योऽस्मीत्यब्रवीद्रामस्तव पादाम्बुधारणात् । | चरणोदकको भक्तिपूर्वक अपने शिरपर रखकर कहा- | | श्रीरामेणैवमुक्तस्तु प्रहसनमुनिरब्रवीत् ॥२१॥ | "हे मुने ! आपके चरणोदकको धारण कर आज मैं | | त्वत्पादसलिलं धृत्वा धन्योऽभूद्गिरिजापतिः । | कृतकृत्य हो गया।" भगवान् रामके इस प्रकार कहने- | | ब्रह्मापि मत्पिता ते हि पादतीर्थहताशुभः ॥२२॥ | पर मुनिवर वसिष्ठने हँसकर कहा ॥ २०-२१ ॥ "हे | | इदानीं भाषसे यत्त्वं लोकानामुपदेशकूत् । | राम ! आपके पादोदकको मस्तकपर धारण कर पार्वती- | | जानामि त्वां परात्मानं लक्ष्म्या संजातमीश्वरम् २३ | वल्लभ भगवान् शंकर धन्य-धन्य हो गये तथा मेरे | | देवकार्यार्थसिद्धयर्थं भक्तानां भक्तिसिद्धये । | पिता ब्रह्माजी भी आपके पादतीर्थका सेवन करनेसे ही | | रावणस्य वधार्थाय जातं जानामि राघव ॥२४॥ | निष्पाप हो गये हैं ॥ २२ ॥ इस समय केवल संसारको | | तथापि देवकार्यार्थं गुह्यं नोद्घाटयाम्यहम् । | यह उपदेश करनेके लिये ही कि 'गुरुके साथ किस | | यथा त्वं मायया सर्वं करोषि रघुनन्दन ॥२५॥ | प्रकार व्यवहार करना चाहिये' आप इस प्रकार | | तथैवानुविधास्येऽहं शिष्यस्त्वं गुरुरप्यहम् । | सम्भाषण कर रहे हैं। मैं भली प्रकार जानता हूँ | | गुरुर्गुरूणां त्वं देव पितॄणां त्वं पितामहः ॥२६॥ | आप लक्ष्मीके सहित प्रकट हुए साक्षात् परमात्मा विष्णु | | अन्तर्यामी जगद्यात्रावाहकस्त्वमगोचरः । | हैं॥ २३ ॥ हे राघव ! मैं जानता हूँ आपने देवताओंका | | शुद्धसत्त्वमयं देहं धृत्वा स्वाधीनसम्भवम् ॥२७॥ | कार्य सिद्ध करनेके लिये, भक्तोंको भक्ति प्रदान करनेके | | मनुष्य इव लोकेऽस्मिन् भासि त्वं योगमायया । | लिये और रावणका वध करनेके लिये ही अवतार लिया | | पौरोहित्यमहं जाने विगर्ह्यं दूष्यजीवनम् ॥२८॥ | है ॥ २४ ॥ तथापि देवताओंके कार्य-सिद्धिके लिये | | इक्ष्वाकूणां कुले रामः परमात्मा जनिष्यते । | मैं इस गुप्त रहस्यको प्रकट नहीं करता। हे रघुनन्दन ! | | इति ज्ञातं मया पूर्वं ब्रह्मणा कथितं पुरा ॥२९॥ | जिस प्रकार मायाके आश्रयसे आप सब कार्य करेंगे | | ततोऽहमाशया राम तव सम्बन्धकाङ्क्षया । | उसी प्रकार मैं भी 'तुम शिष्य हो और मैं गुरु हूँ' इस | | अकार्षं गर्हितमपि तवाचार्यत्वसिद्धये ॥३०॥ | सम्बन्धके अनुकूल व्यवहार करूँगा । किन्तु हे देव ! | | ततो मनोरथो मेऽद्य फलितो रघुनन्दन । | वास्तवमें तो आप ही गुरुओंके गुरु और पितृगणोंके | | त्वदधीना महामाया सर्वलोकैकमोहिनी ॥३१॥ | भी पितामह हैं ॥ २५-२६ ॥ आप अन्तर्यामी, | | मां यथा मोहयेन्नैव तथा कुरु रघूद्वह । | जगद्व्यवहारके प्रवर्त्तक और मन-वाणीके अविषय हैं; | | गुरुनिष्कृतिकामस्त्वं यदि देह्येतदेव मे ॥३२॥ | और स्वेच्छासे यह शुद्ध सत्त्वमय शरीर धारण कर इस | | | लोकमें अपनी योगमायासे मनुष्यके समान प्रतीत होते | | | हैं। मैं यह जानता हूँ कि पुरोहिताई अति निन्दनीय | | | और दूषित जीविका है ॥ २७-२८ ॥ तो भी जब | | | पूर्वकालमें ब्रह्माजीके कहनेसे मुझे यह मालूम हुआ कि | | | इक्ष्वाकुवंशमें परमात्मा राम अवतार लेंगे ॥ २९ ॥ तब | | | हे राम ! आपसे सम्बन्ध जोड़नेकी इच्छासे आपका | | | आचार्य बननेके लिये इस निन्दनीय पदको भी मैंने | | | स्वीकार कर लिया ॥ ३० ॥ हे रघुनन्दन ! आज मेरी | | | इच्छा पूर्ण हो गयी । अब यदि आप गुरुऋणसे | | | उऋण होना चाहते हैं तो मुझे यही दीजिये कि | | | आपके अधीन रहनेवाली आपकी सर्वलोकविमोहिनी | | | महामाया मुझे मोहित न करे ॥ ३१-३२ ॥ हे |
सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४७
| प्रसङ्गात्सर्वमप्युक्तं न वाच्यं कुत्रचिन्मया ।<br>राज्ञा दशरथेनाहं प्रेषितोऽस्मि रघूद्वह ॥३३॥<br>त्वामामन्त्रयितुं राज्ये श्वोऽभिषेक्ष्यति राघव।<br>अद्य त्वं सीतया सार्धमुपवासं यथाविधि ॥३४॥<br>कृत्वा शुचिर्भूमिरायी भव राम जितेन्द्रियः ।<br>गच्छामि राजसान्निध्यं त्वं तु प्रातर्गमिष्यसि ॥३५॥ | रघुश्रेष्ठ ! इस समय प्रसंगवश मैने ये सब बातें आपसे कह दी हैं, मैं ऐसा और कहीं भी न कहूँगा । हे राघव ! महाराज दशरथने इस बातकी सूचना देनेके लिये कि कल वे आपको राजपद्पर अभिषिक्त करेंगे—मुझे आपके पास भेजा है । आज आप सीताके सहित विधिपूर्वक उपवास और शुद्धता तथा इन्द्रियजयपूर्वक पृथिवीपर शयन करें । अब मैं राजाके पास जाता हूँ, आप कल प्रातःकाल वहाँ पधारें"॥ ३३–३५॥ |
| इत्युक्त्वा रथमारुह्य ययौ राजगुरुर्द्रुतम् ।<br>रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥३६॥<br>सौमित्रे यौवराज्ये मे श्वोऽभिषेको भविष्यति ।<br>निमित्तमात्रमेवाहं कर्ता भोक्ता त्वमेव हि ॥३७॥<br>मम त्वं हि बहिःप्राणो नात्र कार्या विचारणा ।<br>ततो वसिष्ठेन यथा भाषितं तत्तथाकरोत् ॥३८॥ | ऐसा कह राजपुरोहित वसिष्ठजी रथपर चढ़कर तुरन्त ही चले गये । तब रामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसते हुए कहा—॥ ३६॥ "हे सुमित्रानन्दन ! कल मेरा युवराज-पदपर अभिषेक होगा, सो मैं तो केवल निमित्तमात्र ही होऊँगा, उसके कर्त्ता-भोक्ता तो तुम्हीं होगे ॥ ३७॥ क्योंकि मेरे बाह्यप्राण तो तुम्हीं हो—इसमें कोई विशेष सोच-विचारकी आवश्यकता नहीं है।" तदनन्तर वसिष्ठजी जैसा कह गये थे रघुनाथजीने वैसा ही किया ॥३८॥ |
