अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 277, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(216) अगस्त्य-संहिता इसके बाद पीठ के ऊपर श्रीराम को सुवर्ण, रजत, ताम्र अथवा प्रस्तर के पीठ पर विधि के अनुसार उत्कीर्ण करें। देवता की स्थापना के स्थान पर उनके यन्त्र की स्थापना करें। यह यन्त्र सुन्दर चौकोर, बत्तीस अथवा सोलह अंगुल परिमाण का होना चाहिए। अङ्कुरार्पणमादौ तु सप्तपञ्चत्रिवासरे।।42।। यथाविधि प्रकुर्वीत चन्द्रताराबलान्विते। सबसे पहले सात, पाँच अथवा कमसे कम तीन दिन पूर्व अंकुरार्पण चन्द्र तारा आदि के बली होने पर विधान से करें। गणेशप्रार्थनां कुर्यात् सर्वविघ्नोपशान्तये।।43।। सुवर्णप्रतिमां पूज्यां वस्त्रद्वयसमन्विताम्। कुटुम्बिने दरिद्राय ब्राह्मणाय निवेदयेत्।।44।। एकाक्षरो गणेशस्य ध्यानमार्गेण यत्नतः। श्रीरामप्रतिमां वापि दशाक्षरविधानतः।।45।। आत्ममूलेन वाचापि द्वादशाक्षरमार्गतः। येन केनापि मार्गेण कारयेद्विधिवन्मुने।।46।। तब गणेश की प्रार्थना सभी प्रकार के विघ्नों की शान्ति के लिए करें। जोड़ा वस्त्र से युक्त स्वर्ण-प्रतिमा की पूजा कर गृहस्थ एवं दरिद्र ब्राह्मण को दान करें। गणेश का एकाक्षर मन्त्र है, जिसका ध्यान कर अथवा श्रीराम की प्रतिमा को दशाक्षर मन्त्र के विधान से अथवा अपने मूल मन्त्र से अथवा द्वादशाक्षर मन्त्र की विधि से जिस किसी भी प्रकार से स्थापना कराएँ। इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये श्रीरामप्रतिष्ठाविधिर्नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः।।29।। अथ त्रिंशोऽध्यायः सुतीक्ष्ण उवाच कथं दशाक्षरादीनां मार्गो वै मुनिसत्तम। आचक्ष्व सरहस्यं मे त्वयि भक्तस्य सुव्रत।।1।।