अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाविंशोऽध्यायः (207) अगस्त्य उवाच सुतीक्ष्ण त्वं महाभाग शृणु वक्ष्यामि तत्त्वतः। यत्परं यद्गुणातीतं यज्ज्योतिरमलं शुभम् ।।20।। तदेव परमं तत्त्वं कैवल्यपदकारणम्। अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण! आप महान् भाग्यशाली हैं। मैं वास्तविक रूप से कहता हूँ, इसे सुनें। जो परम सत्ता है, सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीनों गुणों से भी ऊपर जो निर्मल और शुभ ज्योति है, वही परम तत्त्व है और मोक्षप्राप्ति का साधन भी है। श्रीरामेति परं जाप्यं तारकं ब्रह्मसंज्ञितम् ।।21।। ब्रह्महत्यादिपापघ्नमिति वेदविदो विदुः। श्रीराम राम रामेति ये वदन्त्यपि सर्वदा ।।22।। तेषां भुक्तिश्च मुक्तिश्च भविष्यति न संशयः। 'श्रीराम' यह पद जप का परम मन्त्र है। इसे उद्धार करनेवाला तथा ब्रह्म कहा गया है। वेदज्ञानी इसे ब्रह्महत्या आदि पापों का नाशक कहते हैं। 'श्रीराम राम राम' इसे जो प्रतिदिन बोलते भी हैं, उन्हें संसार में धन-सम्पत्ति का भोग और देहान्त के बाद मोक्ष मिलता है, इसमें सन्देह नहीं। नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि रामं कृष्णमनामयम् ।।23।। अयोध्यानगरे रम्ये रत्नमण्डपमध्यगे। स्मरेत् कल्पतरोर्मूले रत्नसिंहासनं शुभम् ।।24।। अब मैं श्रीराम को प्रणाम कर कृष्णवर्ण के पुण्यमय श्रीराम के ध्यान को कहता हूँ। अयोध्या नगर में सुन्दर रत्नमण्डप के बीच में कल्पवृक्ष की जड़ में स्थित रत्नमय शुभ सिंहासन का स्मरण करना चाहिए। तन्मध्येऽष्टदलं पद्मं नानारत्नप्रवेष्टितम् । सौवर्णं राजतं वापि कारयेद् रघुनन्दनम् ।।25।। पार्श्वे भरतशत्रुघ्नौ ध्वजच्छत्रधरावुभौ। चापद्वयसमायुक्तं लक्ष्मणं कारयेत् सुधीः ।।26।। इस मण्डप के बीच नाना प्रकार के रत्नों से जड़े अष्टदल कमल पर श्रीराम की सुवर्ण अथवा चाँदी से निर्मित प्रतिमा स्थापित करें दोनों पाश्र्वों में छत्र और ध्वज धारण किए हुए भरत और शत्रुघ्न तथा दो धनुष थामे हुए लक्ष्मण की प्रतिमा का निर्माण कराना चाहिए।