| वसिष्ठोऽपि नृपं गत्वा कृतं सर्वं न्यवेदयत् ।<br>वसिष्ठस्य पुरो राज्ञा ह्युक्तं रामाभिषेचनम् ॥३९॥<br>यदा तदैव नगरे श्रुत्वा कश्चित्पुमान् जगौ ।<br>कौसल्यायै राममात्रे सुमित्रायै तथैव च ॥४०॥ | इधर वसिष्ठजीने भी राजा दशरथके पास आकर जो कुछ किया था सो सब सुना दिया । जिस समय महाराज दशरथ वसिष्ठजीसे रामचन्द्रजीके अभिषेकके विषयमें कह रहे थे उसी समय किसी पुरुषने यह समाचार सुनकर सम्पूर्ण नगरमें सुना दिया और राममाता कौसल्या तथा सुमित्राको भी यह सूचना दे दी ॥ ३९–४० ॥ |
| श्रुत्वा ते हर्षसम्पूर्णे ददतुर्हारमुत्तमम् ।<br>तस्मै ततः प्रीतमनाः कौसल्या पुत्रवत्सला ॥४१॥<br>लक्ष्मीं पर्यचरद्देवीं रामस्यार्थप्रसिद्धये ।<br>सत्यवादी दशरथः करोत्येव प्रतिश्रुतम् ॥४२॥<br>कैकेयीवशगः किन्तु कामुकः किं करिष्यति ।<br>इति व्याकुलचित्ता सा दुर्गां देवीमपूजयत् ॥४३॥ | उन दोनोंने सुनते ही अति हर्ष-पूर्ण हो उसे एक अत्युत्तम हार दिया । तदुपरान्त पुत्रवत्सला कौसल्याने रामचन्द्रजीकी इष्ट-सिद्धिके लिये लक्ष्मीदेवीका पूजन किया 'राजा दशरथ सत्य-वादी हैं और उनके विषयमें यह प्रसिद्ध है कि वे अपनी प्रतिज्ञाका पालन करते हैं ॥ ४१--४२ ॥ किन्तु वे कामी और कैकेयीके वशीभूत हैं; ऐसी अवस्था में क्या वे इस प्रतिज्ञाको पूर्ण कर सकेंगे ?' इस प्रकारकी चिन्तासे व्याकुल होकर वह दुर्गादेवीका पूजन करने लगीं ॥ ४३ ॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे देवा देवीं वाणीमचोदयन् ।<br>गच्छ देवि भुवो लोकमयोध्यायां प्रयत्नतः ॥४४॥<br>रामाभिषेकविघ्नार्थं यतस्व ब्रह्मवाक्यतः । | इसी समय देवताओंने सरस्वतीदेवीसे आग्रह किया कि "हे देवि ! तुम युक्तिपूर्वक भूलोकमें अयोध्यापुरीमें जाओ ॥ ४४ ॥ और वहाँ ब्रह्माजीकी आज्ञासे रामचन्द्रजीके राज्याभिषेकमें विघ्न उपस्थित |
| ४८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मन्थरां प्रविशस्त्वादौ कैकेयीं च ततः परम् ॥४५॥<br>ततो विघ्ने समुत्पन्ने पुनरेहि दिवं शुभे ।<br>तथेत्युक्त्वा तथा चक्रे प्रविवेशाथ मन्थराम् ॥४६॥ | करो। प्रथम तो तुम मन्थरामें प्रवेश करना और फिर कैकेयीमें ॥ ४५ ॥ हे शुभे ! इस प्रकार विघ्न उपस्थित हो जानेपर तुम फिर स्वर्गलोकको लौट आना ।' इसपर सरस्वतीने 'बहुत अच्छा' कहकर वैसा ही किया और प्रथम मन्थरामें प्रवेश किया ॥ ४६ ॥ |
| सापि कुब्जा त्रिवक्रा तु प्रासादाग्रमथारुहत् ।<br>नगरं परितो दृष्ट्वा सर्वतः समलङ्कृतम् ॥४७॥<br>नानातोरणसम्बाधं पताकाभिरलङ्कृतम् ।<br>सर्वोत्सवसमायुक्तं विस्मिता पुनरागमत् ॥४८॥ | तब तीन स्थानसे टेढ़ी वह कुबड़ी मन्थरा महलकी अट्टालिकापर चढ़ी और उसने देखा कि नगर सब ओरसे सजाया गया है ॥ ४७ ॥ उसमें नाना प्रकारकी बन्दनवारें बँधी हुई हैं, चित्र-विचित्र पताकाएं सुशोभित हो रही हैं और सब ओर उत्सव हो रहे हैं । यह देखकर वह अत्यन्त विस्मिता हो नीचे उतर आयी ॥ ४८ ॥ |
| धात्रीं पप्रच्छ मात: किं नगरं समलङ्कृतम् ।<br>नानोत्सवसमायुक्ता कौसल्या चातिहर्षिता ॥४९॥<br>ददाति विप्रमुख्येभ्यो वस्त्राणि विविधानि च ।<br>तामुवाच तदा धात्री रामचन्द्राभिषेचनम् ॥५०॥<br>श्वो भविष्यति तेनाद्य सर्वतोऽलङ्कृतं पुरम् ।<br>तच्छ्रुत्वा त्वरितं गत्वा कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् ॥५१॥ | और धायसे पूछा--- "मैया ! आज नगर क्यों सजाया गया है और महारानी कौसल्या भी नाना प्रकारसे उत्सव मनाती हुई अत्यन्त हर्षपूर्वक ब्राह्मणोंको विविध वस्त्राभूषण क्यों दे रही हैं ?" तब धायने उससे कहा- "कल श्रीरामजीका राज्याभिषेक होगा, इसलिये आज सब ओरसे नगर सजाया गया है ।" यह सुनते ही उसने तुरन्त ही कैकेयीके पास जाकर कहा ॥ ४९-५१ ॥ |
| पर्यङ्कस्थां विशालाक्षीमेकान्ते पर्यवस्थिताम् ।<br>किं शेषे दुर्भगे मूढे महद्भयमुपस्थितम् ॥५२॥<br>न जानीषेऽतिसौन्दर्यमानिनी मत्तगामिनी ॥५३॥<br>रामस्यानुग्रहाद्राज्ञः श्वोऽभिषेको भविष्यति । | विशालाक्षी कैकेयी उस समय एकान्तमें पलंगपर बैठी थी, उससे मन्थरा बोली--- "अयि अभागिनि मूढ़े ! कैसे सो रही हो, तुम्हारे लिये बड़ा भारी संकट उपस्थित हुआ है ॥ ५२ ॥ हे मत्तवाली चालवाली ! तुम्हें अपनी सुन्दरताका बड़ा घमण्ड है, इसलिये तुम्हें किसी बातका पता ही नहीं रहता ॥ ५३ ॥ देखो, महाराजकी कृपासे कल रामका राज्याभिषेक होनेवाला है ।" |
| तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय कैकेयी प्रियवादिनी ॥५४॥<br>तस्यै दिव्यं ददौ स्वर्णनूपुरं रत्नभूषितम् ।<br>हर्षस्थाने किमिति मे कथ्यते भयमागतम् ॥५५॥<br>भरतादधिको रामः प्रियकृन्मे प्रियंवदः ।<br>कौसल्यां मां समं पश्यन् सदा शुश्रूषते हि माम् ५६<br>रामाद्भयं किमापन्नं तव मूढे वदस्व मे । | यह सुनकर प्रियवादिनी कैकेयी सहसा उठ खड़ी हुई ॥ ५४ ॥ और उसे अति दिव्य रत्नजटित सुवर्णनूपुर देकर कहा, "अरी ! यह तो बड़े आनन्दकी बात है, इसमें तू संकट उपस्थित हुआ कैसे बतलाती है ? ॥ ५५ ॥ राम तो भरतकी अपेक्षा मेरा अधिक प्रिय करनेवाला और मधुरभाषी है, वह तो कौसल्या तथा मुझे समान भावसे देखता हुआ सदा ही मेरी सेवा किया करता है ॥ ५६ ॥ अरी मूर्खे ! तू यह तो बता कि तुझे रामसे क्या भय उपस्थित हुआ है ?" |
| तच्छ्रुत्वा विषसादाथ कुब्जाऽकारणवैरिणी ॥५७॥<br>शृणु मद्बचनं देवि यथार्थं ते महद्भयम् । | यह सुनकर बिना कारण वैर करनेवाली मन्थरा विषाद करने लगी ॥ ५७ ॥ और बोली, "देवि ! |
सर्ग २ ] अयोध्याकाण्ड ४९
| त्वां तोषयन् सदा राजा प्रियवाक्यान भापते ॥५८॥<br>कामुकोऽतथ्यवादी च त्वां वाचा परितोषयन् ।<br>कार्यं करोति तस्या वै राममातुः सुपुष्कलम् ॥५९॥<br>मनस्येतन्निधायैव प्रेषयामास ते सुतम् ।<br>भरतं मातुलकुले प्रेषयामास सानुजम् ॥६०॥<br>सुमित्रायाः समीचीनं भविष्यति न संशयः ।<br>लक्ष्मणो राममन्वेति राज्यं सोऽनुभविष्यति ॥६१॥<br>भरतो राघवस्याग्रे किङ्करो वा भविष्यति ।<br>विवास्यते वा नगरात्प्राणैर्वा हाप्यतेऽचिरात् ॥६२॥<br>त्वं तु दासीव कौसल्यां नित्यं परिचरिष्यसि ।<br>ततोऽपि मरणं श्रेयो यत्सपल्याः पराभवः ॥६३॥<br>अतः शीघ्रं यतस्वाद्य भरतस्याभिषेचने ।<br>रामस्य वनवासार्थं वर्षाणि नव पञ्च च ॥६४॥<br>ततो रूढोऽभये पुत्रस्तव राज्ञि भविष्यति ।<br>उपायं ते प्रवक्ष्यामि पूर्वमेव सुनिश्चितम् ॥६५॥<br>पुरा देवासुरे युद्धे राजा दशरथः स्वयम् ।<br>इन्द्रेण याचितो धन्वी सहाय्यार्थं महारथः ॥६६॥<br>जगाम सेनया सार्धं त्वया सह शुभानने ।<br>युद्धं प्रकुर्वतस्तस्य राक्षसैः सह धन्विनः ॥६७॥<br>तदाक्षकीलो न्यपतच्छिन्नस्तस्य न वेद सः ।<br>त्वं तु हस्तं समावेश्य कीलरन्ध्रेऽतिधैर्यतः ॥६८॥<br>स्थितवत्यसितापाङ्गि पतिप्राणपरीप्सया ।<br>ततो हत्वाऽसुरान्सर्वान् ददर्श त्वामरिन्दमः ॥६९॥<br>आश्चर्यं परमं लेभे त्वामालिङ्ग्य मुदान्वितः ।<br>वृणीष्व यत्ते मनसि वाञ्छितं वरदोस्म्यहम् ॥७०॥<br>वरद्वयं वृणीष्व त्वमेवं राजाऽवदत्स्वयम् ।<br>त्वयोक्तो वरदो राजन्यदि दत्तं वरद्वयम् ॥७१॥ | मेरी बात सुनो, वास्तवमें तुम्हारे लिये बड़ा संकट उपस्थित हुआ है । राजा तुम्हें सन्तुष्ट करनेके लिये ही सदा चिकनी-चुपड़ी बातें बना दिया करते हैं ॥ ५८ ॥ वे बड़े कामी और मिथ्यावादी हैं; तुम्हें इस प्रकार केवल बातोंसे ही बहलाकर रामकी माताका ही पूरा-पूरा कार्य किया करते हैं ॥ ५९ ॥ अपने मनमें यही ठानकर उन्होंने छोटे भाई शत्रुघ्नके सहित तुम्हारे पुत्र भरतको ननिहाल भेज दिया है ॥ ६० ॥ इसमें सुमित्राके लिये तो निस्सन्देह सब कुछ ठीक ही होगा, क्योंकि लक्ष्मण रामके अनुगामी हैं इसलिये वे तो राज्य ही भोगेंगे ॥ ६१ ॥ किन्तु भरतको या तो रामका दास होकर रहना पड़ेगा या उन्हें शीघ्र ही नगरसे निकाल दिया जायगा अथवा उनका प्राणाघात किया जायगा ॥ ६२ ॥ और तुम्हें दासीके समान सदा कौसल्याकी सेवा करनी पड़ेगी । इस प्रकार सौतसे अपमानित होकर रहनेकी अपेक्षा तो मरना ही अच्छा है ॥ ६३ ॥ इसलिये अब तुम शीघ्र ही भरतके राज्याभिषेक और रामके चौदह वर्षतक वनवासके लिये प्रयत्न करो ॥ ६४ ॥ हे रानी ! ऐसा होनेपर तुम्हारे पुत्र भरत निर्भय और निष्कण्टक हो जायेंगे। इसके लिये मैंने जो पहलेसे ही सोच रक्खा है वह उपाय तुम्हें बताती हूँ ॥ ६५ ॥ पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके समय स्वयं इन्द्रने धनुर्धर महारथी राजा दशरथसे सहायताके लिये प्रार्थना की थी ॥ ६६ ॥ हे सुमुखि ! उस समय सेनाके सहित वे तुम्हें साथ लेकर वहाँ गये थे। जिस समय धनुर्धर महाराज दशरथ राक्षसोंसे युद्ध करनेमें निमग्न थे उस समय उनके बिना जाने रथकी धुरीकी कील निकलकर गिर गयी, तब अत्यन्त धैर्यपूर्वक तुमने अपना हाथ उस कीलके छिद्रमें लगा दिया ॥ ६७-६८ ॥ और हे कृष्णाक्षि ! पतिकी प्राणरक्षाके लिये तुम बहुत देरतक इसी स्थितिमें रही। तदनन्तर समस्त दैत्योंको मार चुकनेपर शत्रुदमन महाराज दशरथने तुम्हें देखा ॥ ६९ ॥ तुम्हें ऐसी स्थितिमें देखकर उन्हें अति आश्चर्य हुआ और अति प्रसन्नतासे तुम्हें गले लगाकर वे बोले- "मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ, तुम्हें जो इच्छा हो सो माँग लो ॥ ७० ॥ इस समय तुम. दो वर माँग सकती हो ।" राजाके इस प्रकार कहनेपर तुमने कहा- "राजन् ! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे दो |
७
| ५० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
|---|
