अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिंशोऽध्यायः (221) — — — — — — — — — — — — — — प्राधान्येन पूज्येन अङ्गत्त्वे रामपीठके। हनूमतोप्येवमेव कुर्यात् पूजामतन्द्रितः ।।२९।। मुख्य रूप से श्रीराम के पीठ पर अंग देवता के रूप में हनुमान् की भी इस प्रकार से आलस्य छोड़कर पूजन करें। पूर्वं नमः पदं चोक्त्वा ततो भगवते पदम्। आञ्जनेयपदं ङेन्तं महाबलपदं तथा।।३०।। वह्निजायान्त एव स्यान्मन्त्रो हनुमतः परम्। सर्वसिद्धिकरः प्रोक्तः सर्वेषामपि सर्वदा।।३१।। मालाख्यः परमो मन्त्रो मारुतेः सर्वसिद्धिदः। पहले 'नमः' बोलकर तब 'भगवते' यह पद बोलें। इसके बाद चतुर्थी विभक्ति में 'आञ्जनेय' पद (आञ्जनेयाय) कहें तब वैसे ही महाबल पद (अर्थात् महाबलाय) कहें। इसके अन्त में वह्निजाया (स्वाहा) लगावें। इस प्रकार "नमो भगवते आञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा"- यह हनुमान का मन्त्र है। इसे सबके के लिए सदा सभी सिद्धियाँ देनेवाला कहा गया है। यह सभी सिद्धियाँ देनेवाला हनुमान् का माला मन्त्र है। लक्ष्मणस्तु सदा पूज्यः प्राधान्येनैव नित्यशः।।३२।। यथा रामस्य पूजा स्यात् तथा तस्यापि नित्यशः। वैष्णवं न्यासजालं च सर्वं कृत्वा समाहितः ।।३३।। भूतशुद्धिं विधायैव मातृकापि प्रयत्नतः। विधाय मानसीं पूजां बाह्यपूजामपि द्वयम्।।३४।। त्रिकालमेककालं वा नित्यमेकान्तमाश्रितः। प्रधान देवता के रूप में प्रतिदिन लक्ष्मण की पूजा करें। जिस प्रकार श्रीराम की पूजा प्रतिदिन होती है उसी प्रकार लक्ष्मण की भी पूजा होनी चाहिए। सभी वैष्णव न्यास कर मानस-पूजा कर तीनों कालों में या एक काल प्रतिदिन एकान्त में रहते हुए पूजन करें। साफल्यं रामपूजाया च इच्छेन्नियतव्रतः।।३५।। तेन यत्नेन कर्तव्या लक्ष्मणस्यापि विस्तरात्।