भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 275

(214) अगस्त्य-संहिता वर्द्धते तत्कुलं भौमे कल्पकोटिशताधिकम् ।। 27 ।। नापण्डितो नापि मूर्खो न दरिद्रोऽपि तत्कुले। नावैष्णवोऽपि जायेत कदाचिदपि कुत्रचित् ।। 28 ।। सूर्य-ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में विधानपूर्वक तुलापुरुष आदि दान करने से जो पुण्य मिलता है, वही श्रीराम की मूर्तिप्रतिष्ठा करके मिलता है। जो मनुष्य विधानपूर्वक श्रीरामचन्द्र की मूर्ति स्थापित करते हैं, वे सांसारिक सभी सुखों का भोगकर नारायण हो जाते हैं। इस संसार में उनके कुल की वृद्धि सौ करोड़ कल्पों तक होती है। उनके कुल में सभी विद्वान् होते हैं कोई न तो मूर्ख होता है, न दरिद्र। कभी कहीं भी उनके कुल में विष्णु की भक्ति से हीन नहीं होते। लौहेन निर्मिता वापि दारुणा वा यथाविधि। कारयेत् प्रतिमां रम्यां श्रीरामस्य शुभे दिने ।। 29 ।। लक्ष्मणस्यापि सीतायाः मारुतेश्च विशेषतः। सीता स्वर्णनिभा कार्या लक्ष्मणोऽपि तथा भवेत् ।। 30 ।। लोहा अथवा काष्ठ से शुभ दिन में श्रीराम की सुन्दर प्रतिमा का निर्माण कराना चाहिए। अपने अपने वैशिष्ट्य के अनुसार लक्ष्मण, सीता और हनुमान् की भी प्रतिमा का निर्माण कराना चाहिए। सीता की प्रतिमा सोना के समान चमकीली होनी चाहिए, लक्ष्मण की भी उसी प्रकार होनी चाहिए। संशोध्य देवतागारं निर्माणस्थानमुत्तमम्। शल्यलोष्टादिवर्ज्यञ्च कुर्याद्यत्नेन शोधयेत् ।। 31 ।। खनेत् तद्भूप्रदेशान्तं जलोत्पत्तिर्यथा भवेत्। यथा पाषाणसिकताः पूरयेत्पूर्ववत् सुधीः ।। 32 ।। कुट्टिमं च प्रकुर्वीत निवासस्थानमुत्तमम्। शुद्धरम्यशिलापट्टैरनेकेश्च सुविस्तरैः ।। 33 ।। देववासप्रदेशं तु पूर्ववद्भूमिकोन्नतम्। हस्तद्वयोन्नतं कुर्यात् सुविस्तीर्णं मनोरमम् ।। 34 ।। कुर्याद्दिवालयं रम्यं सर्वनेत्रोत्तमं परम्¹।

  1. क. सर्वनेत्रोत्सवं यथा।