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वय्येव तिष्ठतु चिरं न्यासभूतं ममानघ ।<br>यदा मेऽवसरो भूयात्तदा देहि वरद्वयम् ॥७२॥<br>तथेत्युक्त्वा स्वयं राजा मन्दिरं व्रज सुव्रते ।<br>त्वत्तः श्रुतं मया पूर्वमिदानीं स्मृतिमागतम् ॥७३॥ | वर देना चाहते हैं ॥ ७१ ॥ तो हे अनघ ! मेरी यह धरोहर बहुत समयतक आप ही रखिये, जिस समय इनका अवसर आवे उस समय आप ये दोनों वर मुझे दे दीजियेगा' ॥ ७२ ॥ तब राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर तुमसे कहा 'हे सुव्रते ! अब घर चलो।' महारानीजी ! यह सम्पूर्ण वृत्तान्त पहले तुम्हींसे मैंने सुना था, इस समय मुझे यह स्मरण हो आया है ॥ ७३ ॥ |
| अतः शीघ्रं प्रविश्याद्य क्रोधागारं रुषान्विता ।<br>विमुच्य सर्वाभरणं सर्वतो विनिकीर्य च ।<br>भूमावेव शयाना त्वं तूष्णीमतिष्ठ भामिनि ॥७४॥<br>यावत्सत्यं प्रतिज्ञाय राजाऽभीष्टं करोति ते ।<br>श्रुत्वा त्रिवक्रयोक्तं तत्तदा केकयनन्दिनी ॥७५॥<br>तथ्यमेवाखिलं मेने दुःसङ्गाहितविभ्रमा ।<br>तामाह कैकेयी दुष्टा कुतस्ते बुद्धिरीदृशी ॥७६॥ | अतः हे भामिनि ! अब तुम शीघ्र ही रोषपूर्वक कोपभवनमें जाओ और अपने समस्त आभूषण उतारकर इधर-उधर बिखेर दो तथा जबतक सत्य प्रतिज्ञापूर्वक राजा तुम्हारा अभीष्ट कार्य करनेको तत्पर न हों तबतक चुपचाप पृथिवीपर पड़ी रहो ।”<br>त्रिवक्रा मन्थराकी ये बातें सुनकर दुःसंगवश बुद्धि भ्रष्ट हो जानेके कारण दुष्टा कैकेयीने उस समय उसका कथन सर्वथा ठीक मान लिया और उससे कहा—"तुझमें ऐसी बुद्धि कहाँसे आ गयी ? ॥७४—७६॥ |
| एवं त्वां बुद्धिसम्पन्नां न जाने वक्रसुन्दरि ।<br>भरतो यदि राजा मे भविष्यति सुतः प्रियः ॥७७॥<br>ग्रामानू शतं प्रदास्यामि मम त्वं प्राणवल्लभा ।<br>इत्युक्त्वा कोपभवनं प्रविश्य सहसा रुषा ॥७८॥<br>विमुच्य सर्वाभरणं परिकीर्य समन्ततः ।<br>भूमौ शयाना मलिना मलिनाम्बरधारिणी ॥७९॥<br>प्रोवाच शृणु मे कुब्जे यावद्रामो वनं व्रजेत् ।<br>प्राणांस्त्यक्ष्येऽथ वा वक्रे शयिष्ये तावदेव हि ॥८०॥ | अरी बाँकी सुन्दरी ! मैं तुझे इतनी बुद्धिमती नहीं जानती थी ! यदि मेरा प्रिय पुत्र भरत राजा हो गया तो मैं तुझे सौ गाँव दूँगी; तू तो मुझे प्राणोंके समान प्यारी है ।” ऐसा कहकर कैकेयीने रोषपूर्वक कोपभवनमें प्रवेश किया ॥ ७७-७८ ॥ और अपने सब वस्त्राभूषण उतारकर इधर-उधर बिखेर दिये तथा मैले-कुचैले वस्त्र पहनकर अति मलिन दशामें पृथिवीमें पड़कर बोली, “अरी कुब्जे ! सुन, जबतक राम वनको न जायेंगे, प्राण भले ही छूट जायें, मैं इसी प्रकार पड़ी रहूँगी ” ॥ ७९-८० ॥ |
| निश्चयं कुरु कल्याणि कल्याणं ते भविष्यति ।<br>इत्युक्त्वा प्रययौ कुब्जा गृहं साऽपि तथाऽकरोत् ॥ | तब कुब्जा यह समझाकर कि 'हे कल्याणि ! तुम निःसन्देह ऐसा ही करना, इससे अवश्य तुम्हारा कल्याण होगा'—अपने घर चली गयी और कैकेयीने भी वैसा ही किया ॥ ८१ ॥ |
| धीरोऽत्यन्तदयान्वितोऽपि सुगुणा-<br> चारान्वितो वाऽथवा<br>नीतिज्ञो विधिवाददेशिकपरो<br> विद्याविवेकोऽथवा । | सच है, कोई पुरुष अत्यन्त धैर्यवान्, दयालु, सद्गुणी, सदाचारी, नीतिज्ञ, कर्त्तव्यनिष्ठ और गुरुका भक्त, अथवा विद्या-विवेक-सम्पन्न भी क्यों न हो यदि निरन्तर अत्यन्त पाप-बुद्धि दुष्ट पुरुषोंका संग करेगा तो अवश्य ही क्रमशः उन्हींकी |
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ३: राजा दशरथका कैकेयीको वर देना
'सर्ग ३] अयोध्याकाण्ड ५१
दुष्टानामतिपापभाविताधियां सङ्गं सदा चेद्भजे- त्तद्बुद्ध्या परिभावितो व्रजति तत् साम्यं क्रमेण स्फुटम् ॥८२॥ अतः सङ्गः परित्याज्यो दुष्टानां सर्वदैव हि । दुःसङ्गी च्यवते स्वार्थाद्यथेयं राजकन्यका ॥८३॥
बुद्धिसे प्रभावित होकर उन्हींके समान हो जायगा ॥८२॥ इसलिये सदा ही दुष्ट पुरुषोंका संग छोड़ना चाहिये, क्योंकि दुःसंगसे पुरुष इस राजकन्या (कैकेयी) के समान ही पुरुषार्थच्युत हो जाता है ॥८३॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥२॥
तृतीय सर्ग राजा दशरथका कैकेयीको वर देना।
श्रीमहादेव उवाच
ततो दशरथो राजा रामाभ्युदयकारणात् । आदिश्य मन्त्रिप्रकृतीः सानन्दो गृहमविशत् ॥१॥
तत्रादृष्ट्वा प्रियां राजा किमेतदिति विह्वलः । या पुरा मन्दिरं तस्याः प्रविष्टे मयि शोभना ॥२॥ हसन्ती मामुपायाति सा किं नैवाद्य दृश्यते । इत्यात्मन्येव संचिन्त्य मनसाऽतिविदूयता ॥३॥ पप्रच्छ दासीनिकरं कुतो वः स्वामिनी शुभा। नायाति मां यथापूर्वं मत्प्रिया प्रियदर्शना ॥४॥
ता ऊचुः क्रोधभवनं प्रविष्टा नैव विद्महे । कारणं तत्र देव त्वं गत्वा निश्चेतुमर्हसि ॥५॥
इत्युक्तो भयसन्त्रस्तो राजा तस्याः समीपगः । उपविश्य शनैर्देहं स्पृशन्ववै पाणिनाब्रवीत् ॥६॥
किं शेपे वसुधापृष्ठे पर्यङ्कादीन् विहाय च । मां त्वं खेदयसे भीरु यतो मां नावभाषसे ॥७॥ अलङ्कारं परित्यज्य भूमौ मलिनवाससा । किमर्थं ब्रूहि सकलं विधास्ये तव वाञ्छितम् ॥८॥
