अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 337 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिंशोऽध्यायः (219)
श्रीराम हाथ से ज्ञान मुद्रा धारण किए हुए हैं, हनुमान् जिनकी सेवा कर रहे हैं तथा शत्रुघ्न, भरत और लक्ष्मण से घिरे हुए हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान करते हुए आधार स्वरूप एकाक्षर मन्त्र का जप कर साधक मोक्ष प्राप्त करता है। अन्याश्च मूर्त्तयः सन्ति बहवो मुनिसत्तम ।।16।। आसामन्यतमा मूर्तिः स्थापनीया प्रयत्नतः। मन्त्राँस्तु वैष्णवानुक्त्वा मूलमन्त्रस्य चेतसा ।।17।। देवस्यापि प्रकुर्वीत ततोऽस्ति किमतः परम्। प्राणप्रतिष्ठां तन्न्यासान् यथाविधि विचक्षणाः ।।18।। लक्ष्मणस्यापि मन्त्रस्य न्यासं देव्याश्च मारुतेः। शत्रुघ्नभरतादीनां कुर्याद्यत्नेन देशिकः ।।19।। हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! श्रीराम की ऐसी अन्य अनेक मूर्तियाँ हैं। इनमें से एक मूर्ति की स्थापना यत्नपूर्वक करनी चाहिए। वैष्णव-मन्त्रों का उच्चारण कर मूल मन्त्र का उचित प्रयोग करें, इससे बढ़कर और क्या होगा? लक्ष्मण, देवी सीता तथा हनुमान् के दिव्य-मन्त्रों को तथा शत्रुघ्न, भरत आदि के मन्त्रों का भी न्यास प्रयोग-साधक यत्नपूर्वक करें। सुतीक्ष्ण उवाच लक्ष्मणादिमनूनां च विधानं लक्षणं मुने। वक्तुमर्हसि मे सर्वं भक्तस्यैवं दयानिधे ।।20।। सुतीक्ष्ण ने कहा- हे दयानिधि अगस्त्य! लक्ष्मण आदि के मन्त्रों के लक्षण एवं विधान भी आप मुझे कह सकते हैं, क्योंकि मैं भी भक्त हूँ। अगस्त्य उवाच शृणु वक्ष्यामि ते सर्वं सुविस्तरमनेकधा। रेफपूर्वं समुद्धृत्य विन्दुलक्षणसंयुक्तम् ।।21।। ङेन्तोयं लक्ष्मणमनुर्नमसा च समन्वितः। ऋषिः स्यामहमेवात्र गायत्रीच्छन्द उच्यते ।।22।। लक्ष्मणो देवता प्रोक्ता लं बीजं शक्तिरेव हि। नमः स्याद्विनियोगे हि पुरुषार्थचतुष्टये ।।23।। दीर्घमात्राञ्च बीजेन षडङ्गानि समाचरेत्।