भारतकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

(222) अगस्त्य-संहिता श्रीराम पूजा की सफलता की इच्छा जो रखते हों, वे नियम का पालन करते हुए यत्नपूर्वक लक्ष्मण की पूजा भी विस्तार से करें। श्रीराममन्त्रभेदास्तु बहवः सन्ति वै मुने॥36॥ तत्साधकैस्सदा कार्या सौमित्रेरपि सर्वशः। परं ब्रह्मापि लोकेस्मिन् रामलक्ष्मणसंज्ञया॥37॥ आविर्भूय च कार्त्स्न्येन सेव्यतां तु द्वयं सदा। श्रीराम के मन्त्र अनेक प्रकार के हैं। उन मन्त्रों के जो साधक हैं, वे सदा हर प्रकार से लक्ष्मण की पूजा करें। परम ब्रह्म इस संसार में श्रीराम और लक्ष्मण के नाम से अंग के रूप में प्रकट हुए हैं, अतः दोनों की सदा सेवा करें। अष्टोत्तरसहस्त्रं वा शतं वा सुसमाहितः॥38॥ लक्ष्मणस्य मनुर्जप्यो मुमुक्षुभिरतन्द्रितैः। एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ बार एकाग्र होकर आलस्य का त्याग कर मोक्षार्थियों को लक्ष्मण के मन्त्र का जप करना चाहिए। तारकं ब्रह्म लोकेऽस्मिन् यथा सेव्यो मुमुक्षुभिः॥39॥ तथैव लक्ष्मणमनुः सदा सेव्यो भवेदिह। जिस तरह तारक ब्रह्म मोक्षार्थियों का पूज्य है, उसी प्रकार लक्ष्मण का भी मन्त्र इस संसार में सेव्य होना चाहिए। दशाक्षरादिमन्त्राणां साफल्यस्यापि कांक्षया॥40॥ सेव्योऽयं सर्वदा मन्त्र ऐहिकामुष्मिकप्रदः। दशाक्षर आदि मन्त्रों की सफलता की इच्छा से भी यह मन्त्र हमेशा जप करने योग्य है, जो संसार में और परलोक में कामनाओं को पूर्ण करता है। अजप्त्वा लक्ष्मणमनुं राममन्त्रा जपन्ति ये॥41॥ तज्जप्तस्य फलं नैव प्रयान्ति कुशला अपि। अरिमित्रविवेकोऽपि नैव कार्यों भवेदिह॥42॥ लक्ष्मण का मन्त्र जप किए विना जो श्रीराम का मन्त्र जपते हैं, उस जप का फल वे अच्छे साधक भी प्राप्त नहीं करते हैं। इस मन्त्र में शत्रु और मित्र का भी विचार नहीं होना चाहिए।