श्रीमहादेवजी बोले-तदनन्तर महाराज दशरथने रामचन्द्रजीके अभ्युदयके लिये प्रजावर्ग और मन्त्रियोंको (माङ्गलिक कार्योंके लिये) आज्ञा देकर आनन्दपूर्वक अपने रनिवासमें प्रवेश किया ॥१॥ वहाँ अपनी प्रिया कैकेयीको न देखकर वे अत्यन्त विह्वल होकर मन-ही-मन कहने लगे, 'क्या कारण है, जो पहले अपने महलमें घुसते ही सदा हँसती हुई मेरे सामने आती थी वह सुमुखी आज दिखायी ही नहीं दे रही है?' अपने चित्तमें अत्यन्त दुःख मानकर इसी प्रकार सोचते-सोचते ॥२-३॥ उन्होंने दासियोंसे पूछा-'आज तुम्हारी शुभलक्षणा स्वामिनी कहाँ है? वह प्रियदर्शना प्रिया आज पूर्ववत् मेरे सामने क्यों नहीं आती ?' ॥४॥
दासियोंने कहा- "देव ! कारण तो मालूम नहीं, किन्तु आज वे कोप-भवनमें गयी हुई हैं; आप स्वयं ही वहाँ जाकर सब हाल जान लीजिये" ॥५॥
दासियोंके इस प्रकार कहनेपर राजा भयभीत होकर उसके पास गये और वहाँ बैठकर उसके शरीरपर धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए बोले-॥६॥ "अयि भीरु ! आज पलंग आदिको छोड़कर इस प्रकार पृथिवीपर क्यों पड़ी हो ? तुम हमसे कुछ बोलती नहीं हो, इससे हमें बड़ा खेद हो रहा है ॥७॥ समस्त वस्त्राभूषण छोड़कर तुम मलिन वस्त्र पहने हुए पृथिवीपर क्यों पड़ी हो ? तुम्हारी जो इच्छा हो सो कहो,
| ५२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
|---|
को वा तवाहितं कर्ता नारी वा पुरुषोऽपि वा ।
स मे दण्ड्यश्च वध्यश्च भविष्यति न संशयः ॥ ९ ॥
ब्रूहि देवि यथा प्रीतिस्तदवश्यं ममाग्रतः ।
तदिदानीं साधयिष्ये सुदुर्लभमपि क्षणात् ॥ १० ॥
जानासि त्वं मम स्वान्तं प्रियं मां खवशे स्थितम् ।
तथापि मां खेदयसे वृथा तव परिश्रमः ॥ ११ ॥
ब्रूहि कं धनिनं कुर्यां दरिद्रं ते प्रियङ्करम् ।
धनिनं क्षणमात्रेण निर्धनं च तवाहितम् ॥ १२ ॥
ब्रूहि कं वा वधिष्यामि वधार्हो वा विमोक्ष्यते ।
किमत्र बहुनोक्तेन प्राणान्दास्यामि ते प्रिये ॥ १३ ॥
मम प्राणात्प्रियतरो रामो राजीवलोचनः ।
तस्योपरि शपे ब्रूहि त्वद्विष्टं तत्करोम्यहम् ॥ १४ ॥
इति ब्रुवाणं राजानं शपन्तं राघवोपरि ।
शनैर्विमृज्य नेत्रे सा राजानं प्रत्यभाषत ॥ १५ ॥
यदि सत्यप्रतिज्ञोऽसि शपथं कुरुषे यदि ।
याच्ञां मे सफलां कर्तुं शीघ्रमेव त्वमर्हसि ॥ १६ ॥
पूर्वं देवासुरे युद्धे मया त्वं परिरक्षितः ।
तदा वरद्वयं दत्तं त्वया मे तुष्टचेतसा ॥ १७ ॥
तद्द्वयं न्यासभूतं मे स्थापितं त्वयि सुव्रत ।
तत्रैकेन वरेणाशु भरतं मे प्रियं सुतम् ॥ १८ ॥
एभिः संभृतसंभारैर्यौवराज्येऽभिषेचय ।
अपरेण वरेणाशु रामो गच्छतु दण्डकान् ॥ १९ ॥
मुनिवेषधरः श्रीमान् जटावल्कलभूषणः ।
चतुर्दश समास्तत्र कन्दमूलफलाशनः ॥ २० ॥
पुनरायातु तस्यान्ते वने वा तिष्ठतु स्वयम् ।
प्रभाते गच्छतु वनं रामो राजीवलोचनः ॥ २१ ॥
| मैं सब पूर्ण करूँगा ॥ ८ ॥ तुम्हारा अनिष्ट करनेवाला कौन है ? वह स्त्री हो अथवा पुरुष अवश्य मेरे दण्डका पात्र होगा । यही नहीं, उसका वध भी किया जा सकता है ॥ ९ ॥ हे देवि ! जिस प्रकार तुम्हारी प्रसन्नता हो वह मुझसे अवश्य कहो । वह कार्य अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी मैं इसी समय एक क्षणमें ही पूरा कर दूँगा ॥ १० ॥ तुम मेरे हृदयको जानती ही हो, मैं तुम्हारा अत्यन्त प्रिय और तुम्हारे वशीभूत हूँ । फिर भी तुम मुझे खिन्न करती हो ? तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है ॥ ११ ॥ बताओ, तुम्हारा प्रिय करनेवाले किस कंगालको मैं धनी कर दूँ अथवा तुम्हारे अप्रियकारी किस धनपतिको एक क्षणमें ही कंगाल बना दूँ ? ॥ १२ ॥ बताओ, किस अवध्यको मार डालूँ और किस वध्यको छोड़ दूँ ? हे प्रिये ! इस विषयमें और अधिक क्या कहूँ, मैं तुम्हें अपने प्राण भी दे सकता हूँ ॥ १३ ॥ कमल-नयन राम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं । मैं उन्हींकी शपथ करके कहता हूँ कि तुम्हें जो कुछ प्रिय हो मैं वही करूँगा” ॥ १४ ॥<br><br>महाराज दशरथके रामकी सौगन्ध खाकर इस प्रकार कहनेपर कैकेयीने धीरे-धीरे अपने आँसू पोंछकर राजासे कहा—॥ १५ ॥ “राजन् ! यदि आप सत्य-प्रतिज्ञ हैं और शपथ भी करते हैं तो शीघ्र ही मैं जो कुछ माँगूँ उसे सफल कर देना चाहिये ॥ १६ ॥ पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें मैंने आपकी रक्षा की थी उस समय प्रसन्न होकर आपने मुझे दो वर देनेको कहा था ॥ १७ ॥ हे सुव्रत ! मैंने वे दोनों वर आपके पास धरोहरके रूपमें रख दिये थे । अब उनमेंसे एक वरसे तो तुरन्त ही मेरे प्रिय पुत्र भरतको इस एकत्रित की हुई सामग्रीसे युवराज-पदपर अभिषिक्त कीजिये और दूसरेसे तुरन्त ही राम दण्डक-वनको चले जायें ॥ १८–१९ ॥ वहाँ श्रीमान् रामको जटा-वल्कलादि धारण कर कन्द-मूल-फल खाते हुए मुनिवेषसे चौदह वर्षतक रहना चाहिये ॥ २० ॥ उसके पश्चात् अपनी इच्छासे चाहे वे अयोध्यामें लौट आवें अथवा वनहीमें रहें किन्तु कमलनयन राम कल सबेरे ही अवश्य वनको चले जायें ॥ २१ ॥ यदि इसमें कुछ देरी होगी तो आपके सामने ही मैं अपने प्राण छोड़ दूँगी ।
