अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ
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(220) अगस्त्य-संहिता
अगस्त्य बोले- सुनो! मैं अनेक प्रकार से विस्तारपूर्वक तुम्हें सबकुछ कहता हूँ। रेफ के साथ बिन्दु लगाकर पहले बोलना चाहिए। तब डेन्त लक्ष्मण पद (लक्ष्मणाय) 'नमः' पद जोड़कर बोलें। यह लक्ष्मण मन्त्र है। इसका ऋषि मैं हूँ, गायत्री छन्द कहा जाता है। इसके देवता लक्ष्मण हैं, लं बीज है और 'नमः' शक्ति है। विनियोग में पुरुषार्थचतुष्टय कामना है। बीज के साथ दीर्घमात्राओं को जोड़कर षडंगों का न्यास करें। द्विभुजं स्वर्णरुचिरतनुं पर्णनिभेक्षणम्। धनुर्बाणकरं रामसेवासंसक्तमानसम् ॥२४॥ दो भुजाओंवाले, स्वर्ण के समान सुन्दर शरीरवाले तथा कोमल पत्र के समान आँखोंवाले, हाथों में धनुष और बाण धारण करनेवाले और श्रीराम की सेवा में संलग्न चित्त वाले श्रीलक्ष्मण का ध्यान करें। पूजापि वैष्णवे पीठे साङ्गावरणवर्जिते। सप्तलक्षं पुरश्चर्या ततः सिद्धिं तु साधयेत् ॥२५॥ लक्ष्मण की पूजा भी वैष्णव पीठ पर होगी, जिसपर अंग देवता और आवरण देवता न रहें। लक्ष्मण का पुरश्चरण सात लाख मन्त्रों का है इसके बाद सिद्धि के लिए साधना करनी चाहिए। देव्यास्तु पूर्वमेवोक्तं सह रामेण तद्भवेत्। भरतस्यैवमेवं स्यात् शत्रुघ्नस्याप्ययं विधिः ॥२६॥ अगस्त्येनोदिताः ह्येते प्राधान्येनापि सत्तम। श्रीरामपूजानिरत एतेन पूजयेत् सदा ॥२७॥ देवी सीता का ध्यान आदि तो श्रीराम के साथ ही पूर्व में कहे गये हैं। वहीं करें। भरत का लक्ष्मण से समान होना चाहिए। शत्रुघ्न की भी यही विधि है। अंग-देवताओं के रूप में ये प्रमुख कहे गये हैं। श्रीराम की पूजा में रत साधक इस प्रकार पूजन करें। आदौ जाप्यं ततो वापि पूजाया राघवस्य तु। एतेषामपि कर्तव्या भुक्तिमुक्तिफलेप्सुभिः ॥२८॥ श्रीराम की पूजा के प्रारम्भ में इन अंग देवताओं के मन्त्रों का जप करना चाहिए अथवा पूजा के बाद जप करना चाहिए। भोग और मोक्ष के इच्छुक साधक इन अंग-देवताओं की भी पूजा करें।
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