भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

एकोनत्रिंशोऽध्यायः (215) प्राकारं कारयेत्तत्र *चतुर्गोपुरसंयुतम्¹ ।।३५।। पीठं रम्यं प्रकुर्वीत शिलायां चोन्नतोन्नतम्। हस्तद्वयायतं कुर्याच्चतुरस्रं सुशोभनम् ।।३६।। मन्दिर तथा चारों ओर के स्थान से काँटा, गड़ा हुआ ढेला (पत्थर, ईंट आदि का टुकड़ा) प्रयत्नपूर्वक हटाकर शोधन करें। तब उस स्थान पर तब तक खुदाई करें, जबतक पानी नहीं छूट जाता है। तब उस गड्ढे को पत्थर और बालू आदि से भर दें और ऊपर पत्थर कूट कूट कर दृढ़ बनावें। इस उत्तम निवास स्थान को शुद्ध तथा सुन्दर बड़े शिलापट्टों से मन्दिर की भूमि को पूर्वोक्त विधि से दो हाथ ऊँची और सुन्दर रूप से विस्तृत करें। वहाँ पर रम्य देवालय का निर्माण करें, जो सबकी आँखों को अच्छा लगे। वहाँ चारों ओर मेहराव से युक्त भवन बनाएँ। उसमें पत्थर की शिला पर क्रमशः ऊँचा करते हुए सुन्दर पीठ का निर्माण करावें। यह पीठ दो हाथ लंबा-चौड़ा चौकोर और सुन्दर होना चाहिए। अग्रभागे हनूमन्तं पीठस्य विलिखेन्मुने। पीठशुद्धिं प्रकुर्वीत वक्ष्यमाणविधानतः ।।३७।। लिखेदाग्नेयदिग्भागे सुग्रीवं द्विभुजं पुनः। दक्षिणे भरतं चैव नैर्ऋत्ये च विभीषणम् ।।३८।। पश्चिमे लक्ष्मणं चैव वायव्येऽङ्गदमेव च। शत्रुघ्नं चोत्तरे भागे ऐशान्यामृक्षनायकम्² ।।३९।। इस पीठ के अग्रभाग में हनुमान् की आकृति बनावें। तब आगे कहीं जानेवाली विधि से पीठ की शुद्धि करें। अग्निकोण में दो बाहों वाले सुग्रीव, दक्षिण में भरत, नैर्ऋत्य कोण में विभीषण पश्चिम में लक्ष्मण, वायव्य में अंगद, उत्तर में शत्रुघ्न और ईशान कोण में जाम्बवान् को उत्कीर्ण करें। ततः श्रीरामचन्द्रं च पीठस्योपरि वै लिखेत्। सौवर्णे राजते वापि ताम्रे वापि यथाविधि ।।४०।। शिलायां वा प्रकुर्वीत चतुरस्रं सुशोभितम्। द्वात्रिंशदङ्गुलं वापि षोडशाङ्गुलमेव च। ।४१।। देवस्य स्थापनस्थाने तद्यन्त्रं स्थापयेन्मुने।

  1. ग. रम्यगोपुरसंयुतम् । 2. ग. ऐशान्ये जाम्बुनायकम् ।