| सर्ग ३ ] | अयोध्याकाण्ड | ५३ |
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| यदि किञ्चिद्विलम्बेत प्राणांस्त्यक्ष्ये तवाग्रतः।<br>भव सत्यप्रतिज्ञस्त्वमेतदेव मम प्रियम् ॥२२॥ | आप अपनी प्रतिज्ञा सत्य कीजिये, मेरा प्रिय कार्य बस यही है” ॥२२॥ |
| श्रुत्वैतद्दारुणं वाक्यं कैकेय्या रोमहर्षणम्।<br>निपपात महीपालो वज्राहत इवाचलः ॥२३॥ | कैकेयीके ऐसे रोमाञ्चकारी कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ वज्राहत पर्वतके समान गिर पड़े ॥२३॥ |
| शनैरून्मील्य नयने विमृज्य परया भिया।<br>दुःस्वप्नो वा मया दृष्टो ह्यथवा चित्तविभ्रमः ॥२४॥ | तत्पश्चात् धीरे-धीरे नेत्र खोलकर अति भयपूर्वक आँसू पोंछे और मन-ही-मन कहने लगे— 'मैंने यह कोई दुःस्वप्न देखा है या मेरे चित्तको भ्रम हो गया है?' ॥२४॥ |
| इत्यालोक्य पुरः पत्नीं व्याघ्रीमिव पुरः स्थिताम्।<br>किमिदं भाषसे भद्रे मम प्राणहरं वचः ॥२५॥ | इसी समय अपने सामने सिंहिनीके समान बैठी हुई रानी कैकेयीको देखकर कहने लगे—"हे भद्रे ! मेरे प्राणोंको हरनेवाले तुम ये क्या वचन बोल रही हो ? ॥२५॥ |
| रामः कमपराधं ते कृतवान्कमलेक्षणः।<br>ममाग्रे राघवगुणान्वर्णयस्यनिशं शुभान् ॥२६॥ | कमलनयन रामने तुम्हारा क्या अपराध किया है ? तुम तो अहर्निश मेरे सामने रामके शुभ गुण गाया करती थी ॥ २६ ॥ |
| कौसल्यां मां समं पश्यन् शुश्रूषां कुरुते सदा।<br>इति ब्रुवन्ती त्वं पूर्वमिदानीं भाषसेऽन्यथा ॥२७॥ | तुम तो पहले कहा करती थी कि 'राम मुझे और कौसल्याको समान जानकर सदा ही मेरी सेवा किया करते हैं।' फिर इस समय तुम यह उलटी बात कैसे कह रही हो ? ॥२७॥ |
| राज्यं गृहाण पुत्राय रामस्तिष्ठतु मन्दिरे ।<br>अनुगृहीष्व मां वामे रामान्नास्ति भयं तव ॥२८॥ | तुम अपने पुत्रके लिये राज्य ले लो, किन्तु रामको घर ही रहने दो। हे वामे ! तुम मुझपर कृपा करो, रामसे तुम्हें कोई भय न करना चाहिये" ॥ २८ ॥ |
| इत्युक्त्वाऽश्रुपरीताक्षः पादयोर्निपपात ह।<br>कैकेयी प्रत्युवाचेदं साऽपि रक्तान्तलोचना॥२९॥ | ऐसा कहकर महाराज दशरथ नेत्रोंमें जल भरकर कैकेयीके चरणोंमें गिर पड़े । तब उस कैकेयीने आँखें लाल करके यों कहा—॥ २९॥ |
| राजेन्द्र किं त्वं भ्रान्तोऽसि उक्तं तद्भाषसेऽन्यथा।<br>मिथ्या करोषि चेत्स्वीयं भाषितं नरको भवेत् ॥३०॥ | “राजेन्द्र ! क्या तुम्हारी बुद्धिमें भ्रम हो गया है जो अपने कथनके विपरीत बोल रहे हो; याद रखो, यदि तुमने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी तो तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा ॥ ३० ॥ |
| वनं न गच्छेदयदि रामचन्द्रः<br>प्रभातकालेऽजिनचीरयुक्तः।<br>उद्बन्धनं वा विषभक्षणं वा<br>कृत्वा मरिष्ये पुरतस्तवाहम् ॥३१॥ | सुनो, यदि कल प्रातःकाल ही मृगचर्म और वल्कल-वस्त्र धारण कर राम वनको न गये तो मैं तुम्हारे सामने ही फाँसी लगाकर या विष खाकर मर जाऊँगी ॥ ३१ ॥ |
| सत्यप्रतिज्ञोऽहमितीह लोके<br>विडम्ब्यसे सर्वसभान्तरेषु।<br>रामोपरि त्वं शपथं च कृत्वा<br>मिथ्याप्रतिज्ञो नरकं प्रयाहि ॥३२॥ | तुम संसारमें सभी सभाओंमें 'मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ' ऐसा कहकर लोगोंको धोखेमें डाला करते हो, अब तुम रामकी शपथ करके की हुई प्रतिज्ञाको भी तोड़ रहे हो, अतः तुम्हें नरकमें जाना पड़ेगा” ॥ ३२ ॥ |
| इत्युक्तः प्रियया दीनो मग्नो दुःखार्णवे नृपः।<br>मूर्च्छितः पतितो भूमौ विसंज्ञो मृतको यथा ॥३३॥ | अपनी प्रियाके ऐसे कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ दुःख-समुद्रमें डूबकर बड़े व्याकुल हो गये, |
| ५४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
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एवं रात्रिर्गता तस्य दुःखात्संवत्सरोपमा ।
अरुणोदयकाले तु वन्दिनो गायका जगुः ॥३४॥
निवारयित्वा तान् सर्वान्कैकेयी रोषमास्थिता ।
ततः प्रभातसमये मध्यकक्षमुपस्थिताः ॥३५॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या ऋषयः कन्यकास्तथा ।
छत्रं च चामरं दिव्यं गजो वाजी तथैव च ॥३६॥
अन्याश्च वारमुख्या याः पौरजानपदास्तथा ।
वसिष्ठेन यथाऽऽज्ञप्तं तत्सर्वं तत्र संस्थितम् ॥३७॥
स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च रात्रौ निद्रां न लेभिरे ।
कदा द्रक्ष्यामहे रामं पीतकौशेयवाससम् ॥३८॥
सर्वाभरणसम्पन्नं किरीटकटकोज्ज्वलम् ।
कौस्तुभाभरणं श्यामं कन्दर्पशतसुन्दरम् ॥३९॥
अभिषिक्तं समायातं गजारूढं स्मिताननम् ।
श्वेतच्छत्रधरं तत्र लक्ष्मणं लक्षणान्वितम् ॥४०॥
रामं कदा वा द्रक्ष्यामः प्रभातं वा कदा भवेत् ।
इत्युत्सुकधियः सर्वे बभूवुः पुरवासिनः ॥४१॥
नेदानीमुत्थितो राजा किमर्थं चेति चिन्तयन् ।
सुमन्त्रः शनकैः प्रायाद्यत्र राजाऽवतिष्ठते ॥४२॥
वर्धयन् जयशब्देन प्रणमन्शिरसा नृपम् ।
