अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 279, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ें(218) अगस्त्य-संहिता शोभित दो धनुष हाथ में लिए हुए लक्ष्मण द्वारा दूर से सेवित, दोनों पार्श्वों में शत्रुघ्न और भरत से सेवित प्रभु श्रीराम ध्यातव्य हैं। ध्यायन्ननन्यधी रामं द्वादशाक्षरमन्वहम् ।।९।। प्रजपेद्दीक्षितो नित्यं श्रीरामन्यासपूर्वकम्। मन्त्रसन्ध्यां विधायैव त्रिकाले पूजयेत् सदा ।।१०।। ऐसे श्रीराम का ध्यान करते हुए दीक्षित द्वादशाक्षर मन्त्र 'रां क्लीं ह्रीं ऐं हुं क्षौं श्रीं आं क्रौं फट् स्वाहा' प्रतिदिन श्रीराम का न्यास और मन्त्रसन्ध्या कर जप करे और तीनों कालों में पूजन करे। क्रीडन्तं सीतया सार्द्धं नीलजीमूतसन्निभम्। वृषाकपिच्छाद्यष्टेन वसिष्ठेन स्मृतं विभुम् ।।११।। तद्गदादाय सौमित्रं चापबाणग्रहोद्यतम्। चापद्वयभृतं पश्चाल्लक्ष्मणं तु सुशोभनम् ।।१२।। सर्वलोकहितोद्युक्तं पीताम्बरधरं विभुम्। ध्यायन् सप्ताक्षरं जप्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।^1 ।।१३।। सीता के साथ क्रीडा करते हुए, नील मेघ के समान, वृषाकपिच्छ^1 अर्थात् हनुमान् आदि आठ देवताओं और वसिष्ठ के द्वारा स्मरण किए गये श्रीराम, जिनके पीठ पीछे दो धनुष लिए हुए सुन्दर रूप वाले लक्ष्मण धनुष और बाण लेकर तैयार हैं। ऐसे श्रीराम, जो सभी लोकों की भलाई करने के लिए तैयार हैं, पीत वस्त्र धारण करते हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर सात अक्षरों वाला मन्त्र जपकर सभी पापों से मुक्त हो जाता है। सुनीलाम्बुदसंकाशं धनुर्बाणकरं मुने। ध्यायेदष्टाक्षरं जप्त्वा राम एव भवेत्ततः ।।१४।। सुन्दर नील मेघ के समान तथा हाथ में धनुष और बाण धारण करने वाले श्रीराम का ध्यान करते हुए अष्टाक्षर मन्त्र का जपकर इससे साधक राम ही हो जाये। ज्ञानमुद्रालसद्बाहुं हनुमत्सेवितं पुनः। शत्रुघ्नभरताभ्यां च लक्ष्मणेन समावृतम् ।।१५।। ध्यायेदेकाक्षरं जप्त्वा मुक्तो भवति भाजनम्।
- वैदिक साहित्य में 'वृषाकपि' वानरवाची शब्द प्रयुक्त हुआ है।