अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिशोऽध्यायः (217) सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे मुनिश्रेष्ठ! दशाक्षर आदि मन्त्र की कैसी पद्धति है, यह मुझे रहस्य के साथ बताएँ, जो आपकी दृष्टि में हो। अगस्त्य उवाच। साधु वक्ष्यामि ते सर्वं शृणुष्वावहितो मुने। सीतालङ्कृतवामाङ्कं द्विभुजं चारुलोचनम् ।। २ ।। वामहस्तेन सीतायाः स्पृशन्तं स्तनमण्डलम्। ज्ञानमुद्रायुतेनान्येनापि तल्लोकसुन्दरम् ।। ३ ।। धनुर्द्वययुतेनापि लक्ष्मणेन सुशोभितम्। कोटिकन्दर्पसंकाशं राघवं करुणाकरम् ।। ४ ।। उपविष्टं पद्ममध्ये वीरासनमनोहरम्। हनुमत्सेवितं चाग्रे कुर्यादेवं मनोहरम् ।। ५ ।। अगस्त्य बोले- हे मुनि! अच्छा, मैं तुम्हें सब कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो। जिनके वामभाग में सीता शोभित हों, बायें हाथ से सीता के स्तनमण्डल को स्पर्श करते हुए दूसरे हाथ से ज्ञानमुद्रा धारण करनेवाले दो भुजाओं वाले एवं सुन्दर आँखों वाले श्रीराम का ध्यान करें। जो दो धनुष लिए हुए लक्ष्मण से शोभित हैं, करोड़ों कामदेव के समान सुन्दर हैं, कमल के मध्य में वीरासन में बैठे हुए हैं, करुणा करनेवाले हैं तथा जिनके आगे हनुमान आज्ञा की प्रतीक्षा में है। दशाक्षरोऽयं कथितो विधिना मुनिपुङ्गवैः। नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं विभुम् ।। ६ ।। द्विभुजं कंजनयनं दिव्यसिंहासने स्थितम्। वसिष्ठाद्यैः परिवृतं हाररत्नकिरीटिनम् ।। ७ ।। सीतासंलापचतुरं दिव्यगन्धादिशोभितम्। चापद्वयकरेणारात् सेवितं लक्ष्मणेन च ।। ८ ।। शत्रुघ्नभरताभ्यां च पार्श्वयोरुपसेवितम्। ऐसे श्रीराम का दशाक्षर मन्त्र 'क्लीं सीतारामचन्द्राभ्यां नमः' है। नीलकमल के समान श्यामल वर्णवाले, पीताम्बरधारी, दो हाथों वाले, कमलनयन, दिव्य सिंहासन पर स्थित, वसिष्ठ आदि पार्षदों से चारो ओर से घिरे हुए, रत्न का मुकुट धारण करनेवाले, श्रीसीता के साथ आलाप करने में चतुर, दिव्य चन्दन आदि से Rarest Archiver