अतिखिन्नं नृपं दृष्ट्वा कैकेयीं समपृच्छत ॥४३॥
देवि कैकेयि वर्धस्व किं राजा दृश्यतेऽन्यथा।
तमाह कैकेयी राजा रात्रौ निद्रां न लब्धवान्॥४४॥
राम रामेति रामेति राममेवानुचिन्तयन् ।
प्रजागरेण वै राजा ह्यस्वस्थ इव लक्ष्यते ।
राममानय शीघ्रं त्वं राजा द्रष्टुमिहेच्छति ॥४५॥
और मृतकके समान मूर्छित और संज्ञाशून्य होकर पृथिवीपर गिर पड़े ॥ ३३ ॥ इस प्रकार अत्यन्त दुःखके कारण उनकी वह रात्रि एक वर्षके समान बीती । इधर सूर्योदय होते ही गायक और वन्दीजन स्तुति-गान करने लगे ॥ ३४ ॥ किन्तु कैकेयीने अत्यन्त रोषमें भरकर उन सबको उसी समय रोक दिया । तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ऋषिगण, कन्याएँ, दिव्य छत्र और चँवर तथा हाथी और घोड़े आदि सभी अभिषेकोपयोगी वस्तुएँ मध्य-द्वारपर उपस्थित की गयीं ॥ ३५–३६ ॥ इनके अतिरिक्त वसिष्ठजीकी आज्ञानुसार मुख्य-मुख्य वारांगनाएँ तथा पुरवासी और जनपदवासी भी वहाँ उपस्थित हो गये ॥ ३७ ॥ उस रात स्त्री, बालक और वृद्ध किसीको भी नींद नहीं आयी । सभीको यही चटपटी लगी रही कि हम रेशमी पीताम्बर पहने भगवान् रामको कब देखेंगे ? ॥ ३८ ॥ जो समस्त आभूषणोंसे सुसज्जित, उज्ज्वल किरीट और कटक पहने हुए हैं तथा कौस्तुभमणिसे विभूषित और सैकड़ों कामदेवोंके समान सुन्दर श्याम-वर्ण हैं एवं सर्व-सुलक्षण-सम्पन्न श्रीलक्ष्मणजीने जिनके ऊपर श्वेत छत्र लगाया हुआ है ऐसे श्रीरामको राज्याभिषेकके अनन्तर मन्द मुसकानके सहित हाथीपर चढ़कर आते हुए हम कब देखेंगे ? वह मङ्गलप्रभात कब होगा ? इस प्रकार सभी पुरवासियोंका चित्त अति उत्कण्ठित हो रहा था ॥ ३९–४१ ॥
इसी समय मन्त्रिवर सुमन्त्र यह सोचकर कि ‘महाराज अभीतक कैसे नहीं उठे’ धीरेसे जहाँ राजा दशरथ थे वहाँ गये ॥ ४२ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने जय-जयकार कर राजाको शिर झुकाकर प्रणाम किया और उन्हें अत्यन्त खिन्न देखकर कैकेयीसे पूछा—॥ ४३ ॥ “देवि कैकेयि ! आपका अभ्युदय हो, कहिये आज महाराज अनमने कैसे दिखायी देते हैं ?” इसपर कैकेयीने कहा—“आज महाराजको रात्रिमें बिलकुल नींद नहीं आयी ॥ ४४ ॥ रात्रिभर रामका चिन्तन करते हुए ‘राम राम राम’ ही रटते रहे हैं । इस प्रकार जागते रहनेके कारण ही राजा कुछ अस्वस्थ दिखायी देते हैं । महाराज रामको देखना चाहते हैं, इसलिये तुम शीघ्र ही उन्हें लिवा लाओ” ॥ ४५ ॥
अयोध्याकाण्ड - सर्ग ४: भगवान् रामका मातासे विदा होना तथा वन-गमनकी तैयारी
.सर्ग ३] अयोध्याकाण्ड ५५
| सुमन्त्र उवाच.<br>अश्रुत्वा राजवचनं कथं गच्छामि भामिनि ।<br>तच्छ्रुत्वा मन्त्रिणो वाक्यं राजा मन्त्रिणमब्रवीत् ॥४६॥<br>सुमन्त्र रामं द्रक्ष्यामि शीघ्रमानय सुन्दरम् ।<br>इत्युक्तस्त्वरितं गत्वा सुमन्त्रो राममन्दिरम् ॥४७॥<br>अवारितः प्रविष्टोऽथ त्वरितं राममब्रवीत् ।<br>शीघ्रमागच्छ भद्रं ते राम राजीवलोचन ॥४८॥<br>पितुर्गेहं मया सार्धं राजा त्वां द्रष्टुमिच्छति ।<br>इत्युक्तो रथमारुह्य सम्भ्रमाच्चरितो ययौ ॥४९॥<br>रामः सारथिना सार्धं लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br>मध्यकक्षे वसिष्ठादीन् पश्यन्नेव त्वरान्वितः ॥५०॥<br>पितुः समीपं सङ्गम्य ननाम चरणौ पितुः ।<br>राममालिङ्गितुं राजा समुत्थाय ससम्भ्रमः ॥५१॥<br>बाहू प्रसार्य रामेति दुःखान्मध्ये पपात ह ।<br>हाहेति रामस्तं शीघ्रमालिङ्ग्याङ्के न्यवेशयत् ॥५२॥<br>राजानं मूर्च्छितं दृष्ट्वा चुक्रुशुः सर्वयोषितः ।<br>किमर्थं रोदनमिति वसिष्ठोऽपि समाविशत् ॥५३॥<br>रामः पप्रच्छ किमिदं राज्ञो दुःखस्य कारणम् ।<br>एवं पृच्छति रामे सा कैकेयी राममब्रवीत् ॥५४॥<br>त्वमेव कारणं ह्यत्र राज्ञो दुःखोपशान्तये ।<br>किञ्चित्कार्यं त्वया राम कर्तव्यं नृपतेर्हितम् ॥५५॥<br>कुरु सत्यप्रतिज्ञस्त्वं राजानं सत्यवादिनम् ।<br>राज्ञा वरद्वयं दत्तं मम सन्तुष्टचेतसा ॥५६॥<br>त्वदधीनं तु तत्सर्वं वक्तुं त्वां लज्जते नृपः ।<br>सत्यपाशेन सम्बद्धं पितरं त्रातुमर्हसि ॥५७॥<br>पुत्रशब्देन चैतद्धि नरकात्त्रायते पिता ।<br>रामस्तयोदितं श्रुत्वा शूलेनाभिहतो यथा ॥५८॥<br>व्यथितः कैकेयीं प्राह किं मामेवं प्रभाषसे । | **सुमन्त्र बोले-**हे भामिनि ! महाराजकी आज्ञा पाये बिना मैं कैसे जा सकता हूँ ? मन्त्रीका यह वचन सुनकर महाराज बोले—॥४६॥ "सुमन्त्र ! मैं मनोहर-मूर्ति रामको देखूँगा। तुम उन्हें शीघ्र ही ले आओ।” राजाके ऐसा कहते ही सुमन्त्र तुरन्त रामके महलको गये ॥ ४७ ॥ और बिना रोक-टोकके तुरन्त भीतर जाकर रामसे कहा—"कमल-नयन राम ! तुम्हारा कल्याण हो, तुम शीघ्र ही मेरे साथ पिताजीके घर चलो, महाराज तुम्हें देखना चाहते हैं।" यह सुनते ही राम चकित-से होकर तुरन्त ही रथपर चढ़कर चले ॥ ४८-४९ ॥ सारथी और लक्ष्मणके सहित भगवान् रामने मध्यद्वारपर विराजमान वसिष्ठादि गुरुजनोंका केवल दर्शनमात्रसे ही सत्कार कर जल्दीसे पिताजीके पास पहुँच उनके चरणोंमें प्रणाम किया । उस समय रामको गले लगानेके लिये ज्यों ही उठकर महाराज दशरथने आवेगके साथ हाथ बढ़ाये कि वे बीचहीमें दुःखपूर्वक 'हा राम ! हा राम !' कहते हुए गिर पड़े । तब रामचन्द्रजीने हाहाकार करते हुए अति शीघ्रतासे उन्हें गले लगाकर अपनी गोदमें बैठा लिया ॥ ५०-५२ ॥<br><br>महाराजको मूर्च्छित देखकर रनिवासकी समस्त महिलाएँ रोने लगीं । तब यह सोचकर कि 'यह रुदन क्यों हो रहा है ?' वहाँ वसिष्ठजी भी चले आये ॥ ५३ ॥ भगवान् रामने कैकेयीसे पूछा—"महाराजके इस दुःखका क्या कारण है ?" उनके इसप्रकार पूछनेपर कैकेयी बोली—॥५४॥ "हे राम ! महाराजके इस दुःखके कारण तुम्हीं हो; तुम्हें उनके दुःखके शान्त करनेके लिये उनका कुछ प्रिय कार्य करना होगा ॥ ५५ ॥ तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, महाराजको भी सत्यवादी बनाओ । उन्होंने प्रसन्न होकर मुझे दो वर दिये हैं ॥ ५६ ॥ किन्तु उनकी सफलता तुम्हारे ही अधीन है । महाराजको तो तुमसे कहनेमें संकोच मालूम होता है; किन्तु तुम्हें सत्यपाशमें बँधे हुए अपने पिताजीकी अवश्य रक्षा करनी चाहिये ॥ ५७ ॥ क्योंकि 'पुत्र' शब्दका अभिप्राय ही यह है कि पिता-की नरकसे रक्षा की जाय ।”<br><br>कैकेयीकी ये बातें सुनकर रामने मानों शूलसे विद्ध हुएके समान व्यथित होकर कहा—"मातः ! आज |
५६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ३
पित्रर्थे जीवितं दास्ये पिबेयं विषमुल्बणम् ॥५९॥
सीतां त्यक्ष्येऽथ कौसल्यां राज्यं चापि त्यजाम्यहम्
अनाज्ञप्तोऽपि कुरुते पितुः कार्यं स उत्तमः ॥६०॥
उक्तः करोति यः पुत्रः स मध्यम उदाहृतः ।
उक्तोऽपि कुरुते नैव स पुत्रो मल उच्यते ॥६१॥
अतः करोमि तत्सर्वं यन्मामाह पिता मम ।
सत्यं सत्यं करोम्येव रामो द्विर्नाभिभाषते ॥६२॥
इति रामप्रतिज्ञां सा श्रुत्वा वक्तुं प्रचक्रमे ।
राम त्वदभिषेकार्थं संभाराः संभृताश्च ये ॥६३॥
तैरेव भरतोऽवश्यमभिषेच्यः प्रियो मम ।
अपरेण वरेणाशु चीरवासा जटाधरः ॥६४॥
वनं प्रयाहि शीघ्रं त्वमद्यैव पितुराज्ञया ।
चतुर्दश समास्तत्र वस मुन्यन्नभोजनः ॥६५॥
एतदेव पितुस्तेऽद्य कार्यं त्वं कर्तुमर्हसि ।
राजा तु लज्जते वक्तुं त्वामेवं रघुनन्दन ॥६६॥
श्रीराम उवाच
भरतस्यैव राज्यं स्यादहं गच्छामि दण्डकान् ।
किन्तु राजा न वक्तीह मां न जानेऽत्र कारणम् ॥६७॥
श्रुत्वैतद्रामवचनं दृष्ट्वा रामं पुरः स्थितम् ।
प्राह राजा दशरथो दुःखितो दुःखितं वचः ॥६८॥
स्त्रीजितं भ्रान्तहृदयमुन्मार्गपरिवर्तिनम् ।
निगृह्य मां गृहाणेदं राज्यं पापं न तद्भवेत् ॥६९॥
एवं चेदनृतं नैव मां स्पृशेद्रघुनन्दन ।
इत्युक्त्वा दुःखसन्तप्तो विललाप नृपस्तदा ॥७०॥
हा राम हा जगन्नाथ हा मम प्राणवल्लभ ।
मां विसृज्य कथं घोरं विपिनं गन्तुमर्हसि ॥७१॥
इति रामं समालिङ्ग्य मुक्तकण्ठो रुरोद ह ।
विमृज्य नयने रामः पितुः सजलपाणिना ॥७२॥
हमसे ऐसी बातें क्यों करती हों ? पिताजीके लिये मैं जीवन दे सकता हूँ, भयंकर विष पी सकता हूँ ॥ ५८-५९ ॥ और सीता, कौसल्या तथा राज्यको भी छोड़ सकता हूँ । जो पुत्र पिताकी आज्ञाके बिना ही उनका अभीष्ट कार्य करता है वह उत्तम है ॥ ६० ॥ जो पिताके कहनेपर करता है वह मध्यम होता है और जो कहनेपर भी नहीं करता वह पुत्र तो विष्ठाके समान है ॥ ६१ ॥ अतः पिताजीने मेरे लिये जो कुछ आज्ञा की है उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा, यह सर्वथा सत्य है; राम एक मुखसे दो बात कभी नहीं कहता" ॥ ६२ ॥
रामकी ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर कैकेयीने इस प्रकार कहना आरम्भ किया, “हे राम ! तुम्हारे अभिषेकके लिये जो कुछ सामग्री एकत्रित की गयी है ॥ ६३ ॥ उसके द्वारा निश्चय ही मेरे प्रिय पुत्र भरतका अभिषेक होना चाहिये । (यहाँ मेरा प्रथम वर है) । दूसरे वरके अनुसार पिताकी आज्ञासे आज तुरन्त ही तुम वल्कल-वस्त्र और जटा धारणकर वनको जाओ और वहाँ मुनिजनोचित भोजन करते हुए चौदह वर्ष-तक रहो ॥ ६४-६५ ॥ वत्स, तुम्हारे पिताका यही कार्य है, जो तुम्हें करना चाहिये । किन्तु राजा इन सब बातोंको तुमसे कहनेमें संकोच करते हैं” ॥६६॥
श्रीरामचन्द्रजी बोले-माता ! भरत आनन्दसे यह राज्य भोगें और मैं भी अभी दण्डकारण्यको जाता हूँ । किन्तु इसका कारण मालूम नहीं होता कि महाराज मुझसे क्यों नहीं कहते ? ॥ ६७ ॥
रामके ये वचन सुनकर और उन्हें अपने सामने बैठे देखकर दुःखातुर महाराज दशरथने इस प्रकार अति दुःखभरे वचन कहे ॥ ६८ ॥ "राम ! मुझ स्त्री-परवश, भ्रान्तचित्त, कुमार्गगामी पापात्माको बाँधकर यह राज्य ले लो; इससे तुम्हें कोई पाप न लगेगा ॥ ६९ ॥ हे रघुनन्दन ! ऐसा होनेपर मुझे भी असत्य स्पर्श न करेगा।" ऐसा कह राजा दशरथ दुःखातुर होकर विलाप करने लगे ॥ ७० ॥ 'हा राम ! हा जगन्नाथ ! हा प्राणप्यारे ! मुझे छोड़कर तुम घोर वनमें जाना कैसे उचित समझ रहे हो ?' ॥ ७१ ॥
ऐसा कहकर उन्होंने रामको गले लगा लिया और जी खोलकर रोने लगे । तब रामने हाथमें जल लेकर